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उत्तरप्रदेश में मायावती की नई चुनौती

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(डॉ. सुधाकर आशावादी -विनायक फीचर्स)

कब कोई राजनीतिक विचार किसी दल को सत्ता का स्वाद चखा दे, अब कब कोई विचार सत्ता से अलग कर दे, यह कोई नहीं जानता। इसी कारण देश की राजनीति में विघटनकारी जातीय गठबंधन की राजनीति कारगर सिद्ध होगी या सोशल इंजीनियरिंग पर आधारित सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय की राजनीति , यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है, किन्तु लंबे समय तक हाशिये पर रहने वाली बहुजन समाज पार्टी एक बार फिर अपनी पूरी शक्ति के साथ लोकतंत्र के चुनावी मैदान में उतर आई है। उत्तर प्रदेश में पिछड़े,दलित और अल्पसंख्यक के नाम पर समाज को बांटने में जुटी समाजवादी पार्टी के लिए यह खतरे की घंटी सिद्ध हो सकता है।

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की स्मृति में लखनऊ में आयोजित सुश्री मायावती की रैली में बसपा समर्थकों ने जिस प्रकार से बसपा की जड़ों को मजबूत करने का जज्बा दिखाया है, उससे लगता है कि गहन मंथन के बाद बसपा नए प्रारूप में उभर कर उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपना दमखम दिखाएगी तथा 2027 में सत्ता में आने का दिवास्वप्न देखने वाली समाजवादी पार्टी तथा अन्य राजनीतिक दलों के लिए नई चुनौतियां खड़ी करेगी।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा की बरसों तक बड़ी उपस्थिति रही है। एक दौर था कि जब प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा हाशिये पर चली गई थी। अपने जातीय समीकरणों के कारण समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी सत्ता का खेल खेलते रहे। सुश्री मायावती ने 18 सितंबर साल 2003 को पहली बार पार्टी की कमान संभाली थी। इसके बाद बसपा सुप्रीमो ने जमकर मेहनत की और चार साल में ही पार्टी के लिए एक ऐसा स्वर्णिम अवसर लाने में सफल हुईं जो इतिहास में दर्ज हो गया। वह साल था 2007 जब उत्तर प्रदेश में पहली बार प्रचंड बहुमत की सरकार बनाई थी। सुश्री मायावती वर्ष 2007 में चौथी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं, यह उनके राजनीतिक जीवन का स्वर्णिम काल था। साल 2003 से लेकर 2024 तक मायावती सात बार पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुकी हैं। वर्ष 2003 से लेकर साल 2024 तक बीएसपी सुप्रीमो ने पार्टी में कई उतार चढ़ाव देखे हैं। वर्तमान में जब उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार पूरी दृढ़ता के साथ गतिशील है तथा विगत लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को अति आत्मिश्वास के कारण अनेक संसदीय क्षेत्रों में हार का सामना करना पड़ा तथा समाजवादी पार्टी की कृपा से कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में कदम रखने की जगह मिली, उसका कारण बसपा की तत्कालीन चुनावों में सक्रिय भागीदारी न होना भी रहा है।

लखनऊ में सुश्री मायावती की हुंकार ने यह जता दिया है, कि आज भी बहुजन समाज के शुभचिंतकों के हृदय में बसपा धड़कती है। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के नाम पर विघटन का खेल खेलने वाली समाजवादी पार्टी के दिन लद गए हैं। समझना चाहिए कि सबका साथ सबका विकास की नीतियां ही राजनीतिक दलों को सत्ता की संजीवनी प्रदान कर सकती हैं। जातीय विघटनकारी षड्यंत्रों को जनता समझ चुकी है। वह किसी भी राजनीतिक दल के विघटनकारी मंसूबों को सफल नहीं होने देगी। बसपा इस बार अपनी नई सोच के साथ यदि चुनाव मैदान में अपना दमखम दिखाती है, तो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय विकल्प के रूप में उभर सकती है। ऐसा समझा जाना चाहिए। (विनायक फीचर्स)

डॉ हेडगेवार सबसे पहले सरसंघचालक

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हिंदू राष्ट्रवाद को आकार देने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे हो गए हैं। महज डेढ़ दर्जन लोगों की पहली शाखा के साथ शुरुआत करने वाला यह संगठन आज देश में सत्ता को मजबूती देने वाली प्रमुख वैचारिक ताकत बन चुका है। संगठन भारत के लोगों में हिंदुत्व की भावना जागृत करने के साथ ही शिक्षा और समाजसेवा में भी अहम योगदान दे रहा है। 100 साल की इस यात्रा में नेतृत्व करने वाली छह हस्तियां ऐसी रही हैं, जिन्हें संघ में सर्वोच्च माना जाता है। यानी सरसंघचालक। इन सरसंघचालकों के बारे में संक्षेप में जानिए

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

  • 27 सितंबर, 1925 को नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। वह 1925-1940 तक इसके सरसंघचालक रहे। वह पेशे से चिकित्सक थे और डॉक्टरजी के नाम से जाने जाते थे। 1920 के दशक के आरंभ में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भागीदार होने के कारण जेल में भी रहे।
  • माधव सदाशिव गोलवलकर
    • 1940-1973 तक संघ के सरसंघचालक रहे। इसी कालखंड में नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी थी, जिसके बाद संघ पर प्रतिबंध लग गया।

    मधुकर दत्तात्रेय देवरस

      • 1973-1994 तक संघ प्रमुख रहे। 12 वर्ष की उम्र में संघ से जुड़े थे। उन्होंने आपातकाल के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में संघ को सीधे तौर पर शामिल किया।

    राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया

      • 1994 से 2000 तक संघ प्रमुख रहे। संघ के एकमात्र गैर-ब्राह्मण प्रमुख। इलाहाबाद विवि में पढ़ाई के दौरान संघ के संपर्क में आए और पूर्णकालिक प्रचारक बने।

