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मिशन लाइफ-एक सार्वभौमिक विचार

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– डॉ. वेदप्रकाश

वसुधैव कुटुंबकम् और सर्वे भवंतु सुखिनः सार्वभौमिक विचार की ही उद्घोषणा करते हैं। भारतीय चिंतन स्व से समष्टि की ओर जाता है, इसका अर्थ यह है कि यहाँ अपने साथ-साथ समूची मानवता के कल्याण की चिंता रही है। अग्नि, जल, वायु, मिट्टी और आकाश इन्हें पंच भूतों के नाम से जाना जाता है और इन्हीं से मिलकर प्रकृति एवं पर्यावरण की संकल्पना आकार लेती है। यह प्रकृति और पर्यावरण ही जीवन को संभव बनाते हैं।

आज विकास की अंधी दौड़ प्रकृति और पर्यावरण के संतुलन को बिगड़ रही है। जलवायु परिवर्तन आज न केवल भारत अपितु समूचे विश्व के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है, विडंबना यह है कि हानिकारक गैसों का सर्वाधिक उत्सर्जन करने वाले संपन्न देश हैं। चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों की इसमें सर्वाधिक भागीदारी है। यह भी चिंता का विषय है कि अभी तक पर्यावरण सुधार की कार्य योजना और घोषणा में अमेरिका, चीन जापान सहित 56 देश ही आगे आए हैं, जबकि पेरिस समझौते पर लगभग 175 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। विश्व के सभी देशों का एक साथ एकजुट न होना आज चिंता को बढ़ा रहा है।

आज भी भारत एकमात्र जी-20 देश है जो पेरिस समझौते के अनुसार 2030 के लिए तय लक्ष्य के अनुरूप जलवायु परिवर्तन से लड़ने के प्रयासों में आगे बढ़ रहा है। आज वर्ष 2020 के आंकड़ों के अनुसार वैश्विक स्तर पर उद्योगों में ऊर्जा के स्रोतों की स्थिति का आंकलन भी आवश्यक है- तरल ईंधन 25.6 फीसद, प्राकृतिक गैस 24.1 फीसद, कोयला 26.7 फीसद, बिजली 15.0 फीसद, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत 8.9 फीसद है। आंकड़ों से स्पष्ट है कि आज भी नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर विश्व समुदाय गंभीर नही है। पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन सम्मेलन काॅप 27 में ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए कड़ी कार्रवाई करने पर बल दिया गया है। ग्लोबल वार्मिंग के लिए गरीब देशों ने धनी देशों और तेल कंपनियों को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि प्रदूषकों को जलवायु परिवर्तन के लिए हर्जाना देना होगा। लेकिन क्या यह विचार लागू हो पाएगा?

मिशन लाइफ पर सबसे पहले वर्ष 2021 में ग्लासगो में आयोजित काॅप 26 सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने विचार रखे थे। हाल ही में उन्होंने गुजरात के केवडिया से मिशन लाइफ अभियान की शुरुआत की है। इस वैश्विक कार्य योजना का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभाव से धरती को बचाना है। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि- जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए सभी को एकजुटता दिखानी होगी, भारत जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने के लिए प्रतिबद्ध है। इस अवसर पर उपस्थित रहे यूएन प्रमुख गुटेरस ने भी कहा कि- जलवायु परिवर्तन विश्व की सबसे बड़ी समस्या है, इसके संरक्षण के लिए हमें सामूहिक प्रयास करना होगा। कुदरत के संसाधनों का हमें विवेक पूर्वक उपयोग करना चाहिए।

निश्चित रूप से आज भारत सहित समूचे विश्व को यह समझना होगा कि जिन संसाधनों का हम सभी अंधाधुंध और अविवेकपूर्ण उपयोग कर रहे हैं वे मानवता के लिए कितने आवश्यक हैं। आज यह भी आवश्यक है कि हम सभी अपनी आदतों में बदलाव करें, क्योंकि प्रकृति और पर्यावरण का संकट हमारी बिगड़ी आदतों के कारण उपज रहा है। ऊर्जा की बचत, खाद्य प्रणाली से जुड़ी आदतों में सुधार, स्वच्छता, पानी बचाने की आदत,सिंगल यूज़ प्लास्टिक को छोड़ना,ई- वेस्ट को सही तकनीक से प्रोसेस करना और स्वस्थ जीवन शैली अपनाते हुए पेड़- पौधों का संरक्षण- संवर्धन,ऑर्गेनिक खेती, जल संरक्षण, बायोगैस, सूर्य ऊर्जा, जल ऊर्जा आदि का अधिकाधिक उपयोग आदि ऐसी बातें हैं जिनसे हम पर्यावरण को बचा सकते हैं।

हाल ही में शिक्षा मंत्रालय ने सराहनीय पहल करते हुए प्रधानमंत्री मोदी के मिशन लाइफ को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने का निर्णय भी लिया है, इससे नई पीढ़ी जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों और उससे निबटने के लिए जागरूक होगी। आज हमें प्रकृति और पर्यावरण को बचाने के लिए समझ के साथ खपत व की आवश्यकता है। यजुर्वेद के 36 वें अध्याय में- द्यौ: शांतिरन्तरिक्ष शान्ति: पृथिवी शान्ति… के माध्यम से प्रकृति और पर्यावरण के चिंतन का आवाह्न मिलता है। क्या आज हमें मानवता के कल्याण के लिए पुन: वैदिक चिंतन की ओर लौटने की आवश्यकता नहीं है?
आइए, वैदिक जीवन पद्धति की ओर लौटें व समूची मानवता के कल्याण के लिए मिशन लाइफ के मंत्र एवं विचार पर चिंतन करें।(युवराज)

डॉ. वेदप्रकाश
असिस्टेंट प्रोफेसर, हंसराज कॉलेज, दिल्ली

जीएम सरसों बनाम किसान हित

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भारत सरकार द्वारा जीएम सरसों की खेती को मंजूरी मिलने के बाद से ही विवाद छिड़ा हुआ है। कहा जा रहा है कि जीएम सरसों के सेवन से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ेगा। इसके अलावा शहद उत्पादन का व्यवसाय पूरी तरह से ठप हो जाएगा। मधुमक्खी पालन से जुड़े किसान बड़ी संख्या में बेरोजगार होंगे। दावा ये भी किया जा रहा है कि शहद के निर्यात में बहुत बड़ी गिरावट आ सकती है। दरअसल, चिकित्सकीय गुणों की वजह जीएम मुक्त सरसों के शहद की मांग विदेशों में ज्यादा है।

जीएम सरसों को पर्यावरणीय परीक्षण के लिए जारी किए जाने पर उठे विवादों के बीच देश में मधुमक्खी-पालन उद्योग के महासंघ ‘कंफेडरेशन ऑफ ऐपीकल्चर इंडस्ट्री’ (सीएआई) ने इस फैसले को ‘मधु क्रांति’ के लिए बेहद घातक बताते हुए इस पर रोक लगाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दखल देने की मांग की है। सीएआई के मुताबिक, जीएम सरसों की खेती होने पर मधुमक्खियों के पर-परागण से खाद्यान उत्पादन बढ़ाने एवं खाद्य तेलों की आत्मनिर्भरता का प्रयास प्रभावित होने के साथ ही ‘मधु क्रांति’ का लक्ष्य और विदेशों में भारत के गैर-जीएम शहद की भारी निर्यात मांग को भी धक्का लगेगा। मधुमक्खी-पालन के काम में उत्तर भारत में लगभग 20 लाख किसान प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। इसके अलावा उत्तर भारत के लगभग तीन करोड़ परिवार सरसों खेती से जुड़े हुए हैं। देश के कुल सरसों उत्पादन में अकेले राजस्थान का ही योगदान लगभग 50 प्रतिशत है।

कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों के मुताबिक, बीज और रासायनिक दवाओं का कारोबार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत सरकार से जीएम सरसों की खेती की जो अनुमति मिली है, वह किसानों के शोषण की गंभीर साजिश है। ये कंपनियां जीएम सरसों प्रौद्योगिकी के आड़ में भारत के बीज बाजार पर कब्जा करना चाहती हैं। ये कंपनियां जल्दी ही धान, गेंहू, अरहर, मूंग, मसूर आदि फसलों के जीएम- एचटी संकर बीज बाजार में बिक्री के लिए लाएंगी और किसानों द्वारा प्रयोग किए जा रहे परंपरागत बीजों को खत्म करके बीटी कपास बीज बाजार जैसा एकाधिकार बना लेंगी।

इससे किसान को हर साल इन कंपनियों से जीएम फसलों का महंगा बीज खरीदना पड़ेगा, जो महंगी रासायनिक दवाओं के बिना पूरी पैदावार भी नही देगा। अभी तो किसान सरसों, धान, गेंहू, चना, मसूर, मूंग आदि फसलों का अपने घर पर बनाया बीज प्रयोग करके बीज कंपनियों के दुश्चक्र से बचे हुए हैं लेकिन जीएम संकर बीज आने के बाद बीटी कपास के किसानों की तरह ही दूसरे किसान भी आत्महत्या को मजबूर होंगे, क्योंकि तब खेती पर बुआई से लेकर मंडी में बिकने तक बहुराष्ट्रीय कंपनियों का शोषणकारी कब्जा होगा और देश के पांच सौ से ज्यादा राष्ट्रीय और प्रादेशिक कृषि अनुसंधान संस्थान व विश्वविधालय, इन कंपनियों के सामने नमस्तक होकर किसानो की कोई मदद नही कर पाएंगे, जैसा कि बीटी कपास मामले में हुआ।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जीएम प्रौद्योगिकी अंतरराष्ट्रीय पेटेंट कानून के अंतर्गत सुरक्षित होती है जिसे बिना भारी भरकम रायल्टी दिए भारतीय संस्थान प्रयोग नही कर सकेंगे! वैसे भी सरसों और धान आदि की संकर किस्मों का बीज पिछले एक दशक से उपलब्ध है जिनकी पैदावार ज्यादा नही होने से किसानों ने इन्हें नहीं अपनाया। देश के कुल धान क्षेत्र का केवल आठ फीसद क्षेत्र ही संकर धान के अंतर्गत आता है! कनाडा व यूरोप की जिस संकर कानोला सरसों/गोबिया सरसों की दूगनी पैदावार का उदारहण देकर वैज्ञानिक देश में भ्रम पैदा कर रहे हैं, वह 1980-1999 के दौरान देश भर में किए गए परीक्षण में भारतीय मौसम के अनुकुल नहीं पाई गई थी। जीएम सरसों का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से इस हाइब्रिड फसल की खेती को मंजूरी देने से फिलहाल रुकने को कहा है। (युवराज)

असल ‘भारत जोड़ो यात्रा’ ‘काशी तमिल संगमम्’ के माध्यम से भाजपा की है

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काशी तमिल संगमम का औपचारिक शुभारंभ शनिवार को हुआ। बीएचयू के एंफीथिएटर मैदान में आयोजित समारोह का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने वणक्कम और हर हर महादेव बोलकर काशी और तमिलनाडु का नाता जोड़ । महीने भर का ये कार्यक्रम 16 दिसंबर तक चलेगा। केंद्र के शिक्षा मंत्रालय की तरफ से आयोजित ये कार्यक्रम आजादी के अमृत महोत्सव के तहत कराया जा रहा है। अखबारों में आये विज्ञापन में कहा गया है कि ये कार्यक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ संकल्प को नये आयाम देने वाला है 

बीएचयू और आईआईटी मद्रास आयोजन के नॉलेज पार्टनर हैं।सरकारी विज्ञापनों में इस कार्यक्रम को वाराणसी और तमिलनाडु के बीच राम सेतु के तौर प्रोजेक्ट किया जा रहा है और अलग अलग तरीके से ये भी समझाने की कोशिश है कि इस संगम के खत्म होने तक तमिलनाडु के लोगों को काशी के बारे में और बनारस के लोगों को तमिलनाडु की सांस्कृतिक समृद्धि के बारे में सब कुछ मालूम हो जाएगा।

” अरुणाचल प्रदेश के दौरे से वाराणसी पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काशी और तमिलनाडु की प्राचीनता, संस्कृति, धार्मिक महत्व, अध्यात्म, रीति रिवाज आदि की चर्चा की। कहा कि काशी और तमिलनाडु दोनों संगीत, साहित्य और कला के केंद्र हैं। दोनों ही जगह ऊर्जा और ज्ञान के केंद्र हैं।

आज भी तमिल विवाह परंपरा में काशी यात्रा का जिक्र होता है। यह तमिलनाडु के दिलों में अविनाशी काशी के प्रति प्रेम है। यही एक भारत श्रेष्ठ भारत की परिकल्पना है जो प्राचीन काल से अब तक अनवरत बरकरार है। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने इशारों में पूर्व की सरकारों पर निशाना साधा। ” 

उन्होंने कहा कि हमें आजादी के बाद हजारों वर्षों की परंपरा और इस विरासत को मजबूत करना था, इस देश का एकता सूत्र बनाना था, लेकिन दुर्भाग्य से इसके लिए बहुत प्रयास नहीं किए गए। काशी तमिल संगमम इस संकल्प के लिए एक प्लेटफॉर्म बनेगा और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए ऊर्जा देगा।

काशी और तमिलनाडु को एक ही जैसा शिवमय और शक्तिमय बताते हुए मोदी ने कहा, एक स्वयं में काशी है। तो तमिलनाडु में दक्षिण काशी है। ‘काशी-कांची’ के रूप में दोनों की सप्तपुरियों में अपनी महत्ता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने तमिल भाषा का भी बड़े सम्मान के साथ जिक्र किया। हाल के उत्तर और दक्षिण के बीच चले भाषायी विवाद के साये में भी प्रधानमंत्री मोदी की बातें राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण लगती हैं।

ये काशी और दक्षिण भारत का रिश्ता है, तमिलनाडु ही नहीं कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल ये सब जो दक्षिण भारतीय राज्य हैं, उनका बहुत पुराना संपर्क रहा है काशी के साथ। काशी दरअसल धर्म-अध्यात्म की नगरी होने के अलावा ये मोक्षदायिनी नगरी रही है। यहां आके पिंडदान करने के बाद, दक्षिण भारत से ही नहीं, पूरे भारतवर्ष से लोग आते हैं यहां। जैसे गया में जाते हैं पिंडदान करने के लिए, वैसे काशी में दक्षिण भारत से तमाम लोग यहां आते रहे हैं पिंडदान करने के लिए अपने पितरों का, पुरखों का।

