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चैतन्य महाप्रभु के कीर्तनों से सैंकड़ों मुस्लिमों ने हिंदु धर्म में घरवापसी की

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  • राजेश झा ( विश्व संवाद केंद्र, मुंबई)

” घर में रहते हुए मैं वह काम नहीं कर सकता, जो करना चाहता हूं। देश में नास्तिकता, हिंसा और वाम-मार्ग के कारण बड़ी बुरी-बुरी बातें फैल रही है। मैं अज्ञान के अंधेरे को दूर करना चाहता हूं। घूम-घूमकर कृष्णभक्ति का सन्देश सारे देश को सुनाना चाहता हूं। जात-पांत के बंधनों से लोगों को निकालना चाहता हूं।

निमाई ने झट अपनी पुस्तक गंगाजी में फेंक दी। बोले, “यह तो एक पुस्तक है। मित्र के लिए मैं अपने प्राण भी दे सकता हूं।”

“मेरे यश और वेश से डाह करनेवालों को सीधे रास्ते पर लाने का केवल एक ही उपाय है और वह है त्याग। त्याग करके ही मैं दुनिया की भलाई में लग सकता हूं”।

जन्म: 18 फ़रवरी सन् 1486
जन्मस्थान :मायापुर (नादिया / नवद्वीप , पश्चिम बंगाल )

नाम : विश्वम्भर मिश्र ,निमाई ,गौर हरि, गौर सुंदर ,गौरांग महाप्रभु , चैतन्य महाप्रभु
माता : शुचि देवी
पिता : जगन्नाथ मिश्र
गुरु : केशव भारती और माधवेन्द्र पुरी

स्थापना : वैष्णव गौड़ीय सम्प्रदाय , वृन्दावन की पुनर्रचना

  • मृत्यु: सन् 1534

भक्तिकाल के प्रमुख संतों में से एक चैतन्य महाप्रभु ने वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी और भजन गायकी की एक नयी शैली को जन्म दिया। समाज से जाति-पांत, ऊँच-नीच की भावना को दूर करने की शिक्षा देनेवाले चैतन्य महाप्रभु का जन्म 18 फ़रवरी सन् 1486 की फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को पश्चिम बंगाल के नवद्वीप (नादिया) नामक उस गांव में हुआ, जिसे अब ‘मायापुर’ कहा जाता है।इनका जन्म संध्याकाल में सिंह लग्न में चंद्र ग्रहण के समय हुआ था। इनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र व मां का नाम शचि देवी था। कहते हैं कि जगन्नाथ -शुचि के एक- के- बाद एक करके आठ कन्याएं पैदा हुईं और मरती गईं। फिर एक लड़का पैदा हुआ। भगवान की दया से वह बड़ा होने लगा। उसका नाम उन्होंने विश्वरूप रखा। विश्व रूप जब दस बरस का हुआ तब उसके एक भाई और हुआ। माता-पिता की खुशी का ठिकाना न रहा। बुढ़ापे में एक और बालक को पाकर वे फूले नहीं समाये। कहते हैं, यह बालक तेरह महीने माता के पेट में रहा। उसकी कुंडली बनाते ही ज्योतिषी ने कह दिया था कि वह महापुरूष होगा। यही बालक आगे चलकर चैतन्य महाप्रभु हुआ।

प्रपंची मुसलमानों द्वारा जब हिन्दूओं को छल एवं बलपूर्वक गऊ -मांस खिलाकर धर्मच्युत किया जाता था उस परिवेश में चैतन्य महाप्रभु का प्रादुर्भाव हिंदुत्व को संजीवनी ही थी। चैतन्य महाप्रभु जैसे महान संतों ने जनसाधारण में’ हिंदुत्व के प्रति भक्ति और समर्पण’ तथा अपने ‘महान इतिहास एवं राष्ट्र के प्रति गर्व’ की भावना जगाये रखी। इसके अलावा उन्होने विधवाओं को ज्ञानमार्ग पर लाकर उनका जीवन सफल बनाया तथा सामाजिक सद्भाव को सुदृढ़ किया।

चैतन्य के जन्मकाल के कुछ पहले सुबुद्धि राय गौड़ के शासक थे। उनके यहाँ हुसैनख़ाँ नामक एक पठान नौकर था। राजा सुबुद्धिराय ने किसी राजकाज को सम्पादित करने के लिए उसे रुपया दिया। हुसैनख़ाँ ने वह रकम खा- पीकर बराबर कर दी। राजा सुबुद्धिराय को जब यह पता चला तो उन्होंने दंड स्वरूप हुसैनख़ाँ की पीठ पर कोड़े लगवाये। हुसैनख़ाँ चिढ़ गया। उसने षड्यन्त्र रच कर राजा सुबुद्धिराय को हटा दिया। अब हुसैन ख़ाँ पठान गौड़ का राजा था और सुबुद्धिराय उसका कैदी। हुसैनख़ाँ की पत्नी ने अपने पति से कहा कि पुराने अपमान का बदला लेने के लिए राजा को मार डालो। परन्तु हुसैनख़ाँ ने ऐसा न किया। वह बहुत ही धूर्त था, उसने राजा को जबरदस्ती मुसलमान के हाथ से पकाया और लाया हुआ भोजन करने पर बाध्य किया। वह जानता था कि इसके बाद कोई हिन्दू सुबुद्धिराय को अपने समाज में शामिल नहीं करेगा। इस प्रकार सुबुद्धिराय को जीवन्मृत ढंग से अपमान भरे दिन बिताने के लिए ‘एकदम मुक्त’ छोड़कर हुसैनख़ाँ हुसैनशाह बन गया। चैतन्य प्रभु ने ‘कृष्ण महामंत्र ‘ देकर कालांतर में सुबुद्धिराय का उद्धार किया।

अस्तु ,उन दिनों देश में छूआछूत ओर ऊंच-नीच का भेद बहुत था।विशेषतः वैष्णव और ब्राह्मण अपने या अपने घरवाले के ही हाथ का पका हुआ खाना खाते थे।एक दिन एक ब्राह्मण निमाई के यहां आया।पिता जगन्नाथ मिश्र ने उसकी बड़ी आवभगत की। शचीदेवी ने उन्हें सीदा ( बिना पकाया हुआ भोज्य सामग्री ) दिया।ब्राह्मण ने चौका लीप-पोत कर तैयार किया और खाना बनाया। खाने से पहले वह आंखें बन्द करके विष्णु भगवान को भोग लगाने लगा। तभी निमाई ने आकर उसकी थाली में से खाना खाना शुरू कर दिया। यह देखकर ब्राह्मण चिल्लाने लगा।उनकी आवाज सुनते ही मिश्रजी और शचीदेवी दौड़े आये। मिश्रजी ने निमाई को पकड़ लिया और उन्हें पीटना ही चाहते थे कि ब्राह्मण ने छुड़ा दिया।मिश्रजी और शचीदेवी के आग्रह पर ब्राह्मण ने दूसरी बार भोजन तैयार किया। निमाई को अलग जाकर रस्सी से बांध दिया, पर भगवान को भोग लगाते समय फिर वही घटना घटी। निमाई रस्सी खोलकर आ गये और थाली में से चावल खाने लगे। अब की बार मिश्रजी के गुस्से का ठिकाना न रहा। वह मारने को लपके, पर ब्राह्मण ने उन्हें रोक दिया।
उसी समय पाठशाला से पढ़कर निमाई के बड़े विश्वरूप आ गये। सबने मिलकर ब्राह्मण से फिर खाना बनाने का आग्रह किया।ब्राह्मण मान गया। विश्वरूप और माता ने निमाई के रस्सी से बांधकर अपने पास बिठा लिया। कहते हैं, जब ब्राह्मण ने भोजन बनाकर भगवान विष्णु को भोग लगाया तो भगवान चतुर्भुज रूप में उसके सामने आ खड़े हुए और बोले, “तुम्हारे बुलाने पर मैं बालक के रूप में दो बार तुम्हारे पास आया, पर तुम पहचान नहीं पाये। अब जो इच्छा हो, मांगो।” ब्राह्मण गदगद् हो गया। बस, मुझे यही वर दीजिए कि आपकी मूर्ति सदा मेरे हृदय में बसी रहे।” विष्णु भगवान ने कहा, “ऐसा ही होगा।” ब्राह्मण ने बड़ी खुशी से भोजन किया। फिर वह निमाई को देखने गया। वह सो रहे थे। ब्राह्मण ने मन-ही-मन उन्हें प्रणाम किया और अपने घर लौट गया।जिसके घर से जो कुछ मिलता, निमाई भी वही खा लेते थे । पड़ोसिन प्यार से उन्हें खिलातीं। कोई-कोई कहतीं, “निमाई ब्राह्मण होकर हर किसी का छुआ खा लेता है।” निमाई हंसकर कहते, “हम तो बालगोपाल हैं। हमारे लिए ऊंच-नीच क्या! तू खिला, हम तेरा खा लेंगे।”

