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यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट लंदन (यूईएल) ने पुणे में भारत का पहला कार्यालय खोला करियर और शिक्षा केंद्र की दुनिया में अब आएगी बड़ी क्रांति

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यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट लंदन (यूईएल) के द्वारा भारत में  पहला कार्यालय ग्लोबल स्टूडेंट सेंटर के नाम से पुणे  में स्थापित किया गया है। आइंस्टीन और न्यूटन हॉल, हयात रीजेंसी, पुणे में एक प्रेस मीट में, डैनियल कफ, भर्ती निदेशक, पूर्वी लंदन विश्वविद्यालय और अमोल वर्पे, प्रबंध निदेशक – उच्च शिक्षा, विश्वविद्यालय भागीदारी, ग्लोबल एजुकेशन सेंटर लंदन, इंग्लैंड, यूके और एशले  वेरेस, ग्लोबल सेल्स हेड – मालवर्न इंटरनेशनल ने भारत में उद्योग 4.0 रोजगार को बढ़ावा देने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट लंदन के रणनीतिक दृष्टिकोण की घोषणा की है। पूर्वी लंदन विश्वविद्यालय (यूईएल) न्यूहैम, लंदन, इंग्लैंड के लंदन बरो में स्थित एक सार्वजनिक विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना 1898 में हुई थी और 1992 में पब्लिक विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त कर चुका ये विश्वविद्यालयईस्ट लंदन में तीन जगहों पर मौजूद हैं। जिनमें से एक रॉयल डॉकलैंड्स में और अन्य दो स्ट्रैटफ़ोर्ड में स्थित हैं। 
2018-19 शैक्षणिक वर्ष से पूर्वी लंदन विश्वविद्यालय क्रमवार अपने पाठ्यक्रमों को विकसित कर रहा है और अपने छात्रों के हित में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए अपने पाठ्यक्रम, शिक्षाशास्त्र, अनुसंधान प्रभाव और साझेदारी को बदलने के लिए और सामुदायिक सफलता के लिए एक नई प्रस्तावित योजना के तहत10-वर्षीय रणनीति ‘विजन 2028’ को भारतवर्ष में लागू करना शुरू कर रहा है।

‘यूईएल’ को दुनिया के शीर्ष 200 युवा विश्वविद्यालयों में स्थान दिया गया है, इसके अलावा मनोविज्ञान अनुसंधान के प्रभाव के लिए यूके में पहला, आर्किटेक्चर के लिए लंदन में दूसरा और सिविल इंजीनियरिंग के लिए तीसरा स्थान प्राप्त किया गया है।  यूईएल को अंतरराष्ट्रीय समर्थन और वीज़ा सलाह के लिए यूके में भी प्रथम स्थान दिया गया है, और यह लंदन का एकमात्र विश्वविद्यालय है जो परिसर में आवास प्रदान करता है। वैश्विक बाजार सिकुड़ने के साथ, यूईएल पुणे का यह विस्तार एक स्वागत योग्य कदम है।बकौल डेनियल कफ (भर्ती निदेशक, पूर्वी लंदन विश्वविद्यालय) पूर्वी लंदन विश्वविद्यालय को अक्सर करियर के नेतृत्व वाले विश्वविद्यालय के रूप में सर्वोपरि मान्यता दी गई है, और हम यह सुनिश्चित करने की एकमात्र प्रतिबद्धता से वचनबद्ध हैं कि पूर्वी लंदन विश्वविद्यालय के छात्र नियोक्ताओं के लिए पहली पसंद बनें।
प्रस्तुति : काली दास पाण्डेय

पूर्वांचल की वे 16 सीटें

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  • Ajay Bhattacharya

सुवेंदु का गढ़ ढहा

30 साल में पहली बार भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी गढ़ माने जाने वाले कांथी नगर पालिका के 21 में से 18 वार्डों में जीत हासिल कर तृणमूल कांग्रेस ने किला ढहा दिया है। भाजपा ने दो वार्डों में जीत हासिल की है और एक वार्ड में एक निर्दलीय आगे चल रहा है। 30 वर्षों में यह पहली बार है जब कांथी नगर पालिका अधिकारी परिवार के बिना होगी। 108 नगर निकायों में यह स्तंभ लिख्रे जाने तक क़रीब 80 पर तृणमूल का क़ब्ज़ा हो गया है। यहां तक कि अधीर रंजन चौधरी क़ा गढ़ कहलाने वाला बरहमपुर में भी तृणमूल लगभग आ गई है। भाजपा सांसद अर्जुन सिंह का गढ़ भाटपाड़ा भी तृणमूल के क़ब्ज़े में आ गया है। हुगली की सभी 12 नगरपालिका पर तृणमूल का कब्जा हो गया है। चपदानी नगरपालिका के 22वार्ड मे तृणमूल ने 11 सीट हासिल की है जबकि 1 कांग्रेस और बाकी 10 निर्दल प्रत्याशियो ने जीता है।
संघमित्रा ने सुर बदला

स्‍वामी प्रसाद मौर्य के काफिले पर पथराव के बाद उनकी बेटी संघमित्रा का सुर बदल गया है। उन्होंने फेसबुक लाइव के जरिये कहा कि पिता के रोड शो पर हमला करने वाले भाजपा प्रत्याशी और नेताओं पर कार्रवाई होनी चाहिए। हमले की जानकारी मिली तो कुशीनगर से फाजिलनगर जाते समय बेवली बाजार में मुझे भी घेरा गया। अभद्रता करने वाले लोग शीर्ष नेतृत्व की सुनने वाले नहीं हैं। मुझे प्रताड़ित करने वालों पर अब कार्रवाई होनी चाहिए। मैंने कहा था कि पिता के प्रचार में नहीं जाऊंगी, मगर अब कहती हूं कि फाजिलनगर की जनता स्वामी प्रसाद का साथ दे। संघमित्रा मौर्य ने आगे कहा, ‘मैं भाजपा की कार्यकर्ता हूं। मैं भाजपा की सांसद हूं और बनी रहूंगी। मुझे किसी की सलाह की जरूरत नहीं है। बदायूं की जनता के वोट से चुनकर मैं संसद में गई, किसी की दयादृष्टि वाली सांसद नहीं हूं। न पार्टी से इस्तीफा दूंगी और न सांसदी से।’

पूर्वांचल की वे 16 सीटें

उत्तर विधानसभा चुनाव आखिरी चरण की ओर बढ़ चला है। छठे और सातवें चरण की 111 सीटों पर 3 मार्च और 7 मार्च को मतदान होना है। पूर्वांचल की 8 जिलों की 16 सीटें ऐसी हैं, जहां अभी तक भाजपा का खाता नहीं खुल सका है। आजमगढ़ की आजमगढ़ सदर, गोपालपुर, सगड़ी, मुबारकपुर, अतरौलिया, निजामाबाद दीदारगंज और मऊ सदर की सीट पर हमेशा गैर भाजपा दलों जीत होती रही है। गोरखपुर की चिल्लूपार सीट पर भी भाजपा का अब तक खाता नहीं खुला है। पिछले तीन चुनाव में बसपा यहां से जीतती रही है। देवरिया की भाटपाररानी अब तक हुए चुनावों में कांग्रेस चार बार, तीन बार सपा जीत चुकी हैं। इस सीट से मौजूदा विधायक समाजवादी पार्टी से है। इसी तरह जौनपुर की मछलीशहर सीट पर भी आज तक कमल नहीं खिला है। यहां पांच बार कांग्रेस, तीन बार जनता दल, दो बार सपा व बसपा जीत चुके हैं।

