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आधुनिक दधीचि वीर सावरकर

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“चालीस हजार शताब्दियों का हिन्दू इतिहास कोई ताड़ के पत्तों पर नहीं लिखा गया, जो हाथ से गिरते ही मिट जाएगा. हिन्दू धर्म ना ही कोई गोलमेज परिषद हैं बल्कि यह एक गौरवान्वित जाति का महान जीवन हैं जिसके सम्बन्ध में कहानियां नहीं बल्कि सदियों का पूरा इतिहास हैं” – वीर सावरकर

भारतीय वांग्मय में महर्षि दधीचि द्वारा विश्व कल्याण के लिए अपनी हड्डियां दान किये जाने का उल्लेख है ,दूसरा अभिलेख वीर विनायक दामोदर सावरकर ने अपने जीवनचरित से हमारे मानस पर टंकित कर दिया है। उन्होने देश को स्वतन्त्र कराने के लिए अपने तन -मन -धन का रेशा -रेशा मातृभूमि और यहाँ के लोगों के लिए लुटा दिया वह भी एक वर्ग विशेष की लगातार योजनाबद्ध लांछन से भी बिना किंचित विचलित हुए। विश्व के इतिहास में ऐसे बहुत कम उदाहरण हैं कि कोई व्यक्ति अपना सर्वस्व देश के लिए न्यौछावर करता रहे चाहे उसको इसके बदले में कुछ मान – सम्मान या अन्य लाभ मिलता हो अथवा नहीं। लेकिन ऐसे लोगों का विवरण तो दुर्लभ है जिनके बलिदानों को विवादित करने की लगातार कुचेष्टाओं के बाद भी कोई अपने समाज एवं देश के लिए उत्सर्ग दिन दोगुना रात चौगुना निरपेक्ष भाव से बढ़ाता रहे।वीर सावरकर उस राजर्षि का नाम है जिनकी दूरदर्शिता का कोई तोड़ नहीं, जिनकी स्पष्टवादिता का कोई विकल्प नहीं।

विनायक दामोदर सावरकर भारत के वीर स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रवादी नेता थे। उन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया था। उनका नाम भारतीय इतिहास में बहुत ही गर्व के साथ लिया जाता है।वीर सावरकर राष्ट्रवादी संगठन हिंदू महासभा के प्रमुख सदस्य रहकर भी अपने सभी कर्तव्यों को भलीभांति निभाते रहे। वे पेशे से तो वकील थे लेकिन अपने जीवन के अनुभव से वे एक महान शोधकर्ता सह लेखक के रूप में भी उभर कर सामने आए। उन्होंने दस हज़ार पंक्तियों से अधिक कविताओं और कई नाटकों के लेखन से मराठी साहित्य को समृद्ध किया। उन्होने भारतरत्न लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर के लिए भी एक नाटक लिखा था। उनके लेखन ने सदैव ही लोगों को हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की प्रेरणा दी। अपने व्याख्यानों और विमर्शों से हमेशा ही लोगों को सामाजिक और राजनैतिक एकता के बारे में समझाते रहते थे। वीर सावरकर एक ऐसे नेता थे जिन्होंने राजनीति के साथ-साथ संस्कृति को भी अपने जीवन में महत्वपूर्ण स्थान दिया,यहां तक की हिंदुत्व की रक्षा के लिए उन्होंने स्वयं ही आत्मतर्पण करके अनुपम उदाहरण भारत के इतिहास में प्रस्तुत किया।

नाम – विनायक दामोदर सावरकर उपाख्य वीर सावरकर
जन्म – 28 मई 1883 (जन्म स्थान – नासिक, मुंबई, भारत)
व्यवसाय – वकालत , राजनीतिक कार्यकर्त्ता , सामाजिक लेखक और कार्यकर्ता
जीवन लक्ष्य – भारत देश को हिंदुत्व की ओर ले जाना
शैक्षिक योग्यता – वकालत
पिता का नाम – दामोदर सावरकर
माता का नाम – राधाबाई सावरकर
पत्नी का नाम – यमुनाबाई
बच्चे – विश्वास, प्रभाकर और प्रभात चिपलनकर
भाई/ बहन – गणेश, मैनाबाई और नारायण
मृत्यु – 26 फरवरी 1669