तो उस पिंडदान करने के क्रम में काशी अनादि काल से, आदि शंकराचार्य के जमाने से लोग आते रहे और उस जमाने से काशी दक्षिण भारतीयों का एक केंद्र रहा है। उसमें भी काशी में एक मोहल्ला है- हनुमान घाट। हनुमान घाट पूरी तरह से दक्षिण भारतीयों से भरा पड़ा है। इस एरिया में आप घूमेंगे तो आपको आधे सिर बाल, आधे सिर मुंडाए, वो जो मालगुडी देज के ब्राह्मण आपने सीरियल्स में देखा होगा, उस तरह के लोग दिखाई पड़ेंगे। घनपाड़ी दिखाई पड़ेंगे, जो लंबी चोटियां, जो शिखा रखते हैं।

वेद पाठ करते हुए, कर्मकांड कराते हुए लोग। एक जमाने से लोग यहां बसे हुए हैं। कई-कई पीढ़ियों से लोग हैं यहां पर। और तमाम बड़े लोग, तमिलनाडु के सुब्रमण्यम भारती जो राष्ट्रवादी कवि रहे हैं, वो काशी आकर रहे हैं।

और भी बहुत सारे तमाम लोग। वो हनुमान घाट मोहल्ले में जहां रहते थे, वहां पर उनकी प्रतीमा की स्थापना की गई। बहुत सारे लोग वहां रहते हैं। केदार घाट से लेकर हनुमान घाट तक का जो क्षेत्र है, हरिश्चंद्र घाट से सटा हुआ है। एक तरफ, दाहिनी तरफ हनुमान घाट है, बाईं तरफ केदार घाट है। ये पूरा दक्षिण भारतीयों का गढ़ है।

यहां खान-पान, रहन-सहन सब कुछ, मैं स्वयं दक्षिण भारतीय हूं, मैं मूलत: कर्नाटक के एक छोटे से तटवर्ती गांव गोकर्ण का रहने वाला हूं, जिसे दक्षिण की काशी कही जाती है। हमारे पुरखे भी यहां आके इसी तरह से बसे और हम लोग आज यहां काशी में रहते हैं।

ये अलग बात है कि आज प्रफेशन दूसरा हो गया। मैंने जर्नलिज्म का रास्ता चुना, उसी तरह उन परिवारों में जो लोग पौरोहित्य करते रहे, उन लोगों के बच्चों ने पढ़-लिखकर अपना दूसरा रास्ता अपनाया। लेकिन हर परिवार में, कोई न कोई एक परिवार ऐसा है, जो पौरोहित्य का काम करता है। काशी में रहकर जो इस तरह कर्मकांड कराते हैं, वो तमिलियन यहां पर बहुत सारे हैं।

आपको मैं बताऊं कि काशी में सुब्बुलक्ष्मी रहती थीं, डॉ। रंगास्वामी अय्यर के पुत्र थे डॉ। रंगास्वामी शंकर, उनके घर में ठहरती थीं। और पूरा दक्षिण भारतीय परंपराओं से युक्त लोग जिस तरह से खान-पान, रहन-सहन।

हनुमान घाट के हर घर के बाहर आपको दहलीज पे रंगोली दिखाई पड़ेगा। कल सुबह उठके झाड़ू-पोंछा करने के बाद तुरंत अपने घर की दहलीज पे, या घर की चौखट के बाहर रास्ते में भी रंगोली बनाए हुए आपको दिखाई पड़ेगा। ये जो दक्षिण भारतीय यहां के हैं वो काशी को जीते हुए अपनी लोक परंपरा, रीति-रिवाज को आज भी वैसे ही जीते हैं।

काशी और दक्षिण भारत के इस संगम को लोग राजनीतिक दृष्टि से भी देख रहे है । इसका एकमात्र मकसद अगर कुछ है तो आने वाले तमिलनाडु का जो चुनाव है, कर्नाटक में होने वाले चुनाव हैं, वही एक तीर से कई लक्ष्य भेदने का इनका प्रयास है।

ये जो टूरिज्म को बढ़ावा देना, ये सब काशी और तमिलनाडु का इतना प्रभुत्व नहीं है वो यहां आकर चुनाव कराएं और चुनाव जीत जाएं लेकिन तमिलनाडु में भाजपा को अगर घुसपैठ करनी होगी, अगर वहां पर लक्ष्य साधना होगा सरकार बनाने के लिए तो द्रमुक और अन्नाद्रमुक को पीछे छोड़ने के लिए कुछ जरूरी है कि भाजपा कुछ ऐसा आयोजन करे और वहां पर कुछ ऐसा आयोजन संभव नहीं था, तो काशी में प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में ऐसा कुछ आयोजन हो जाता है तो उसके एक दूसरे असरात होते हैं।

एक महीने तक चलने वाले इस कार्यक्रम में कई हजार लोग तमिलनाडु के विभिन्न क्षेत्रों से आ रहे हैं और सच ये है कि तमिलनाडु ही नहीं, अभी तो कर्नाटक में बैंगलोर-वेंगलोर वगैरह शहर में एक वक्त से तमिलियन हावी हैं। तो वहां की राजनीति में इसके जरिए उनके घुसपैठ करने की है, तमिलियन के जो वोटर्स हैं कर्नाटक में उनको साधने के उद्देश्य से ऐसा आयोजन कर रहे हैं। आप जो कह रहे हैं, निश्चित रूप से राजनीति ही है ।

पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों के दौरान दक्षिण की राजनीति के प्रति भाजपा और कांग्रेस के नजरिये में काफी फर्क देखने को मिला था। भाजपा का पूरा फोकस जहां पश्चिम बंगाल पर रहा, कांग्रेस की गतिविधियों में ज्यादा जोर तमिलनाडु और केरल को लेकर देखने को मिला था। ये भी महसूस किया गया कि जैसे कांग्रेस को पश्चिम बंगाल से कोई मतलब नहीं रहा, भाजपा का रुख केरल और तमिलनाडु को लेकर मिलती जुलती ही रही।

केरल में भाजपा से ज्यादा मेट्रो मैन ई। श्रीधरन ही दिखे, लेकिन पार्टी के हाथ खींच लेने पर वो भी शांत हो गये। बची खुची चीजें चुनाव नतीजों ने बराबर कर दी थीं।

दक्षिण को लेकर कांग्रेस का एक और पक्ष राहुल गांधी के बयान के जरिये सामने आया, जिसमें उनका कहना था कि राजनीति को लेकर उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण भारत के लोग ज्यादा जागरुक होते हैं। ये दावा राहुल गांधी ने अमेठी में अपने अनुभव के आधार पर कहा था, लेकिन तब जब वहां के लोगों ने कांग्रेस नेता को नकार दिया।राहुल गांधी को तो पहले भी दक्षिण भारत के दौरों में काफी कंफर्टेबल देखा जाता रहा, लेकिन वायनाड की चुनावी जीत ने एक नया और मजबूत बॉन्ड ही बना दिया।

अब अगर काशी तमिल संगमम् के कार्यक्रमों और हिस्सा लेने वाले मेहमानों को ध्यान से देखें और समझने की कोशिश करें तो साफ तौर पर लगता है कि भाजपा दक्षिण भारत के वोटर से जुड़ने के लिए किस हद तक परेशान है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण सुनने के बाद तो ऐसा ही महसूस हो रहा था जैसे बगैर नाम लिए वो ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के किस्से सुना रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया कि काशी तमिल संगमम् का आयोजन आजादी के अमृत काल में हो रहा है, और बोले, ‘भारत वो राष्ट्र है जिसने स्वाभाविक सांस्कृतिक एकता को जिया है।’

