चित्रगुप्त आर्ट्स के बैनर तले बनी फिल्म ‘पलक’ अब बहुत जल्द ही सिनेदर्शकों तक पहुँचने वाली है। इस फिल्म की कहानी एक दिव्यांग लड़की की है जो दूसरे दिव्यांग लड़की का जीवन सुधारती है, उसके जीवन में रोशनी लेकर आती है। इस फ़िल्म के लिए ‘आय (नेत्र) बैंक’ (एन जी ओ) भी सहयोग कर रहा है। ‘ऑय बैंक’ के फाउंडर शैलेश श्रीवास्तव के द्वारा इस फिल्म के निर्माण में पुरा सहयोग दिया गया है। यह फ़िल्म राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिलीज होगी। जिसमें ऑय ब्रांड के कलाकारों का भी साथ होगा जिनमें से एक महानायक अमिताभ बच्चन भी हैं। इस फ़िल्म को रिलीज होने से पहले ही दो फिल्म पुरस्कारों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है जो गर्व की बात है। फिल्म की कहानी में एक महत्वपूर्ण संदेश है साथ ही चार गीत भी है जिसमें कव्वाली, सैड सांग, सगाई का गीत और सोलो गीत मुख्य हैं। फिल्म में सभी रंगमंच से जुड़े अनुभवी कलाकार हैं जो ज्यादातर उत्तर भारतीय हैं। इस फिल्म में ‘नदिया के पार’ फेम अभिनेत्री शीला शर्मा, अभिनेता अतुल श्रीवास्तव, वेब सिरीज़ आश्रम की तूलिका बनर्जी, विक्रम शर्मा जैसे मंझे हुये कलाकार हैं। सिवान (बिहार) के मूल निवासी फिल्म निर्माता मधुप श्रीवास्तव ने संदेशपरक फिल्म ‘पलक’ के पहले भी प्रोडक्शन डिजाइन और निर्देशन जैसे कई काम फ़िल्म और टेलीविजन के लिए किये हैं। दूरदर्शन पर उनकी क्राइम बेस्ड सीरियल भी टेलीकास्ट हो चुकी है।
उनकी ‘उड़ेंगे ऊंची उड़ान’ नाम की धारावाहिक भी टेलीविजन पर आ चुकी है। निर्देशन के क्षेत्र में वह कई अवार्ड से भी सम्मानित हो चुके हैं। नवीनतम प्रोजेक्ट ‘पलक’ के बाद मधुप श्रीवास्तव अपनी चित्रगुप्त आर्ट्स के बैनर तले पुनः फिल्म निर्माण का कार्य करने जा रहे हैं जिसमें उनके सहयोगी बैनर युनिप्लेयर फिल्म्स है। यूनिप्लेयर फिल्मस की संचालिका अनामिका श्रीवास्तव हैं। बकौल मधुप श्रीवास्तव मौज़ूदा दौर में फिल्मों के प्रति लोगों के मन में काफी बदलाव आए हैं वो कुछ नया देखना चाहते हैं जिसमें मनोरंजन के साथ नई कहानी और संदेश भी हो और उनकी यह तुष्टि फिल्म ‘पलक’ से पूर्ण होगी। यह फिल्म एक संदेशपरक सामाजिक कहानी है जिसे सभी दर्शकों तक पहुंचाना जरूरी है। प्रस्तुति : काली दास पाण्डेय
अहमदाबाद बम धमाके के ४९ आरोपियों में ३८ को मृत्युदंड और शेष ११ को जीवन के अंतिम सांस तक जेल में रखने का आदेश विशेष न्यायालय ने दिया है।करीब १४ साल बाद, २००८ अहमदाबाद सीरियल बम ब्लास्ट केस में स्पेशल कोर्ट का फैसला आया है। इस बम कांड की रचना पांच राज्यों दिल्ली -मध्यप्रदेश -गुजरात -उत्तरप्रदेश और बिहार में की गयी थी।बम फोड़ने से पहले ईमेल द्वारा इसकी घोषणा आतंकियों ने की थी जो देश में हुए आतंकी घटनाओं में पहली बार तब देखा गया था। यह सीधे -सीधे भारतीय गणतंत्र को चुनौती थी।