विनायक दामोदर सावरकर का प्रारंभिक जीवन,

नासिक जिले के भगूल में एक साधारण हिंदू ब्राह्मण परिवार में 28 मई 1883 को विनायक दामोदर सावरकर का जन्म हुआ था। बचपन से ही देश भक्ति का भाव उनके मन में भरा हुआ था। मात्र 12 साल की उम्र में ही विनायक सावरकर ने मुसलमान छात्रों के एक समूह को भगा दिया जिन्होंने पूरे शहर में अफरा-तफरी मचा रखी थी.उनके उस साहस और बहादुरी के लिए उनकी बहुत प्रशंसा हुई और उन्हें वीर विनायक दामोदर सावरकर कहा जाने लगा। बचपन से ही देश के लिए कुछ करने की लगन ने उन्हें क्रांतिकारी युवा बना दिया। इस काम में उनके बड़े भाई गणेश ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया और कालांतर में वे एक युवा खिलाडी के रूप में उभरे फिर धीरे -धीरे उन्होंने युवा समूह का आयोजन किया जिसे बाद में ‘मित्र मेला’का नाम दिया गया.

विनायक दामोदर सावरकर की १८५७ के विद्रोह पर लिखी किताब,

वीर सावरकर ने १८५७ के विद्रोह और उस समय के गुरिल्ला युद्ध का बहुत सूक्ष्म अध्ययन करके लन्दन में वकालत की पढ़ाई के दौरान उस पर एक पुस्तक लिखी “द हिस्ट्री ऑफ द वॉर ऑफ द इंडियन इंडिपेंडेंस”। इस पुस्तक ने अंग्रेजी सरकार की नींद लूट ली। अंग्रेजी सरकार ने इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया।परन्तु यह पुस्तक न केवल क्रांतिकारियों तक देश भर में पहुंचाई गयी बल्कि लोगों ने छिप -छिपकर इसका सामूहिक वाचन भी किया। उन्होंने अपने दोस्तों के बीच इस पुस्तक को भी को बांट दिया। शीघ्र ही वीर सावरकर को राष्ट्रद्रोह के आरोप में अंग्रेजी सरकार ने गिरफ्तार किया।वीर सावरकर ने इसके अलावा अन्तजर्वाला,हिन्दू पद – पादशाही ,काला पानी ,हिन्दुत्व आदि पुस्तकें भी लिखीं।

सावरकर को काला पानी की सजा,

भारत लौटकर सावरकर ने अपने भाई गणेश के सहयोग से ” इंडियन कॉउन्सिल एक्ट 1909 (मिंटो- मोर्ली फॉर्म्स) “के विरोध में प्रदर्शन करना आरंभ किया। इससे ब्रिटिश पुलिस ने विनायक सावरकर को अपराधी घोषित करते हुए उनके विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी किया। उस गिरफ्तारी से बचने के लिए सावरकर पैरिस चले गए। सन 1910 में सावरकर को ब्रिटिश पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया और उन्हें अपराधी ठहराते हुए उनके विरुद्ध अदालत में केस दर्ज कराया गया, जिस की सुनवाई के लिए उन्हें मुंबई भेज दिया गया। इस मामले में उन्हें 50 साल की सजा सुनाई गई और उन्हें 4 जुलाई 1911 को अंडमान निकोबार द्वीप समूह में कालापानी की सजा के तौर पर सेल्यूलर जेल में बंद कर दिया। उस सजा के दौरान लगातार उन्हें प्रताड़ना का सामना करना पड़ा लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। वहां पर रहने वाले कैदियों को उन्होंने पढ़ाना -लिखाना शुरू कर दिया। कुछ समय पश्चात उन्होंने उस जेल के अंदर एक बुनियादी पुस्तकालय शुरु करने के लिए सरकार से अनुरोध किया और जेल में ही पुस्तकालय शुरु कर दिया गया.