” मोदी ने ये भी समझाया कि किस तरह पिछली सरकारों में उत्तर और दक्षिण को एक करने के लिए जरा भी प्रयास नहीं किये गये।सरकारी तौर पर काशी तमिल संगमम् को इस रूप में भी प्रचारित किया जा रहा है कि ये तमिल जैसी प्राचीन भाषा के विकास में मददगार बनने वाला है लेकिन दक्षिण के कुछ लोग आयोजन को तमिल की जगह संस्कृत को बढ़ावा देने वाला बता रहे हैं – क्या इसलिए क्योंकि ये आयोजन वाराणसी में हो रहा है?तमिल भाषा की तारीफ पहले भी कर चुके प्रधानमंत्री मोदी ने संगमम् में कहा, हमारे पास दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा तमिल है। ” 

आज तक ये भाषा उतनी ही पॉपुलर है।।। और उतनी ही जीवंत है। दुनिया में लोगों को जब पता चलता है कि विश्व की सबसे पुरानी भाषा भारत में है तो उन्हें आश्चर्य होता है।दक्षिण भारत की विभूतियों का जिक्र कर मोदी वहां के लोगों से जुड़ने के लिए शिद्दत से प्रयासरत दिखे, मेरा अनुभव है।।। रामानुजाचार्य और शंकराचार्य से लेकर राजाजी और सर्वपल्ली राधाकृष्णन तक। दक्षिण के विद्वानों के भारत दर्शन को समझे बिना हम भारत को नहीं जान सकते।आपको याद होगा भाजपा नेता अमित शाह ने हिन्दी के इस्तेमाल को लेकर बयान दिया था तो दक्षिण भारत से जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई थी, ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी की तमिल भाषा की तारीफ विरोध करने वालों को भाजपा की तरफ से कुछ नया न करने को लेकर यकीन दिलाने की कोशिश ही लगती है।

सरकारी तौर पर काशी तमिल संगमम् के आयोजन को चाहे जिस रूप में प्रचारित किया जाये लेकिन भाजपा की हैदराबाद कार्यकारिणी से आयीं तब की खबरों पर नजर डालें तो तस्वीर काफी हद तक साफ नजर आएगी ।

PM addressing at the Kashi Tamil Sangamam, in Varanasi on November 19, 2022.

ये समागम भी भाजपा के मिशन साउथ के रोड मैप का हिस्सा ही है।दक्षिण भारत के केरल से आने वाली पीटी ऊषा, आंध्र प्रदेश से आने वाले विजयेंद्र प्रसाद, कर्नाटक के वीरेंद्र हेगड़े और तमिलनाडु के इलैयाराजा को राज्य सभा भेजा जाना भी तो उसी रणनीति हिस्सा है।हाल फिलहाल देखें तो प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के निशाने पर अक्सर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के। चंद्रशेखर राव ही नजर आते हैं, लेकिन ये नहीं भूलना चाहिये कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को भी भाजपा उसी लूप में शामिल कर चुकी है – अगर ऐसा नहीं था तो तमिलनाडु से लोगों को बुलाकर महीना भर काशीवास कराने की क्या जरूरत थी?

 तमिलनाडु की जरूरत तो 2024 में हैं लेकिन तेलंगाना से भी पहले कर्नाटक का नंबर आने वाला है। और भाजपा को हर हाल में सत्ता में वापसी करनी है ताकि आगे चल कर 2019 जैसे रिजल्ट कर्नाटक में ला सके। तब भाजपा ने कर्नाटक की 28 लोक सभा सीटों में से 25 जीत ली थी।भाजपा दक्षिण के जिन पांच राज्यों पर अभी फोकस कर रही है, उनमें कर्नाटक के अलावा केरल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु हैं । 2019 में कर्नाटक की 25 सीटों के अलावा दक्षिण भारत की 130 सीटों में भाजपा महज पांच ही सीटों पर जीत हासिल कर सकी थी । काशी तमिल संगमम् 2024 के मंजिल का ही एक पड़ाव है।

सनातन धर्म में गाय यानि गौ ( cow ) का विशेष महत्व है

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सनातन धर्म में गाय यानि गौ ( cow ) का विशेष महत्व है। इसी के चलते इन्हें माता का दर्जा दिया जाता है। गाय ( cow ) का कई मायनों में विशेष महत्व है। ऐसे में ज्योतिष से लेकर धर्म में भी गाय की विशेषताओं का वर्णन मिलता है। पंडित एसके उपाध्याय के अनुसार गाय (cow) से जुड़़े ऐसे कई उपाय हैं जिनकी मदद से हम जीवन को खुशहाल बना सकते हैं, इन उपायों के संबंध में मान्यता है कि इनके प्रभाव से जीवन में खुशहाली आने के साथ ही तरक्की भी आती है। तो चलिए जानते हैं गाय (cow) से जुड़े कुछ खास उपाय…

1. माना जाता है कि घर में बनने वाली पहली रोटी हमेशा गाय (cow) को खिलाएं और सभी शुभ कार्यों में गाय का ग्रास अवश्य निकालें। साथ ही अपने बच्चे के हाथ से गौ माता को भोजन जरूर खिलाएं। इससे नव गृह शांत होंगे।

2. सप्ताह में कम से कम एक बार परिवार के साथ गौशाला में अवश्य जाएं और सामर्थ्य अनुसार दान करें। इसके अलावा गर्मियों में पानी और सर्दियों के दौरान गौ (cow) माता को गुड़ का भोग अवश्य लगाएं। माना जाता है कि ऐसा करने से बार बार आने वाली परेशानियां दूर होती हैं।

3. गौ माता (Gau Mata) के पंचगव्य का सेवन करें व परिवार को भी कराएं। मान्यता के अनुसार इससे हर प्रकार की बीमारी दूर होती है, वहीं गर्मियों में पानी और सर्दियों के दौरान गौ माता को गुड़ का भोग अवश्य लगाएं।

4. माना जाता है कि गौ माता (Gau Mata) जहां भी खड़ी हो जाती हैं, वह स्थान दोष मुक्त हो जाता है। ऐसे में अपने घर पर एक बार गौ माता का भ्रमण जरूर करवाएं।

5. गौ (cow) माता को चारा अवश्य खिलाएं। अगर रोजाना संभव नहीं तो कम से कम हफ्ते में एक दिन यह उपाय जरूर करें। इसके साथ ही गौ माता (Gau Mata) की पूजा के साथ साथ उनकी प्ररिक्रमा अवश्य करें। इससे व्यक्ति को सभी तीर्थों का पुण्य प्राप्त होगा। गाय के गले में बजती घंटी उनकी आरती करने की-सूचक मानी जाती है।

6. किसी भी प्रकार की बुरी नजर या नकारात्मक ऊर्जा से बचने के लिए रोजाना या हफ्ते में एक बार गौ (cow) माता की पूंछ को अपने सिर के ऊपर से जरूर घुमाएं।

7. मान्यताओं के अनुसार, धर्म के साथ किया गया गौ (cow) पूजन शत्रुओं का विनाश कर व्यक्ति को सफलता प्रदान करता है।