हमारे देश में पहली बार एक साथ ३८ लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई है। इसके पहले राजीव गांधी हत्या काण्ड में २० लोगों को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी। पूरा ट्रायल साबरमती जेल के अंदर हुआ है।कुल ११०० गवाह थे ।इस बीच सैफू और उसके साथियों ने २१३ फीट लंबी सुरंग खोद कर भागने का भी प्रयास किया था , मगर सफल नहीं हो सके थे।आतंकियों को पता था कि घायलों को देखने तत्कालीन सीएम मोदी अस्पताल जाएंगे और वो उन्हे्ं भी निशाना बनाना चाहते थे. सरकारी वकील भी यही बात कह रहे हैं। २५ जुलाई २००८ को बंगलुरु और उसके ठीक दूसरे दिन अहमदाबाद में सीरियल बम फोड़कर आतंकियों ने भारतीय गणतंत्र को सकते में ला दिया था। बंगलुरु में एक की मृत्यु हुई और अहमदाबाद में ५६ की जानें गयीं। अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट एक आतंकी हमला था , हमले में शामिल जिन दोषियों को फांसी हुई सबसे पहले एक बार उनके नाम इस प्रकार हैं -: १ .पहला नाम है आतिफ अमीन ये इंडियन मुजाहिद्दीन से जुड़ा हुआ आतंकी था, आजमगढ़ मॉड्यूल का चीफ भी. जिसे दिल्ली पुलिस ने सिंतबर 2008 में हुए बाटला हाउस एनकाउंटर में मार गिराया था २ इमरान इब्राहीम शेख ३ . इकबाल शेख ४ . समसुद्दीन शाहबुद्दीन शेख ५ . गयासुद्दीन अब्दुल हलिम अंसारी ६ . मोहम्मद आरिफ ७ . अनीस अगरबत्तीवाला ८ . यूनुस महम्मद मंसूरी ९ . कमरुद्दीन चाँद मोहम्मद नागोरी १० . आमिल परवाज काजी सैफुद्दीन शेख ११ . अब्दुल करीम मुस्लिम १२ . इकबाल जहरुल नागोरी १३ . हाफिस हुसैन उर्फ अदनान मुल्ला १४ चौदहवां नाम है मोहम्मद साजिद, इसे भी बाटला हाउस एनकाउंटर में मार गिराया गया था १५ . मुफ्ती अबु बशर १६ . अब्बास समेजा १७ . जावेद अहमद सगीर अहमद शेख १८ . मोहमद इस्माइल १९ . अफजल उस्मानी २० . मोहम्मद आरिफ उर्फ जुम्मन शेख २१ . आसिफ उर्फ़ हसन बशीरुद्दीन शेख २२ . सरफुद्दीन कापडिया २३ . मोहम्मद सेफ २४ . जीशान अहमद २५’ जियाउर रहमान २६ मोहम्मद शकील २७ . मोहम्मद अकबर २८ . फजले रहमान उर्फ सलाउद्दीन दुर्रानी २९ . अहमद बावा उर्फ अबू बकर बरेलवी ३० . सरफुद्दीन उर्फ सलीम ३१ . सैफुर रहमान ३२ .अब्दुल करीम मुस्लिम ३३ . मोहम्मद तनवीर ३४ . राजा अय्यूब शेख ३५ . मोहम्मद मुबीन ३६ मोहम्मद रफीक ३७ . तौसीफ खान ३८ . मोहम्मद आरिफ ये कुल 38 दोषी हैं जिसे अहमदाबाद की स्पेशल कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई है.