Chaitnya Mhaprabhu

एक दिन की बात है। बालक के स्वभाव की जांच करने के लिए पिताजगन्नाथ मिश्र ने उसके सामने खिलौने, रुपये और भगवतगीता रख दी। बोले, “बेटा, इनमें से कोई-सी एक चीज़ उठा लो।” बालक ने भगवतगीता उठा ली। पिता समझ गये कि आगे चलकर यह बालक भगवन का बड़ा भक्त होगा। एक बार निमाई काले नाग से खेलते हुए पाये गए।उनके चारों ओर सांप-कुंडली मार कर बैठा हुआ था ओर वह बड़े प्यार से उसके शरीर पर हाथ फेर रहे थे। लोगों को पक्का विश्वास हो गया कि हो-न-हो, इस बालक के शरीर में कोई महान आत्मा रहती है। निमाई बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा संपन्न थे। साथ ही, अत्यंत सरल, सुंदर व भावुक भी थे। बाल्यावस्था में इनका नाम विश्वंभर था, परंतु सभी इन्हें ‘निमाई’ कहकर पुकारते थे। गौरवर्ण का होने के कारण लोग इन्हें ‘गौरांग’, ‘गौर हरि’, ‘गौर सुंदर’ आदि भी कहते थे।

निमाई जितने शरारती थे, बड़े भाई विश्वरूप उतने ही गम्भीर और अपने विचारों की दुनिया में खोये रहने वाले आदमी थे।विश्वरूप की उम्र इस समय १६-१७ साल की थी। माता-पिता विश्वरूप के विवाह की बात सोचने लगे, किन्तु उनकी लगन दूसरी ही ओर थी। मां-बाप ने जोर दिया तो अवसर पाकर एक दिन वह रात को घर से निकल गये और संन्यासी हो गये। बहुत ढूंढ़ने पर भी उनका पता न चला। मिश्रजी और शचोदेवी के दु:ख की सीमा न रही। निमाई पर भी इस घटना का बहुत असर पड़ा। वह भी अब गम्भीर रहने लगे।निमाई का मन अब पढ़ने की ओर झुका, पर पिता को उसमें रस न था। वह सोचते थे कि एक लड़का तो खो ही गया, कहीं दूसरा भी हाथ से न चला जाय। वह निमाई को पढ़ते देखते तो बहुत नाराज होते। पर निमाई जब पढ़ने पर ही तुले थे, तो उन्हें कौन रोक सकता था! वह पिता से छिपकर पढ़ते।इस समय उनकी अवस्था ग्यारह वर्ष की थी। इस छोटी-सी उम्र में ही उन्होंने बहुत-कुछ पढ़ डाला। पिता अपने पुत्र की चतुराई की बातें सुन-सुनकर बहुत खुश होते। पर भाग्य के आगे किसका बस चलता है! एक दिन अचानक जगन्नाथ मिश्र को जोर का बुखार चढ़ा और कुछ ही दिनों में वह चल बसे।घर पर दु:ख का पहाड़ टूट पड़ा। पर निमाई ने हिम्मत से काम लिया। अपने-आपको तो सम्भाला ही, मां को भी को भी धीरज बंधाया।

दुखी मां का अब निमाई ही सहारा थे। पढ़ने से जो समय बचता, उसमें वह माता की खूब सेवा करते।व्याकरण के साथ-साथ निमाई अब अन्य विषय भी पढ़ने लगे। धीरे-धीरे उनके ज्ञान की चर्चा चारों ओर होने लगी। उनकी उम्र सोलह साल की हो चुकी थी। लोग उन्हें ‘निमाई पंडित’ कहने लगे।निमाई के एक मित्र थे पं० रघुनाथ। वह उन दिनों एक पुस्तक लिख रहे थे। उनका विचार था कि इस पुस्तक को लिख लेने पर उस विषय का उनसे बड़ा विद्वान कोई नहीं होगा। तभी उन्हें पता लगा कि निमाई पंडित भी उसी विषय पर पुस्तक लिख रहे हैं। वह जानते थे कि निमाई इस विषय के पंडित हैं। वह उनके घर पहुंचे। रघुनाथ ने कहा, “सुना है, तुम न्याय पर कोई पुस्तक लिख रहे हो!” हंसते हुए निमाई ने कहा, “अजी, छोड़ो। तुम्हें किसी ने बहका दिया होगा। कहां मैं और कहां न्याय जैसा कठिन विषय ! मन-बहलाव के लिए वैसे ही कुछ लिख रहा हूं।”
“फिर भी मैं उसे सुनना चाहता हूं।” रघुनाथ ने जोर देकर कहा।

“जैसी तुम्हारी इच्छा! चलो, गंगाजी पर नाव में सैर करेंगे और पुस्तक भी सुनायेंगे।”

दोनों गंगा-घाट पर पहुंचे और नाव में बैठकर घूमने लगे। निमाई ने अपनी पुस्तक पढ़नी शुरू की। सुनकर रघुनाथजी रोने लग गये।

“निमाई ने हैरानी से पूछा, “क्यों, क्या हुआ? रो क्यों रहे हो?”

“निमाई, मेरी बरसों की मेहनत बेकार गई। तुम्हारी इस पुस्तक के सामने मेरी पुस्तक पर कौन ध्यान देगा? अपनी जिस पुस्तक पर मुझे इतना गुमान था, वह तो इसके सामने कुछ भी नहीं है ” रघुनाथ ने कहा।

निमाई हंसने लगे। बोले, “बस इतनी-सी बात के लिए परेशान हो!” यह कहकर उन्होंने झट अपनी पुस्तक गंगाजी में फेंक दी। बोले, “यह तो एक पुस्तक है। मित्र के लिए मैं अपने प्राण भी दे सकता हूं।”

उस दिन के बाद से फिर निमाई पाठशाला में पढ़ने नहीं गये। घर पर ही पिता और भाई की किताबों से पढ़ने लगे।कुछ दिन बाद उन्होंने लड़कों को पढ़ाने के लिए एक पाठशाला खोली। धीरे-धीरे उसमें बहुत-से विद्यार्थी हो गये। उनमें कई तो उम्र में उनसे बड़े थे। निमाई अपने विद्यार्थियों को खूब मेहनत से पढ़ाते और मित्र की तरह उनसे प्रेमभाव रखते। माता के बहुत दबाव डालने पर उन्होंने पंडित बल्लभाचार्य की पुत्री लक्ष्मीदेवी से विवाह कर लिया। लक्ष्मीदेवी को वह बचपन से ही जानते थे।इन्ही दिनों नवद्वीप में एक पंडित आये। उन्हें अपने ज्ञान का बड़ा घमंड था, लेकिन निमाई के सामने उन्हें मुंह को खानी पड़ी। इससे निमाई का नाम और प्रचारित हो गया। उनकी पाठशाला विद्यार्थियों से भरी रहती।
कुछ दिनों के लिए निमाई पूर्वी बंगाल की यात्रा पर गये। इसी बीच घर पर सर्पदंश से लक्ष्मीदेवी की मृत्यु हो गई। बेचारी मां को उस समय धीरज बंधानेवाला कोई न था। लौटने पर निमाई को जब यह समाचार मिला तो वह बहुत दुखी हुए। इसी तरह एक-दो बरस निकल गए। निमाई विद्वानों और माता की सेवा करते अपनी पाठशाला में छात्रों को पढ़ाते।अपनी मां का वह बहुत मान करते थे। माता की आज्ञा और आग्रह से उन्होंने पंडित सनातन मिश्र की कन्या विष्णुप्रिया से विवाह कर लिया। सूने घर में फिर चहल-पहल हो गई। विष्णुप्रिया के अच्छे स्वभाव के कारण धीरे-धीरे शचीदेवी और निमाई लक्ष्मीदेवी के विछोह का दु:ख भूल-सा गये।

गया जाकर बहुत-से लोग अपने पितरों का श्राद्ध करते हैं। इस बार नवद्वीप से गया आनेवालों में निमाई भी थे। वह वहां जाकर अपने पिता का श्राद्ध करना चाहते थे। गया में इस समय बड़ी भीड़ थी। माने हुए सिद्ध-महात्मा वहां आये हुए थे। वहीं पर संन्यासी माधवेन्द्र पुरी से निमाई की भेंट हुई। नवद्वीप में एक बार वह पहले भी मिल चुके थे। पर तब के और अब के निमाई में बड़ा अन्तर था। भेंट होते ही निमाई ने श्रद्धा से उनके चरण पकड़ लिये। संन्यासी ने उन्हें प्यार से आशीर्वाद दिया। निमाई बोले, “स्वामी! संसार की गति के साथ यह जीवन इसी तरह बीत जायगा। अब हमें भी कृष्ण-भक्ति दीजिये।”
संन्यासी ने सरलता से कहा, “आप तो स्वयं कृष्णरूप हैं। पहुंचे हुए पंडित हैं। आपको कोई क्या दीक्षा देगा!”

