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सवालों के घेरे में न्याय व्यवस्था

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  • आशीष वशिष्ठ 

 सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2012 के छावला सामूहिक बलात्कार मामले में 19 वर्षीय लड़की की हत्या और बलात्कार के आरोपी तीन लोगों को बरी कर दिया। उन्हें पहले ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराया गया था और मौत की सजा सुनाई गई थी जिसकी 26 अगस्त 2014 को दिल्ली हाईकोर्ट ने पुष्टि की थी। दोषियों को जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया, उससे हर कोई स्तब्ध है। आरोपियों को बरी करने के बाद पीड़िता के पिता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से उन्हें निराश किया है और 11 साल से अधिक समय तक लड़ाई लड़ने के बाद न्यायपालिका से उनका विश्वास उठ गया है।

मूल रूप से उत्तराखंड की ‘अनामिका’ (बदला हुआ नाम) दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के छावला के कुतुब विहार में रह रही थी। 9 फरवरी 2012 की रात नौकरी से लौटते समय उसे कुछ लोगों ने जबरन अपनी लाल इंडिका गाड़ी में बैठा लिया। 3 दिन बाद उसकी लाश बहुत ही बुरी हालत में हरियाणा के रिवाड़ी के एक खेत मे मिली। बलात्कार के अलावा उसे असहनीय यातना दी गई थी।  मगर, गैंगरेप के बाद भयंकर यातनाएं देकर मारी गई ‘अनामिका’ को इंसाफ नहीं मिल सका।

अब सुप्रीम कोर्ट ने तीनों आरोपियों को बरी कर दिया है। इसकी वजह पुलिस की खराब जांच और निचली अदालत में मुकदमे के दौरान बरती गई लापरवाही है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में यह भी कहा कि मामले की सुनवाई के दौरान कई स्पष्ट खामियां थीं। अभियोजन पक्ष द्वारा परीक्षण किए गए कुल 49 गवाहों में से 10 सामग्री गवाहों से जिरह नहीं की गई और कई अन्य महत्वपूर्ण गवाहों से बचाव पक्ष के वकील द्वारा पर्याप्त रूप से जिरह नहीं की गई। पीठ ने यह भी कहा कि विभिन्न फैसलों में अदालत ने बार-बार देखा कहा कि जज को ट्रायल में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए और गवाहों से पूछताछ करनी चाहिए, लेकिन वर्तमान मामले में न्यायाधीश ने एक निष्क्रिय अंपायर की भूमिका निभाई।

ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या न्यायालय को पुलिसिया जांच और सम्पूर्ण व्यवस्था से यह नहीं पूछना चाहिए कि माना कि जिन्हें आरोपी बनाया गया है, वह निर्दोष है तो फिर ‘अनामिका’का असली गुनाहगार कौन है? वह कैसे बच गया पुलिस की नजरों से ? अगर तमाम व्यवस्था -चाहे कार्यपालिक यो या न्यायपालिका- की नजरों से अपराधी बच जा रहे हैं तो इस देश की करोड़ो बेटियां खुद को कैसे सुरक्षित महसूस करेंगी? सिक्के का दूसरा पहलू यह कि एक बार मान भी लें कि ये तीनों आरोपी असली गुनाहगार नहीं हैं तो फिर जेलों में बंद रहने के कारण इनके जीवन के जो 10 साल बर्बाद हुए हैं, उसकी भरपाई कैसे की जाएगी और कौन करेगा ?

 हालांकि पीड़ित परिवार के पास अभी कोर्ट में इस फैसले के मद्देनजर पुनर्विचार याचिका  का अधिकार है और उम्मीद है कि कोर्ट इसे जरूर पुनर्विचार योग्य समझेगी। क्योंकि यह मामला न सिर्फ एक अनामिका का है बल्कि देश की करोड़ो बेटियों की सुरक्षा का मामला है।

यह प्रसंग हमारी पूरी न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। इस दिल दहला देने वाली घटना को अंजाम देने के बाद भी आज अपराधी खुली हवा में सांस ले रहे हैं। सवाल तो इस बात का है कि आखिर किसी ने तो इस कांड को अंजाम दिया।

यह मामला पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े करता है। आखिर कैसे पुलिस ने जांच की? इससे तो ऐसे अपराधियों का मनोबल और बढ़ेगा। अपराधियों को लगेगा कि कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। भारत भले तमाम तरह की तरक्कियों के दावे करता रहे, लेकिन हकीकत यह है कि हमारा समाज, न्याय व्यवस्था, पुलिस आदि सब सवालों के घेरे में हैं। (युवराज)

आशीष वशिष्ठ 

भाजपा – वाममोर्चा  गठबंधन: अवसरवादिता या किसी बड़े बदलाव के संकेत

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– अमित कुमार अम्बष्ट ” आमिली “

अगर राष्ट्रीय स्तर पर या किसी भी प्रदेश में भाजपा – वामपंथी मोर्चा के गठबंधन की बात हो तो सहसा किसी को यकीन नहीं होगा , सैद्धांतिक स्तर में दो धुर विरोधी खेमा एक दूसरे के साथ कैसे आ सकते हैं ?  , लेकिन कहते है न प्यार और जंग में सब जायज है और सत्ता के गलियारे में कुछ भी असंभव नहीं होता है । ऐसा ही पश्चिम बंगाल के समवाय समिति के चुनाव में हुआ है ।

 गौरतलब है कि बंगाल के समवाय समिति के चुनाव में भाजपा ने वामपंथी मोर्चा से गठबंधन कर सबको चौंका दिया , दोनों दलों ने चुनाव से पूर्व समवाय बचाओ समिति नाम से संगठन बनाकर चुनाव लड़ा जबकि तृणमूल कांग्रेस की ओर से भी 46 सीटों पर नॉमिनेशन दाखिल किया गया था, लेकिन चुनाव से पहले ही 35 सीटों पर चुनाव से ठीक पहले ही तृणमूल उम्मीदवारों ने नामांकन वापस ले लिया था , बंगाल में पहली बार भाजपा और वाम मोर्चा ने साथ चुनाव लड़कर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को बुरी तरह पराजित कर दिया  ।

दोंनो दलों के साथ आने के बाद समनवाय समिति चुनाव के नतीजों का आलम यह रहा कि नंदकुमार के बहरामपुर को-ऑपरेटिव ऐग्रिकल्चरल सोसायटी के चुनाव में तृणमूल खाता ही नहीं खोल पाई , जबकि यहाँ कुल सीटों की संख्या 63 हैं , कुल 63 सीटों पर भाजपा – वामपंथी मोर्चा ने कब्जा जमा लिया ।

भाजपा – वामपंथी गठबंधन की यह जीत इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि पश्चिम बंगाल में अगले वर्ष यानी 2023 में पंचायत चुनाव होने हैं और पंचायत चुनावों को लेकर सभी राजनीतिक पार्टियां तैयारियों में जुटी हुई हैं , इसके अलावा 2024 में आने वाले लोकसभा चुनाव पर भी सबकी नजर है , खासकर ममता बनर्जी जी खुद को विपक्ष के नेता के तौर पर खुद को प्रोजेक्ट करने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं, ऐसी स्थिति में भाजपा भी पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है , इसमें कोई दोराय नहीं है , हालांकि  2018 में हुए पिछले पंचायत चुनाव की बात  करें तो ग्राम पंचायत की कुल 48636 सीटों में से तृणमूल कांग्रेस को 38118 बीजेपी को 5779 वाममोर्चा को 1713 कांग्रेस को 1066 एवं अन्य को 1960 सीटें प्राप्त हुई थी ।

पंचायत समिति के 9214 सीटों  में से तृणमूल कांग्रेस को 8062 बीजेपी 769 वाममोर्चा 129 कांग्रेस को 133 एवं अन्य को 121 सीटें प्राप्त हुई थी एवं जिला परिषद के कुल 824 सीटों में तृणमूल कांग्रेस को 793 बीजेपी 22 वाममोर्चा 1 कांग्रेस को 6 एवं अन्य को 2 सीट प्राप्त हुई थी, यानी लगभग लगभग 90 फीसदी सीटों पर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों को जीत मिली थी , तृणमूल कांग्रेस  ने 34 फीसदी सीटें निर्विरोध जीतने में सफल रही थी, हालांकि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस पर यह भी आरोप लगते रहते हैं कि पार्टी के दबंगों के कारण कई उम्मीदवार अपना नामांकन नहीं भरते या वापस ले लेते हैं , यही कारण है कि निर्विरोध चुनाव में जीतने वाले तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों की संख्या इतनी ज्यादा है । ऐसे में अगर वाममोर्चा भाजपा साथ आ जाते हैं तो संगठनात्मक स्तर पर भी भाजपा को अधिक बल मिलेगा और उम्मीदवार नामंकण और चुनाव लड़ने से नहीं डरेंगे।