    केएस सुदर्शन

    • वर्ष 2000 में संघ प्रमुख बने। कर्नाटक के रहने वाले सुदर्शन ने 2009 में खराब स्वास्थ्य के चलते पद छोड़ा।

    मोहन भागवत

    • साल 2009 से संघ प्रमुख। महाराष्ट्र के अकोला स्थित पंजाबराव कृषि विश्वविद्यालय से पशु चिकित्सा विज्ञान और पशुपालन में स्नातक हैं। संघ प्रचारक बनने के लिए उन्होंने अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई छोड़ दी।

    अहंकार के खिलाफ
    संघ व भाजपा के बीच सहज संवाद और समन्वय के बावजूद भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पिछले साल कहा था कि पार्टी अब उस समय से आगे बढ़ चुकी है जब उसे संघ की जरूरत नहीं है। इस पर भागवत ने भी जवाब दिया था। उन्होंने कहा था कि जनता की सेवा करने वालों में अहंकार नहीं होना चाहिए।

जीवन को सहज, सुंदर और सफल बनाने वाले दस सूत्र

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(विजय कुमार शर्मा-विभूति फीचर्स)

दशहरा केवल रावण दहन का पर्व नहीं, बल्कि यह अपने भीतर छिपे बुरे गुणों को पहचानने और उन्हें मिटाने का अवसर भी है। यह त्यौहार हमें याद दिलाता है कि जैसे भगवान राम ने असत्य पर विजय पाई, वैसे ही हम भी अपने जीवन के संकटों पर काबू पा सकते हैं। इसके लिए हमें कुछ सरल सूत्र अपनाने होंगे, जो हमारे जीवन को सहज, सुंदर और सफल बना देंगे।

1. अहंकार का दहन करें

दशहरा हमें यह सिखाता है कि रावण जैसा महान ज्ञानी और शक्तिशाली व्यक्ति भी केवल अहंकार के कारण नष्ट हो गया। जीवन में यदि हम अभिमान को पालते हैं तो वह धीरे-धीरे रिश्तों को तोड़ता है और समाज से दूर कर देता है। अहंकार हमें सच्चे मित्रों और ईश्वर की कृपा से भी वंचित कर देता है। इसलिए इस पर्व पर संकल्प लें कि भीतर छिपे अहंकार, क्रोध और ईर्ष्या को जलाएँ और विनम्रता को अपनाएँ। विनम्र व्यक्ति ही सबका प्रिय बनता है और हर संकट को सहजता से पार कर लेता है।

2. सत्य का साथ दें

राम की विजय का सबसे बड़ा आधार सत्य था। चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विपरीत क्यों न हों, सत्य का मार्ग कभी छोड़ना नहीं चाहिए। असत्य से मिलने वाली सफलता क्षणिक होती है और अंततः विनाश का कारण बनती है। सत्य का पालन करने से विश्वास और प्रतिष्ठा मिलती है। यह जीवन में ऐसे कवच का काम करता है, जो हमें हर संकट से सुरक्षित रखता है। इसलिए दशहरा के दिन संकल्प लें कि जीवन के हर छोटे-बड़े कार्य में सत्य और ईमानदारी का साथ देंगे।

3. संयम साधें

मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अनियंत्रित मन और वाणी है। यदि हम संयम नहीं रखते तो क्रोध और आवेग के कारण गलत निर्णय ले बैठते हैं। दशहरा हमें याद दिलाता है कि संयम ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है। भोजन, व्यवहार, बोलचाल और इच्छाओं पर नियंत्रण रखने वाला व्यक्ति कभी संकटों में नहीं फँसता। संयमित जीवन से न केवल आत्मबल बढ़ता है बल्कि परिवार और समाज में भी सम्मान मिलता है। इस पर्व पर संकल्प लें कि संयम को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएँगे।

4. धर्म के मार्ग पर चलें

धर्म का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। धर्म का असली स्वरूप है – कर्तव्य, न्याय, सत्य और करुणा। दशहरा हमें प्रेरित करता है कि जीवन की हर परिस्थिति में धर्म का पालन करें। जब हम अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाह करते हैं, तो संकट स्वतः दूर हो जाते हैं। धर्म मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी पराजित नहीं होता, भले ही अस्थायी कठिनाइयाँ आएँ। भगवान राम ने हर परिस्थिति में धर्म का पालन कर यह उदाहरण प्रस्तुत किया।

5. सेवा का भाव रखें

सेवा केवल दान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि दूसरों की पीड़ा समझकर उनकी मदद करना ही सच्ची सेवा है। निःस्वार्थ सेवा करने से मन को शांति मिलती है और समाज में सम्मान भी। सेवा करने वाले व्यक्ति के जीवन में संकट लंबे समय तक टिक नहीं पाते क्योंकि उसके अच्छे कर्म ही उसकी रक्षा करते हैं। दशहरा का यह संदेश हमें याद दिलाता है कि जरूरतमंदों, बीमारों, बुजुर्गों और बच्चों की सेवा करके हम न केवल पुण्य अर्जित करते हैं, बल्कि अपने जीवन को भी सार्थक बनाते हैं।

6. शक्ति और करुणा में संतुलन

जीवन में शक्ति होना जरूरी है, परंतु उसका उपयोग दूसरों को दबाने के लिए नहीं बल्कि रक्षा और सहयोग के लिए होना चाहिए। रावण ने शक्ति का दुरुपयोग किया और अंततः नष्ट हुआ, जबकि भगवान राम ने करुणा और धर्म के लिए शक्ति का प्रयोग किया और आदर्श बने। दशहरा हमें यही शिक्षा देता है कि शक्ति और करुणा का संतुलन ही संकट हरने का सूत्र है। यदि हम शक्तिशाली होकर भी दयालु बने रहें तो समाज हमें आदर देता है और संकट हमारे निकट नहीं आ पाते।

