इससे पहले कि श्रद्धा हत्याकांड की बात की जाए मैं अच्छी तरह जानता हूं कि यह देश प्रेम के खिलाफ नहीं है । मर्जी से एक दूसरे के साथ रहने को भी कानूनी मान्यता मिल चुकी है । दो बालिग व्यक्ति अपनी पसंद के साथी चुन सकते हैंऔर साथ रह सकते हैं । भले ही विवाह के बंधन में न बंधने की वजह से छोटे शहरों एवं निम्न मध्यमवर्गीय समाज के लोग ऐसे संबंधों को गलत मानते हों लेकिन महानगरों में अब एक बहुत बड़ा खाता पीता ऐसा वर्ग है जो ऐसी बातों की परवाह नहीं करता ।
आसान नहीं है मैनपुरी में समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार डिम्पल यादव की राह
– अशोक भाटिया
सपा सांसद रह चुके रघुराज शाक्य मैनपुरी लोकसभा उप चुनाव में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव को चुनौती देंगे। भाजपा ने रघुराज शाक्य को मैनपुरी उप चुनाव में पार्टी का प्रत्याशी घोषित किया है। पार्टी ने मंगलवार को उप चुनाव के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की। प्रसपा के अध्यक्ष शिवपाल यादव के करीबी रहे रघुराज शाक्य विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में शामिल हुए थे। रघुराज को पार्टी ने मैनपुरी में प्रत्याशी बनाकर सपा के लिए मुकाबले को कांटे का बनाने की कोशिश की है। डिंपल यादव ने सोमवार को नामांकन दाखिल किया। इस दौरान डिंपल और अखिलेश से अधिक चर्चा में सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव रहे। उनके नाम पर ही वोट मांगते अखिलेश यादव दिखते रहे। अब भाजपा ने ऐसा दांव खेला है, जिस चुनौती से निपटना अखिलेश यादव के लिए मुश्किलों भरा हो सकता है। शिवपाल यादव भले ही सोमवार को दिन भर लखनऊ कार्यालय में बैठकर भविष्य की रणनीति बनाते दिखे। मैनपुरी के चुनावी मैदान में वे दिखेंगे या नहीं, भविष्य तय करेगा। लेकिन, उनके साथी रहे रघुराज शाक्य की भाजपा से उम्मीदवारी ने चुनावी हलचल को बढ़ा दिया है। रघुराज शाक्य को शिवपाल सिंह यादव का करीबी माना जाता है। उत्तर प्रदेश चुनाव 2022 से ठीक पहले प्रगतिशील समाजवादी पार्टी छोड़कर रघुराज शाक्य ने भाजपा का दामन थाम लिया था। रघुराज शाक्य इटावा सीट से दो बार सांसद रहे हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की मौजूदगी में इसी साल फरवरी माह में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की थी। करीब 53 वर्षीय रघुराज शाक्य प्रगतिशील समाज पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर भी रह चुके हैं। रघुराज शाक्य वर्ष 1999 और 2004 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर इटावा से सांसद चुने गए। वर्ष 2012 में सपा के टिकट पर इटावा सदर सीट से विधानसभा का चुनाव जीता था। उत्तर प्रदेश चुनाव 2022 में इटावा सदर सीट से उम्मीदवारी कर रहे थे, लेकिन उन्हें चुनावी मैदान में नहीं उतारा गया।
मैनपुरी में जातीय समीकरण की बात करें तो ये सीट पिछड़े वर्ग के मतदाताओं की बहुलता वाली सीट है। यहां सबसे ज्यादा यादव मतदाता हैं। इनकी संख्या करीब 3.5 लाख है। शाक्य, ठाकुर और जाटव मतदाता भी अच्छी संख्या में हैं। इनमें करीब 1.60 लाख शाक्य, 1.50 लाख ठाकुर, 1.40 लाख जाटव, 1.20 लाख ब्राह्मण और एक लाख के करीब लोधी और राजपूतों के वोट हैं। वहीं, वैश्य और मुस्लिम मतदाता भी एक लाख के करीब हैं, जबकि कुर्मी मतदाता की संख्या एक लाख से ज्यादा है। मैनपुरी में अभी करीब 17 लाख वोटर्स हैं। इनमें 9.70 लाख पुरुष और 7.80 लाख महिलाएं हैं। 2019 में इस सीट पर 58.5% लोगों ने वोट डाला था।
मुलायम सिंह यादन ने भले ही 1996, 2004, 2009, 2014 और 2019 में पांच बार मैनपुरी सीट जीती हो, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में उनकी जीत का अंतर समाजवादी के लिए चिंता का विषय है। 2004 के लोकसभा चुनावों में 64 प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन हासिल करने वाली समाजवादी पार्टी के लिए साल 2019 लोकसभा चुनाव में जीत का अंतर घटकर 94,389 रह गया, जबकि समाजवादी ने ये चुनाव बसपा के साथ मिलकर लड़ा था, जिसे दलितों का बड़ा समर्थक माना जाता है।
अखिलेश और डिंपल यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती परिवार को एकजुट करने की भी होगी। मैनपुरी लोकसभा के तहत इटावा नगर की जसवंतनगर विधानसभा सीट भी आती है। इस सीट से शिवपाल सिंह यादव विधायक हैं। शिवपाल सिंह और अखिलेश के बीच की तल्खी भी जगजाहिर है। वहीं, जसवंतनगर में शिवपाल यादव की पकड़ सबसे मजबूत मानी जाती है। साल 2019 के लोकसभा में मुलायम सिंह की जीत जसवंतनगर से ही सुनिश्चित हुई थी। इस सीट से मुलायम सिंह यादव ने 65 हजार से ज्यादा वोटों के लीड ली थी। ऐसे में शिवपाल यादव की नाराजगी डिंपल पर भारी पड़ सकती है। हालांकि, रामगोपाल यादव ने कहा कि शिवपाल की सहमति से ही मौनपूरी से डिंपल को प्रत्याशी बनाया गया।
मैनपुरी लोकसभा सीट पर उप चुनाव सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद हो रहा है। यह मुलायम परिवार की परंपरागत सीट रही है। ऐसे में सपा की ओर से डिंपल यादव को उम्मीदवार बनाया गया। उनके पक्ष में चुनावी मैदान में उतरे अखिलेश यादव ने मुलायम सिंह यादव के नाम पर सभी वोट डिंपल को मिलने का दावा किया है। हालांकि, भावनाओं को एक तरफ रखें तो शाक्य वोट बैंक मुलायम सिंह यादव तक की चिंता इस सीट पर बढ़ाता रहा है। मैनपुरी सीट से लोकसभा चुनाव 2019 में महज 94,389 वोटों के अंतर सेजीता था। मुलायम के खिलाफ प्रेम सिंह शाक्य चुनावी मैदान में उतरे थे।