  विगत लोकसभा चुनाव के आंकड़ों की बात करें तो पश्चिम बंगाल के कुल 42 लोकसभा सीट के लिए मतदान हुए जिसमें 22 सीटों पर संघीय मोर्चा को सफलता मिली जिसमें  तृणमूल कांग्रेस और वाम मोर्चा भी शामिल थी  जबकि बीजेपी 18 सीटों पर विजयी रही थी , अगर मतों का प्रतिशत देखे तो संघीय मोर्चा को 43.3% जबकि एनडीए को 40.7 % मत प्राप्त हुआ था , जबकि कांगेस और वाम मोर्चा को क्रमशः 5.67 % एवं 6.33% मत प्राप्त हुआ था ,  कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि दोनों ही मोर्चा के बीच कड़ा संघर्ष हुआ था लेकिन तृणमूल कांग्रेस को तकरीबन 12 सीटें गवानी पड़ी थी , ऐसे में अगर भाजपा और वाममोर्चा साथ आते है तो ग्राम पंचायत चुनाव पर तो प्रभाव पड़ेगा ही लोकसभा चुनाव में भी पश्चिम बंगाल की तस्वीर बदल सकती है , इसमें कोई दोराय नहीं है,  क्योंकि वाममोर्चा को जो 6.33% का मत लोकसभा में प्राप्त हुआ था , वो वाममोर्चा के कैडर वोटर हैं , जो किसी भी स्थिति में भविष्य में भी वाममोर्चा के साथ बने रहेंगे , ऐसे में यह आंकड़ा न सिर्फ तृणमूल कांग्रेस को चुनौती देने में सफल होगा अपितु चारों खाने चित भी कर दे सकता है ।

क्योंकि जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस के रिश्ते कांग्रेस से भी तल्ख होते जा रहें है , इस बात की तरफ स्पष्ट संकेत करते  हैं कि तृणमूल कांग्रेस आगामी किसी भी चुनाव में शायद ही कांग्रेस को साथ लेकर चुनाव लड़े ,  क्योंकि ममता बनर्जी अक्सर गैर कांग्रेसी विपक्षी एकता की न सिर्फ बात करती है अपितु कहीं न कहीं उनके मन में यह इच्छा है कि सभी विपक्षी दल उन्हें विपक्ष के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर स्वीकार ले, इतना ही नहीं ममता बनर्जी वामपंथी मोर्चा को भी पुनः अपने पाँव फैलाने का मौका बिल्कुल ही नहीं देना चाहूगी , इसीलिए समवाय समिति के चुनाव के पहले ही तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता कुणाल घोष  ने अपना बयान जारी करते हुए कहा कि प्रदेश में भाजपा और वाम मोर्चा की मिली भगत एक्सपोज हो गयी है ।

हालांकि पश्चिम बंगाल खासकर ग्राम पंचायत चुनाव में  भाजपा – वाम मोर्चा गठबंधन को लेकर अटकले तेज हो गयी हैं ऐसे में सवाल उठता है कि समवाय समिति का चुनाव साथ लड़ना दोनों दलों की महज अवसरवादिता थी या फिर यह बीजेपी का यह एक प्रयोग है । अगर यह दोनों दलों के लिए प्रयोग है तो इस प्रयोग के प्राथमिक नतीजे दोनों ही दलों के लिए न सिर्फ उत्साहवर्धक हैं अपितु पश्चिम बंगाल में एक बड़े बदलाव की तरफ भी संकेत कर रहे हैं।  अगर भाजपा पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा को अपने साथ लाने में सफल हो जाती है तो आने वाला समय तृणमूल कांग्रेस के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकता है ।

(युवराज)- अमित कुमार अम्बष्ट ” आमिली “

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हेट स्पीच पर तल्ख टिप्पणी तो ठीक पर उसके लिए जिम्मेबार डर का क्या करें?

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– गौतम चौधरी

अभी हाल ही में हेट स्पीच मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की और उस टिप्पणी के बाद सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों वाली एक पीठ ने तीन प्रदेश के पुलिस को नोटिस जारी कर दिया। इस मामले में कोर्ट का रुख बेहद चैकाने वाला है। सामान्य तौर पर इस प्रकार के मामले राजनीतिक होते हैं लेकिन माननीय न्यायालय को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा यह हमारे देश के लोकतंत्र के लिए बुरी खबर है।

पहले तो हम यह समझें कि आखिर कोर्ट ने क्या कहा? मसलन, न्यायमूर्ति केएम जोसफ ने कहा-‘‘यह 21वीं सदी है। हम धर्म के नाम पर कहां आ पहुंच गए हैं? हमें एक धर्मनिरपेक्ष और सहिष्णु समाज होना चाहिए, लेकिन आज घृणा का माहौल है। सामाजिक ताना बाना बिखरा जा रहा है। हमने ईश्वर को कितना छोटा कर दिया है।

उसके नाम पर विवाद हो रहे हैं।’’ इस मामले में माननीय न्यायालय ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड पुलिस को नोटिस जारी करते हुए पूछा, ‘‘हेट स्पीच में शामिल लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। जिम्मेदार ऐसे बयान देने वालों पर फौरन सख्त कार्रवाई करें, नहीं तो अवमानना के लिए तैयार रहें।’’ जस्टिस केएम जोसफ और ऋषिकेश रॉय की बेंच ने अपने आदेश में कहा कि कोर्ट की जिम्मेदारी है कि वह इस तरह के मामलों में हस्तक्षेप करे।

दरअसल, शाहीन अब्दुल्ला ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। उन्होंने कोर्ट से मांग की कि वह देशभर में हुई हेट स्पीच की घटनाओं की निष्पक्ष, विश्वसनीय और स्वतंत्र जांच के लिए केंद्र सरकार को निर्देशित करें। भारत में मुस्लिमों को डराने-धमकाने के चलन को तुरंत रोका जाए। याचिकाकर्ता ने अदालत से तुरंत सुनवाई की मांग की थी। इसी याचिका के आलोक में कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की और आनन-फानन में तीन प्रदेश की पुलिस को नोटिस जारी कर दिया। यदि कोर्ट की बात करें तो यह बेहद सकारात्मक पहल है और किसी भी धर्मनिर्पेक्ष राष्ट्र के लिए यह जरूरी है। भारत के लोकतंत्र में विश्वास करने वाले हर नागरिक को इस निर्णय पर गर्व होना चाहिए लेकिन कोर्ट के इस निर्णय से देश के वैसे नागरिकों में डर भी पैदा हो गया है जो देश में कानून के राज समर्थक हैं और अपने आप को असुरक्षित महसूस करते हैं।

इस मामले में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर हेट स्पीच क्यों दिए जा रहे हैं? इस प्रकार के हेट स्पीच से फायदा किसको हो रहा है? इसके लिए इधर के दिनों कुछ बड़ी घटनाओं का जिक्र यहां जरूरी हो जाता है। एक तो उदयपुर में एक खास धर्म विशेष के दो युवकों ने कन्हैया लाल की बेरहमी से हत्या कर दी। पुलिस वहां भी थी और प्रदेश की सरकार सीना ठीक के कहती रही कि यहां कानून का राज है। दूसरी घटना अभी हाल ही में मुंबई की है। यहां भी एक खास धर्म के नौजवान ने अपनी ही प्रेमिका, जो उसके साथ लीवइन थी, उसके कई टुकड़े किए और फ्रीज में डाल दिया। डारखंड की लड़की को जिंदा जला दिया गया।

साल भर के अंदर कम से कम 10 ऐसी घटनएं घटी है, जिसमें एक खास धर्म विशेष के युवकों ने भारत के बहुसंख्यक समाज पर विभत्स और क्रूर आक्रमण किए हैं। इस प्रकार के आक्रमणों से भारत का बहुसंख्यक समाज विगत लगभग 1000 वर्षों से प्रभावित होता रहा है। कोर्ट में याचिकाकर्ता ने यह जरूर कहा कि एक खास वर्ग विशेष के लोगों को सत्ता और शासन द्वारा धमकाया व डराया जा रहा है लेकिन उन्होंने यह कबूल नहीं किया कि बहुसंख्यक समाज में जो एक खास समुदाय द्वारा लगातार डर पैदा किया जा रहा है उसका क्या होगा?

माननीय न्यायालय का निर्णय शिरोधार्य लेकिन समाज में जो इस प्रकार की घृणा पैदा की जा रही है उसका भी समाधान ढूंढना होगा। इसका समाधान न तो न्यायालय के पास है और ही सत्ता-शासन के पास। घृणास्पद बयान देने वाले राजनेता तो घृणित राजनीति की उपज हैं लेकिन समाज को यहीं रहना है।

पड़ोस में रहने वाले राम को रहमान चाहिए और जगतलाल को मशीह। हेट स्पीच का कारण बहुसंख्यक समाज में एक खास सुमाय के प्रति बैठा हुआ वह डर है जो उन्हें शदियों से डराता रहा है। यही नहीं भारत का बहुसंख्यक समाज अपने पड़ोस के देशों से आई खबरों को भी देखता, सुनता है। हेट स्पीच के पीछे का कारण यह भी है। जब तक वह डर जिंदा है घृणा की राजनीति करने वाले हेट स्पीच देते रहेंगे। इसलिए समाज को, देश के हुक्मरानों को और माननीय न्यायालय को इस डर का भी समाधान ढूंढना होगा। (युवराज)

धर्मांतरण का सबसे बड़ा खेल राजस्थान की कांग्रेस सरकार के राज में  खुलेआम खेला जा रहा है!