निमाई के बहुत जोर देने पर माधवेन्द्र पुरी स्वामी ने उन्हें दीक्षा दे दी। ज्यों ही निमाई के कान में मंत्र फूंका गया, वह बेहोश हो गए और उसी हालत में चिल्लाने लगे, “अरे प्यारे कृष्ण, तुम कहां हो? मुझे भी अपने पास बुला लो।” होश आने पर अपने साथियों से बोले, “भैया, तुम घर लौट जाओ। हम तो अब कृष्ण के पास वृन्दावन जाते हैं।”

पर पुरी स्वामी ने उन्हें समझाकर कहा, “वृन्दावन बाद में जाना। पहले नवद्वीप में कृष्ण-भक्ति की गंगा बहाओ। पहले अपने यहां के लोगों का उद्धार करो।”
गुरु की आज्ञा से निमाई नवद्वीप लौट आये।

गया से लौटने के बाद निमाई का मन पाठशाला में न लगा। वह हर समय कीर्त्तन में लीन रहने लगे। व्याकरण पढ़ाते-पढ़ाते श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन करने लगते, फिर कृष्ण-वियोग में फूट-फूटकर रोने लगते।धीरे-धीरे पाठशाला का अन्त हो गया। निमाई के कारण नवद्वीप के वैष्णवों में एक नई लहर आ गई। जोरों का कीर्त्तन होता। निमाई कीर्त्तन करते-करते नाचने लग जाते। उनके साथ-साथ और भी भक्त नाचने लगते।भक्तों की संख्या बढ़ने लगी। बिना जात-पांत के भेद के सब लोग उनके कीर्त्तन में शामिल होते थे। लोग उनको भगवान कृष्ण का अवतार मानने लगे।निभाई के विरोधी उन्हें नीचा दिखाने के उपाय सोचते रहते थे।
बंगाल का यह इलाका उन दिनों गौड़ देश के नाम के नाम से प्रसिद्ध था। वहां पर मुसलमान बादशाह का राज्य था। राज्य की ओर से हर बड़े नगर में काजी की अदालत थी।एक बार उन्होंने काजी से शिकायत की कि उनके कीर्त्तन से हम बड़े परेशान हैं। वह शोर मचाकर राज को सोने नहीं देते और कीर्त्तन से हम बड़े परेशान हैं। वह शोर मचाकर रात को सोने नहीं देते और कीर्त्तन के बहाने बुरे-बुरे काम करते हैं। साथ ही उन्होंने मुसलमानों को कृष्ण भक्त बना लिया है।
यह सुनते ही काजी जलभुन गया। उसने फौरन आज्ञा दी कि कहीं भी कीर्त्तन नहीं होगा।
भक्तों ने आकर जब काजी की यह आज्ञा सुनाई तो निमाई पंडित मुस्कुराते हुए बोले , “घबराते क्यों हो? उन्होने नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि निमाई पंडित आज शहर के बाजारों में कीर्त्तन करता हुआ काजी के मकान के सामने जाएंगे और वहां कीर्त्तन करेंगे क्योंकि काजी साहब के उद्धार का समय आ गया है।” इस मुनादी को सुनकर लोगों की खुशी की कोई सीमा न रही। लोगों ने नगर के बाजार सजाये। दूसरे मत को माननेवाले लोगों ने भी अपने मकानों को सजाया। निमाई पंडित अपने भक्तों के साथ कीर्त्तन करते चले “हरिबोल ! हरिबोल !” जुलूस कीर्त्तन करता हुआ बाजारों से गुजरने लगा। निमाई प्रभु-भक्ति में लीन होकर नृत्य कर रहे थे। उनकी आंखों से कृष्ण-विरह में आंसू बह रहे थे। उन्हें देखकर विरोध करनेवालों के भी हृदय उनके चरणों में झुके जा रहे थे।

जनता में काजी की आज्ञा के खिलाफ जोश पैदा होने लगा। जनता चिल्लाने लगी, “काजी का मकान जला दो, काजी को मार दो।” लोग गुस्से में भरे हुए काजी के मकान की ओर बढ़ने लगे।निमाई पंडित कीर्त्तन में मस्त थे। जब भक्तों ने उन्हें लोगों के जोश की बात बतलाई तो उन्होंने कीर्त्तन बन्द कर दिया और गुस्से से भरी हुई जनता के सामने जाकर बोले, “काजी का बुरा करनेवाला मेरा बुरा करेगा। मैं काजी को प्रेम से जीतना चाहता हूं, डर दिखाकर नहीं। इसलिए आप मेरे काम में रुकावट न डालें।”

काजी डर के मारे अपने घर में छिपकर बैठा था। निमाई ने उसके नौकरों से कहा, “काजीसाहब को मेरे आने की खबर दो। उनसे कहो कि डर की कोई बात नहीं। वह मुझ पर यकीन करें। मेरे होते हुए उनका बाल भी बांका न होगा।” गांव के नाते काजी निमाई के मामा लगते थे। नौकरों के समझाने-बुझाने पर काजी बाहर आये।

निमाई पंडित ने प्यार से कहा, “मामाजी, भानजा मिलने आये और मामा मकान के द्वार बन्द करके अन्दर जा बैठे, यह भी कोई बात हुई!”
काजी ने कहा, “तुम्हारे कीर्त्तन में रुकावट डालने का मुझे दु:ख हैं। मैं लोगों के बहकावे में आ गया था। अब तुम खूब कीर्त्तन करो, तुम्हें कोई नहीं रोकेगा।”

इस घटना से निमाई पंडित के हृदय में एक बड़ा परिवर्तन आने लगा। संन्यास लेने की इच्छा पैदा होने लगी। वह सोचते थे कि मेरे यश और वेश से डाह करनेवालों को सीधे रास्ते पर लाने का केवल एक ही उपाय है और वह है त्याग। त्याग करके ही मैं दुनिया की भलाई में लग सकता हूं। यह इच्छा जब उन्होंने भक्तों, अपनी माता और पत्नी के बताई तो सब रोने लगे। सबने उन्हें समझाने की कोशिश की, पर बेकार। निमाई पंडित चट्टान की तरह अटल थे।बाद में सबने उनकी बात मान ली। एक रात को माता और पत्नी को सोता छोड़ वह संन्यास लेने के लिए घर से निकल पड़े।
घर से निकलकर वह केशव भारती की कुटी पर पहुंचे और उनसे दीक्षा देने की प्रार्थना की। उस समय निमाई की उम्र चौबीस साल की थी।
केशव भारती ने उन्हें बहुत समझाया। कहा, “अभी तुम्हारी उम्र छोटी है। तुम्हारे कोई बाल-बच्चा भी नहीं है। इस हालत में तुम्हारे लिए संन्यास लेना ठीक नहीं होगा। जाओ, घर लौट जाओ।”
निमाई ने हाथ जोड़कर कहा, “गुरुदेव, घर में रहते हुए मैं वह काम नहीं कर सकता, जो करना चाहता हूं। देश में नास्तिकता, हिंसा और वाम-मार्ग के कारण बड़ी बुरी-बुरी बातें फैल रही है। मैं अज्ञान के अंधेरे को दूर करना चाहता हूं। घूम-घूमकर कृष्णभक्ति का सन्देश सारे देश को सुनाना चाहता हूं। जात-पांत के बंधनों से लोगों को निकालना चाहता हूं। आप मुझ पर दया करें, मुझे दीक्षा दें।”
केशव भारती कुछ सोचते हुए बोले, “अच्छा, निमाई पंडित, एक शर्त पर मैं तुम्हें दीक्षा दे सकता हूं। तुम अपनी माता और पत्नी से आज्ञा ले आओ।”
निमाई ने कहा, “गुरूदेव उन दोनों ने मुझे आज्ञा दे दी है। मैं उनसे पहले ही पूछ चुका हूं।”

