( पुरुष नसबंदी की कम लागत और सुरक्षित प्रक्रिया के बावजूद, भारत की एक तिहाई से अधिक यौन सक्रिय आबादी में महिला नसबंदी को क्यों अपनाया जा रहा है ? पुरुष नसबंदी का विकल्प नगण्य-सा है। हमारे राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि वर्तमान में 15-49 वर्ष की आयु की विवाहित महिलाओं के बीच गर्भनिरोधक के उपयोग में 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। महिलाओं के प्रजनन अधिकारों और गर्भनिरोधक विकल्पों को नियंत्रित करने के लिए पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण जारी हैं। )
-प्रियंका ‘सौरभ’
प्रजनन अधिकार कानूनी और स्वास्थ्य से संबंधित स्वतंत्रताएं हैं जो दुनिया भर के देशों में अलग-अलग हैं। महिलाओं के प्रजनन अधिकारों में कानूनी और सुरक्षित गर्भपात का अधिकार; जन्म नियंत्रण का अधिकार; जबरन नसबंदी और गर्भनिरोधक से मुक्ति; अच्छी गुणवत्ता वाली प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करने का अधिकार; और मुफ्त और सूचित प्रजनन के लिए शिक्षा और पहुंच का अधिकार शामिल है।
हालाँकि, हमारे देश में महिलाओं के यौन और प्रजनन अधिकारों की मान्यता अभी भी नगण्य है। महिलाओं के लिए एक सख्त एजेंसी की कमी सबसे बड़ी बाधा है। प्रजनन और यौन अधिकारों की अनुपस्थिति का महिलाओं की शिक्षा, आय और सुरक्षा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे वे “अपना भविष्य खुद बनाने में असमर्थ” हो जाती हैं।
वर्तमान में 15-49 वर्ष की आयु की विवाहित महिलाओं में गर्भनिरोधक के उपयोग में 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है यानी 2015-16 में 53.5% से 2019-20 में 66.7% हो गई है। कंडोम के उपयोग में उल्लेखनीय उछाल देखा गया है, जो 5.6% से बढ़कर 9.5% हो गया। भारत में परिवार नियोजन की अवधारणा की स्थापना के कई वर्षों बाद भी केवल महिला नसबंदी सबसे लोकप्रिय विकल्प बनी हुई है। पुरुष नसबंदी का विकल्प नगण्य-सा है।
कम उम्र में शादी, जल्दी बच्चे पैदा करने का दबाव, परिवार के भीतर निर्णय लेने की शक्ति की कमी, शारीरिक हिंसा और यौन हिंसा और पारिवारिक संबंधों में जबरदस्ती के कारण शिक्षा कम होती है और बदले में महिलाओं की आय कम होती है। अपने प्रजनन अधिकारों पर कमी के कारण लगातार बच्चे पैदा करने से वह ज्यादातर एक गृहिणी बन गई है, जिससे वह वित्त के लिए जीवनसाथी पर निर्भर हो गई है। पितृसत्तात्मक मानसिकता और बच्चों के बीच उचित दूरी के बिना अपेक्षित संख्या में बेटे पैदा होने तक बच्चे को जन्म देना उसे शारीरिक रूप से कमजोर बनाता है और उसके जीवन को खतरे में डालता है। समाज में बेवजह ये डर कि शिक्षित महिलाओं को पति और उसके परिवार द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता है, उसके शिक्षा अधिकारों को कही न कही कम कर देता है।
पुरुष नसबंदी की कम लागत और सुरक्षित प्रक्रिया के बावजूद, भारत की एक तिहाई से अधिक यौन सक्रिय आबादी के साथ महिला नसबंदी सबसे व्यापक प्रसार विधि है। भारत में प्रजनन अधिकारों को बाल विवाह, कन्या भ्रूण हत्या, लिंग चयन और मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता के मुद्दों जैसे चुनिंदा मुद्दों के संदर्भ में ही समझा जाता है।
महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों, उनके पोषण की स्थिति, कम उम्र में शादी और बच्चे पैदा करने के जोखिम पर ध्यान देना चिंता का संवेदनशील मुद्दा है और अगर महिलाओं की स्थिति में सुधार करना है तो इस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। साथ ही बड़े स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम के माध्यम से जमीनी स्तर तक स्वास्थ्य देखभाल की जानकारी उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। भारत में महिलाओं के प्रजनन अधिकारों के प्रचार और संरक्षण को संबोधित करने और पहचानने के लिए उचित कानूनी ढांचे की आवश्यकता है।
महिलाओं के लिए उपयुक्त, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं और संबंधित सेवाओं तक पहुंच की आवश्यकता है। स्वास्थ्य कार्यक्रमों में प्रजनन स्वास्थ्य सहित महिलाओं के स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देना चाहिए। महिलाओं के प्रजनन अधिकारों की रक्षा और बढ़ावा देने और महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य के सभी मुद्दों की देखभाल करने के लिए प्रजनन अधिकार अधिनियम के रूप में कानून बने चाहे वह चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करने या जागरूकता पैदा करने के संबंध में हो या महिलाओं से संबंधित स्वास्थ्य नीतियां और कार्यक्रम का।
इसलिए, यह समय की मांग है कि नीति और व्यापक स्तर पर यौन और प्रजनन स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाए। बेहतर और स्वस्थ प्रजनन व्यवहार को बढ़ावा देना जो लड़कियों और युवाओं को जीवन रक्षक यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता को पूरा करें। सार्वजनिक बहस और मांगों में इन मुद्दों को लाने के लिए नागरिक समाज की जिम्मेदारी है।
पिछले कुछ वर्षों में, महिलाओं ने लैंगिक अंतर को कम करने में उल्लेखनीय प्रगति के साथ कई क्षेत्रों में काफी प्रगति की है। फिर भी महिलाओं और लड़कियों की तस्करी, मातृ स्वास्थ्य, हर साल गर्भपात से होने वाली मौतों की वास्तविकताओं ने उन सभी विकासों के खिलाफ कड़ा प्रहार किया है।
जैसा कि स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, “जब तक महिलाओं की स्थिति में सुधार नहीं होगा, तब तक दुनिया के कल्याण के बारे में सोचना असंभव है। एक पक्षी के लिए केवल एक पंख पर उड़ना असंभव है।” –प्रियंका सौरभ रिसर्च स्कॉलर, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,उब्बा भवन, शाहपुर रोड, सामने कुम्हार धर्मशाला, आर्य नगर, हिसार (हरियाणा)-125003 (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook –https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/twitter-https://twitter.com/pari_saurabh
Mumbai – राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता व मंत्री नवाब मलिक को अंडरवर्ल्ड से उनके कनेक्शन के आरोप में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गिरफ्तार किया है। देश में आतंकी कार्रवाइयों को अंजाम देनेवाले लोगों से संबंध रखनेवाले आरोपियों पर कार्रवाई सर्वथा उचित है।
ये दुर्भाग्य है कि गौरवशाली इतिहास रखनेवाले महाराष्ट्र राज्य के एक मंत्री को अंडरवर्ल्ड से संबंध व आर्थिक व्यवहार के कारण गिरफ्तार किया गया है। आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त लोगों से संबंधित आरोपियों को किसी भी हालत में नहीं छोड़ा जाना चाहिए और उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
मुंबई बम ब्लास्ट में जिन आतंकवादियों ने 257 निर्दोष मुंबईकरों की जान ली तथा हजारों लोगों को घायल किया, उन आतंकवादियों से नवाब मलिक ने रिश्ता रखा तथा उनके साथ व्यवसाय किया, ऐसे नवाब मलिक को देशवासी कभी माफ नहीं करेंगे ।
यह देश की सुरक्षा से जुडा मुद्दा है , इस विषय में सभी दलो को राजनीति छोड़कर केंद्रीय एजेंसियों का सहयोग करना चाहिए ।
बॉलीवुड की चर्चित अदाकारा हुमा कुरैशी की फिल्म ‘वलीमई’ 24 फरवरी को रिलीज होगी। फिलवक्त हुमा कुरैशी इस फिल्म के प्रमोशन के लिए बैंगलोर, हैदराबाद और चेन्नई इन शहरों के चक्कर लगा रही है। ‘वलीमई’ के रिलीज़ के दिन चेन्नई में आयोजित किए गए मॉर्निंग फैन शो में हुमा कुरैशी उपस्थित रहेंगी। प्राप्त जानकारी के अनुसार ‘वलीमई’ की एडवांस बुकिंग पूरे देश में शुरू हो गई है। साउथ सुपरस्टार अजित कुमार और हुमा कुरैशी अभिनीत फिल्म ‘वलीमई’ सिर्फ एक एक्शन फिल्म नहीं है बल्कि एक फैमिली एंटरटेनर है जो सामाजिक मुद्दों पर भी बात करती है। इस फिल्म में पहली बार हुमा एक पुलिस अधिकारी की भूमिका निभा रही है, साथ ही पहली बार एक्शन करती भी नजर आएंगी। इस फिल्म के ट्रेलर जारी किए जाने के बाद पॉजिटिव रिस्पॉन्स मिलने पर प्रोड्यूसर बोनी कपूर ने इस फिल्म को हिंदी, तेलुगू और कन्नड़ में बड़े पैमाने पर रिलीज करने का फैसला किया हैै।