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धर्मांतरण का सबसे बड़ा खेल राजस्थान की कांग्रेस सरकार के राज में  खुलेआम खेला जा रहा है!

अशोक भाटिया

हाल ही में धर्मांतरण को बहुत गंभीर मुद्दा बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व राज्यों से इस मामले में दखल देने को कहा। साथ ही यह भी कहा कि इस चलन को रोकने के लिए ईमानदारी से कोशिश करें। कोर्ट ने इस बात की चेतावनी भी दी कि अगर जबरन धर्मांतरण को नहीं रोका गया तो बहुत मुश्किल परिस्थितियां खड़ी हो जाएंगीं।उसके बावजूद धर्मांतरण का खेल राजस्थान की कांग्रेस सरकार के राज में  खुलेआम खेला जा रहा है। 

मिशनरियों की मंडलियां भोले-भाले लोगों को प्रलोभन देकर तो कभी बीमारी ठीक करने और शराब छुड़ाने के नाम पर मूर्ति पूजा का विरोध कर रही हैं। अलवर से लेकर बारां तक और गरीबों-दलितों से लेकर आदिवासियों तक ये मिशनरी अपना जाल फैला रहे हैं। धर्मांतरण की करतूतों के खिलाफ कोई कार्रवाई न होने का ही दुष्परिणाम है कि मिशनरियों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं कि अब तो राजधानी जयपुर में गहलोत सरकार की नाक के नीचे धर्मांतरण का बड़ा खेल चल रहा है लेकिन सरकार सिर्फ खुली आंख से तमाशा देखने में लगी है।

राजस्थान के बारां और अलवर आदि के बाद अब राजधानी जयपुर में भी धर्म परिवर्तन कराने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। जयपुर के वाटिका में करीब 250 लोगों को जबरन हिंदू धर्म से ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर करने का खुलासा हुआ है। हिंदू जागरण मंच का आरोप है कि 28 अक्टूबर को वाटिका में करीब 2000 लोगों के सामूहिक धर्मांतरण का कार्यक्रम था लेकिन जब इसका भारी विरोध किया गया तो इसे दबाव के चलते रद्द करना पड़ा। पुलिस ने अभी तक इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की है।

गहलोत सरकार की तरफ से कोई आदेश-निर्देश न होने के कारण पुलिस ने भी फिलहाल इस मामले में चुप्पी साध रखी है। जयपुर से 22 किमी दूर वाटिका की ढाणी बैरावाला इसका केंद्र है। 400 परिवारों वाली इस ढाणी और आसपास के गांव में हिंदुओं के धर्मांतरण के प्रयास किये जा रहे हैं।

गरीब व एससी ग्रामीणों को लालच और डर दिखाकर ईसाई में कन्वर्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि खुद को मिशनरी की मंडली बताने वाले लोग मूर्ति पूजा को खत्म कराने, हिंदू देवी-देवताओं को नहीं मानने और महिलाओं को व्रत से दूरी जैसे संदेश दे रहे हैं। ये यीशु की शरण में आने पर बीमारी से लेकर हर समस्या दूर होने का दावा कर रहे हैं। आरोप है कि धर्मांतरण का यह खेल बीमारी ठीक होने, शराब छूटने और आर्थिक स्थिति सुधारने के नाम पर खेला जा रहा था। इसके लिए हिन्दुओं से हिन्दू देवताओं की पूजा बंद करवाकर मूर्तियों का विसर्जन करवा दिया गया। धर्मांतरण के शिकार लोगों ने बताया कि उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर बहकाया गया और डराया गया।

इस मामले को लेकर हिंदू जागरण मंच आक्रोशित है। मंच का आरोप है कि मिशनरी के संपर्क में आकर ईसाई धर्म के प्रचारक बने पास्टर धर्मपाल बैरवा व उनकी टीम ने क्षेत्र में धर्म के प्रचार के लिए वर्किंग कर रही है। अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में जयपुर के सांगानेर में धर्मांतरण को लेकर एक बड़ा आयोजन था। धार्मिक सभा के आयोजन के नाम पर इसके पोस्टर पर भी लगाए गए थे। धर्म जागरण मंच के संजय सिंह शेखावत ने जांच स्थानीय नेता अमित शर्मा से कराई। मामला खुलता चला गया। फिर हिंदू संगठनों की आपत्ति के बाद यह कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। सांगानेर सदर के थानेदार बृजमोहन कविया खोखली दलील देते हैं कि आयोजकों ने कार्यक्रम की इजाजत ली थी। कार्यक्रम से दो-तीन दिन पहले आकर उन्होंने बताया कि अब कार्यक्रम नहीं कराना है। ईसाई धर्म के प्रचार के नाम पर ये लोग एससी या गरीब व्यक्ति को आर्थिक मदद या काम-धंधे का लालच देते हैं। कई लोगों को मदद भी देते हैं ताकि उन्हें जाल में फंसा सकें।

प्रार्थना में शामिल होने वाले व्यक्ति दानपात्र में जो राशि डालते हैं, वह भी धर्मांतरण के लिए काम में ली जाती है। दावा है कि ईसाई धर्म से प्रभावित लोग खुद की आय का हिस्सा तक देते हैं। बताया जाता है कि रुपये नहीं देने पर अनर्थ होने का डर भी बताया जाता है। राजधानी से पहले राजस्थान के बारां जिले में धर्म परिवर्तन का एक बड़ा मामला सामने आया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गाँव में मां दुर्गा आरती का आयोजन कराने वाले दलित युवकों से मारपीट की गई। पूरे घटनाक्रम से गुस्साए दलितों ने सामूहिक रूप से धर्म परिवर्तन कर लिया। बताया जा रहा है कि 250 दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाने से सनसनी फैल गई। वहीं, पुलिस अधिकारी पूजा नागर ने बताया कि बारां जिले के बापचा थाना क्षेत्र के भुलोन गांव बौद्ध धर्म ग्रहण किया गया है। हालाँकि पुलिस ने धर्म परिवर्तन करने वालों की संख्या काफी कम बताई है। गाँव में दलितों ने जुलूस निकालते हुए धर्मांतरण की शपथ ली और गांव की बैथली नदी में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां और तस्वीरें प्रवाहित कर दीं।

कांग्रेस सरकार जब राजधानी में ही धर्मांतरण को नहीं रोक पा रही है, तो जिलों में ऐसे मामलों में उससे कार्रवाई की क्या ही उम्मीद करें। जयपुर और बारां की तरह अलवर में भी धर्मांतरण का मामला पिछले माह ही आ चुका है। राजस्थान के अलवर जिले में माता-पिता पर अपने बेटे-बहू का धर्मांतरण कराने का आरोप लगा है। पीड़ित दंपति सोनू और उनकी पत्नी रजनी ने पिछले माह 19 अक्टूबर को इस मामले में शिकायत दर्ज कराई। इन दोनों ने शिकायत देते हुए पुलिस से कहा है कि सोनू के माता-पिता ने घर में रखी मूर्तियों को तोड़ दिया और हिंदू देवी-देवताओं के पोस्टर्स को फाड़ दिया है। वे लोग, इन पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए लगातार दवाब बना रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पीड़ित दंपति ने राजस्थान के अलवर पुलिस स्टेशन में माता-पिता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। यह भी कहा जा रहा है कि दंपति ने शिकायत दर्ज कराने के लिए बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों से मदद मांगी।

वहीं राजस्थान में बढ़ रहे धर्मांतरण के मामले को लेकर भारतीय जनता पार्टी प्रदेश सरकार को घेरने लगी है। भाजपा  प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया ने कहा है कि  राजस्थान कितना असुरक्षित इसका नमूना धर्मांतरण है। यहां लव जिहाद और लैंड जिहाद की घटनाएं होती रही हैं। धर्मान्तरण बीच में रुका था लेकिन फिर से हो रहा है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। कमजोर लोगों को टारगेट किया जा रहा है।पूनिया के अलावा उपनेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने भी कहा, “राज्य में हिंदुओं के धर्मांतरण की घटनाओं का बार-बार सामने आना और गहलोत सरकार का ऐसे गंभीर मुद्दे पर मूकदर्शक बने रहना इस बात का प्रमाण है कि कांग्रेस तुष्टिकरण की नीति पर चलकर धर्मांतरण को शह देने में लगी हुई है। राज्य सरकार जबरन धर्मांतरण करवाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें।” जल्द ही कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की  भारत जोड़ों यात्रा राजस्थान जाने वाली है उन्हें इस जबरन धर्म परिवर्तन के मसले  पर हिन्दू संगठनों का विरोध भी झेलना पड़ सकता हैं

(युवराज)– अशोक भाटिया

प्यार के तिलिस्म में फंसती युवतियां और टूटती संस्कार की कड़ियां*

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*– डॉ.नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी*

 