7. सद्ग्रंथों का अध्ययन करें

रामायण, महाभारत और गीता जैसे ग्रंथ केवल कथाएँ नहीं, बल्कि जीवन के मार्गदर्शक हैं। इनका अध्ययन करने से हमें संकटों से जूझने की प्रेरणा और समाधान दोनों मिलते हैं। गीता सिखाती है कि कठिनाइयों में धैर्य कैसे बनाए रखें, रामायण हमें मर्यादा और आदर्श का पाठ पढ़ाती है। सद्ग्रंथों से जुड़कर हम न केवल ज्ञान प्राप्त करते हैं बल्कि जीवन में सही दिशा भी पाते हैं। दशहरा पर संकल्प लें कि प्रतिदिन थोड़ा समय सद्ग्रंथों के अध्ययन को देंगे। यही आत्मबल को दृढ़ बनाता है।

8. परिवार में सौहार्द बढ़ाएं

आज के समय में संकट का एक बड़ा कारण परिवारों में टूटन और कलह है। दशहरा का पर्व हमें यह अवसर देता है कि हम अपने परिवारजनों के साथ मिलकर रिश्तों को और प्रगाढ़ करें। संवाद, प्रेम और विश्वास ही रिश्तों की नींव हैं। यदि परिवार में सौहार्द रहेगा तो संकट कभी भी लंबे समय तक नहीं टिक पाएगा। त्योहारों का उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं, बल्कि परिवार को एक सूत्र में बांधना भी है। इसलिए दशहरा पर पारिवारिक रिश्तों को नई ऊर्जा देने का संकल्प लें।

9. प्रकृति और पर्यावरण का आदर करें

रावण का विनाश हुआ क्योंकि उसने प्रकृति और धर्म का अनादर किया। आज के समय में पर्यावरण संकट सबसे बड़ा खतरा है। यदि हम प्रकृति का सम्मान करेंगे और उसके संसाधनों का संतुलित उपयोग करेंगे तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य बना सकेंगे। पेड़ लगाना, जल संरक्षण करना और प्रदूषण कम करना भी हमारे धर्म का हिस्सा है। दशहरा पर संकल्प लें कि हम पर्यावरण का आदर करेंगे और प्रकृति को देवता की तरह पूजकर उसकी रक्षा करेंगे। यही असली विजय है।

10. आत्मचिंतन व साधना करें

संकट तभी बड़ा लगता है जब मन अस्थिर और नकारात्मक हो। आत्मचिंतन और साधना से मन को स्थिर किया जा सकता है। प्रतिदिन कुछ समय ध्यान, प्रार्थना और मौन में बैठकर अपने जीवन का मूल्यांकन करें। इससे हमें अपनी गलतियों का बोध होगा और सुधार का अवसर भी मिलेगा। साधना से आत्मबल और धैर्य बढ़ता है, जो किसी भी कठिनाई को पार करने में सहायक होता है। दशहरा पर यह संकल्प लें कि प्रतिदिन आत्मचिंतन और साधना को जीवन का हिस्सा बनाएँगे।

दशहरा केवल बाहरी रावण को जलाने का नहीं, बल्कि अपने भीतर के रावण को पराजित करने का पर्व है। यदि हम इन दस सूत्रों को जीवन में अपनाएँ, तो हर संकट को अवसर में बदल सकते हैं और सच्चे अर्थों में विजय प्राप्त कर सकते हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि धर्म, सत्य, संयम और करुणा से ही स्थायी शांति और सफलता मिलती है। आइए, इस दशहरा हम अपने भीतर छिपी नकारात्मकताओं को जला कर उज्ज्वल और सकारात्मक जीवन की ओर बढ़े। (विभूति फीचर्स)

संकल्प, साधना, सेवा और समर्पण का प्रतीक है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ

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(विष्णु दत्त शर्मा-विनायक फीचर्स)

देश में संगठन और आंदोलन आते-जाते रहे हैं। कुछ समय के साथ क्षीण हुए तो कुछ परिस्थितियों की आँधियों में बह गए और कुछ अपने मूल ध्येय को भूलकर अस्तित्वहीन हो गए। परंतु विश्व के संगठनात्मक इतिहास में शायद ही ऐसा कोई उदाहरण मिलता हो,जिसने न केवल सौ वर्षों की यात्रा की हो, बल्कि अनेक बार प्रतिबंधों, आलोचनाओं और वैचारिक हमलों के बावजूद अपने मूल ध्येय पर अडिग रहते हुए निरंतर विकास किया हो। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी अनूठे उदाहरण के रूप में आज शताब्दी वर्ष मना रहा है। संघ के साथ हमेशा अदृश्य चुनौतियां भी रही है। तीन बार प्रतिबंध भी लगाया गया। किंतु, इतिहास साक्षी है कि प्रत्येक अवरोध के बाद संघ पहले से अधिक समर्थ व ऊर्जावान होकर उभरा। यह उसकी संगठनात्मक दृढ़ता और वैचारिक स्पष्टता का प्रमाण है। संघ-यात्रा केवल इस संगठन की ही नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, हिन्दुत्व और सनातन संस्कृति की स्वाभाविक सहयात्रा भी है।
अपनी ध्येय यात्रा में संघ ने सदा ही संवाद और समरसता का मार्ग अपनाया। समरस भावना और आचरण से विरोधी धारणाओं को भी समय के साथ समाप्त किया। आज देशव्यापी शाखाओं में सामाजिक समरसता का प्रत्यक्ष अनुभव किया जाता है। संघ ने सदैव इस बात पर बल दिया कि राष्ट्रीय एकता केवल नारों से नहीं, बल्कि जीवन के आचरण और परस्पर व्यवहार से स्थापित होती है। इस दृष्टि से संघ का कार्य सनातन संस्कृति की गहरी परंपराओं से जुड़ा हुआ है। वह विभेद मिटाकर सभी को एक सूत्र में बाँधने की दिशा में प्रयत्नशील रहा है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आज भारत के कोने-कोने में लाखों स्वयं सेवक संघ के माध्यम से समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण में जुटे हैं।