इस फिल्म में कार्तिकेय गुम्माकोंडा विलेन के रोल में नजर आएंगे। अदाकारा हुमा कुरैशी की यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर आलिया भट्ट की फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ से टकराने वाली है। फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ 25 फरवरी को रिलीज होने वाली है। प्रस्तुति : काली दास पाण्डेय
गाँधीनगर साहित्य सेवा संस्थान चेरी टेबल ट्रस्ट गुजरात के अध्यक्ष कवि लेखक अनुवादक हिंदी गुजराती को स्वामी दयानन्द सरस्वती दर्शन शास्त्र, राष्ट्रवाद,, सनातन वैदिक धर्म व संस्कृति के अंतर्गत डॉ गुलाब चंद पटेल जी को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में गांधीजी और अन्य शोध पुस्तक को द्वितीय पुरस्कार आचार्य अकादमी चुलियाणा द्वारा वार्षिक साहित्यिक पुरस्कारों (2021) की घोषणा मे घोषित किया गया हे साहित्य, संस्कृति, धर्म, दर्शन, योग व हिन्दी के प्रसार प्रचार को समर्पित राष्ट्रवादी संस्था एवं प्रमाण अन्तरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल (ISSN:2249-2976) व चिन्तन अन्तरराष्ट्रीय मुल्यांकित त्रैमासिक रिसर्च जर्नल (ISSN:2229–7227) प्रकाशित करने वाली संस्था आचार्य अकादमी चुलियाणा व योग को समर्पित संस्था वैदिक योगशाला कुरुक्षेत्र (हरियाणा) द्वारा अपने वार्षिक साहित्यिक पुरस्कारों (2021) की घोषणा कर दी गई है।
श्रीमती हेमलता हिन्दी साहित्य (गद्य, पद्य) पुरस्कार के अंतर्गत प्रथम सांझा पुरस्कार श्री विकल सिंह फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) की पुस्तक आदिवासी कविताएं व डॉ. अनु पाण्डेय आणंद (गुजरात) की पुस्तक समकालिन साहित्य में किन्नर विमर्श और अन्य संदर्भ को, द्वितीय सांझा पुरस्कार डॉ. कृष्णा आचार्य बीकानेर (राजस्थान) की पुस्तक पांचाली व सेवासदन प्रसाद नवीं मुबई (महाराष्ट्र) की पुस्तक मेरी सर्वश्रेष्ठ लघुकथाएं को तथा तृतीय सांझा पुरस्कार डॉ. मधुकांत रोहतक (हरियाणा) की पुस्तक नमिता सिंह मूछों वाली व राधिका के. त्रिवेंन्द्रम (केरल) की पुस्तक समकालिन साहित्य चिंतन एवं आयाम को दिया गया। इसी वर्ग में डॉ वंदना मिश्रा की पुस्तक बहुत कुछ शेष है अभी, नवलपाल प्रभाकर दिनकर झज्जर (हरियाणा) की पुस्तक तुम्हारा साथ, डॉ. दीन्दयाल साहू दुर्ग (छतीसगढ) की पुस्तक आंचलिक संस्कृति में देवारों का योग तथा बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) की पुस्तक को सान्तवना पुरस्कार भी दिया गया। स्वामी दयानंद सरस्वती दर्शनशास्त्र, राष्ट्रवाद, सनातन वैदिक धर्म व संस्कृति के अंतर्गत प्रथम पुरस्कार डॉ. आशुतोष पारिक अजमेर (राजस्थान) की पुस्तक सामाजिक चेतना के संवाहक स्वामी दयानंद सरस्वती को द्वितीय पुस्कार डॉ. गुलाबचंद पटेल गांधी नगर (गुजरात) की वैश्विक परिप्रेक्ष्य में गांधी और अन्य शोध को तथा तृतीय पुरस्कार डॉ. मनीषा दुबे धमोह (मध्य प्रदेश) की पुस्तक को दिया गया।
बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर समानता व समानता पुरस्कार के अंतर्गत प्रथम पुरस्कार डॉ. पायल लिल्हारे झांसी (उत्तर प्रदेश) की पुस्तक डॉ. भीमराव अंबेडकर का वैचारिक चिंतन को तथा द्वितीय पुरस्कार प्रो. आमलपुरे सूर्यकांत विश्वनाथ रायगढ (महाराष्ट्र) की पुस्तक संत रविदास सृजन के आलोक को दिया गया। तृतीय पुरस्कार के लिए कोई भी पुस्तक उपयुक्त नहीं पाई गई। चौधरी छोटूराम किसान, खेतीबाडी, मजदूरी व शिक्षा पुरस्कार के अंतर्गत कोई भी पुस्तक उपयुक्त नहीं पाई गई। आयोजक समिति व आचार्य अकादमी चुलियाणा रोहतक हरियाणा के अध्यक्ष डॉ. शीलक राम आचार्य ने सभी विजेताओं को शुभकामनाएं दी। उन्होंने यह भी बताया कि सभी विजेताओं को इनामी राशि, स्मृति चिन्ह तथा प्रमाण-पत्र तथा सान्तवना पुरस्कार विजेताओं को स्मृति चिन्ह व प्रमाण-पत्र डाक के द्वारा भेजे जाएंगे।डॉ गुलाब चंद पटेल को अध्यक्ष खम्भोंलज साहित्य संस्था के अध्यक्ष श्री शैलेष वाणिया जी ने हार्दिक बधाई दी है
सिनेबस्टर मैगज़ीन के मालिक रॉनी रॉड्रिग्स ने मुम्बई के फाइव स्टार होटल जे डब्लू मेरिएट में अपनी बेटी डेलिसिया का 5 वा बर्थडे पार्टी का शानदार आयोजन किया जहां काफी फिल्मी सेलेब्रिटीज़ ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। डेलिसिया के पांचवे जन्मदिन पर कई मेहमान और मीडियाकर्मी इस समारोह को चार चांद लगाने आए। परियों के ड्रेस पहनी कई सुंदर महिलाओं के बीच जब रॉनी की अपनी लिटिल प्रिंसेस बेटी के साथ एंट्री हुई तो लग रहा था कि जैसे कोई शानदार फ़िल्म का कोई भव्य सीन शूट हो रहा हो। डेलिसिया काफी मासूम और क्यूट लग रही थीं। यहां खूबसूरत केक काटकर बच्ची का जन्मदिन मनाया गया। सभी ने बच्ची को बधाई दी। रॉनी रॉड्रिग्स ने यहां खूब डांस किया और आए हुए तमाम मेहमानों का खूब स्वागत और शुक्रिया अदा किया।
इस बर्थडे पार्ट मे सेलेब्रिटी गेस्ट के तौर पर निर्माता निर्देशक मेहुल कुमार, ऎक्ट्रेस आरती नागपाल, संगीतकार दिलीप सेन, पंकज बेरी, अरुण बख्शी, सुरेंद्र पाल, योगेश लखानी, सन्दीप सोपारकर, कवलजीत सिंग, हॅरी वर्मा, सौरभ पटेल, लेझलीन, राजू टांक, पुनीत खरे, विकास महंते, संजय सिंग, राजीव चौधरी, एलिना टूटेजा, संतोष गुप्ता, रणवीर गेहलोत, विजय सिंग, निर्मल मिश्रा, मॉडल-अभिनेत्री आद्या सिंह, दिलीप सेठी, मधू भरती, पियू चौहान, सुधीर गायकवाड, अशोक शेखर, बाबबी वत्स, भंडारी, कबीर, पन्नू, हेमंत सांगानी, आनंद बलराज (रामलखन), कल्याणजी जाना, इत्यादि हाज़िर हुए। सभी ने रॉनी रॉड्रिग्स की बेटी डेलिसिया को बर्थडे के लिए खूब मुबारकबाद और शुभकामनाएं दीं। अरुण बख्शी ने कहा कि कोरोना काल के बाद इस तरह की भव्य पार्टी का आयोजन रॉनी रॉड्रिग्स द्वारा किया गया है। उनकी पुत्री को जन्मदिन की खूब बधाई। बिल्कुल परियों जैसी लग रही है बच्ची। जीवन मे वह सारी खुशियां पाए, हमसब की यही दुआएं हैं। इस खास मौके पर आरती नागपाल ने कहा कि रॉनी जी ने यह बेहतरीन पार्टी अपनी बेटी के जन्मदिन के मौके पर रखी है। उनकी पांच साल की बेटी डेलिसिया बहुत ही प्यारी है उसको बर्थडे की ढेर सारी विशेज़। एक्टर पंकज बेरी ने यहां मीडिया से बात करते हुए बताया कि रॉनी जी की बेटी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं। उन्होंने इस प्रोग्राम पर हम सबको आमंत्रित किया, यह बड़ा अच्छा लगा। उन्होंने सभी मेहमानों और मीडिया वालों के लिए भी इस खुशी के मौके पर खूब प्रबंध किया। हम सबको खुशी है कि कोरोना काल के बाद रौनक एक बार फिर छा गई है, इस तरह की पार्टियां होनी चाहिए।
मुंडे मीडिया पीआर के रमाकांत मुंडे ने यहां मीडिया के सामने घोषणा की कि अगले माह जुहू के इसी होटल जे डब्लू मेरिएट में सिनेबस्टर अवार्ड्स का एलान किया जाएगा। गौरतलब है कि सिनेबस्टर मैगज़ीन के मालिक रॉनी रॉड्रिग्स ने इस फंक्शन में आए हुए तमाम गेस्ट्स के साथ मीडिया वालों से भी मुलाकात की, उनके साथ तस्वीरें खिंचवाईं और उनकी इस दरियादिली की सभी ने खूब तारीफ की। इस बर्थडे पार्टी के पीआर की जिम्मेदारी मुंडे न्यूज़ के रमाकांत मुंडे ने बखूबी निभाई। रमाकांत मुंडे (मुंडे मीडिया)
क्या मुसलमानों को फ्रांस से बुर्क़े पर रोक लगाने की मांग करने का अधिकार है जबकि पश्चिम की महिलाओं को कम कपड़े में मुस्लिम देशों में सार्वजनिक स्थानों पर या घर से बाहर निकलकर घूमने की अनुमति नहीं है !आप आशा कर रहे हैं कि वे आपकी संस्कृति का सम्मान करें और जब वे आपके देश में आएं तब भी और जब आप उनके यहां जाए तब भी। लेकिन आप उनकी संस्कृति का सम्मान पाकिस्तान में नहीं करते हैं और यदि आपका वश चले तो उनके देश में भी नहीं होने दे सकते – इतना दोगलापन
ये अब ख़तरनाक दुनिया हो गई है। व्यक्ति यदि आपादमस्तक परदे में हो तो वह भी सुरक्षा के लिए ख़तरा हो सकता है। आपको पता ही नहीं परदे में कौन है। इस्लाम केवल ये कहता है कि महिला (औरत शब्द इसलिए नहीं लिखूंगी कि अरबी में इसका अर्थ ” महिला की योनि ” होता है और यह यह आम चलन में उनका ही दिया हुआ शब्द है ) ऐसे कपड़े पहने कि उच्चश्रृंखल न दिखें। फिर यह बुर्क़ा आया कहाँ से ?
