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बालासाहेब ठाकरे के स्मारक पर उद्धव ‘सेना’ ने छिड़का गोमूत्र

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मुंबई: शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे (Balasaheb Thackeray Death Anniversary) की पुण्यतिथि पर महाराष्‍ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) के उनके स्‍मारक पर जाने को लेकर राजनीत‍ि शुरू हो गई है। एकनाथ श‍िंदे अपने गुट के विधायकों के साथ शिवाजी पार्क स्थित बालासाहेब की समाधि पर पहुंचे और उन्हें नमन किया। एकनाथ शिंदे के वहां से जाते ही यह बात सामने आई है कि उद्धव ठाकरे गुट के कार्यकर्ताओं ने स्मारक पर जाकर गोमूत्र छिड़का। इस मौके पर कार्यकर्ताओं ने जोरदार नारेबाजी भी की। इससे पहले भी केंद्रीय मंत्री नारायण राणे की ओर से बालासाहेब के समाधि स्थल पर सलामी देने के बाद ठाकरे गुट के कार्यकर्ताओं ने गोमूत्र छिड़का और क्षेत्र का शुद्धिकरण किया।

दरअसल एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद बालासाहेब ठाकरे का असली वारिस कौन? इसी को लेकर महाराष्‍ट्र में ठाकरे और शिंदे गुट के बीच तनातनी चल रही है। इसी तरह बालासाहेब ठाकरे का 10वां स्मृति दिवस मनाया गया। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने शिंदे गुट के विधायकों के साथ बुधवार को शिवाजी पार्क में बालासाहेब के स्मारक का दौरा किया ताकि गुरुवार को कोई अप्रिय घटना न हो।

श‍िंदे के जाते ही बालासाहेब के स्‍माकर पहुंचे उद्धव गुट के सैनिक
हालांकि, जैसे ही एकनाथ शिंदे का काफिला वहां से निकला, ठाकरे गुट के कार्यकर्ता बालासाहेब के स्मारक पहुंचे और उस पर गोमूत्र छिड़का। खास बात यह है कि इस मौके पर सांसद अरविंद सावंत भी मौजूद थे। सांवत ने कहा क‍ि बालासाहेब का स्मृति दिवस है। उन्होंने जीवन भर हम पर हिंदू धर्म को बिठाया। उन्हें देशद्रोहियों पर बहुत गुस्सा आया। उन्होंने इसी शिव तीर्थ से आदेश दिया था कि अगर कोई शिवसेना छोड़ता है तो ऐसे विधायकों को सड़क पर रौंदा जाए।

स्‍मारक पर गोमूत्र छ‍िड़कने के बाद पानी से सफाई

सांसद अरविंद सावंत ने इस बात पर प्रतिक्रिया दी कि ऐसे बदनसीब लोग उनके समाधि स्थल पर आ गए और शिवसैनिकों ने इसे संस्कृति की तरह गोमूत्र से साफ कर दिया। इसके बाद स्‍मारक वाली जगह को शुद्ध करने के लिए गौमूत्र के बाद पानी भी छिड़का।

शिंदे गुट ने की निंदा
उधर, उद्धव गुट के इस कदम से श‍िंदे गुट खुश नहीं है। बालासाहेबची शिवसेना के प्रवक्ता दीपक केसरकर ने कहा क‍ि हम इस कृत्य की निंदा करते हैं। बालासाहेब किसी एक व्यक्ति या एक पार्टी के नहीं थे… उन्हें हर पार्टी का सम्मान और सम्मान प्राप्त था।

राहुल गांधी का बयान महाराष्ट्र में उनके सहयोगी दल उद्धव ठाकरे की शिवसेना के लिए गले की हड्डी बन चुका है

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मुंबई: एक तरफ देश में राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की भारत जोड़ो यात्रा चल रही है। दूसरी तरफ गुजरात (Gujrat) और हिमाचल प्रदेश में चुनावी माहौल है। ऐसे में राहुल गांधी का वीर सावरकर (Veer Savarkar) को लेकर दिया बयान गुजरात और हिमाचल के चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हालत खराब कर सकता है। राहुल गांधी का यह बयान महाराष्ट्र (Maharashtra) में उनके सहयोगी दल उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) की शिवसेना के लिए गले की हड्डी बन चुका है। जिसे न तो उद्धव ठाकरे उगल पा रहे हैं और न ही निगल पा रहे हैं। सियासी नफा-नुकसान का आंकलन करते हुए उद्धव ठाकरे ने खुद को और पार्टी को राहुल गांधी के इस बयान से अलग कर लिया है। वहीं शिवसेना सांसद संजय राउत (Sanjay Raut) ने कहा है कि जब महाराष्ट्र में भारत जोड़ो यात्रा (Bharat Jodo Yatra) को अच्छा प्रतिसाद मिल रहा था तो राहुल गांधी को इस तरह का विवादित बयान देने की क्या आवश्यकता थी। सूत्रों की माने तो इस मुद्दे पर शिवसेना (Shivsena) ने अपने सभी प्रवक्ताओं को बोलने से मना किया है। कुछ महीनों पहले तक महाराष्ट्र में चल रही महाविकास अघाड़ी सरकार (Mahavikas Aghadi Government) को तो राहुल गांधी बचा नहीं पाए।