राष्ट्रीय एकता और जनमत निर्माण में संघ का कार्य अनुकरणीय है। यह केवल शाखा या संगठनात्मक गतिविधियों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे भारत को एक सूत्र में बाँधने का ध्येय रखता है। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन इसका प्रमुख उदाहरण है। दशकों तक बहसें और संघर्ष चलते रहे, पर संघ ने धैर्यपूर्वक देश का जनमत तैयार किया। अंततः अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण केवल धार्मिक उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना, आत्मगौरव, स्वत्व और जनभावना की विजय बना। यही संघ की विशेषता है कि वह सामाजिक व वैचारिक स्तर पर स्थायी और गहरा असर डालने वाले मुद्दों पर धैर्यपूर्वक आगे बढ़ता है। वास्तव में इसकी कार्यपद्धति अद्वितीय है।
स्थापना काल से ही संघ ने सदैव यह स्पष्ट किया कि राष्ट्र निर्माण का वास्तविक मार्ग व्यक्ति निर्माण से होकर ही जाता है। यही कारण है कि संघ से निकले स्वयंसेवक राजनीति, शिक्षा, साहित्य, विज्ञान, समाजसेवा और उद्योग हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ रहे हैं। यद्यपि संघ प्रत्यक्ष राजनीति से दूर रहता है, परंतु संघ की प्रेरणा से राजनीति में भी एक नई संस्कृति का प्रवाह हुआ। दीनदयाल उपाध्याय से लेकर नरेंद्र मोदी तक, ऐसे अनेक नेता सामने आए जिन्होंने राजनीति को केवल सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा का मार्ग माना। आज जब राजनीति में स्वार्थ और अवसरवाद के आरोप आम हो चुके हैं, तब संघ की यह बड़ी देन है कि राजनीति में सुचिता, समर्पण और राष्ट्र सर्वोपरि की धारा निरंतर बह रही है। आज भी संघ ही वह संगठन है जिसका कार्यकर्ता किसी सत्ता की आकांक्षा से प्रेरित नहीं होता, बल्कि वह अपने जीवन को समाज और राष्ट्र के लिए खपा देने की प्रेरणा पाता है। संघ से निकले असंख्य आत्मविश्वासी, अनुशासित और राष्ट्रनिष्ठ स्वयंसेवक समाज के विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान कर रहे हैं।
वस्तुतः संघ ने अपने सौ वर्षों में समाज को संगठित करने की साधना की है। संघ का आशय केवल किसी संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि वह संगठन शक्ति का जीवंत प्रतीक है। अकेला व्यक्ति चाहे कितना ही सक्षम क्यों न हो, जब समाज संगठित होता है, तब असंभव भी संभव हो जाता है। संघ कार्य का संदेश है कि संगठित शक्ति ही वास्तविक वैभव दिखाती है और वही राष्ट्र को सही दिशा देती है।
संघ की एक और विशेषता है, नवाचार और युगानुकूलता को आत्मसात करना। इसकी शताब्दी यात्रा केवल परंपराओं के पुनरावर्तन तक सीमित नहीं रही है। हर युग में संघ ने युगानुकूल परिवर्तन को अंगीकार किया है। स्थापना काल से लेकर वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के नेतृत्व तक संगठन ने अनेक नवाचार और आवश्यक बदलाव किए हैं। श्रद्धेय भागवत जी ने बौद्धिक जगत को नई दृष्टि दी, सामाजिक समरसता को केंद्र में रखा और यहाँ तक कि विश्व की धारणा बदलने का प्रयास भी किया। उनके नेतृत्व में संघ ने यह स्पष्ट किया कि हिन्दुत्व कोई संकीर्ण विचार नहीं, बल्कि समग्र मानवता को जोड़ने वाला दृष्टिकोण है और सह-अस्तित्व इसकी नींव है।
आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप संघ के कार्यक्रमों का पुनर्संयोजन हर स्तर पर उसकी युगानुकूलता दिखाई देती है। संघ का आचरण यह बताता है कि उसकी मूल शक्ति समय के साथ कदम मिलाकर चलने और अनुकूलन की क्षमता में है। यह बड़ा कारण है कि हर कालखंड में युवा वर्ग के बीच संघ का आकर्षण लगातार बढ़ता गया है।
वास्तव में मेरे लिए यह सब केवल सैद्धांतिक बातें नहीं हैं, बल्कि प्रत्यक्ष जीवन का अनुभव हैं। लगभग चालीस वर्ष पूर्व मैंने स्वयं इस आकर्षण को अपने भीतर पाया और संघ से जुड़ा। मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ा, तो मैं ऐसे क्षेत्र से आता था जहाँ संकीर्णता और जड़ता गहरी थी। यदि युवा काल में संघ से जुड़ाव न हुआ होता, तो संभव है कि मेरी जीवन-दिशा भटक जाती। परंतु संघ के संस्कारों ने मुझे सार्थक जीवन दिया। राष्ट्र सर्वोपरि के विचार ने मुझे देशसेवा की ओर उन्मुख किया और यह सिखाया कि जीवन का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के लिए जीना है। यही जुड़ाव मेरे विचार, आचरण और दृष्टिकोण को बदलने वाला सिद्ध हुआ। जीवन के लगभग तीस वर्ष एबीवीपी में कार्य करते हुए संघ की साधना का प्रत्यक्ष साक्षी बनने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ।
हिन्दुत्व संघ का महा संकल्प है। उसका लक्ष्य है ऐसा समाज खड़ा करना, जो राष्ट्र को सर्वोपरि माने। यह अवधारणा एकात्मता पर केंद्रित है। संघ की यही साधना रही है। यद्यपि संघ ने कभी स्वयं को प्रचार के केंद्र में नहीं रखा। स्वयं सेवकों से भी उसकी यही अपेक्षा रही है कि पुरुषार्थ करो, परंतु श्रेय की चिंता मत करो। इस मंत्र से उसकी जड़ें समाज में विश्वास और विश्वसनीयता के साथ गहरी और सुदृढ़ होती गई।
अविरल यात्रा में संघ कभी हिन्दुत्व, भारत और स्वत्व से विमुख नहीं हुआ। चाहे कितनी भी उपेक्षाएं हुई हों, चुनौतियाँ आई हों, संघ इन्हीं तत्वों पर खड़ा रहा। हिन्दुत्व यहाँ संकीर्णता का प्रतीक नहीं, बल्कि वह समग्र मानवता को एक सूत्र में जोड़ने वाली दृष्टि है। यही संस्कृति भारत को सहस्राब्दियों तक जीवित रखती आई है और संघ उसी परंपरा का संवाहक बनकर हिमालय की तरह अडिग खड़ा है।
सौ वर्ष का पड़ाव केवल इतिहास की कोई तारीख नहीं, बल्कि उस संकल्प, साधना, सेवा और समर्पण का प्रतीक है, जिसने करोड़ों स्वयं सेवकों को राष्ट्र सेवा के मार्ग पर अग्रसर किया। संघ ने हम भारतवासियों को यह जीवन-दृष्टि दी है कि अपने लिए नहीं, राष्ट्र के लिए जीना है। यही उसका शताब्दी-संदेश है। संघ केवल एक संगठन नहीं, यह भारत की आत्मा का स्पंदन है। आगामी समय में पंच परिवर्तन स्वबोध, पर्यावरण, सामाजिक समरसता, नागरिक शिष्टाचार और कुटुम्ब प्रबोधन-के आधार पर भारत को सिरमौर बनाने का संकल्प लिया गया है। सतत चलते हुए संघ सनातन संस्कृति, हिन्दुत्व, भारत और स्वत्व का अमर प्रवाह है, जो आने वाली पीढ़ियों को भी राष्ट्रभक्ति की धड़कन देता रहेगा। (विनायक फीचर्स) (लेखक मध्य प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष एवं लोकसभा सदस्य हैं)

कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर गौ तस्करी को बढ़ावा देने का लगाया आरोप

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कवर्धा\बालोद: कांग्रेस कमेटी ने भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाए. कांग्रेस नेताओं ने दावा किया कि प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद गौवंश संरक्षण की स्थिति बदतर हो गई है. पार्टी का कहना है कि बीते दो वर्षों में छत्तीसगढ़ से लगभग 5 लाख गौवंश गायब हो गए हैं. वहीं 580 गौवंश सड़क हादसों में मारे गए, 1200 से अधिक भूख-प्यास से मर गए और 200 से ज्यादा जहरीले पदार्थ खाने से मौत के शिकार हुए.

भाजपा पर गौठान बंद करने का आरोप: जिला कांग्रेस प्रवक्ता विकास केसरी ने कहा कि कांग्रेस सरकार में प्रदेशभर में 10,800 गौठान बनाए गए थे, जिनमें 14 लाख से अधिक गौवंश का संरक्षण किया जाता था. वहां चारा-पानी की व्यवस्थित सुविधा उपलब्ध कराई गई थी. लेकिन भाजपा सरकार बनते ही सबसे पहले गांव-गांव के गौठान बंद कर दिए गए, जिसके चलते मवेशी सड़क पर भटकने लगे और उनकी जान पर संकट आ गया.

65 देशों को बीफ निर्यात करने का आऱोप: कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा खुद को गौ पूजक और गौ रक्षक बताकर सिर्फ दिखावा करती है, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है. भाजपा शासन में गौ तस्करी के मामले बढ़े हैं. कांग्रेस नेताओं ने कहा कि 2014 में मोदी सरकार आने के बाद भारत 65 देशों को बीफ निर्यात कर रहा है और भाजपा शासित राज्यों में सबसे अधिक स्लॉटर हाउस संचालित हो रहे हैं.

गौठान चालू करने की मांग: कांग्रेस ने मांग की है कि सरकार प्रदेश से गायब हुए 5 लाख गौवंश के मामले में स्पष्ट जवाब दे और पूर्व में संचालित सभी 10,800 गौठानों को पुनः चालू कर चारा-पानी की सुरक्षित व्यवस्था सुनिश्चित करे.

बालोद में भी कांग्रेस का आरोप: वहीं बालोद जिला कांग्रेस कमेटी ने भी भारतीय जनता पार्टी सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा सरकार गौ-रक्षक का चोला ओढ़कर कत्लखानों से चंदा ले रही है, जबकि प्रदेश में पशुधन की स्थिति बदतर हो चुकी है. जिला कांग्रेस अध्यक्ष चंद्रेश हिरवानी ने प्रेस वार्ता में दावा किया कि पिछले पौने दो साल में राज्य से करीब 5 लाख पशुधन गायब हो गए हैं, वहीं 2,500 से अधिक मौतें दुर्घटनाओं और भूख से हो चुकी हैं. हिरवानी ने बताया कि भाजपा शासनकाल में गौ-तस्करी तेज़ हो गई है और सड़कों पर बेसहारा पशुधन मर रहे हैं. केवल बीते दो वर्षों में 850 से अधिक गाय वाहन दुर्घटनाओं में कुचलकर मारी गईं. कांग्रेस सरकार के समय बनाए गए गौठान बंद कर दिए गए, जिससे रोजगार भी प्रभावित हुआ है. हिरवानी ने कहा कि भाजपा सरकार “गौ-रक्षक” होने का दावा करती है, मगर जमीनी हकीकत बिलकुल विपरीत है.