विनायक दामोदर सावरकर द्वारा हिन्दू सभा का निर्माण,

वीर सावरकर 6 जनवरी 1924 को कालापानी की सजा से मुक्त हो गए।इसके बाद उन्होंने भारत में रत्नागिरी हिंदूसभा के गठन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस सभा का मुख्य उद्देश्य सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को पूरी तरह से संरक्षण प्रदान करना था। सन 1937 में विनायक सावरकर को हिंदू सभा के सदस्यों द्वारा उन्हें हिंदू सभा का अध्यक्ष बना दिया गया। उसी कालखंड में मोहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस के शासन को हिंदू राज के रूप में घोषित कर दिया। पहले से ही हिंदू और मुसलमान के बीच देश में झगडे चल रहे थे, जिन्ना के इस आरोप ने उनके बीच चल रहे तनाव को और अधिक बढ़ा दिया। उनकी कोशिश सदैव यहीं थी कि वे एक हिंदू राष्ट्र का निर्माण करें, इसलिए विनायक सावरकर ने इस प्रस्ताव पर ध्यान दिया और इसके लिए उनके साथ कई सारे भारतीय राष्ट्रवादी भी जुड़ गए, जिनके बीच सावरकर की लोकप्रियता धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी.

विनायक दामोदर सावरकर गांधीजी के रहे विरोधी

वीर सावरकर भारत देश को हिंदुत्व की ओर ले जाना चाहते थे जबकि महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इसके घोर आलोचक थे इसलिए उन्होंने गांधी जी की नीतियों और गतिविधियों का विरोध किया जिनमें से भारत छोड़ो आंदोलन भी एक है। सावरकर कभी भी नहीं चाहते थे कि भारत को दो राष्ट्रों में बांट दिया जाए इसलिए वे विभाजन के पक्ष में कभी भी नहीं रहे। उनका मानना यह था कि एक देश में दो राज्यों के सह -अस्तित्व का प्रस्ताव रखा जाए ना कि एक राशि को दो राष्ट्रों में बाँटकर उसके टुकड़े कर दिए जाएं। उन्होंने खिलाफत आंदोलन के दौरान मुसलमानों के साथ तुष्टिकरण की महात्मा गांधी की नीति की आलोचना की. अपने कई लेखो में तो उन्होने गांधी जी को पाखंडी कहा है। वे गांधीजी के बारे में कहते थे कि वे एक अपरिपक्व मुखिया हैं, जिन्होंने छोटी सोच रखते हुए देश का सर्वनाश कर दिया.

वीर सावरकर की मृत्यु कैसे हुई,

वीर सावरकर ने अपने जीवन में इच्छा मृत्यु का प्रण ले लिया था इसलिए उन्होंने पहले ही सबको बोल दिया था कि वे अपनी मृत्यु तक उपवास रखेंगे अन्न का एक दाना भी मुंह में नहीं रखेंगे। अपने अंतकाल में लिए गए उपवास को लेकर उन्होंने यही कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने की पूरी अनुमति प्राप्त होनी चाहिए कि वह अपना जीवन कैसे समाप्त करना चाहता है और किस प्रकार अपने जीवन का वहन करना चाहता है इस बात की पूरी अनुमति उस व्यक्ति को मिलनी चाहिए। उन्होंने जैसे ही अपने प्रण के अनुसार उपवास आरंभ किए उस दौरान अपनी मृत्यु से पहले एक लेख लिखा जिसका नाम ‘यह आत्मह्त्या नहीं आत्मतर्पण है’ 1 फरवरी 1966 को सावरकर ने यह घोषणा कर दी थी कि आज से वह उपवास रखेंगे और भोजन करने से बिल्कुल परहेज करेंगे।उनकी यह प्रतिज्ञा थी कि जब तक उनकी मौत नहीं आएगी तब तक वह अन्न का एक दाना मुंह में नहीं रखेंगे। उनके इस प्रण के बाद लगातार वे अपने उपवास का पालन करते रहे और आखिरकार अपने मुंबई निवास पर 26 फरवरी 1966 में उन्होंने अंतिम सांस ली। सावरकर का घर और उन से जुड़ी सभी वस्तुएं अब सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए संरक्षित रखी गई है.