8. अगर आपका कोई काम रुका हुआ है और लाख कोशिशों के बाद भी पूर्ण नहीं हो पा रहा है तो उस काम को गौ माता (Gau Mata) के कण में अवश्य कहें। इससे आपका काम गौ माता के आशीर्वाद से हो जाता है।

9. माना जाता है कि गाय (cow) की पीठ पर उभरे कूबड़ को छूने से और उस पर हाथ फेरने से न सिर्फ व्यक्ति रोग मुक्त हो जाता है, बल्कि उस पर कभी भी कर्ज का बोझ नहीं पड़ता।

10. यदि आप नौकरी में आगे बढ़ना चाहते हैं या नौकरी में परिवर्तन चाहते हैं, तो हर बुधवार को गाय (cow) को हरा चारा अवश्य खिलाना चाहिए।

कोर्ट का आदेश आफताब पर पुलिस थर्ड डिग्री प्रयोग नहीं कर सकती – 5 दिनों के अंदर होगा नार्को टेस्ट

असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने कच्छ में कहा ????????? नहीं तो हर शहर में पैदा होगा आफताब

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Shraddha Murder Case: 26 साल की श्रद्धा वालकर(Shraddha Walker) की हत्या का मामला इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। वहीं अब इस मामले की गूंज गुजरात विधानसभा चुनावों में भी देखने को मिल रही है। दरअसल गुजरात चुनाव(Gujarat Election 2022) को लेकर प्रचार करने कच्छ पहुंचे असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक रैली में आगाह करते हुए कहा कि अगर देश में कोई मजबूत नेता नहीं होगा, तो हर शहर में आफताब पैदा होगा, और हम अपने समाज की रक्षा नहीं कर पाएंगे।

बता दें कि हिमंता बिस्व सरमा भाजपा(BJP) के फायर ब्रांड नेता माने जाते हैं और गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए उन्हें स्टार प्रचारकों की लिस्ट में शामिल किया है। इसी सिलसिले में वो चुनावी रैलियों में नरेंद्र मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनाने की बात कर रहे हैं। उन्होंने कच्छ में कहा, “2024 में नरेंद्र मोदी को तीसरी बार पीएम बनाना बहुत जरूरी है।”

कोर्ट का आदेश आफताब पर पुलिस थर्ड डिग्री प्रयोग नहीं कर सकती – 5 दिनों के अंदर होगा नार्को टेस्ट

सरमा ने कहा कि अगर देश में ताकतवर नेता(नरेंद्र मोदी) नहीं होगा तो हर शहर में आफताब पैदा होगा और समाज की रक्षा नहीं हो पाएगी। असम सीएम ने श्रद्धा मामले में को लव जिहाद(Love Jihad) से जोड़ते हुए कहा कि आफताब श्रद्धा को मुबंई से दिल्ली लेकर आया और लव जिहाद के नाम पर उसके 35 टुकड़े कर दिए और उसे बॉडी को फ्रिज में रखा। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति से बचने के लिए बहुत जरूरी है कि नरेंद्र मोदी(Narendra Modi) को 2024 में तीसरी बार फिर से पीएम बनाया जाए।

Shradddha Murder News:

बता दें कि श्रद्धा वालकर और आफताब दोनों कॉल सेंटर में का करते थे। कुछ महीने पहले वो दोनों मुंबई से दिल्ली चले गए थे और चार दिन बाद दोनों के बीच खर्चों और धोखेबाजी के मुद्दे पर बहस होने लगी। इसको लेकर आरोप है कि आफताब ने श्रद्धा की गला दबाकर हत्या कर दी और बाद में शरीर के 35 टुकड़े कर एक फ्रिज रखा।

श्रद्धा वालकर की मौत का खुलासा पिछले महीने उसके पिता के शक पर हुआ। दरअसल दूसरे धर्म के लड़के से रिश्ता रखने के चलते श्रद्धा और उसके परिवार के बीच मई 2021 से बात नहीं हुई थी।

विश्व को विकास चाहिए विनाश नहीं

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– डॉ. नीरज भारद्वाज

इतिहास के पृष्ठों को पलटा तो दो विश्व युद्ध की विभीषिका और उसमें हुए नरसंहार की बातें सामने आई। साथ ही दो विश्व युद्धों के बाद होने वाले शांति समझौतों को भी पढ़ा। प्रथम विश्व युद्ध 1914-1918 तक चला। उसके बाद सन 1919 में वर्साय की संधि हुई और जर्मनी को उस पर न चाहते हुए भी हस्ताक्षर करने पड़े। जर्मनी की हार के साथ-साथ उस पर कितने ही आर्थिक प्रतिबंध लगे, इसमें अपने अधिकार क्षेत्र के कितने ही भूभाग को जर्मनी से छुड़वा दिया गया। नए स्वतंत्र राष्ट्रों की घोषणा कर दी गई और किसी ने जर्मनी के भूभाग को अपना बताते हुए अपने क्षेत्र में मिला लिया। वास्तव में यह शांति समझौता कम जर्मनी पर प्रतिबंध लगाना ज्यादा दिखाई दे रहा था।

विचार करें तो यह शांति समझौता ही दूसरे विश्व युद्ध का एक बड़ा कारण भी बना। दूसरे विश्व युद्ध में भी जर्मनी की हार हुई। जर्मनी ने हार का फिर मुँह देखा। लेकिन आज जर्मनी जैसे-तैसे करके अपने को संभाल रहा है।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप के देश, अमेरिका, सोवियत संघ आदि देशों ने मिलकर विश्व शांति के कदम उठाने का प्रयास किया। इस सराहनीय कदम के प्रयास के बाद ही 24 अक्टूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र चार्टर आधिकारिक रूप से अस्तित्व में आ गया। इसमें फ्रांस, चीन, सोवियत संघ, ब्रिटेन, अमेरिका आदि 50 देशों ने हस्ताक्षर किए। पोलैंड ने बाद में हस्ताक्षर किए और इसमें उस समय कुल संख्या 51 हो गई।

इस चार्टर में कहा गया था कि, हम संयुक्त राष्ट्र के लोग आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका, जिसने हमारे जीवन काल में दो बार मनुष्य जाति के लिए अकथनीय पीड़ा को जन्म दिया, से बचाने के लिए कृतसंकल्प है। हम बुनियादी मानवाधिकारों, व्यक्ति की प्रतिष्ठा और मूल्य, स्त्री और पुरुष तथा बड़े और छोटे राष्ट्रों के समान अधिकारों के विश्वास की पुनर्पुष्टि करते हैं और ऐसी स्थितियों के निर्माण के लिए वचनबद्ध हैं, जिनमें न्याय तथा संधियों एवं अंतरराष्ट्रीय कानून के अन्य स्रोतों से उत्पन्न दायित्वों के प्रति आदर बनाए रखा जा सके।

