पाली । मारवाड़ को यों ही भामाशाहों की धरा नहीं कहा जाता। यहां सेवा का भाव कूट-कूटकर भरा हुआ है। विशेषकर गोवंश के लिए तो मारवाड़ के लोग बढ़-चढक़र दान देते हैं। ये परम्परा सदियों से चली आ रही है। सेवा का ऐसा ही भाव रविवार को मोहरा कलां में देखने को मिला, जहां गोशाला के उत्थान व विकास के लिए श्री कृष्ण मरुधर केसरी गौ सेवा समिति के तत्वावधान में पूर्व अध्यक्ष ठा.भगवत सिंह की स्मृति में भागवत कथा व नानी बाई का मायरा कार्यक्रम आयोजित हुआ। इसके अंतिम दिन दानदाताओं के साथ ही छत्तीस कौम के ग्रामीणों ने खुले हाथों से दान किया। जहां गोवंश की सेवा के लिए 2.51 करोड़ रुपए दिए गए, वहीं 80 बीघा जमीन भी गोशाला के नाम कर एक अलग ही संदेश दिया है।
भागवत कथा व नानी बाई के मायरे की आरती तथा महायज्ञ व महाप्रसाद के साथ कार्यक््रम का समापन हुआ। यहां कथावाचक अशोक महाराज ने कथा का वाचन किया। इस दौरान कई संतों का सान्निध्य मिला। कार्यक्रम में मायरा भरने के साथ ही गौ सेवा के लिए लोग आगे आए। यहां पर स्व. भगवत सिंह व स्व्. सूरज कंवर की तरफ से 11 लाख रुपए दिए गए। वहीं संत सुरेंद्रदास जी महाराज ने 10 लाख रुपए दिए। इसके अलावा गांव के 36 कौम के लोगों गौमाता की सेवा में 2 करोड़ 51 लाख रुपए का दान किया। इसके साथ 80 बीघा जमीन भी दी गई। सभी दानदाताओं का सम्मान किया गया। जो जमीन दान दी गई, उसी जमीन पर 108 कुंडीय हवन कर पूर्णाहुति दी गई।
नेटफ्लिक्स (Netflix) दुनिया की अग्रणी स्ट्रीमिंग मनोरंजन सेवा है जिसके जरिये मोबाइल, लैपटॉप या स्मार्ट टीवी पर कभी भी किसी भी स्थान पर इंटरनेट के माध्यम से किसी भी टीवी शो, सीरीज या मूवी का आनंद लिया जा सकता है। जब से भारत में नेटफ्लिक्स (Netflix) का आगमन हुआ है तब से भारतीय सिनेदर्शकों में इसके प्रति दीवानगी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। खासकर युवावर्ग को अपने कंटेंट के माध्यम से अपनी ओर आकर्षित करने की दिशा में ‘नेटफ्लिक्स’ अग्रसर है।
नेटफ्लिक्स (इंडिया) ने बर्कली (वालेंसिया) के संयुक्त तत्वाधान में पिछले दिनों तीन दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। ‘मनी हीस्ट’, ‘स्क्विड गेम’ और ‘द फेम गेम’ जैसी अंतरराष्ट्रीय श्रृंखला की सफलता के बाद, बर्कली और नेटफ्लिक्स की ग्रो क्रिएटिव पहल ने भारत में महत्वाकांक्षी संगीत पर्यवेक्षकों के एक समूह के लिए कार्यशाला को विकसित करने के लिए भागीदारी की है प्रतिफल स्वरूप कार्यशाला के प्रतिभागियों को कई फिल्मों, श्रृंखलाओं और गैर-फिक्शन परियोजनाओं में संगीतकारों और पोस्ट-प्रोडक्शन पर्यवेक्षकों के साथ सहयोग करने का अवसर मिला। इस कार्यशाला के समापन पर प्रतिभागियों को बर्कली वालेंसिया और नेटफ्लिक्स द्वारा जारी संगीत पर्यवेक्षण प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ। समारोह में प्रसिद्ध भारतीय संगीतकार जोड़ी अजय-अतुल ने भाग लिया, जिन्होंने कार्यशाला के प्रतिभागियों के साथ बातचीत की। अजय-अतुल करीब दो दशकों से संगीत की रचना कर रहे हैं और ‘सैराट’ जैसे यादगार साउंडट्रैक का निर्माण किया है। इस कार्यशाला का मूल उद्देश्य नई पीढ़ी के संगीत पर्यवेक्षकों को ऑनलाइन सामग्री उत्पादन का समर्थन करने के लिए प्रशिक्षित कर प्रोत्साहित करना एवं साथ ही साथ निर्माताओं और संगीत पर्यवेक्षकों को यह समझने में मदद करना है कि कैसे अधिक प्रभावी ढंग से सहयोग करना है, प्रतिभागियों को संगीत वर्कफ़्लो के बारे में एक खुली बातचीत करने में सक्षम बनाना है, और उत्पादन मूल्य को अधिकतम करने के लिए रणनीति, योजना और बजट को कुशलतापूर्वक कैसे प्रबंधित करना है।
नेटफ्लिक्स( इंडिया) के म्यूजिक क्रिएटिव और प्रोडक्शन टीम के प्रमुख प्रभारी रामप्रसाद सुंदर ने कहा कि नेटफ्लिक्स में, हम मनोरंजन उद्योग में मूल्य जोड़ने के लिए कौशल और ज्ञान के साथ रचनात्मक समुदाय के निर्माण में गहराई से निवेश कर रहे हैं। बर्कली वालेंसिया के साथ साझेदारी में शुरू की गई संगीत पर्यवेक्षक कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों से उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली है। भविष्य में भी नेटफ्लिक्स के द्वारा संगीत प्रतिभा की अगली पीढ़ी के निर्माण और पोषण के लिए वैश्विक सर्वोत्तम परंपराओं के तहत प्रथाओं और कार्यप्रवाहों को लाकर उत्कृष्टता के लिए प्रयास करना जारी रहेगा।
अंतरराष्ट्रीय शिक्षण वातावरण के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और बर्कली वालेंसिया के कार्यकारी निदेशक मारिया मार्टिनेज इटुरिएगा ने मुम्बई में आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला के औचित्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस कार्यशाला में, प्रतिभागियों को संगीत पर्यवेक्षक की भूमिका का एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य मिलता है, जो इसे भारतीय बाजार में संदर्भित करता है, जबकि कला कौशल की एक ठोस श्रृंखला प्राप्त करता है जिसे प्रतिभागियों का समूह तुरंत अपने करियर को विकसित करने के लिए लागू कर सकते हैं।
‘बर्कली’ के बारे में बताते चलें कि बर्कली समकालीन संगीत और प्रदर्शन कला का प्रमुख संस्थान है, जो बोस्टन, न्यूयॉर्क शहर और वालेंसिया, स्पेन में अपने परिसरों में स्नातक और स्नातक डिग्री कार्यक्रमों की पेशकश करता है, और अपने पुरस्कार विजेता दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम, बर्कली ऑनलाइन के माध्यम से। दुनिया के सबसे प्रेरित कलाकारों की रचनात्मक और करियर क्षमता को पोषित करने के लिए समर्पित, कला शिक्षा के लिए बर्कली की प्रतिबद्धता इसके छात्रों, शिक्षकों और पूर्व छात्रों के काम में परिलक्षित होती है-जिनमें से सैकड़ों को ग्रैमी, टोनी, ऑस्कर और एमी पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।
‘नेटफ्लिक्स’ ऑनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग सेवा संस्थान के रूप में विश्वविख्यात हो चुका है जिसमें 190 से अधिक देशों में 222 मिलियन सशुल्क सदस्यताएं हैं, जो विभिन्न प्रकार की शैलियों और भाषाओं में टीवी श्रृंखला, वृत्तचित्र, फीचर फिल्मों और मोबाइल गेम का आनंद ले रही हैं। सदस्य किसी भी इंटरनेट से जुड़ी स्क्रीन पर जितना चाहें, कभी भी, कहीं भी देख सकते हैं। सदस्य बिना विज्ञापनों या प्रतिबद्धताओं के खेल सकते हैं, रोक सकते हैं और देखना फिर से शुरू कर सकते हैं।
The word ‘bhasma‘ means ‘that by which our sins are destroyed’. Bhasma is especially associated with Lord Shiva who is believed to apply it all over his body. Shaivites apply it on their forehead as tripundra or three parallel horizontal lines. When a kumkum dot is applied at the centre of the tripundra, the mark symbolizes Shiva-Shakti-the unity of energy and matter that creates the entire seen and unseen universe.