गौवंश बचेगा तो सनातन बचेगा:अभिनेता विवेक ओबेरॉय

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गौवंश बचेगा तो सनातन बचेगा:अभिनेता विवेक ओबेरॉय
मुंबई (विभूति फीचर्स)। सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता विवेक ओबेराय ने गौवंश और सनातन धर्म पर कहा है कि हमारे देश का आधार गौमाता है। अगर गौवंश रहेगा तो ही सनातन धर्म सुरक्षित रहेगा।

फिल्म अभिनेता विवेक ओबेराय ने गौवंश और सनातन धर्म की महत्ता बताते हुए कहा कि मेरे पिता जी (सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता सुरेश ओबेरॉय) ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक गौमाता की सुरक्षा, संरक्षण और संवर्धन के लिए पदयात्रा निकाली। वे किसानों से मिले और कई महीनों तक सुदूर के गांव – गांव तक गए। उन्होंने गौमाता का देश की आर्थिक संरचना में योगदान बताते हुए समझाया कि कैसे गौमाता का संरक्षण किया जाए। उन्होंने गौ हत्या की रोकथाम के भी सघन प्रयास किए। श्री विवेक ओबेरॉय ने गौमाता और सनातन धर्म पर विस्तृत उद्बोधन दिया।
चर्चित अभिनेता विवेक ओबेरॉय ने यह बात भारत के पहले गौ वंश पर आधारित राष्ट्रीय समाचारपत्र गऊ भारत भारती की 11वीं वर्षगाँठ पर “राष्ट्र सेवा सम्मान समारोह” के आयोजन में कही। जुहू इस्कॉन सभागार मुंबई में गुरुदेव आचार्य लोकेश मुनि की अध्यक्षता और सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता विवेक ओबेरॉय के मुख्य अतिथित्व में यह कार्यक्रम हुआ। अन्य अति विशिष्ट अतिथियों के रुप में यहां सद्गुरु डॉ. दयानिधि , विनय गोपाल सिंह , महेंद्र संगोई , सुनील सेठ और विशेष तौर पर हैदराबाद से आए ज्योतिषचार्य कल्याण शास्त्री भी उपस्थित थे।

गुरुदेव आचार्य लोकेश मुनि ने भी गऊ भारत भारती और उसके संस्थापक संजय अमान के कार्यो की सराहना की।
उल्लेखनीय है कि गऊ भारत भारती समाचारपत्र भारत में गौवंश और गौ-आधारित अर्थव्यवस्था पर केंद्रित पहला राष्ट्रीय समाचारपत्र है। “गौ माता राज्य माता,स्वर्णिम भारत-संपन्न किसान-उन्नत महाराष्ट्र” के ध्येय को लेकर यह समाचार पत्र विगत 11वर्षों से प्रयत्नशील है। गौवंश संरक्षण, गौ-आधारित कृषि, और इसके आर्थिक व सांस्कृतिक महत्व को बढ़ावा देने में भी यह महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

यह समाचारपत्र न केवल गौवंश के आर्थिक योगदान पर प्रकाश डालता है, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व को भी रेखांकित करता है, जैसे कि गाय को “विश्व की माता” के रूप में मान्यता देना। यह देशव्यापी चर्चा का हिस्सा बनकर गौ-आधारित अर्थव्यवस्था और सतत विकास को प्रोत्साहित कर रहा है।


इस अवसर पर मुख्य अतिथि विवेक ओबेराय ( सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और उद्योगपति ),विनय गोपाल सिंह (उद्योगपति ),महेंद्र भाई संगोई और सद्गुरु डॉ. दयानिधि (राष्ट्रीय संत) ने गौ भक्तों और गौवंश के लिए कार्य कर रहे लोगों तथा कला , साहित्य , समाजसेवा के क्षेत्र में सराहनीय काम करने वालों को राष्ट्र सेवा सम्मान से सम्मानित किया । इस कार्यक्रम में जीतेश्वर इंफ़्रा की प्रबंध निदेशिका रंजना सिंह , वर्षा चतुर्वेदी,संगीत मासूम , समर्था महालक्ष्मी ,लेखिका ललिता जोगड़ , हरेश वोरा , विजय पहरिया , डॉ लेना गुप्ता , एरीपरला योगानन्द शास्त्री को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में जयश्री, विशाल भगत और हिम बहादुर सोनार भी उपस्थित थे। (विभूति फीचर्स)

उद्यमियों की उपस्थिति के साथ लोनावला मे “अल्टिमेट मिलियनेयर ब्लूप्रिंट” वर्कशॉप और अवॉर्ड समारोह

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लोनावला। व्यवसाय का असली उद्देश्य केवल मुनाफा नहीं, बल्कि समाज का उत्थान है — इसी विचारधारा पर आधारित “अल्टिमेट मिलियनेयर ब्लूप्रिंट” वर्कशॉप 24 से 27 सितंबर तक लोनावला के हरे–भरे वातावरण में संपन्न हुई।

देविदास श्रावण नाईकरे ने ध्यान, वेदज्ञान और आधुनिक बिजनेस स्ट्रैटेजी का अनूठा संगम प्रस्तुत किया। उन्होंने उद्यमियों को संदेश दिया कि बड़ा टर्नओवर होने से पहले बड़ा विचार ज़रूरी है और स्थायी सफलता से पहले स्थिर मन।

कार्यशाला के समापन पर महाराष्ट्र के शीर्ष उद्यमियों को अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर उपस्थित रहे बॉलीवुड स्टार मुश्ताक खान ने कहा कि यह अवॉर्ड आपकी सफलता का नहीं, बल्कि आपके सेवाभाव और दृष्टिकोण का सम्मान है।”

अंत में कार्यशाला का मूल संदेश यही रहा, “सच्चा लीडर वही है जो अपने सपनों के साथ-साथ समाज के सपनों को भी पूरा करता है।