       आजकल युवा प्रेम को व्यवहारिक बनाने के चक्कर में प्रेम की मूल संवेदना को ही खत्म करने लगे हैं जैसे कि आए दिन प्रेम में हत्या या बलात्कार तक की घटनाएं होती रह रही हैं। आजकल युवा का आकर्षण से प्रेम तक के बीच का समय काल काफी कम हो रहा है। कुछ घटनाओं में तो अनजान से दोस्ती, दोस्ती से प्रेम और प्रेम से सेक्स और सेक्स से घर से भाग जाने तक की घटना इतने कम दिनों में हो जाती है जो समझ नहीं आ रहा है। एक दूसरे को जाने बिना समझे बिना काफी रिश्तों को काफी आगे ले जाने की बीमारी से समाज ग्रसित है। दोस्ती होती है, शादी की बात होती है और फिर इनका व्यवहार ऐसे ही मानो पति पत्नी हो. फिर कुछ दिन में सब खत्म क्योंकि जब रिश्ते  शारीरिक जरूरत के अनुसार बनते है तो टूटना स्वाभाविक है। इससे बचने के लिए युवाओं को दोस्ती और प्रेम तथा अपने और बहुरूपिये के बीच के अंतर को समझना होगा।

          आफताब श्रद्धा जैसी घटनाएं बहुत दुखद है। एक सभ्य समाज के नाम पर कलंक है। आज़ादी की चाह हमारे युवाओं को भटकाव  की ओर ले जा रही है। परिणाम लड़कियों को ही भुगतना पड़ता है। काश! हमारी बेटियों को समझ आ जाए। वे माता-पिता को अपना बैरी ना समझे। अपने जीवन के कीमती वर्ष पढ़ाई और कैरियर में लगाएं। एक निश्चित उम्र के बाद ही अच्छे बुरे की समझ भी आती है। आजकल के मां – बाप भी कैरियर बनाने के चक्कर में अपने बच्चों को जमाने के ऊंच-नीच नहीं बताते। सिर्फ पढ़ो , पढ़ो, कैरियर बनाओ। जो नसीहत उन्हें शुरू से देनी चाहिए वह उन्हें कभी नहीं मिलता। वे सिर्फ कैरियर के गुलाम बनकर रह जाते हैं। ऐसे में जब आफताब जैसा भेड़िया उनसे नकली मुहब्बत दिखाता है तो वह उसी को असली प्यार समझ कर अपने परिवार से विद्रोह कर बैठती है। फिर जो परिणाम होता है वह सर्वविदित है। लड़की की तो शत प्रतिशत गलती है जिसका परिणाम भुगत लिया उसने। इतनी निशृंस हत्या करना, एक गंदी सोच का ही नतीजा है। प्रेम शब्द का सिर्फ सहारा लिया।

          आश्चर्य है कि विदेश में रहने वाले लोग भारतीय संस्कृति की ओर आने लगें हैं और भारत के युवा विदेश के कल्चर को अपना कर आधुनिकता का आवरण ओढ़ कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। लिव इन रिलेशनशिप में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों का अधिक दैहिक और मानसिक शोषण किया जाता है। आधुनिकता के नाम पर हम आने वाली पीढ़ी को कितना गलत संदेश दे रहे हैं। माता पिता आर्थिक उपार्जन हेतु व्यस्त रहते हैं और बच्चों को समय नहीं दे पाते और बच्चे इंटरनेट पर उपलब्ध ज्ञान का गलत मतलब निकाल लेते हैं। सचमुच आने वाली पीढ़ी के लिए यह बहुत भयावह स्थिति है। वैसे लिव-इन को कानूनी मान्यता देना हमारे संस्कार के विरुद्ध है, इसका साफ-साफ अर्थ ये कि हम पाश्चात्य रंग में रंग गए। ऐसा पाश्चात्य में एक कानून था जो शादी के पहले सेक्स को निषेध करता था। यूरोप में फौर्नीकेशन नाम का कानून था जिसमें विवाह बिना सैक्स अपराध था। आज इस पर समाज के साथ-साथ माता-पिता और सरकार को भी सोचने की आवश्यकता है।

रही सही कसर वेब सीरीज और चलचित्र निकाल दे रहे हैं। बहुत दुखद और भयावह स्थिति है। संस्कार को आज दकियानूसी की निशानी बताया जा रहा है। आधुनिकता में भी एक तरह का दकियानूसीपन ही चल रहा है । लिव-इन में हो तो जब रिश्ता टूट जाये तो अलग हो जाओ बिना किसी झगड़े के लेकिन ऐसा भी नहीं करेंगे । लड़-झगड़ कर भी चिपके रहेंगे । फिर पीछा छुड़ाने के लिए हत्या तक पर उतर आएंगे । मनुष्य को पहचानने की कोई क्षमता नहीं है । जीवन में संघर्ष किया नहीं । बस किसी तरह कमाने लगे, बाल कटा कर ख़ुद को आधुनिक समझ नशा और सेक्स को आज़ादी समझ परिवार और रिश्तों को नकार खुद को आधुनिक समझने का भ्रम पाले हैं । यह अधकचरे ज्ञान वाली, पढ़ी-लिखी जाहिल युवा पीढ़ी है ।

समझदार युवा पहले अपना कैरियर बनाते हैं फिर भले ही अपनी मर्जी से शादी या प्रेम करते हैं । ये तो वासनाओं, इच्छाओं के वशीभूत केवल नशा, सेक्स, आधुनिक रहन सहन के नाम पर कुछ भी खाना कुछ भी पिना परिवार से दूरी को ही आज़ादी समझने वाले लोग हैं जो एक तरह से मनोरोगी, विक्षिप्त हैं और समाज के लिए अवांछनीय, गैर सामाजिक तत्व बनते जा रहे हैं ।

           इस का दोषी जितना युवा है, उससे कम दोषी उसका परिवार , समाज , प्रशासन और सरकार नहीं है। हमें अपने नीति और नीयत पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। हम अपना दोष पश्चिमी सभ्यता या किसी अन्य के सर नहीं मढ़ सकते। हमें अपनी भावी पीढ़ी को विश्वास में लेकर चलना चाहिए। ऐसा क्या है जो कार्यालयों में लोग अधिकारी की बात मानते हैं और जिस घर परिवार ने उन्हें या हमें सब कुछ दिया तथा भरन पोषण किया, उसे नजरंदाज करते हैं। उसका विरोध भी करते हैं। इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? घर परिवार या समाज और सरकार द्वारा बनाई गई कानून व्यवस्था।

           पहले बहुत जाँच पड़ताल के बाद रिश्ते हुआ करते थे । अब सब फ़ास्ट हो गया है। सब हर बात के लिए इसी भागमभाग में लगे हैं कि कहीं बढ़िया मौका चूक न जाएं, दौड़ में पीछे न रह जाएं। स्पीड में तरक्की वैभव सुख मज़ा सब पा लेने को आतुर युवक युवतियां अंधाधुंध दौड़ रहे हैं, भूल जाते हैं कि मुंह के बल गिर भी सकते हैं। ये पश्चिम नहीं.संस्कारों की चिकनी चट्टान बहुत चोट पहुंचा सकती है. युवाओं को अब रुककर, थोडा़ सोचने की ज़रूरत है नहीं तो इसके गलत परिणाम सबके सामने है। अब विचार आपको करना है कि आगे क्या करना है। (युवराज)

   डॉ.नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी

SPECIAL STORY – क्या भारत जनसंख्या में सचमुच चीन को पछाड़ देगा ?

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  • अश्विनी कुमार मिश्र 

संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार 15 नवंबर विश्व की जनसंख्या  800 करोड़ तक पहुँच गई हैइस आबादी विस्तार में  चीन और भारत  का सबसे बड़ा हिस्सा हैं। दिलचस्प बात यह है कि इसी रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र ने भी भविष्यवाणी की है कि भारत चीन को पीछे छोड़ देगा और जनसंख्या के मामले में दुनिया में पहले स्थान पर जाएगा। इस पृष्ठभूमि में संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट क्या है? इसमें व्यक्त की गई भविष्यवाणियां वास्तव में क्या हैं? जनसंख्या के मामले में चीन को पछाड़ कर कब नंबर वन बनेगा भारत? और जनसंख्या के बारे में माल्थस का सिद्धांत क्या है

 संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार 15 नवंबर विश्व की आबाद 800 करोड़ तक पहुँच गई है. इसमें चीन और भारत का योगदान बड़ा है.  यह भी अनुमान है कि विश्व की जनसंख्या 2030 तक 850 करोड़, 2050 तक 970 करोड़ और 2100 तक 1040 करोड़ हो जाएगी। 2080 में दुनिया की आबादी चरम पर होगी। 2100 के बाद जनसंख्या घटने लगेगी।

भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश कब बनेगा?