निमाई के बहुत कहने पर केशव भारती उन्हें दीक्षा देने को तैयार हो गए। इतने में निमाई को ढ़ूंढ़ते हुए नवद्वीप के अनेक भक्त वहां आ पहुंचे। वह बड़ा ही हृदयविदारक दृश्य था। यह सुनकर कि एक युवक पत्नी और मां को छोड़कर संन्यासी बन रह है, आसपास के गांव के नर-नारी इकट्ठे हो गये। वे उन्हें मना करते और केशव भारती को गालियां देते। कोई भी नाई निमाई पंडित के सुन्दर बाल काटने को तैयार न हो रहा था । तब निमाई ने अपनी मधुर वाणी से सबको शान्त किया। उनके अनुरोध पर एक नाई ने उनके केश कटे पर उसने कसम खा ली कि आगे से वह यह काम नहीं करेगा। वह कृष्ण-भक्त हो गया। सन 1510 में संत प्रवर श्री पाद केशव भारती से संन्यास की दीक्षा लेने के बाद निमाई का नाम कृष्ण चैतन्य देव हो गया।

अपने समय में सम्भवत: इनके समान ऐसा कोई दूसरा आचार्य नहीं था, जिसने लोकमत को चैतन्य के समान प्रभावित किया हो। एक बार चैतन्यप्रभु अकेले ही चेरानन्दी वन में जा रहे थे। उस वन में मशहूर डाकू नौरोजी रहता था। उसका नाम सुनकर लोग कांप उठते थे। चैतन्य को इस वन में से जाने के लिए लोगों ने बहुत मना किया, पर उनके मन में नौरोजी को सही रास्ते पर लाने की धुन समाई हुई थी।नौरोजी उनको देखते ही उनका भक्त हो गया और वह संन्यासी बनकर महाप्रभु के साथ रहने लगा। पश्चिम बंगाल में अद्वैताचार्य और नित्यानन्द को तथा मथुरा में रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी को अपने प्रचार का भार संभलवाकर चैतन्य नीलांचल (कटक) में चले गए और वहाँ 12 वर्ष तक लगातार जगन्नाथ की भक्ति और पूजा में लगे रहे। चैतन्यप्रभु अधिकतर जगन्नाथपुरी में रहते थे और जगन्नाथजी की मूर्ति के आगे खड़े होकर घंटों रोया करते थे। वह प्रभु प्रेम की मस्ती में ‘श्री कृष्ण, श्री कृष्ण, मेरे प्राणाधार, श्री हरि तुम कहां हो’ पुकारते हुए कीर्तन करने लगे। उनके बहुत से शिष्य बन गए जो मिलकर ‘हरि हरये नम:,गोपाल गोबिंद, राम श्री मधुसूदन’ का संकीर्तन करते हुए प्रभु को ढूंढने लगे। उनके व्यक्तित्व का लोगों पर ऐसा विलक्षण प्रभाव पड़ा कि बहुत से अद्वैत वेदांती व संन्यासी भी उन के संग से कृष्ण प्रेमी बन गए और उनके विरोधी भी उनके अनुयायी बन गए।

कृष्ण-भक्ति के गीत गाते हुए वह जनता के हृदय में भगवत् भक्ति की भावना भरने लगे। वे कहते थे कि गिरिजाघरों या मस्जिदों में पूजा का प्रसार सम्भव नहीं, क्योंकि लोगों की रुचि इसमें नहीं रही, किन्तु हरे कृष्ण का कीर्तन कहीं भी और कभी भी किया जा सकता है | इस प्रकार श्री चैतन्य की पूजा करते हुए लोग सर्वोच्च कर्म कर सकते है और परमेश्वर को प्रसन्न करने का सर्वोच्च धार्मिक प्रयोजन पूरा कर सकते हैं | उन दिनों अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग राजाओं के राज्य थे; किन्तु चैतन्यप्रभु इतने प्रसिद्द और सम्मानित थे कि उन्हें कहीं भी जाने की रोक-टोक न थी। एक यात्रा में उन्हें पता चला कि उनके बड़े भाई विश्वरूप दो वर्ष साधु रहकर मर गये।साधु बनने के बाद दो बार चैतन्य अपनी माता से मिले। वैसे माता के समाचार वह समय-समय पर अपने भक्तों से पूछते रहते थे। एक बार जब वह नवद्वीप गये, तो विष्णुप्रिया उनसे मिली। चैतन्य बोले, “देवी, इस संन्यासी के लिए क्या आज्ञा है?” विष्णुप्रिया ने सिर झुकाकर कहा, “महाराज, मुझे आपके खड़ाऊं चाहिए।” चैतन्यप्रभु ने खड़ाऊं दे दिया। बाद में विष्णुप्रिया ने कृष्ण-भक्ति की दीक्षा ले ली।

चैतन्य महाप्रभु ने बंगाल की विधवाओं की दयनीय दशा और सामाजिक तिरस्कार को देखते हुए उनके शेष जीवन को प्रभु -भक्ति की ओर मोड़ा और इसके बाद ही उनके वृंदावन आने की परंपरा शुरू हो गई।वे 1515 में वृंदावन आए और उन्होंने अपना शेष जीवन वृंदावन में व्यतीत किया।वृंदावन करीब 500 वर्ष से विधवाओं के आश्रय स्थल के तौर पर जाना जाता है। कान्हा के चरणों में जीवन की अंतिम सांसें गुजारने की इच्छा लेकर देशभर से यहां जो विधवाएं आती हैं, उनमें ज्यादातर करीब 90 फीसद बंगाली हैं। अधिकतर अनपढ़ और बांग्लाभाषी। वृंदावन की ओर बंगाली विधवाओं के रुख के पीछे मान्यता यह है कि भक्तिकाल के प्रमुख कवि चैतन्य महाप्रभु का जन्म 1486 में पश्चिम बंगाल के नवद्वीप गांव में हुआ था।उन्होने विलुप्त वृन्दावन को फिर से बसाया और अपने जीवन का अंतिम भाग वहीं व्यतीत किया।कहा जाता है कि यदि गौरांग ना होते तो वृंदावन आज तक एक मिथक ही होता। वैष्णव लोग तो इन्हें श्रीकृष्ण का राधा रानी के संयोग का अवतार मानते हैं।

जब चैतन्य महाप्रभु कीर्तन करते थे, तो लगता था मानो ईश्वर का आह्वान कर रहे हैं। ” हरे-कृष्ण, हरे-कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण, हरे-हरे। हरे-राम, हरे-राम, राम-राम, हरे-हरे॥” यह अठारह शब्दीय (32 अक्षरीय) कीर्तन महामंत्र निमाई उपाख्य चैतन्य महाप्रभु की ही देन है। भक्तिमार्ग में इसे तारकब्रह्ममहामंत्र कहा गया, व कलियुग में जीवात्माओं के उद्धार हेतु प्रचारित किया गया था। कलियुग के युगधर्म श्री हरिनाम संकीर्तन को प्रदान करने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु जी ने अपने पार्षद श्री नित्यानंद प्रभु श्री अद्वैत, श्री गदाधर, श्री वासु को गांव-गांव और शहर-शहर में जाकर श्री हरिनाम संकीर्तन का प्रचार करने की शिक्षा दी। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए महामन्त्र ‘नाम संकीर्तन’ का अत्यंत व्यापक व सकारात्मक प्रभाव यूरोप,अमेरिका जैसे महादेशों में भी है। श्री चैतन्य महाप्रभु जी के जीवन का लक्ष्य लोगों में भगवद भक्ति और भगवतनाम का प्रचार करना था। वह सभी धर्मों का आदर करते थे।विश्व भर में श्री हरिनाम संकीर्तन श्री चैतन्य महाप्रभु की ही आचरण युक्त देन है। उन्होंने कलियुग के जीवों के मंगल के लिए ही उन्हें श्रीकृष्ण प्रेम प्रदान किया है, वह सांसारिक वस्तु प्रदाता नहीं बल्कि करुणा और भक्ति के प्रदाता हैं।
चैतन्य महाप्रभु ने संस्कृत में कुछ लिखित कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णम्रि रिकॉर्ड किये है। चैतन्य के आध्यात्मिक, धार्मिक, महमोहक और प्रेरणादायक विचार लोगो की अंतरआत्मा को छू जाते थे। उनकी सिखाई कुछ बाते इस प्रकार हैं – :