पूजा राव हॉरर और रोमांच से भरपूर फिल्म द अनवांटेड गिफ्ट में करेगी धमाल

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झारखंड के बंसीधर नगर से निकलकर मायानगरी मुंबई तक का सफर तय करने वाली अभिनेत्री पूजा राव अब दर्शकों के लिए रोमांच और हॉरर का डबल डोज लेकर आ रही हैं। उनकी आगामी फीचर फिल्म “द अनवांटेड गिफ्ट” हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में बनी है। खास बात यह है कि इस फिल्म में पूजा न सिर्फ मुख्य अभिनेत्री हैं बल्कि बतौर निर्माता भी अपनी नई पारी की शुरुआत कर रही हैं। यह फिल्म नए वर्ष पर रिलीज होगी।

इसके साथ ही पूजा की हिंदी फिल्म “जिला ग्रीडी” की शूटिंग पूरी हो चुकी है, जिसमें उन्होंने एक पाकिस्तानी लड़की का किरदार निभाया है। यह फिल्म लव स्टोरी और ड्रामा से भरपूर है और जल्द ही इसका ट्रेलर रिलीज किया जाएगा।

पूजा राव अब तक 500 से अधिक म्यूजिक वीडियो में नजर आ चुकी हैं। वहीं, वेब सीरीज़ “मुँह दिखाई”, “बंद दरवाजा”, “विधवा” और “खींच मेरी फोटो” में उनके अभिनय को दर्शकों ने सराहा है। भोजपुरी इंडस्ट्री से पूजा ने शुरुआत की थी और छठ गीतों से अपने करियर की पहली पहचान बनाई।

पूजा राव का जीवन सफर बेहद प्रेरणादायक रहा है। एक साधारण परिवार में जन्मी पूजा ने आईटीआई की पढ़ाई की है। वह बचपन से ही टीवी पर अभिनेत्रियों को देखकर सपनों की दुनिया में खो जाती थीं और ठान लिया था कि एक दिन पर्दे पर जरूर नजर आएँगी। अपने बलबूते पर इन्होंने अपनी मंजिल तय की। उनके इस सपने में उनके दादा-दादी का आशीर्वाद और सहयोग रहा। पूजा अपने दादा-दादी को अपना आदर्श मानती हैं।

आज वही साधारण लड़की न सिर्फ अभिनय में बल्कि निर्माता के रूप में भी नई पहचान बना रही है। पूजा को मुंबई ग्लोबल की ओर से अवार्ड मिल चुका है और वह दुबई में मॉडलिंग और रैम्प वॉक भी कर चुकी हैं। वह भोजपुरी और हिंदी सिनेमा के बड़े नामों – रवि किशन, करण ट्रेकर, चिंटू पांडे जैसे सितारों के साथ स्क्रीन शेयर कर चुकी हैं।

पूजा का कहना है, “कभी हार नहीं माननी चाहिए और हमेशा कुछ अलग करने का हौसला होना चाहिए। सपनों का सागर चाहे जितना बड़ा क्यों न हो, मेहनत और जुनून से उसे पार किया जा सकता है।”

नए साल में पूजा राव की एक के बाद एक फिल्में और म्यूजिक वीडियो रिलीज होंगी। दर्शकों को उनके इस नए अंदाज और नए सफर का बेसब्री से इंतजार है।

दमदार एक्टिंग से दर्शकों की फेवरेट रही हैं मृणाल देशराज

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मुंबई। “इश्कबाज़”, “नागिन”, “कहीं तो होगा” जैसे सुपरहिट सीरियल्स से टीवी पर अपनी पहचान बनाने वाली हॉट और ग्लैमरस अदाकारा मृणाल देशराज एक बार फिर सुर्खियों में हैं। ग्रे शेड्स की क्वीन कहे जाने वाली मृणाल अपने बोल्ड अंदाज़ और दमदार एक्टिंग से दर्शकों की फेवरेट रही हैं।

एक ब्रेक के बाद मृणाल अब अपनी दूसरी पारी की तैयारी कर रही हैं और इस बार उनका निशाना है ओटीटी। स्टाइल और एटीट्यूड में बेमिसाल मृणाल का कहना है कि वह नए प्लेटफॉर्म पर अपनी बहुमुखी प्रतिभा दिखाना चाहती हैं।

मृणाल सिर्फ़ कैमरे के सामने ही नहीं, बल्कि फिटनेस और स्पोर्ट्स की दुनिया में भी बेहद एक्टिव हैं। योगा, जिम्नास्टिक, स्क्वैश, लॉन टेनिस, किक बॉक्सिंग, स्विमिंग, रनिंग, स्पिनिंग और हैवी वेट लिफ्टिंग… इन सबमें उनका जलवा देखने लायक है। यही वजह है कि उनकी फिट और टोंड बॉडी फैंस को हमेशा इंप्रेस करती है।

थिएटर से शुरुआत करने वाली मृणाल ने परितोष पेंटर के “ये क्या हो रहा है”, “अमर, अकबर और टोनी”, विपुल मेहता के “हम ले गए तुम रह गए”, रमेश तलवार के “डॉ. मुक्ता” और नादिरा बब्बर के “यहूदी लड़की” जैसे नाटकों से अपने टैलेंट का लोहा मनवाया। वहीं छोटे पर्दे पर “कहीं तो होगा” की शिप्रा, “सुजाता” की पद्मिनी, “डोली सजा के”, “छोटी सी ज़िंदगी”, “महाराणा प्रताप” की महारानी उमादेवी जैसे नेगेटिव रोल्स में छा गईं। और फिर “इश्कबाज़” की जाह्नवी ओबेरॉय और “नागिन” की रोहिणी बनकर फैंस के दिलों पर राज किया।

ग्लोबल एक्सीलेंस अवॉर्ड जीत चुकीं और कई मैगज़ीन कवर रह चुकी मृणाल का कहना है – “पैशन और डेडिकेशन ही मेरी ताकत है। काम के पीछे भागो, पैसे के पीछे नहीं, मंज़िल खुद चलकर आपके पास आएगी।”

अब देखना यह होगा कि ओटीटी पर मृणाल अपने ग्लैमरस और दमदार अंदाज़ से क्या नया धमाल मचाती हैं।