दिल्ली दरबार में उत्तराखंड दंगल

उत्तराखंड भाजपा के अखाड़े में जारी दंगल दिल्ली दरबार तक पहुँच गया है। चुनाव नतीजों से पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अचानक दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के यहाँ हाजिरी पर सियासी अटकलों का बाज़ार गर्म हैं। पिछले दिनों से उत्तराखंड भाजपा में जिस तरह प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक पर भितरघात के आरोप लगे हैं उससे पार्टी संगठन में बड़ा बदलाव की आहट महसूस की जा रही है ओर वह भी 10 मार्च को चुनाव नतीजे आने से पहले ही। पार्टी के भीतर खेमेबाज़ी के चलते राज्य के नेताओं के एक-एक कर दिल्ली जाकर बैठकें करने को भले ही मतदान के बाद की समीक्षा बताया गया हो मगर लेकिन असल जड़ में सत्ता में वापसी या सत्ता से बाहर होने की सूरत में पार्टी के भीतर होने वाला बदलाव है। इनमें प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी में बदलाव पहले नंबर पर है। संविधान के मुताबिक 2023 में संगठन के चुनाव होने ही हैं। पार्टी प्रदेश संगठन के लिए नया चेहरा तलाश करने की जुगत में हो सकती है।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और देश की कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनके स्तंभ प्रकाशित होते हैं।)

SSAN MUSIC सान म्यूजिक कंपनी ने जारी किया म्यूजिक वीडियो ‘तेरे शहर में’

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झारखंड प्रदेश के जमशेदपुर स्टील सिटी के संस्थापक जमशेद जी नसरवानजी टाटा के जन्म दिन( 3 मार्च ) के अवसर पर बॉलीवुड की चर्चित म्यूजिक कंपनी सान म्यूजिक द्वारा गीतकार हरिशंकर सूफी की नई पेशकश म्यूजिक वीडियो ‘तेरे शहर में’ जारी किया गया। 

बॉलीवुड की मशहूर गायिका साधना सरगम के स्वर से सजे इस म्यूजिक सिंगल ‘तेरे शहर में’ के ऑडियो को भी अलग अलग प्लेटफॉर्म क्रमशः यूट्यूब म्यूजिक, गाना,  स्पॉटीफाई, हंगामा म्यूजिक, जिओ सावन, आई ट्यून स्टोर, साउंड क्लाउड, विंक और अन्य डिजिटल म्यूजिक स्टोर और चैनल पर बहुत जल्द ही रिलीज किया जाएगा। इस म्यूजिक वीडियो में अभिनेता शान्तनु भाभरे अपनी भावपूर्ण अदायगी पेश करते नज़र आएंगे। शांतनु भामरेकला और वाणिज्य के क्षेत्र में एक जाने माने शख्सियत हैं और राजीव चौधरी एवं अशोक त्यागी की फिल्म ‘रेड’ में अभिनेता कमलेश सावंत ( फेम दृश्यम) और मेगा स्टार अमिताभ बच्चन के साथ ‘भूतनाथ रिटर्न्स’ आदि में काम कर चुके हैं। शान से एंटरटेनमेंट के सहयोग से सीफेस प्रोडक्शन और एच एल प्रोडक्शन के संयुक्त तत्वाधान में निर्मित इस म्यूजिक वीडियो के निर्माता हीरा लाल(अधिवक्ता), निर्देशक आगा रिज़वी, क्रिएटिव डायरेक्टर पवन शर्मा, पी आर ओ काली दास पाण्डेय, गीतकार हरिशंकर सूफी और संगीतकार शौरिष हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=M0eJMb4UgUs&ab_channel=SSANMUSIC

 प्रस्तुति : काली दास पाण्डेय

https://www.youtube.com/watch?v=M0eJMb4UgUs&ab_channel=SSANMUSIC

युवा समाज को प्रेरणा देगा जवाहर ताराचंद कौल चौक – मंगल प्रभात लोढ़ा

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मुंबई। उपनगर मलाड पश्चिम में जवाहर ताराचंद कौल चौक का उद्घाटन करने के लिए महाविकास अघाड़ी सरकार के कैबिनेट मंत्री असलम शेख, भाजपा अध्यक्ष मंगल प्रभात लोढ़ा ,फिल्म अभिनेता सुनील शेट्टी और भाजपा सांसद गोपाल शेट्टी विशेष रूप से पहुंचे।
ज्ञात हो कि जवाहर तारा चंद क़ौल ७० के दशक के फिल्म सुपरस्टार रहे है। जवाहर कौल ने कई सुपर हिट फिल्मो में अपने अभिनय का जादू बिखेरा है। २७ सितंबर १९२७ को जन्मे जवाहर कौल का संबंध श्रीनगर कश्मीर से है आप का परिवार भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के परिवार का अंश है और उनसे सम्बंधित है। श्री कौल की प्रमुख फिल्मे ” पहली झलक ” ” पापी ” , ” अदालत ” ” दाग ” है जो उस समय सुपर हिट थी।
आप का देहांत अप्रैल १५ , २०१९ , को ९१ वर्ष की उम्र में हो गया था।

जवाहर कौल एक अच्छे अभिनेता ही नहीं समाज सेवक भी थे श्री कौल ने हमेशा से समाज की चिंता की और शिक्षा को बढ़ावा दिया। आज उनके बेटे प्राचार्य अजय कौल उसी मुहीम को आगे बढ़ाते हुए कार्य कर रहे है। अजय कौल अपने एकता मंच व चिल्ड्रेन वेल्फेअर सेंटर हाईस्कूल के माध्यम से सामाजिक और देश हित में कार्य करते हुए शिक्षा को हर वर्ग तक पहुंचाने में लगे है।

Jawahar Kaul Chawk at malad west , marve road

जवाहर कौल चौक का अनावरण उनकी स्मृति में बनवाया गया है। जिससे हमारा युवा समाज प्रेरणा ले और सामाजिक कार्य करते हुए देश की सेवा में आगे बढे। चौक के उद्घाटन समारोह में लगभग सैकड़ो लोगो ने भाग लिया जिसमे सभी राजनीतिक पार्टियों के लोग शामिल थे। प्राचार्य अजय कौल ने अपनी राजनीतिक सूझ बूझ का परिचय देते हुए शिक्षा के मंदिर में समाज के सभी लोगो को बुला कर एक नई ऊर्जा भरते हुए कला , संस्कृति और सिनेमा के उन सभी कलाकारों को प्रेरणा स्वरुप जवाहर कौल की स्मृति का अनावरण करवाया।

भाजपा अध्यक्ष मंगल प्रभात लोढ़ा ने इस अवसर पर कहा कि – ”युवा समाज को प्रेरणा देगा जवाहर ताराचंद कौल चौक , यह मात्र चौक नहीं है अपने आप में एक युग का इतिहास है जो समय समय पर दुहराया जायेगा।

UP Election 2022: यूपी में छठें चरण के लिए थमा प्रचार का शोर, 10 जिलों की 57 सीट पर गुरुवार को होगा मतदान

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UP Election 2022: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए छठें चरण के मतदान के लिए मंगलवार शाम प्रचार का शोर थम गया. अब 3 मार्च यानी गुरुवार को 10 जिलों की 57 सीट पर मतदान होगा. इन 57 सीटों पर मंगलवार शाम 6 बजे से ही प्रचार थम गया और अब 48 घंटे तक यह प्रतिबंध जारी रहेगा.

छठें चरण में गोरखपुर, देवरिया, अंबेडकरनगर, बस्ती, बलिया, बलरामपुर, संतकबीरनगर, कुशीनगर, महराजगंज और सिद्धार्थनगर में मतदान होगा. इस चरण में कटेहरी, टांडा, आलापुर, जलालपुर, अकबरपुर, तुलसीपुर, गैनसारी, उतरौला, बलरामपुर, शोहरतगढ़,कपिलवस्तु, बांसी, इटवा और डुमरियागंज में मतदान होगा.

इन सीटों पर भी होगा मतदान
इसके साथ ही हर्रैया, कप्तानगंज, रुधौली, बस्ती सदर, महादेवा, मेहदावल, खलीलाबाद, धनघटा, फरेंदा, नौतनवा और सिसवा में भी गुरुवार को वोटिंग होगी. इसी चरण में महाराजगंज, पनियरा, कैंपियरगंज, पिपराइच, गोरखपुर शहर, गोरखपुर ग्रामीण, सहजनवा, खजनी, चौरी चौरा, बांसगांव, चिल्लूपार, खड्डा और पडरौना में लोग वोट करेंगे.