• कृष्णा ही सर्वश्रेष्ट परम सत्य है।
• कृष्णा ही सभी उर्जाओ को प्रदान करता है।
• कृष्णा ही रस का सागर है।
• सभी जीव भगवान के ही छोटे-छोटे भाग है।
• जीव अपने तटस्थ स्वाभाव की वजह से ही मुश्किलों में आते है।
• अपने तटस्थ स्वाभाव की वजह से ही जीव सभी बन्धनों से मुक्त होते है।
• जीव इस दुनिया और एक जैसे भगवान से पूरी तरह से अलग होते है।
• पूर्ण और शुद्ध श्रद्धा ही जीवो का सबसे बड़ा अभ्यास है।
• कृष्णा का शुद्ध प्यार ही सर्वश्रेष्ट लक्ष्य है।

    चैतन्य के अनुसार भक्ति ही मुक्ति का साधन है। उनके अनुसार जीवो के दो प्रकार होते है, नित्य मुक्त और नित्य संसारी। नित्य मुक्त जीवो पर माया का प्रभाव नही पड़ता जबकि नित्य संसारी जीव मोह-माया से भरे होते है। कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णम् बताता है कि कृष्ण-नाम को प्रधानता दी जानी चाहिए | भगवान् श्री चैतन्य ने कृष्णभावनामृत की शिक्षा दी और कृष्ण-नाम का कीर्तन किया | अतएव श्री चैतन्य की पूजा करने के लिए सबको मिलकर महामंत्र का कीर्तन करना चाहिए- हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण,हरे हरे |हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे || 

४८ वर्ष की उम्र में रथ-यात्रा के दिन उनकी जीवन-लीला समाप्त हो गई। उनका शरीर चला गया, पर उनका नाम सदा अमर रहेगा। भक्ति की उन्होंने जो धारा बहाई, वह कभी नहीं सूखेगी और लोगों को हमेशा पवित्र करती रहेगी।

सत्य घटना पर आधारित वेब सीरीज ‘रोहतक सिस्टर्स’ की शूटिंग भोपाल में तेज गति से जारी

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गलिटीज़ टेलीप्ले के बैनर तले प्रथम प्रस्तुति के रूप में  वेब सीरीज ‘रोहतक सिस्टर्स’ की शूटिंग इन दिनों भोपाल(मध्य प्रदेश) में तेज गति से जारी है। सत्य घटना पर आधारित इस वेब सीरीज में नवोदित कलाकारों के साथ बॉलीवुड के नामचीन कलाकार भी अपने अभिनय का जलवा बिखेरते नज़र आएंगे। मौजूदा दौर में दर्शकों के बदलते मिज़ाज़ को ध्यान में रखते हुए इस वेब सीरीज की कथावस्तु में एक्शन, कॉमेडी और ट्रेजडी का भी समावेश किया गया है।

राजोरा एंटरटेनमेंट के द्वारा प्रस्तुत की जा रही इस वेब सीरीज के निर्माता द्वय बच्चन तोमर और अज़रा सईद हैं। बॉलीवुड के चर्चित निर्देशक मनोज सिंह के निर्देशन में बन रही इस वेब सीरीज के लेखक आबिद निसार और डीओपी धर्मेंद्र बिस्वास हैं। इस वेब सीरीज के मुख्य कलाकार तेज सप्रू, बृजेश त्रिपाठी, अनिल नागरथ, मृणाल जैन, गौरव शर्मा, सोनम अरोड़ा, उर्वी सिंह, विक्रम कोचर, स्मिता शरण, विभा छिबर श्वेता खंडूरी, प्रीति मेहरा, एहसान खान, उपासना रथ, कल्याणी झा, अरुण सिंह, हेराम त्रिपाठी, सुनीत राजदान, मुनि झा, कुणाल, सिकंदर मिर्ज़ा और परेश ब्रह्मभट्ट आदि हैं।

IPL में करोड़ों का बिकते ही ये स्टार क्रिकेटर बन गया धोखेबाज! अचानक इस टीम का छोड़ दिया साथ

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नई दिल्ली: IPL में करोड़ों का बिकते ही इंटरनेशनल क्रिकेट का एक धुरंधर खिलाड़ी धोखेबाज बन गया है. बता दें कि ये खिलाड़ी और कोई नहीं बल्कि ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर मैथ्यू वेड हैं. मैथ्यू वेड को मेगा ऑक्शन में गुजरात टाइटंस ने 2 करोड़, 40 लाख रुपए में खरीदा है. ऑस्ट्रेलियाई विकेटकीपर बल्लेबाज मैथ्यू वेड ने लगातार 3 छक्के लगाकर पिछले साल अपनी टीम को 2021 टी20 वर्ल्ड कप जिताया था. 

करोड़ों का बिकते ही ये क्रिकेटर बन गया धोखेबाज

मैथ्यू वेड की इस बार मेगा ऑक्शन में काफी डिमांड थी और  गुजरात टाइटंस ने 2 करोड़, 40 लाख रुपए में मैथ्यू वेड को अपने खेमे में शामिल कर लिया. आईपीएल की इस बड़ी डील के मिलते ही अचानक मैथ्यू वेड ने इंग्लैंड की काउंटी क्रिकेट को अलविदा कह दिया. मैथ्यू वेड इंग्लैंड के घरेलू टूर्नामेंट काउंटी क्रिकेट में वॉरसेस्टरशायर क्लब के लिए खेलते थे.

अचानक इस टीम का छोड़ दिया साथ

मैथ्यू वेड ने पूरे सीजन के लिए करार किया था, लेकिन अब अपना नाम वापस ले लिया है, जो धोखा साबित हुआ है. मैथ्यू वेड यह दूसरी बार आईपीएल में खेलेंगे. इससे पहले उन्होंने 2011 सीजन में आईपीएल खेला था. मैथ्यू वेड तब दिल्ली डेयरडेविल्स के लिए क्रिकेट खेले थे. तब दिल्ली की कप्तानी वीरेंद्र सहवाग के हाथ में थी.

इस बार उन्हें आईपीएल की नई टीम गुजरात टाइटंस ने अपनी टीम में शामिल किया है. आईपीएल में इस बार कुल 10 टीमें होने से रोमांच दोगुना हो जाएगा. इस टीम की कप्तानी हार्दिक पांड्या के हाथ में रहेगी. आईपीएल 2022 का सीजन 26 मार्च से भारत में ही खेला जा सकता है. टूर्नामेंट मई के महीने तक चलेगा.

चंदन राठोड की ताजा थ्रिलर फ़िल्म ‘हवे शु’ सुपर डुपर हिट की ओर

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गुजराती फ़िल्म इंडस्ट्री के सुपरस्टार चंदन राठोड की ताजातरीन सस्पेंस थ्रिलर फ़िल्म हवे शु सुपर डुपर हिट हो रही है। फिल्मी दुनिया में हर अभिनेता में एक विशेषता की जरूरत होती है। लेकिन जब बात मल्टीटैलेंट की आती है तो एक ही अभिनेता की कई खासियतों की बात आती है तो गुजराती फ़िल्म इंडस्ट्री में सबसे पहले एक ही नाम होता है सुपर स्टार चंदन राठोड का। उन्होंने कई किरदारों को न सिर्फ निभाया, बल्कि उन किरदारों को फिल्म में जीवंत भी किया।

पहली फिल्म “धुलकी तारी माया लागी ” 2003 में सुपरहिट रही और इसने उन्हें सुपर स्टार का खिताब दिलाया। फिर क्या पूछना था…कई निर्माताओं को उन्हें फिल्म में साइन करने के लिए डेट्स का इंतजार करना पड़ता था। अब तक 107 फिल्में जिनमें उन्होंने 96 फिल्मों में मुख्य भूमिका निभाई है, जिनमें से 46 फिल्में सुपरहिट रही हैं। और ‘इंस्पेक्टर अर्जुन, प्रीत ना सोगन्द , प्राण जाए पन प्रीत ना जाए, खम्मा मारा लाल, भव भव ना भरथार ,सासु शेर जमाई सवाशेर, एकको बादशाह रानी। जैसी यादगार फिल्में लोग आज भी देखते हैं उन्होंने 100 से ज्यादा एलबम गाने और टीवी सीरियल्स में अपने अभिनय से लोगों के दिलों में खास जगह बना ली है। चंदन राठौर की अगली फिल्म… ‘हवे शु ?’ रिलीज हो चुकी है। एच. जी. पिक्चर्स के बैनर तले बनी इस फिल्म का निर्देशन किशोर गोटी ने किया है। कथा पटकथा, संवाद है मोबिन खान के और गीत-संगीत जयेश बारोट ने दिया है। चंदन राठोड, किरण आचार्य और ममता सोनी अभिनीत इस फिल्म में राम की सीधी-सादी कहानी है। जिसका परिवार सुखी है। वह ऑफिस और अपनी पत्नी को प्यार से संभालते है। लेकिन अचानक एक दिन राम की पत्नी की हत्या हो जाती है। यह हत्या किसने की? किसी से दुश्मनी नहीं तो अचानक हत्या क्यों? आगे क्या होगा आगे क्या होता है ये जानने के लिए ये सस्पेंस थ्रिलर फिल्म ही देखनी होगी।