विचारणीय बात यह है कि इस संस्था को बनाने वाले भी यही यूरोपीय देश, अमेरिका, सोवियत रूस आदि हैं। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध को जन्म देने वाले उसके बाद संधि करने वाले भी यही देश हैं। अब रूस-यूक्रेन युद्ध चल रहा है। इसमें हथियार, पैसा, सैनिक आदि एक दूसरे देशों को देने वाले भी यही देश हैं। फिर यह संस्था बनाई क्यों? जब आपको इस संस्था की कार्यशैली, व्यवस्था आदि को मानना ही नहीं है, तो व्यर्थ का खर्च क्यों हो रहा है।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों में प्रमुख बातें भी लिखी गई हैं, जो इस प्रकार हैं- अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखना, राष्ट्रों के बीच बराबरी की बुनियादी पर अधिकारों के सिद्धांत तथा जनता के आत्म निर्णय के प्रति आदर पर आधारित मित्रतापूर्वक संबंध विकसित करना, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं मानवीय समस्याओं के समाधान एवं मानवाधिकारों तथा बुनियादी स्वतंत्रताओं को परिवर्तित करने में सहयोग करना आदि बातें लिखी गई है।

जब इतने कुछ उद्देश्य, सिद्धांत आदि बनाए गए हैं, फिर भी विश्व में यह युद्ध क्यों हो रहे हैं? आज विश्व के लगभग 193 देश इसके सदस्य हैं, फिर भी दुनिया में कहीं न कहीं एक दूसरे देशों के बीच जंग जारी ही रहती है। कहीं न कहीं कोई न कोई युद्ध की विभीषिका में देश जलता दिखाई दे ही जाता है।

विश्व के देशों में शांति कैसे बनी रह सकती है, इस विषय पर सोचने की जरूरत है। प्रतिस्पर्धा के इस महादौर में सभी आगे बढ़ना चाहते हैं।

यूरोपीय देशों तथा अमरीका को जैसे ही अपना सिंहासन हिलता दिखाई देता है, फिर एक भयानक विश्व युद्ध होने की संभावना बन जाती है। आज विश्व का हर एक देश किसी से कमतर नहीं है। लेकिन यूरोपीय देश और अमेरिका विश्व पर अपना वर्चस्व दिखाने के लिए दुनिया को विनाशकारी युद्ध में धकेलने से नहीं डरते हैं। रूस-युक्रेन युद्ध में खुलेआम हथियार, पैसा, सैनिक आदि भेजे जा रहे हैं, जबकि शांति प्रस्ताव के लिए कार्य करना चाहिए। जब शांति के लिए संयुक्त राष्ट्र बनाया गया है तो फिर नैटो देशों की कल्पना क्यों आई? फिर नया संघ बना और फिर नया विवाद, आखिर युद्ध हो ही गया। किसी भी देश को संधि-समझौतो के साथ शांति की जरूरत होती है। इस विश्व को विकास के साथ शांति चाहिए, विनाश के साथ विकास नहीं। (युवराज)

राहुल गांधी सावरकर का नाम लेकर भाजपा को ही फायदा पहुंचा रहे हैं

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर सावरकर पर ‘आजादी के आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल को धोखा देने’ का आरोप लगाकर महाराष्ट्र की सियासत में उबाल ला दिया है।राहुल गांधी ने महाराष्ट्र के वाशिम में अपनी ‘भारत जोड़ो’ यात्रा के दौरान मंगलवार को आदिवासी क्रांतिकारी बिरसा मुंडा की शहादत की तुलना हिंदुत्व विचारक वीर सावरकर से की थी। राहुल ने कहा था कि सावरकर ने क्षमादान के लिए अंग्रेजों को चिट्ठी और दया याचिकाएं लिखी थीं और ‘सबसे आज्ञाकारी सेवक’ बने रहने का वादा किया था। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सावरकर अंग्रेजों की मदद करते थे और ब्रिटिश सरकार से हर महीने पेंशन लेते थे।राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि ऐसे समय में जब देश के तमाम स्वतंत्रता सेनानी स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे, तब सावरकर ने अंग्रेजों का पक्ष लेकर और उनसे माफी मांगकर आजादी के दीवानों को धोखा दिया। 

राहुल गांधी के इस बयान के तुरंत बाद महाराष्ट्र में FIR दर्ज हो गई और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के मंत्रिमंडल ने कांग्रेस नेता की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया। महाराष्ट्र के कई शहरों में राहुल के पुतले जलाए गए, प्रदर्शन शुरू हो गए।सावरकर पर अपने बयान को लेकर सफाई देने के लिए राहुल गांधी ने गुरुवार को अकोला में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने विनायक दामोदर सावरकर द्वारा ब्रिटिश शासकों को कथित तौर पर लिखी एक चिट्ठी दिखाई जिसमें उन्होंने क्षमादान की मांग की थी। राहुल गांधी ने कहा, ‘सावरकर ने पत्र का अंत में ‘ I beg to remain, Sir, your most obedient servant ‘ लिखा। उन्होंने इस चिट्ठी पर साइन क्यों किया? उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह अंग्रेजों से डरते थे।’राहुल गांधी ने कहा, ‘सावरकर जी द्वारा इस पत्र पर हस्ताक्षर करने के बारे में मेरी यही राय है। महात्मा गांधी, नेहरू और सरदार पटेल जी ने कई साल जेल में बिताए लेकिन उन्होंने कभी भी ऐसी किसी चिट्ठी पर साइन नहीं किया।

अटकाने, लटकाने और भटकाने का समय चला गया – PM Narendra Modi in Itanagar

राहुल गांधी वीर सावरकर की जिस चिट्ठी की आखिरी लाइन ‘I beg to remain, Sir, your most obedient servant’ को पढ़कर उन्हें अंग्रेजों का पिट्ठू बता रहे हैं, महात्मा गांधी भी अंग्रेजों को लिखी चिट्ठियां के आखिर में ऐसी ही लाइन लिखते थे। यह ब्रिटिश राज के दौरान अप्लीकेशन लिखने का एक फॉर्मैट था, प्रोफॉर्मा था।दूसरी बात ये कि 20 मई 1980 को इंदिरा गांधी ने मुंबई के वीर सारवरकर प्रतिष्ठान को सावरकर का जन्म शताब्दी वर्ष मनाने के लिए बधाई दी थी। इंदिरा गांधी ने इस चिट्ठी वीर सावरकर को भारतमाता का वीर सपूत बताया था। इंदिरा गांधी ने इस चिट्टी में लिखा था, ‘अंग्रेजों के खिलाफ सावरकर का ऐतिहासिक विरोध आजादी की लड़ाई में उन्हें विशेष स्थान देता है। भारत के इस महान सपूत की जन्म शाताब्धि मनाने के लिए आपको शुभकामनाएं।’ एक हकीकत यह भी है कि इंदिरा गांधी की सरकार ने 1970 में वीर सावरकर के नाम से डाक टिकट भी जारी किया था।

वहीं भाजपा यह भी दावा करती है कि इंदिरा गांधी ने अपने पर्सनल अकाउंट से वीर सावरकर ट्रस्ट को 11 हजार रुपये दान किए थे। काश, वीर सावरकर के बारे में ऐसी बातें कहने से पहले राहुल गांधी ने ये सब जानकारी लर ली होती। अगर राहुल यह सब जानते होते तो शायद वह भारत के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक सावरकर के बारे में ऐसी बातें नहीं कहते।

गौरतलब है कि सावरकर के बहाने राहुल गांधी निश्चित तौर पर कांग्रेस और अपने खिलाफ एकतरफा हमलों की धार थोड़ा कुंद कर सकते हैं, लेकिन महाराष्ट्र में ऐसा करना कांग्रेस के लिए किसी भी रूप में फायदे का सौदा नहीं हो सकता – अव्वल तो ये सब करके महाराष्ट्र में वो भारतीय जनता पार्टी को ही फायदा पहुंचा रहे हैं।