Some devotees apply it on different parts of their body such as upper arms, chest and throat. Ascetics rub it all over their body, especially those who maintain a dhuni or eternal fire. Many devotees also consume a pinch of it each time they receive it to redeem their sins and mitigate their physical sufferings.
Bhasma or vibhuti is the holy ash retrieved from the havan kund or sacrificial fire into which special logs of wood obtained from certain sacred trees, pure ghee, herbs and grains are offered, duly charged with mantras, to a deity. Ash obtained from this sacred fire is unique: it has immense potency, both spiritual as well as material.
Unlike other gods, Lord Shiva is additionally worshipped by pouring ash as abhisheka, and later, it is distributed to devotees as vibhuti. This bestows blessings to one who applies it on his forehead and other body parts. It also protects the wearer from ill health and the evil eye.
Vibhuti is always taken with the ring finger because it is one of the most sensitive and sacred points of the body. To receive maximum benefit, apply vibhuti on the ajna chakra, the spot between the eyebrows; on the vishuddha chakra or throat chakra, the pit of the throat, to enhance speech power; on the anahata chakra or heart chakra, the centre of the chest; and just behind the earlobes.
Vibhuti obtained from a sacred havan kund serves as divine herbal medicine. Applying vibhuti on different parts of the body can bring transcendental positive energy from the astral world. It is also a tool to enhance our body’s receptivity. When applied at different body points, especially points of greater receptivity such as the ajna chakra, we receive greater divine energy.
ओडिशा: मयूरभंज जिले में एक महिला सफाई कर्मी जिसका नाम लक्ष्मी मुखी है उसका अपने बच्चे को पीठ से बांधकर सड़क की सफाई करते हुए समाचार एजेंसी ANI ने एक वीडियो ट्वीट किया है जिसपर काफी यूजर्स ने अपनी अपनी अलग अलग प्रतिक्रिया दी है। समाचार एजेंसी के अनुसार लक्ष्मी मुखी पिछले 10 वर्षों से बारीपदा नगर पालिका में काम कर रही है । और अपने घर में वह अकेली है जिसकी वजह से वह अपने बच्चे को अपनी पीठ पर बांध कर हर रोज़ काम पर जाती है। इस पर लक्ष्मी मुखी कहती है -” यह मेरे लिए कोई समस्या नहीं है, यह मेरा कर्तव्य है।
बारीपदा नगर पालिका के अध्यक्ष, बादल मोहंती को जब यह जानकारी मिली तो उन्होंने कहा कि -” लक्ष्मी मुखी हमारे सफाई कर्मचारी हैं। कुछ व्यक्तिगत पारिवारिक कारणों से वह अपने बच्चे को अपने साथ ले जाती है और हर दिन अपने कर्तव्यों का पालन करती है। मैंने अपने अधिकारियों को उनकी जरूरतों पर नजर रखने का निर्देश दिया है, अगर कोई समस्या है तो हम उनका साथ देंगे।
"I have been working in Baripada Municipality for the last 10 years. I am alone in my home so I have to tie my child on my back and work. It is not a problem for me, it is my duty," said Laxmi Mukhi, the lady sweeper pic.twitter.com/Y8nDIlCuY1
नई दिल्ली, एजेंसियां। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मन की बात कार्यक्रम को संबोधित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि देश में स्टार्टअप की संख्या लगातार बढ़ रही है। खास बात यह है कि वैश्विक महामारी के समय में भी देश में स्टार्टअप की संख्या बढ़ी है। देश में यूनिकॉर्न की संख्या 100 के पार जा चुकी है। मुझे इस बात का गर्व है कि भारत में बहुत से ऐसे मेंटर्स हैं, जिन्होंने स्टार्ट अप को आगे बढ़ाने के लिए खुद को समर्पित कर दिया है। वहीं, भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद आज उज्जैन दौरे पर जाएंगे। राष्ट्रपति कोविंद यहां महाकालेश्वर के दर्शन करेंगे। इसके अलावा भारत और बांग्लादेश के बीच रेल यातायात एक बार फिर से हो गया है। कोविड -19 महामारी के कारण पिछले करीब दो सालों से ज्यादा वक्त से दोनों देशों के बीच ट्रेन सेवाएं बाधित थीं। भारत में पिछले 24 घंटों में Covid-19 के 2,828 नए मामले सामने आए हैं। जबकि 2,035 ठीक हुए और 14 मौतें हुईं है। PM मोदी ने उत्तराखंड की कल्पना का किया जिक्र
PM मोदी ने उत्तराखंड के जोशीमठ की रहने वाली कल्पना का जिक्र किया। पीएम ने कहा कि कल्पना ने हाल ही में कर्नाटक में अपनी 10वीं की परीक्षा पास की है, लेकिन उनकी सफलता की खास बात ये है कि उन्हें कुछ समय पहले तक कन्नड़ा भाषा भी नहीं आती थी, उन्होंने 3 महीने में कन्नड़ा भाषा सीखी और 92 नंबर भी लेकर आई। कल्पना उत्तराखंड के जोशीमठ की रहने वाली है, वे पहले टीबी से पीड़ित रही और तीसरी कक्षा में उनकी आंखों की रोशनी भी चली गई। कल्पना बाद में मैसूर की रहने वाली प्रोफेसर तारामूर्ति के संपर्क में आई जिन्होंने उनकी मदद की।
कल्पना ने हाल ही में कर्नाटक में अपनी 10वीं की परीक्षा पास की है, लेकिन उनकी सफलता की खास बात ये है कि उन्हें कुछ समय पहले तक कन्नड़ा भाषा भी नहीं आती थी, उन्होंने 3 महीने में कन्नड़ा भाषा सीखी और 92 नंबर भी लेकर आई: PM मोदी pic.twitter.com/v8alx0QQ7f
केदरानाथ में गंदगी फैला रहे लोग
मन की बात में पीएम मोदी ने उत्तराखंड की चारधाम यात्रा का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि, केदारनाथ में हर दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंच रह हैं. लोग इस यात्रा के सुखद अनुभव शेयर कर रहे हैं. लेकिन मैंने ये भी देखा कि श्रद्धालु केदारनाथ में कुछ यात्रियों की फैलाई गई गंदगी से काफी दुखी भी हैं. सोशल मीडिया पर भी कई लोगों ने अपनी बात रखी है. हम पवित्र यात्रा में जाएं और गंदगी का ढेर हो, ये अच्छी बात नहीं है. लेकिन इस बीच कई लोग ऐसे हैं जो दर्शन के साथ-साथ सफाई अभियान में भी जुटे हैं. कई संस्थाएं भी वहां काम कर रही हैं. हमारे यहां जैसे तीर्थ यात्रा का महत्व है, वैसे ही तीर्थ सेवा का भी महत्व बताया गया है.