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गोधरा काण्ड के बाद मुस्लिम आतंकियों ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मार डालने की बड़ी कोशिश की। अहमदाबाद बम कांड का लक्ष्य मोदी थे और उसमें ५६ लोग मारे गए और २०० लोग घायल हुए थे। सबसे अचरज की बात है कि पहली बार पूर्व सूचना देकर बम फोड़े गए । अगर दुर्भाग्य से आतंकी सफल हो जाते तो भारत को ‘बनाना कंट्री ‘ विश्व स्तर पर सिद्ध करने की आवश्यकता फिर कभी नहीं होती। आजमगढ़ जिले (उत्तरप्रदेश ) के सरायमीर के अबू बशर को अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट का मास्टर माइंड माना गया। इसके अलावा आजमगढ़ के मोहम्मद सैफ, मोहम्मद आरिफ, शकीब निसार और शैपुर रहमान भी दोषी पाया गया है ।आजमगढ़ के ही रहने वाले पांच को मौत की सजा दी गई है, जबकि तीन अन्य को बरी कर दिया गया है। अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट में सजा सुनाए जाने के बाद आजमगढ़ का नाम सामने आया है। बाटला हाउस एनकाउंटर में भी आजमगढ़ का कनेक्शन सामने आया था।सराय मीर के निवासी मोहम्मद यासिर ने कहा कि यह एक स्थानीय अदालत की ओर से कठोर निर्णय है। हम निश्चित रूप से उच्च न्यायालय का रुख करेंगे।
बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद आजमगढ़ को एक आतंक का केंद्र बताया गया क्योंकि मारे गए दो संदिग्ध और गिरफ्तार किए गए तीन सभी जिले के सराय मीर इलाके के संजरपुर गांव के थे।बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद गिरफ्तार किए गए इंडियन मुजाहिदीन (IM) के चार आतंकवादी २००८ के अहमदाबाद सीरियल बम विस्फोटों में मौत की सजा पाने वालों में शामिल हैं। चार अन्य दोषी उसी साल दिल्ली सीरियल बम विस्फोट की साजिश में शामिल थे।पुलिस की ओर से दाखिल चार्जशीट में कहा गया था कि तीन आतंकवादी २२ जुलाई को अहमदाबाद में विस्फोट करने के लिए पहुंचे थे। इनके पहुंचने के तीन दिन बाद ९ दूसरे आतंकवादी भी पहुंचे। इन सभी ने बम लगाए और उसी शाम को वापस ट्रेन पकड़ ली। विस्फोटों की जांच के दौरान पता चला कि आतंकवादी बटला हाउस में छिपे हुए हैं और बाद में उसी साल सितंबर में मुठभेड़ हुई।
२६ जुलाई २००८ को जब कुछ न्यूज़ एजेंसियों और पत्रकारों को एक ई -मेल आया (जो अनजान जगह से भेजा गया था) तो मजाक मान अधिकांश ने उसे पढ़ने की भी आवश्यकता नहीं समझी क्योंकि ई -मेल में लिखा गया था कि हम नरेंद्र मोदी को बता देंगे की उसकी औकात क्या है ।भेजने वाले की जगह लिखा था- IM (आई एम मतलब इंडियन मुजाहिदीन) मगर शाम होते -होते कहर बरप चुका था। यश व्यास तब सिर्फ १० वर्ष का था। उसका पूरा परिवार अहमदाबाद बम धमाके की चपेट में आ गया। उसके पिता और भाई की मौत हो गई, जबकि वह महीनों असरवा इलाके में एक अस्पताल में भर्ती रहा। वह आज २४ साल का हो गया है। विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई कर रहा है, लेकिन उसकी आंखों के सामने आज भी १३ साल पहले की घटना घूमती है। यश व्यास की तरह कई लोगों ने अपनों को आंखों के सामने तड़पते, कर्राहते और मरते देखा।ब्लास्ट में घायल हुए यश ने बताया कि वह विस्फोट में ५० प्रतिशत से ज्यादा जल गए थे। उन्हें चार महीने तक आईसीयू में रखा गया। वह आज भी पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाए हैं। उनके सुनने की क्षमता कम हो गई थी। यश के बड़े भाई १२ साल के थे, पिता के साथ वह भी इस धमाके की चपेट में आ गए थे। अपनी मां और दादी के साथ वह अकेले परिवार में जिंदा बचे। मां को उनके इलाज से लेकर पालने-पोसने और पढ़ाने में काफी संघर्ष करना पड़ा। उनके पिता दुष्यंत व्यास सिविल अस्पताल में कैंसर चिकित्सा सुविधा में लैब टेक्नीशन थे।