इसके साथ ही तमकुही राज, फाजिलनगर, कुशीनगर, हाटा, रामकोला, रुद्रपुर, देवरिया, पथरदेवा और रामपुर कारखाना विधानसभा क्षेत्र में गुरुवार को मतदान होगा. वहीं भाटपाररानी, सलेमपुर, बरहज, बेल्थरा रोड, रसड़ा, सिकंदरपुर, फेफाना, बलिया नगर, बांसडीह और बैरिया में वोटिंग होगी.

292 सीटों पर हो चुकी है वोटिंग
बता दें यूपी में सात चरणों में वोटिंग होगी और 10 मार्च को काउंटिंग कराई जाएगी.

58 सीटों पर 10 फरवरी, 14 फरवरी को 55 सीटों पर, 20 फरवरी को 59, 23 फरवरी को 59 सीट, 61 सीटों पर 27 फरवरी को मतदान के साथ 292 सीटों पर नेताओं का भाग्य ईवीएम में कैद हो चुका है. वहीं  3 मार्च के बाद 7 मार्च को 54 सीटों पर मतदान होगा.

Bhagat Singh Koshyari : देश की जनता के जननायक है .

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भगत स‍िंह कोश्‍यारी राजनीत‍ि में अपनी सादगी के ल‍िए जाने जाते है. इस वजह से उन्‍हें उत्‍तराखंड में बच्‍चे से लेकर बुजुर्ग तक प्‍यार से भगत दा के नाम से पुकारते हैं. वह उत्‍तराखंड गठन के बाद बनी अंतर‍िम सरकार में मुख्‍यमंत्री की ज‍िम्‍मेदारी संभाल चुके हैं.

भगत दा’. RSS प्रचारक से राज्यपाल तक का सफर कर चुके भगत सिंह कोश्यारी ने महाराष्ट्र में एक नई तरह की राजनीति की शुरुआत की है। आम तौर पर एक राज्यपाल एक रबर स्टैम्प की तरह से होता है मगर भगत सिंह कोश्यारी ने एक राज्यपाल की भूमिका की पूरी की पूरी पृष्ठ्भूमि ही बदल कर रख दी है। महानगर मुम्बई की तमाम स्वमसेवी संगठनों और संस्थाओ को पुनर्जीवित कर दिया है , हर दिन कुछ न कुछ सांस्कृतिक , सामाजिक कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि के तौर पर भाग ले कर राजभवन से सामाजिक समरसता और समाज सेवा की प्रेरणा देने वाले भगत सिंह कोश्यारी आज महानगर मुम्बई ही नहीं सम्पूर्ण महाराष्ट्र की जनता के लाडले बन चुके है।
भगत दा में एक जननायक की भूमिका में नजर आते है। जनता के बीच रहना उन्हें सामाजिक कार्यो की प्रेरणा देना , देश की सेवा में प्रेरक बनाना उनकी ख़ासियत है। आज भले ही महाराष्ट्र की तिकड़ी सरकार के साथ उनका विवाद समय – समय खुल कर सामने आते रहे हो मगर उनके सामने सभी ने मुँह की खाई है। अभी अभी ताजे विवाद को भी ले कर उन्होंने एक साधे हुए राजनेता के तौर पर ज़वाब दे कर विरोधी पार्टियों को आईना दिखा दिया है।

घटना क्रम के अनुसार , महाराष्ट्र (Maharashtra) के कई नेताओं ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी (Bhagat Singh Koshyari) की, समर्थ रामदास को छत्रपति शिवाजी महाराज (Chhatrapati Shivaji Maharaj) का गुरु बताने वाली टिप्पणी पर सोमवार को आपत्ति जताई. इन नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता एवं छत्रपति शिवाजी महाराज के वंशज उदयनराजे भोंसले का नाम भी शामिल है. उन्होंने कोश्यारी के बयान पर आपत्ति जताते हुए उनसे तत्काल इसे वापस लेने को कहा है. कोश्यारी ने रविवार को औरंगाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान छत्रपति शिवाजी महाराज और चंद्रगुप्त मौर्य का उदाहरण देते हुए गुरु की भूमिका को रेखांकित किया था.

उन्होंने कहा था, ‘‘इस भूमि पर कई चक्रवर्ती (सम्राट), महाराजाओं ने जन्म लिया, लेकिन चाणक्य न होते तो चंद्रगुप्त के बारे में कौन पूछता? समर्थ (रामदास) न होते तो छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में कौन पूछता.’’ कोश्यारी ने कहा था, ‘‘मैं चंद्रगुप्त और शिवाजी महाराज की योग्यता पर सवाल नहीं उठा रहा हूं. जैसे एक मां, बच्चे का भविष्य बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, उसी तरह हमारे समाज में एक गुरु का भी बड़ा स्थान है.’’
खैर भगत दा के साथ विवादों का पुराना नाता है। वह राज्यपाल से ज्यादा एक नायक और जननायक की भूमिका में रहते है जिसे महाराष्ट्र की जनता बहुत प्यार करती है।

Shri Bhagat Singh Koshyari ji

देश की स‍ियासत में भगत स‍िंह कोश्‍यारी (Bhagat Singh Koshyari) क‍िसी पहचान के मोहताज नहीं है. राजनीत‍ि में अपनी सादगी के ल‍िए पहचाने जाने वाले भगत स‍िंंह कोश्‍यारी को प्‍यार से ‘भगत दा’ के नाम से पुकारा जाता है. भगत स‍िंह कोश्‍यारी उत्‍तराखंड बीजेपी (Uttarakhand BJP) के दिग्गज और वरिष्ठ नेताओं में शुमार रहे हैं. उन्‍होंने राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ (RSS) के प्रचारक से महाराष्‍ट्र के राज्‍यपाल तक का सफर तय क‍िया है, लेक‍िन भगत दा का यह राजनीत‍िक सफर बेहद ही उतार- चढ़ाव भरा रहा है. राजनीत‍ि में आने से पहले वह कॉलेज में एक श‍िक्षक के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे थे. ज‍िसके बाद वह राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ (RSS) में पूर्णकाल‍िक हो गए और अव‍िवाह‍ित रहते हुए RSS के स्‍वयं सेवक के साथ ही BJP  की राजनीत‍ि में सक्र‍िय रहे.

एटा के इंटर कॉलेज में क‍िया अध्‍यापन, RSS के संपर्क में आए और पूर्णकालि‍क हो गए

अंग्रेजी से परास्‍नातक करने के बाद भगत स‍िंह कोश्‍यारी ने अध्‍यापन के क्षेत्र में भव‍िष्‍य बनाने का प्रयास क‍िया. ज‍िसके तहत उन्‍होंने 1964 में एटा के राजाराम इंटर कॉलेज में बतौर प्रवक्‍ता काम करना शुरू क‍िया और कुछ वर्षों तक पढ़ाया. इसके बाद वह 1966 में RSS के संपर्क में आए और पूर्णकालि‍क हो गए. इसके बाद उन्‍होंने प्रवक्‍ता की नौकरी छोड़ कर प‍िथौरागढ़ की तरफ वाप‍िस रूख क‍िया और प‍िथौरागढ़ को अपनी कर्मभूम‍ि बनाया.

प‍िथौरागढ़ के सरस्‍वती श‍िशु मंदि‍र की स्‍थापना के साथ ही यहीं पढ़ाया भी

प‍िथौरागढ़ लौटे भगत स‍िंह कोश्‍यारी ने 1977 में ज‍िले के अंदर सरस्‍वती श‍िशु मंद‍िर की स्‍थापना की और लंबे समय तक इस स्‍कूल में अध्‍यापन का काम भी क‍िया. इसके साथ ही उन्‍होंने  पर्वत पीयूष नाम से साप्‍ताहि‍क समाचार पत्र का संपादन और प्रकाशन क‍िया. ज‍िसमें वह जनसरोकारों के मुद्दे उठाते रहे. वह आपतकाल के दौरान तकरीबन दो सालों तक फतेहगढ़ जेल में बंद भी रहे.