Char Dham Yatra is underway in Uttarakhand where thousands of pilgrims are arriving. I've seen pilgrims in Kedarnath are saddened by litter spread by some pilgrims. There're also some pilgrims who are cleaning nearby areas of their stay during their Yatra: PM Modi in Mann Ki Baat pic.twitter.com/A9kn2oqpwx
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“वैज्ञानिकता की कसौटी पर कसा गया यह एक सत्य है कि गाय के समीप जाने से ही संक्रामक रोग कफ, सर्दी, खांसी, जुकाम से लड़ने वाली ऊर्जा का विकिरण होता है। एशियन वैज्ञानिक शिरोमियना का कहना है कि गाय पालने से या संपर्क में रहने से मनुष्य की उम्र बढ़ती है, क्योंकि मनुष्य के सांस के हानिकारक लार्वा, बैक्टीरिया, गाय की श्वास से नष्ट होते हैं।’ कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट के अनुसार सुबह खाली पेट गौ मूत्र के सेवन करने से कैंसर जैसा रोग भी नष्ट हो सकता है।”
हिन्दू धर्म में गाय का अत्यधिक है। महत्व है, लेकिन यह महत्व वैज्ञानिक ज्ञान पर आधारित है। पिछले दशक में हुए कई शोधा ने इस बात को प्रमाणित किया है। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि गाय को उपस्थिति मात्र ही पर्यावरण के लिए एक महत्त्वपूर्ण योगदान है, दूसरी तरफ हमारे प्राचीन ग्रंथ भी यह बताते हैं कि गाय की पोट पर सूर्यकेतु स्नायु हानिकारक विकिरण को रोक कर वातावरण को स्वच्छ बनाते हे।
कृषि में गाय के गोबर की खाद, गौमूत्र से काफी सुधार होता है। प्रकृति के 99% कीट प्रणाली के लिये गाय का गोबर लाभदायक है, गौमूत्र या खमीर हुए छाछ से बने कॉटनाशक इन सहायक कोटों को प्रभावित नहीं करते। एक गाय का गोबर 7 एकड़ भूमि को खाद और मूत्र 100 एकड़ भूमि को फसल को कोर्टी से बचा सकता है। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि गाय के गोबर में विटामिन बी-12 प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, यह रेडियोधर्मिता को भी सोख लेता है।
गाय का दूध पीला रंग लिये होता है, जो कैंसर जैसा होता है। यह’ क्यूरोसिन’ नामक प्रोटीन के कारण होता है। यह आरोग्यवर्धक बुद्धिवर्धक, शीतलतादायक) औषधि है, जिससे आंखों की रोशनी बढ़ती है।
वैज्ञानिक डा. फ्रँक माऊण्टेन कहते है कि एक लीटर गाय का दूध लेकर “एक उसका पृथक्करण किया तो देखने में आया कि इसमें आठ अण्डे तथा पांच सौ ग्राम मुर्गों का मांस तथा 750 ग्राम मछली जितने तत्व मिल सकते हैं। गाय का दूध मास से श्रेष्ठ है, क्योंकि इसके विटामिन तथा पोषक श्रेष्ठ है, क्योंकि इसके विटामिन तथा पोषक तत्व उच्च कोटि के होने के साथ साथ सुपाच्य और सात्विक होते हैं। इन तत्वों को शरीर स्वाभाविक रूप से ग्रहण करता है।
गाय के कच्चे दूध में ऑक्साइड रिडक्टेस जैसे पाचक रस अच्छी मात्रा में होते हैं जो शरीर में पैदा होने वाले टोकिसन्ना तथा टोमेन्स जैसे विकारों को दूर करता है। भारतीय नस्ल की गाय के दूध के अन्दर जल 87%, बसा 4%, प्रोटीन 4%, शर्करा 5%, तथा अन्य तत्व 1 से 2% पाया जाता है। गाय के दूध में 8 प्रकार के प्रोटीन 11 प्रकार के विटामिन पाए जाते हैं। गाय के दूध में ‘कैरोटिन’ नामक प्रदार्थ या जर्सी गाय के दूध की तुलना में दस गुना अधिक होता है।
दूध को दो श्रेणियों में बांटा गया है- A1 और A2 (A1 जर्सी का और A2 भारतीय देशी गाय का) एक शोध के अनुसार भारत सहित पूरे विश्व में AT दूध पौकर लोग मधुमेह, गठिया, अस्थमा अस्थमा, मानसिक विकार जैसे गंभीर रोगों का शिकार हो गए हैं। दुनिया भर में डेयरी उद्योग अपने पशुओं की प्रजनन नीतियों में A2 में दूध के उत्पादन के आधार पर बदलाव ला रहा है। विश्व बाजार में न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, कोरिया, जापान और अब अमेरिका में प्रमाणित A2 दूध के दाम साथ शरण AT दूध से कहीं अधिक है। जबकि A2 दूध सिर्फ भारतीय नस्ल की देशी गाय से प्राप्त होता है।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट के अनुसार सुबह खाली पेट गी मूत्र के सेवन करने से कैंसर जैसा रोग भी नष्ट हो सकता है। चूंकि माँ मूत्र में पोटेशियम, सोडियम, नाइट्रोजन, फास्फेट, यूरिया, यूरिक एसिड होता है, दूध देते समय गाय के मूत्र में लेक्टोज की वृद्धि होती है, जो हृदय रोगों के लिए लाभकारक है।
मुम्बई – समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार महाराष्ट्र ने पिछले 24 घंटों में कोरोना वायरस के 529 नए मामले सामने आए हैं। इस दौरान 325 मरीज ठीक हुए हैं। अच्छी बात है कि इस दौरान एक भी मौत दर्ज नहीं की गई है। राज्य में सक्रिय मामले 2772 हैं। इस बीच चिंता की बात है कि महाराष्ट्र में पहली बार B.A.4 और 5 वेरिएंट के केस मिले हैं; पुणे में B.A.4 वेरिएंट के 4 मरीज और B.A.5 वेरिएंट के 3 मरीज मिले हैं।