गौ-हत्यारों की रिश्तेदार है कांग्रेस’, गौ-मांस टैक्स के आरोप पर सीएम मोहन यादव का पलटवार

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मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बालाघाट में कांग्रेस पर गौ-मांस कर और गौ-हत्या के मुद्दे पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का गौमाता से कोई लेना-देना नहीं है उनकी सरकार ने गौ-हत्या पर सख्त प्रतिबंध लगाए हुए है। उन्होंने कांग्रेस पर साधु-संतों पर गोलियां चलवाने का भी आरोप लगाया। मुख्यमंत्री ने गौशाला योजना का उल्लेख करते हुए गौ-पालकों को प्रति गाय 40 रुपये देने की बात कही।

भोपाल/बालाघाट। कांग्रेस ने गौ-मांस के टैक्स को लेकर मध्यप्रदेश सरकार पर गंभीर आरोप लगाए थे। इस आरोप पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जबरदस्त पलटवार किया है। उन्होंने 24 सितंबर को बालाघाट के कटंगी में कांग्रेस पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि हमारी मान्यता है गाय में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है। हम गौ-हत्या की सोच भी नहीं सकते।

कांग्रेसियों का गौमाता से कोई लेना देना नहीं। वह तो गौमाता के हत्यारों की रिश्तेदार है। उसने ही दशकों पहले करपात्री महाराज और साधु संतों पर गोलियों तक चलवाईं। कांग्रेस ने अपना गाय-बछड़े का चुनाव चिन्ह बदलकर पंजा कर दिया। कांग्रेस के इस पाप को जनता कभी माफ नहीं करेगी।

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव आज बालाघाट के कटंगी पहुंचे। उन्होंने यहां किसानों को बोनस की राशि दी। इसी दौरान उन्होंने मंच से कहा कि जब हमने लाड़ली बहनों को एक हजार रुपये देने शुरू किए तो कांग्रेसियों ने कहा कि पैसा नहीं है, यह केवल चुनाव की बात है, बाद में कुछ नहीं होगा।

लेकिन, हम सबने देखा कि बहनों को चुनाव के पहले एक हजार, पिछले साल 1250, रक्षाबंधन पर 250 रुपये अलग से दिए। नालायक कांग्रेसी कहते हैं कि बहनों को पैसे दो तो शराब पी जाती हैं। सीएम डॉ. मोहन ने बहनों से कहा कि कोई कांग्रेसी गली-मोहल्ले आए तो उनका हिसाब चुकता करना। अपने इन्हीं कर्मों की वजह से कांग्रेस 20 साल से सत्ता से बाहर है।

कांग्रेसी पहले लाड़ली बहनों को गाली दे रहे थे, अब नई कहानी शुरू की है। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश में गौ-मांस को टैक्स फ्री कर दिया। अब कोई इन मूर्खों से पूछे कि 2004 के पहले तुम्हारी सरकार थी। उस वक्त जो तुमने किया तो उसका हिसाब लेंगे। हमारे यहां कोई भी गौ-हत्या संभव नहीं है।

गौवंश को लेकर प्रदेश में सख्त कानून
सीएम डॉ. मोहन यादव ने कहा कि हमारी सरकार ने गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। हम गौ-माता के प्रति ऐसी बात तो सोच भी नहीं सकते। कोई गौ-माता को काटने की तो छोड़ो, अगर उसको परेशान भी करेगा तो हमारी सरकार उसे उठाकर जेल में डाल देती है। हमने कानून बनाया है। हमने कई ट्रक और गाड़ियां जब्त की हैं, जिनमें भरकर गौवंश की तस्करी की जा रही थी। हम जब गौ-हत्यारों को पकड़ने जाते हैं तो कांग्रेसी हाय रे-हाय रे चिल्लाने लगते हैं।

कांग्रेस को गौमाता से कोई लेना-देना नहीं। इनकी गौ-हत्यारों से रिश्तेदारी है। कांग्रेसी किसी के नहीं हो सकते। भगवान राम के मामले में भी कांग्रेस ने शपथ पत्र दिया था कि कहां राम, किसने देखे, कहां पैदा हुए, राम का कोई अस्तित्व नहीं है, वो तो काल्पनिक है। लेकिन, जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश से राम मंदिर बना तो कांग्रेसी कहने लगे ही राम हमारे भी हैं। राम मंदिर को लेकर सारे अड़ंगे कांग्रेस ने ही लगाए।

अपने पाप देखे कांग्रेस
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि सरकार ने गौशाला के लिए योजना बनाई है। गौ-पालकों को प्रति गाय 40 रुपये प्रदान किए जा रहे हैं। कांग्रेस से पूछो कि उसका इतिहास क्या है। 1960-65 के आसपास करपात्री महाराज साधु संतों को लेकर नई दिल्ली आए थे। उन्होंने सरकार से कहा था कि गौ-माता की हत्या बंद करो और सबको साथ लेकर चलो।

लेकिन, कांग्रेसियों ने निहत्थे साधु-संतों पर गोलियां चलवाकर उनकी हत्या का पाप किया। देश इस पाप के लिए कभी कांग्रेस को क्षमा नहीं करेगा। करपात्री महाराज ने अंशन करते-करते शरीर छोड़ दिया। महात्मा गांधी के समय कांग्रेस ने अपना चुनाव चिन्ह गाय-बछड़ा रखा। इसके बाद इन्हें गाय-बछड़े से नफरत हो गई और उन्होंने अपना चुनाव चिन्ह हाथ रख लिया।

गाय माता कांग्रेसियों को पसंद नहीं और सर्टिफिकेट हमसे ले रहे हैं। कांग्रेस अपने अंदर के पाप देखे। ये पाप उसको खा जाएंगे। हमारी सरकार में जो 25 गाय पालेगा और 40 लाख निवेश करेगा तो हम उसको दस लाख का अनुदान देंगे। हमारी सरकार गौ-माता को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।