विनायक दामोदर सावरकर के विचार,

1- ज्ञान प्राप्त होने पर किया गया कर्म सफलतादायक होता है, क्योंकि ज्ञान – युक्त कर्म ही समाज के लिए हितकारक है. ज्ञान – प्राप्ति जितनी कठिन है, उससे अधिक कठिन है – उसे संभाल कर रखना . मनुष्य तब तक कोई भी ठोस पग नहीं उठा सकता यदि उसमें राजनीतिक, ऐतिहासिक,अर्थशास्त्रीय एवं शासनशास्त्रीय ज्ञान का अभाव हो.
2- देशभक्ति का अर्थ यह कदापि नहीं है कि आप उसकी हड्डियाँ भुनाते रहें. यदि क्रांतिकारियों को देशभक्ति की हुडियाँ भुनाती होतीं तो वीर हुतात्मा धींगरा, कन्हैया कान्हेरे और भगत सिंह जैसे देशभक्त फांसी पर लटककर स्वर्ग की पूण्य भूमि में प्रवेश करने का साहस न करते. वे ए क्लास की जेल में मक्खन, डबलरोटी और मौसम्बियों का सेवन क्र, दो-दो माह की जेल –यात्रा से लौट क्र अपनी हुडियाँ भुनाते दिखाई देते.
3- इतिहास, समाज और राष्ट्र को पुष्ट करनेवाला हमारा दैनिक व्यवहार ही हमारा धर्म है. धर्म की यह परिभाषा स्पष्ट करती है कि कोई भी मनुष्य धर्मातीत रह ही नहीं सकता. देश इतिहास, समाज के प्रति विशुद्ध प्रेम एवं न्यायपूर्ण व्यवहार ही सच्चा धर्म है.
4- मन सृष्टि के विधाता द्वारा मानव-जाति को प्रदान किया गया एक ऐसा उपहार है, जो मनुष्य के परिवर्तनशील जीवन की स्थितियों के अनुसार स्वयं अपना रूप और आकार भी बदल लेता है.

सावरकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातें,

1- वीर सावरकर ने खुद को नास्तिक घोषित कर दिया था, इसके बावजूद भी हिंदू धर्म को वे पूरे दिल के साथ निभाते थे. और लोगों को उसकी और बढ़ने के लिए प्रोत्साहित भी किया करते थे. क्योंकि राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान के रूप में वे खुद को हिंदू मानते थे और यदि कोई उनको हिंदू बुलाता था तो उन्हें बहुत ज्यादा गर्व महसूस हुआ करता था.
2- वे कभी भी हिंदुत्व को धर्म के रूप में नहीं मानते थे. बे अपनी पहचान के रूप में हिंदुत्व को देखा करते थे वही उन्होंने हजारों रुढ़िवादी मान्यताओं को खारिज कर दिया था जो हिंदू धर्म से जुड़ी हुई थी, लेकिन व्यक्ति के जीवन में उन मान्यताओं का कोई भी आधार नहीं था.
3- अपने जीवन का राजनैतिक रूप भी बखूबी निभाया, उन्होंने राजनैतिक रूप में मूल रूप से मानवतावाद, तर्कवाद, सार्वभौमिक, प्रत्यक्षवाद, उपयोगितावाद और यथार्थवाद का एक मुख्य मिश्रण अपने जीवन में अपनाया.
4- देश भक्ति के साथ-साथ भारत की कुछ सामाजिक बुराइयों के खिलाफ दोनों ने अपनी आवाज उठाई जैसे जातिगत भेदभाव औऱ अस्पृश्यता जो उनके समय में बह प्रचलित प्रथा मानी जाती थी.
5- उनका कहना था कि उनके जीवन का सबसे अच्छा और प्रेरित भरा समय वह था जो समय उन्होंने काला पानी की सजा के दौरान जेल में बिताया था. काला पानी की सजा के दौरान जेल में रहते हुए उन्होंने काले पानी नामक एक किताब भी लिखी थी जिसमें भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ताओं के संघर्षपूर्ण जीवन का संपूर्ण वर्णन है.