B.A.4 और B.A.5 ओमीक्रोन के सब-वैरिएंट्स हैं। हाल ही में तमिलनाडु में एक 19 वर्षीय महिला SARS-CoV2 के वैरिएंट BA.4 से संक्रमित मिली। उसके पहले दक्षिण अफ्रीका की यात्रा करने वाला एक व्यक्ति हैदराबाद एयरपोर्ट पर बीए.4 वैरिएंट से संक्रमित मिला। BA4 और BA5 वेरिएंट को सबसे पहले दक्षिण अफ्रीका के स्वास्थ्य अधिकारियों ने जनवरी और फरवरी में रिपोर्ट किया था। तब से दोनों वेरिएंट दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और जर्मनी, डेनमार्क आदि सहित यूरोप के देशों में कोविड की एक नई लहर को ट्रिगर करने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं।
वहीं देश में कोरोना वायरस संक्रमण के 2685 नए मामले सामने आने के बाद देश में अब तक संक्रमित हो चुके लोगों की संख्या बढ़कर 4,31,50,215 हो गई है। वहीं, उपचाराधीन मरीजों की संख्या बढ़कर 16,308 पर पहुंच गई है। बीते 24 घंटे में देश में संक्रमण से 33 और मरीजों की मौत होने से मृतक संख्या बढ़कर 5,24,572 हो गई है। आंकड़ों के मुताबिक, राष्ट्रव्यापी टीकाकरण अभियान के तहत देशभर में अब तक टीके की 193.13 करोड़ से अधिक खुराक लगाई जा चुकी हैं।
Maharashtra reports 529 new #COVID19 cases, 325 recoveries, and zero deaths in the last 24 hours.
गौमाता की महिमा अपरंपार है। मनुष्य अगर जीवन में गौमाता को स्थान देने का संकल्प कर ले तो वह संकट से बच सकता है। मनुष्य को चाहिए कि वह गाय को मंदिरों और घरों में स्थान दे, क्योंकि गौमाता मोक्ष दिलाती है। पुराणों में भी इसका उल्लेख मिलता है कि गाय की पूंछ छूने मात्र से मुक्ति का मार्ग खुल जाता है।
गाय की महिमा को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। मनुष्य अगर गौमाता को महत्व देना सीख ले तो गौमाता उनके दुख दूर कर देती है। गाय हमारे जीवन से जु़ड़ी है। उसके दूध से लेकर मूत्र तक का उपयोग किया जा रहा है। गौमूत्र से बनने वाली दवाएं बीमारियों को दूर करने के लिए रामबाण मानी जाती हैं।
गोपाष्टमी के दिन गाय का पूजन करके उनका संरक्षण करने से मनुष्य को पुण्य फल की प्राप्ति होती है। जिस घर में गौपालन किया जाता है उस घर के लोग संस्कारी और सुखी होते हैं। इसके अलावा जीवन-मरण से मोक्ष भी गौमाता ही दिलाती है। मरने से पहले गाय की पूंछ छूते हैं ताकि जीवन में किए गए पापों से मुक्ति मिले।
लोग पूजा-पाठ करके धन पाने की इच्छा रखते हैं लेकिन भाग्य बदलने वाली तो गौ-माता है। उसके दूध से जीवन मिलता है। रोज पंचगव्य का सेवन करने वाले पर तो जहर का भी असर नहीं होता और वह सभी व्याधियों से मुक्त रहता है। गाय के दूध में वे सारे तत्व मौजूद हैं, जो जीवन के लिए जरूरी हैं। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि गाय के दूध में सारे पौष्टिक तत्व मौजूद होते हैं। मीरा जहर पीकर जीवित बच गई, क्योंकि वे पंचगव्य का सेवन करती थीं। लेकिन कृष्ण को पाने के लिए आज लोगों में मीरा जैसी भावना ही नहीं बची।
रोज सुबह गौ-दर्शन हो जाए तो समझ लें कि दिन सुधर गया, क्योंकि गौ-दर्शन के बाद और किसी के दर्शन की आवश्यकता नहीं रह जाती। लोग अपने लिए आलीशान इमारतें बना रहे हैं यदि इतना धन कमाने वाले अपनी कमाई का एक हिस्सा भी गौ सेवा और उसकी रक्षा के लिए खर्च करें तो गौमाता उनकी रक्षा करेगी इसलिए गौ-दर्शन को सबसे सर्वोत्तम माना जाता है।
नेहरू ने वीर सावरकर की बात सुनी होती तो १९६२ का युद्ध नहीं होता
– राजेश झा
सावरकर वह अद्वितीय व्यक्ति हैं, जिन्होंने पाकिस्तान के जन्म से कई साल पहले भारत के विभाजन की भविष्यवाणी कर दी थी कि कॉन्ग्रेस की तुष्टिकरण की नीतियाँ मुस्लिम लीग का चारा बन जाएँगी और जिसका आख़िरी मुकाम होगा भारत का विभाजन।१९५४ में जब नेहरू पंचशील सिद्धांत लेकर आए तब भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के महान दूरदर्शी वीर सावरकर ने चेतावनी दी थी कि उनको थोड़ा भी आश्चर्य नहीं होगा अगर चीन भविष्य में भारत की भूमि हड़पने का प्रयत्न करे। यह भविष्यवाणी ८ साल बाद १९६२ में सच सिद्ध हुई, जब चीन ने आक्रमण कर भारत की बहुत बड़ी भूमि पर कब्जा कर भारत को मध्य-एशिया से अलग-थलग कर दिया।
मूल लेख
कोई भी राष्ट्र अपनी पिछली गलतियों का सामना किए बिना आगे नहीं बढ़ सकता। जो राष्ट्र अपनी भूलों से सबक लेने में विफल होते हैं, वे इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिए जाते हैं।हर राष्ट्र के प्रारब्ध में एक समय ऐसा आता है जब उसे परम सत्य को स्वीकार करना चाहिए, चाहे वह कितना भी कड़वा क्यों न हो। संभव है यह स्वीकारोक्ति हमारे भविष्य को सुरक्षित करने में कारगर हो। ऐसे समय जब चीन के बार-बार पीठ पर वार करने, जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान के लगातार आतंकी हमले और एक आंतरिक सुरक्षा स्थिति, जिसमें पैन-इस्लामिक और कम्युनिस्टों की संयुक्त कार्रवाई भारत-राष्ट्र को अस्थिर कर रही है, तब क्या भारत के लिए अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टि में गियर बदलने का समय आ चुका है? शायद हाँ!