हम सभी जानते हैं कि बुर्क़े का सम्प्रदाय या मज़हब से कोई लेना- देना नहीं। इस्लाम केवल ये कहता है कि महिला (औरत शब्द इसलिए नहीं लिखूंगी कि अरबी में इसका अर्थ ” महिला की योनि ” होता है और यह उनका ही दिया शब्द है )ऐसे कपड़े न पहनें कि उच्छृंखल दिखें। फिर बुर्क़ा आया कहा से? दुनिया भर में महिलाएं अपने चेहरे को ढंकती क्यों हैं? बुर्क़ा पुरुष द्वारा खोजी गई चलती -फिरती जेल है जिसके अंदर वह उस स्त्री को रखता है जिससे वह प्यार करता है।पर क्या सच में ऐसा है ? अगर इसमें मोहब्बत होती तो मैं इसे शायद मंज़ूर कर लेती। उस सूरतेहाल में यह जेल स्त्री को किसी दूसरे मायने में ज्यादा स्वीकार्य होती। लेकिन तब फिर प्रश्न होता कि किस स्वभाव का पुरुष उस महिला को जेल में रखेगा जिसे वह प्यार करता है। ऐसे में बुर्क़ा उस तरह की जेल अधिक है जिसमें पुरुष ‘अपनी स्त्री’ को गिरफ़्त या क़ैद में रखता है उसमें प्रेम सिर्फ बहाना है, सच्चाई नहीं ।
मुस्लिम परिवारों में महिला के ब्रेनवाश की प्रक्रिया बचपन में ही शुरू हो जाती है। छुटपन में ही उसे बताया जाता है कि तुम्हें स्वयं को पुरुषों से छिपाना है। तुम्हारा चेहरा छुपाकर रखना ‘धर्म’ है। महिला को पुरुषों से भयभीत रहना भी सिखाया जाता है। बहुत कम आयु में ही महिला को बताया जाता है कि पुरुष ख़तरनाक़ होते हैं उन पर ऐतबार नहीं किया जा सकता। स्त्री से कहा जाता है, तुम केवल अपने पिता और भाई पर ऐतबार कर सकती हो क्योंकि पुरुष आपको सहजता से फुसला सकता है। पाकिस्तान में तो महिलाओं को बताया जाता है ‘पुरुष भेड़िया यानी कामुक और क्रूर होता है जबकि महिला भेड़ या सीधी-सादी होती है।‘ इस नसीहत के चलते ही ज्यादतर पुरुष भेड़िये की तरह व्यवहार करने लगते हैं और महिला सहमी -सिकुड़ी -सितम सहनेवाली भेड़ बन जाती है।
हमारे पुरुष कहते हैं कि महिलाओं को परदा करना चाहिए जबकि हम महिलाओं के पास पुरुष के लिए किसी तरह का विचार या नज़रिया नहीं होता। ये विचार महिलाओं को हानि पहुंचाने और उनके साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती करने का होता है। इसलिए वे (पुरुष) हमें (महिलाओं को ) जेल में रखना चाहते हैं ताकि हमें लेकर उनका दिमाग़ साफ़ रहे। यह तो तोड़ा-मरोड़ा हुआ तर्क है। लेकिन क्या यक़ीनन उनका ये विचार यहां रुक जाता है? क्या बुर्क़े में ढंकी महिला को कोई नहीं छेड़ता ? हक़ीक़त की दुनिया में छिछोरों को इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है कि आप बुर्क़े में हैं ( या बिकनी में ), वे आपको सतायेंगे ही। मेरा अनुभव बताता है कि चेहरे पर परदा सड़कों-गलियों में होने वाली छेड़छाड़ या छींटाकशी से मेरी कभी बचा नहीं पाता।
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मनो बौद्धिक विकास के लिए बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा देना आवश्यक
पाकिस्तान से छोटे शहरों में घर से निकलने पर हमेशा या मेरे पिता या मेरे भाई साथ होते हैं , अन्यथा गलियों से अकेले गुज़रते समय हमारे जिस्म पर चाहे जितने कपड़े हों, पुरुष चिल्लाएंगे, छींटाकशी करेंगे, पीछा करेंगे और हमारे जिस्म को छूने की कोशिश करेंगे। इसी के चलते महिला अपने घर से अकेली नहीं निकल सकती और उसके साथ हमेशा घर का कोई पुरुष रहता है। पाकिस्तान और दूसरे मुस्लिम देशों में पुरुष अपने घर की महिलाओं की दूसरों से हिफ़ाज़त करते हैं। लाहौर जैसे पाकिस्तान के बड़े शहरों में माहौल अलग होता है, आप यकीन करें या न करें वहां महिलाओं को यौन-शोषण जैसी समस्या से अपेक्षाकृत कम जूझना पड़ता है। यहां हमारे आसपास के पुरुष सिर न ढंकने और परदा न करने वाली महिलाओं की संगत के अभ्यस्त होते हैं।इसका कारण यह है कि पुरुष अधिक शिक्षित होते हैं इसलिए उनकी बहन और मां ज़्यादा स्वतंत्र या अधिकार संपन्न होती हैं।
आइए, अब बात करते हैं अमेरिका की, जी हां, यहां तो गलियों में पुरुष का व्यवहार विस्मयकारी अनुभव है। मैं जो चाहूं पहन कर आसपास जा सकती हूं। किसी की क्या मजाल की बुरी नज़र भी डाले। इससे मेरी समझ में आया कि बुर्क़ा ख़तरनाक़ पुरुषों को हमसे दूर नहीं रखती, बल्कि यह समाज समझ है जो हानिकारक लोगों को हमसे दूर रख सकता है या रखता है।विशेषकर क़ानून का कठोरता से पालन का परिणाम है जो किसी देश में स्त्री को सुरक्षित अनुभव कराता या रखता है। हवाई के खूबसूरत बीच पर मस्ती भरी ठंड हवाओं के सुखद स्पर्श का मेरा पहला अनुभव रोमांचकारी रहा वरना पुरुष ने बुर्क़ा कहे जाने वाले शामियाने में रखकर स्त्री से खुशनुमा मौसम को इंजॉय करने का उसका बुनियादी हक़ ही लूट लिया है। बुर्क़े के भीतर अंधेरा होता है, गर्मी होती है, स्त्री को पुरुष ने वहां केवल इसलिए ढकेल दिया है कि स्त्री के बारे में उसके पास कोई विचार नहीं है तो वो बुर्क़े के भीतर घुटती रहे।किसी सभ्य देश में अगर सामने वाले की सहमति के बग़ैर आपने अपने विचार उस पर थोपने की कोशिश की तो आप 10-20 साल के लिए जेल भेज दिए जाएंगे।
दबाए हुए समाज के पुरुष के लिए ये समझना बड़ा मुश्किल है कि खुले समाज के पुरुष वास्तव में अपने विचार पर अंकुश लगाना सीख गए हैं और उसके लिए वे औरतों पर दोषारोपण नहीं करते। जब फ्रांस में बुर्क़े पर रोक की बात आती हैं, जहां यह तर्क दिया जाता है कि महिला जो चाहे उसे पहनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए और ये स्वतंत्रता काम नहीं करती… हर समाज में ड्रेसकोड और स्वतंत्रता की एक सीमा है। आपकी स्वतंत्रता वहीं समाप्त हो जाती है जहां से हमारा रास्ता शुरू होता है। नंगेपन के पैरोकार अकसर कहते हैं कि सड़क पर बिना कपड़े के घूमना उनका अधिकार और मौलिक अधिकार या स्वतंत्रता है जो पूरी होनी चाहिए। स्पष्ट है उन्हें उन्हें इसकीअनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे दूसरे समाज में अव्यवस्था फैलने का खतरा बढ़ेगा । इसी तरह एक व्यक्ति यदि आपादमस्तक परदे में हो तो वह भी सुरक्षा के लिए ख़तरा हो सकता है। आपको पता ही नहीं परदे में कौन है। ये अब ख़तरनाक दुनिया हो गई है। आप अपने बच्चे को पार्क में खेलने की इजाज़त नही दे सकते जहां सिर से पांव तक बुर्क़े में ढंके लोग बैठे हैं। क्या मुसलमानों को फ्रांस से बुर्क़े पर रोक लगाने की मांग करने का अधिकार है जबकि पश्चिम की महिलाओं को कम कपड़े में मुस्लिम देशों में ,विशेषकर पाकिस्तान में सार्वजनिक स्थानों या घर से बाहर घूमने की अनुमति नहीं है !आप आशा कर रहे हैं कि वे आपकी संस्कृति का सम्मान करें और जब वे आपके देश में आए तब भी और जब आप उनके यहां जाए तब भी लेकिन आप उनकी संस्कृति का सम्मान तो अपने देश में नहीं करते हैं और यदि आपका वश चले तो उनके देश में भी नहीं होने दे सकते – ऐसा कैसे ?