बप्पी दा के चलें जाने की खबर से मन आहत है-प्रकाश तिवारी मधुर

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संगीत की दुनिया में एक अलग संगीत को पहचान दिलाने वाले बप्पी लहरी जिन्हें डिस्को किंग कहा जाता है। संगीत का एक नया आयाम,नया इतिहास बनाया । याद आ रहा है से लेकर उलाला तक ,सभी गाने लोगों की जुबां पर हैं। गायक संगीतकार प्रकाश तिवारी मधुर बताते हैं कि,कुछ ही दिन पहले उनसे मुलाकात करने लहरी हाउस में गया था,तब एक दम स्वस्थ थे हंसते मुस्कुराते हुए बातें कर रहे थे,मुझसे गाने भी सुने और आशिर्वाद भी दिया । उनके चलें जाने की खबर से मन आहत है,क्यों चलें जाते हैं ऐसे लोग जो दुनियां को हंंसना गाना सिखाते हैं,और फिर अचानक चलें जाते हैं। लता जी के बाद भारत ने एक और रत्न खो दिया।

Singer Prakash Tiwari Madhur With Music Director Late Bappi Lahri Ji in lahri house

Chitra Ramkrishna के घर IT की छापेमारी, हिमालय में भटकते अज्ञात योगी के इशारे पर NSE की कई जानकारी की लीक

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नई दिल्ली, एएनआइ। आयकर विभाग ने NSE के पूर्व एमडी चित्रा रामकृष्णन (Former MD Chitra Ramkrishna) के परिसरों में छापेमारी की है। सेबी समूह संचालन अधिकारी और प्रबंध निदेशक के सलाहकार के रूप में आनंद सुब्रमण्यम की नियुक्ति से संबंधित प्रतिभूति अनुबंध नियमों में कथित उल्लंघन में उनकी भूमिका की जांच कर रहा है। यह फैसला उच्च स्तर पर लिया गया है और टीमों को सुबह से ही रामकृष्ण से जुड़े परिसरों की तलाशी के लिए लगाया गया है। छापेमारी विभाग की मुंबई जांच शाखा द्वारा की जा रही है। 

यह कदम SEBI द्वारा आरोप लगाए जाने के कुछ दिनों बाद लिया गया है, जिसमें कहा गया है कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के पूर्व प्रमुख एक ‘अज्ञात व्यक्ति’ के साथ स्टॉक एक्सचेंज के बारे में गोपनीय जानकारी का संचार करते थे। नियामक ने आरोप लगाया कि रामकृष्ण ने एनएसई के पांच साल के वित्तीय अनुमान, लाभांश भुगतान अनुपात, एक्सचेंज की व्यावसायिक योजनाओं और एनएसई की बोर्ड बैठक के एजेंडे जैसी गोपनीय जानकारी ‘अज्ञात व्यक्ति’ के साथ साझा की थी।

शुक्रवार को जारी नियामक के 190-पृष्ठ के आदेश के अनुसार सेबी के सामने अपने सबमिशन में रामकृष्ण ने कहा कि वह व्यक्ति एक ‘सिद्ध पुरुष’ या ‘योगी’ था, वह एक ‘परमहंस’ है। सेबी ने एनएसई, रामकृष्ण, पूर्व सीईओ रवि नारायण और दो अन्य को समूह संचालन अधिकारी और प्रबंध निदेशक के सलाहकार के रूप में आनंद सुब्रमण्यम की नियुक्ति से संबंधित प्रतिभूति अनुबंध नियमों का उल्लंघन करने के लिए दंडित किया क्या है NSE का बयान NSE का कहना है कि उक्त आदेश 2013-2016 की अवधि के दौरान एनएसई में कुछ मुद्दों से संबंधित है और इसलिए लगभग 6-9 वर्ष पुराना है। इस संबंध में पिछले कुछ वर्षों में एनएसई में बोर्ड और प्रबंधन स्तर पर कई बदलाव हुए हैं। सेबी एनएसई और अन्य एमआईआई के संचालन की बारीकी से निगरानी और पर्यवेक्षण कर रहा है। बयान के अनुसार, एनएसई ने वर्षों से विभिन्न मामलों पर सेबी के निर्देशों का संचालन किया है और टेक्नोलॉजी वास्तुकला सहित नियंत्रण पर्यावरण को और मजबूत करने के लिए विभिन्न उपाय किए हैं।

PM Modi Fatehpur Rally: प्रधानमंत्री बोले- बुंदेलखंड में घोषणा करके सो जाने वाले नहीं घोर परिश्रम करने वाले चाहिये

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फतेहपुर के बहुआ रोड के एफसीआई के पास मैदान में फतेहपुर-बांदा और रायबरेली समेत 11 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा की जीत के लिए माहौल बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मंच पर पहुंच गए और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने स्वागत किया। वहीं भाजपा नेताओं ने भारत माता के जयकारे लगाकर उनका स्वागत किया।

फतेहपुर, संवाददाता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि सारे वाद और विवाद एक तरफ और राष्ट्रवाद एक तरफ, यूपी के लोगों ने ठान लिया है कि होली आने से पहले दस मार्च को ही रंगों की होली धूमधाम से विजय की होली मना लेंगे। फतेहपुर बुंदेलखंड के क्षेत्र में पराक्रम और वीरता यहां के लोगों के नसों और खून में है। देश का सामर्थ्य बढ़ता देखकर यहां के लोगों का उत्साह बढ़ता है। लेकिन, यूपी के घोर परिवारवादी हैं, उन्हें देश का पराक्रम कभी नहीं अच्छा लगा। देश कुछ भी अच्छा करता है ये परिवारवादी उसपर सवाल उठाते हैं। वह फतेहपुर के बहुआ रोड पर एफसीआई के पास मैदान में जनसभा को संबोधित कर रहे थे।

कहा, अब अवध और बुंदेलखंड के विकास के लिए बदला लेने वाले नहीं, जमीन पर बदलाव लाने वाले चाहिये, परिवारवाद को बढ़ावा देने वाले नहीं पलायन को रोकने वाले चाहिये, सिर्फ घोषणा करके सो जाने वाले लोग नहीं बल्कि घोर परिश्रम करने वाले लोग चाहिये। इसलिए चुनाव को महत्वपूर्ण मानिए और ठान लीजिए किए सारे काम छोड़कर मतदान करेंगे।

उन्होंने कहा कि कोरोना ने दो साल में अपनी चपेट में लिया है और मानवता को संकट में डाला है। ऐसी भयंकर महामारी के बीच एक एक जीवन बचाने के लिए दो साल से काम कर रहे हैं कोशिश कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी सरकार में आपके आशीर्वाद से हमे देश की सेवा करने का मौका मिला है, ये भाजपा सरकार देश को मुफ्त टीका लगा रही है, वैक्सीनेशन हो रहा है। घर घर एक एक व्यक्ति को सभी डोज मिल जाए इसके लिए पूरी मेहनत करती है। संकट से आपको रक्षा कवच दिया है, सच्चे अर्थ में मानवता की जिंदगी बचाने का काम किया है। लेकिन, ये परिवारवादी क्या बोल रहे हैं कि ये तो भाजपा का टीका है। अरे ये तो कोरोना से बचने का टीका है, जब यूपी के लोगों ने इनकी बात अनसुनी कर दी, कभी कभी तो लगता है कि टीके से दो लोग डरते हैं, पहला कोराना वायरस और दूसरे टीका विरोधी लोग। रिकार्ड वैक्सीन लगवा दी तो अब ये क्या शुरू किया है कि सरकार ये टीके के पीछे इतना खर्चा क्यों कर रही है। आपकी जिंदगी बचेगी तो मुझे खुशी होगी, आप लोगों ने इतना प्यार दिया सम्मान दिया और पद दिया, मुझे आप लोगों के लिए काम करते रहना है। ये परिवारवादी को टीके से भी समस्या, मोदी से भी समस्या और योगी से भी समस्या।

