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शक्ति की उपासना और कन्याओं पर बढ़ते जुल्म

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ललित गर्ग – विभूति फीचर्स
शताब्दियों से हम नवरात्र महोत्सव मनाते हुए कन्याओं को पूजते हैं। पूरे नौ दिन शक्ति की उपासना होती है। दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा-अर्चना करके लोग उनसे कृपा का अनुरोध करते हैं। लेकिन विडम्बना देखिये कि सदियों की पूजा के बाद भी हम कन्याओं को उनका उचित स्थान और सम्मान नहीं दे पाये हैं। हाल ही कि घटनाओं पर नजर डाले, किस तरह देश में कन्याओं एवं महिलाओं के साथ गलत हथकंडों में दुरुपयोग किया जाता है, शोषण किया जाता है, इज्जत लूटी जाती है और हत्या कर देना- मानो आम बात है। इन त्रासद, अमानवीय एवं विडम्बनापूर्ण नारी अत्याचार की बढ़ती घटनाओं के होते हुए मां दुर्गा को पूजने का क्या अर्थ है? सुनने में अजीब लगता है कि देश में अधिकांश लोग पढ़े-लिखे और संपन्न होने के बावजूद घर में कन्या के जन्म लेने पर शोक मनाते हैं। जन्म से पहले ही पता चल जाए कि बच्ची पैदा होगी तो ये उसकी जान लेने से भी नहीं कतराते। ऐसी  मानसिकता के लोग किस तरह मां दुर्गा की पूजा के पात्र हो सकते हैं? पिछली सदी में समाज के एक बड़े वर्ग में यह एक विभीषिका ही थी कि परिवार की धुरी होते हुए भी नारी को वह स्थान प्राप्त नहीं था जिसकी वह अधिकारिणी थी।
उसका मुख्य कारण था सदियों से चली आ रही कुरीतियाँ, अंधविश्वास व बालिका शिक्षा के प्रति संकीर्णता। कितनी विडम्बना है कि जिस देश में हम ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा बुलन्द करते हुए एक जोरदार मुहिम चला रहे हैं उस देश में हम एक प्रतिभा सम्पन्न बेटी की जिन्दगी को इसलिये नहीं बचा सके क्योंकि सरकार की नीति उसकी पढ़ाई में बाधक बन गयी। युवा सपनों का टूटना-बिखरना तो आम बात है लेकिन एक दलित बालिका के पढाई का सपना उसकी मौत का कारण बनना सरकार ही नहीं सम्पूर्ण राष्ट्रीयता पर एक बदनुमा दाग है। यह दाग ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के संकल्प पर भी लगा है और यह दाग हमारे द्वारा मां दुर्गा को पूजने की परम्परा पर भी लगा है। नारी अस्मिता एवं अस्तित्व को नोचने वाली घटनाएं हमें बार-बार शर्मसार करती है।
देवभूमि भी धुंधली हुई है क्योंकि पवित्र माटी की गुडिय़ा को जब दरिन्दों ने हवस का शिकार बनाया , यह वीभत्स घटना भी महाभारतकालीन उस घटना का नया संस्करण है जिसमें राजसभा में द्रौपदी को बाल पकड़कर  खींचते हुए अंधे सम्राट धृतराष्ट्र के समक्ष, उसकी विद्वत मंडली के सामने निर्वस्त्र करने का प्रयास हुआ था। इस वीभत्स घटना में मनुष्यता का ऐसा भद्दा एवं घिनौना स्वरूप सामने आया है जिसने पूरे राष्ट्र को एक बार फिर झकझोर दिया है। एक बार फिर अनेक सवाल खड़े हुए है कि आखिर कितनी बालिकाएं, कब तक ऐसे जुल्मों का शिकार होती रहेंगी। कब तक अपनी मजबूरी का फायदा उठाने देती रहेंगी। दिन-प्रतिदिन देश के चेहरे पर लगती इस कालिख को कौन पोछेगा? कौन रोकेगा ऐसे लोगों को जो इस तरह के जघन्य अपराध करते हैं, नारी को अपमानित करते हैं। इन सवालों के उत्तर हमने निर्भया के समय भी तलाशने की कोशिश की थी। लेकिन इस तलाश के बावजूद इन घटनाओं का बार-बार होना दु:खद है और एक गंभीर चुनौती भी है। यह समाज की विकृत मानसिकता को भी दर्शाता है।
सोचनीय प्रश्न है कि मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हुए भी हर घर में क्या कन्याओं एवं महिलाओं को जीने का सम्मानपूर्वक स्थान प्राप्त है? जिस तरह कन्या भू्रण हत्या की घटनाएं बढ़ी है, उससे तो ऐसा प्रतीत नहीं होता। जहां पांव में पायल, हाथ में कंगन, हो माथे पे बिंदिया… इट हैपन्स ओनली इन इंडिया- जब भी कानों में इस गीत के बोल पड़ते है, गर्व से सीना चौड़ा होता है। जब नवरात्र के दिनों में कन्याओं को पूजित होने के स्वर सुनते हैं तब भी सुकून मिलता है लेकिन जब उन्हीं कानों में यह पड़ता है कि इन पायल, कंगन और बिंदिया पहनने वाली कन्याओं के साथ इंडिया क्या करता है, तब सिर शर्म से झुकता है। निर्भया कांड, नितीश कटारा हत्याकांड, प्रियदर्शनी मट्टू बलात्कार व हत्याकांड, जेसिका लाल हत्याकांड, रुचिका मेहरोत्रा आत्महत्या कांड, आरुषि मर्डर मिस्ट्री की घटनाओं में पिछले कुछ सालों में इंडिया ने कुछ और ऐसे मौके दिए जब अहसास हुआ कि किसी तरह नारी अस्तित्व बच भी जाए तो दुनिया के पास उसके साथ और भी बहुत कुछ है बुरा करने के लिए। बहशी एवं दरिन्दे लोग ही नारी को नहीं नोचते, समाज के तथाकथित ठेकेदार कहे जाने वाले लोग और पंचायतें भी नारी की स्वतंत्रता एवं अस्मिता को कुचलने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे है स्वतंत्र भारत में यह कैसा समाज बन रहा है, जिसमें महिलाओं की आजादी छीनने की कोशिशें और उससे जुड़ी हिंसक एवं त्रासदीपूर्ण घटनाओं ने बार-बार हम सबको शर्मसार किया है।
नारी के साथ नाइंसाफी चाहे कोटखाई में हो या गुवाहाटी में हुई हो या बागपत में या तमिलनाडू में- नवरात्र का अवसर इन स्थितियों पर आत्म-मंथन करने का है, उस अहं के शोधन करने का है जिसमें श्रेष्ठताओं को गुमनामी में धकेलकर अपना अस्तित्व स्थापित करना चाहता है। देश में हुई जनगणना के आंकड़े चौंकाते ही नहीं बल्कि दुखी भी करते हैं। जिस तरह से लड़के-लड़कियों का अनुपात असंतुलित हो रहा है, उससे ऐसी चिन्ता भी जतायी जाने लगी है कि यही स्थिति बनी रही तो लड़कियां कहां से लाएंगे? केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों ने स्थिति की गंभीरता को देखते कड़े कदम उठाये, लेकिन समस्या कम होने की बजाय आज भी खड़ी है। देश में शिक्षा के क्षेत्र में कुछ पॉजिटिव बदलाव आए हैं। पुरुषों में साक्षरता पिछले दस सालों में 31 फीसदी बढ़ी है तो महिलाओं में 49 फीसदी। लेकिन लड़कियों के लिए समाज के साक्षर होने का कोई सकारात्मक अर्थ नहीं है क्योंकि अधिकतर साक्षर राज्यों और जिलों में बच्चियों का जीवन ज्यादा खतरे में है। आदिवासी इलाकों और पिछड़ा कहे जाने वाले क्षेत्रों में बालिका अनुपात अच्छा ही नहीं, काबिले तारीफ है।
जिस देश में हर साल पांच लाख से अधिक कन्या भू्रण मार दिए जाते हों वहां लड़कियों की सामाजिक हैसियत  सुधरने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? सरकार की तमाम कोशिशों एवं सख्त कानूनों के बावजूद भू्रण परीक्षण का प्रचलन बढ़ रहा है। क्या कारण है भ्रूण परीक्षण के बढ़ते प्रचलन का? क्या ऐसा इसलिए किया गया कि भू्रण को कोई असामान्य परेशानी थी, मां का शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं था या गर्भ निरोधक नाकाम रहा था। नहीं। एक्सपर्ट कहते हैं 80 फीसदी मेडिकल अबॉर्शन कन्याभ्रूण के ही होते हैं। किस मेडिकल ग्राउंड पर इसकी इजाजत दी जाती है, कोई नहीं जानता। इस मामले में डॉक्टर एवं भ्रूण परीक्षण कराने वाला परिवार दोनों ही दोषी होते हैं। जिन परिवारों में देवी की पूजा अर्चना की जाती है, उन परिवारों में जन्म से पहले ही कन्याओं को मार देने की स्थितियां हमारी धार्मिक आस्था पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े करती है।
गुजरात, महाराष्ट्र और बंगाल में लोग छोटा परिवार चाहते हैं और बेटी को बुरी नहीं मानते। लेकिन कम से कम एक  बेटा होना उन्हें भी जरूरी लगता है। पंजाब, हरियाणा और उत्तरप्रदेश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो किसी की पहली संतान बेटी होने पर अगली बार बेटा होने का आशीर्वाद देते हैं और अगली बार भी बेटी हुई तो दिलासा देने आते हैं। अस्पताल में बेटी होने पर बधाई नहीं मांगी जाती, लेकिन बेटा होने की खबर आते ही पूरे परिवार एवं समाज में जश्न की तैयारियां होने लगती हैं। अगर कोई बेटी के जन्म पर खुश होना चाहे तो समाज उसे ऐसा नहीं करने देता। क्या जन्म के बाद बेटे और बेटी के बीच भेदभाव कम करने की किसी कोशिश को सराहा जाता है? ऐसा होने लगे तभी देवी- पूजा की सार्थकता है और तभी हमारा नवरात्र महोत्सव मनाना उपयोगी है। (विभूति फीचर्स)