( डॉ शाज़िया नवाज़ पाकिस्तान की प्रमुख एवं चर्चित लेखिका हैं। वर्ष 2011 में फ़्रांस सरकार ने बुर्क़े पर रोक लगाया तो पाकिस्तान में उसपर छिड़ी बहस में हस्तक्षेप करते हुए डॉ शाज़िया नवाज़ ने अंग्रेजी में एक लेख लिखा था।उसी लेख का यह हिंदी अनुवाद विश्व संवाद संवाद केंद्र मुंबई के राजेश झा ने किया है। )
जन्म लेने के बाद शिशु जो प्रथम भाषा बोलने और सीखने का प्रयास करता है उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं।हमारा प्रारंभिक ज्ञान मातृभाषा द्वारा ही होता है और हम अपने भावी ज्ञान को भी (वह हमें चाहे जिस भाषा द्वारा प्राप्त हो) मातृ भाषा द्वारा प्राप्त किए हुए ज्ञान के आलोक में ही देखते हैं। मातृभाषा हमारे बाल्यकाल की भाषा होने के कारण हमारे मानसिक संस्थान का मजबूत अंग बन जाती है। मातृभाषा में प्रशिक्षित बच्चों में अन्य भाषाएँ सीखने की क्षमता भी अधिक होती है ,जिन बच्चों को बहुभाषी बनाया जाता है उनकी प्रतिभा का विकास बहुत तीव्र गति से संभव होता है।आज विश्व की दस प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियों का नेतृत्व भारतीय कर रहे हैं तो उसका एक कारण यह भी है। मनुष्य चाहे जितना विदेशी रंग में रंग जाए किंतु सच्चे हर्ष और घोर विपत्ति के अवसर पर मातृभाषा में स्वयं अभिव्यक्त कर सकता है। जिस भाषा को मनुष्य स्वाभाविक अनुकरण द्वारा बाल्यकाल से सीखता है उसे हम उसकी मातृभाषा कहते हैं इसी बात को हम दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि जिस भाषा को हम माता की गोद में सीखते हैं वह हमारी मातृभाषा हो सकती है या मातृभाषा है।
भारतीय प्राद्योगिकी संस्थान (मुंबई) में प्राध्यापक डॉक्टर गणेश रामकृष्ण कहते हैं कि मातृभाषा से शिशु का परिचय उसके भ्रूणावस्था में ही हो जाता है क्योंकि वह उसकी ध्वनि माँ से सुनता है। मनोविज्ञान की प्रोफ़ेसर और प्रमुख लेखक क्रिस्टीन मून ने छह महीने के भ्रूण से लेकर उसके शिशु रूप में जन्मने तक भ्रूण की गतिविधियों का गहन अध्ययन किया है। उन्होने वर्षों के शोध से सिद्ध किया है कि गर्भावस्था में ही भ्रूण का परिचय उसकी माँ द्वारा बोले और सुने जानेवाले शब्दों से होने लगता है। मुंबई विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की प्राध्यापक श्रीमती मेघना ठाकुर कहती हैं कि ‘ मातृभाषा के साथ हमारे बचपन की बहुत सी मधुर स्मृतियां जुड़ी हुई होती हैं, इस कारण उसे बोलने और सुनने के लिए हमारे मुख और कान की पेशियां अभ्यस्त हो जाती हैं। उसके उच्चारण व श्रवण में हमको अधिक प्रयास नहीं करना पड़ता। जो आनंद हमको अपनी मातृभाषा के गायन में होता है वह किसी दूसरी भाषा के गायन में नहीं आता।
शोधों ने यह सिद्ध किया है कि जीवन के आरंभिक वर्षों और प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा माध्यम में पढ़ने वाले बच्चों में सर्वश्रेष्ठ संवेगात्मक विकास के साथ साथ सभी विषयों की समझ और अधिगम भी बेहतर होते हैं उन बच्चों की तुलना में जिन्हें अपनी मातृभाषा/परिवेश भाषा से अलग किसी भाषा में पढ़ना पड़ता है। इतना ही नहीं, दूसरी भाषाएं सीखने में भी मातृभाषा/परिवेश भाषा में पढ़ने वाले बच्चे आगे पाए गए उन दूसरी श्रेणी के बच्चों की तुलना में जो अन्य भाषा से दूसरी भाषा सीखते हैं।हिंदी और अंग्रेजी माध्यम बच्चों तथा किशोरों को मराठी सिखानेवाली संस्कार भारती की स्वयंसेविका मानसी राणे कहती हैं कि प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा माध्यम से शिक्षा देने से बच्चों को बहुभाषी बनाने में भी श्रेष्ठतर होती है।बच्चों की प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा में मातृभाषा या पारिवारिक भाषा या परिवेश/स्थानीय भाषा का महत्व उन मुट्ठी भर विषयों में है जिस पर पूरी दुनिया के शिक्षाविदों और मनोवैज्ञानिकों की सहमति है। इस विषय पर इतने सारे शोध, प्रयोग, अध्ययन हुए हैं, इतनी सारी किताबें लिखी गई हैं कि अब इसे एक सार्वभौमिक निर्विवाद सत्य के रूप में वैश्विक स्वीकृति मिल गई है। शिक्षाविद् जानते हैं कि 6 साल की उम्र तक बच्चों के ८०-८५ प्रतिशत मस्तिष्क का विकास हो जाता है। यह भी अब एक सर्वविदित तथ्य है कि दो से आठ साल की उम्र के बीच कई भाषाएं आसानी से सीख लेने की क्षमता बच्चों में सबसे प्रबल होती है।
ज्ञान मनन से बढ़ता है और मनन के लिए पारस्परिक आदान-प्रदान आवश्यक है। यह आदान-प्रदान और विचार- विनियम में जितना व्यापक मातृभाषा द्वारा हो सकता है उतना दूसरी भाषा द्वारा नहीं हो सकता। बाल- साहित्य की अधिकारी ज्ञाता अर्चना पोहनेर के अनुसार मातृभाषा के शब्दों में हमारी जातीय संस्कृति का इतिहास छिपा होता है। उसके द्वारा हम अपने घर वालों और जाति वालों के साथ एक सूत्र में जुड़ जाते हैं और हम उनके हृदय तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं। मातृभाषा अपने व्यवहार करने वालों में एक आरक्षित प्रेम भाव उत्पन्न कर देती है। विश्व के किसी भी स्थान-समाज में जन्म लेने वाले बच्चों के लिए मातृभाषा/परिवेश/स्थानीय भाषा ही सर्वांगीण विकास तथा सभी विषयों के बारे में सीखने के लिए सर्वोत्तम माध्यम होती है। यह बात सुदूर जंगलों में रहने वाले वनवासी बच्चों पर भी उतनी है लागू होती है जितनी सबसे विकसित, संपन्न समाजों-देशों के बच्चों पर।
मानसी राणे कहती हैं कि समाज विकसित या अविकसित हो सकते हैं लेकिन कोई भी भाषा अविकसित नहीं होती। संसार की हर भाषा में अपने बोलने-बरतने वालों की सभी संचार-अभिव्यक्ति-आवश्यकताओं को पूरा करने की अन्तर्निहित क्षमता होती है। यह बात इसलिए भी केन्द्रीय महत्व की है कि बहुत से ऐसे देशों-समाजों में जो आधुनिक विकास, संपन्नता, तकनीकी-आर्थिक प्रगति में विकसित देशों से पिछड़ गए हैं, लोगों के मन में यह बात बिठा दी जाती है कि उनकी अपनी देशज, स्थानीय भाषाएं विकसित देशों की तथाकथित विकसित भाषाओं की तुलना में अविकसित, गरीब और असमृद्ध हैं। यह स्थिति ज्यादातर उन देशों की है जो किसी -न- किसी औपनिवेशिक देश की दासता के शिकार रहे हैं। अपनी भाषा-संस्कृति-समाज-समझ की हीनता का यह भाव इन समाजों में अपनी विरासत, अपनी हर बात को लेकर एक गहरा आत्महीनता , आत्म-लज्जा का भाव भर देता है जिससे उनके आत्म-विश्वास खंडित होते जाते है।इसका परिणाम यह होता है कि ऐसे विजित समाज अपनी भाषा, अपनी सांस्कृतिक पहचान, तौर-तरीकों, परंपराओं, पद्धतियों, ज्ञान-परंपराओं को लेकर गहरे संशय और अविश्वास से भर जाते हैं। उन्हें विजेता समाज, संस्कृति, भाषा, शिक्षा, जीवन शैली श्रेष्ठतर लगने लगते हैं। परिणामतः वे अपने पारंपरिक तौर तरीके छोड़ कर विजेता या प्रभुत्वशाली वर्ग के तौर तरीके अपनाने लगते हैं। उनकी नकल करने लगते हैं।