अब सावरकर पर बोलकर गुजरात में भी पार्टी का बंटाधार कर रहे हैं। शिवसेना के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न लिखने की शर्त पर कहा कि यह सब जानते हैं कि गुजरात में कांग्रेस पार्टी की लड़ाई पहली पोजीशन के लिए नहीं बल्कि दूसरी और तीसरी पोजीशन के लिए चल रही है। बीजेपी (BJP) और कांग्रेस (Congress) के बीच में होने वाली टक्कर में अब आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल भी कूद पड़े हैं। ऐसे में मुकाबला त्रिकोणीय हो चुका है। गुुजरात के गंभीर सियासी हालातों के बार भी राहुल गांधी ने यह बयान देकर पार्टी नेताओं के लिए मुसीबत पार्टी के लिए मुसीबत मोल ले ली है। शिवसेना की तरह एनसीपी (NCP) के प्रवक्ता भी राहुल गांधी के साल पर जवाब देने से बचते हुए नजर आ रहे हैं।

महाराष्ट्र में बीजेपी के निशाने पर राहुल गांधी
इस मुद्दे पर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राहुल गांधी की आलोचना करते हुए कहा था कि वह स्वतंत्रता सेनानी के बारे में पूरी तरह झूठ बोल रहे हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने राहुल को चेतावनी देते हुए कहा कि वीर सावरकर के अपमान को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। महाराष्ट्र के लोग हिंदू विचार के किसी भी शख्स का अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे।

क्या बोले थे राहुल गांधी?
दरअसल राहुल गांधी ने महाराष्ट्र में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान मंगलवार को वाशिम जिले में विनायक दामोदर सावरकर पर निशाना साधा है। राहुल गांधी ने सावरकर की चिट्ठी पढ़ते हुए कहा कि उन्होंने अंग्रेजों की मदद की थी और कारागार में रहने के दौरान उन्होंने माफीनामे पर हस्ताक्षर करके महात्मा गांधी और अन्य समकालीन भारतीय नेताओं को धोखा दिया था। राहुल गांधी ने विनायक सावरकर के ‘माफीनामे’ की एक प्रति दिखाते हुए निशाना साधा।

उन्होंने दावा किया, ‘सावरकर जी ने अंग्रेजों की मदद की। उन्होंने अंग्रेजों को चिट्ठी लिखकर कहा – सर, मैं आपका नौकर रहना चाहता हूं।’ राहुल गांधी ने यह भी कहा, ‘जब सावरकर जी ने माफीनामे पर हस्ताक्षर किए तो उसका कारण डर था। अगर वह डरते नहीं तो वह कभी हस्ताक्षर नहीं करते। इससे उन्होंने महात्मा गांधी और उस वक्त के नेताओं के साथ धोखा किया।

कानपुर – साढ़ में गौ तस्कर सक्रिय, बंधे मिले गोवंश

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कानपुर (ब्यूरो) साढ़ थाना क्षेत्र के छांजा गांव निवासी सरोज, मुनौवर, विमल, नदनलाल पूर्व प्रधान समेत ग्रामीणों ने बताया कि बीते तीन दिनों से देर शाम लगभग आधा दर्जन पुरुष और महिलाएं गोद में बच्चे लिए खुद को राजस्थानी बताकर अन्ना गौवंश को अपने झुंड में शामिल कर गांव के किनारे ऊसर में ले जाते थे। वहीं पर गौ तस्कर का यह गिरोह बीते दो दिनों से रुके हुए थे, पास खेत में पानी लगाए लोगों को शक हुआ तो उन्होंने शोर मचाया।

एक दूसरे से रस्सी के सहारे
गौतस्कर गौवंश छोड़कर भाग गए। ग्रामीणों ने देखा तो अन्ना गौवंश को एक रस्सी के सहारे एक दूसरे से बांध रखा था, वहीं दो गौवंश मृत पड़े हुए थे, ये लोग गांव गांव खुद को राजस्थानी बताकर अन्ना गौवंश को पकड़कर एक जगह पर इकठ्ठा करते हैं। जिसके बाद वह कंटेनर बुलावकर अन्ना गौवंशो को लादकर बहार भेज देते थे। ग्रामीणों ने पुलिस को घटना की सूचना दी मौके पर पहुंची पुलिस घटना की जांच में जुटी गई है।