 

मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम – विदेशों में भी प्रेरणास्त्रोत रही है रामकथा

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दिनेश चंद्र वर्मा – 
मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम का चरित्र सदैव से ही प्रेरणा का स्त्रोत रहा है। एशियाई देशों में रामकथा इतनी लोकप्रिय रही है कि हर एशियाई भाषा में भगवान राम का जीवन चरित्र लिखा गया है। भारत की तो हर भाषा में रामायण मिलती है किन्तु एशियाई देशों में भी रामकथा इतनी व्यापक एवं प्रचलित थी कि कम्बोडिया, थाईलैण्ड और जाबा में रामकथा से चित्रित मंदिर आज भी देखने को मिलते हैं। कम्बोडिया की राजधानी पअंग कोर वाटफ में विश्व के सबसे विशाल मंदिर में रामकथा उत्कीर्ण है। इस मंदिर में लगी विशालकाय चट्ïटानें इतनी बड़ी हैं कि उन्हें हाथियों से खींचना तक कठिन था, किन्तु ये चट्टानें उस समय आदमी खींच कर लाये थे।
” थाईलैण्ड में राम की कथा रामकियेन के नाम से प्रचलित है। यह कथा लगभग उसी स्वरूप में है, जिस स्वरूप में संस्कृत में महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है। हां एक अंतर अवश्य है इस कथा में रावण के वध के बाद लंका की स्थिति का भी विवरण मिलता है। इस विवरण के अनुसार चक्रवाल के राजा महापाल ने एक बार लंका पर आक्रमण कर दिया था तब लंका के शासकों की मदद हेतु भगवान राम ने हनुमान को लंका भेजा था। रामकियेन की मूल कथा जहां वाल्मीकि रामायण के समान है, वहीं उसमें कुछ नये पात्रों का भी समावेश है। कुछ पात्रों के नाम बदले हुए हैं। ” 

कम्बोडिया के अतिरिक्त इंडोनेशिया, थाईलैण्ड, जाबा, सुमात्रा और बाली में रामकथा का आज भी प्रचलन है। कुछ इतिहासकारों की मान्यता है कि इन देशों में बौद्ध धर्म के पहुंचने के कई वर्षों पूर्व से रामकथाएं प्रचलित थीं। स्थानीय भाषाओं में इनका व्यापक प्रचार-प्रसार था। इन देशों में मिले कुछ पुरातत्व अवशेष इस धारणा की पुष्टिï करते हैं। मलेशिया को पूर्ण इस्लामी देश माना जाता है किन्तु वहां 'हकायत सिरीराम’ के नाम से आज भी रामकथा प्रचलित है। इस कथा पर आधारित नाटक भी वहां खेले जाते हैं। 'हकायत सिरीराम’ मे राम का आदर्श चरित्र तो ज्यों का त्यों है पर कथा एवं पात्रों में वाल्मीकि रामायण से काफी अंतर है। जैसे इस कथा में कैकई का नाम बलिया दरी बताया गया है तथा उसे रानी के स्थान पर दासी बताया गया है। राम को इस कथा में ;सिरीराम’ कहा गया है। लक्ष्मण के नाम में कोई परिवर्तन नहीं है, किन्तु भरत को 'वरदान’ कहा गया है। सीता को रावण की पुत्री बताया गया है तथा कहा गया है कि सीता के पैदा होते ही ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि यह कन्या अपने पिता की मृत्यु का कारण बनेगी। रावण ने इस कन्या को नदी में बहा दिया। यह कन्या एक ऋषि को मिली तो उन्होंने उसका पालन -पोषण किया। इस कन्या के विवाह के लिए ऋषि ने यह शर्त रखी थी कि जो व्यक्ति एक तीर से चालीस वृक्षों को छेद देगा उसके साथ ही इस कन्या का विवाह किया जाएगा। राम ने इस शर्त को पूरा किया और उनका सीता के साथ विवाह कर दिया गया। इस कथा में रावण की बहिन शूर्पनखा का नाम 'सुरापंडिका’ कहा गया है। कथा में हनुमान जी का भी उल्लेख है पर उन्हें वानर नहीं माना गया है। हकायत सिरीराम के अनुसार हनुमान जी अंजनी नामक तपस्विनी के पुत्र थे, उनकी  मुखाकृति वानर से मिलती थी। इस कथा में सीता की अग्नि परीक्षा तथा बाद में उन्हें राम द्वारा त्याग देने का उल्लेख भी है। महर्षि वाल्मीकि को इस कथा में;ऋषि काली’ कहा गया है। इस कथा में यह भी कहा गया है कि बाद में राम और सीता का मिलन हो गया था तथा वे वन चले गये थे।