भारत जोड़ो यात्रा के के तहत महाराष्ट्र में भी राहुल गांधी की रैली पहले से ही तय था। बिरसा मुंडा की जयंती पर एक रैली वाशिम जिले में हुई और राहुल गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा को टारगेट करने के लिए सावरकर के नाम का इस्तेमाल किया अब महाराष्ट्र में ऐसा होगा तो क्या होगा? बिलकुल वैसा ही रिएक्शन हुआ जो स्वाभाविक था। ऐसा तो नहीं लगता कि राहुल गांधी या उनके सलाहकारों को इसका अंदाजा नहीं होगा।

ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी ने पहली बार वीर सावरकर के खिलाफ बोला है। चूंकि गुजरात चुनाव में हिंदुत्व एक बहुत बड़ा फैक्टर है, चुनाव प्रचार जोरों पर है, और सावरकर हिंदुत्व के एक बहुत बड़े प्रतीक हैं, इसलिए राहुल को अपने बयान का बचाव करने के लिए आगे आना पड़ा।

भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने राहुल गांधी को उनकी दादी इंदिरा गांधी की चिट्ठी की याद दिला दी। उन्होंने कहा कि एक चिट्ठी इंदिरा गांधी ने भी लिखी थी जिसमें उन्होंने वीर सावरकर को ‘देश का सपूत’ बताया था, अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाला योद्धा कहा था।

पात्रा ने पूछा, ‘अब राहुल गांधी बताएं कि कौन सही है: वह या उनकी दादी?’ भाजपा नेता और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, ‘राहुल तो यह भी नहीं जानते कि सावरकर कितने साल अंडमान की खतरनाक सेल्युलर जेल में बंद रहे। मैं जानना चाहता हूं कि वीर सावरकर की तरह 11 साल तक कितने कांग्रेस नेताओं ने कष्ट सहे। जेल में लंबी यातनाओं के बावजूद उन्होंने आजादी के गीत गाए। कांग्रेस के अन्य नेताओं की तरह राहुल भी सावरकर के बारे में रोज झूठ बोलते रहे हैं। महाराष्ट्र की जनता उन्हें सही समय पर करारा जवाब देगी।’सावरकर के बारे में राहुल के बयान को लेकर भाजपा का गुस्सा सड़कों पर भी नजर आ रहा हैं ।

नवी मुंबई से लेकर नागपुर तक भाजपा कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन चालू है , राहुल गांधी के पुतले जलाए। शिवसेना (शिंदे गुट) के सांसद राहुल शेवाले ने महाराष्ट्र में राहुल की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर रोक लगाने की मांग की।

दिसंबर, 2019 में झारखंड चुनाव के दौरान राहुल गांधी के एक बयान पर संसद में बहुत बवाल हुआ था और भाजपा सांसदों ने राहुल गांधी से माफी मांगने को कहा था। अगले ही दिन दिल्ली में कांग्रेस की तरफ से भारत बचाओ रैली करायी गयी और राहुल गांधी ने बातों बातों में ही सावरकर को घसीट लिया, ‘मेरा नाम राहुल सावरकर नहीं, राहुल गांधी है।माफी नहीं मांगूंगा। मर जाऊंगा लेकिन माफी नहीं मांगूंगा।’

जिस तरीके से महाराष्ट्र की धरती पर पहुंच कर राहुल गांधी ने टिप्पणी की है, अगर उनको लगता है कि सावरकर का नाम लेकर वो संघ और भाजपा को कठघरे में खड़ा कर सकेंगे, ये साबित कर सकेंगे कि संघ और भाजपा का आजादी के आंदोलन में कोई योगदान नहीं रहा और ऐसा करके वो नेहरू पर संघ और भाजपा के हमले को रोक सकेंगे तो ऐसा नहीं होने वाला।संघ और भाजपा ने अपना जो सपोर्ट बेस बना लिया है, राहुल गांधी की बातों का उन पर कोई असर नहीं होने वाला है।

हो सकता है राहुल गांधी को लगता हो कि ऐसा करके वो कांग्रेस कार्यकर्ताओं का जोश बढ़ा सकते हैं लेकिन ये मंहगा भी पड़ सकता है और राहुल गांधी और उनके सलाहकारों की सारी मेहनत बेकार की कवायद साबित होने जा रही है।देखा जाये तो राहुल गांधी सावरकर को विवादों में घसीट कर महाराष्ट्र में कांग्रेस का भला नहीं कर सकते । भला तो केवल भाजपा का होगा जब हिंदूवादी संगठन और ज्यादा भाजपा के साथ जुड़ जायेंगे ।

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सावरकर को कठघरे में खड़ा कर राहुल गांधी कांग्रेस मुक्त महाराष्ट्र के अलावा कुछ भी हासिल नहीं कर सकते।ऐसा होने से महाराष्ट्र में कांग्रेस के खिलाफ जनमत खड़ा हो रहा है । नाना पटोले इस मुद्दे पर राहुल गांधी के साथ खड़े होने का असर देख चुके हैं। राहुल गांधी के बयान के बाद जिस तरह उद्दव ठाकरे ने उनके बयान से किनारा करते हुए कहा कि हम वीर सावरकर पर राहुल गांधी के बयान का समर्थन नहीं करते हैं। वीर सावरकर के लिए हमारे दिल में आदर और सम्मान है और उनके योगदान को कोई नहीं मिटा सकता । जाहिर है कांग्रेस के साथ होने बाद भी उद्धव ने उनसे दूरी बनाकर साफ कर दिया है, कि वह वीर सावरकर पर राहुल गांधी के साथ खड़े नहीं हो सकते हैं।

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वैसे तो वीर सावरकर कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिस्सा नहीं रहे लेकिन जिस तरह उन्होंने भारत में हिंदू राष्ट्र की कल्पना की और 1857 के अंग्रेजों के खिलाफ हुए विद्रोह को पहले स्वतंत्रता संग्राम के रूप में स्थापित किया, उससे वह हमेशा से आरएसएस और भाजपा के लिए वह हमेशा से नायक रहे हैं। ऐसा नहीं है कि सावरकर का विपक्ष में केवल उद्धव ठाकरे ही समर्थन कर रहे हैं। कांग्रेस के एक और पुराने साथी एनसीपी प्रमुख शरद पवार भी साल 2021 में वीर सावरकर के बारे में राहुल गांधी से अलग विचार रखते हैं। उन्होंने कहा था कि स्वतंत्रता आंदोलन में सावरकर के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यही नहीं महाराष्ट्र और मराठी मानुष में हर कोई उनका सम्मान करता है। उस वक्त उन्होंने यह भी कहा था कि सावरकर दलितों के लिए मंदिर प्रवेश सुधारों को बढ़ावा देने वाले अग्रणी लोगों में से एक थे। अब राहुल की बात का इतना प्रचार हुआ है कि आम आदमी को सावरकर के बारे में जानने व उसके हिंदूवादी होने व भाजपा को उसे पूजने का ज्ञान प्राप्त हुआ । इसलिए कहा जा सकता है कि राहुल गांधी सावरकर का नाम लेकर भाजपा को ही फायदा पहुंचा रहे हैं ।