तस्करों की नहीं मिली जानकारी
थानाध्यक्ष धर्मेंद्र कुमार ने बताया कि गौवंशों को ग्राम प्रधान को सुपुर्द कर गौशाला भिजवाने के लिए कहा गया है। वहीं गौतस्करों की कोई जानकारी नहीं मिल पाई है।

India Forex Reserves: भारत के लिए अच्छी खबर, विदेशी मुद्रा भंडार में आया 14.72 अरब डॉलर का उछाल

India Forex Reserves: भारत के लिए अच्छी खबर, विदेशी मुद्रा भंडार में आया 14.72 अरब डॉलर का उछाल

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प्रतिकात्मक फोटो
प्रतिकात्मक फोटो

India Foreign Currecy Reserves: भारत के लिए अच्छी खबर है. विदेशी मुंद्रा भंडार (India Forex Reserves) में जबरदस्त उछाल आया है. 11 नवंबर, 2022 को खत्म हफ्ते में विदेशी मुद्रा भंडार में 14.72 अरब डॉलर का उछाल आया है.  आरबीआई ( Reserve Bank Of India) के मुताबिक विदेशी मुद्रा भंडार 14.72 अरब डॉलर बढ़कर 544.715  अरब डॉलर पर जा पहुंचा है. इससे पहले 4 नवंबर को समाप्त हुए सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार 1.09 अरब डॉलर घटकर 529.99 अरब डॉलर रह गया था. विदेशी करेंसी एसेट्स जो कुल रिजर्व का प्रमुख हिस्सा माना जाता है वो 11.8 अरब डॉलर बढ़कर 482.53 अरब डॉलर रहा है. गोल्ड रिजर्व 2.64 अरब डॉलर बढ़कर 39.70 अरब डॉलर पर जा पहुंचा है.

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में बड़े इजाफे की वजहों पर नजर डालें तो माना जा रहा है कि हाल के दिनों में आरबीआई ने डॉलर की जबरदस्त खरीदारी की है. तो अमेरिकी डॉलर में मजबूती पर ब्रेक लगा है ऐसे में रिवैल्यूशन गेन के चलते भी विदेशी मुद्रा भंडार में इजाफा हुआ है. इससे पहले 28 अक्टूबर, 2022 को खत्म हुए हफ्ते में विदेशी मुद्रा भंडार में 6.56 अरब डॉलर का इजाफा हुआ था और ये बढ़कर 531.08 अरब डॉलर पर जा पहुंचा था जो सितंबर 2021 के बाद सबसे बड़ा उछाल था.

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इस वर्ष मार्च में 607 अरब डॉलर था जो 3 सितंबर 2021 के 642.45 अरब डॉलर से 97.73 अरब डॉलर कम है. हालांकि 21 अक्टूबर को खत्म हुए हफ्ते में 117.93 अरब डॉलर की गिरावट आ चुकी थी जब विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 524.52 अरब डॉलर पर जा पहुंचा था. और उन लेवल से रिजर्व में सुधार देखा जा रहा है. बीते 13 हफ्ते में से 11 हफ्ते में विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट दर्ज की गई है. महंगे आयात और रूस यूक्रेन युद्ध के बाद से लगातार विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट देखने को मिली थी.

दरअसल डॉलर के मुकाबले रुपये को गिरने से बचाने के लिए आरबीआई को दखल देते हुए डॉलर बेचना पड़ा था इसके चलते  विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आई थी. हालांकि अमेरिकी फेडरल रिजर्व महंगाई पर नकेस कसने के लिए ब्याज दरें बढ़ाता रहा है तो डॉलर इससे मजबूत होता जाएगा. कई जानकारों का मानना है कि विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 510 अरब डॉलर तक गिर सकता है.

काजोल की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘सलाम वेंकी’ 9 दिसंबर को रिलीज होगी

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कनेक्टिकट मीडिया की नवीनतम प्रस्तुति इमोशनल फिल्म ‘सलाम वेंकी’ 9 दिसंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। इस फिल्म से बॉलीवुड अभिनेत्री काजोल हिंदी सिनेमा में अपनी दूसरी पारी शुरू कर रही है। बीमार बेटे और मां की भावनात्मक कहानी को इस फिल्म की कथावस्तु का आधार बनाया गया है।पिछले दिनों काजोल की इस बहुप्रतीक्षित फिल्म का ट्रेलर रिलीज किया गया, जो काफी इमोशनल है और दर्शकों से सीधा कनेक्ट हो रहा है। 2 मिनट 18 सेकंड के इस ट्रेलर में कलाकारों की शानदार एक्टिंग, बहुत सारा इमोशन्स और मजाक मस्ती शामिल है। एक सच्ची कहानी पर आधारित इस फिल्म के ट्रेलर की शुरुआत काजोल और विशाल जेठवा के साथ होती है, जो मां और बेटे के किरदार में है। काजोल पूरे ट्रेलर में अपने बेटे का ध्यान रखती हुई दिखी हैं। ट्रेलर में सुपरस्टार राजेश खन्ना की हृदयस्पर्शी फिल्म ‘आनंद’ का एक डायलॉग भी है, जिसमें काजोल का बेटा कहता है, ‘जिंदगी लंबी नहीं, बड़ी होनी चाहिए।’