विनायक दामोदर सावरकर के जीवन पर बनी फिल्में,

1- वीर सावरकर के जीवन पर सन 1996 में पहली फिल्म बनी थी जिसमें अन्नू कपूर मुख्य रोल में नजर आए थे. वह मलयालम और तमिल 2 भाषाओं में रिलीज हुई थी उसका नाम काला पानी था.
2- 2001 में फिर से सावरकर के जीवन पर वीर सावरकर नामक फिल्म बनाना शुरू किया गया जिसे बाद में रिलीज भी किया गया और बेहद पसंद भी किया गया।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी सेनानी वीर सावरकर एक वक्ता, विद्वान, विपुल लेखक, इतिहासकार, कवि, दार्शनिक और में कार्यकर्ता थे।
वे विश्व के अबतक के अकेले व्यक्ति हैं जिनको एक ही जीवन में दो बार आजीवन कारावास का दंड अपने देश से अटूट प्रेम के कारण मिला। महात्मा गाँधी इनके त्याग , समर्पण और चतुराई के कायल थे। चालीस हजार शताब्दियों का हिन्दू इतिहास कोई ताड़ के पत्तों पर नहीं लिखा गया, जो हाथ से गिरते ही मिट जाएगा. हिन्दू धर्म ना ही कोई गोलमेज परिषद हैं बल्कि यह एक गौरवान्वित जाति का महान जीवन हैं जिसके सम्बन्ध में कहानियां नहीं बल्कि सदियों का पूरा इतिहास हैं।

वीर सावरकर के योगदानों को देखते हुए उनको भारतरत्न की उपाधि दी जानी चाहिए किन्तु कुछ हिन्दुविरोधी तथा गंदी राजनीति करनेवाले लोग आपत्तियां दर्ज करते रहते हैं। वीर सावरकर द्वारा अपने आजीवन कारावास को निरस्त करने की क्षमायाचना को महात्मा गाँधी ने स्वयं ” शिवाजी महाराज जैसी चतुराई” कहा है , वीर सावरकर के महान योगदानों को रेखांकित करने के लिए अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में इंदिरा गाँधी ने डाक टिकट जारी कराया और उनको देश का सपूत कहा। भीमराव आंबेडकर ने वीर सावरकर को सच्चा हितैषी और दूरदर्शी नेता बताया किन्तु उन्हीं की छाँव में पनपे और बढे लोग जब सावरकर पर लांछन लगते हैं तो यह बरबस हे ये पंक्तियाँ जीवित हो उठती हैं -:

कोहनी पर टिके हुए लोग,
टुकड़ों पर बिके हुए लोग!
करते हैं बरगद की बातें,
ये गमले में उगे हुए लोग !!

वीर सावरकर को ‘भारत रत्न ” देने के विषय को लेकर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में कई सालों से तलवारें खिंची हुई हैं। इसके शुरुआती दौर में ही स्वर कोकिला भारतरत्न लता मंगेशकर ने न सिर्फ वीर सावरकर का खुल कर समर्थन किया था, बल्कि विरोध करने वालों की अज्ञानता पर सवाल उठाते हुए उनको अज्ञानी तक कह दिया था। गत वर्ष 28 मई को सावरकर की जयंती के मौके पर लता ने ट्वीट किया था-” जो लोग सावरकर जी के विरोध में बोल रहे हैं वे नहीं जानते कि सावरकर जी कितने बड़े देशभक्त और स्वाभिमानी थे”।

सन्दर्भ :

लता सुर गाथा : यतीन्द्र मिश्र
१९५७ का स्वातंत्र्य समर

राजेश झा ( विश्व संवाद केंद्र, मुंबई)

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