1997 में व‍िधानपर‍िषद पहुंचे, 2001 में बने उत्‍तराखंड के मुख्‍यमंत्री

भगत सिंह कोश्यारी लंबे समय तक कुमाऊं व‍िव‍ि की कार्यकारी प‍र‍िषद के सदस्‍य भी रहे. तो वहीं वह 1997 में पहली बार व‍िधानपर‍िषद पहुंचे. इसके बाद जब 2000 में पृथक उत्‍तराखंड बना तो गठ‍ित पहली अंतर‍िम सरकार में उन्‍हें कैब‍िनेट मंत्री बनाया गया, लेक‍िन एक साल बाद ही वह अंतर‍िम सरकार के मुख्‍यमंत्री बनाए गए. इसके एक साल बाद 2002 में उत्‍तराखंड का पहला व‍िधानसभा चुनाव आयोज‍ित क‍िया गया. इस चुनाव में भगत स‍िंह कोश्‍यारी कपकोट से व‍िधानसभा पहुंचे, लेक‍िन बीजेपी को बहुमत नहीं म‍िला. इस दौरान भगत स‍िंह कोश्‍यारी ने नेताप्रत‍िपक्ष के तौर पर ज‍िम्‍मेदारी संभाली.

दोबारा मुख्‍यमंत्री बनने से चूके तो राज्‍यसभा पहुंचे

2007 के चुनाव में बीजेपी को भगत स‍िंह कोश्‍यारी के नेतृत्‍व में सफलता म‍िली, लेक‍िन बहुमत का आंकड़ा प्राप्‍त कर लेने के बाद भी बीजेपी ने भगत स‍िंह कोश्‍यारी को मुख्‍यमंत्री नहीं बनाया गया. उनकी जगह पर केंद्र की राजनीत‍ि में सक्र‍िय भुवन चंद्र खंडूरी को मुख्‍यमंत्री बनाया गया. इसके बाद 2008 में भगत स‍िंह कोश्‍यारी को उत्तराखंड कोटे से राज्यसभा का सदस्य बनाया गया. वहीं इस दौरान भगत सिंह कोशियारी भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहे.

2014 में लोकसभा पहुंचे, 2019 में बने महाराष्‍ट्र् के राज्‍यपाल

भगत सिंह कोश्यारी उत्तराखंड की कपकोट विधानसभा सीट से 2 बार विधायक रह चुके हैं. वहीं उन्‍होंने 2014 में नैनीताल सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा. ज‍िसमें उन्‍हें जीत म‍िली. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव से उन्‍होंने दूरी बनाई. 2019 जब दोबारा मोदी सरकार सत्‍ता में आई तो 31 अगस्त 2019 को सरकार ने उन्हें महाराष्ट्र का राज्यपाल नियुक्त किया.

महर्षि दयानन्द सरस्वती :महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने आर्य समाज का हिन्दी मे प्रचार प्रसार किया हे

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महर्षि दयानन्द ,कखन जी भाई नमक औचित्य ब्राह्मण गुजरात के टंकारा गाँव मे करीबन 200 साल पहले जमादार थे।वे शिव भक्त थे,इन्हे मूलशंकर नामक पुत्र था मूल शंकर धर्म,श्लोक और सूत्र सीखाते थे।,सैट साल की उम्र मे इन्हे जनोई धरण करने सीखा दिया।यजुर्वेद भी पढ़ाया मूलशंकर ने व्याकरण वेद का अभ्यास कर लिया 14 साल की उम्र मे अर्थववेद संहिता सीख ली,21 साल की उम्र मे शादी करनी थी,उसे शादी देना चाहते थे उनके मातपिता , 1903 मे एक शाम को मूल शंकर ने गृह त्याग कर दिया

मूलशंकर लाला भगत की भूमि मे साला पहुचे।वहा ब्रह्मचर्य की दीक्षा ली,भगवा धारण कर लिया,वे सिध्ध्पुर मेले मे एक दिन पाहुच गए,वहा इनके पिताजी से भेट हुई ,मूलशंकर ने पिताजी के पेर पकड़ लिया वहा से अहमदाबाद,अहमदाबाद से बड़ौदा पहुच गए,वहा से चनोद करनाली जा पहुचे।पिताजी ने उसे समझाने के लिए दो पहरेदार रखे थे,वहा से वे सिध्ध्पुर से रात मे अंधेरे मे निकल पड़े,महाराष्ट्र के श्रुंगेरी मठ के परमानंद सरस्वती ने उन्हे ब्रह्मचारी सन्यासी  की दीक्षा दी,यहा से इन्हे दयानन्द सरस्वती नाम प्राप्त हुआ.दयानन्द ने हरद्वार के कुम्भ के मेले मे योगियो से ज्ञान समागम किया,काँगड़ी गुरुकुल रम्या तपोवन मे गौरी कुंड मे जलस्रोत पर बैठकर एक माह अघोर तपस्या की त्रिस साल की उम्र मे विध्याचल घूमे।बतिस वे वर्ष मे दुर्गाकुंड मंदिर मे चंडालगढ़ पहुचे,वहा आननका त्याग किया और शुद्ध दूध हारी बने,

   दयानन्द 1914 मे तैतीस साल की उम्र मे नर्मदा नदी के दर्शन को निकल पड़े,नर्मदाके मूल की शोध की त्रिस साल वे घूमते रहे,1917 मे विध्या प्राप्त की,बाद मे मथुरा पहुच गए॰अमरीका के कर्नल ओलकोट और ऋषि रमणी मेडम ब्लेवेरस्की थियोसोफ़िकल सोसाइटी के स्थापक थे,उनहो ने दयानन्द सरस्वती जी की बाते सुनी थी,थियोसोफ़िकल सोसाइटी ने उन्हे आर्य समाज का एक अंग बना दिया था,वे डौनो स्वामी जी के शिष्य  बन गए।1937 मे मुजफ्नगर मे आर्य समाज मे दूसरे वार्षिकोत्सव मे उपस्थित होकर सरस्वती जी ने दो भाषण दिये,थियोसोफ़िकल सोसाइटी से सावधानी बरतने के संकेत दिये और मेडम ब्लेवस्की की सख्त आलोचना की,महर्षि का जीवन चरित्र विरतव की घटनाओ से भरा हुआ हे,मणिरत्न जेसे उनका जीवन प्रकाशित हे।मतभेद रखनेवालों सत्या की पहचान कराई हे।उन्होने एक साथ चालीस से पचास राजपूतो को यज्ञोपवीत दिया हे,स्त्रियो को गायत्री मंत्र पढ़ने का अधिकार मरशी दयानन्द  सरस्वती ने दिलाया,मेरठ मे महाराज ने श्रद्धा का खंडन करने के लिए भाषण किया था।

    दयानन्द जी को मूर्ति पुजा मे विरोध था,नौवि सदी मे विदेशी आक्रमण को रोकने मे भारत तददन निसफल साबित हुआ था,छोटे छोटे जमी के विभाजित राजाओ अपने को पृथ्वीपति मानने लगे थे,ज्ञाति प्रथा बढ़ रही थी,बल विवाह की रस्म सर्व सामान्य बन गई थी.विवाह करके पाँच साल मे विधवा बनी हुई पुत्री का दुख मात पिता के दिल को नहीं छु सका था,लिखने पढ़ने को सिख ले तो अभ्यास पूर्ण हो गया समझा जाता था।ब्रहमीन का लड़का क्रियाकन्द सीखने पाठशाला  जाता था,व्याकरण न्याय वेदान्त विज्ञान और इतिहास का अभ्यास क्रम मे स्थान नहीं था,धर्म मे बिता समय और परमानंद के अनुसार संध्या वंदन ,पुजा पाठ देव दर्शन और कीर्तन किए जाते थे। 