लोकसभा चुनाव 2019 में मुलायम सिंह यादव को 5,24,926 वोट मिले थे। वहीं, दूसरे नंबर पर रहे भाजपा के प्रेम सिंह शाक्य को 4,30,537 वोट मिले थे। मुलायम सिंह यादव का यह आखिरी चुनाव माना जा रहा था। इस कारण भाजपा का कोई भी सीनियर नेता यहां प्रचार करने नहीं आया। इसके बाद इस प्रकार का वोट भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में था। उत्तर प्रदेश चुनाव 2022 में भाजपा ने मैनपुरी सीट के तहत मैनपुरी विधानसभा और भोगांव विधानसभा सीट पर कब्जा जमाया था। भाजपा ने पिछले दिनों में किलों को ढाहने की कवायद शुरू की है। आजमगढ़ और राजपुर लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के अभेद्य किले को उप चुनाव की बिसात पर ढाहा जा चुका है। इन सीटों पर भगवा परचम लहरा रहा है। ऐसे में रघुराज शाक्य डिंपल यादव की चुनौती बढ़ा सकते हैं। इतना मानकर चलिए, अब मैनपुरी लोकसभा सीट पर प्रचार करने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी जाएंगे। अन्य सीनियर नेता भी। इसलिए मुकाबला कड़ा होगा।
भाजपा की तो 2014 से ही उत्तर प्रदेश की ऐसी सीटों पर नजर रही जिन पर बड़े राजनीतिक विरोधी काबिज हुआ करते थे। 2019 में भाजपा ने अमेठी हथिया लिया और 2022 में आजमगढ़ और रामपुर के बाद भाजपा का अगला निशाना मैनपुरी ही है।
डिम्पल का राजनातिक अनुभव देखे तो 2009 से उन्होंने अपना सफ़र शुरू किया था । तब अखिलेश यादव फिरोजाबाद और कन्नौज दो लोक सभा सीटों से चुनाव लड़े थे। दोनों सीटों से जीते भी, लेकिन बाद में फिरोजाबाद छोड़ दी थी। जब उपचुनाव की घोषणा हुई तो परिवार में डिंपल यादव को चुनाव लड़ाने पर सहमति बनी – ये डिंपल यादव का पहला चुनाव था।लेकिन तभी राज बब्बर भी कांग्रेस से टिकट लेकर मैदान में कूद पड़े। मुलायम परिवार में किसी ने भी राज बब्बर की परवाह नहीं की। असल में राज बब्बर पहले समाजवादी पार्टी के ही नेता हुआ करते थे, लेकिन पार्टी में उनको लाने वाले अमर सिंह से तकरार बढ़ जाने पर निकाल दिया गया था। राज बब्बर के बाद ही अमर सिंह ने अमिताभ बच्चन और जया बच्चन को मुलायम सिंह यादव के परिवार और पार्टी से जोड़ा था, लेकिन उनके बढ़ते प्रभाव से राज बब्बर को घुटन होने लगी थी , और फिर नौबत ये आ गयी कि पार्टी से ही बेदखल होना पड़ा । फिरोजाबाद उपचुनाव राज बब्बर के लिए बदला लेने का बड़ा मौका समझ में आया।चुनाव प्रचार के लिए जब राज बब्बर ने सलमान खान को बुला लिया तो, अमर सिंह ने संजय दत्त को बुला लिया डिंपल यादव के लिए वोट मांगने। अमर सिंह ने भी संजय दत्त के साथ रैली की, लेकिन सलमान खान को वॉन्टेड बोल कर सारे किये कराये पर खुद ही पानी फेर दिया।नतीजा आया तो डिंपल यादव चुनाव हार चुकी थीं और राज बब्बर जीत कर हिसाब बराबर कर चुके थे। पूरे परिवार में मायूसी छा गयी और उबरने में तीन साल लग गये , लेकिन ये भी है कि डिंपल की वो हार समाजवादी पार्टी के लिए संजीवनी बूटी साबित हुई। अखिलेश यादव के लिए डिंपल यादव की हार बहुत बड़ा सदमा रही। तब समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर हो चुकी थी और मायावती अपनी सोशल इंजीनियरिंग के जरिये सरकार बनवा चुकी थीं । अखिलेश यादव ने सलाह मशविरा किया और साइकिल लेकर निकल पड़े।उसके बाद तो अगले विधानसभा चुनाव की तारीख आने तक अखिलेश यादव साइकिल पर ही सवार रहे और गांव गांव घूम कर लोगों से समाजवादी पार्टी के लिए वोट मांगते रहे। और तब तक मैदान में डटे रहे जब तक लोगों ने समाजवादी पार्टी को सत्ता नहीं सौंप दी।
ये तो मुलायम सिंह का दबदबा ही रहा जो सारी चीजें मैनेज कर दिये और 2012 में डिंपल यादव को निर्विरोध विजेता घोषित किया गया और वो संसद पहुंच गयीं। खास बात ये है कि तब भी डिंपल यादव को उपचुनाव में ही उतारा गया था और वो भी अखिलेश यादव की ही खाली की हुई सीट से। असल में 2012 में जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी तो मुलायम सिंह यादव पीछे हट गये और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने गये और उसी के चलते उनकी कन्नौज सीट खाली हो गयी थी। अव्वल को मुलायम परिवार को छाछ फूंक कर पीने की जरूरत नहीं थी, लेकिन सच तो यही रहा कि फिरोजबाद चुनाव का नतीजा दूध से जलने जैसा ही रहा। फिर क्या था, मुलायम सिंह यादव ने पूरी ताकत झोंक दी। फिर भी एक आदमी चुनाव मैदान में टपक पड़ा था। बहरहाल जैसे तैसे वो भी मैनेज हो गया और डिंपल यादव निर्विरोध चुनाव जीत कर संसद पहुंच गयीं।
फिरोजाबाद की ही तरह पिछले आम चुनाव में हार का मुंह देख चुकीं डिंपल यादव के लिए मैनपुरी का मैदान कोई नया नहीं है, लेकिन कन्नौज की तरह तो वो मैनेज होने से रहा। बल्कि, ये लड़ाई तो और भी ज्यादा मुश्किल होने वाली है।मुलायम सिंह ने तो 2019 में ही मैनपुरी के लोगों से बोल दिया था कि वो अपना आखिरी चुनाव लड़ रहे हैं। हालांकि, वो अपना कार्यकाल भी नहीं पूरा कर पाये। और अब उनके विरासत को बचाने और बनाये रखने की जिम्मेदारी बेटे अखिलेश यादव पर आ चुकी है और यही वजह है कि अखिलेश यादव ने अपने बाद समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत चेहरा मैदान में उतार दिया है।हो सकता है अखिलेश यादव ने मुलायम सिंह यादव के आखिरी चुनाव लड़ने की बात सोच कर ही मैनपुरी संसदीय क्षेत्र की विधानसभा सीट करहल से चुनाव लड़ने का फैसला किया हो ये तो है ही कि आजमगढ़ के मुकाबले अखिलेश यादव के लिए मैनपुरी का किला बचाना कहीं ज्यादा जरूरी है।