भारत १९६२ से भ्रामक ड्रैगन की प्रकृति से अवगत है। यह मानना पड़ेगा कि प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद भारत ने चीन को रोकने के काफी प्रयास किए, और एक हद तक भारत को चीन के समक्ष एक समान भागीदार के रूप में स्थापित भी किया। इसके साथ ही भारत ने गलवान घाटी में शालीनता के साथ अपना दृढ व्यवहार प्रस्तुत किया।मोदी ने जापान और वियतनाम जैसी चीन विरोधी शक्तियों से दोस्ती करने, म्यांमार जैसी चीन समर्थक शक्तियों को भारत समर्थक बनाने और दक्षिण चीन सागर में चीनी आक्रमण का विरोध करने के साथ ही कोविड महामारी से संबंधित मुद्दों पर चीन विरोधी रुख अपनाने का बड़ा काम भी किया है। कोई भी इस बात से इंकार नहीं कर सकता है कि ३४०० किलोमीटर लंबी भारत-चीन सीमा पर सैन्य और नागरिक बुनियादी ढाँचे के निर्माण की विशाल-योजना चीनी घुसपैठ के लिए उकसावे में से एक थी।
हमें यह भी स्वीकारना होगा, खासकर गलवान घाटी की घटना के बाद दलाईलामा को चीन के बारे में बोलने से रोकने की नीति हमारी रणनीतिक कमजोरी साबित हुई है। जब संयुक्त राष्ट्र द्वारा मौलाना मसूद अजहर को आतंकवादी निरुपित करने का चीन विरोध कर रहा था, तब हमें शिनजियांग में उइगरों और तिब्बत के साथ-साथ चीनी अत्याचारों को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं करके भारत ने बड़ी गलती की। राष्ट्रीय सुरक्षा भूलों की श्रृंखला
राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में इतिहास पर नजर डालने पर पाते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर जवाहरलाल नेहरू की गलतियाँ १८६२ के भारत-चीन युद्ध में भारी पड़ीं। नेहरू के पंचशील सिद्धांत के कारण देश को भारी कीमत चुकानी पड़ी। वह गाँधी की अहिंसा और नेहरू की कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति प्रेम का मिश्रण था। १९५४ में जब नेहरू पंचशील सिद्धांत लेकर आए तब भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के महान दूरदर्शी वीर सावरकर ने चेतावनी दी थी।सावरकर ने कहा था कि चीन द्वारा तिब्बत को हड़पने के बाद अगर नेहरू पंचशील जैसी लुभावनी बातें चीन के साथ करते हैं तो जमीन हड़पने की चीनी भूख को बढ़ावा मिलेगा और उनको थोड़ा भी अचम्भा नहीं होगा अगर चीन भविष्य में भारत की भूमि हड़पने का प्रयत्न करे। यह भविष्यवाणीभविष्वाणी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवरकर ने भी की थी। दोनों की भविष्यवाणी ८ साल बाद १९६२ में सच सिद्ध हुई, जब चीन ने आक्रमण कर भारत की बहुत बड़ी भूमि पर कब्जा कर भारत को मध्य-एशिया से अलग-थलग कर दिया।
इसके अतिरिक्त भी भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर गाँधीवाद की काली छाया के कई उदाहरण हैं। १९७८ के आसपास गाँधीवादी विचारधारा के प्रभाव में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई जैसे ईमानदार नेता ने तत्कालीन पाकिस्तान के तानाशाह जनरल जियाउल हक के समक्ष यह आत्मघाती खुलासा किया कि भारत का पाकिस्तान में जासूसी नेटवर्क था और भारत को पाकिस्तान के कहुटा परमाणु रिएक्टर की जानकारी थी।इसके बाद जनरल जियाउल हक ने पाकिस्तान में भारत की गुप्चार व्यवस्थाओं को नष्ट कर दिया, जिसे भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने अपने कार्यकाल के दौरान स्थापित किया था। जियाउल हक ने भारत के जासूसों को मरवा दिया, जबकि कुछ अन्य भागने में सफल रहे।
चिंता की बात यह है कि श्रीमती इंदिरा गाँधी के मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टिकोण और एक सशक्त प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के आगमन के बावजूद, भारतीय सुरक्षा नीति गाँधीवादी छाया से मुक्त नहीं हो सकी है।१९७१ के युद्ध में पाकिस्तान को दो टुकड़ों में तोड़ने के बाद भी हम पीओके के मुद्दे को सुलझाने में नाकाम रहे, जब भारत के पास पाकिस्तान के ९३००० जवान बंदी थे और तो और भारत ने १९७१ के युद्ध में जीते हुए सिंध प्रांत को भी शिमला करार में वापस कर दिया। इससे पहले लाल बहादुर शास्त्री ने भी ताशकंद समझौते के तहत १९६५ के युद्ध में जीते हुए पाक क्षेत्रों को वापस दे दिया था।
आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर भी भारत ने गाँधी-नीति के प्रभाव में कई गलतियाँ की हैं, विशेषकर इस्लामिक कट्टरपंथी अति वहाबी तत्वों से निपटने में। उदाहरण के तौर पर २०१४ में मोदी सरकार आने के बाद भारत ने तबलीगी जमात के १० हजार विदेशी प्रचारकों को भारत में आने और वहाबी प्रचार करने की अनुमति दी। यह सब इसके बावजूद हुआ, जबकि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र को इस बात की पूरी जानकारी थी कि तबलीगी जमात विश्व का सबसे बड़ा वहाबी आन्दोलन है, जो दुनिया के १५० से अधिक देशों में फैला हुआ है और इस्लामिक उम्मा (विश्व इस्लामिक भाईचारे) का प्रचार करता है, जो राष्ट्रवाद के विचार के विरुद्ध है। यह स्थिति एक राष्ट्रवादी सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टिकोण में कमी का प्रमाण है।
याद रहे कि मोदी और शाह ने इस्लामिक कट्टरपंथियों की योजनाओं पर एक के बाद एक अनेक प्रहार किए। पहले आसाम और उत्तर प्रदेश के चुनाव जीते, जहाँ इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा यह माना जाता था कि भाजपा ये दोनों प्रदेश कभी भी जीत नहीं पाएगी। फिर इन दोनों ने जम्मू-कश्मीर को धारा-३७० से मुक्त किया। कट्टरपंथियों को तीसरा बड़ा झटका तब लगा जब मोदी सरकार ने राम-मंदिर मुद्दे को न्यायायिक समाधान देने में अहम् भूमिका निभाई। इसके बाद ही शाहीन बाग का षड्यंत्र, जो मोदी और शाह को घेरने की एक चाल थी, इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा रचा गया।