रामायण का चीनी भाषा में भी अनुवाद हुआ तथा कालांतर में वह बौद्ध साहित्य में शामिल हो गया। बौद्ध साहित्य में रामकथा 'दशरथ जातक’ के रूप में प्रचलित है। जापान में रामकथा को आज भी नृत्य नाटिका के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। टोकियो के काबुकी थियेटर में रामायण पर आधारित नाटक और नृत्यों का मंचन किया जाता है, जो आज भी वहां बहुत लोकप्रिय है। एशियाई देशों में रामकथा के व्यापक प्रचार-प्रसार के साक्षी मध्य जावा के प्राचीन शिव मंदिर भी हैं। प्रेम बनन तथा पर तरन में स्थित इन दोनों शिव मंदिरों में रामकथा उत्कीर्ण है।  ईरान में नौवीं शताब्दी में रामायण का रूपांतर ईरानी भाषा में हो चुका था। जाबा में दसवीं शताब्दी में रामकथा पर आधारित 'रामायने ककबीन’ नामक ग्रन्थ की रचना हो चुकी थी। वहां 'सेरतराम’ नामक एक अन्य ग्रन्थ भी मध्यकाल में लिखा गया, जो रामकथा पर ही आधारित है। बाली दीप में आज भी ;चरित्र रामायण’ के नाम से रामकथा प्रचलित है।

कम्बोडिया में;रामकेति’ नामक एक अति प्राचीन ग्रन्थ उपलब्ध हुआ है। इस ग्रंथ के 80 सर्ग ही मिल पाए हैं तथा इसमें राजा दशरथ के पुत्रयेष्ठिï यज्ञ से मेघनाद वध तक की कथा समाहित है।  थाईलैण्ड की राजधानी बैंकाक के बौद्ध मंदिरों में रामकथा उत्कीर्ण है। थाईलैण्ड के शासक आज भी अपने नाम के साथ राम लगाते हैं। थाईलैण्ड में रामकथा पर आधारित कोई एक दर्जन ग्रंथ उपलब्ध हैं।

वर्मा (म्यानमार) में राम के चरित्र पर रामयागन नामक ग्रंथ की रचना हुई। तिब्बती भाषा में भी भगवान राम के जीवन पर आधारित ग्रंथ मिले हैं। तुनछांग की गुफाओं में दो ऐसी पांडुलिपियां मिली हैं, जिनमें राम की कथा थी तथा जिनकी रचना छठवीं एवं सातवीं शताब्दी में हुई थी। साईबेरिया तथा रूस के हाल्मिंग गणराज्य में भी रामकथा प्रचलित होने के प्रमाण मिलते हैं। श्रीलंका में भी सिंहली भाषा में राम की महिमा में कोई आधा दर्जन से अधिक ग्रंथ लिखे जाने के प्रमाण मिले हैं, जिनमें सुवेणी, सीतात्याग तथा जानकी हरण के नाम उल्लेखनीय हैं। भारत में आक्रांताओं के आगमन के पूर्व से ही रामकथा मध्यपूर्व में प्रचलित थी पर मुगल शासकों के काल में अरबी एवं फारसी में भी रामकथा का अनुवाद हुआ। बाद में यूरोपीय देशों में भी रामकथा पहुंची तथा अंग्रेज साहित्यकारों की मान्यता है कि, होमर मिल्टन तथा शेक्सपियर की कुछ रचनाओं पर रामकथा का प्रभाव पाया जाता है। पादरी फ्रेंक हेवलिंग नामक अंग्रेज लेखक ने अपनी पुस्तक 'दी राईज ऑफ रिलीजियस सिग्नीफेन्स ऑफ दी राम’ में इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कहा है कि यूरोप में राम का महत्व बढ़ता जा रहा है।

विभिन्न यूरोपीय भाषाओं में रामकथा का अनुवाद हुआ। पार्जिटन ने वाल्मीकि रामायण का अनुवाद किया। रूसी विद्वान वारान्निकोव ने तुलसी कृत रामचरित मानस को अनुदित किया। यूरोपीय विद्वान फादर कामिल बुल्के तो रामकथा से इतने अभिभूत हुए कि वे बीसवीं सदी के रामायण के सबसे बड़े विद्वान के रूप में जाने जाते हैं। अनेक यूरोपीय विद्वानों ने रामकथा की विवेचना और मीमांसा अपने-अपने दृष्टिïकोण से की है, जैसे ए.के. वेवर का कथन है कि राम ने श्रीलंका में अपने धर्म के प्रचार हेतु युद्ध लड़ा था। मोनियर विलियम्स के मतानुसार राम ने आर्य संस्कृति के प्रचार के लिए श्रीलंका पर आक्रमण किया था।

अब विद्वान रामकथा की किसी भी तरह विवेचना करते रहें पर दो तथ्य अब स्थापित हो चुके हैं। एक तो दुनिया के हर देश में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का चरित्र प्रेरणादायी माना जाता है तथा दूसरा तथ्य यह है कि सदियों पूर्व रामकथा सुदूर देशों में प्रचलित हो गई थी। (विभूति फीचर्स)