दुष्यंत अपने दोनों बेटों को साइकिल चलाना सिखाने के लिए अस्पताल के एक खुले मैदान में ले गए थे। शाम करीब साढ़े सात बजे थे। उनके पिता को पता चला कि विस्फोट पीड़ितों को एम्बुलेंस में लाया जा रहा है। वह सिविल अस्पताल के ट्रॉमा वॉर्ड के पास पहुंचे, लेकिन तभी एक तेज आवाज के साथ विस्फोट हुआ। उसके बाद आंखों के सामने सब बिफर गया।
बीजेपी नेता प्रदीप परमार ने बताया कि वह भी इस ब्लास्ट में घायल हुए थे। वह असहनीय दर्द से कराह रहे थे। डॉक्टरों ने उनके शरीर को और संक्रमण से बचाने के लिए पैर काटने का फैसला किया लेकिन सौभाग्य से उनका पैर काटने की नौबत नहीं आई। हालांकि आज भी उनके पैरों में घावों के गहरे निशान नजर आते हैं। उन्होंने बताया कि वह असरवा इलाके में हुए ब्लास्ट पीड़ितों से मिलने सिविल अस्पताल पहुंचे थे, जहां ब्लास्ट हुआ और वह भी चपेट में आ गए। पुराने शहर की जमालपुर-खड़िया सीट से भाजपा के पूर्व विधायक भूषण भट्ट ने याद किया कि कैसे यहां के रायपुर चाकला इलाके में एक विस्फोट के बाद वह बाल-बाल बचे थे। उन्होंने कहा, ‘शनिवार का दिन था…मैं और भाजपा के कुछ अन्य स्थानीय कार्यकर्ता एक सैंडविच विक्रेता के ठेले के पास बैठे थे। अचानक, पास स्थित एक मेडिकल दुकान के पास एक विस्फोट हुआ और लोग उस जगह की ओर भागने लगे जहां हम बैठे थे। मैं और अन्य कर्मचारी उठे और दुकान के पास जाकर देखने लगे कि क्या हुआ है।’ सैंडविच विक्रेता की पत्नी, हसुमती कादिया, अपने पति के लिए कुछ घर का बना नाश्ता लेकर आई और एक मेज के पास बैठ गई जहां भट्ट कुछ मिनट पहले बैठे थे। उन्होंने कहा, ‘कुछ समय बाद, उस टेबल के पास एक और विस्फोट हुआ, जिसमें हसुमतिबेन की मौत हो गई। पास की एक दुकान के एक अन्य कर्मचारी अंकित और तीन अन्य की मौके पर ही मौत हो गई।’ भट्ट ने कहा कि विस्फोट के बाद, यहां के लोग घायलों को उनके स्कूटर पर, और ऑटो-रिक्शा और एम्बुलेंस में ले गए।
अहमदाबाद में लगातार २१ बम धमाके हुए ,एक- के- बाद एक ,७० मिनट के अंदर , सब पूरी तरह योजनाबद्ध । उसमें ५६ लोग मारे गए और २०० लोग घायल हुए थे। सबसे अचरज की बात है कि पहली बार सूचना देकर बम फोड़े गए । आतंकवादी जानते थे कि बाज़ार में बम- विस्फोट होने के बाद घायलों को अस्पताल ले जाया जाएगा और इतनी बड़ी दुर्घटना होने के कारण राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अस्पताल अवश्य आएंगे इसलिए उन्होंने उस इलाके के अस्पताल में पहले से दो कारों में विस्फोटक सामग्री जमा कर रखी थी।जैसे ही घायलों को लेकर एम्बुलेंस, टेंपो,कार ,बस वहां पहुंचे और घायलों को स्ट्रेचर पर लाद कर अंदर ले जाया जाने लगा वहाँ विस्फोट हुए और कुल ३६ घायलों की मृत्यु सिर्फ अस्पताल में हो गई । ये विभत्सतम और अकल्पनीय था – अस्पताल में विस्फोट !! ऐसा तो सीरिया और फिलिस्तीन में भी नहीं होता है , लेकिन यह अहमदाबाद में हुआ।