 

बी लाइव प्रोडक्शंस और आर टेक स्टूडियोज के संयुक्त तत्वाधान में सूरज सिंह, श्रद्धा अग्रवाल और वर्षा कुकरेजा द्वारा निर्मित फिल्म ‘सलाम वेंकी’ का निर्देशन रेवती ने किया है। इस फिल्म में काजोल और विशाल जेठवा के अलावा राहुल बोस, राजीव खंडेलवाल, प्रकाश राज और अहाना कुमरा भी खास किरदार में नजर आएंगे।

बकौल निर्माता सूरज सिंह ‘सलाम वेंकी’ के जरिए हमलोग सिनेदर्शकों को भावनात्मक व सशक्त कहानी देने में सक्षम हुए हैं। काजोल और रेवती मैम के साथ जुड़ना एक अद्भुत अनुभव था, उनके सहयोग के बग़ैर कुछ भी संभव नहीं था। हमें पूरा विश्वास है कि ‘सलाम वेंकी’ एक ऐसी कहानी है, जो लाखों दिलों को छू लेगी।

प्रस्तुति : काली दास पाण्डेय

शार्ट फिल्म ‘एक अजनबी शाम’ की शूटिंग सम्पन्न

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एनी फिल्म्स एवं एम के आर्ट्स के सहयोग से अवि फिल्म्स के बैनर तले बन रही शार्ट फिल्म ‘एक अजनबी शाम’ की शूटिंग पिछले दिनों सम्पन्न हो गई। इस शार्ट फिल्म के निर्माता जानेमाने लेखक राज गोपाल सिंह वर्मा हैं। विदित हो कि राज गोपाल सिंह वर्मा द्वारा लिखी कई पुस्तकों को उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत किया गया है। इनमें ‘दुर्गावती’ और ‘बेगम समरु का सच’ उल्लेखनीय हैं। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के निकटवर्ती इलाकों में फिल्माई गई शार्ट फिल्म

‘एक अजनबी शाम’ में अभिनेता बिक्रम सिंह और अभिनेत्री हेजल अरोड़ा की मुख्य भूमिका है। बिक्रम सिंह की संजय मिश्रा के साथ अभिनीत फिल्म ‘त्वमेव सर्वम’ रिलीज हो चुकी है। चर्चित निर्देशक संजय कुमार सिंह द्वारा निर्देशित फिल्म ‘एक अजनबी शाम’ में अभिनेता अजय पाल और नितिन तेजराज भी महत्वपूर्ण भूमिका में नज़र आएंगे।

प्रस्तुति : काली दास पाण्डेय

शराब बेचकर गौ सेवा का प्रस्ताव, स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरी ने दिया ये सुझाव

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मध्य प्रदेश में शराब बेचकर गौ सेवा करने का प्रस्ताव आया है. पशुपालन और गौ संवर्धन बोर्ड के उपाध्यक्ष स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरी (Akhileshwaranand Giri) ने मांग की है कि शराब पर गौ सेवा सेस लगाया जाए. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि जब तब प्रदेश में शराबबंदी नहीं होती है तब तक इस नीति से गायों के लिए पर्याप्त बजट का इंतजाम आसानी से हो जाएगा.

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बैठक दिया गया था सुझाव

महामंडलेश्वर स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरी ने जबलपुर में पत्रकारों से चर्चा में बताया कि पिछले दिनों मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में गौ संवर्धन बोर्ड की बैठक हुई थी. इसमें गौ सेवा के लिए बजट का विषय आया था. उस समय सुझाव दिया गया कि गौ सेवा के लिए शराब पर सेस लगा कर पैसों का इंतजाम किया जा सकता है. उत्तर प्रदेश और राजस्थान सरकार ने भी शराब पर ऐसा सेस लगाया है. हालांकि इस प्रस्ताव को पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की शराबबंदी की मुहिम के चलते अधिकारियों के विवेक पर छोड़ दिया गया. ऐसा कहा गया कि इससे उमा भारती रुष्ट हो जाएंगी.