राम मंदिर की ५०० साल पुरानी समस्या का समाधान और धारा ३७० को हटाना राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर मोदी सरकार की प्रतिबद्धता का प्रमाण था। यह आज की राजनीतिक परिस्थितियों की दृष्टि से अकल्पनीय था। इन निर्णयों ने मोदी और शाह को भारतीय इतिहास के स्वर्णाक्षरों में दर्ज कर दिया है। सावरकर-बोस दृष्टि के अभाव के कारण भाजपा सरकार ने शाहीन बाग़ मुद्दे को बहुत हल्के तरीके से लिया।
जहाँ नरमपंथियों को साथ रखते हुए कट्टरपंथी और अतिवादी मजहबी लोगों को शाहीन बाग मुद्दे पर घेरा जा सकता था, वहाँ भाजपा ने दिल्ली चुनाव को दो मजहबों का मुद्दा बना कर जीतने का प्रयास किया। इसके कारण नरमपंथी और कट्टरपंथी दोनों एकजुट हो गए। यह सावरकर-बोस के राष्ट्रीय सुरक्षा-सिद्धांत के पूर्णत: विरुद्ध था।
हालाँकि, राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर भारत पिछले कई दशकों की तुलना में कहीं बेहतर स्थिति में है, लेकिन यह तथ्य पिछली सरकारों की तरह बना हुआ है कि मोदी सरकार भी पाकिस्तान या चीन पर भारत के विरुद्ध अपराधों के लिए पर्याप्त नुकसान निर्धारित करने में विफल रही है। शत्रु देशों से हुई नुकसान की भरपाई कराने के मामले में इजरायल का उदाहरण सटीक है।
भले ही भारत ने पुलवामा हादसे का पाकिस्तान से बदला लिया हो, लेकिन सब प्रयासों के बावजूद पाकिस्तान आतंकी देश घोषित नहीं हो सका है। जम्मू-कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंकी हमले जारी हैं। स्पष्ट रूप से, भारत की सुरक्षा दृष्टि में कुछ गड़बड़ है और आंतरिक और बाहरी दोनों तरह से इसे ठीक करने की तत्काल आवश्यकता है। गाँधीजी की विचारधारा: राष्ट्रीय सुरक्षा में अवरोध
प्रश्न उठता है ,भारत के ‘कमजोर सुरक्षा नीति’ से बाहर निकलने का रास्ता क्या है? यह स्पष्ट है कि गाँधीजी के योगदान ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत को बहुत अधिक श्रेय दिलाया है। राष्ट्रीय मंच पर उनके समाज सेवा के मॉडल और स्वदेशी, ग्राम स्वराज की उनकी दृष्टि जो गाँवों को आत्मनिर्भर बनाने की बात करती है, दलितोद्धार और स्वच्छता का उनका प्रयास आज भी अनुकरणीय है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सम्पूर्ण अहिंसा और हिंदुओं की कीमत पर मजहबी एकता की उनकी विचारधारा ने जिन्नावादियों को विभाजन के लिए प्रेरित किया।
इतना ही नहीं, बल्कि गाँधीवाद के इर्द-गिर्द बुने गए विभिन्न नारों के नाम पर स्वतंत्र भारत में पैन-इस्लामिक तत्वों ने अपने स्वयं के एजेंडे को आगे बढ़ाया। यही कारण है कि शाहीन बाग सहित पूरे भारत में और यहाँ तक कि विदेशों में शाहीनबाग़ के नाम पर हुए हर प्रदर्शन में पहली तस्वीर महात्मा गाँधी की होती थी। इसलिए यह स्पष्ट है कि मजहबी एकता का गाँधी मॉडल बहुसंख्यक समुदाय को ब्लैकमेल करने का एक औजार ही है। गाँधीजी की संपूर्ण अहिंसा की विचारधारा पर ईमानदार बहस की जरूरत
बहुत से लोग यह नहीं जानते कि गाँधीजी ने भी एक बार सुझाव दिया था कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत को सेना को खत्म कर देना चाहिए और केवल पुलिस पर भरोसा रखना चाहिए। १९२५ में यह कह कर उन्होंने कई लोगों को चौंका दिया कि गुरु गोविंद सिंह, महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी दिग्भ्रमित देशभक्त थे।जब द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी लन्दन के ऊपर बमबारी कर रहा था, तब गाँधी ने कहा था कि उन्हें खून-खराबा देखकर आत्महत्या करने का मन हो रहा है और बाद में उन्होंने इंग्लैंड को अपने बचाव के लिए नैतिक बल पर भरोसा करने की सलाह दी, बजाए सैन्य शक्ति के। उनके इन अकल्पनीय सुझावों से ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल बहुत बुरी तरह चिढ़ गए थे।
स्पष्टत: गाँधी का शांतिवाद हमें चीन जैसे दुश्मन देशों की दुष्टता को देखने से रोकता है। उरी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट जैसे दुर्लभ मामलों को छोड़कर, हमने शायद ही कभी जैसे को तैसा कार्रवाई की विचारधारा का पालन किया है। यह गाँधीवादी विरासत का प्रत्यक्ष परिणाम है।यदि चीन हमारे क्षेत्र पर कब्जा कर सकता है तो उसके सीमावर्ती कुछ अन्य स्थानों पर हम क्यों नहीं कर सकते हैं! यह उल्लेखनीय है कि कूटनीति और सुरक्षा-व्यवस्था में नए प्रतिमान स्थापित करने वाले मोदी जैसे दूरदर्शी व्यक्ति की दृष्टि को भी गाँधीवाद भ्रमित करता है।जब हमें चुनौती दी जाती है तो हम उपदेशों के साथ शुरू करते हैं, जैसे-भारत कभी भी आक्रमण नहीं करता, लेकिन जब कोई आक्रमण के लिए बाध्य करता है तब भारत इसे बर्दाश्त भी नहीं करता। यह स्थिति आत्म-संशय का प्रमाण है।
एक तरफ जहाँ अमेरिका ने कुख्यात आतंकी ओसामा बिन लादेन से ११००० किलोमीटर दूर जाकर ट्विन टावर त्रासदी में मारे गए ३००० लोगों का बदला लिया, वहीं इसके ठीक विपरीत हाफिज सईद और मौलाना मसूद अजहर, जिन्होंने १९९५ के बाद से हजारों भारतीयों को मौत के घाट उतार दिया, भारतीय सीमा से मात्र १५० किलोमीटर दूर बैठे होने के बावजूद हम उन्हें मिटा देने में असमर्थ हैं। क्या यह ओसामा के खिलाफ अमेरिका की प्रतिक्रिया के ठीक विपरीत नहीं है?