Navratri 2023 – भगवती दुर्गा की दुर्लभ प्रतिमाएं

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– दिनेश चंद्र वर्मा
भारत में शक्ति अथवा दुर्गा की पूजा, आराधना एवं उपासना की अत्यधिक प्राचीन परंपरा रही है। शक्ति अथवा दुर्गा  के उपासक शाक्य कहलाते हैं और जिस प्रकार वैष्णव विष्णु के अनेक रूपों की उपासना करते हैं या शैव, शिव, रूद्र या महेश के विविध स्वरूपों की आराधना करते हैं, उसी प्रकार शाक्य संप्रदाय के लोग शक्ति एवं दुर्गा के अनेक रूपों की उपासना करते रहे हैं। दुर्गा के सैकड़ों नाम एवं स्वरूप दुर्लभ हैं। उनमें प्रकृति के प्रजनन, पालन और संहार तीनों गुण देखे जाते हैं। इस प्रकार दुर्गा की उपासना भी विविध स्वरूपों में की गई है।
मध्यप्रदेश के पुरातत्व विभाग के पास दुर्गा की कुछ ऐसी ही दुर्लभ प्रतिमाएं हैं। इनमें से एक प्रतिमा तो शायद संसार में और कहीं देखने को नहीं मिलती है। यह प्रतिमा है अलक्ष्मी की। दुर्गा के जिन स्वरूपों की वंदना होती है, उनमें उनके महालक्ष्मी एवं सरस्वती के स्वरूप भी शामिल हैं, पर क्या दुर्गा के रूप में अलक्ष्मी की भी उपासना होती थी? अलक्ष्मी की यह प्रतिमा मध्यप्रदेश के रीवा जिले के गुर्गी नामक स्थान से प्राप्त हुई है।
रीवा, उस छतरपुर जिले का समीपवर्ती जिला है, जहां खजुराहों के विश्वविख्यात मंदिर हैं। अलक्ष्मी की यह प्रतिमा दसवीं शताब्दी की है। उस समय न केवल खजुराहों में बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी अनेक प्रतिमाओं एवं मंदिरों का निर्माण हुआ था। अलक्ष्मी की यह प्रतिमा कृशकाय स्वरूप में है। प्रतिमा को इतनी सफाई से उत्कीर्ण किया गया है कि न केवल पसलियां, बल्कि अन्य हड्डियां तक स्पष्ट दिखाई देती हैं।
पूरी प्रतिमा में 6 नरमुंड तथा दो नरकंकाल हैं। इन नरकंकालों को रक्तपान करते हुए दिखाया गया है। एक नरकंकाल खड़ा हुआ है, जबकि दूसरा आड़ा पड़ा हुआ है।
अलक्ष्मी की पूजा उपासना का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है, पर मान्यता यह है कि जब अकाल पड़ता था, तब इस देवी की आराधना एवं उपासना की जाती थी। इस प्रतिमा में प्रदर्शित कंकाल संभवत: इसी अकाल के प्रतीक है। संभवत: भारत में अलक्ष्मी की यह एकमात्र प्रतिमा है।
अपराजिता दुर्गा का ही एक नाम है, पर अपराजिता बौद्धों के वज्रयान मत की भी एक प्रसिद्ध देवी है। सातवीं शताब्दी में बौद्ध मत में वज्रयान (तंत्रयान) का प्रादुर्भाव हुआ और बौद्ध धर्मावलंबी गौतमबुद्ध के नाम को भूलकर कई अन्य देवी-देवताओं के माध्यम से तंत्र की साधना में जुट गए। इस प्रकार की उपासना का उल्लेख चीनी यात्री  व्हेनसांग ने भी किया है। अपराजिता की कुछ अन्य प्रतिमाएं नालंदा एवं पटना संग्रहालयों में है, पर भोपाल संग्रहालय की यह प्रतिमा उन प्रतिमाओं से कुछ भिन्न है।
कुछ पुरातत्व शास्त्री इस प्रतिमा को बौद्ध प्रतिमा नहीं मानते हैं। इसके दो कारण हैं एक तो यह प्रतिमा दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी की हैं, जब हिंदुओं और बौद्धों की कटुता समाप्त हो गई थी तथा हिंदुओं ने भगवान बुद्ध को भगवान विष्णु का नवम अवतार स्वीकार कर लिया था। दूसरा कारण इस प्रतिमा के प्राप्त होने वाले स्थान से संबंधित है। यह प्रतिमा मंदसौर जिले के हिंगलाजगढ़ नामक स्थान से प्राप्त हुई है।
हिंगलाजगढ़ एक समय में दुर्गा की उपासना का केंद्र था तथा वहां मालवा के परमार शासकों ने अनेक मंदिरों तथा प्रतिमाओं का निर्माण किया था। यह प्रतिमा संभवत: गणेश एवं दुर्गा से संबंधित किसी पौराणिक कथा का प्रतीक है। वैसे दुर्गा द्वारा भगवान शंकर की पीठ पर पैर रखकर दानवों के संहार की प्रतिमाएं मिलती हैं, वैसी ही यह प्रतिमा हो सकती है, जिसमें वह भगवान गणेश पर पैर रखे हुए हैं। पुरातत्व शास्त्रियों का कहना है कि हिंगलाजगढ़ का कभी बौद्ध धर्म से संबंध नहीं रहा और न वहां (अपराजिता को छोड़कर) अन्य कोई बौद्ध प्रतिमा ही मिलती है।
अपराजिता की यह भग्न प्रतिमा, मध्यकालीन शिल्पकला का अनुपम उदाहरण है। इस प्रतिमा को त्रिभंग मुद्रा में दर्शाया गया है। देवी जटा मुकुट को धारण किए हैं, जिस पर नरमुंडों का सुरुचिपूर्ण अंकन है। मुख के पीछे पूर्ण प्रफुल्लित कमल का प्रभामंडल है, प्रतिमा
कानों में चक्रकुंडल धारण किए हुए हैं। मस्तक पर भगवान शिव के तीनों नेत्रों की भांति उभरी हुई आंखें देवी के रौद्र रूप का भान कराती है।
इस प्रतिमा में दस भुजाएं थीं, पर दायीं ओर तीन हाथों को छोड़कर शेष सभी भुजाएं खंडित हैं। सबसे ऊपर के हाथ में ढाल है तथा नीचे के हाथ में खप्पर है, तीसरे हाथ का आयुध स्पष्ट नहीं दिखता है। देवी गले में अलंकृत कंठहार पहने हुई हैं। वक्षस्थल पर कुचबंद एवं मोतियों की माला है।
हाथों में कंकण एवं  जबंद है। प्रतिमा साड़ी के साथ कमर में करधनी धारण किए हुए हैं। इस प्रतिमा को हिंदू प्रतिमा मानने वाले पुरातत्व शास्त्री, इस प्रतिमा के मस्तक पर त्रिनेत्र एवं जटामुकुट एवं नरमुंडों के अंकन को आधार मानकर इसे यंगिनी नामक योगिनी की प्रतिमा भी मानते हैं।
जबलपुर के प्रसिद्ध चौंसठ योगिनी मंदिर में यंगिनी की प्रतिमा है, जिसमें यह योगिनी गणेश को अपनी गोद में लिए हुए दिखाई गई है। इस बात में विवाद हो सकता है कि यह प्रतिमा बौद्ध है या हिंदू, पर इस बात पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती कि ये दोनों प्रतिमाएं शिल्प शा एवं पुरातत्व महत्व की दृष्टि से बेजोड़ है। भारत में इस प्रकार की अन्य देवी प्रतिमाएं शायद ही कहीं हों। (विभूति फीचर्स)

ब्रांड फिल्म्स क्रिएट करने में माहिर है “मुम्बई फिल्म्स”