विश्व के सभी पूर्व-औपनिवेशित देश-समाज इस आत्महंता चेतना से ग्रस्त हो गहरी और व्यापक सांस्कृतिक-बौद्धिक-शैक्षिक दासता के शिकार बने दिखते हैं भले ही उन्हें राजनीतिक स्वाधीनता मिल गई हो। ऐन्स्रे ने १९७९ में कहा था कि सांस्कृतिक दासता का एक स्पष्ट परिणाम उस समाज में नवाचार, मौलिक चिंतन, शोध, आविष्कारों की कमी में दिखता है। चूँकि समाज का शिक्षित वर्ग पराई शिक्षा पद्धति और विचार सरणियों की नकल करना ह्रदयंगम कर चुका होता है इसलिए अपनी नैसर्गिक प्रकृति तथा प्रतिभा की नींव पर मौलिक विचार, कल्पनाओं और नवोन्मेष की उसकी क्षमता क्षीण पड़ जाती है। भाषायी साम्राज्यवाद- “वह परिघटना जिसमें एक भाषा के बोलने वालों के मन-मस्तिष्क और जीवन दूसरी भाषा द्वारा इतने दबा दिए जाते हैं कि वे यह विश्वास करते हैं कि जब मामला जीवन के उच्चतर पहलुओं का हो तो वे उसी विदेशी भाषा का प्रयोग कर सकते हैं और उन्हें करना चाहिए जब मामला जीवन के उन्नत पक्षों से, जैसे शिक्षा, दर्शन, साहित्य, शासन, प्रशासन, न्याय व्यवस्था आदि, निपटने का हो। भाषायी साम्राज्यवाद में किसी समाज के श्रेष्ठ लोगों के भी मानस, दृष्टिकोणों और आकांक्षाओं को विकृत करने और उन्हें देशज भाषाणों के सही मूल्यांकन तथा उनकी संपूर्ण संभावनाओं का अहसास करने से रोकने की एक शक्ति है।“ भारत भी इस ऐतिहासिक विकार, भाषायी साम्राज्यवाद का शिकार है।
इस विषय का दूसरा पहलू बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में मातृभाषा या भाषा की भूमिका का है। इसे समझने से पहले यह जरूरी है कि भाषा के बारे में इस सबसे बड़ी लगभग वैश्विक और सार्वभौमिक भ्रम को दूर किया जाए कि भाषा केवल संवाद का माध्यम है। जब तक इस भ्रम को दूर नहीं किया जाता और भाषा की ज्यादा बड़ी भूमिका को ठीक से नहीं समझा जाता तब तक बच्चों की प्रारंभिक देखभाल तथा शिक्षा में मातृभाषा के महत्व को नहीं समझा जा सकता। जिस तरह गर्भनाल के माध्यम से बच्चे को मां के गर्भ में सारा पोषण प्राप्त होता है, धीरे-धीरे उसके विभिन्न अंगों और पूरे शरीर का निर्माण होता है, वैसे ही बच्चे की माँ/परिवार/परिवेश की भाषा उसके अंतःशरीर या अंतःकरण के गठन में निभाती है। दृष्टि, स्पर्श, ध्वनियां और स्वाद- मुख्यतः जन्म के समय से सक्रिय इन चार इंद्रियों के माध्यम से भीतर जाने वाले अनुभवों, अनुभूतियों, प्रभावों से बच्चे की आंतरिक दुनिया बनती है। बच्चा जो देखता है, जिन्हें देखता है, जिन ध्वनियों को सुनता है, जिन स्पर्शों को महसूस करता है उनके दैनिक अनुभव से धीरे-धीरे उस की चेतना को कोरे पन्ने पर अनुभवों का कोश बढ़ता जाता है और बाहरी संसार के इन अनुभवों से, परिचित-सुखद अनुभूतियाँ देने वाले चेहरों-आवाज़ों-स्पर्शों से उसके रिश्तों और ज्ञान का आंतरिक संसार बनता जाता है। यही आंतरिक संसार धीरे-धीरे बच्चे के आत्मबोध में परिवर्तित हो जाता है।
जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है वैसे -वैसे उसका परिचय अपने परिवार से शुरू होकर अपने परिवेश से होने लगता है। शैशव के इस बीजरूपी आत्मबोध से वयस्क होने पर संसार-बोध तक की इस यात्रा में उसकी इन्द्रियां ही सबसे अधिक सहायक होती है। इन ऐन्द्रिक अनुभवों के माध्यम से वह जानता और पहचानता है माँ को, पिता को, निकट परिजनों को, घर को, विविध रूपों और वस्तुओं को, विभिन्न ध्वनियों और उनके स्रोतों-आशयों-अर्थों को। और यूं रूपाकारों, पारिवारिक तथा पारिवेशिक व्यक्तियों, संबंधों और वस्तुओं, नामों, उनके अर्थों तथा प्रयोजनों से उसका ज्ञान संसार भरता जाता है। जैसे-जैसे यह संसार बड़ा होता जाता है, बच्चा इसके अनुभवों को ह्रदयंगम करता जाता है। वह सहज मानवीय प्रतिक्रिया में अपने इस अंतरंग संसार से संवाद करना शुरू कर देता है, हाथ-पैर चला कर, मुखमुद्राओं से, किलकारियों या रुदन से, फिर अपनी तोतली अनगढ़ बातों से अपने को व्यक्त करना शुरू कर देता है। तब तक प्रमुखतः माँ और दूसरे परिजनों को सुनते-सुनते ध्वनियों, शब्दों, अर्थों, आशयों का उसका कोश भी बढ़ते हुए तुतुलाने से शुरू होकर एक दिन माँ/मम्मा शब्द से भाषा में बदल जाता है। यहाँ से बच्चे का भाषा भंडार आश्चर्चजनक तेजी से भरने लगता है। डेढ़-दो साल से आठ साल बच्चों के भाषिक, संवेगात्मक विकास के सबसे उत्कट साल होते हैं। ये अपने घर से आरंभ करके बाहर के वृहत्तर संसार से रोज़ सघन और विविधतापूर्ण परिचय के वे वर्ष हैं जब बच्चा सोख्ते की तरह हर चीज़ ग्रहण करता है। ये ही वे वर्ष हैं जब उसकी शाला-पूर्व शिक्षा आरंभ होती है और कक्षा आठ तक चलती है। इस भाषा से ही बच्चा अपने रोज बढ़ते, विस्तृत होते संसार के बारे में ज्ञान प्राप्त करता है, उससे संबंध स्थापित करता है। ये संबंध केवल बौद्धिक जानकारी के ही नहीं स्थानीय, सामाजिक, सांस्कृतिक, भावनात्मक तथा संवेगात्मक भी होते हैं। अपने भौतिक तथा मनोवैज्ञानिक ज्ञान तथा सहज जिज्ञासा से बच्चा अवचेतन स्तर पर ही संसार की खोज करता जाता है और इस तरह अपने आपको उसमें स्थापित भी करता जाता है।
इस प्रारंभिक भूमिका के बाद जब हम भारतीय शैक्षिक परिदृश्य को देखते हैं तो पाते हैं कि ७२ साल की स्वाधीनता के बाद हमारी शिक्षा व्यवस्था की ध्वस्त अवस्था, हमारी भाषाओं की बढ़ती अप्रासंगिकता, हमारे करोड़ों शिक्षित युवाओं की रोजगार-अयोग्यता, देश में नवाचार और मौलिक वैज्ञानिक आविष्कारों की लज्जास्पद कमी, आधुनिक ज्ञान के विविध क्षेत्रों में विश्वस्तरीय मौलिक चिंतन- पुस्तकों- खोजों का अभाव, आर्थिक-सामाजिक पिछड़ापन जैसी बातें सामने खड़ी दिखती हैं। इन स्थितियों के लिए जिम्मेदार कारणों, वर्गों में प्रमुख हमारी शिक्षा व्यवस्था के लिए जिम्मेदार नेतृत्व है जिसने स्वाधीनता के बाद भी भारत की बौ्द्धक आजादी की नींव यानी शैक्षिक आजादी के महत्व को नहीं समझा और शिक्षा व्यवस्था में बुनियादी, आमूल-चूल परिवर्तन नहीं किए। अंग्रेजों द्वारा अपने औपनिवेशिक हितों के लिए बनाया गया शिक्षा तंत्र ही मामूली बदलावों के साथ जारी रहा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की अस्थिर स्थितियों और चुनौतियों से जूझते राजनीतिक-शैक्षिक नेतृत्व ने कुछ इस दबाव में और कुछ बौद्धिक आलस्य में शिक्षा की वह सुविचारित नई प्रणाली विकसित नहीं की जो भारत की प्रकृति, परंपरा और प्रतिभा के अनुरूप इस नए भारत के स्वप्न को मूर्त रूप दे पाती। इस बौद्धिक आलस्य में राजभाषा हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी को भी जारी रख कर उसके प्रभुत्व, प्रभाव को बनाए रखना भी था और शिक्षा की माध्यम भाषा के रूप में बनाए रखना भी, विशेषतः उच्चतर शिक्षा में। प्रशासन, उद्योग, ज्ञान-विज्ञान में अंग्रेजी का प्रभाव, शक्ति और प्रतिष्ठा घटे नहीं, बढ़ते रहे। इनका स्वाभाविक असर प्राथमिक शिक्षा पर पड़ा और धीरे-धीरे उसमें भी स्थानीय भाषाओं की जगह अंग्रेजी ही माध्यम भाषा के रुप में बढ़ती रही। इस विदेशी भाषा से मिलने वाले प्रगति और रोजगार के अवसरों, सामाजिक प्रतिष्ठा के आकर्षण में अभिभावको की कई पीढ़ियों ने अपने बच्चों को भाषाई माध्यम की जगह अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में भर्ती कराया। इस तरह इन बच्चों के साथ ऐसी अनेक पीढ़ियाँ तैयार हो गईं जो बचपन से ही अपनी-अपनी भाषाओं से शिक्षा, ज्ञान ग्रहण तथा गंभीर अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में दूर हो चुकी थीं। वे अपनी भाषाओं का बातचीत, जीवन के सामान्य व्यापार में तो इस्तेमाल करती थीं लेकिन जीवन के ज्यादा महत्वपूर्ण आयामों में अंग्रेजी पर ही निर्भर थी, उसकी अभ्यस्त बना दी गई थीं।