संयुक्त राष्ट्र संघ की इस रिपोर्ट में अलग-अलग भविष्यवाणी की गई हैं । इसने यह भी भविष्यवाणी की गई है कि साल 2023 में चीन को पछाड़कर मौजूदा दर से आबादी में भारत नंबर वन देश बन जाएगा।2050 तक विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वृद्धि केवल आठ देशों में होगी। इसमें कांगो, मिस्र, इथियोपिया, भारत, नाइजीरिया, पाकिस्तान, फिलीपींस और तंजानिया शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक विश्व जनसंख्या संभावना रिपोर्ट सोमवार (14 नवंबर) को विश्व जनसंख्या दिवस पर प्रकाशित हुई थी। इसमें ये सभी भविष्यवाणियां की गई हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वर्तमान जनसंख्या वृद्धि दर 1950 के बाद से सबसे कम है। 2020 में जनसंख्या वृद्धि दर 1 प्रतिशत से भी कम थी।

दुनिया की आबादी को 700 करोड़ से 800 करोड़ होने में कुल 12 साल लगे। अब इस आबादी को 800 से बढ़ाकर 900 करोड़ करने में 15 साल लगेंगे। यानी साल 2037 में 900 करोड़ आबादी पहुंच जाएगी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके कारण विश्व की जनसंख्या वृद्धि दर धीमी हो गई है।

ब्रिटिश अर्थशास्त्री थॉमस रॉबर्ट माल्थस ने जनसंख्या वृद्धि पर एक सिद्धांत प्रतिपादित किया। उसका नाम माल्थस थ्योरी है। माल्थस के सिद्धांत के अनुसार जनसंख्या प्रत्येक 25 वर्ष में दोगुनी  हो जाती है। जबकि संसाधन सामान्य दर से बढ़ते हैं तो जनसंख्या वृद्धि दर दोगुनी हो जाती है। उदा. यदि जनसंख्या 2 से 4 और 4 से 8 हो जाती है, संसाधन 2 से 3 और 3 से 4 हो जाता है।

जनसंख्या वृद्धि के प्रभाव
माल्थस के सिद्धांत के अनुसार यदि जनसंख्या तेजी से बढ़ती है तो संसाधन कम होने लगते हैं। इससे भोजन और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव पड़ता है। माल्थस का कहना है कि ऐसी स्थिति में जनसंख्या नियंत्रण के लिए स्वतः ही प्राकृतिक घटनाएं घटित होती हैं। उदा. जनसंख्या को सूखा, महामारी, युद्ध और प्राकृतिक आपदाओं जैसी घटनाओं द्वारा नियंत्रित किया जाता है। हालाँकि, माल्थस के सिद्धांत की कई बार आलोचना की गई है।

जनसंख्या वृद्धि के पीछे कारण

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, उपचार और प्रौद्योगिकी में प्रगति सार्वजनिक स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता और चिकित्सा को अधिक सुलभ बना रही है। इसके कारण महामारी की दर में कमी आई है। महामारी हो भी जाए तो मरने वालों की संख्या पहले से कम है, क्योंकि इलाज उपलब्ध है। स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण जीवन प्रत्याशा बढ़ी है। इससे मृत्यु दर में कमी आई है और जनसंख्या में वृद्धि हुई है।

“पटाया-थाईलैंड में चल रहे अंतरराष्ट्रीय परिवार नियोजन सम्मेलन में बोलते हुए, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. नतालिया कानेम ने यह जानकारी दीकि जनसंख्याँ की रफ़्तार कई कारणों से तेज है. और 15 नवंबर जनसंख्याँ के लिहाज से विश्व के लिए ऐतिहासिक दिन होगाजब विश्व की आबादी 800 करोड़ हो गयी.   उन्होंने कहा कि ‘आठ’ अंक सांकेतिक है। यदि इसे क्षैतिज रूप से घुमाया जाए तो अनंत की तस्वीर बनती है। इस संख्या को पार कर रही दुनिया में महिलाओं और लड़कियों के लिए विकास की अनंत संभावनाएं पैदा की जानी चाहिए।” (युवराज)

अश्विनी कुमार मिश्र 

बच्चों को मोबाइल से बचाएं

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आशीष वशिष्ठ का कॉलम/ बात कुछ ऐसी है

विकास और प्रौद्योगिकी के इस बदलते दौर में मोबाइल हमारे जीवन का एक अहम अंग बन गया है। एक पल के लिए भी कोई इसे स्वयं से दूर नहीं करना चाहता है। इसी का परिणाम है कि माता-पिता की देखा-देखी आज छोटे-छोटे बच्चे भी इसके आदी हो गए हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि लाड-प्यार के कारण आपने जिस उपकरण को अपने बच्चे की जीवन में शामिल किया है, आगे चलकर वह आपके बच्चे की शारीरिक और मानसिक समस्याओं का कारण बन सकता है।

कोरोना महामारी के दौर में ऑनलाइन पढ़ाई ने बच्चों को मोबाइल फोन का गुलाम बना दिया। अब बच्चों की आदत इतनी बिगड़ गई है कि कुछ देर के लिए उन्हें मोबाइल फोन न मिले तो उनमें चिड़चिड़ापन, बेचैनी, घबराहट, गुस्सा, व्यवहार में आक्रामकता, बातचीत ही बंद कर देना या खाना छोड़ देने जैसे लक्षण सामने आ रहे हैं। स्मार्ट फोन के हाथ में आते ही उनका मूड ठीक हो रहा है। मोबाइल की लत से बच्चों की दैनिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं।

स्कूल से आते ही बच्चे मोबाइल फोन में ही लगे रहते हैं। इससे आंखों पर बुरा असर तो पड़ ही रहा है, मानसिक विकार भी आ रहे हैं। मनोचिकित्सकों के अनुसार जागरूक अभिभावक तो काउंसलिंग करवा रहे हैं, लेकिन कुछ इन लक्षणों को अनदेखा कर रहे हैं। स्कूल बंद होने से ऑनलाइन पढ़ाई का फायदा हुआ था, लेकिन अब मोबाइल की लत नुकसानदायक साबित हो रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों और किशोरों में मोबाइल की लत मानसिक रोगी बना सकता है। ऐसे में अभिभावक को बहुत अधिक सावधान रहने की जरूरत है। मोबाइल फोन पर बहुत अधिक गेम खेलना, दिनभर वीडियो देखते रहना या इसका किसी भी रूप में बहुत अधिक प्रयोग, उनके स्वास्थ्य के लिए अति नुकसानदायक है।

डाक्टरों के अनुसार मोबाइल ज्यादा इस्तेमाल करने से बच्चों में डिप्रेशन, अनिद्रा और चिड़चिड़ापन जैसी मानसिक समस्याएं बढ़ रही हैं। बच्चों में सिर और आंखों में दर्द, भूख न लगना, आंखों की रोशनी कम होना, गर्दन में दर्द जैसी शारीरिक बीमारियां हो रहीं हैं। वहीं अत्यधिक मोबाइल इस्तेमाल से बच्चों में अवसाद और निराशा तेजी बढी है। बच्चे आभासी दुनिया को ही वास्तविक दुनिया समझ बैठे हैं। साथ ही इनको ई-स्पोर्ट के चलते अन्य शारीरिक बीमारियां भी देखने में मिल रही हैं। इसके अलावा इंटरनेट पर फैली अश्लीलता इनके मन मस्तिष्क को को दूषित कर रही है।

छोटे-छोटे बच्चे और किशोर जिस तरह से जघन्य अपराधों में लिप्त होते जा रहे हैं, वह गंभीर चिंता का विषय है। जाहिर है, सोशल मीडिया, इंटरनेट और इलेक्ट्रानिक गैजेट के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के दुष्प्रभाव हैं ये सब। यही कारण है कि बच्चों में नैतिकता की गिरावट साथ ही आदर्श व्यवहार की कमी बड़े रूप में देखी जा सकती है। मोबाइल का कम इस्तेमाल ठीक है, अन्यथा यह लत है। मूड ठीक करने के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल भी ऐसा ही है, जैसे ड्रग्स व्यवहार को प्रभावित करती है।

चिकित्सकों की माने तो बच्चों में मोबाइल की लत को दूर करने के लिए परिवार में अनुशासन जरूरी है। बच्चों को एक निर्धारित समय के लिए मोबाइल फोन के इस्तेमाल के लिए कहा जा सकता है। बच्चों को आउट डोर या इंडोर खेलकूद या दूसरी रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रेरित करें। पेरेंट्स बच्चों को घर से बाहर घूमने टहलने ले जाएं। अच्छी कहानियां सुनाएं। मोबाइल की आदत को छुड़ाने के लिए उन पर प्रतिबंध भी लगाना जरूरी है।

अभिभावक स्वयं भी मोबाइल के इस्तेमाल में सावधानी बरतें। दिनों दिन गंभीर होती इस समस्या के प्रति अभिभावकों को ध्यान देना होगा कि बच्चे इंटरनेट और मोबाइल का उपयोग कितना और किस उद्देश्य से कर रहे हैं। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो समाज के लिए यह किसी आपदा से कम नहीं होगा। (युवराज)

– आशीष वशिष्ठ 

जी 20 देशों के सम्मेलन में भारतीय कूटनीति की जो धाक दिखी, क्या दुनिया के देश भारत की तरफ एक उम्मीद की नजर से देख रहे हैं?