बम विस्फोट मणिनगर इलाके में हुआ था जो नरेन्द्र मोदी का विधान सभा क्षेत्र था ।जो मेल भेजा गया था उसके आई पी एड्रेस की जांच की गई तो पता चला कि एक पब्लिक लाइब्रेरी के फ्री वाई -फाई से वह भेजा गया है और IM का मतलब था इंडियन मुजाहिदीन जो कि सिमी के बैन होने के बाद बना नया संगठन था। हांलांकि खुफिया एजेंसियों को पता था कि यह सिर्फ दुनिया की नजरों में धूल झोंकने की कवायद थी असल खिलाड़ी तो लश्कर का था।जांच शुरू हुई तो कहीं कोई सुराग नहीं मिला।केंद्रीय और स्थानीय एजेंसी बहुत हाथ पैर मार रही थी पर कहीं कुछ नहीं, कोई लीड नहीं मिल रही थी। रोड चेकपोस्ट, होटलों,लौजों की तलाशी, मस्जिदों की जांच के बाद भी कुछ नहीं मिला ऐसे ही हताशा व् निराशा के काल में भरुच से एक पुलिस कॉन्स्टेबल का फोन आया तो सबके आँखों में बिजली कौंध गयी।
भरूच के एक कांस्टेबल याकूब अली ने विशेष जांचदल के प्रमुख (एस आई टी चीफ) को फोन किया कि जिन गाड़ियों में बम रखे गए थे तथा जिनकी फोटो समाचार- पत्रों में छपी है उन्हें उसने भरूच में एक हफ्ते पहले देखा है। टीम भरूच पहुंची और याकूब अली के साथ बिस्मिल्लाह लौज गई जहां दोनों कारें खड़ी देखी गई थीं ।लौज के मालिक ने बताया कि टूरिस्ट आए थे जिन्होंने दो कमरे किराये पर लिये थे; उन्ही की गाड़ियां थीं। दोनों कमरों की बारीकी से जांच की गई , सबके पहचानपत्र भी नकली थे।सी सी टी वी का चलन था नहीं, मोबाइल फोन भी उतना ज्यादा नहीं चल रहा था। मगर उनमें से एक आदमी ने होटल के फोन से एक कौल किया था जिसका पेमेंट चेक आउट के समय बिल के साथ दिया था। जाँच से पता चला कि वह फोन आजमगढ़ किया गया था । और जब आजमगढ़ के उस फ़ोन मालिक के घर पर पुलिस पहुंची तो मिल गया सफदर नागौरी उर्फ सैफू इंडियन मुजाहिदीन का सरगना…. फिर धीरे- धीरे सब पकड़े गए ।आठ लोग तो आजमगढ़ के ही हैं।
नवभारत टाइम्स (मुंबई ) के क्राइम बीट पर लगभग ३० वर्षों से कार्यरत सुनील मल्होत्रा ने लगातार एक सप्ताह तक अहमदाबाद बमकांड की रिपोर्टिंग कर सबको हतप्रभ कर दिया था। वे बताते हैं -‘कल जब अहमदाबाद कोर्ट ने ३८ लोगों को फांसी की सजा सुनाई और ११ को आजीवन कारावास दिया, तो अपने आप वह पुराने दिन याद आ गए। सोचा, उन संस्मरण को शेयर करूं, क्योंकि अहमदाबाद केस का सीधा कनेक्शन मुंबई से था और हर पत्रकार की तरह मुझमें भी तब कुछ एक्सक्लूसिव पाने की भूख थी। दिप्तीमान तिवारी उन दिनों मुंबई मिरर में मुंबई में थे, इन दिनों इंडियन एक्सप्रेस (दिल्ली) में है। वह किसी स्टोरी के बारे में मुझसे ऑफिस में या प्रेस रूम में बात कर रहे थे। मैंने उन्हें मुंबई क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी का नाम और मोबाइल नंबर दिया और कहा कि यह अधिकारी आपकी स्टोरी में बहुत मदद कर सकते हैं। दो तीन दिन बाद मुंबई मिरर में वह स्टोरी पब्लिश हुई। उस अधिकारी का नाम भी । क्राइम ब्रांच के उस अधिकारी ने मुझसे कहा कि मेहरोत्रा जी, क्या आपने मुंबई मिरर में मेरी स्टोरी पढ़ी? मैंने जवाब हां में दिया, लेकिन साथ ही मुस्करा भी दिया । वह अधिकारी बोले, आप मुस्करा क्यों रहे हैं ? तब मैंने उनसे कहा, कि आपका मोबाइल नंबर मैंने ही तिवारी को दिया था।जवाब में वह अधिकारी बोले- बदले में मैं आपको १५ दिन में एक एक्सक्लूसिव खबर दूंगा । मैंने जवाब में उस अधिकारी से कहा कि राकेश मारिया के क्राइम ब्रांच चीफ रहते आप मुझे एक्सक्लूसिव खबर देंगे, मुझे संदेह है। उस अधिकारी ने फिर वादा किया कि मुझ पर यकीन करो। लगभग १५ दिन बाद मुंबई पुलिस प्रेस रूम से फोन आया कि आज शाम पांच बजे ( या चार बजे)आजाद मैदान पुलिस क्लब में मुंबई क्राइम ब्रांच की प्रेस कॉन्फ्रेंस है। आजाद मैदान पुलिस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस का मतलब ही होता है कि बड़ा मामला है। बहरहाल, शाम को वहां पहुंचे, तो क्राइम ब्रांच चीफ राकेश मारिया वहां मौजूद थे। मुंबई पुलिस कमिश्नर हसन गफूर और एटीएस चीफ हेमंत करकरे भी आए थे।