इसका परिणाम आज इस रूप में हमारे सामने है कि एक ओर तो गरीब -से -गरीब अभिभावक भी अपने बच्चों को अच्छे भाषा-माध्यम सरकारी विद्यालयों से हटाकर तथाकथित अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में डाल रहे हैं भले ही वे कितने भी घटिया और मँहगे हों। दूसरी ओर, अंग्रेजी माध्यम में पढ़ कर निकले हमारे दोहरा नुकसान उठा रहे हैं। एक तो उन्हें इस थोपे हुए अंग्रेजी माध्यम के कारण सच्चा विषय-ज्ञान नहीं मिलता, उनका ज्ञान उथला और अनुपयोगी रहता है। इससे वे शिक्षित डिग्रीधारी तो बन जाते हैं लेकिन ये डिग्रियाँ उनमें रोजगार, अच्छी नौकरियों के लिए सुयोग्य नहीं बनातीं। दूसरा इससे भी बड़ा नुकसान यह होता है कि वे अपनी भाषाओं की समृद्धि, क्षमताओं, शक्ति और सौन्दर्य से क्रमशः दूर, कटे हुए और अपरिचित होते जाते हैं। चूँकि हमारी सांस्कृतिक पहचान, आत्म-संस्कृति बोध अविच्छिन्न रूप से हमारी विविध भाषाओं से जुड़ा हुआ है, उनके सघन परिचय-प्रयोग से ही विकसित होता है इसलिए ये शिक्षित युवा आत्म विकास के रोजगारपरक रास्तों से तो दूर रहते ही हैं अपनी सांस्कृतिक पहचान, अपना अस्मिता बोध भी खो देते हैं।
‘नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ के संशोधित मसौदे में भी मातृभाषा और भारतीय भाषाओं के संदर्भ में अनेक अहम सिफारिशें हैं, लेकिन मातृभाषा के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण बिंदु को लेकर शिक्षा नीति तैयार वाली कस्तूरीरंगन समिति ने शायद इस पर बहुत गंभीरता से विचार नहीं किया। यह बिंदु है प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा का। हालांकि मातृभाषा किसे कहें, इसे लेकर एक विवाद भी है। क्या है मातृभाषा की भारतीय संकल्पना? मातृभाषा में शिक्षा क्यों जरूरी है? इस संदर्भ में शिक्षाशास्त्र के शोधों के क्या निष्कर्ष हैं? यह भी कि राष्ट्रहित में क्या किया जाना चाहिए? पिछले कुछ दशकों से भारत में सरकारी स्कूली शिक्षा में काफी गिरावट आई है। दूसरी तरफ निजी स्कूल कुकुरमुत्ते की तरह महानगरों को तो छोड़िए, छोटे शहरों और कस्बों तक में चौतरफा उग आए हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षण का माध्यम जहां अपने-अपने राज्यों की भाषाएं या कहें कि स्थानीय अथवा मातृभाषा हुआ करता था, वहीं अब लगभग सभी निजी स्कूलों में शिक्षण का माध्यम अंग्रेजी हो गया है। हालांकि मातृभाषा की अवधारणा को ही लेकर कुछ विद्वान विवाद खड़ा करते हैं।
भाषाई अधिकारों पर विश्व सम्मेलन (बारसेलोना) में बेनिन के प्रतिनिधि ने जून 1996 में जो कहा था वह अपनी सांस्कृतिक विरासत, जड़ों, ज्ञान-परंपराओं, अस्मिता के सभ्यतामूलक सूत्रों से यह कटाव प्राथमिक शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से पाने वाले बच्चों में भी देखा जा सकता है। इनके साथ ही इन बच्चों के मन में अंग्रेजी-जनित एक अहंकार, भाषा-माध्यम समवयस्क व्यक्तियों के बरक्स एक श्रेष्ठता ग्रंथि भी विकसित हो जाती है। इसी के चलते भारत और इंडिया एक देश के दो नाम ही नहीं दो अलग-अलग मनोवैज्ञानिक तथा आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक संसार भी बन गए हैं। “अपनी भाषा बोलने के लिए एक बच्चे को सज़ा देना उस भाषा के विनाश का आरंभ है।“ भारत के हजारों अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालयों में यह शर्मनाक व्यवहार आज भी आम है। इस तरह भारत के विद्यालयों में ही भारत की भाषाओं के विनाश की नींव तैयार की जा रही है। भारतीय मानस पर अंग्रेजी और अंग्रेजियत के इस प्रभाव ने आम शिक्षित भारतीय को पश्चिमपरस्त, पश्चिमी सभ्यता, ज्ञान-विज्ञान, तकनीक तथा चिंतन का मुखापेक्षी बना कर देश को एक नकलची राष्ट्र बना दिया है। पराई भाषा में मौलिक चिंतन नहीं हो सकता। वह अपनी भाषा में ही संभव है। लेकिन अंग्रेजी के वर्चस्व ने सारी भारतीय भाषाओं को बोलने वालों, उनके परिवेश, परंपराओं, जीवनशैलियों को इस आधुनिक अंग्रेजी-परस्त युवा के लिए पिछड़ा हुआ, अनाधुनिक और शर्म का कारण बना दिया है। इसी कारण भारत में ज्ञान-विज्ञान के उच्चतर क्षेत्रों में नवाचार, मौलिक चितन, शोध, आविष्कार इतने कम हैं।
भारत को यदि इस ज्ञान युग में आधुनिक, प्रगतिशील, समृद्ध और ज्ञान-विज्ञान में अग्रणी बनना है तो उसे अंग्रेजी का यह मोह छोड़ कर अपनी ९०% प्रतिभाओं को उनकी अपनी भाषाओं में शाला-पूर्व स्तर से ही उत्कृष्टतम शिक्षा देकर उनकी मौलिकता तथा रचनाशीलता को उच्चतम प्रस्फुटन के अवसर देने होंगे। सशक्त भारत-निर्माण एवं प्रभावी शिक्षा के लिए मातृभाषा में शिक्षा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षा को अपने समाज एवं राष्ट्र के अनुरूप संचालित करने और अपनी भाषाओं में शिक्षण करने से ज्ञान के नए क्षितिज खुलेंगे, नवाचार के नए-नए आयाम उभरेंगे।अपनी-अपनी मातृ/परिवेश/प्रादेशिक भाषाओं में शिक्षा-संस्कार तथा स्वस्थ आत्म-बोध प्राप्त करके ही ये नई पीढियाँ भारतीय नवोन्मेष का नया युग निर्मित कर सकेंगी। सौभाग्य से नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने दशकों बाद भारतीय राष्ट्र के नवनिर्माण में भारतीय भाषाओं की इस अनिवार्य भूमिका को पहचाना है और प्राथमिक से लेकर उच्चतम स्तर की शिक्षा में उनको केन्द्रीय स्थान दिया है। अगले १५-२० वर्षों में इस नई शिक्षा व्यवस्था से आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, तकनीक तथा एक पुनर्प्राप्त सांस्कृतिक गौरव और सभ्यता-बोध से संपन्न होकर जब भावी भारतीय संसार में पदार्पण करेंगे तब भारत की वास्तविक प्रतिभा का चमत्कार संसार देखेगा। इसका प्राथमिक माध्यम बनेंगी भारतीय भाषाएं।