   इस परिस्थिति मे परिवर्तन लाने वाले राजा राम मोहन राय इलाहि से प्राश्चर्यार्थ संस्कृति की अवर से जन्मा था,इस समय मे स्वामी नारायण ,महर्षि दयानन्द और राम कृष्ण परमहंस का उदभवस्वयं और इस देश की धर्म संस्कृति पर आधारित था,महर्षि दयानंद उज्ज्वल ज्योति पुंज थे,मूलशंकर से दयानंद मे परिवर्तन की कथा ,त्याग ,तपस्या ,लगन और ध्येय प्राप्ति की कथा उल्का मे तेजस्वी लाइन जेसे हे,जाती प्रथा तोड़ने की अन्य धर्म के लोगो को हद धर्म मे लानेकी कन्या पढ़ाई की महर्षि की बाते आज भी कम नहीं हुई हे,मूर्ति पुजा का विरोध किया था,उनके वक्तव्य के सामने पंडित भी अवाक बन जाते थे,उनका कार्य क्षेत्र पांचाल था,एक हजार साल से विदेशियों को रोकने वाले पंपावियों के धर्म ने क्रांति की चिंगारी उन्हे स्पर्श कर गई,थी,देश के विभिन्न प्रांतो मे उन्होने प्रवास किया था,अलवर के राजा उनसे प्रभावित हुए थे,और अपने साथ अलवर ले गए थे,किन्तु राजा के पास साई जा नहीं सकते थे,इस लिए अलवर छोड़ दिया,और मथुरा मे वेद पाठशाला की स्थापना की,वे प्रामाणिक ग्रंथ ही छात्रों को पढ़ाते थे,आगरा मे वे गीता कथा करते थे,एक माह तक वहा रहे थे,मूर्ति पुजा नहीं करना हे,यह बात सभी को वे समझाते थे,उनकी बाते सुनकर लोग मूर्तिया नदी मे फेंक आते थे,हरद्वार  मे गए तो अंध श्रद्धा देखकर बहुत व्यथित हुये ,

वेद धर्म का गौरव बढ़े और युवाओ आगे बढ़े एसी उनकी सोच थी,विध्यालय बनाने और गुरुकुल चलाकरयुवाओ को तालिम देकर सशक्त बनाने की बात इनहो ने काही थी।

हिन्दी भाषी द्रष्टि कोण प्रचार के लिए प्रकाश डालते थे।हिन्दी भाषा मे लेख प्रकाशित करते थे,लोगो को समझाने के कम उन्होने किया हे,वे काशी गए थे,अंध विश्वास देखा डरने लगे,काशी नरेश के पंडित तैयार करो शास्त्रार्थ करने को कहा,वहा से वे कोलकाता गए,वहा के अग्रणी उनके पास जाते थे,केशव सेन के साथ बहुत चर्चा हीदी मे ही होती थी,कोलकाता से वे मुंबई हुगली नासिक मथुरा गए,गुजरात सारा और वहा से चितोड़ जोधपुर उड़ेपुर गए।उड़ेपुर के राजा जसवंत उनसे प्रभावित थे,वे वेदगन स्तुति संस्कृत मे करते थे,प्रार्थना के बाद हिन्दी मे गायत्री मंत्र करते थे।   लोगो मे राष्ट्र भावना जताने ,देश भक्ति जताने के लिए कार्य करते थे,एक धर्म और एक भाषा हीदी का लक्ष रखकर देश की उन्नति की खेवना करते थे,महर्षि दयानन्द आज भी उनके विचारो से हमारे बीच जीवित हे,उनके चरणों मे कोटी कोटी वंदन करते हुए जन्म दिन अवसर पर पुष्पांजलि अर्पित करते हे।

डॉ गुलाब चंद पटेल

कवि लेखक अनुवादक

मो.88497 94377

फिल्म समीक्षा : गंगूबाई काठियावाड़ी

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फिल्म समीक्षा : गंगूबाई काठियावाड़ीरिलीज डेट : 25 फरवरी 2022कलाकार : आलिया भट्ट, अजय देवगन, शान्तनु माहेश्वरी, विजय राज, सीमा पाहवा, इंदिरा तिवारी, जिम सरभ, वरुण कपूर और हुमा क़ुरैशी आदि।क्रिटिक्स रेटिंग : *** 3.5डायरेक्टर : संजय लीला भंसालीनिर्माता :  संजय लीला भंसाली और जयंतीलाल गड़ाशैली : बायोपिकसंगीत : संचित बल्हारा , अंकित बल्हाराछायांकन : सुदीप चटर्जी

                       आलिया भट्ट की मोस्ट अवेटेड फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ वेश्यावृत्ति पर आधारित है। भंसाली प्रोडक्शन की यह फिल्म हुसैन जैदी की किताब ‘माफिया क्वींस ऑफ मुंबई’ के अध्यायों का रूपांतरण है और इसमें आलिया मुख्य भूमिका में है। इस फिल्म के माध्यम से एक गंभीर मुद्दे को सरलता के साथ रखा गया है जो वाकई काबिले तारीफ है। आलिया भट्ट इस फिल्म में यकीनन अपने फिल्मी करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की है। इस फ़िल्म में अजय देवगन की उपस्थिति 10 मिनट की है।सीमा पाहवा ने अपने किरदार को बहुत सही तरीके से जीवंत किया है। अपने छोटे से रोल में विजय राज बहुत जंचते हैं । शांतनु माहेश्वरी ने अपनी अदायगी का अमिट छाप छोड़ है। उन्हें इस रोल के लिए पसंद किया जाएगा । वरुण कपूर ठीक हैं । जिम सरभ (पत्रकार अमीन फैजी) बेहतरीन हैं । इंदिरा तिवारी (कमली) जो आखिरी बार सीरियस मेन [2020] में नजर आईं थीं इस फिल्म में उनकी उपस्थिति एक सरप्राइज है । राहुल वोहरा (प्रधानमंत्री) ठीक हैं । मधु (गंगूबाई द्वारा बचाई गई लड़की), शौकत अब्बास खान, बिरजू, डेंटिस्ट आदि का किरदार निभाने वाले कलाकार  अपने हिसाब से ठीक हैं। इनसे संजय लीला भंसाली और अच्छा काम ले सकते थे। ‘शिकायत’ गाने में हुमा कुरैशी अच्छी लगती हैं । संगीतकार संचित बल्हारा और अंकित बल्हारा का बैकग्राउंड स्कोर काफी बेहतर है । सुदीप चटर्जी की सिनेमेटोग्राफ़ी उम्दा है और कमाठीपुरा सेट के दृश्यों को खूबसूरती से कैप्चर किया गया है । सुब्रत चक्रवर्ती और अमित रे का प्रोडक्शन डिजाइन आंखों को भाता है और वास्तविक भी लगता है। शीतल इकबाल शर्मा की वेशभूषा आकर्षक है, खासकर आलिया द्वारा पहनी गई सफेद ड्रेसेस । शाम कौशल का एक्शन ठीक है । वीएफएक्स बढ़िया है । संजय लीला भंसाली की एडिटिंग कुछ जगहों पर और बेहतर हो सकती थी जो नहीं हो सकी। फिर भी ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ एक दमदार कहानी से सजी आलिया भट्ट के फिल्मी करियर की अब तक की सबसे असरदार अभिनय से सजी फिल्म है जिसमें कुछ मानवीय संवेदनाओं से जुड़े बेहद ही शानदार सीन्स हैं। उम्मीद की जा रही है कि बॉक्स ऑफ़िस  की कसौटी पर खरी उतरेगी।
समीक्षक : राज दीप पाण्डेय