अत: सबसे पहले गाँधीजी की विचारधारा पर एक ईमानदार बहस होनी चाहिए, जो राष्ट्र के लिए उनके योगदान की सराहना करते हुए यह प्रमाणित करे कि उनकी विचारधारा ने भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को कितनी क्षति पहुँचाई है। इसके बाद भारतीय स्वतंत्रता अभियान के महानायक और हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा-दृष्टि के पुरोधा वीर सावरकर और आजाद हिन्द फ़ौज के प्रणेता सुभाषचंद्र बोस को भारत के सुरक्षा प्रतीक के रूप में प्रस्थापित करना चाहिए। सावरकर और बोस राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रतीक पुरुष क्यों? नेहरू ने वीर सावरकर की बात सुनी होती तो १९६२ का युद्ध नहीं होता
पहले सावरकर के विचारों और दृष्टि का विश्लेषण करें। सावरकर वह अद्वितीय व्यक्ति हैं, जिन्होंने पाकिस्तान के जन्म से कई साल पहले भारत के विभाजन की भविष्यवाणी कर दी थी कि कॉन्ग्रेस की तुष्टिकरण की नीतियाँ मुस्लिम लीग का चारा बन जाएँगी और जिसका आख़िरी मुकाम होगा भारत का विभाजन।सन १९३७ से सावरकर ने कई बार कॉन्ग्रेस को अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के खिलाफ चेतावनी दी थी, लेकिन उनके विचारों को एक सांप्रदायिकतावादी के रूप में करार दिया गया। हालाँकि उन्होंने कभी भी खास मजहब के अधिकारों की कीमत पर हिंदुओं के लिए विशेष व्यवहार की माँग नहीं की। दस साल बाद उनकी बात सच साबित हुई जब पाकिस्तान का जन्म हुआ और कॉन्ग्रेसी नेता जो कह रहे थे कि पाकिस्तान का निर्माण हमारी लाशों पर होगा, गलत साबित हुए।
सावरकर भारत की सुरक्षा के एक महान दूरदर्शी थे। उन्होंने १९४० में असम की समस्या (असम की मुस्लिम आबादी तब सिर्फ १० % थी, आज यह ३५ % है) की भविष्यवाणी और १९६२ के भारत-चीन युद्ध की भविष्यवाणी आठ साल पहले कर दी थी। १९५४ में उन्होंने नेहरू को चेतावनी दी थी कि पंचशील का उनका सिद्धांत चीन के कुत्सित मंसूबों को बढ़ावा देगा और अगर निकट भविष्य में वह हमला कर भारत की भूमि को हड़प लेता है तो उन्हें आश्चर्य नहीं होगा।
पाकिस्तान पर भी उनकी चेतावनी सटीक थी। उन्होंने कहा कि जब तक धार्मिक कट्टरता पर आधारित एक राष्ट्र भारत का पड़ोसी रहेगा, तब तक भारत शांति से नहीं रह पाएगा। यह आज तक सही प्रतीत होता रहा है। दिलचस्प बात यह है कि सावरकर ने पहली बार द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र रणनीति की वकालत की थी। उन्होंने स्वतंत्रता से पहले और बाद में भारतीयों के सैन्यीकरण की बात की थी। उन्होंने भारत को महाशक्ति बनाने के लिए परमाणु बम की भी बात की थी, लेकिन किसी ने सावरकर के विचारों को पैन-इस्लामिक और कम्युनिस्ट विचारों के सामने प्राथमिकता नहीं दी।भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टि में सावरकर का योगदान अंतहीन है और इस लेख के दायरे से परे भी। उदाहरण के तौर पर उन्होंने आजादी के तुरंत बाद जवाहरलाल नेहरू सरकार को सलाह दी थी कि अरब सागर को ‘सिंधु सागर’ कहना चाहिए, लेकिन नेहरू सहमत नहीं हुए।
सावरकर जीवनी के लेखक धनंजय कीर के अनुसार, १९४० में सावरकर ने सुभाषचन्द्र बोस को यह सलाह दी थी कि विश्व मंच पर दुश्मन के दुश्मन देश को हमारे मित्र के रूप में देखा जाना चाहिए।इसी से प्रेरित होकर सुभाषचंद्र बोस ने इटली, जापान और जर्मनी जैसे इंग्लैण्ड विरोधी शक्तियों के साथ एक समझौता करते हुए आज़ाद हिंद फौज का गठन किया। इस फ़ौज में उन भारतीय सैनिकों को शामिल किया गया था जो द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटिश शासन की ओर से लड़ते हुए इटली और कुछ अन्य मित्र देशों द्वारा पकड़ लिए गए थे।
आजाद हिन्द फ़ौज ने ब्रिटिश शासन से हिंदुस्तान को मुक्त कराने के उद्देश्य से अंग्रेजी हुकूमत पर हमला किया था। हालाँकि आजाद हिन्द फ़ौज नाकाम रही, लेकिन उसने भारत को स्वतंत्र करने के लिए ब्रिटेन पर भारी दबाव पैदा किया। एक अर्थ में बोस ने सावरकर की दृष्टि को लागू किया। १९४७ में ब्रिटिश प्रधानमंत्री के रूप में भारत को स्वतंत्रता देने वाले क्लेमेंट एटली ने १९५६ में अपनी भारत यात्रा के दौरान (जब वह ब्रिटिश पीएम नहीं थे) कुछ चौंकाने वाले खुलासे किए।
पश्चिम बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल पीवी चक्रवर्ती के साथ उनकी बातचीत और उनकी टिप्पणियाँ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को देखने के तरीके में पूरी तरह से बदलाव के लिए मजबूर करती हैं। एटली ने चक्रवर्ती से कहा, “आजाद हिन्द फ़ौज द्वारा बनाया गया दबाव, द्वितीय विश्वयुद्ध से लौटने वाले भारतीय सैनिकों की ओर से ब्रिटिश शासन को स्वीकार करने की अनिच्छा और अंततः १९४६ में मुंबई डॉक पर नौसेना के सैनिक विद्रोह ने ब्रिटेन पर दबाव बनाने में एक बड़ी भूमिका निभाई।” चक्रवर्ती द्वारा पूछे गए एक विशेष सवाल पर एटली ने कहा कि भारत की आजादी के लिए ब्रिटेन पर दबाव बनाने में कॉन्ग्रेस और महात्मा गाँधी की भूमिका ’न्यूनतम’ थी। इस पूरी बात का उल्लेख महान इतिहासकार आरसी मजूमदार ने अपनी पुस्तक ”बंगाल का इतिहास” में विस्तार से किया है।
इसलिए, भारत के लिए वह समय आ गया है कि वह सावरकर और बोस को अपना राष्ट्रीय सुरक्षा प्रतीक-पुरुष के रूप में घोषित करे। सामाजिक-आर्थिक विकास और आत्मनिर्भरता के गाँधी विचारों पर भले ही अमल किया जाए, लेकिन सुरक्षा-सिद्धांत के मामले में गाँधी-विचारों को भारत अस्वीकृत करता यह घोषणा भी होनी चाहिए। इस विषय पर सावरकर-बोस सिद्धांत ही उपयुक्त और मान्य हो।गौरतलब है कि समुदाय विशेष के प्रति रवैए को लेकर सावरकर और बोस के बीच कुछ मतभेद थे, लेकिन ज्यादातर राष्ट्रीय सुरक्षा विषयों पर दोनों एकमत थे। पर हमें इस बात को भी स्वीकार करना होगा कि हिन्दू-मुस्लिम विषयों पर सावरकर ने जो भी भविष्यवाणियाँ आज से ८० -९० वर्ष पहले की थी वे सभी सच साबित हुई हैं। इन प्रयासों का क्या असर होगा?