मातृ भाषा की यह विशेषता होती है कि यह हमारे लिए सभी भाषाओं में सबसे आसान भाषा होती है।इसे बोलना आसान होता है तथा यह हमारी मूल भाषा तथा प्रांत को दर्शाता है। हम सभी के जीवन में मातृभाषा का एक अलग ही महत्व है। हम चाहे जितनी भी अलग अलग भाषा का ज्ञान प्राप्त कर लें किन्तु को जगह मातृभाषा की है वो जगह कोई और दूसरी भाषा नहीं ले सकती है। बचपन से बोलने के कारण यह सदा हमारे साथ होती है। हम बाद में सीखी हुई भाषा को भले ही भूल जाएं लेकिन हम मातृभाषा को कभी नहीं भूलते है।भाषा की उन्नति के साथ विचार की स्पष्टता आती है और विचार ही सारी क्रियाओं का मूल स्रोत है। यदि विचार में शक्ति और स्पष्टता है तो हमारी क्रियाओं का प्रवाह निर्बाध बहता रहेगा और हम उत्तरोत्तर उन्नति करते जाएंगे।मातृभाषा, किसी भी व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषायी पहचान होती है।
विश्वभर में यह स्वीकार किया गया है कि बच्चों के गुणों व क्षमताओं का अधिकतम विकास मातृभाषा में शिक्षा प्रदान करने से ही संभव हो सकता है। शैक्षणिक मनोविज्ञान के अनुसार मातृभाषा में संप्रेषण एवं संज्ञान सहज तथा शीघ्र हो जाता है। इससे बच्चे कठिन चीजें भी आसानी से समझ लेते हैं, जबकि इतर भाषाओं में बच्चों को रटना पड़ता है, जो उनके पूर्ण मानसिक विकास के लिए ठीक नहीं है। यूनेस्को ने भी इसके महत्व पर मुहर लगाते हुये प्रतिवर्ष 21 फरवरी को मातृभाषा शिक्षण दिवस के रूप में मनाने का आग्रह किया हुआ है। नायर अस्पताल मुंबई में मनोविज्ञान की शिक्षक डॉक्टर जाह्नवी केदारे कहती हैं कि मातृभाषा से बच्चों का परिचय घर और परिवेश से ही शुरू हो जाता है। इस भाषा में बातचीत करने और चीज़ों को समझने-समझाने की क्षमता के साथ बच्चे विद्यालय में प्रवेश करते हैं। यदि उनकी इस क्षमता का उपयोग पढ़ाई के माध्यम के रूप में मातृभाषा का चुनाव करके किया जाये तो इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं। मातृभाषा में शिक्षा देने के प्रमुख उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए बाल -प्रशिक्षक श्रीमती अर्चना पोहनेर कहती हैं कि (1) विद्यार्थी एवं अध्यापकों में भाषा ज्ञान द्वारा विचारशीलता उत्पन्न करने, (2) उनमें अपने विचारों के परावर्तन, अभिव्यक्ति व संप्रेषण कुशलता उत्पन्न करने, (3) शिक्षण की भाषा को सरल, बोधगम्य, विषयकेन्द्रित बनाने तथा (4) पाठ्य आधारित भाषायी गतिविधियों (श्रवण, पठन, भाषण, लेखन, समझ) के आयोजन में सक्षम बनाने में मातृभाषा अधिक उपयोगी और प्रभावी सिद्ध हुई है । विभिन्न शोध बताते हैं कि बच्चों के पूर्ण मनो-बौद्धिक विकास के लिए आरंभिक शिक्षण मातृभाषा में ही होना चाहिए। आरंभिक शिक्षण मातृभाषा में होने से बोध एवं संज्ञान क्षमता बढ़ती है। छोटे बच्चों के संदर्भ में प्रत्यक्ष अनुभव है कि गणित या सामान्य चीजें भी अंग्रेजी में उन्हें नहीं समझ आतीं, जबकि वही चीज उनकी मातृभाषा में बतायी जाए तो उनके लिए ज्यादा कठिनायी नहीं आती। नई शिक्षा नीति मसौदे में भी मातृभाषा की शक्ति को रेखांकित करते हुए पैरा 4.8 में कहा गया है कि जहां तक हो सके आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई मातृभाषा में ही होनी चाहिए। पैरा 22.8 में तो उच्चतर शिक्षा में भी शिक्षण माध्यम के रूप में भारतीय भाषाओं के उपयोग को बढ़ाने की बात की गई है, लेकिन इन अनुशंसाओ को लागू करने लेकर कोई अनिवार्यता नहीं है।मातृभाषा हमें राष्ट्रीयता से जोड़ती है और देश प्रेम की भावना उत्प्रेरित भी करती है। मातृभाषा ही किसी भी व्यक्ति के शब्द और संप्रेषण कौशल की उद्गम होती है। एक कुशल संप्रेषक अपनी मातृभाषा के प्रति उतना ही संवेदनशील होगा जितना विषय-वस्तु के प्रति। मातृभाषा व्यक्ति के संस्कारों की परिचायक है।इतना ही नहीं, दूसरी भाषाएं सीखने में भी मातृभाषा/परिवेश भाषा में पढ़ने वाले बच्चे आगे पाए गए हैं उन दूसरी श्रेणी के बच्चों की तुलना में जो अन्य भाषा से अपनी शिक्षा प्रारम्भ करते हैं।
आज विश्व की दस प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियों का नेतृत्व भारतीय कर रहे हैं तो इसका कारण क्या यह है ? अगर हाँ तो हमारे देश के ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रो में अधिकांश बच्चे आज भी मातृभाषा में ही प्रशिक्षित होते हैं तो उनमें इतनी तीव्रता क्यों नहीं होती ? क्यों हमारे पास सुन्दर पिचाइयों की भरमार नहीं है ? श्रीमती अर्चना पोहनेर कहती हैं कि उनके शिक्षा के माध्यम लेकर शोध है क्या ?वहा कौन- कौनसी भाषा मे बोलते थे, घर पर कौन सी भाषा में बोलते थे, किस उम्र मे उन्हेने इंग्लिश सिखा, कौन सी कक्षा तक वो अपनी मातृभाषा में पढ़े ? परिसर भाषा मे सीखे ऐसी अनेक बाते हो सकती है इसलिए पहले विन्दुओं को देखा जाना चाहिए।किन्तु श्री दिलीप केलकर कहते हैं कि पहली बात यह है कि अपवादों को विशेष विषय के रूप में लेना चाहिए उनको जनरलाइज नहीं चाहिए। इसका दूसरा पक्ष यह है कि मातृभाषा में सीखी हमारे देश की सुन्दर पिचाई जैसी प्रतिभाओं ने विश्व स्तर पर अपने ज्ञान का डंका बजवाया है। इसका श्रेय हमारी वैदिक शिक्षा पद्धति को है। अंग्रेजी हमारे देश की उपरोक्त प्रतिभाओं की द्वितीयक भाषा है और उन्होने अंगेजों और अमेरिकियों को उनके घर में हराया है तो उसके मूल में वैदिक शिक्षण है। अगर हम इस अपवादों को छोड़ दें तो भी यह पाया गया है कि प्रारम्भ में मातृभाषा में प्रशिक्षित बच्चों में अन्य भाषाएँ सीखने की क्षमता भी अधिक होती है ,जिन बच्चों को बहुभाषी बनाया जाता है उनकी प्रतिभा का विकास बहुत तीव्र गति से संभव होता है।
प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक रवींद्रनाथ श्रीवास्तव लिखते हैं कि प्रयोजन की दृष्टि से मातृभाषा के दो आयाम हैं। पहले रूप में मातृभाषा का अर्थ है मां की भाषा अर्थात झूले-पालने की भाषा, जिसके द्वारा शिशु अपने भाषाई बोध एवं जीवन बोध का निर्माण करता है, लेकिन पश्चिम से अलग भारत जैसे बहुभाषी देश में मातृभाषा का एक और भी आयाम है। वह भाषा भी मातृभाषा है जो सड़क, बाजार और व्यापक सामाजिक जीवन की भाषा है, जिसके माध्यम से व्यक्ति विचार, संस्कार और जातीय इतिहास एवं परंपरा से जुड़ता है। जब हम अपनी मातृभाषा में बातचीत करने लग जाते हैं तो अपनापन होने लगता है , लोगों के साथ हमारा सहकारिता का भाव बढ़ जाता है. आजकल जो विचार और क्रिया में अंतर है वह मातृभाषा का समुचित आदर ना होने के कारण ही हो रहा है।’ विचार’ पढ़े- लिखे लोगों के हाथ में है जो प्राय मातृभाषा से विमुख रहते हैं और ‘ क्रिया ‘मातृभाषा भाषी अनपढ़ों के हाथ में हैं जिससे बहुत सी सामाजिक सुधार संबंधी योजनाएं निष्फल हो जाती हैं। भारतवर्ष में जो मौलिकता का अभाव है उसका बहुत कुछ कारण यह भी है कि हमारी शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा नहीं है। हम विचार किसी और भाषा में करते हैं और शिक्षा दूसरी भाषा में इसलिए हमारी शिक्षा हमारे मानसिक संस्थान का अंग नहीं बन पाती ,इसलिए वर्तमान शिक्षा द्वारा प्राप्त ज्ञान फलता -फूलता नहीं है। मातृभाषा माता के दूध के समान पवित्र और स्वास्थ्यवर्धक है, माता के सामान्य हमारी गुरु है और उसी के सामान स्नेहमयी है। तभी तो भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कहा था -‘ निज भाषा की उन्नति है सब उन्नति का मूल’।