स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरी का सुझाव

राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरी ने सुझाव दिया है कि जब तक पूर्ण शराबबंदी लागू नहीं की जाती, तब तक शराब पर गौ सेस लगा दिया जाए. इसके तहत प्रति बोतल 5-10 पैसे सेस लगाकर इससे 300 करोड़ का एक्स्ट्रा रेवेन्यू जेनरेट किया जा सकता है. माना जा रहा है कि शराबबंदी पर दो संतों दीदी उमा भारती और स्वामी अखिलेश्वरानंद के बीच यह मत भिन्नता आगे चलकर मध्य प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा सकती है. उमा भारती शराबबंदी की मांग को लेकर पहले से ही शिवराज सरकार से नाराज चल रही है.

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गौ संवर्धन से ही संभव है भारतीय संस्कृति की रक्षा- उपेंद्र भाई त्यागी

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नवादा 18 नवम्बर। भारतीय संस्कृति की रक्षा के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्वावधान में नवादा जिले के वारसलीगंज प्रखंड के दौलतपुर तथा नारोमुरार गांव में भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रमोद कुमार चुन्नू की अध्यक्षता में गौ संवर्धन समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक उपेंद्र भाई त्यागी उपस्थित थे।

ग्रामीणों को भारतीय संस्कृति की रक्षा के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हुए श्री त्यागी ने कहा कि हमारी संस्कृति में गाय, गंगा, गीता ,गुरु और गायत्री का सर्वोपरि महत्व है ।इसके आधार पर ही सनातन धर्म की रक्षा संभव है ।उन्होंने कहा कि आज गांव से भाग कर लो शहरों में आकर पाश्चात्य सभ्यता को ग्रहण कर अपने को धन्य महसूस कर रहे हैं। लेकिन उनका कितना नुकसान हो रहा है, इसका अहसास तक नहीं करते।

उन्होंने कहा कि गांव की संस्कृति में गाय की पूजा से लेकर उसके संवर्धन की व्यवस्था की गई थी । गाय और गंगा को माता की संज्ञा दी गई है ।दूध व पानी के बिना संसार नहीं चल सकता। इंसान का जीवन रोग ग्रस्त होकर नष्ट हो जाएगा। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए गौ संवर्धन बहुत जरूरी है ।जिसके लिए व्यापक पैमाने पर ग्रामीणों को पहल करनी चाहिए।

इस अवसर पर धनंजय कुमार ,आशीष कुमार ,सरपंच संजय कुमार आदि उपस्थित थे। ग्रामीणों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक उपेंद्र भाई त्यागी का जमकर स्वागत किया ।उन्हें कई गांव के लोगों ने भी गौ संवर्धन समारोह के लिए आमंत्रित करते हुए अपने को धन्य बताया ।भाजपा नेता व वरिष्ठ समाजसेवी प्रमोद कुमार चुन्नू ने कहा कि गौ संवर्धन अभियान के तहत गांव-गांव घूमकर व्यापक अभियान चलाया जाएगा ,ताकि हम भारतीय संस्कृति की रक्षा कर सकें।

सामंजस्य का प्रतीक : सोनपुर मेला ! (20 नवंबर 2022) यह मेला मात्र मवेशी मेला नहीं है

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के. विक्रम राव

कभी भारत का सबसे लंबा रेलवे प्लेटफॉर्म सोनपुर होता था। आज पूर्व-मध्य रेलवे के इस महत्वपूर्ण स्टेशन का प्लेटफार्म घटकर सातवें पायदान पर आ गया है। पहले नंबर पर कर्नाटक का हुबली है। बीच में गोरखपुर, कोल्लम, खड़गपुर, बिलासपुर और झांसी आ गए। ऐसी ही उपेक्षा सोनपुर के विश्वविख्यात पशु मेले की भी हुई है। पारंपरिक कार्तिक पूर्णिमा (8 नवंबर 2022) के स्थान पर इस वर्ष यह उत्सव रविवार (20 नवंबर 2022) को होगा। कारण है कि उस दिन चंद्र ग्रहण लगा था। अतः नई तिथि है माघ माह की एकादशी (रविवार 20 नवंबर 2022)। चंद्र ग्रहण के कारण सूतक लगा था। इसका प्रभाव आठ घंटे पहले से ही लागू हो गया। इस वजह से हरिहर नाथ मंदिर का पट बंद रहा। यह प्रथम बार है कि कार्तिक मेले पर चंद्र ग्रहण लगा। इसका असर धार्मिक महत्ता के हिसाब से बुरा पड़ रहा है।