मैनपुरी संसदीय क्षेत्र में पांच विधानसभा सीटें हैं, जिनमें अखिलेश यादव की करहल सहित तीन विधानसभा सीटें समाजवादी पार्टी के पास हैं, जबकि दो सीटों पर भाजपा काबिज है। इस लिहाज से देखा जाये तो इलाके में आधे से ज्यादा दखल तो समाजवादी पार्टी का ही है, लेकिन चुनाव भी तो सर्जरी की ही तरह होता है जिसमें हमेशा ही जोखिम बना रहता है।मैनपुरी सीट पर समाजवादी पार्टी का 1996 से ही कब्जा रहा है, जब मुलायम सिंह यादव खुद वहां से सांसद बने थे अब तक मैनपुरी लोक सभा सीट पर दो बार उपचुनाव भी हो चुके हैं और ये तब से तीसरा उपचुनाव है।2004 में हुआ उपचुनाव जीत कर धर्मेंद्र यादव संसद पहुंचे थे, लेकिन 2022 के आजमगढ़ उपचुनाव में वो भाजपा के दिनेश लाल निरहुआ से मात खा गये।
2014 में मुलायम सिंह यादव मैनपुरी और आजमगढ़ दो सीटों से चुनाव लड़े और जीतने के बाद मैनपुरी सीट छोड़ दी थी। तब मुलायम परिवार के ही तेज प्रताप यादव सांसद बने – और अब उनकी बहू डिंपल यादव मैदान में उतर चुकी हैं।हाल फिलहाल हो रहे उपचुनाव एक हिसाब से 2024 के आम चुनाव के लिए फीडबैक माने जा रहे हैं, लेकिन मैनपुरी उपचुनाव का नतीजा तो समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार डिम्पल यादव के लिए आसान नहीं लगाती। खैर नतीजा जो है वह 8 दिसंबर को आएगा तब तक बहुत कुछ राजनीतिक उलटफेर हो सकता है । (युवराज)
– अशोक भाटिया
बिग बॉस 16 में मिस नेपाल मनीषा आचार्या की हो सकती है wild Card एन्ट्री !
मुम्बई। Big boss के घर मे कई बार ऐसे कंटेस्टेंट की वाइल्ड कार्ड एंट्री हो जाती है जो अपने दम पर दर्शकों का खूब मनोरंजन करते है यही वजह है कि बिग बॉस की टीम ऐसे पर्सनालिटी की तलाश करती है जो वाकई में दमदार हो, कुछ ऐसी है पर्सनालिटी के लिए जानी जाती है मिस नेपाल मनीषा आचार्य।
खबर आ रही है कि मनीषा आचार्या जिनको आप लोगों ने कई वीडियो एल्बम और कई प्रोजेक्ट में देखा है वो अगर आने वाले समय मे बिग बॉस के घर में एंट्री मार ले तो इसमें आश्चर्य नहीं होगा।
इस खबर की पुष्टि फिलहाल ना ही बिग बॉस की टीम ने किया और ना ही मनीषा आचार्या ने, लेकिन सूत्रों के हवाले से खबर है कि मनीषा से इस प्रोजेक्ट को लेकर काफी चर्चा चल रही और जल्द ही इस खबर पर मोहर लग सकता है।

अगर मनीषा की एंट्री बिग बॉस घर में होती है तो दर्शकों को मनोरंजन की गारंटी पक्की है। साथ में मनीषा जो अपनी बेबाकी के लिए मशहूर है, उनकी बोल्ड और बिंदास अंदाज़ देखने मे खूब मजा आएगा। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, मनीषा कोइराला और सलमान खान को अपना आइडियल मानने वाली मनीषा आचार्या के लिए बिग बॉस का घर उनके फिल्मी करियर में एक नया आयाम कायम करेगी।
विद्या सागर गौ-रक्षा समिति अध्यक्ष के विरूद्ध मंत्री से की शिकायत
पन्ना। विद्या सागर गौ-रक्षा समिति पवई के अध्यक्ष के विरूद्ध समिति के नियमों का पालन न करने एवं तानाशाही रवैया अपनाये जाने को लेकर समित की पूर्व अध्यक्ष संतोष जैन द्वारा मध्य प्रदेश शासन के मंत्री एवं पन्ना विधायक बृजेन्द्र प्रताप सिंह को एक लिखित पत्र में शिकायत की गई है। शिकायकर्ता ने पत्र में उल्लेख किया है कि समिति की स्थापना के समय पदाधिकारियों के संबंध निर्वाचन संबंधी समिति का सर्वसम्मति से निर्माण किया गया जिसका अध्यक्ष द्वारा पालन नहीं किया जा रहा है। सक्रिय सदस्य बिना बैठक बुलाये बिना सूचना के निकाल दिये जाते है तथा मनमाने तरीके से नाम लिख लिये जाते हेै।
समिति के सचिव की नियुक्ति बिना बैठक की गई और घर जाकर लोगों के हस्ताक्षर करवा लिये गये है। शिकायतकार्ता का आरोप है कि इनके द्वारा विगत पशु आहार भी चोरी छुपे विक्रय किया गया। समिति के अध्यक्ष का कार्यकाल नियम विरूद्ध १५ वर्ष हो चुका है तब से अभी तक सार्वजनिक बैठक नहीं बुलाई गई है। शिकायतकर्ता द्वारा सदस्यों को जानकारी नहीं देने समिति अध्यक्ष द्वारा अकेले निर्णय लेने तथा समिति के व्यय एवं कार्याे में पारदर्शिता नहीं रखने का आरोप लगाया है साथ ही साथ पशुओं की संख्या कम गौ सदन में गलत दर्ज करवाई जाती है। शिकायतकर्ता द्वारा मांग की गई है कि समिति के संविधान के अनुसार समिति अध्यक्ष का कार्यकाल ०५ वर्ष का है और वर्तमान अध्यक्ष १५ वर्ष से लगातार समिति के अध्यक्ष बने हुए है तथा मनमानी एवं नियमों के विरूद्ध कार्य कर रहे है जिसकी जांच करवाई जाये साथ ही पारदर्शी तरीके से शीघ्र निर्वाचन अध्यक्ष की मांग की जाये।
सूरत – गौ माता के पंचगव्य का सेवन करने वाला सच्चा गोव्रती-साध्वी कपिलादीदी
सूरत. पांच दिवसीय गौ कथा के दूसरे दिन सोमवार को सिटीलाइट स्थित माहेश्वरी भवन में व्यासपीठ से साध्वी कपिलादीदी ने कहा कि आज अधर्म बढऩे से अच्छा काम करने में कठिनाई होती है। जगत के सभी जीवों का पोषण करने वाली मां भगवती गौ माता सडक़ों पर भटक रही हैं और हिंसक जानवर श्वान घरों में आनंद भोग रहा है। धर्म को संरक्षित करना बहुत बड़ा धर्म है। धर्म की हानि होने पर सज्जनों की पीड़ा हरने के लिए स्वयं ठाकुरजी अवतरित होते हैं।