सत्ता के लिए संस्कृति से न करें समझौता –  महामंडलेश्वर विश्वेश्वरानंद गिरी

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मुंबई। मालाड के मालवणी में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार और उनके पलायन  पर आधारित पुस्तक का विमोचन स्वातंत्र्यवीर विनायक सावरकर की पुण्यतिथि के अवसर पर शनिवार को किया गया। वर्ली स्थित सेंचुरी मार्केट के पास मुंबई शहीद स्मारक के पास  आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित महामंडलेश्वर परम पूज्य श्री विश्वेश्वरानंद गिरी जी महाराज ने ‘मुंबई सुरक्षिततेच्या उंबरठ्यावर’ पुस्तक का विमोचन किया।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री विश्वेश्वरानंद जी महाराज ने कहा कि सत्ता के लिए संस्कृति से समझौता नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं लेकिन जब-जब हिंदू धर्म पर आंच आई तब-तब हमने उसके खिलाफ आवाज उठाने का काम किया। उन्होंने वीर सावरकर को याद करते हुए कहा कि आज उनकी पुण्यतिथि है इसलिए समस्त हिंदुओं को समाज की लड़ाई लड़नी चाहिए। पुस्तक के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि यह मात्र एक पुस्तक नहीं बल्कि हिंदुओं पर हुए अत्याचार की सच्ची कहानी है इसलिए अगर हिंदू समाज को जिंदा रखना है तो हिंदुओं को जागरूक होना पड़ेगा। इसके साथ-साथ अपनी संस्कृति को बचाने के लिए हर लड़ाई लड़नी पड़ेगी। महाराज जी ने कहा कि मुंबई में एक ऐसा समाज है जिसके लाऊडस्पीकर से जनता परेशान है लेकिन कोई कुछ नहीं बोलता। लेकिन जब हमारे मंदिरों की घंटियां बजती हैं तो आसपास के लोग उसका विरोध करते हैं। महाराज जी ने कहा कि जो बालासाहेब ठाकरे हिंदुत्व और मराठी मानुष की विचारधारा पर आजन्म कायम रहे, आज उनके बेटे उन बातों और उनकी विचारधारा को भूल गए हैं। शिवसेना को इस पर विचार करना चाहिए।

धर्मरक्षा मंच की ओर से आयोजित इस पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में उपस्थित भाजपा विधायक नितेश राणे ने कहा कि मुंबई की कानून व्यवस्था खराब हो गई है। राज्य की महाविकास आघाड़ी की सरकार में महिलाएं अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रही हैं, विशेषकर हिंदू महिलाएं। साल 1993 में हुए बम धमाकों को याद करते हुए नितेश राणे ने कहा कि शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे के कारण मुंबई सुरक्षित नहीं होती तो उस दौरान हिंदुओं का क्या होता, यह कोई बता नहीं सकता। लेकिन शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे वाली शिवसेना अब रही नहीं क्योंकि जिस विचारधारा और दल का बालासाहेब ठाकरे विरोध करते थे, आज उसी दल और विचारधारा के साथ उनके बेटे सरकार चला रहे हैं। राणे ने कहा कि इस पुस्तक के माध्यम से हिंदुओं को जागरूक होना पड़ेगा, नहीं तो भविष्य में समाज पर एक विशेष समाज राज करना शुरू कर देगा। इस अवसर पर मुंबई भाजपा अध्यक्ष व विधायक मंगल प्रभात लोढ़ा, मुंबई भाजपा उपाध्यक्ष आचार्य पवन त्रिपाठी, मुंबई सचिव सचिन शिंदे और पुस्तक के लेखक प्रकाश गाडे सहित बड़ी संख्या में पदाधिकारी और कार्यकर्ता उपस्थित थे।

ज्ञात हो कि ‘मुंबई सुरक्षिततेच्या उंबरठ्यावर’

पुस्तक में मुंबई के हिंदुओं की सुरक्षा से लेकर मुस्लिम तुष्टिकरण तक कई आवश्यक व संवेदनशील मुद्दों को समाहित किया गया है। मुंबई की बस्तियों में भेदभाव, मालवणी में हिंदुओं की दशा से लेकर हिंदुओं के समग्र चिंतन को इस पुस्तक में प्रकाशित किया गया है।

आधुनिक दधीचि वीर सावरकर

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“चालीस हजार शताब्दियों का हिन्दू इतिहास कोई ताड़ के पत्तों पर नहीं लिखा गया, जो हाथ से गिरते ही मिट जाएगा. हिन्दू धर्म ना ही कोई गोलमेज परिषद हैं बल्कि यह एक गौरवान्वित जाति का महान जीवन हैं जिसके सम्बन्ध में कहानियां नहीं बल्कि सदियों का पूरा इतिहास हैं” – वीर सावरकर

भारतीय वांग्मय में महर्षि दधीचि द्वारा विश्व कल्याण के लिए अपनी हड्डियां दान किये जाने का उल्लेख है ,दूसरा अभिलेख वीर विनायक दामोदर सावरकर ने अपने जीवनचरित से हमारे मानस पर टंकित कर दिया है। उन्होने देश को स्वतन्त्र कराने के लिए अपने तन -मन -धन का रेशा -रेशा मातृभूमि और यहाँ के लोगों के लिए लुटा दिया वह भी एक वर्ग विशेष की लगातार योजनाबद्ध लांछन से भी बिना किंचित विचलित हुए। विश्व के इतिहास में ऐसे बहुत कम उदाहरण हैं कि कोई व्यक्ति अपना सर्वस्व देश के लिए न्यौछावर करता रहे चाहे उसको इसके बदले में कुछ मान – सम्मान या अन्य लाभ मिलता हो अथवा नहीं। लेकिन ऐसे लोगों का विवरण तो दुर्लभ है जिनके बलिदानों को विवादित करने की लगातार कुचेष्टाओं के बाद भी कोई अपने समाज एवं देश के लिए उत्सर्ग दिन दोगुना रात चौगुना निरपेक्ष भाव से बढ़ाता रहे।वीर सावरकर उस राजर्षि का नाम है जिनकी दूरदर्शिता का कोई तोड़ नहीं, जिनकी स्पष्टवादिता का कोई विकल्प नहीं।

विनायक दामोदर सावरकर भारत के वीर स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रवादी नेता थे। उन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया था। उनका नाम भारतीय इतिहास में बहुत ही गर्व के साथ लिया जाता है।वीर सावरकर राष्ट्रवादी संगठन हिंदू महासभा के प्रमुख सदस्य रहकर भी अपने सभी कर्तव्यों को भलीभांति निभाते रहे। वे पेशे से तो वकील थे लेकिन अपने जीवन के अनुभव से वे एक महान शोधकर्ता सह लेखक के रूप में भी उभर कर सामने आए। उन्होंने दस हज़ार पंक्तियों से अधिक कविताओं और कई नाटकों के लेखन से मराठी साहित्य को समृद्ध किया। उन्होने भारतरत्न लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर के लिए भी एक नाटक लिखा था। उनके लेखन ने सदैव ही लोगों को हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की प्रेरणा दी। अपने व्याख्यानों और विमर्शों से हमेशा ही लोगों को सामाजिक और राजनैतिक एकता के बारे में समझाते रहते थे। वीर सावरकर एक ऐसे नेता थे जिन्होंने राजनीति के साथ-साथ संस्कृति को भी अपने जीवन में महत्वपूर्ण स्थान दिया,यहां तक की हिंदुत्व की रक्षा के लिए उन्होंने स्वयं ही आत्मतर्पण करके अनुपम उदाहरण भारत के इतिहास में प्रस्तुत किया।

नाम – विनायक दामोदर सावरकर उपाख्य वीर सावरकर
जन्म – 28 मई 1883 (जन्म स्थान – नासिक, मुंबई, भारत)
व्यवसाय – वकालत , राजनीतिक कार्यकर्त्ता , सामाजिक लेखक और कार्यकर्ता
जीवन लक्ष्य – भारत देश को हिंदुत्व की ओर ले जाना
शैक्षिक योग्यता – वकालत
पिता का नाम – दामोदर सावरकर
माता का नाम – राधाबाई सावरकर
पत्नी का नाम – यमुनाबाई
बच्चे – विश्वास, प्रभाकर और प्रभात चिपलनकर
भाई/ बहन – गणेश, मैनाबाई और नारायण
मृत्यु – 26 फरवरी 1669