उस पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्राइम ब्रांच के वह अधिकारी भी मिल गए । मेरा उनसे सामना हुआ, तो मैंने उनसे कहा कि १५ दिन पहले क्या इसी एक्सक्लूसिव खबर की बात आप कर रहे थे? वह बोले, हां । मैंने उन्हें याद दिलाया कि मैंने तब जवाब में आपसे क्या कहा था? वह बोले, चिंता न करो, तुम्हें एक्सक्लूसिव खबर ही दूंगा, बस यहां खामोश रहो। प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होते -होते करीब ६ बज गए। उसके बाद जैसा कि बड़े केसों से जुड़ी प्रेस कांफ्रेंस में होता है, पत्रकार प्रेस कांफ्रेंस खत्म होने के बाद केस के इन्वेस्टिगेशन से जुड़े अधिकारियों को घेर लेते हैं । मेरा सोर्स अधिकारी भी तमाम पत्रकारों से घिरा हुआ था। करीब सवा सात, साढ़े सात बजे वह अधिकारी आजाद मैदान पुलिस क्लब से बाहर निकला। लेकिन मेरी टेंशन खत्म नहीं हुई, बल्कि और बढ़ गई। कारण? उस अधिकारी के साथ और भी अधिकारी थे। वह आगे चल रहे थे, मैं पीछे चल रहा था। अखबार की डेडलाइन का अलग टेंशन था। मैंने अपने सोर्स अधिकारी को तब पीछे से जोर से आवाज दी–सर। उन्होंने मुझे लगभग अनसुना का ड्रामा करते हुए आगे से पीछे अपना हाथ हिलाया और इशारा किया कि बस, मेरे पीछे -पीछे चलते रहो। मैं एक्सक्लूसिव स्टोरी की भूख में वैसा ही करता रहा। कुछ मिनट बाद मेरा सोर्स अधिकारी अन्य अधिकारियों और मुझे बीच रास्ते छोड़कर एसबी वन के ऑफिस में घुस गया। मुझे बहुत गुस्सा आया। लगा, इस अधिकारी ने मुझे पोपट बना दिया है। कुछ मिनट बाद मैंने उन्हें फोन लगाया, जवाब में एसबी वन से बाहर निकलते उनका चेहरा सामने आया। वह बोले कि उन अधिकारियों से खुद को अलग करने के लिए टॉयलेट जाने के बहाने वह जानबूझ कर एसबी वन गए थे। रात के करीब पौने आठ बजे रहे थे। वह मुझे इसके बाद एसबी वन ऑफिस से कुछ दूर एक अंधेरी जगह पर ले गए। सिर्फ १५ मिनट बात की और सिर्फ इतनी रिक्वेस्ट की कि १५ दिन तक तुम मुझे न कॉल करना और न ही ऑफिस आना, नहीं तो सारे बॉस समझ जाएंगे कि यह एक्सक्लूसिव ख़बर किसने दी? मैं इसके बाद लगभग दौड़ते -दौड़ते ऑफिस आया, क्योंकि एक्सक्लूसिव खबर देने के साथ डेडलाइन का प्रेशर मुझ पर बहुत ज्यादा था। पर आप लोग यकीन मानिए, अपने सोर्स अधिकारी से उस १५ मिनट की बातचीत से मैंने करीब एक हफ्ते तक रोज नई स्टोरी दीं। अब तो मैं बूढ़ा हो गया हूं, लेकिन वह मेरी पत्रकारिता के बेहद रोमांच भरे दिन थे। मुंबई के लगभग सभी पत्रकारों ने इंडियन मुजाहिद्दीन से जुड़े उस केस को कई दिनों तक कवर किया था। उन दिनो एनडीटीवी में शैलेंद्र मोहन जी थे, जिनके सेंट्रल एजेंसियों में अच्छे सोर्स थे। उस केस की रिपोर्टिंग के दौरान, शायद PTC करते वक्त वह घायल हो गए थे और कई दिन तक अस्पताल में भर्ती थे।