आज के परिवेश में माना कि लोग गौ माता नहीं रख सकते, लेकिन गौ वंश को संरक्षित करने के लिए गो व्रती तो बन ही सकते हैं। गो व्रती का मतलब है पंचगव्य (गाय का घी, दूध, दही, मूत्र एवं गोबर) सहित गौ वंश उत्पाद का सेवन करना। भवन में पांच दिवसीय कथा का आयोजन श्रीमहेश मित्र मंडल की ओर से किया गया है। कथा में साध्वी ने कहा कि आज आश्रम तो बन रहे हैं, लेकिन गौ शालाएं नहीं दिखाई देती हैं।
आश्रम के साथ गौशाला हो और ठाकुरजी की प्रियतम गौ माता की सेवा होती हो तो वहां की दिव्यता अलग ही होती है। ठाकुरजी के नाम के साथ गौ माता का नाम आ जाए तो जीवन सफल हो जाता है। इस मौके पर साध्वी ने नशे से दूर रहने की बात भी कई दृष्टांतों के साथ श्रद्धालुओं के समक्ष कही। कथा आयोजन में श्री महेश मित्र मंडल के जुगल कोठारी, अनिल नागौरी, संतोष भट्टड़, नवीन भूतड़ा, गिरिराज टावरी, तन्मय चांडक, रोहित मालपानी, दीपक भूतड़ा, कमल झंवर समेत आदि सक्रिय हैं।
रुकनी चाहिए राज्यपालों और सरकार के बीच तकरार
– अशोक भाटिया
राज्य की कार्यपालिका के प्रमुख राज्यपाल होते हैं। यह पद हमें अंग्रेजों से विरासत में मिला है जिसकी शुरूआत 1858 में ही हो गई थी। संविधान के अनुच्छेद 155 के अनुसार राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रत्यक्ष रूप से की जाएगी परंतु वास्तव में उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर की जाती है। राज्यपाल, जो मंत्री परिषद की सलाह के अनुसार कार्य करते हैं, उनकी स्थिति राज्य में वही होती है जो केंद्र में राष्ट्रपति की है। संविधान निर्माता डा. बी.आर. अम्बेडकर ने 31 मई, 1949 को कहा था कि राज्यपाल का पद सजावटी है तथा उनकी शक्तियां सीमित और नाममात्र हैं।
फायनैंस बिल के अलावा कोई अन्य बिल राज्यपाल के सामने उनकी स्वीकृति के लिए पेश करने पर वह या तो उसे अपनी स्वीकृति देते हैं या उसे पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकते हैं। ऐसे में सरकार द्वारा दोबारा बिल राज्यपाल के पास भेजने पर उन्हें उसे पारित करना होता है। कुछ समय से गैर भाजपा शासित राज्यों में वहां के सत्तारूढ़ दलों तथा राज्यपालों के बीच टकराव काफी बढ़ रहा है। जिन राज्यों में ज्यादा टकराव बढ़ा है उनमें प्रमुख है तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, दिल्ली और पश्चिम बंगाल ।
इन सभी राज्यों में गैर-भाजपा सरकार है और एक बात कॉमन है। वो बात है राज्य सरकार का राज्यपाल के साथ विवाद। बीते कुछ समय से पांचों राज्यों में राज्यपाल बनाव राज्य सरकार देखने को मिल रहा है। सभी राज्यों में सरकारों और राज्यपालों के बीच बयानबाजी चलती रहती है और एक दूसरे के कामकाज में रोड़े अटकाए जाने का आरोप लगाया जाता है। हाल ही में गैर-भाजपा शासित तीन दक्षिणी राज्यों में राज्यपालों और सत्तारूढ़ सरकार के बीच टकराव काफी बढ़ गया। तमिलनाडु ने आरएन रवि को वापस बुलाने की मांग की, केरल ने राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति पद पर राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान की जगह शिक्षाविदों को नियुक्त करने के लिए अध्यादेश मार्ग प्रस्तावित किया और तमिलिसाई सुंदरराजन ने संदेह जताया कि तेलंगाना में उनका फोन टैप किया जा रहा है।
केरल में सत्तारूढ़ एलडीएफ का पूर्व में राज्यपाल खान के साथ कई बार टकराव हो चुका है। एलडीएफ ने कहा कि उसने राज्य के विश्वविद्यालयों में राज्यपाल की जगह प्रतिष्ठित शिक्षाविदों को कुलाधिपति बनाने के लिए बुधवार को अध्यादेश लाने का फैसला किया। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों ने इस फैसले का विरोध किया है। मुख्यमंत्री कार्यालय के बयान के अनुसार मंत्रिमंडल की बैठक में फैसला किया गया कि खान से अध्यादेश को मंजूरी देने की सिफारिश की जाएगी जो विश्वविद्यालय कानूनों में कुलापधिपति की नियुक्ति से संबंधित धारा को हटा देगा। इस धारा में कहा गया है कि राज्यपाल राज्य के 14 विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी होंगे।तेलंगाना की राज्यपाल ने तेलंगाना राष्ट्र समिति शासित तेलंगाना में ‘अलोकतांत्रिक’ स्थिति का दावा किया। तमिलिसाई सुंदरराजन ने संदेह जताया कि तेलंगाना में उनका फोन टैप किया जा रहा है। उनके इस बयान पर इस पर अब विवाद गहराता जा रहा है।
तेलंगाना सीपीआई के वरिष्ठ नेता के नारायण ने तो यहां तक कह दिया कि हमारे देश के लिए गवर्नर सिस्टम उपयोगी ही नहीं और सभी पीएम मोदी से आह्वान किया कि सभी राज्यपालों को तुरंत हटा देना चाहिए।तमिलनाडु के संबंध में सत्तारूढ़ द्रमुक के नेतृत्व वाले धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन ने राज्यपाल रवि को बर्खास्त करने की मांग करते हुए राष्ट्रपति भवन का दरवाजा खटखटाया और आरोप लगाया गया कि उन्होंने ‘सांप्रदायिक घृणा को भड़काया है।‘गठबंधन के संसद सदस्यों ने राष्ट्रपति कार्यालय को प्रस्तुत अर्जी में राजभवन के पास लंबित विधेयकों को भी सूचीबद्ध किया गया है और स्वीकृति के लिए देरी पर सवाल उठाया गया। इन विधेयकों में राज्य को नीट मेडिकल परीक्षा के दायरे से छूट देने के प्रावधान वाला विधेयक भी शामिल है।