यह मेला मात्र मवेशी मेला नहीं है। वैदिक आस्था से जुड़ा उपलक्ष्य है। हालांकि इस पर संकट तो छा गया है। वैसा ही देश की पुरातन धरोहर पशु हाथी पर भी है, जो मेले का खास आकर्षण है। इसके बेशकीमती धवल दंत के कारण इसके अस्तित्व पर भी मुसीबत आई है। एशिया के अन्य हाथियों की तुलना में भारत का सर्वाधिक महंगा होता है। इसे 1959 में ही संकटग्रस वन्यजीव घोषित किया गया था। इसीलिए आठवीं पंचवर्षीय योजना से इसके संरक्षण हेतु विशेष प्रावधान रखे गए थे। इन्हीं हाथियों के कारण सोनपुर चर्चित हो गया। आस्थावानों के लिए तीर्थ स्थल भी। यहीं भगवान विष्णु ने अपने भक्त हाथी की मगरमच्छ के दांतो से रक्षा की थी। यहीं अलौकिक सूत्र गजेंद्र मोक्ष उच्चारित हुआ था। इस पूरे भूभाग को हरिहर (विष्णु-शिव) क्षेत्र कहा गया है। बिहार प्रदेश का तीर्थविशेष। हरिहर का यह संयुक्त तीर्थस्थान है। यह गंगा यह नारायणी (बड़ी गंडक) के संगम तट पर पटना के पास सोनपुर में स्थित है। यही समन्वयात्मक हरिहरनाथ का मंदिर है। कार्तिक पूर्णिमा को यहां विशाल मेला होता है। इसमें देशदेशांतर के लाखों लोग सम्मिलित होते हैं। वाराह पुराण में हरिहरक्षेत्र का माहात्मय निगदित है।

यूं तो आश्चर्य की बात है कि सबसे बलशाली चौपाये हाथी को तुलनात्मक रूप से उससे कम शक्तिवाले मगर से टक्कर हुई। दोनों मे जंग लंबी अवधि तक चली। इसी नारायणी-गंगा के संगम तट पर हुआ था। पौराणिक कथा है की यहां कोणाहार घाट पर विष्णु के दो भक्त गस और ग्रह भिड़ गए थे। इस संदर्भ में एक गाथा है। द्रविड़ देश में एक पाण्ड्यवंशी राजा राज्य करते थे। नाम था इंद्रद्युम्न। वे भगवान की आराधना में ही अपना अधिक समय व्यतीत करते थे। उनकी आस्था थी कि भगवान विष्णु ही मेरे राज्य की व्यवस्था करते है। अतः वे प्रभु की उपासना में ही दत्तचित्त रहते थे। एकदा महर्षि अगस्त्य अपने समस्त शिष्यों के साथ वहां पहुँच गए। मौनव्रती राजा इंद्रद्युम्न परम प्रभु के ध्यान में निमग्न थे। इससे महर्षि अगस्त्य ने कुपित होकर इंद्रद्युम्न को शाप दे दिया- “इस राजा ने गुरुजनो से शिक्षा नहीं ग्रहण की है और अभिमानवश परोपकार से निवृत होकर मनमानी कर रहा है। ऋषियों का अपमान करने वाला यह राजा हाथी के समान जड़बुद्धि है इसलिए इसे घोर अज्ञानमयी हाथी की योनि प्राप्त हो।”

गजेन्द्र योनि मे जन्मे राजा ने एक दिन अपने साथियो सहित प्यास से व्याकुल था। वह कमल की गंध से सुगंधित वायु को सूंघकर एक चित्ताकर्षक विशाल सरोवर के तट पर जा पहुंचा। गजेन्द्र ने उस सरोवर के निर्मल,शीतल और मीठे जल में प्रवेश किया। पहले तो उसने जल पीकर अपनी तृषा बुझाई, फिर जल में स्नान कर अपना श्रम दूर किया। तभी अचानक गजेन्द्र ने सूंड उठाकर चीत्कार की। पता नहीं किधर से एक मगर ने आकर उसका पैर पकड़ लिया था। गजेन्द्र ने अपना पैर छुड़ाने के लिए पूरी शक्ति लगाई परन्तु उसका वश नहीं चला, पैर नहीं छूटा।” निश्चय के साथ गजेन्द्र मन को एकाग्र कर पूर्वजन्म में सीखे श्रेष्ठ स्त्रोत द्वारा परम प्रभु की स्तुति करने लगा।” गजेन्द्र की स्तुति सुनकर भगवान विष्णु प्रकट हुये। गजेन्द्र को पीड़ित देखकर भगवान विष्णु गरुड़ पर आरूढ़ होकर अत्यंत शीघ्रता से सरोवर के तट पर पहुंचे। जब जीवन से निराश तथा पीड़ा से छटपटाते गजेन्द्र ने हाथ में चक्र लिए गरुड़ारूढ़ भगवान विष्णु को तेजी से अपनी ओर आते देखा तो उसने कमल का एक सुन्दर पुष्प अपनी सूंड में लेकर ऊपर उठाया और बड़े कष्ट से कहा- “नारायण ! जगद्गुरो ! भगवान ! आपको नमस्कार है।” तब भगवान विष्णु गरुड़ की पीठ से कूद पड़े और गजेन्द्र के साथ ग्राह को भी सरोवर से बाहर खींच लाए और तुरंत अपने तीक्ष्ण चक्र से ग्राह का मुंह फाड़कर गजेन्द्र को मुक्त कर दिया।