सफदर नागोरी उन ३८ दोषियों में से एक है, जिन्हें गुजरात की एक अदालत ने २००८ में अहमदाबाद में हुए सीरियल ब्लास्ट मामले में शुक्रवार को मौत की सजा सुनाई। नागोरी और अन्य आरोपियों पर आतंकी वारदात के जरिए ५६ लोगों की जान लेने का दोष है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के सेंट्रल जेल में बंद नागोरी को सजा मिलने के बाद भी अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है। उसने कहा है कि भारत का संविधान उसके लिए कोई मायने नहीं रखता। अभियोजन पक्ष के अनुसार मध्य प्रदेश के उज्जैन का रहने वाला नागोरी (५४ ) प्रतिबंधित स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) से जुड़ा था और अहमदाबाद धमाकों का मुख्य साजिशकर्ता था। जेल अधिकारियों के मुताबिक, नागोरी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अहमदाबाद की विशेष अदालत में हुई सुनवाई में हिस्सा लिया।
भोपाल सेंट्रल जेल के अधीक्षक दिनेश नरगावे ने बताया कि नागोरी ने मौत की सजा सुनाए जाने के तुरंत बाद कहा, ‘संविधान मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता। मेरे लिए कुरान के फैसले सबसे ऊपर हैं।’ सिमी के महासचिव रह चुके नागोरी पर अहमदाबाद धमाकों के लिए विस्फोटकों का इंतजाम करने और सिमी की अन्य अवैध गतिविधियों के लिए धन इकठ्ठा करने का आरोप लगाया गया था।सूत्रों के मुताबिक नागोरी लगभग १०० आपराधिक मामलों में आरोपी है। उसके विरुद्ध उज्जैन के महाकाल पुलिस स्टेशन में १९९७ में पहला आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। नागोरी को २६ मार्च २००८ को इंदौर के एक फ्लैट से गिरफ्तार किया गया था और तब से वह जेल में कैद है। नागोरी के पिता मध्य प्रदेश पुलिस की अपराध शाखा में सहायक उप-निरीक्षक थे। २६ जुलाई २००८ को अहमदाबाद में ७० मिनटों के बीच २२ धमाके हुए थे। जिधर देखो, उधर तबाही का मंजर था। सिविल अस्पताल हो, नगर निगम का एलजी अस्पताल, बसें, पार्किंग में खड़ी साइकलें, कारें… ५६ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। २०० से ज्यादा घायल हुए। कुल २४ बम लगाए गए थे। कलोल और नरोदा में लगा बम नहीं फटा। अदालत ने ४९ में से ३८ दोषियों को मौत की सजा सुनाई है। बाकी ११ दोषियों को उम्रकैद की सजा मिली है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरदोई में आयोजित एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए आतंकवाद का मुद्दा उठाया और कहा,‘एक समय था जब देश में हर सप्ताह बम धमाके होते थे और हिंदुस्तान के कितने शहरों में निर्दोष नागरिक मारे गये।मैं उस दिन को भूल नहीं सकता जब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था और अहमदाबाद में सीरियल बम धमाके हुए थे… मैंने उस खून से गीली हुई मिट्टी को उठाकर संकल्प लिया था कि मेरी सरकार इन आतंकवादियों को पाताल से भी खोज कर सजा देगी।अहमदाबाद धमाके में अदालत के फैसले का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा, ‘आज मैं विशेष तौर पर इसका जिक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि कुछ राजनीतिक दल ऐसे ही आतंकवादियों के प्रति मेहरबान रहे हैं और ये राजनीतिक दल वोट बैंक के स्वार्थ में आतंकवाद को लेकर नरमी बरतते रहे हैं।’ खैर मोदी मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बन चुके हैं. वो अस्पताल गए थे, मगर धमाकों के बाद। अहमदाबाद धमाकों को नहीं रोका जा सका। उसकी पीड़ा और वेदना आज भी लोगों के आंखों में तैर रही है , अस्पताल में हुए धमाकों में जो घायल हुए आज फैसले से बहुत खुश हैं जबकि सजा पाए आतंकियों पास अभी उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के विकल्प हैं।