पश्चिम बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनखड़ और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच संबंध कुछ अच्छे नहीं थे। दोनों ही एक दूसरे की सार्वजनिक रूप से आलोचना कर चुके हैं। ये विवाद शुरू हुआ कोरोना के कारण लॉकडाउन के बाद, जब राज्यपाल ने नियमित रूप से राज्य प्रशासन और पुलिस को लॉकडाउन को प्रभावी ढंग से लागू करने में उनकी “विफलताओं” के लिए खींच लिया। 15 अप्रैल, 2020 को उन्होंने ट्वीट किया, “#कोरोनावायरस को दूर करने के लिए लॉकडाउन प्रोटोकॉल को पूरी तरह से लागू करना होगा। पुलिस और प्रशासन या धार्मिक सभाओं पर अंकुश लगाने में विफल है ममता ।”इसके बाद, सितंबर 2020 में विवाद ने एक नया मोड़ ले लिया, क्योंकि मुख्यमंत्री ने राज्यपाल को नौ पन्नों का एक पत्र लिखा, जिसमें तत्कालीन पुलिस महानिदेशक वीरेंद्र द्वारा बंगाल में कानून और व्यवस्था को संभालने पर सवाल उठाने के लिए उनकी आलोचना की गई थी। धनखड़ ने राज्य के पुलिस प्रमुख पर कानून-व्यवस्था की स्थिति के बारे में उनके सवालों का “दो-पंक्ति” जवाब भेजने के लिए फटकार लगाई और उन्हें तलब किया।
दिल्ली में भी गैर-भाजपा सरकार है। यहां उप-राज्यपाल तो बदल रहे हैं, लेकिन सरकार के साथ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। नजीब जंग के बाद अब केजरीवाल का विवाद वीके सक्सेना के साथ है। अरविंद केजरीवाल का आरोप है कि एलजी उनकी सरकार की महत्वपूर्ण योजनाओं की स्वीकृति में रोड़ा अटका रहे हैं तो वहीं एलजी का कहना है कि सरकार जनता के हित में काम नहीं कर रही है। एलजी इसको लेकर कई लेटर भी लिख चुके हैं। एलजी ये भी कह चुके हैं कि मुख्यमंत्री की तरह ही बाकी मंत्री भी उनकी बात नहीं सुनते हैं। अब हालात यह हैं कि एलजी ने दिल्ली सरकार की कई योजनाओं के लिए जांच समितियों का गठन कर दिया है।
गौरतलब है कि जो टकराव है राज्यपाल और मुख्य मंत्रियों के बीच में या राज्य सरकार के बीच में, वो किसी के लिए भी अच्छा नहीं है। न राज्यपाल के लिए अच्छा है, न राज्य सरकार के लिए अच्छा है, न केंद्र सरकार के लिए अच्छा है और न ही जनता के लिए अच्छा है। क्योंकि राज्यपाल का रोल बहुत पैसिव होता है, एक्टिव रोल नहीं होता है लेकिन तीन-चार चीजें हैं जहां राज्यपाल की भूमिका स्पष्ट है। देखा जाए तो राज्यपाल और राष्ट्रपति वो एक संविधान के रक्षक माने जाते हैं और एक नैतिक भूमिका होती है उनकी। दोनों को एक पॉलिटिकल हेड माना जाता है, चाहे देश के हों, चाहे स्टेट के हों। अगर कोई बिल जाता है सरकार की तरफ से तो राष्ट्रपति उस पर हामी न भरे, उस पर महीनों तक बैठ सकते हैं, अगर कुछ न करें। ऐसा होता भी है।
चुनाव के बाद जब सरकार इलेक्ट होती है तो किसको मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनाना है, वो भी राज्यपाल या राष्ट्रपति तय करेगा कि किसको बुलाया जाए और मैजोरिटी अप्रूव किया जाए।असेंबली को कन्वीन करना या पार्लियामेंट को कन्वीन करना, इसमें भी रोल होता है राष्ट्रपति और राज्यपाल का। इससे ज्यादा अगर राज्यपाल प्रो-एक्टिव हो जाता है या स्टेट गवर्नमेंट अनकॉन्स्टिट्यूशनल चीजें करने लगती है, तो ये सब बहुत ग्रे एरियाज हैं, जिनमें अब हम घुसते जा रहे हैं और एक राज्य में नहीं हो रहा है। पहले भी जब धनकड़ और ममता बनर्जी में घमासान महाभारत की तरह हुआ, अब जब धनकड़ उप राष्ट्रपति बन गए हैं, पश्चिम बंगाल में कुछ शांति है। लेकिन जैसा कि आपने कहा सदर्न स्टेट्स में चाहे तमिलनाडु है, केरल में तो ऑर्डिनेंस ही कर दिया है कि राज्यपाल चांसलर नहीं रहेगा यूनिवर्सिटीज का। यहां तक कि वो वाइस चांसलर यानी कुलपतियों को अपॉइंट नहीं कर सकते हैं। और आरिफ मोहम्मद खान जो राज्यपाल हैं केरल के, उन्होंने कहा है कि अगर ऑर्डिनेंस उनके पास आया तो वह उस पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे, सीधे प्रेसिडेंट को रेफर करेंगे। अब प्रेसिडेंट डिसाइड करता है, राज्यपाल को फॉर्मली अपॉइंट करता है प्रेसिडेंट और विदड्रॉ भी कर सकता है अपना प्लेजर कि इनको हटाया जाए। प्रेसिडेंट का मतलब केंद्र सरकार, मतलब कि प्रेसिडेंट केंद्र सरकार के कहने पर ही कह रहे हैं, जो भी कदम लेते हैं। तो अब क्या होगा, ये जो ऑर्डिनेंस है, आगे चीजें बढ़ ही नहीं पाएंगी जब तक कि प्रेसिडेंट अपना डिसिजन नहीं देते हैं। अगर आर।एफ। मोहम्मद खान रेफर कर देते हैं, तो कोई बिल पास ही नहीं हो पाएगी, ये जो ऑर्डिनेंस है। तमिलनाडु में तो आर.एन. रवि को विदड्रॉ करने की बात की है वहां की सरकार ने। तो यह बहुत ही अनहैपी, बहुत ही अजीबोगरीब स्थिति है। शायद देश के लिए अच्छा न ही, राज्य के लिए अच्छा और न ही संविधान के लिए अच्छा।
यह जरुर है कि भाजपा जहां पावर में है वहां ये टकराव नहीं दिख रहे हैं, राज्यपाल के साथ। जहां राज्यपाल भाजपा सरकार के नियुक्त किए गए हैं। वो हर बार ये होता है, जो सरकार पावर में होती है वही राज्यपाल को नियुक्त करती है। तो या तो राज्यपाल जैसे उस गद्दी पर बैठे, एकदम गैर राजनितिक हो जाए, जैसे कि लोक सभा का स्पीकर सरकार नियुक्त करती है, लेकिन हमलोग उसको मानते हैं , चाहते हैं कि वो बिलकुल अराजनितिक हो जाए। जैसे मुख्य चुनाव अधिकारी । कई पद ऐसे हैं जहां आपको एक राजनितिक पार्टी की सरकारनियुक्त करती है, लेकिन आपका रोल गैर राजनीतिक होना चाहिए। ऐसा हमारे संविधान में माना गया है। ऐसी हालत में माना गया है लेकिन ऐसा सही में नहीं हुआ है। आज की बात नहीं है, पहले भी हुआ है। मामले कोर्ट तक भी गए हैं। दरअसल केंद्र सरकार व राज्य सरकार को मिल कर ऐसे तकरार रोकना चाहिए और संविधान के दायरे में काम करना चाहिए नहीं तो यह कड़वाहट बढ़ती जाएगी व संवैधानिक व्यवस्था में रूकावट आ जाएगी जो राज्य व केंद्र सरकार के लिए ठीक नहीं है ।(युवराज)