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अशोक भाटिया

जी-20 देशों के सम्मेलन का इंडोनेशिया के खूबसूरत शहर बाली में समापन हो गया और अगले वर्ष के लिए इसकी अध्यक्षता भारत को सौंप दी गई। जी 20 शिखर सम्मेलन के डिक्लेरेशन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्पष्ट छाप दिखाई दी। ‘ये युग युद्ध का नहीं’, का जो संदेश प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के प्रेसिडेंट व्लादिमीर पुतिन से बातचीत के दौरान दिया था, उसे बाली डिक्लेरेशन में जगह दी गई है। यह बात बहुत महत्वपूर्ण है। ये गांधी, बुद्ध और महावीर का देश है जहां अहिंसा और शक्ति की बात होती है, शांतिपूर्ण तरीके से सारी बातें निपटाने की।


दूसरी बात ये वक्त युद्ध का नहीं है। निश्चित रूप से जो बड़ा संकट आज दुनिया में आया हुआ है, चाहे वो खाद्य सुरक्षा की बात हो, चाहे वो विद्युत या ऊर्जा सुरक्षा की बात हो, या बाकी जो दूसरे हेल्थ इशूज हैं या इन्फ्लेशन है, पॉवर्टी है, ये कुछ ना कुछ हद तक जो अभी कॉनफ्लिक्ट चल रहे हैं दुनिया में। खासकर रशिया और यूक्रेन के बीच कॉन्फ्लिक्ट हो रहा है, उससे खाद्य और ऊर्जा का संकट बढ़ता जा रहा है। बाकी जो कॉन्फ्लिक्ट चीन के साथ ताइवान, साउथ चाइना सी में ले लीजिए या ईरान-इजरायल का कॉनफ्लिक्ट देखिए, या पाकिस्तान-तालिबान का देख लीजिए। बाकी जो दूसरे इश्यूज हैं, जिसमें देशों को सुरक्षा के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ता है, हथियारों के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है, जो बेसिक सुविधाएं हैं वो जिसमें आप हेल्थ की कहिए, मेडिसिन हुआ, एजुकेशन हुआ, पॉवर्टी एलिवेशन हुआ, जो बेसिक नीड्स हैं, उसकी तरफ से ध्यान हट रहा है।

मोदी जी ने सटीक बात कही है कि ये युग युद्ध का युग नहीं है। ये युद्ध, जो गैर परम्परागत चुनौतियां हैं, उनसे निपटने का है। जैसे कि अब जी 20 का अगला अध्यक्ष भारत है। भारत को एक मौका है कि जो गैर परंपरागत चुनौतियां हैं समाज के सामने, विश्व के सामने। उनके साथ भारत के लीडरशिप में लड़ा जाए। भारत, जो वसुधैव कुटुंबकम की बात करता है, वन विलेज, वन वर्ल्ड की बात करता है, ये साबित करने के तरफ अग्रसर किया जाए, क्योंकि भारत एक सॉफ्ट पावर है। भारत एक लॉ अबाइडिंग कंट्री है। भारत दुनिया की लार्जेस्ट फंक्शनल डेमोक्रेसी है। ये मैसेज भारत हमेशा देना चाहता है कि कोई भी संकट का समाधान हमें डायलॉग और डिप्लोमैसी के माध्यम से करना चाहिए, युद्ध के माध्यम से नहीं करना चाहिए। साथ साथ यही बातें भारत ने जी 20 सम्मेलन में भी कहीं।

ऐसे में जी 20 सम्मेलन में भारतीय कूटनीति की जो धाक दिखी, उससे दुनिया के देश भारत की तरफ एक उम्मीद की नजर से देख रहे हैं . इसके आलावा बड़ी बात ये है कि भारत की जो विदेश नीति है, उसमें मोटे तौर पे भारत में सर्व सम्मति है कि भारत जो विदेशों के साथ संबंध बना रहा है, डेवेलप कर रहा है, वो सबको मान्य है।

भारत ने सम्मेलन में गुजरे कोरोना संकट व जलवायु परिवर्तन को विश्व की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा विनाशक बताते हुए कहा कि इससे विभिन्न देशों के बीच की विभिन्न वस्तुओं की सप्लाई या आपूर्ति शृंखला टूट गई जिसकी वजह से उपभोक्ता वस्तुओं की कमी महसूस होने लगी।

अतः कोरोना के बाद नयी विश्व व्यवस्था की जरूरत महसूस हो रही है। भारत का यह शुरू से ही मानना रहा है कि जलवायु परिवर्तन के खतरे को देखते हुए जिस प्रकार गरीब या विकासशील कहे जाने वाले देशों पर विकसित देशों द्वारा प्रकृति के साथ की गई छेड़छाड़ या आधुनिकतम वैज्ञानिक विधियों द्वारा प्रदूषित गैसों के अत्याधिक उत्सर्जन का विपरीत असर हुआ है, उसकी भरपाई अमीर देशों को ही करनी चाहिए जिससे ये देश अपने विकास के लिए वैकल्पिक तरीकों का उपयोग करने में सक्षम हो सकें परन्तु सम्मेलन ने इस बारे में कोई फैसला नहीं किया है जबकि जलवायु परिवर्तन का विनाशकारी असर विकासशील देशों पर ही पड़ रहा है।

इसके साथ यह भी सत्य है कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत सबसे ज्यादा प्रभावी देश माना जाता है। इस सम्मेलन से एक तस्वीर और साफ हो रही है कि वर्तमान विश्व परिस्थितियों में बहुदेशीय सहयोग व सहकार के साथ ही द्विपक्षीय आधार पर सहयोग की दिशा में भी देश आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं।

Photo – ANI

प्रधानमन्त्री श्री मोदी का चीनी राष्ट्रपति के साथ बातचीत का सुनिश्चित कार्यक्रम तो तय नहीं हो पाया मगर रात्रि भोजन के अवसर पर जिस तरह दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के साथ अनौपचारिक बातचीत की उससे दोनों देशों के बीच चल रहे तनाव में कमी जरूर आनी चाहिए। श्री मोदी ने जून 2020 में हुए लद्दाख के गलवान घाटी संघर्ष के बाद पहली बार शी जिनपिंग से व्यक्तिगत बातचीत की।

यह तथ्य स्वयं में बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी वर्ष के सितम्बर महीने में दोनों नेता ‘शंघाई सहयोग संगठन’ सम्मेलन में भी मिले थे मगर दोनों के बीच शिष्टाचार बातचीत तक नहीं हो सकी थी। बाली में श्री मोदी ने पहल करके जिस तरह शी जिनपिंग को पकड़ा उससे साफ जाहिर होता है कि भारत चीन से अपनी बात पुरजोर तरीके से करने का इच्छुक है।

श्री मोदी ने ब्रिटेन के नव निर्वाचित प्रधानमन्त्री श्री ऋषि सुनक से भी द्विपक्षीय वार्ता की। श्री सुनक इसी सम्मेलन के दौरान रूस को एक बेतरतीब देश तक कह चुके हैं। जाहिर है कि इस मुद्दे पर भारत का पूरी तरह भिन्न मत है क्योंकि रूस भारत का सबसे सच्चा व पक्का मित्र है।

श्री सुनक रूस के खिलाफ कड़े प्रतिबंध लगाने के भी हिमायती हैं जबकि भारत का रुख ठीक इसके विपरीत रहा है परन्तु हकीकत यह है कि जी-20 देश रूस से आयातित ऊर्जा व कच्चे तेल पर प्रतिबन्ध लगाने के सपने को भी पूरा नहीं कर सके हैं। यहां भारत की कूटनीति ने कमाल दिखाया है। श्री मोदी ने फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों से भी मुलाकात की। इसके अलावा वह जर्मन चांसलर ओलाफ शोल्ज, आस्ट्रेलिया के प्रधानमन्त्री एंथोनी अल्बानीज से भी मिले। साथ ही कुछ अन्य देशों के प्रमुखों के साथ भी मुलाकात की। इसका सीधा मतलब यही निकलता है कि विश्व के विभिन्न देश द्विपक्षीय सम्बन्धों की गरमाहट के आधार पर विश्व व्यवस्था में बदलाव की राह देख रहे हैं। भारत एक जमाने से विकासशील देशों का अगुवा रहा है, अतः वह अपनी भूमिका का निर्वाह दुनिया के एक समान विकास के रूप में करने की राह पर ही है।

जी20 में रूस को लेकर भारत के स्‍टैंड का लोहा अमेरिका और चीन ने भी माना। इस सम्मेलन के जरिये प्रधानमंत्री मोदी ने दुनिया को यह दिखा दिया कि भारत G-20 की अध्‍यक्षता मजबूती से करने को तैयार है। उन्‍होंने कहा कि G-20 में प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह से बेबाकी से भारत का पक्ष रखा, उससे यह संदेश गया कि 21वीं सदी का भारत एकदम अलग है।