यह हरिहर योग है जिसका उल्लेख कई ग्रंथों तथा इतिहास में है। श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कंध अध्याय में 33 श्लोक है जिसे हाथी ने सुनाया फिर विष्णु की मदद मांगी थी। सोनपुर के संगम तट पर ऐसा हुआ था। जनकपुरी स्वयंवर में जाते वक्त राम यहीं आए थे। आराधना की थी।

वैदिक धर्म के अनुरूप गमनीय तथ्य यह है कि शैव तथा वैष्णव जन सदैव युद्धरत रहते थे। इस हरिहर योग में दोनों में सामंजस्य स्थापित हो गया। भले ही बिहार राज्य में आजकल राजनैतिक सामंजस्य संभव नहीं हो पाया है इन नेताओं की अभी ग्रह शांति होनी शेष है। सोनपुर आकर सीखें।

 

 

 

इंदिरा जयंती : मोम की गुड़िया से आयरन लेडी बनीं इंदिरा

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डॉ0 घनश्याम बादल

19 नवंबर 1917 को मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुई इंदिरा गांधी अगर आज जिंदा होती, और कांग्रेस सता में होती तो भी सारा देश उन्हे कमोबेश वैसे ही याद कर रहा होता जैसे अटल या दीनदयाल उपाध्याय याद किये जाते हैं आज । यदि पलट कर भारत के इतिहास पर नजर डालें तथा स्वाधीन भारत को एक मजबूत राष्ट्र के रूप में खड़ा करने वाली लौह महिला के अवदान का मूल्यांकन किया जाए तो इंदिरा गांधी हर सम्मान की हकदार हैं ।
वही इंदिरा , जिसे कामराज जैसे ताकतवर नेताओं ने इसलिए प्रधानमंत्री बनने दिया था ताकि उनका राजनैतिक इस्तेमाल अपने हित साधने के लिए किया जा सकें । मोम की गुड़िया सी दिखती इंदिरा, जिसे नेहरु परिवार ने फूलों की पंखुड़ियों की तरह संभाल कर पाला था । वही इंदिरा, जिसने 1966 में प्रधानमंत्री बनकर, नई कांग्रेस बना ली थी, और समय के साथ जिसने पुरानी कांग्रेस को दफन कर दिया, पाकिस्तान को ऐसा घेरा कि बंगलादेश ही नहीं बनाया वरन् पाक के मन में एक भय भर दिया था ।

इंदिरा ने देश को डरा रहे आतंकियों को धता बताकर ऑप्रेशन ब्ल्यूस्टार से उसकी कमर तोड़, फिर से देश को विकास की राह पर डाल उसे अपने पैरों पर खडे करने का रास्ता बनाया आज उसी इंदिरा की जयंती है ।
बेशक, उस इंदिरा को याद करना तो बनता है आज बिना यह सोचे कि वह किस दल की थी या आज किस दल की सरकार सत्ता में है यही इस देश की संस्कृति भी है, पर संस्कारों एवं संस्कृति की बात करने वाली सरकार अपनी पूर्व कांग्रेसी सरकारों के द्वारा किए गए व्यवहार को आधार बनाकर इंदिरा कोएक हाशिए पर रख रही है बिना यह सोचे कि वह इस देश की पहली महिला प्रधानमंत्री थी और अब तक की आखरी भी।

भाजपा – वाममोर्चा  गठबंधन: अवसरवादिता या किसी बड़े बदलाव के संकेत

प्रियदर्शनी व लौह महिला दोनों विशेषण फिट बैठते हैं इंदिरा पर । जिसे विपक्ष तक ने ‘दुर्गा’ माना था। आनंद भवन में जन्मी, पली बढ़ी जवाहरलाल व कमला नेहरु की इकलौती पुत्री इंदिरा ने कालांतर में भारतीय राजनीति व विश्व राजनीति के क्षितिज पर अमिट प्रभाव छोड़ा