अशोक भाटिया
अंबाला सेंट्रल जेल से आपराधिक नेटवर्क चला रहे हार्डकोर अपराधी
– सतीश हांडा की रिपोर्ट
अंबाला सेंट्रल जेल में तमाम कोशिशों और सख्ती के बावजूद, जिसमें करीब 1500 कैदी वर्तमान में सजा काट रहे हैं या विचाराधीन हैं, जिनमें हत्या के मामले शामिल हैं, गैंगस्टर समूहों के सदस्य कथित तौर पर जेल के अंदर से आपराधिक नेटवर्क चला रहे हैं और कई महत्वपूर्ण व्यक्ति और वरिष्ठ अधिकारी भ्रष्ट आचरण में लिप्त हैं क्योंकि ऐसे जेल कर्मचारी जेल से आपराधिक नेटवर्क चलाने वाले कैदियों के साथ अवैध रूप से मोबाइल फोन रखने पर नियंत्रण नहीं कर पाए हैं। अंबाला सेंट्रल जेल अधीक्षक संजीव पटर के आदेश पर जेल के सभी बैरकों में तलाशी अभियान चलाया गया जहां से मोबाइल फोन और अन्य संबंधित सामान बरामद किया गया.
अंबाला सेंट्रल जेल के अधिकारियों ने तलाशी जारी रखी और बैरक से एक ऐप्पल आईफोन सहित कुल आठ मोबाइल फोन बरामद किए जहां एक निलंबित एचएससी अधिकारी अनिल नागर, नारायणगढ़ चीनी मिल के एक वीआईपी सुब्रत खन्ना प्रबंध निदेशक, खूंखार गैंगस्टर गिरोह के सदस्य और अन्य शामिल थे। आठ हाई-प्रोफाइल पुरुष मोबाइल फोन ले जाते पाए गए हैं।
पत्रकारों से बात करते हुए पटर के एक सख्त और अनुशासित अधिकारी ने कहा कि ए-क्लास और बी-क्लास बैरक में रहने वाले हाई-प्रोफाइल पुरुषों को जेल के नियमों के खिलाफ वर्णानुक्रम के विपरीत अनाधिकृत सुविधाएं दी जा रही हैं। उन्होंने कहा कि 17 अक्टूबर को इन बैरकों को खाली कराकर नियमानुसार अन्य बैरकों में रखा गया और जांच के दौरान ऐसे अवैध मोबाइल फोन बरामद हुए और हैरानी की बात यह है कि जेल के अंदर एक आईफोन का इस्तेमाल किया जा रहा था. इससे पहले जेल के सुरक्षाकर्मियों ने जेल की चहारदीवारी के पास पड़े एक बॉक्स में बंद नौ मोबाइल फोन बरामद किए थे. इतना ही नहीं, यह जानकारी मिलने पर कि सुरक्षा कर्मियों द्वारा जेल में चेकिंग अभियान चलाया गया है, कैदियों ने खुद 22 मोबाइल फोन जला दिये या क्षतिग्रस्त कर दिये, जो बाद में जेल सुरक्षा कर्मचारियों को मिले. इंस्पेक्टर गौरव पुनिया, एसएचओ बलदेव नगर थाना अंबाला सिटी ने कहा कि शिकायत मिली है, प्राथमिकी दर्ज की गई है और जांच शुरू की गई है।
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पिछले परिदृश्य से पता चलता है, इस जेल के अंदर आपराधिक समूहों के बीच लगातार झड़पों, कैदियों से ड्रग्स की बरामदगी सहित कई बार इस जेल के अंदर देखी गई घटनाओं के कारण अंबाला सेंट्रल जेल हमेशा अखबारों में सुर्खियों में रहा है। कड़ी सुरक्षा के बीच इस संबंध में जेल कर्मचारियों के शामिल होने का संदेह है। दो दिन पूर्व सूचना पर जेल कर्मियों ने बंदियों से काला राणा, कला जठेड़ी व लारेंस बिश्नोई गिरोह के सदस्य तीन मोबाइल फोन बरामद किये तथा जेल अधीक्षक की शिकायत पर बलदेव नगर थाने में एक बंदी अर्जुन उर्फ कटोरा के खिलाफ मामला दर्ज किया गया. अंबाला सिटी जिसने जेल के अंदर मोबाइल फोन के प्रवेश की जांच शुरू की।
जानकारी से पता चलता है कि इस जेल में कई खूंखार अपराधी बंद हैं जो जेल के अंदर मोबाइल फोन का उपयोग करते हुए पाए जाते हैं, जिनमें गैंगस्टर काला राणा के भाई सूर्य प्रताप राणा, विक्की बागपत उर्फ विकास, शुभम उर्फ बिग्नी, योग राज, विजय, रवि के रूप में पहचाने जाने वाले कुछ नाम शामिल हैं। योगेश, सागर और अर्जुन उर्फ कटोरा के खिलाफ हत्या या हत्या के प्रयास के 20 से अधिक मामले दर्ज हैं।
सेंट्रल जेल में मोबाइल फोन की बरामदगी की लगातार शिकायतें मिलने के बाद अंबाला के पुलिस अधीक्षक जशनदीप सिंह रंधावा ने डीएसपी अंबाला छावनी राम कुमार के नेतृत्व में एक टीम गठित की थी, जिसमें सीआईए-1, सीआईए-2, साइबर सेल के पुलिस अधिकारी शामिल थे. करीब चार घंटे तक जेल में तलाशी अभियान चलाया और तलाशी अभियान के दौरान बंदियों और बंदियों के कब्जे से आठ मोबाइल और आठ सिम कार्ड बरामद किये. रंधावा ने कहा कि बलदेव नगर थाने में आरोपी बंदियों और बंदियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है और आगे की कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि जेल परिसर में मोबाइल फोन, नशीले पदार्थों के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए जेल प्रशासन के साथ समन्वय कर जेल में तलाशी अभियान जारी रखने के आदेश दिये गये हैं. जानकारी से पता चलता है, जेलों के अंदर मोबाइल फोन तक पहुंच एक खतरा बन गया है और अंबाला सेंट्रल जेल की स्थिति अपराधियों को बाहर से जेल की दीवार से सटे सड़क के माध्यम से पैकेट में संचार गैजेट फेंकने में सहूलियत देती है।
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अंबाला जेल को नए स्थान पर शिफ्ट करने के लिए अंबाला प्रशासन काम कर रहा है। अंबाला में पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं जब गैंगस्टर आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने के लिए जेल के अंदर से मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते थे। प्रसिद्ध पंजाबी गायक, सिद्धू मूसेवाला उर्फ शुभदीप सिंह की हत्या के मामले में, गैंगस्टरों के पास जेलों के अंदर मोबाइल फोन थे, इस प्रकार वे गंभीर अपराध करने की योजना बना रहे थे।(युवराज)
-सतीश हांडा
T20 World Cup Final – बिना हार के खेल संभव है?