इससे अंतरराष्‍ट्रीय जगत में भारत की एक अलग साख और पहचान बनी है। अंतरराष्‍ट्रीय जगत में भारत की धाक जमी है। खास कर तब जब, दिसंबर में भारत G-20 की अध्यक्षता का जिम्मा ले रहा है। यह ऐसा समय है, जब दुनिया जंग, गृहयुद्ध, आर्थिक मंदी और ऊर्जा की बढ़ी हुई कीमतों और महामारी के दुष्प्रभावों से जूझ रही है। ऐसे समय विश्व G-20 में भारत की भूमिका को भी उम्‍मीद की नजरों से देखा जा रहा है।

प्रधानमंत्री ने दुनिया को यह भरोसा दिलाया कि वह G20 का नेतृत्‍व करने में पूरी तरह से सक्षम है। मोदी ने कहा कि विश्व G20 की तरफ आशा की नजर से देख रहा है। मोदी ने यह संकेत दिया कि भारत की मजबूत लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था, देश की अद्भुदता, विविधता, समावेशी परंपराओं और सांस्कृतिक समृद्धि का पूरा अनुभव मिलेगा। मोदी ने दुनियाभर के नेताओं से मिलकर उनको यह विश्‍वास दिलाया कि G20 की अध्‍यक्षता की जो जिम्‍मेदारी भारत को मिली है, उसको वह पूरी तरह से निभाने के लिए तैयार है  देखा जाय तो भारतीय हितों के लिहाज से G20 की यह बैठक बेहद उपयोगी रही।

प्रधानमंत्री मोदी ने इस मंच का पूरा कूटनीतिक लाभ उठाया। इस दौरान उन्‍होंने कई वैश्विक नेताओं के साथ द्विपक्षीय वार्ता कर भारत के पक्ष को रखा। मोदी ने फ्रांस के राष्‍ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ द्विपक्षीय वार्ता की। इस दौरान अमेरिकी राष्‍ट्रपति जो बाइडन के साथ उनकी शानदार केमिस्‍ट्री देखने को मिली। दोनों नेताओं ने एक दूसरे का गर्मजोशी के साथ स्‍वागत किया था ।

यूक्रेन जंग के बाद अमेरिका, भारत की तटस्‍थता की नीति से खफा चल रहा है।प्रधानमंत्री मोदी की जर्मन चांसलर ओलाफ शोल्‍ज के साथ द्विपक्षीय बैठक की। इसके साथ उन्‍होंने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक के साथ लंबी वार्ता की। दोनों नेताओं ने व्‍यापक साझेदारी को लेकर समीक्षा की। इस क्रम में मोदी और इटली में उनके समकक्ष के साथ भी द्विपक्षीय वार्ता हुई। चीन के राष्‍ट्रपति के साथ द्विपक्षीय वार्ता नहीं हुई, लेकिन मोदी और चीन के राष्‍ट्रपति शी चिनफ‍िंग के साथ गर्मजोशी के साथ मुलाकात हुई। मोदी को मिल रहे सम्‍मान और रुतबे को चीन के राष्‍ट्रपति शी चिनफ‍िंग ने अपने आंखों से देखा। भारत की अंतरराष्‍ट्रीय जगत में क्‍या साख है इसे चिनफ‍िंग महसूस कर रहे होंगे।

(युवराज) अशोक भाटिया

T20 Cricket World Cup: टी20 क्रिकेट वर्ल्ड कप : हार तो हुई मगर

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– अमित कुमार अम्बष्ट आमिली ” आमिली “

टी20 क्रिकेट वर्ल्ड कप में भारत की हार ने निश्चित तौर पर भारत के क्रिकेट फैन्स को निराश किया, कहते है कि भारत में क्रिकेट एक धर्म है , जहाँ अच्छे प्रदर्शन पर खिलाड़ी देवता की तरह पूजे जाते हैं लेकिन ठीक इसके विपरीत खराब प्रदर्शन पर यह सोशल मीडिया में ट्रोलिंग का दौर भी है, अर्थात खराब प्रदर्शन पर खिलाड़ियों को अपने ही फैन्स की तीखी आलोचना भी झेलनी पड़ती है , इस वर्ल्ड कप का जैसा की प्रोमो भी था , ” दिल से रिक्वेस्ट है, इस बार जीतकर भुला दो पिछली हार और खत्म करो इंतज़ार.” देशवासियों को बहुत उम्मीद थी कि इस बार वर्ल्ड कप का इंतजार खत्म होगा और कप्तान रोहित शर्मा , महेन्द्र सिंह धोनी की तरह ही देश का परचम आस्ट्रेलिया से लहरा कर लौटेंगे, लेकिन अफ़सोस ऐसा हो न सका और भारत सेमीफाइनल मैच में इंग्लैंड के हाथों पराजित होकर टूर्नामेंट से बाहर हो गया , इस हार के कई प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कारण हो सकते हैं ,  लेकिन रोहित शर्मा की कमजोर कप्तानी, टूर्नामेंट से पहले ही भारत ही नहीं विश्व के बेहतरीन गेंदबाज जसप्रीत बुमरा  और ऑलराउंडर रविन्द्र जडेजा का चोटिल हो जाना टीम को खलता रहा , ओपनर के तौर पर रोहित शर्मा और लोकेश राहुल की जोड़ी भी कोई बड़ा कमाल नहीं दिखा सकी , रोहित शर्मा वीकेटकीपर के तौर पर दिनेश कार्तिक का इस्तेमाल करें या फिर युवा वीकेटकीपर बल्लेबाज ॠषभ पंत का खिलाएं इसमें भी उलझे दिखे , युजबेन्द्र चहल जैसे वीकेट टेकर स्पीनर को पूरे टूर्नामेंट में रोहित शर्मा ने टीम में शामिल करना जरूरी नहीं समझा और तकरीबन तमाम गेंदबाजों का लचर प्रदर्शन जारी रहा , टीम इंडिया सेमीफाइनल में टूर्नामेंट से बाहर हो गयी ,  मगर ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि टीम इंडिया ने इस टूर्नामेंट से कुछ भी हासिल नहीं किया , भारतीय टीम भी इस टूर्नामेंट से खाली हाथ नहीं लौटी , अगर पूरे टूर्नामेंट पर एक सकारात्मक दृष्टि डाले तो टीम इंडिया ने भी इस टूर्नामेंट से बहुत कुछ हासिल किया है ।सेमीफाइनल में भले भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में छह विकेट गंवाकर 168 रन बनाए। जवाब में इंग्लैंड की टीम ने 16 ओवर में बिना कोई विकेट गंवाए लक्ष्य हासिल कर लिया लेकिन अगर सेमीफाइनल को छोड़ दें तो इससे पहले टीम इंडिया का प्रदर्शन औसतन बढिया ही रहा ।

     भारत के प्रमुख गेंदबाज जसप्रीत बुमरा की अनुपस्थिति में टीम इंडिया को अर्शदीप सिंह जैसा युवा गेंदबाज मिला , जिसने तकरीबन प्रत्येक मैच में अपनी छाप छोड़ी , अशर्दीप सिंह ने छह मैचों में 10 विकेट लिया और उनकी इकोनॉमी 7.80 की रही। यह इकोनॉमी इसलिए खास है क्योंकि उनसे डेथ ओवर्स में गेंदबाजी कराई गई। अर्शदीप में बाय हाथ के तेज गेंदबाज की सभी खूबियां दिखीं , आगे चलकर अर्शदीप भारत के मुख्य गेंदबाज बन सकते हैं इसमें कोई दोराय नहीं है , डेथ ओवर्स में लगातार याॅरकर डालकर  उन्होंने साबित किया कि दबाब में भी वो अच्छा प्रदर्शन कर सकते है । अर्शदीप का इस टूर्नामेंट में सबसे बेहतर प्रदर्शन 32 रन देकर  3 विकेट लेने का रहा ।भविष्य में भारतीय टीम को अर्शदीप सिंह से बहुत उम्मीदें हैं।

     इस टूर्नामेंट में दूसरी सबसे अच्छी बात रही कि किंग कोहली जो लगातार अपनी फार्म से जूझ रहे थे उन्होंने इस टूर्नामेंट में शानदार वापसी की , नवंबर 2019 के बाद से विराट कोहली कोई शतकीय पारी नहीं खेल पाए थे ,  2019 के बाद 2022 सितंबर में एशिया कप में अफगानिस्तान के खिलाफ शतक लगाने में सफल हुए , एशिया कप के बाद टी20 वर्ल्ड कप में विराट कोहली अपने पुराने रंग में नजर आए , टी20 वर्ल्ड कप में उन्होंने कई महत्वपूर्ण पारियां खेलीं , पाकिस्तान के खिलाफ कोहली ने अपने दम पर मैच जिताया , इस वर्ल्ड कप में उन्होंने छह मैचों में 98.66 की औसत और 136.40 के स्ट्राइक रेट से 296 रन बनाए ,  इतना ही नहीं छह में से चार मैचों में कोहली ने अर्धशतक जमाया , कोहली टी20 विश्वकप में दो बार सबसे ज्यादा रन बनाने वाले इकलौते बल्लेबाज बने. उन्होंने इस बार 6 मैचों में 296 रन बनाए, इससे पहले टी20 विश्वकप 2014 में भी सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज रहे थे , इस तरह से विराट कोहली के नाम से एक और  ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज हो गयी है ।