इन प्रयासों से गाँधीजी के नाम का दुरुपयोग बंद हो जाएगा। पैन-इस्लामिक तत्वों द्वारा गाँधी का नाम राष्ट्र को भयादोहित करने के लिए लिया जाता रहा है। यह प्रयास भारत के मुस्लिम समुदाय के उस हिस्से को ठीक से परिभाषित करने में सक्षम करेगा जो नरमपंथी है और पैन-इस्लामिक अभियान का हिस्सा नहीं है तथा भारत की मुख्यधारा में बने रहना चाहता है।समुदाय विशेष के समावेशी लोगों की संख्या भारत में काफी है, लेकिन सावरकर-बोस आधारित राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के अभाव में भारत उन्हें अंगीकृत करने में असमर्थ है।
हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा के मैदान से गाँधी के अति मानवतावाद वाली विचारधारा को हटाकर भारत दुनिया के ताकतवर देशों को उपयुक्त सन्देश देने में समर्थ होगा, विशेषकर चीन और पाकिस्तान जैसे दुष्ट प्रतिद्वन्दी देशों को। पूरी दुनिया को पता चलेगा कि चुनौती देने पर भारत से क्या उम्मीद रखनी चाहिए।
भारत की भ्रमित राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टि को स्पष्ट करना और सही दिशा देना बहुत बड़ी राष्ट्रीय सेवा होगी। कुछ नेता मानते है कि गाँधी की विचारधारा को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वर्तमान शासक (मोदी सरकार) पहले से ही राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में सावरकर-बोस सिद्धांतों का अनुकरण कर रही है और उसके प्रमाण हैं- बालाकोट हमला, सर्जिकल स्ट्राइक और अनुच्छेद ३७० ,लेकिन इस तर्क में दोष है।
वर्तमान परिस्थितियों और समय की माँग है कि सुरक्षा के मोर्चे पर सिर्फ सरकार का ही नहीं, बल्कि देशवासियों का नजरिया स्पष्ट हो। जाहिर है, राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर दृष्टि और सिद्धांत बदलने का समय आ गया है और आज के शासक भी अगर ये कहते हैं कि उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि गाँधी के विचारों से पूरी तरह मुक्त है तो वे गलत कह रहे हैं।इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि हमारी सरकार ने बीते ६ वर्षों में १० हजार तबलीगी जमात के विदेशी वहाबी प्रचारकों को भारत में आने और प्रचार करने की अनुमति दी। हालाँकि ३० मार्च, २०२० के बाद हुए तबलीगी जमात के कोरोना कांड के बाद सरकार ने इन विदेशी प्रचारकों को प्रतिबंधित कर दिया है। यह स्पष्ट है कि आज के भारतीय जहाज के तल में एक बड़ा छेद है जिसे हमें दुरुस्त करने की आवश्यकता है। अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो यह जहाज सागर में डूब सकता है।
जांजगीर-चांपा। शुक्रवार को पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली थी कि एक कंटेनर क्रमांक एचआर ६७ ए ०४१ जिसमें मवेशियां ठूंस ठूंसकर भरी है। उसे हरियाणा की ओर ले जाया जा रहा है। पुलिस ने तत्काल उक्त कंटेनर को घेराबंदी कर डायल 112 की टीम ने फोरलेन के अर्जुनी करुमहु की पास पकड़ा। टोल प्लाजा के पहले ड्राइवर खलासी मुलमुला थाना अंतर्गत ड्राइवर व कंडक्टर मौके से फरार हो गए। पुलिस की टीम ने सभी मवेशियों को अपने कब्जे में लिया। कंटेनर का चालक भागना चाह रहा था। लेकिन डायल 112 की टीम के आरक्षक अजय भानु व चालक विंदा संडे कंटेनर को रोकना चाहा लेकिन नहीं रुका तब उसे पत्थर मारने की कोशिश की तो कंटेनर जाके रुका और कंटेनर ट्रक ड्राइवर व हेल्पर फरार हो गए। कंटेनर को खोलकर देखे तो उसमें 70-80 मवेशी भरे हुए थे। कुछ पहले सी ही बेहोशी की हालत में नीचे बैठे हुए थे। थानेदार मुलमला के अनुसार रिपोर्ट दर्ज कर कार्रवाई की जा रही है। अवैध खरीद की धारा लगी है। गाड़ी को राज सात कर कानूनी कार्रवाई की जा रही है। पामगढ़ डोंगाकोहारौद के सभी मवेशी को गौ रक्षा केंद्र में भेजा गया। मुलमुला पुलिस कंटेनर गाड़ी को अपने कब्जे में ले लिया गया है। कंटेनर में छह दर्जन मवेशियों को भरकर बाहर ले जा रहे वाहन को मुलमुला पुलिस ने पकड़ा है। बताया जा रहा है कि इनमें पांच-छह मवेशियों की मौत भी हो गई। गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष रामसुंदर दास के निर्देशन में मुलमुला पुलिस वाहन चालक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रही है।