– अशोक भाटिया

अटकाने, लटकाने और भटकाने का समय चला गया – PM Narendra Modi in Itanagar

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PM Modi in Itanagar: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर में डोनी पोलो हवाई अड्डे का उद्घाटन किया। यह राज्य का पहला ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा है। इस दौरान लोगों को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा कि अटकाने, लटकाने और भटकाने का समय चला गया।

ईटानगर में पीएम मोदी ने कहा, “फरवरी 2019 में इस एयरपोर्ट का शिलान्यास हुआ था और ये सौभाग्य मुझे मिला था। हम ऐसा वर्क कल्चर लाए हैं, जिसका शिलान्यास हम करते हैं, उसका उद्घाटन भी हम करते हैं। अटकाना, लटकाना और भटकाना वह समय चला गया।” उन्होंमे कहा, “जब मैंने 2019 में इसका शिलान्यास किया, तब चुनाव होने वाले थे। राजनीतिक टिप्पणीकारों ने शोर मचाया कि हवाई अड्डा नहीं बनने जा रहा है और आज इसका उद्घाटन हो रहा है।”

पूर्वोत्तर को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलती है: PM Modi ने कहा, “देश ने 2014 के बाद हर गांव तक बिजली पहुंचाने का अभियान शुरू किया था। इस अभियान का बहुत बड़ा लाभ अरुणाचल प्रदेश के गांवों को भी हुआ है। यहां ऐसे अनेकों गांव थे, जहां आजादी के बाद पहली बार बिजली पहुंची थी। आज देश में जो सरकार है, उसकी प्राथमिकता देश का विकास है, देश के लोगों का विकास है। साल में 365 दिन, चौबीसों घंटे, हम देश के विकास के लिए ही काम करते हैं। कल्चर हो या एग्रीकल्चर, कॉमर्स हो या कनेक्टिविटी, पूर्वोत्तर को आखिरी नहीं बल्कि सर्वोच्च प्राथमिकता मिलती है।”

कोर्ट का आदेश आफताब पर पुलिस थर्ड डिग्री प्रयोग नहीं कर सकती – 5 दिनों के अंदर होगा नार्को टेस्ट

तिहाड़ जेल में सत्येंद्र जैन का मसाज वाला वीडियो वायरल

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नई दिल्ली: दिल्ली सरकार के मंत्री सत्येंद्र जैन का एक वीडियो बीजेपी की ओर से जारी किया गया है। तिहाड़ जेल में बंद सत्येंद्र जैन इस वीडियो में मसाज कराते दिख रहे हैं। बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने यह वीडियो ट्वीट करते हुए आम आदमी पार्टी पर सवाल खड़े किए हैं। इससे पहले ईडी की ओर से भी कोर्ट में यह कहा गया था कि सत्येंद्र जैन को नियमों की अनदेखी करते हुए जेल में कई प्रकार की सुविधाएं दी जा रही हैं। ईडी ने कुछ दिन पहले ही यह आरोप लगाया था।

बीजेपी की ओर से अलग-अलग वीडियो जारी किया गया है। एक वीडियो में सत्येंद्र जैन के पास कई लोग बैठे हुए दिखाई दे रहे हैं। सत्येंद्र जैन मंत्री भी हैं। बीजेपी सत्येंद्र जैन को पहले ही बर्खास्त करने की मांग कई बार कर चुकी है। इस वीडियो के सामने आने के बाद बीजेपी और आक्रामक हो गई है।दिल्ली की एक अदालत ने आम आदमी पार्टी (AAP) नेता सत्येंद्र जैन को झटका देते हुए गुरुवार को ही मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया था और कहा कि वह प्रथम दृष्टया अपराध से प्राप्त धन को छिपाने में शामिल थे। इससे पहले पिछले महीने ही प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कोर्ट का रुख करते हुए यह दावा किया था कि सत्येंद्र जैन ने तिहाड़ जेल के भीतर गवाहों से मुलाकात की।

ईडी की ओर से दावा किया गया कि आरोपी जैन के पास इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स तक पहुंच है। इसके साथ ही जेल के सभी मानदंडों का उल्लंघन करते हुए AAP के मंत्री से जेल में लोगों ने मुलाकात की।

कोर्ट का आदेश आफताब पर पुलिस थर्ड डिग्री प्रयोग नहीं कर सकती – 5 दिनों के अंदर होगा नार्को टेस्ट

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दिल्ली की महरौली में हुए श्रद्धा मर्डर केस में आफ़ताब की कस्टडी रिमांड देते हुए कोर्ट ने पुलिस को सख्त हिदायतें दी हैं। इन हिदायतों में आरोपित पर थर्ड डिग्री प्रयोग न करना भी शामिल है। पुलिस को इन्हीं 5 दिनों के अंदर ही आफताब का नार्को टेस्ट भी करवाना होगा। इसी के साथ पुलिस को आफ़ताब का मेडिको लीगल केस (MLC) भी नियमों के मुताबिक बनाना होगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 18 नवम्बर 2022 (शुक्रवार) को आफ़ताब का और 5 दिनों का कस्टडी रिमांड स्वीकृत करते हुए मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट विजयश्री राठौर ने ये दिशा निर्देश दिए। उन्होंने केस के जाँच अधिकारी के साथ रोहिणी की फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला को भी आदेश जारी करते हुए 5 दिनों के भीतर ही आफ़ताब का नार्को टेस्ट करने के लिए कहा।

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बेल बजाने से नाराज होता था आफताब
सामने आ रही एक नई जानकारी के मुताबिक आरोपित आफताब को घर में लगी बेल (घंटी) बजने से दिक्कत होती थी। सुदर्शन न्यूज़ के पत्रकार प्रेम कश्यप की एक ग्राउंड रिपोर्ट में आफ़ताब के एक पड़ोसी मिथलेश कुमार ने इस बात का खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि वो आफताब के ही फ़्लैट में 1 माह पहले किराएदार के तौर पर आए थे। मिथलेश ने आगे बताया कि जब उन्होंने पहली बार घर की बेल बजाई थी, तब आफ़ताब काफी नाराज हुआ था।

मिथलेश का दावा है कि घंटी बजने से नाराज हो कर आफ़ताब नीचे उत्तर आया था और दुबारा उन्हें ऐसा न करने की नसीहत दी थी। इसके अलावा मिथलेश का दावा है कि आरोपित काफी रिजर्व रहता था और रात में अपना खाना आदि लेने के लिए घर से बाहर निकलता था। जिस घर में आफताब किराए पर रहता था, वो हरे रंग में रंगा गया है। मिल रही जानकारी के मुताबिक यहाँ के मकान मालिक से भी पूछताछ चल रही है। ऑपइंडिया के पास वीडियो बयान मौजूद हैं।

आफ़ताब के गुस्से की दवा खोज रही थी श्रद्धा

मुंबई के एक डॉक्टर प्रणव काबरा का दावा है कि श्रद्धा आफ़ताब के गुस्से की दवा खोज रही थी। उन्होंने दावा किया है कि फरवरी 2021 में श्रद्धा ने उन्हें फोन करके बताया था कि उनका पार्टनर काफी गुस्से वाला है, जिसके लिए वो दवा चाहती हैं। डॉक्टर के मुताबिक वो इस बात को भूल चुके थे लेकिन TV पर न्यूज़ चलती देख कर उन्हें सब याद आ गया।