टी ट्वंटी की विश्व विजेता बन गयी इंग्लैंड की टीम। भारतीय टीम की जिस पाकिस्तान से सेफा में हार हुई,उसी पाकिस्तान की टीम को भी फाइनल में हार का सामना करना पड़ा। खेल है तो हार भी है जीत भी है। ये अलग बात है कि हमारी आग्रही समझ हारने वाली टीम और उसके खिलाडियों को मुजरिम की तरह पेश करती है। उन्हे कटघरे में ला देती है।
वहीँ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाले हार की तार्किक समीक्षा की जगह खिलाडियों के खिलाफ जनता में गुस्सा भरते नज़र आते है. इस बार लगभग यही दिखा। सेफा मे हार के बाद यही मीडिया अपने दर्शकों से पूछता दिखा कि हार का मुजरिम कौन है? मीडिया वाले यही समझ विकसित कर रहे है कि हार स्वीकार नही है।
खेल में हार न हो , ऐसा संभव है क्या? जिन्हे ये खलनायक बना कर पेश कर रहे है, उनके हिस्से वैश्विक कीर्तिमान भरे पड़े है। खेलो के इतिहास में हार और जीत की अनेक उदाहरण दर्ज है। फिर हार को लेकर इतनी व्यग्रता क्यों? क्या खेल भावना यही है?
मुझे तो यही लगता है कि इन्हे न खेल भावना की समझ है, न पत्रकारिता की। सम्यक प्रतिक्रिया की जगह उग्रता जब स्थान ग्रहण कर ले तो वो मौलिकता के लिए खतरा पैदा कर देता है। मीडिया में अगुआई कर रहे व्यक्तियों को समझना होगा,खासकर चैनल वालो को कि उनकी विश्वसनीयता खतरे में है जो किसी के लिए अच्छा नही है।(युवराज)
सूरज रजक
संजय राउत के बोल बचन के मायने
– अश्विनी कुमार मिश्र
जेल से छूटने के बाद उद्धव सेना के नेता संजय राउत के बदले बोल को लेकर तरह तरह की राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म है. आखिर संजय राउत महाराष्ट्र की नयी सरकार की प्रशंसा क्यों कर रहे हैं.? उनके गोल वचन और और अंदाजे बयां से यह कहा जाने लगा है कि वह कोई नया पांसा फेंक रहे हैं. समझा जा रहा है कि उपमुख्यमंत्री के निर्णयों की सराहना कर वह भाजपा और शिंदे सेना के बीच भ्रम फैलाने का काम कर रहे हैं. वह कौटिल्य शास्त्र के सूत्र को पकड़कर पुराने रिश्तों को खंगालने और नए रिश्तों में दरार डालने की नीति पर चल रहे हैं. संजय राउत ने महाविकास आघाडी सरकार के दौरान फडणवीस सरकार पर जिस तरह के प्रहार किये थे शायद वह भूल गए. और अब जेल से छूटने के बाद उनका हृदय परिवर्तन सचमुच कोई संकेत है. उन्होंने जिस तरह से शिवसेना को भाजपा से दूर ले जाकर नई राजनीति गढ़ी उसका परिणाम सामने आ गया. सत्ता के लिए एक सिद्धांतहीन गठबंधन बनाकर शिवसेना की बुरी गत करा दी. एक राजनीतिक हाराकिरी हो जाने के बाद श्री राउत भाजपा वालों पर सुमन वृष्टि कर रहे हैं. यह आशंका और कुशंका दोनों पैदा करता है. यह तो सत्य है कि शिवसेना को जितना बर्बाद राजनीति ने नहीं किया उतना संजय राउत की जिद्द ने किया. आखिर जिन शिवसैनिकों ने शिवसेना को फर्श से उठाकर अर्श तक पहुँचाया वे ही अलग हो गए. अपनी गलतियों में झाँकने के बजाय उन्हें गद्दार कहा जो इस सिद्धांतविहीन राजनीति में अपना अस्तित्व संभाल रहे थे.जिस व्यक्ति ने कभी चुनाव नहीं लड़ा ,कभी मतदाताओं का सामना नहीं किया उसने एक ऐसा चक्र चलाया कि शिवसेना में ही बगावत हो गयी.
अब संजय राउत जब बाजी हार चुके हैं तो उन्हें भाजपा वालों की याद आ रही है. अब रिश्ते सुधारने के लिए देवेंद्र फडणवीस की एकतरफा स्तुति कर शिंदे सेना और भाजपा में नया भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं. देवेंद्र फडणवीस की सरकार में शिवसेना भी थी तब तो अंदाजा लग ही जाना चाहिए था कि फडणवीस की कार्यशैली कैसी है. फिर ढाई ढाई साल का शिगूफा छेड़ कर युति तोड़वाने का पाप संजय राउत ने किया. उसी का भान उन्हें जेल में 100 दिन रहकर हो गया होगा. और अब वे प्रायश्चित करने के लिए स्तुति सुमन की वर्षा कर रहे हैं. यह सही है महाविकास आघाड़ी सरकार में राज्य की कई क्रियाशील गतिविधियों को रोक दिया गया. मुख्य मंत्री वर्क फ्रॉम होम के मोड़ में थे।
राज्य का फेसबुकिया संचालन गजब का था. पुलिस अधिकारी ही जिलेटिन रखते पकड़े गए.ऐसे कई उदाहरण है जो अब पुराने पड़ गए हैं लेकिन शिंदे -फडणवीस की सरकार में काम ने गति पकड़ी है.एक सक्रिय सरकार अड़चनों को पार करते हुए काम कर रही है. कई प्रकल्प पर काम रफ़्तार से बढ़ रहा है. मेट्रो. कोस्टल रोड सहित मुंबई न्हावा सेवा लिंक पर काम का महत्वपूर्ण चरण पूरा हो चुका है. सरकार कई कल्याणकारी निर्णय ले चुकी है. म्हाडा को दिया गया अधिकार उनमें से एक है.जो कि सही निर्णय है.म्हाडा एक स्वतंत्र संस्था है. जो सरकारी अड़चनों में पड़कर काम नहीं कर पा रही थी, उसे उसके अधिकार दिए जा रहे हैं. इस निर्णय का संजय राउत ने सराहना की है. .