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आज का दौर मार्केटिंग और प्रोमोशन का ज़माना है, हर ब्रांड को हर क्षेत्र में प्रोमोट करने की जरूरत पड़ती है। लोग अब फ़ोटो देखने के बजाय वीडियो देखना ज्यादा पसन्द करते हैं इसलिए एडवर्टाइजमेन्ट के वीडियो की मांग इन दिनों खूब बढ़ गई है। इसी ट्रेंड को देखते हुए युवा प्रोड्यूसर, सिनेमेटोग्राफर बाज़िल खांचे ने दो साल पहले अपनी कम्पनी शुरू की जिसका नाम है मुम्बई फ़िल्मस और देखते ही देखते यह विज्ञापन जगत में काफी लोकप्रिय हो गई है।
    बता दें कि बाज़िल ऐड वर्ल्ड से पहले से जुड़े रहे हैं। उन्होंने सिनेमेटोग्राफर के रूप में बहुत सारे ऐड वीडियो शूट किए हैं। उसके बाद पिछले दो साल से वह मुम्बई फिल्म्स कंपनी चला रहे हैं।
    मुम्बई फिल्म्स के फाउंडर बाज़िल ने कहा कि मुम्बई फिल्म्स एक ऐड वीडियो प्रोडक्शन हाउस है, इस कंपनी के अंतर्गत हम डिजिटल मार्केटिंग भी करते हैं। कारपोरेट, रियल एस्टेट, फैशन इत्यादि के ऐड वीडियो हम तैयार करते हैं। शॉर्ट और लौंग दोनों फॉर्मेट में हम वीडियो विज्ञापन बनाते हैं। हम प्रि प्रोडक्शन से लेकर पोस्ट प्रोडक्शन तक का पूरा काम देखते हैं। उसके बाद उस प्रोडक्ट की डिजिटल मार्केटिंग भी करते हैं।”
     मुंबई फिल्म्स ऐसी ब्रांड फिल्में बनाने में माहिर है जो गहरा प्रभाव छोड़ती है और वीडियो प्रोडक्ट को सबसे आकर्षक रूप में पेश करते हैं। एनीमेशन और 3डी एनीमेशन में उनकी महारत है जिसकी वजह से मार्केटिंग कम्पैन में जान आ जाती है।
    मुंबई फिल्म्स ऐसा प्रोडक्शन हाउस है जो क्रिएटिव वीडियो बनाने के लिए प्रसिद्ध है। उनकी माहिर टीम आकर्षक कॉर्पोरेट विज्ञापन, फैशन विज्ञापन और प्रोडक्ट ऐड तैयार करती है। उनकी विशेषता रियल एस्टेट विज्ञापनों तक फैली हुई है, जो खूबसूरत दृश्य क्रिएट कर प्रोपर्टी मार्केटिंग को
अलग ही स्तर तक ले जाते हैं।
     बाज़िल कहते हैं “हमारे कॉर्पोरेट विज्ञापन ब्रांड को ऊपर उठाने और व्यावसायिक सफलता दिलाने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं। क्रिएटिविटी के साथ कुशल सिनेमेटोग्राफर्स और लेखकों की हमारी टीम आकर्षक विज्ञापन तैयार करती है जो ब्रांड की टारगेट ऑडिएंस तक पहुंचती है, उनसे कनेक्ट करती है और उस विशेष ब्रांड की पहचान को मजबूत बनाती है।
     फैशन विज्ञापन के क्षेत्र में मुम्बई फिल्म्स आकर्षक और ट्रेंडसेटिंग विज्ञापन तैयार करने में माहिर है जो फैशन ब्रांड की विशिष्ट पहचान और पेशकश को प्रदर्शित करते हैं। इनके द्वारा बनाए गए विज्ञापन फैशन जगत में उस विशेष ब्रांड की उपस्थिति को बढ़ाने के लिए तैयार किए जाते हैं।
    बाज़िल आगे कहते हैं कि आज के मुकाबले वाले बाजार में, एक ब्रांड को लोगों से जोड़ने के लिए एक सम्मोहक फ़िल्म की जरूरत होती है जो लोगों के दिल और दिमाग पर दस्तक दे सके। मुंबई फिल्म्स में, हम आकर्षक ब्रांड फिल्में तैयार करने में माहिर हैं जो ब्रांड की अनूठी कहानी बताती हैं।

साल के सबसे बड़े क्रिकेट इवेंट के लिए फिर वापस आ गया है स्विगी का मैच डे मेनिया

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अनिल बेदाग
मुंबई : भारत के अग्रणी ऑन-डिमांड कन्वीनियंस डिलीवरी प्लेटफॉर्म स्विगी ने आज 2023 के सबसे बड़े क्रिकेट इवेंट के लिए एक बार फिर अपने ‘मैच डे मेनिया’ का एलान किया है।
मैच डे मेनिया के साथ इस क्रिकेट इवेंट को और खास बनाने के लिए यूजर्स को फूड डिलीवरी, इंस्टामार्ट, डाइनआउट पर शानदार डिस्काउंट एवं बेनिफिट और अन्य ऑफर मिलेंगे।
11 अक्टूबर से 19 नवंबर, 2023 तक क्रिकेट के दीवानों को स्विगी के फूड डिलीवरी, इंस्टामार्ट और डाइनआउट पर मैच ऑवर के दौरान ऑर्डर पर फ्लैट 150 रुपये ऑफ जैसे कई ऑफर्स का आनंद मिलेगा।
फ्री हिट के साथ मैच डे मेनिया चैंपियनशिप
इस क्रिकेट सीजन में इंडिया के रनों पर खुश होने के साथ-साथ स्विगी पर आप भी रन बना सकते हैं। चैंपियनशिप के दौरान यूजर्स स्विगी पर रन बना सकते हैं और कुछ माइलस्टोन पार कर बड़े प्राइज जीत सकते हैं।
यूजर्स स्विगी पर फूड ऑर्डर या इंस्टामार्ट पर ग्रॉसरी ऑर्डर करके 2 रन प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा डाइनआउट के दौरान डाइनआउट पे से बिल पेमेंट करते हुए 4 रन प्राप्त कर सकते हैं। स्विगी एचडीएफसी क्रेडिट के लिए एप्लाई करके शानदार 6 रन प्राप्त कर सकते हैं।
      डेली स्विगी मनी बोनांजा में यूजर्स के पास रोजाना कम से कम 6 रन बनाकर 10,000 रुपये जीतने का मौका होगा। डेली लक्जरियस गेटअवे में न्यूनतम 12 रन बनाकर यूजर्स के पास 30,000 रुपये का ताज कपल स्टे वाउचर जीतने का मौका होगा।
      आभूषण से भरपूर डेली डिलाइट्स के तहत न्यूनतम 18 रन बनाकर स्विगी यूजर्स 50,000 रुपये का तनिष्क का वाउचर भी जीत सकते हैं।  न्यूनतम 24 रन बनाकर रोज एक स्विगी यूजर के पास आईफोन 15 जीतने का मौका रहेगा।  न्यूनतम 30 रन बनाकर रोजाना किसी एक स्विगी यूजर को कपल वाउचर के साथ मालदीव के ट्रिप पर जाने का मौका मिलेगा। न्यूनतम 36 रन बनाकर स्विगी यूजर्स नई एसकोडा कार के रूप में अल्टीमेट प्राइज जीतने का मौका भी प्राप्त कर सकते हैं।