बॉलीवुड अभिनेता सोनू सूद के खिलाफ मोगा थाना सिटी में चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में केस दर्ज किया है। हालांकि अभिनेता सोनू सूद का कहना है कि उन्हें क्षेत्र में शिअद प्रत्याशी के समर्थकों के धमकाने की सूचना मिली थी। जिसकी पुष्टि के लिए वहां गया था। पुलिस ने एक गाड़ी को कब्जे में लिया है। इस पर सोनू सूद अपने साथियों के साथ सवार थे। हालांकि वह किसी और के नाम पर पंजीकृत है। गाड़ी में सोनू सूद के साथ मुंबई के उनके कुछ दोस्त भी थे। जबकि 18 फरवरी की शाम से ही बाहरी लोगों को विधानसभा छोड़ने का आदेश था।
बताया जा रहा है कि अभिनेता सोनू सूद पर यह कार्रवाई एसएसपी स्तर से हुई है। शिकायत में कहा गया है कि सोनू सूद मोगा के मतदाता नहीं हैं। जबकि सोनू का कहना है कि वह मोगा के जन्मे और यहीं पले-बढ़े हैं। गौरतलब है कि मतदान वाले दिन (20 फरवरी) सोनू सूद गांव लंडेके जा रहे थे। इसी दौरान उनकी गाड़ी को शिअद की शिकायत पर पुलिस ने रोक ली और अभिनेता को घर भेज दिया। अभिनेता पर मतदाताओं को प्रभाव में लेने का आरोप लगा। बताते हैं कि सोनू सूद को मतदान के दिन घर से बाहर न निकलने का निर्देश दिया गया था।
सोनू सूद से जब्त इंडेवर गाड़ी मोगा के दत्त रोड निवासी हरविंदर सिहं उर्फ काला के नाम पर बताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार यह गाड़ी अक्सर ही सोनू सूद के मोगा स्थित आवास पर खड़ी रहती है। उधर, सोनू सूद ने इन आरोपों को नकार दिया और कहा कि उन्हें सूचना मिली थी कि शिअद प्रत्याशी बरजिंदर सिंह बराड़ के बूथ के समक्ष शिअद कार्यकर्ता उनके कार्यकर्ता को धमका रहे हैं और वहां रुपये बांटने पर कुछ विवाद हुआ था। जिसकी पुष्टि के लिए मैं वहां जा रहा था।
पुलिस अधिकारी हरप्रीत सिंह के अनुसार उन्हें मुखबिर से सूचना मिली थी कि सोनू सूद अपनी बहन मालविका के पक्ष में मुंबई के कुछ लोगों समेत प्रचार कर रहे हैं और उन पर प्रभाव बना रहे हैं। जब वह मौके पर पहुंचे तो सोनू सूद लंडेके गांव में एक मतदान केंद्र के बाहर कार में सवार थे। उधर, सोनू सूद विवादों के बाद शूट पर दक्षिण अफ्रीका रवाना हो गए हैं।
साइरस मिस्त्री के समूह को राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 26 मार्च, 2021 के अपने उस फैसले पुनर्विचार करने का फैसला किया है जिसमें वर्ष 2016 में उन्हें कंपनी के कार्यकारी अध्यक्ष व बोर्ड निदेशक से हटाने के टाटा संस के फैसले को बरकरार रखा गया था। इस मामले पर 9 मार्च को सुनवाई होगी।
चीफ जस्टिस एनवी रमण, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 2:1 के बहुमत से मिस्त्री समूह द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका पर नौ मार्च को खुली अदालत में विचार करने पर सहमति व्यक्त की है। जस्टिस रामसुब्रमण्यम ने पुनर्विचार याचिका पर विचार करने के 15 फरवरी के इस आदेश से असहमति जताई है। सुप्रीम कोर्ट के नियमों के अनुसार पुनर्विचार याचिकाओं पर जजों के चैंबर के भीतर विचार किया जाता है।
सोमवार को जारी आदेश में बहुमत ने कहा है कि पुनर्विचार याचिकाओं की मौखिक सुनवाई की मांग करने वाले आवेदनों को स्वीकार किया जाता है। वहीं बहुमत के विचार से अलग जस्टिस रामसुब्रमण्यम ने कहा है, मुझे आदेश से सहमत होने में असमर्थता पर खेद है। मैंने पुनर्विचार याचिकाओं को ध्यान से देखा है और मुझे निर्णय की समीक्षा करने के लिए कोई वैध आधार नहीं मिला है। पुनर्विचार याचिकाओं में उठाए गए आधार इसके अंतर्गत नहीं आते हैं। इसलिए मौखिक सुनवाई की मांग करने वाले आवेदन खारिज किए जाने योग्य हैं।
अक्तूबर 2016 में मिस्त्री को चेयरमैन पद से हटाया गया मिस्त्री को 24 अक्तूबर 2016 को टाटा संस के चेयरमैन पद से अचानक बिना कोई कारण बताए हटा दिया गया था। हालांकि, बाद में कुछ प्रेस बयानों में समूह ने दावा किया कि मिस्त्री अपेक्षा के अनुसार प्रदर्शन नहीं कर पा रहे थे और उनकी निगरानी में टाटा संस को नुकसान हुआ। दूसरी ओर मिस्त्री के अनुसार घाटे के आंकड़ों में समूह की भारी लाभ कमाने वाली कंपनी टीसीएस से मिलने वाले लाभांश को शामिल नहीं किया गया, जो औसतन सालाना 85 फीसदी से अधिक था।
चित्रगुप्त आर्ट्स के बैनर तले बनी फिल्म ‘पलक’ अब बहुत जल्द ही सिनेदर्शकों तक पहुँचने वाली है। इस फिल्म की कहानी एक दिव्यांग लड़की की है जो दूसरे दिव्यांग लड़की का जीवन सुधारती है, उसके जीवन में रोशनी लेकर आती है। इस फ़िल्म के लिए ‘आय (नेत्र) बैंक’ (एन जी ओ) भी सहयोग कर रहा है। ‘ऑय बैंक’ के फाउंडर शैलेश श्रीवास्तव के द्वारा इस फिल्म के निर्माण में पुरा सहयोग दिया गया है। यह फ़िल्म राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिलीज होगी। जिसमें ऑय ब्रांड के कलाकारों का भी साथ होगा जिनमें से एक महानायक अमिताभ बच्चन भी हैं। इस फ़िल्म को रिलीज होने से पहले ही दो फिल्म पुरस्कारों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है जो गर्व की बात है। फिल्म की कहानी में एक महत्वपूर्ण संदेश है साथ ही चार गीत भी है जिसमें कव्वाली, सैड सांग, सगाई का गीत और सोलो गीत मुख्य हैं। फिल्म में सभी रंगमंच से जुड़े अनुभवी कलाकार हैं जो ज्यादातर उत्तर भारतीय हैं। इस फिल्म में ‘नदिया के पार’ फेम अभिनेत्री शीला शर्मा, अभिनेता अतुल श्रीवास्तव, वेब सिरीज़ आश्रम की तूलिका बनर्जी, विक्रम शर्मा जैसे मंझे हुये कलाकार हैं। सिवान (बिहार) के मूल निवासी फिल्म निर्माता मधुप श्रीवास्तव ने संदेशपरक फिल्म ‘पलक’ के पहले भी प्रोडक्शन डिजाइन और निर्देशन जैसे कई काम फ़िल्म और टेलीविजन के लिए किये हैं। दूरदर्शन पर उनकी क्राइम बेस्ड सीरियल भी टेलीकास्ट हो चुकी है।
उनकी ‘उड़ेंगे ऊंची उड़ान’ नाम की धारावाहिक भी टेलीविजन पर आ चुकी है। निर्देशन के क्षेत्र में वह कई अवार्ड से भी सम्मानित हो चुके हैं। नवीनतम प्रोजेक्ट ‘पलक’ के बाद मधुप श्रीवास्तव अपनी चित्रगुप्त आर्ट्स के बैनर तले पुनः फिल्म निर्माण का कार्य करने जा रहे हैं जिसमें उनके सहयोगी बैनर युनिप्लेयर फिल्म्स है। यूनिप्लेयर फिल्मस की संचालिका अनामिका श्रीवास्तव हैं। बकौल मधुप श्रीवास्तव मौज़ूदा दौर में फिल्मों के प्रति लोगों के मन में काफी बदलाव आए हैं वो कुछ नया देखना चाहते हैं जिसमें मनोरंजन के साथ नई कहानी और संदेश भी हो और उनकी यह तुष्टि फिल्म ‘पलक’ से पूर्ण होगी। यह फिल्म एक संदेशपरक सामाजिक कहानी है जिसे सभी दर्शकों तक पहुंचाना जरूरी है। प्रस्तुति : काली दास पाण्डेय