कहा, दशकों तक घोर परिवारवादी सत्ता में आए, इन्होंने छोटे किसानों के लिए कुछ किया। किसानों के नाम पर झूठी घोषणाएं करके अपने रिश्तेदार और परिवारवादियों की तिजोरियां भरी हैं।

कहा, बेसहारा पशुओं से होने वाली परेशानी कम हो, आपका संकट दूर करने के लिए हम चिंता करते हैं। फतेहपुर के लोग कभी नहीं भूल सकते हैं कि पिछली सरकार के लोग यहां कैसे कैसे दबंगई करते थे। सरकारी जमीनों पर कब्जा, अवैध खनन माफिया ने इस पूरे इलाके को तबाह कर दिया था। योगी जी की सरकार ने इन माफिया का इलाज करके सही किया है ना। घोर परिवारवादियों ने गन्ना मिलों को बंद किया, सिंचाई की सुविधा देने की बजाए अवैध खनन माफिया को पाला पोसा था। दशकों तक ऐसी परियोजनाओं को दबाकर रखा था, लेकिन तब इन्हें बुंदेलखंड के किसानों की याद नहीं आई।

डबल इंजन की सरकार ने सिंचाई परियोजनाएं 44 हजार करोड़ लागत से अधिक खर्च से खेत खेत तक पानी पहुंचाया। केन बेतवा लिंक परियोजना को मैं पूरा करना चाहता हूं लेकिन परिवारवादियों को अगर मौका मिल गया तो ये उसमें भी रोड़ा अटकाएंगे। हमारी सरकार यहां हर घर जल अभियान चला रही है। भाजपा सरकार का फतेहपुर और इस क्षेत्र से स्नेह है। घोर परिवारवादियों ने यहां से पल्ला झाड़ लिया था लेकिन भाजपा ने फतेहपुर की आकांक्षा को समझा और उसे पूरा किया।

78 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर याद किये गए भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहेब फाल्के

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प्रस्तुति : काली दास पाण्डेय

गोरेगांव (मुम्बई) स्थित दादा साहेब फाल्के चित्र नगरी,फिल्म सिटी स्टूडियो में भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहेब फाल्के की 78 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर फिल्मसिटी स्टूडियो प्रबंधन द्वारा एक भव्य समारोह आयेजित किया गया। इस समारोह में भारतीय फिल्म जगत से जुड़ी संस्थाओं के प्रतिनिधियों, बॉलीवुड के नामचीन शख्सियतों व महाराष्ट्र सरकार के प्रशाशनिक पदाधिकारियों के अलावा दादा साहेब फाल्के के ग्रैंडसन चंद्रशेखर कुशेलकर भी अपने पूरे परिवार के सदस्यों के साथ, अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और सभी ने दादा साहेब फाल्के की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। इसके पश्चात दिवंगत भारत रत्न लता मंगेशकर और संगीतकार बप्पी लहरी के लिए श्रंद्धांजलि स्वरूप एक मिनट का मौन रखा गया। इसके बाद दादा साहेब फाल्के की स्मृति में भारत सिने एंड टीवी राइटर एसोसिएशन तत्वाधान में निर्धारित छठे कफ(KAF) अवार्ड के लिए फिल्म विधा से जुड़े चयनित नवोदित प्रतिभाओं को रविन्द्र अरोड़ा के द्वारा अवार्ड दे कर सम्मानित किया गया। इस आयोजन में वेस्टर्न इंडिया फिल्म एंड टीवी प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन की खास भागीदारी रही।

दादा साहेब फाल्के के ग्रैंडसन चंद्रशेखर कुशेलकर ने कार्यक्रम के दौरान अपने संक्षिप्त भाषण में दादा साहेब फाल्के के संघर्ष काल की चर्चा  करते हुए कहा कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री पूरी दुनिया मे हर साल सबसे ज्यादा फिल्में बनाने के लिए जाना जाता है। देश का हर दूसरे नौजवान फिल्मों में काम करने की या फिर फिल्मों से जुड़ी अन्य विधाओं से खुद को जोड़ कर अपना कैरियर बनाना चाहता है। लेकिन देश में जब दादा साहेब फाल्के जी ने फिल्म निर्माण को शुरू किया होगा तो उनको कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा होगा इसको हमेशा दिल और दिमाग में रखना होगा। आज सिनेमा उद्योग कई तरह के संकटों के दौर से गुज़र रहा है। इससे घबराना नहीं है।

आज धैर्य के साथ संघर्ष करने की आवश्यकता है।विदित हो कि दादासाहब फाल्के का असल नाम धुंडीराज गोविंद फाल्के था। उनका जन्म 30 अप्रैल, 1870 को महाराष्ट्र के त्रिम्बक (नासिक) में एक मराठी परिवार में हुआ था। सन1910 में तब के बंबई के अमरीका-इंडिया पिक्चर पैलेस में ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ दिखाई गई थी। थियेटर में बैठकर फिल्म देख रहे धुंदीराज गोविंद फाल्के ने तालियां पीटते हुए निश्चय किया कि वो भी भारतीय धार्मिक और मिथकीय चरित्रों को रूपहले पर्दे पर जीवंत करेंगे। इसके बाद दादा साहेब ने फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ का निर्माण कार्य शुरू किया जो देश की पहली फीचर फिल्म के रूप में जानी जाती है। दादा साहेब अपनी इस फिल्म के सबकुछ थे। उन्होंने इसका निर्माण किया, निर्देशक भी वही थे, कॉस्ट्यूम डिजाइन, लाइटमैन और कैमरा डिपार्टमेंट भी उन्हीं ने संभाला था। वही फिल्म की पटकथा के लेखक भी थे।

3 मई 1913 को इसे कोरोनेशन सिनेमा बॉम्बे में रिलीज किया गया। यह भारत की पहली फिल्म थी। राजा हरिश्चंद्र की सफलता के बाद दादा साहेब फाल्के ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद दादा साहेब फाल्के ने देश की पहली फिल्म कंपनी’हिंदुस्तान फिल्म्स’ की स्थापना की। ‘राजा हरिश्चंद्र’ से शुरू हुआ उनका करियर 19 सालों तक चला। राजा हरिश्चंद्र की सफलता के बाद अपने फिल्मी करियर में उन्होंने 95 फिल्म और 26 शॉर्ट फिल्में बनाईं। उनकी सफल फिल्मों में मोहिनी भस्मासुर (1913), सत्यवान सावित्री (1914), लंका दहन (1917), श्री कृष्ण जन्म (1918) और कालिया मर्दन (1919) के नाम उल्लेखनीय  हैं।

उनकी आखिरी मूक फिल्म ‘सेतुबंधन’ थी और आखिरी फीचर फिल्म ‘गंगावतरण’ थी। उनका निधन 16 फरवरी 1944 को नासिक में हुआ था। उनके सम्मान में भारत सरकार ने 1969 में ‘दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड’ देना शुरू किया। यह भारतीय सिनेमा का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है। सबसे पहले यह पुरस्कार पाने वाली देविका रानी चौधरी थीं। 1971 में भारतीय डाक विभाग ने दादा साहेब फाल्के के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया।आज भले ही दादा साहेब फाल्के हमारे बीच नहीं है लेकिन आज भी उनका संदेश व उनके संघर्षों को बयां करते पदचिन्ह भारतीय फिल्म जगत के फिल्मकारों  को कर्मपथ पर धैर्य के साथ अग्रसर रहने के लिए सदैव प्रेरित  करता है और युगों युगों तक करता रहेगा।

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फतेहपुर-बिंदकी में तीन गौ-तस्करों को तमंचा व बम के साथ दबोचा

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फतेहपुर – बिंदकी पुलिस ने सोमवार की रात तीन गौ तस्करों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने उनके पास से प्रतिबंधित मांस के साथ तमंचा व देशी बम भी बरामद किया है। पुलिस ने तीनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।