विनायक दामोदर सावरकर का प्रारंभिक जीवन,

नासिक जिले के भगूल में एक साधारण हिंदू ब्राह्मण परिवार में 28 मई 1883 को विनायक दामोदर सावरकर का जन्म हुआ था। बचपन से ही देश भक्ति का भाव उनके मन में भरा हुआ था। मात्र 12 साल की उम्र में ही विनायक सावरकर ने मुसलमान छात्रों के एक समूह को भगा दिया जिन्होंने पूरे शहर में अफरा-तफरी मचा रखी थी.उनके उस साहस और बहादुरी के लिए उनकी बहुत प्रशंसा हुई और उन्हें वीर विनायक दामोदर सावरकर कहा जाने लगा। बचपन से ही देश के लिए कुछ करने की लगन ने उन्हें क्रांतिकारी युवा बना दिया। इस काम में उनके बड़े भाई गणेश ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया और कालांतर में वे एक युवा खिलाडी के रूप में उभरे फिर धीरे -धीरे उन्होंने युवा समूह का आयोजन किया जिसे बाद में ‘मित्र मेला’का नाम दिया गया.

विनायक दामोदर सावरकर की १८५७ के विद्रोह पर लिखी किताब,

वीर सावरकर ने १८५७ के विद्रोह और उस समय के गुरिल्ला युद्ध का बहुत सूक्ष्म अध्ययन करके लन्दन में वकालत की पढ़ाई के दौरान उस पर एक पुस्तक लिखी “द हिस्ट्री ऑफ द वॉर ऑफ द इंडियन इंडिपेंडेंस”। इस पुस्तक ने अंग्रेजी सरकार की नींद लूट ली। अंग्रेजी सरकार ने इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया।परन्तु यह पुस्तक न केवल क्रांतिकारियों तक देश भर में पहुंचाई गयी बल्कि लोगों ने छिप -छिपकर इसका सामूहिक वाचन भी किया। उन्होंने अपने दोस्तों के बीच इस पुस्तक को भी को बांट दिया। शीघ्र ही वीर सावरकर को राष्ट्रद्रोह के आरोप में अंग्रेजी सरकार ने गिरफ्तार किया।वीर सावरकर ने इसके अलावा अन्तजर्वाला,हिन्दू पद – पादशाही ,काला पानी ,हिन्दुत्व आदि पुस्तकें भी लिखीं।

सावरकर को काला पानी की सजा,

भारत लौटकर सावरकर ने अपने भाई गणेश के सहयोग से ” इंडियन कॉउन्सिल एक्ट 1909 (मिंटो- मोर्ली फॉर्म्स) “के विरोध में प्रदर्शन करना आरंभ किया। इससे ब्रिटिश पुलिस ने विनायक सावरकर को अपराधी घोषित करते हुए उनके विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी किया। उस गिरफ्तारी से बचने के लिए सावरकर पैरिस चले गए। सन 1910 में सावरकर को ब्रिटिश पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया और उन्हें अपराधी ठहराते हुए उनके विरुद्ध अदालत में केस दर्ज कराया गया, जिस की सुनवाई के लिए उन्हें मुंबई भेज दिया गया। इस मामले में उन्हें 50 साल की सजा सुनाई गई और उन्हें 4 जुलाई 1911 को अंडमान निकोबार द्वीप समूह में कालापानी की सजा के तौर पर सेल्यूलर जेल में बंद कर दिया। उस सजा के दौरान लगातार उन्हें प्रताड़ना का सामना करना पड़ा लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। वहां पर रहने वाले कैदियों को उन्होंने पढ़ाना -लिखाना शुरू कर दिया। कुछ समय पश्चात उन्होंने उस जेल के अंदर एक बुनियादी पुस्तकालय शुरु करने के लिए सरकार से अनुरोध किया और जेल में ही पुस्तकालय शुरु कर दिया गया.

विनायक दामोदर सावरकर द्वारा हिन्दू सभा का निर्माण,

वीर सावरकर 6 जनवरी 1924 को कालापानी की सजा से मुक्त हो गए।इसके बाद उन्होंने भारत में रत्नागिरी हिंदूसभा के गठन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस सभा का मुख्य उद्देश्य सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को पूरी तरह से संरक्षण प्रदान करना था। सन 1937 में विनायक सावरकर को हिंदू सभा के सदस्यों द्वारा उन्हें हिंदू सभा का अध्यक्ष बना दिया गया। उसी कालखंड में मोहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस के शासन को हिंदू राज के रूप में घोषित कर दिया। पहले से ही हिंदू और मुसलमान के बीच देश में झगडे चल रहे थे, जिन्ना के इस आरोप ने उनके बीच चल रहे तनाव को और अधिक बढ़ा दिया। उनकी कोशिश सदैव यहीं थी कि वे एक हिंदू राष्ट्र का निर्माण करें, इसलिए विनायक सावरकर ने इस प्रस्ताव पर ध्यान दिया और इसके लिए उनके साथ कई सारे भारतीय राष्ट्रवादी भी जुड़ गए, जिनके बीच सावरकर की लोकप्रियता धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी.

विनायक दामोदर सावरकर गांधीजी के रहे विरोधी

वीर सावरकर भारत देश को हिंदुत्व की ओर ले जाना चाहते थे जबकि महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इसके घोर आलोचक थे इसलिए उन्होंने गांधी जी की नीतियों और गतिविधियों का विरोध किया जिनमें से भारत छोड़ो आंदोलन भी एक है। सावरकर कभी भी नहीं चाहते थे कि भारत को दो राष्ट्रों में बांट दिया जाए इसलिए वे विभाजन के पक्ष में कभी भी नहीं रहे। उनका मानना यह था कि एक देश में दो राज्यों के सह -अस्तित्व का प्रस्ताव रखा जाए ना कि एक राशि को दो राष्ट्रों में बाँटकर उसके टुकड़े कर दिए जाएं। उन्होंने खिलाफत आंदोलन के दौरान मुसलमानों के साथ तुष्टिकरण की महात्मा गांधी की नीति की आलोचना की. अपने कई लेखो में तो उन्होने गांधी जी को पाखंडी कहा है। वे गांधीजी के बारे में कहते थे कि वे एक अपरिपक्व मुखिया हैं, जिन्होंने छोटी सोच रखते हुए देश का सर्वनाश कर दिया.

वीर सावरकर की मृत्यु कैसे हुई,

वीर सावरकर ने अपने जीवन में इच्छा मृत्यु का प्रण ले लिया था इसलिए उन्होंने पहले ही सबको बोल दिया था कि वे अपनी मृत्यु तक उपवास रखेंगे अन्न का एक दाना भी मुंह में नहीं रखेंगे। अपने अंतकाल में लिए गए उपवास को लेकर उन्होंने यही कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने की पूरी अनुमति प्राप्त होनी चाहिए कि वह अपना जीवन कैसे समाप्त करना चाहता है और किस प्रकार अपने जीवन का वहन करना चाहता है इस बात की पूरी अनुमति उस व्यक्ति को मिलनी चाहिए। उन्होंने जैसे ही अपने प्रण के अनुसार उपवास आरंभ किए उस दौरान अपनी मृत्यु से पहले एक लेख लिखा जिसका नाम ‘यह आत्मह्त्या नहीं आत्मतर्पण है’ 1 फरवरी 1966 को सावरकर ने यह घोषणा कर दी थी कि आज से वह उपवास रखेंगे और भोजन करने से बिल्कुल परहेज करेंगे।उनकी यह प्रतिज्ञा थी कि जब तक उनकी मौत नहीं आएगी तब तक वह अन्न का एक दाना मुंह में नहीं रखेंगे। उनके इस प्रण के बाद लगातार वे अपने उपवास का पालन करते रहे और आखिरकार अपने मुंबई निवास पर 26 फरवरी 1966 में उन्होंने अंतिम सांस ली। सावरकर का घर और उन से जुड़ी सभी वस्तुएं अब सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए संरक्षित रखी गई है.