आधुनिक तकनीकी का उपयोग व लाभ सामान्य जनता तक पहुंचे- मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी

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देहरादून 14 अक्टूबर2023, शनिवार , आज दून बिजनेस पार्क, देहरादून में हेक्सावेयर टेक्नोलॉजी के स्थानीय कार्यालय का मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के द्वारा उद्धघाटन किया गया ।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने आशा व्यक्त की कि जिन उद्देश्यों व सोच को लेकर यह उद्घघाटन हो रहा है वह निश्चित ही सफल होगा..! प्रौद्योगिकी का क्षेत्र लोगों को सशक्त व स्वयं के पैरों पर खड़ा होने का एक माध्यम बनेगा. !
वर्तमान में नए रिसर्च हो रहे हैं उन्हें हमें स्वीकार करना चाहिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज हम 75 वें वर्ष के अमृत काल में श्रेष्ठ भारत के निर्माण में आगे बढ़ रहे हैं.. ! यह नया भारत टेक्नोलॉजी के विकास व विस्तार में अहम भूमिका निभा रहा है ! एक समय था जब भारत में आयातित अधिकांश वस्तुओं पर अन्य देश का ब्रांड छपा रहता था किंतु आज प्रत्येक वस्तुओं में मेड इन इंडिया लिखा जा रहा है! हम 2G 3G 4G के मामले में टेक्नोलॉजी हेतु दूसरों पर निर्भर रहते थे किंतु हमने 5G से अपनी योग्यता व टेलिकॉम टेक्नोलॉजी में वैश्विक मानक तय किये हैं .!भारत की स्वीकार्यता प्रत्येक क्षेत्र में बड़ी है। तकनीकी कितनी भी आए यदि उसके उपयोग की जिम्मेदारी सशक्त हाथों में ना हो तो उसका सही प्रयोग नहीं हो पाता है ! अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों का कथन व बयान यह दर्शाता है कि हमारा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में सशक्त हाथों में है !भारत डिजिटलाइजेसशन के क्षेत्र में तीव्रता से अग्रसर है .!
मुख्यमंत्री ने कहा कि डिजिटल इंडिया यह कोई सरकारी कार्य नहीं बल्कि एक विजन है, दृष्टि है जिसका उद्देश्य सामान्य जनमानस तक तकनीकी को पहुंचना है !जिससे इस सेवा का उचित व अधिक से अधिक उपयोग किया जा सके।गत कुछ वर्षों से यूपीआई हमारी अर्थव्यवस्था व जरूरतों का अभिन्न अंग बन गया है .मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि एक समय वह भी था जब डिजिटल इंडिया की समझ रखने वाले मुट्ठी भर लोग सामान्य गरीब जनता को संशय की दृष्टि से देखते किंतु आज डिजिटल इंडिया सभी लोगों के उपयोग तक उनके हाथों में पहुंच गया है !वर्तमान में 40% डिजिटल पेमेंट का उपयोग भारत में ही होता है भारत इस क्षेत्र में नित तरक्की कर रहा है लोगों का जीवन स्तर व तरीका बदल रहा है ! यह विकास का गेटवे या डिजिटल इंडिया की नींव है. ! यह डिजिटल सेवा का माध्यम है इसके विस्तार और विकास के लिए हमारी सरकार प्रयासरत है ! किसी भी प्रकार का सहयोग इस प्रकार की हेक्सावियर टेक्नोलॉजी के विकास के लिए किया जा सकेगा.. !उत्तराखंड सरकार द्वारा लोगों को निवेश हेतु आकर्षित करने के लिए हमने कई नीतियां बनाई व संशोधित की हैं !यहां प्रत्येक उद्यमी कार्य करना चाहता है हम उन सभी महानुभावों का स्वागत करेंगे।
इस उद्धघाटन समारोह में विधायक विनोद चमोली, प्रौद्योगिकी सचिव शैलेश बगोली, आईटीडीए निदेशक निकिता खंडेलवाल, हेक्सावेयर टेक्नोलॉजी के एजीक्यूटिव वाईस प्रेजिडेंट हेमंत विज, सतेन्दयु मोहंती व नीता नम्बिआर सहित कई गणमान्य उपस्थित थे।

वीस्ट्राइड डिजिटल प्लेटफॉर्म लॉन्च

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अनिल बेदाग
मुंबई :  वीस्ट्राइड, सक्रिय दवा सामग्री (एपीआई), मध्यवर्ती और अनिर्मित सामग्री के लिए पहली बार खुफिया-संचालित, एकीकृत बी 2 बी प्लेटफॉर्म ने मुंबई के कोहिनूर कॉन्टिनेंटल होटल के एमराल्ड हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम में अपना नया डिजिटल प्लेटफॉर्म लॉन्च किया।
    इस कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि फुललाइफ हेल्थकेयर के चेयरमैन सतीश खन्ना, जो ल्यूपिन के पूर्व समूह अध्यक्ष और रणनीतिक सलाहकार, लेखक और मेंटर थे। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री राकेश बामजई, अध्यक्ष, भारत, उभरते एशिया और एक्सेस मार्केट्स, वियाट्रिस, और सीईओ-एमडी, मायलन लेबोरेटरीज लिमिटेड थे।
    वीस्ट्राइड के सह-संस्थापक अश्विनर सिंह चौधरी और सलीम शेख ने फार्मा उद्योग के वरिष्ठ पेशेवरों की उपस्थिति में आधिकारिक तौर पर वीस्ट्राइड डिजिटल प्लेटफॉर्म लॉन्च किया।
   लॉन्च कार्यक्रम में वीस्ट्राइड के सह-संस्थापक डॉ. मधु तल्ला ने कहा, “वीस्ट्राइड को लॉन्च करते हुए, हम न केवल एक प्लेटफॉर्म पेश कर रहे हैं, बल्कि हम फार्मा उद्योग के लिए एक नए युग की शुरुआत भी कर रहे हैं। वीस्ट्राइड फार्मा खरीदारों और विक्रेताओं के इस परिदृश्य को नेविगेट करने के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए तैयार है, जिससे एक सहज यात्रा का निर्माण होता है जो दोनों पक्षों को सशक्त बनाता है। यह सिर्फ लेनदेन के बारे में नहीं है; यह एआई-सक्षम खुफिया-संचालित परिवर्तन के बारे में भी है।
     वीस्ट्राइड कॉमर्स अपने नए डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से खरीदारों और आपूर्तिकर्ताओं को जोड़ने के लिए तैयार है, जिससे लागत बचत लाभ और बेहतर परिचालन दक्षता हो सकती है। कंपनी अपने प्लेटफॉर्म का उपयोग करके सही भागीदारों की पहचान करने के बाद ग्राहकों के लिए कार्यशील पूंजी आवश्यकताओं को निधि देने में मदद करने के लिए आपूर्ति श्रृंखला वित्तपोषण विकल्प भी प्रदान किया करेगी।
 की सेवाओं में वीस्ट्राइड एड्ज और वीस्ट्राइड कॉमर्स शामिल हैं। वीस्ट्राइड एड्ज महत्वपूर्ण बाजार खुफिया प्रदान करने के लिए डेटा इंटेलिजेंस की शक्ति का लाभ उठाता है जो सीधे ग्राहकों द्वारा सामना की जाने वाली व्यावसायिक चुनौतियों को संबोधित करता है। ये अंतर्दृष्टि व्यापक वैश्विक अनुसंधान, वास्तविक समय बाजार की गतिशीलता, और व्यापक डोमेन विशेषज्ञता और अत्याधुनिक डेटा विज्ञान में निहित हैं। यह ग्राहकों को चुस्त और अच्छी तरह से सूचित निर्णय लेने में मदद करता है। फार्मास्युटिकल बिजनेस-टू-बिजनेस (बी 2 बी) कॉमर्स परिदृश्य को बदलने के लिए समर्पित वाईस्ट्राइड कॉमर्स का उद्देश्य एक विश्वसनीय और पारदर्शी पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है।