पुलिस को सूचना मिली कि तस्कर प्रतिबंधित मांस बिक्री के लिए ले जा रहे हैं। इस पर क्षेत्र के नाथुखेड़ा तिराहे पर ग्राम आलमगंज के पास घेराबंदी की गई। पुलिस की टोकाटाकी पर तस्करों में हमला करते हुए भागने की कोशिश की। पुलिस ने जबावी कार्रवाई करते हुए तीनों को पकड़ लिया। बिंदकी सीओ योगेन्द्र मलिक ने बताया कि शातिरों के पास एक तमंचा, कारतूस, चार देशी बम और 50 किलो प्रतिबंधित मांस से लदी दो बाइकों को बरामद कर लिया। हत्थे चढ़े शातिर शबलु , फुरकान व गुलफाम निवासी आलमगंज हैं। कार्रवाई करने वाली टीम में एसएसआई राजेश कुमार सिंह, शहनवाज हुसैन, पंकज, नीतेश आदि पुलिस बल मौजूद रहे।

सरकारी उदासीनता से आलू किसान नाराज तीसरे चरण में 36 सीटें आलू बेल्ट में

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  • Ajay Bhattacharya

लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में तीसरे चरण में शामिल 16 जिलों की 59 विधानसभा क्षेत्रों में 36 विधानसभा क्षेत्र आलू उत्पादक हैं। यादव, कुर्मी बहुलता वाले इन इलाकों में किसान आलू को खरा सोना मानते हैं। अगर आलू के उत्पादन क्षेत्रों के हिसाब से देखें तो देश का सबसे बड़ा आलू उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश है। यहां करीब 6.1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में आलू बोया जाता है। प्रदेश में करीब 147.77 लाख मीट्रिक टन आलू का उत्पादन हुआ है। आगरा से शुरू होकर मथुरा, इटावा, फर्रुखाबाद से लेकर कानपुर देहात तक फैले आलू बेल्ट में देश में होने वाली कुल पैदावार का करीब 30 फीसदी हिस्सा पैदा होता है। डीजल की कीमतों में वृद्धि, डीएपी और यूरिया की कमी, तैयार आलू आढ़ती के सहारे होने का दर्द किसानों को बेचैन किए रहता है। आलू उत्पादक किसानों को रिझाने के लिए हर दल के घोषणा पत्र में इसका जिक्र है।

भाजपा ने मेगा फूड पार्क, एक जनपद एक उत्पाद, फूड प्रॉसेसिंग, किसानों को सिंचाई के लिए मुफ्त बिजली, स्टोरेज प्लांट आदि को अपने घोषणापत्र में जगह दी है। तो समाजवादी पार्टी ने भी किसान आयोग का गठन, ग्रीन फील्ड परियोजनाओं के लिए लैंड बैंक की स्थापना, किसानों को सिंचाई के लिए मुफ्त बिजली, ब्याज मुक्त कर्ज, हर 10 किलोमीटर के दायरे में किसान बाजार नेटवर्क के तहत बाजार की स्थापना, सभी मंडलों में फूड प्रॉसेसिंग क्लस्टर।

प्रदेश में पांच जगह फूड प्रॉसेसिंग क्लस्टर, कन्नौज में कंटेनर डिपो के साथ आलू निर्यात क्षेत्र की स्थापना जैसे ख्वाब अपने घोषणापत्र में परोसे हैं। वहीं कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कोल्ड स्टोरेज और खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा, हर ब्लॉक में कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था की बात रखी है।

मगर किसी भी पार्टी के घोषणापत्र में गन्ने की तरह आलू की भी कीमत निर्धारित करने की बात गायब है। फर्रुखाबाद आलू आढ़ती एसोसिएशन का कहना है कि यहां का आलू पश्चिम बंगाल, असम के साथ ही नोएडा भी जाता है। नोएडा में आलू पाउडर बनाने की कंपनी है। यदि यह सुविधा आलू बेल्ट में हो जाए, तो यहां के किसानों और आढ़तियों, दोनों को फायदा मिलेगा।

इंडियन पोटैटो ग्रोवर एंड एक्सपोर्ट सोसायटी चाहती है कि हर जिले में गुणवत्ता जांचने की व्यवस्था हो जाए तो अन्य राज्यों में आलू भेजना आसान हो जाय। वर्ष 2012 में सपा सरकार बनने पर तत्कालीन सहकारिता मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने पहल की थी। उन्होंने निर्यात को बढ़ावा देने के लिए मंडी परिषद के किसानों को प्रशिक्षण दिलाया। बाद में पता चला कि निर्यात के लिए जरूरी रोगमुक्त प्रमाण पत्र दिए जाने की यहां व्यवस्था ही नहीं है। गन्ना परिषद की तरह आलू विकास परिषद, आलू आयोग का गठन हो, नए बीज के लिए अनुसंधान केंद्र बने और निर्यात की दृष्टिकोण से किसानों को आलू बीज उपलब्ध कराए जाएं।

सरकार आलू की लागत का मूल्यांकन करे और खोदाई के वक्त बाजार भाव तय करे, तो किसानों का फायदा होने लगेगा। मजदूरों के साथ आलू की खोदाई में लगे किसान कहते हैं, इस बार पैदावार तो ठीक है, बस अच्छे दाम का इंतजार है। 10 फरवरी को भाव 800 रुपये क्विंटल था, पर यह तय नहीं है कि आगे भी यही स्थिति रहेगी। न्यूनतम भाव तय हो जाए तो किसान इत्मीनान की सांस ले। वह सवाल करते हैं कि आखिर गन्ने की तरह आलू का भाव क्यों तय नहीं होता है? आलू का औद्योगिक विकास क्यों नहीं हो रहा है? हर दूसरे साल आलू फेंकने की नौबत क्यों आती है? इसे लेकर समूचे आलू बेल्ट के किसानों में सभी दलों के प्रति गुस्सा है। कुछ ऐसा ही सवाल फर्रुखाबाद के बुढ़नामऊ के किसान भी करते हैं। खेत में आलू की खोदाई में व्यस्त इन किसानों का कहना है कि हर चुनाव में चिप्स, अल्कोहल फैक्टरी और आलू पाउडर बनाने की बात उठती है। इस चुनाव में भी राजनीतिक दल इसके दावे करने लगे हैं। लेकिन यह दावा हकीकत में बदल पाएगा, इस पर संशय है। ऐसे में वोट उसे ही देंगे, जो आलू किसानों की बात करेगा। कमालगंज हो कायमगंज, सियासी दलों की आलू किसानों के प्रति उदासीनता से किसानों में नाराजगी है।

अलबत्ता घोषणा पत्र के सवाल पर वे कहते हैं कि कुछ ने ज्यादा तो कुछ ने कम, आलू से जुड़ी बातें रखी हैं। पर, ऐसी घोषणाएं तो हर चुनाव में होती हैं। वे धरातल पर उतरेंगी, इसमें संशय है। फर्रुखाबाद से आगे बढ़ने पर कायमगंज से लेकर एटा तक और मैनपुरी से फिरोजाबाद तक खेतों में आलू के ढेर लगे हैं। सातनपुर आलू मंडी में पहुंचने वाले किसान सवाल उठाते हैं उनकी उपज की बिक्री को लेकर सरकार गंभीर क्यों नहीं होती है? आलू आधारित उद्योग नहीं लगने की वजह से उनके बच्चे उन्हें छोड़कर दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में रहने के लिए विवश हैं। क्योंकि, आलू से मिलने वाले रुपये से सिर्फ पेट भरता है।

जीवन स्तर नहीं सुधारा जा सकता है। बेटी की शादी हो या बेटे की कोचिंग की फीस, इसकी भरपाई आलू की उपज नहीं कर पाती है। एटा के प्रगतिशील किसान कहते हैं, हमेशा की तरह चुनावी सीजन में चिप्स फैक्टरी, अल्कोहल फैक्टरी, प्रसंस्करण आदि की सबको याद आ रही है। फर्रुखाबाद के नवाबगंज में चिप्स फैक्टरी के लिए 2013 में और कन्नौज में वोदका फैक्टरी के लिए जमीन अधिगृहीत की गई, लेकिन नतीजा सिफर रहा। मथुरा में आलू चिप्स उत्पादन इकाई की बात चली, लेकिन किसानों को कोई फायदा नहीं मिला। आलू में परता (मुनाफा) कम होता जा रहा है। इसलिए सड़क के किनारे की जमीनों पर दुकान बनवा दिए हैं। दो साल तक आलू की खेती में फायदा होता है। तीसरे साल अचानक मूल्य में गिरावट होती है और लागत भी नहीं निकल पाती है। करीब 10 साल से यही प्रचलन रहा है।