2022  गुजरात टाइटंस फ्रेंचाइजी के कप्तान के तौर पर जिस तरह से हार्दिक पांड्या से खुद को साबित किया , टी20 वर्ल्ड कप में भी उनसे बहुत उम्मीदें थी और टी20 वर्ल्ड कप में भी उन्होंने ठीक वैसा ही किया , पाकिस्तान के खिलाफ हार्दिक ने विराट कोहली के साथ मिलकर विषम परिस्थिति से निकाला , उन्होंने 40 रन की धीमी मगर उपयोगी पारी खेली , इसके बाद इंग्लैंड के खिलाफ सेमीफाइनल में भी हार्दिक की शुरुआत बले धीमी रही लेकिन फिर उन्होंने जब  गियर चेंज किया तो उनकी बैटिंग देखते ही बनती थी , हार्दिक पांड्या ने सेमी फाइनल मैच में 33 गेंदों पर 4 चौके और 5 छक्कों की मदद से 63 रनों की तूफानी पारी खेली ,  हार्दिक ने इस विश्व कप में छह मैचों में 131.95 के स्ट्राइक रेट से 128 रन बनाए , साथ ही आठ विकेट भी लिए , अर्थात हार्दिक ने टीम इंडिया में आलराउंडर का दावा न सिर्फ पेश किया अपितु उनकी सुझबुझ को देखते हुए आम-जन और शायद वरिष्ठ खिलाड़ी भी उनमें कप्तान बनने की क्षमता  देख रहें हैं।

  टी20 वर्ल्ड कप 2022 की बात हो और अपने देशी मिस्टर 360 सूर्यकुमार यादव का नाम नहीं लिया जाए तो शायद बात अधुरी रह जाएगी । 32 वर्ष में टीम इंडिया का हिस्सा बनने के बावजूद सूर्यकुमार यादव ने आज की तारीख में अपनी बैटिग से लाखों फैन्स अर्जित कर लिए हैं  , अगर टी20 वर्ल्ड कप की बात करें तो  कई मैचों में भारत को मुश्किल परिस्थितियों से उन्होंने उबारा है ,  दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ उनकी 40 गेंदों में 68 रन की पारी देखने लायक थी ,  भारत भले ही उस मैच में  हार मिली, लेकिन सूर्यकुमार सूर्य की तरह चमके , मैदान के हर कोने पर साॅट्स लगाकर सूर्यकुमार ने टीम इंडिया में अपनी जगह पक्की कर ली इसमें कोई संदेह नहीं है ।  टी20 वर्ल्ड कप में छह मैचों में 59.75 की औसत और 189.68 के स्ट्राइक रेट से 239 रन बनाए। इसमें तीन अर्धशतक शामिल है।

   कुल मिलाकर कह सकते हैं कि आज हर भारतीय भारतीय क्रिकेट टीम के टी20 वर्ल्ड कप टूर्नामेंट में हार से भले दुखी हो , भले ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भारतीय टीम खाली हाथ लौट गयी लेकिन वास्तव में इस हार के बावजूद भारत ने टी20 वर्ल्ड कप में बहुत कुछ हासिल किया है । (युवराज)

अमित कुमार अम्बष्ट आमिली ” आमिली “

 

देहव्यापार के नए ठिकाने स्पा सेंटर

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देहव्यापार के नए ठिकाने स्पा सेंटर
– आशीष वशिष्ठ 

देश में स्पा सेंटर और मसाज पार्लर के नाम पर देहव्यापार के नए ठिकाने तेजी से पनप रहे हैं। ऊपर लिखा रहता है कि यहां पर मसाज की जाती है लेकिन अंदर सेक्स रैकेट का गंदा खेल होता है। ये कुप्रवृत्ति बड़ी तेजी से देश के हर छोटे—बड़े शहर में फैल रही है। ग्राहकों को लुभाने के लिए व्हाट्स एप ग्रुप बनाया जाता है जिसमें युवतियों की फोटो डाली जाती और यह वायदा किया जाता है कि मसाज पार्लर में आने पर मसाज के अलावा उन्हें सैक्सुअल फेवर भी मिलेंगे। ग्राहकों की भीड़ को बढ़ाने के लिए मसाज के पैकेज भी बनाए जाते हैं।

जानकारों के मुताबिक, मोटा मुनाफा मिलने की उम्मीद में एस्कोर्ट सर्विस प्रोवाइडरों ने स्पा सेंटरों की शुरुआत की थी। क्योंकि एस्कोर्ट सर्विस प्रोवाइडरों को कॉल गर्ल्स प्रोवाइड कराने व नाइट शिफ्ट में ज्यादा खर्चा आने की वजह से एस्कॉर्ट सर्विस का धंधा फ्लॉप होने लगा था। वहीं मुनाफा भी ज्यादा नहीं थी। जबकि स्पा एंड मसाज सेंटर की आड़ में सेक्स रैकेट चलाने में उन्हें मोटा मुनाफा मिलता था।

स्पा एंड मसाज सेंटरों के संचालक ग्राहकों को लुभाने के लिए आयुर्वेद पद्धित का भी झांसा देते हैं। इसके लिए उन्होंने इस तरह के होर्डिंग्स भी स्पा के बाहर लगाए रहते हैं। वहीं संचालकों ने अपने स्पा सेंटर के नाम भी आयुर्वेद पद्धति के मिलते जुलते नाम से रख रखे हैं, जिससे किसी को भनक न लगे कि यहां जिस्मफरोशी का धंधा चल रहा है।

गत अक्टूबर को कानपुर पुलिस ने में दो स्पा सेंटरों में छापा डालकर 6 लड़कियों और चार युवकों को पकड़ा। वाराणसी पुलिस ने पांडेयपुर क्षेत्र में स्पा सेंटर की आड़ में देह व्यापार के धंधे का भंड़ाफोड़ कर चार युवतियों समेत पांच लोग गिरफ्तार किये।

बीती 1 नवंबर को राजस्थान के अलवर में पुलिस ने एक मॉल में चलने वाले स्पा सेंटरों पर छापा मारकर 21 युवक-युवती पकड़े, इनमें अधिकतर कॉलेज के छात्र थे। इंदौर पुलिस ने बीती 15 सितंबर को स्पा सेंटर की आड़ में सेक्स रैकेट को पकड़ा। पुलिस ने छापा मार 12 लड़कों और 6 लड़कियों को गिरफ्तार किया। बीती 11 अगस्त को हरियाणा के गुरुग्राम में एक स्पा सेंटर की आड़ में सेक्स रैकेट का पुलिस ने भंडाफोड़ करते हुए  चार लोगों को गिरफ्तार किया।

पिछले साल 14 फरवरी यूपी की राजधानी लखनऊ पुलिस ने गाजीपुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले कई मराज पार्लरों में छापेमारी कर 12 लोगों को गिरफ्तार किया। अप्रैल 2017 में लखनऊ के हुसैनगंज क्षेत्र में एक मसाज पार्लर में पुलिस ने छापेमारी में 17 को गिरफ्तार किया। नवम्बर 2017 को लखनऊ पुलिस ने पाॅश कालोनी गोमती नगर में संचालित आयुर्वेदिक स्पा और मसाज पार्लर की आड़ में संचालित सेक्स रैकेट का पर्दाफाश किया था।

बीते साल 28 सितम्बर को नोएडा में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के दिल्ली में तैनात साइंटिस्ट का मसाज करने के दौरान अपहरण हो गया था। आरोपियों ने साइंटिस्ट को छोड़ने की एवज में फिरौती मांगी थी। नोएडा पुलिस ने तीन अपहरणकर्तााओं को गिरफ्तार किया। मार्च 2018 को नोएडा पुलिस ने स्पा और मसाज पार्लर की आड़ में सेक्टर-18 में एक सेक्स रैकेट का भंडाफोड़ किया। पुलिस ने करीब दो दर्जन लोगों को हिरासत में भी लिया था।

देह व्यापार के साथ मसाज पार्लर की आड़ में कई गोरखधंधे हो रहे है। अखबारों में हाई प्रोफाइल लेडीज का मसाज करें जैसे विज्ञापन पढ़ कर कई बेरोजगर युवक इसके जाल में फंसकर अपना पैसा और समय बर्बाद कर रहे हैं। युवतियों को यह कहकर पार्लर ज्वाइन कराया जाता है कि उन्हें अच्छी सैलरी मिलेगी और धीरे-धीरे पैसे का लालच देकर उन्हें देह व्यापार की दलदल में धकेल दिया जाता है।

ऑनलाइन ठग भी स्पा और मसाज के बहाने लोगों को आर्थिक ठगी का शिकार बना रहे हैं। ऐसे कई मामले प्रकाश में आ चुके हैं। स्पा सेंटर के पीछे सफेदपोश, पुलिस और अपराधियों का एक संगठित नेटवर्क है। देहव्यापार के नए अड्डो स्पा सेंटरों पर पुलिस प्रशासन को प्रभावी कार्रवाई कर तत्काल लगाम लगाने की जरूरत है। (युवराज)

आशीष वशिष्ठ