इंडिया आईटीएमई सोसाइटी, आईटीएमई, अफ्रीका एंड मिडिल ईस्ट ने मुंबई में कर्टेन रेजर कार्यक्रम की मेजबानी की

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अनिल बेदाग
मुंबई : इंडिया आईटीएमई सोसाइटी, आयोजक, आईटीएमई, अफ्रीका एंड मिडिल ईस्ट 2023 ने मुंबई में एक पूर्वावलोकन और कर्टेन रेजर कार्यक्रम की मेजबानी की। यह नेटवर्किंग प्रस्तुति 30 नवंबर से 2 दिसंबर 2023 तक नैरोबी, केन्या में आगामी अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी आईटीएमई अफ्रीका और एमई 2023 की एक झलक प्रदर्शित करने के लिए थी। यह वैश्विक दर्शकों के लिए आयोजित श्रृंखला का दूसरा कार्यक्रम है। पहला कार्यक्रम 3 अक्टूबर को केन्या के नैरोबी में वरिष्ठ केन्याई सरकारी अधिकारियों और दूतावास की भागीदारी की उपस्थिति में आयोजित किया गया था।
      मीडिया को संबोधित करते हुए इंडिया आईटीएमई सोसाइटी के अध्यक्ष श्री केतन सांघवी ने कहा, “आईटीएमई, अफ्रीका और मध्य पूर्व 2023 द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को बढ़ाने और केन्या और भारत के बीच औद्योगिक सहयोग को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इस साझेदारी का उद्देश्य दोनों देशों की व्यावसायिक क्षमता का लाभ उठाना और उनके संबंधित वस्त्र प्रौद्योगिकी और इंजीनियरिंग उद्योगों के नवाचार, आर्थिक विकास और स्थिरता लक्ष्यों का निर्माण करना है। केन्या में इंडिया आईटीएमई सोसाइटी प्रदर्शनी में 23 देशों के भाग लेने के साथ, अफ्रीका को भविष्य की साझेदारी में निवेश करने और पूरे अफ्रीकी क्षेत्र में सफल व्यावसायिक उद्यमों के निर्माण के अपार लाभ प्राप्त होंगे।”

भगवान श्रीविष्णु के अवतार श्री परशुराम जी महाराज से सीखनी चाहिए गौ रक्षा

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भगवान परशुराम जी का सुंदर चित्र जब वह अपनी नन्दिनी को आतताईयों से छूडाकर लाते हैं .सबसे बड़े गौ रक्षक भगवान श्रीविष्णु के अवतार श्री परशुराम जी महाराज से हम सबको सीखनी चाहिए गौ रक्षा हेतु। गौ रक्षा इस धर्म और धरा पर सबसे महत्वपूर्ण क्यों है?  गौ नहीं रही तो क्या यह पृथ्वी या स्वयं मनुष्य रह लेगा?

तो बिलकुल नहीं गाय खत्म तो पृथ्वी खत्म यह तय है… इस हेतु गाय की रक्षा एवं सम्मान कितना आवश्यक है इससे ही समझ सकते हो।

परन्तु स्वयं को ब्राह्मण कहने कहलाने वाले समाज जो सनातन की मार्गदर्शक जिम्मेदारी मिली है उनमे बड़ी आबादी को गौ रक्षा और गौ रक्षक से मतलब नहीं गाय की दुर्दशा होने से कोई मतलब नहीं।

जय दादा परशुराम जय परशुराम संगठन सहित फेसबुक सोसल मिडिया पर दम भरने वाले ब्राह्मणों की कमी नहीं है, परन्तु भगवान परशुराम से जरा सा भी गौ रक्षा गौ सेवा नहीं सीखी…

वही भगवान परशुराम को जातिवाद मे बांध के सोचने वालों की भी कमी नहीं है, जो जातीवाद को बढ़ावा देते है वर्ण व्यवस्था से मतलब नहीं रखते हद है कि भगवान को भी जाती तक सिमित किया गया। जबकि राम क्षत्रिय थे ब्राह्मण रावण पापी था तो उन्होंने रावण का वध किया उसी प्रकार भगवान परशुराम भी जो उस समय के क्षत्रिय पापी थे उनके वध किया। राम और परशुराम अलग नहीं दोनों । एक है विष्णु दोनों रूपों में और गौ के सम्मान की अद्भुत गौरवशाली गाथा के रूप में।  जगत के प्रथम गौ रक्षक श्री हरि भगवान परशुराम , है .राम और परशुराम अलग नहीं दोनों ।एक है विष्णु दोनों रूपों में और गौ के सम्मान की अद्भुत गौरवशाली गाथा के रूप में।

 