संजय राउत गलतफहमी और खुश फहमी दोनों में हैं. जेल से निकलकर वह सोच रहे हैं कि उन पर लगा आरोप समाप्त हो गया है. लेकिन ऐसा नहीं है.उनकी जमानत को निरस्त करने के लिए मामला हाईकोर्ट में चला गया है,जिस पर 25 को सुनवाई होनी है. हाईकोर्ट ने संजय राउत से इस बारे में शपथ पत्र देने को भी कहा है. विशेष अदालत ने जो टिप्पणी की है वह सरकार के एक महकमे पर आक्षेप है. इतनी बड़ी संस्था किसी बेक़सूर को पकड़ने का दुःसाहस कैसे कर सकती है.? विशेष अदालत का यह निर्णय एकतरफा लगता है. ईडी ने इस निर्णय के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है क्योंकि अदालत के कमेंट्स ने पूरी संस्था को कटघरे में खड़ा कर आरोपी को निर्दोष साबित करने का प्रयास किया है. अगर हाईकोर्ट का फैसला संजय राउत के विपरीत आया तो श्री राउत की कठिनाई बढ़ सकती यही. इसे समझते हुए वह अपने बयान में नरमी लाने का प्रयास कर रहे हैं.
दूसरा यह कि श्री राउत अपने को अब भी बड़ा किंगमेकर समझ रहे हैं. उनकी इस नासमझी ने ही उद्धव ठाकरे के कुनबे का बेडा गर्क किया है. इसका नतीजा यह है कि जिनके खिलाफ स्वर्गीय बाल ठाकरे ने आजीवन कमरकसी ,आज उन्हीं की पदयात्रा में शामिल होकर वैचारिक दिवालियेपन का प्रदर्शन उद्धव सेना कर रही हैं. संजय राउत को यह भी खुशफहमी है कि राजनीति के ढोल को हर तरफ से बजा सकते हैं. जो बदली हुई परिस्थिति में लाभदायक नहीं कही जा सकती. यह भी कि फडणवीस,मोदी और अमित शाह के प्रति मीठे बोल बोलकर अपना राजनीतिक खाता सीधा कर सकते हैं,जो अब संभव नहीं है. श्री राउत ने युति की जड़ पाताल तक खोद कर शिवसेना को शरद पवार का गुलाम बना लिया है. वह फडणवीस की नीतियों की प्रशंसा कर दूर की चाल चल रहे हैं. उन्हें यह गलतफहमी हो गयी है कि शिंदे खेमाँ और भाजपा के बीच अनबन चल रही है. हाल में ऐसे कई घटना क्रम हुए जिसमें दोनों गुटों के नेताओं में अनबन हुई. इसमें बच्चू कडू-राणा प्रकरण,अब्दुल सत्तार ,गुलाब राव पाटिल और संतोष बांगर जैसे नेताओं की मचमच को वह शिंदे गट की बेचैनी समझ रहे हैं।
और इसलिए इस पूरे गुट को नजरअंदाज कर संजय राउत ने फडणवीस की तारीफ़ के पुल बांधने शुरू कर दिए हैं. उधर संजय राउत के जेल से छूटने को लेकर किसी अदृश्य हाथ के मदद की चर्चा रंगने लगी है. क्योंकि राष्ट्रवादी गुट में फुस फुस होने लगी है कि अनिल देशमुख और नवाब मलिक तो जेल में रह गए संजय कैसे बाहर आ गए. क्या यह किसी शर्त पर मिली जमानत है या कुछ और, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। (युवराज)
(अश्विनी कुमार मिश्र ,लेखक–निर्भय पथिक के संपादक व राजनीतिक विश्लेषक हैं. )
राकांपा के राष्ट्रीय महासचिव नरेन्द्र वर्मा का जन्मदिन सेवा सप्ताह के रूप में संपन्न
मुंबई। हाल ही में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव नरेन्द्र वर्मा का जन्मदिन सेवा सप्ताह के रूप में मनाया गया। इस अवसर पर अंधेरी पश्चिम के जानकी देवी पब्लिक स्कूल में रात्रिभोज का भी आयोजन किया गया। इससे पहले नरेंद्र वर्मा ने अपने हाथों से वर्सोवा के हाऊस ऑफ चैरिटी में अन्न एवं खाद्य सामग्री प्रदान किया। साथ ही वृद्धाश्रम में निवास करने वालों को खाद्य सामग्री वितरण किया। देर शाम जानकी देवी पब्लिक स्कूल में पार्टी के कार्यकतार्ओं संग केक काटकर तथा रात्रि भोज आयोजित कर सादगीपूर्ण ढंग से उनका जन्मदिन मनाया गया।
रात्रि भोज में राष्ट्रवादी कांग्रेस मुंबई की कार्यकारी अध्यक्ष राखी जाधव, नरेन्द्र राणे, राकांपा की महाराष्ट्र महिला अध्यक्ष विद्या चौहान, राकांपा मुंबई की उपाध्यक्ष अल्पना ताई पेंटर, मुंबई राकांपा की महिला अध्यक्ष सुरेखा पेडनेकर, पार्टी के स्लम सेल अध्यक्ष श्रीधर पुजारी, राकांपा मुंबई सेवादल के अध्यक्ष दीपक पवार, नेशनल स्टूडेंट कांग्रेस मुंबई के अध्यक्ष एडवोकेट प्रशांत दिवाते के अलावा राकांपा के वरिष्ठ नेता प्रभाकर चालुके, मनोज व्यूअरे, नितिन विष्णू कदम, संजय करांदे, शरद सिंगरे, उत्तम राव मोरे, अरविन्द तिवारी, रुपेश खांडके, संतोष धुवाली, उमेश येवले तथा राकांपा नेत्री और अभिनेत्री कृषा खंडेलवाल आदि ने उपस्थित रहकर नरेन्द्र वर्मा को जन्मदिन की शुभकामनाएं दी।
