छात्रा के रूप में सिल्क पहनने वाली इंदिरा को शांति निकेतन में खादी की साड़ी पहननी पड़ती थी और नंगे पैर रहना होता था। शांति निकेतन का अनुशासन भी काफी कड़ा था। सामान्यतः अमीरी में पले बच्चों के लिए वहाँ टिक पाना कठिन था। लेकिन इंदिरा ने सख्त अनुशासन तथा अन्य नियमों का पूर्णतया पालन किया इंदिरा में अध्ययन से इतर लोककला और भारतीय संस्कृति में भी रुचि जाग्रत की गई। इंदु ने शीघ्र ही मणिपुरी शास्त्रीय नृत्य में दक्षता हासिल कर ली। उसका नृत्य काफी मनमोहक होता था। इंदिरा ने 13 वर्ष की अल्पायु में बच्चों के सहयोग से ‘वानर सेना’ का गठन कर अपने इरादों को स्पष्ट कर दिया था । बालिका के रूप में इंदिरा ने बचपन में ही स्वाधीनता के लिए संधर्ष करते हुए यह समझ लिया था। कि किसी भी राष्ट्र के लिए उसकी आजादी का कितना अधिक महत्त्व होता है और आजीवन इंदिरा ने भारत की आजादी के महत्व को पहचाना तथा अलग-अलग कोनों से उस पर उठने वाली कुटिल निगाहों एवं नीतियों को धता बताया ।

इंदिरा के व्यक्तित्व में आई कठोरता प्रतिकूल परिस्थितियों का परिणाम थी , अन्यथा तो उनके अंदर भी एक प्रेम की प्यासी कोमल महिला का दिल था । उसी के चलते 1942 में इंदिरा को प्रेम हुआ, पारसी युवक फीरोज गाँधी से । इंदिरा का परिचय फीरोज से उस समय से था जब वह आनंद भवन में एक स्वतंत्रता सेनानी की तरह आते था। फीरोज गाँधी ने कमला नेहरू को अपनी मां जैस मान दिया था। जर्मनी में जब कमला नेहरू को चिकित्सा के लिए ले जाया गया तब फिरोज मित्रता का फर्ज पूरा करने के लिए जर्मनी पहुँच गए थे। लंदन से भारत वापसी का प्रबंध भी फिरोज ने एक सैनिक जहाज के माध्यम से किया था दोनों की मित्रता इस हद तक परवान चढ़ी कि विवाह करने का निश्चय कर लिया।
नेहरू भले ही एक धर्मनिरपेक्ष एवं उदारवादी छवि के नेता थे लेकिन एक पिता के रूप में वह सोच भी नहीं सकते थे कि इंदिरा उस फीरोज गाँधी से शादी करना चाहती है जो उनके समाज-बिरादरी का नहीं है। उन्होंने कई प्रकार से इंदिरा को समझाने का प्रयास किया लेकिन इंदिरा की जिद कायम रही। अस्तु इंदिरा की जिद के आगे नेहरू हार गए और फिरोज तथा इंदिरा का विवाह कहा तो कुछ ने दुर्गा व लौह महिला भी बताया ।

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इंदिरा का पूरा जीवन उतार चढ़ाव भरा था। जिद्दी, दृढव्रती, साहसी, निरंकुश राजनेता, कूटनीतिज्ञ, प्रशासक, रणनीतिकार, जाबांज, देशभक्त, सदय, कठोर, ममतामयी, हार न मानने वाली, मोम की गुड़िया से लौह महिला में तब्दील हो जाने वाली इंदिरा है ही ऐसी शख्सियत जिसे न दोस्त भुला सकते हैं और न दुश्मन ।

शास्त्री जी की मृत्यु के बाद 1966 में अप्रत्याशित रूप से प्रधानमंत्री बनी इंदिरा एक कठोर शासक एवं देश के प्रति पूर्णतया समर्पित नेता, विरोधियों के लिए निर्मम, समर्थकों के लिए पूर्णतया पक्षपाती,किसी भी हद तक जाकर अपने लक्ष्य हासिल करने को कटिबद्ध, राजनीति में सारे उतार-चढ़ावों से उबरने में सिद्धहस्त इंदिरा ने सत्ता भोगी भी और सत्ता से निर्वासन भी सहा । उसी संसद में उन्हें फटकार भी सहनी पड़ी जिसकी कभी वह नेता होती थी । वह चुनाव हारी भी और जीती भी, गिरी भी और उठी भी मगर अपने ही विश्वस्त अंग रक्षकों की गोलियों से लहूलुहान इंदिरा का मृत शरीर शक्ति स्थल पहुंचकर फिर कभी नहीं उठा ।

आनंद भवन से शुरू हुआ इंदिरा का सफर भौतिक रूप से शक्ति स्थल की चिता पर समाप्त हो गया लेकिन उनकी नीतियां, पाकिस्तान को सिखाए गए सबक, बांग्लादेश का निर्माण, आपातकाल लागू करना, 1977 में हारकर 1980 में वापसी करना इतिहास में दर्ज हो चुका है । (युवराज)

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