युद्ध की छाया में बेरंग होते विधानसभा चुनाव

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राकेश अचल
इजराइल और फिलीस्तीन के बीच चल रहे युद्ध ने भारत में पांच राज्यों के चुनावों का रंग फीका कर दिया है।  चुनाव बेमजा और बेरंग हो गए है ।  टीवी के परदे का एक बड़ा समय इस युद्ध की भेंट चढ़ गया है। युद्ध  होता ही ऐसा है जिसमें सब कुछ भेंट चढ़ जाता है। मानवता तक नहीं बचती। पहले पंद्रह दिन पितृपक्ष ले गया और आने वाले नौ दिन देवी के नाम आरक्षित हैं। कांग्रेस ने पितृपक्ष  में अपने प्रत्याशियों की सूची का ऐलान न कर इस रंग को और बेरंग कर दिया।
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने दो महीने पहले ही अपने प्रत्याशियों की पहली सूची मध्यप्रदेश में जारी कर दी थी । फिर छत्तीसगढ़ का नंबर आया ।  राजस्थान  की बारी बाद में आयी। तेलंगाना और मिजोरम विधानसभा चुनाव में भाजपा की ज्यादा दिलचस्पी है नहीं क्योंकि इन दोनों राज्यों में भाजपा के लिए कोई ज्यादा गुंजाइश है भी नहीं। पैर रखने की जगह ही मिल जाये ये ही बहुत है। स्थिति ये है कि मिजोरम की और तो अब तक प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने झांका तक नहीं है। इन विधानसभा चुनावों में रंग उभरने से पहले ही इजराइल और फिलीस्तीन के बीच जंग छिड़ गयी। भारत सरकार अब इस जंग में व्यस्त है ,चुनावों के लिए समय निकलना कठिन हो रहा है।
सत्तारूढ़ भाजपा के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मध्यप्रदेश और राजस्थान में ‘ सिंधिया फेक्टर ‘ गले की फांस बन या है। राजस्थान में भाजपा पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे सिंधिया को विधानसभा चुनाव   से अलग रखना चाहती है ,लेकिन वे हैं कि अलग हो ही नहीं रही ।  भाजपा ने रानी का विकल्प रानी को चुना लेकिन मुकाबला सध नहीं रहा।  जयपुर राजघराने की रानी धौलपुर की महारानी के समाने टिक नहीं पा रहीं। प्रदेश भाजपा का एक बड़ा धड़ा वसुंधरा राजे के साथ खड़ा है। वसुंधरा राजे से भाजपा की विरक्ति की वजह क्या है ये कोई नहीं जानता ,जबकि भाजपा की जड़ों में सिंधिया खानदान का बहुत खून-पसीना लगा हुआ है।
मध्य्प्रदेश में वसुंधरा राजे सिंधिया की बहन यशोधरा राजे ने भाजपा हाईकमान के तेवर देखकर मैदान छोड़ दिया है। वे विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ रहीं है।  वैसे भी उन्हें टिकिट न  मिलना तय था। भनक समय पर पड़ गयी सो यशोधरा ने खुद ही मना कर दिया। वसुंधरा और यशोधरा के भाई माधवराव सिंधिया के इकलौते पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया हालाँकि मध्यप्रदेश में भाजपा  के लिए एक बड़ी जरूरत हैं लेकिन वे भी विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए राजी नहीं है।  वे चुनाव लड़वाने वाले नेता हैं हालाँकि भाजपा पिछले लोकसभा चुनाव में उन्हें अभिमन्यु की तरह घेरकर चुनाव हरा चुकी है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने आपको चुनाव प्रचार के लिए तैयार कर रखा है जबकि उनके विरोधी चाहते हैं कि जब भाजपा के 7 सांसद चुनाव लड़ रहे हैं तो सिंधिया को भी विधानसभा का चुनाव लड़ाया  जाना चाहिए।
छत्तीसगढ़ में भाजपा के पास कोई सिंधिया है नहीं ,इसलिए वहां सिंधियाशाही को लेकर कोई संकट नहीं है। छग में भाजपा अपने वजूद   के लिए चुनाव लड़ रही है,सत्ता हासिल करने के लिए नहीं। यहां भाजपा ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खिलाफ उनके  ही भतीजे को चुनाव मैदान में उतारा है। भाजपा के पास कोई और पुरोधा  है ही नहीं।  पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह पहले ही निराश कर चुके है।  2018  के विधानसभा चुनाव में डॉ रमन सिंह की कथित लोकप्रियता की कलई खुल चुकी है।पिछले पांच साल में छग में भाजपा का चर्चित ‘ आपरेशन लोटस’ भी कामयाब नहीं हुआ ।  भाजपा को छग कांग्रेस में ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसा कोई विभीषण नहीं मिला। राजस्थान ने भी इस मामले में भाजपा को निराश किया।
इन बेमजा विधानसभा चुनाव में जितनी बेफिक्री इस बार  कांग्रेस में दिखाई दे रही है उतनी पहले कभी नहीं देखी गयी ।  कांग्रेस की महासचिव श्रीमती प्रियंका बाड्रा  अपनी चुनाव रैलियों में अपने समर्थकों के बीच आंखमिचौली करते दिखाई दे रहीं हैं। उनके चेहरे पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के चेहरों पर चस्पा तनाव रत्ती भर नहीं है। राहुल गाँधी की चुनावी रैलियां भी बिना तनाव के हो रहीं हैं। आम आदमी पार्टी  की चुनावी रैलियों पर जरूर सांसद संजय सिंह की गिरफ्तारी का असर पड़ा है। आम आदमी पार्टी को भाजपा से दिल्ली में भी लड़ना पड़ रहा है और दिल्ली के बाहर भी। आप के तीन नेता जेल में हैं और इनमें  से दो तो स्टार प्रचारक है।  मनीष सिसौदिया और संजय सिंह की कमी आम आदमी को खल  रही है। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत  सिंह मान उतने प्रभावी साबित नहीं हो रहे। इसलिए इन तीनों राज्यों में आप न गुजरात दोहरा पाएगी और न पंजाब।
भाजपा में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री  श्री शिवराज सिंह चौहान के ‘ फीनिक्स ‘ अवतार ने भी भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दीं हैं। भाजपा हाईकमान शिवराज सिंह चौहान से मुक्ति पाना चाहता हैं लेकिन शिवराज सिंह हैं कि फीनिक्स की तरह बार-बार जन्म ले लेते हैं। 2018  में जनता ने उन्हें ख़ारिज कर दिया लेकिन 2020  में उनका पुनर्जन्म हो गया और वे एक बार फिर जन्म लेने का ऐलान कर चुके हैं। इतना आत्मविश्वास तो महारानी वसुंधरा राजे सिंधिया भी प्रकट नहीं कर सकीं अपने आप पर। मजे की बात ये हैं कि चौहान हों या वसुंधरा राजे सिंधिया या ज्योतिरादित्य सिंधिया तीनों संसदीय ज्ञान में अपनी पार्टी के वर्तमान भाग्यविधाताओं  से ज्यादा अनुभवी हैं। शिवराज सिंह चौहान 1991  में संसद की सीढियाँ चढ़ चुके थे। वसुंधरा ने संसद की सीढियाँ 1989  में चढ़ीं थी जबकि ज्योतिरादित्य सिंधिया भी 2002  में सांसद पहुँच चुके थ।  संसद पहुँचने वाले नरेंद्र मोदी इन सबमें जूनियर   है।  वे 2014  में संसद की सीढियाँ चढ़े। मोदी विधानसभा  में भी वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह के बाद पहुंचे।
बहरहाल युद्ध की छाया में हो रहे बेरंग विधानसभा चुनावों में रंग भरने की पुरजोर कोशिशें की जा रहीं हैं। मतदाताओं को रिझाने की इन कोशिशों को कितनी कामयाबी मिलती हैं ये कह पाना अभी कठिन हैं। यद्यपि प्रधामंत्री जी कैलाश में डमरू बजा रहे हैं। उनका तांडव कब शुरू होगा ये नहीं  बताया जा सकता। वे ही हैं जो इन चुनावों को बेरंग होने से बचा सकते हैं ।(विभूति फीचर्स)