विनायक दामोदर सावरकर के विचार,

1- ज्ञान प्राप्त होने पर किया गया कर्म सफलतादायक होता है, क्योंकि ज्ञान – युक्त कर्म ही समाज के लिए हितकारक है. ज्ञान – प्राप्ति जितनी कठिन है, उससे अधिक कठिन है – उसे संभाल कर रखना . मनुष्य तब तक कोई भी ठोस पग नहीं उठा सकता यदि उसमें राजनीतिक, ऐतिहासिक,अर्थशास्त्रीय एवं शासनशास्त्रीय ज्ञान का अभाव हो.
2- देशभक्ति का अर्थ यह कदापि नहीं है कि आप उसकी हड्डियाँ भुनाते रहें. यदि क्रांतिकारियों को देशभक्ति की हुडियाँ भुनाती होतीं तो वीर हुतात्मा धींगरा, कन्हैया कान्हेरे और भगत सिंह जैसे देशभक्त फांसी पर लटककर स्वर्ग की पूण्य भूमि में प्रवेश करने का साहस न करते. वे ए क्लास की जेल में मक्खन, डबलरोटी और मौसम्बियों का सेवन क्र, दो-दो माह की जेल –यात्रा से लौट क्र अपनी हुडियाँ भुनाते दिखाई देते.
3- इतिहास, समाज और राष्ट्र को पुष्ट करनेवाला हमारा दैनिक व्यवहार ही हमारा धर्म है. धर्म की यह परिभाषा स्पष्ट करती है कि कोई भी मनुष्य धर्मातीत रह ही नहीं सकता. देश इतिहास, समाज के प्रति विशुद्ध प्रेम एवं न्यायपूर्ण व्यवहार ही सच्चा धर्म है.
4- मन सृष्टि के विधाता द्वारा मानव-जाति को प्रदान किया गया एक ऐसा उपहार है, जो मनुष्य के परिवर्तनशील जीवन की स्थितियों के अनुसार स्वयं अपना रूप और आकार भी बदल लेता है.

सावरकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातें,

1- वीर सावरकर ने खुद को नास्तिक घोषित कर दिया था, इसके बावजूद भी हिंदू धर्म को वे पूरे दिल के साथ निभाते थे. और लोगों को उसकी और बढ़ने के लिए प्रोत्साहित भी किया करते थे. क्योंकि राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान के रूप में वे खुद को हिंदू मानते थे और यदि कोई उनको हिंदू बुलाता था तो उन्हें बहुत ज्यादा गर्व महसूस हुआ करता था.
2- वे कभी भी हिंदुत्व को धर्म के रूप में नहीं मानते थे. बे अपनी पहचान के रूप में हिंदुत्व को देखा करते थे वही उन्होंने हजारों रुढ़िवादी मान्यताओं को खारिज कर दिया था जो हिंदू धर्म से जुड़ी हुई थी, लेकिन व्यक्ति के जीवन में उन मान्यताओं का कोई भी आधार नहीं था.
3- अपने जीवन का राजनैतिक रूप भी बखूबी निभाया, उन्होंने राजनैतिक रूप में मूल रूप से मानवतावाद, तर्कवाद, सार्वभौमिक, प्रत्यक्षवाद, उपयोगितावाद और यथार्थवाद का एक मुख्य मिश्रण अपने जीवन में अपनाया.
4- देश भक्ति के साथ-साथ भारत की कुछ सामाजिक बुराइयों के खिलाफ दोनों ने अपनी आवाज उठाई जैसे जातिगत भेदभाव औऱ अस्पृश्यता जो उनके समय में बह प्रचलित प्रथा मानी जाती थी.
5- उनका कहना था कि उनके जीवन का सबसे अच्छा और प्रेरित भरा समय वह था जो समय उन्होंने काला पानी की सजा के दौरान जेल में बिताया था. काला पानी की सजा के दौरान जेल में रहते हुए उन्होंने काले पानी नामक एक किताब भी लिखी थी जिसमें भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ताओं के संघर्षपूर्ण जीवन का संपूर्ण वर्णन है.

विनायक दामोदर सावरकर के जीवन पर बनी फिल्में,

1- वीर सावरकर के जीवन पर सन 1996 में पहली फिल्म बनी थी जिसमें अन्नू कपूर मुख्य रोल में नजर आए थे. वह मलयालम और तमिल 2 भाषाओं में रिलीज हुई थी उसका नाम काला पानी था.
2- 2001 में फिर से सावरकर के जीवन पर वीर सावरकर नामक फिल्म बनाना शुरू किया गया जिसे बाद में रिलीज भी किया गया और बेहद पसंद भी किया गया।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी सेनानी वीर सावरकर एक वक्ता, विद्वान, विपुल लेखक, इतिहासकार, कवि, दार्शनिक और में कार्यकर्ता थे।
वे विश्व के अबतक के अकेले व्यक्ति हैं जिनको एक ही जीवन में दो बार आजीवन कारावास का दंड अपने देश से अटूट प्रेम के कारण मिला। महात्मा गाँधी इनके त्याग , समर्पण और चतुराई के कायल थे। चालीस हजार शताब्दियों का हिन्दू इतिहास कोई ताड़ के पत्तों पर नहीं लिखा गया, जो हाथ से गिरते ही मिट जाएगा. हिन्दू धर्म ना ही कोई गोलमेज परिषद हैं बल्कि यह एक गौरवान्वित जाति का महान जीवन हैं जिसके सम्बन्ध में कहानियां नहीं बल्कि सदियों का पूरा इतिहास हैं।

वीर सावरकर के योगदानों को देखते हुए उनको भारतरत्न की उपाधि दी जानी चाहिए किन्तु कुछ हिन्दुविरोधी तथा गंदी राजनीति करनेवाले लोग आपत्तियां दर्ज करते रहते हैं। वीर सावरकर द्वारा अपने आजीवन कारावास को निरस्त करने की क्षमायाचना को महात्मा गाँधी ने स्वयं ” शिवाजी महाराज जैसी चतुराई” कहा है , वीर सावरकर के महान योगदानों को रेखांकित करने के लिए अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में इंदिरा गाँधी ने डाक टिकट जारी कराया और उनको देश का सपूत कहा। भीमराव आंबेडकर ने वीर सावरकर को सच्चा हितैषी और दूरदर्शी नेता बताया किन्तु उन्हीं की छाँव में पनपे और बढे लोग जब सावरकर पर लांछन लगते हैं तो यह बरबस हे ये पंक्तियाँ जीवित हो उठती हैं -:

कोहनी पर टिके हुए लोग,
टुकड़ों पर बिके हुए लोग!
करते हैं बरगद की बातें,
ये गमले में उगे हुए लोग !!

वीर सावरकर को ‘भारत रत्न ” देने के विषय को लेकर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में कई सालों से तलवारें खिंची हुई हैं। इसके शुरुआती दौर में ही स्वर कोकिला भारतरत्न लता मंगेशकर ने न सिर्फ वीर सावरकर का खुल कर समर्थन किया था, बल्कि विरोध करने वालों की अज्ञानता पर सवाल उठाते हुए उनको अज्ञानी तक कह दिया था। गत वर्ष 28 मई को सावरकर की जयंती के मौके पर लता ने ट्वीट किया था-” जो लोग सावरकर जी के विरोध में बोल रहे हैं वे नहीं जानते कि सावरकर जी कितने बड़े देशभक्त और स्वाभिमानी थे”।

सन्दर्भ :

लता सुर गाथा : यतीन्द्र मिश्र
१९५७ का स्वातंत्र्य समर

राजेश झा ( विश्व संवाद केंद्र, मुंबई)