” घर में रहते हुए मैं वह काम नहीं कर सकता, जो करना चाहता हूं। देश में नास्तिकता, हिंसा और वाम-मार्ग के कारण बड़ी बुरी-बुरी बातें फैल रही है। मैं अज्ञान के अंधेरे को दूर करना चाहता हूं। घूम-घूमकर कृष्णभक्ति का सन्देश सारे देश को सुनाना चाहता हूं। जात-पांत के बंधनों से लोगों को निकालना चाहता हूं।
निमाई ने झट अपनी पुस्तक गंगाजी में फेंक दी। बोले, “यह तो एक पुस्तक है। मित्र के लिए मैं अपने प्राण भी दे सकता हूं।”
“मेरे यश और वेश से डाह करनेवालों को सीधे रास्ते पर लाने का केवल एक ही उपाय है और वह है त्याग। त्याग करके ही मैं दुनिया की भलाई में लग सकता हूं”।
जन्म: 18 फ़रवरी सन् 1486 जन्मस्थान :मायापुर (नादिया / नवद्वीप , पश्चिम बंगाल )
नाम : विश्वम्भर मिश्र ,निमाई ,गौर हरि, गौर सुंदर ,गौरांग महाप्रभु , चैतन्य महाप्रभु माता : शुचि देवी पिता : जगन्नाथ मिश्र गुरु : केशव भारती और माधवेन्द्र पुरी
स्थापना : वैष्णव गौड़ीय सम्प्रदाय , वृन्दावन की पुनर्रचना
मृत्यु: सन् 1534
भक्तिकाल के प्रमुख संतों में से एक चैतन्य महाप्रभु ने वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी और भजन गायकी की एक नयी शैली को जन्म दिया। समाज से जाति-पांत, ऊँच-नीच की भावना को दूर करने की शिक्षा देनेवाले चैतन्य महाप्रभु का जन्म 18 फ़रवरी सन् 1486 की फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को पश्चिम बंगाल के नवद्वीप (नादिया) नामक उस गांव में हुआ, जिसे अब ‘मायापुर’ कहा जाता है।इनका जन्म संध्याकाल में सिंह लग्न में चंद्र ग्रहण के समय हुआ था। इनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र व मां का नाम शचि देवी था। कहते हैं कि जगन्नाथ -शुचि के एक- के- बाद एक करके आठ कन्याएं पैदा हुईं और मरती गईं। फिर एक लड़का पैदा हुआ। भगवान की दया से वह बड़ा होने लगा। उसका नाम उन्होंने विश्वरूप रखा। विश्व रूप जब दस बरस का हुआ तब उसके एक भाई और हुआ। माता-पिता की खुशी का ठिकाना न रहा। बुढ़ापे में एक और बालक को पाकर वे फूले नहीं समाये। कहते हैं, यह बालक तेरह महीने माता के पेट में रहा। उसकी कुंडली बनाते ही ज्योतिषी ने कह दिया था कि वह महापुरूष होगा। यही बालक आगे चलकर चैतन्य महाप्रभु हुआ।
प्रपंची मुसलमानों द्वारा जब हिन्दूओं को छल एवं बलपूर्वक गऊ -मांस खिलाकर धर्मच्युत किया जाता था उस परिवेश में चैतन्य महाप्रभु का प्रादुर्भाव हिंदुत्व को संजीवनी ही थी। चैतन्य महाप्रभु जैसे महान संतों ने जनसाधारण में’ हिंदुत्व के प्रति भक्ति और समर्पण’ तथा अपने ‘महान इतिहास एवं राष्ट्र के प्रति गर्व’ की भावना जगाये रखी। इसके अलावा उन्होने विधवाओं को ज्ञानमार्ग पर लाकर उनका जीवन सफल बनाया तथा सामाजिक सद्भाव को सुदृढ़ किया।
चैतन्य के जन्मकाल के कुछ पहले सुबुद्धि राय गौड़ के शासक थे। उनके यहाँ हुसैनख़ाँ नामक एक पठान नौकर था। राजा सुबुद्धिराय ने किसी राजकाज को सम्पादित करने के लिए उसे रुपया दिया। हुसैनख़ाँ ने वह रकम खा- पीकर बराबर कर दी। राजा सुबुद्धिराय को जब यह पता चला तो उन्होंने दंड स्वरूप हुसैनख़ाँ की पीठ पर कोड़े लगवाये। हुसैनख़ाँ चिढ़ गया। उसने षड्यन्त्र रच कर राजा सुबुद्धिराय को हटा दिया। अब हुसैन ख़ाँ पठान गौड़ का राजा था और सुबुद्धिराय उसका कैदी। हुसैनख़ाँ की पत्नी ने अपने पति से कहा कि पुराने अपमान का बदला लेने के लिए राजा को मार डालो। परन्तु हुसैनख़ाँ ने ऐसा न किया। वह बहुत ही धूर्त था, उसने राजा को जबरदस्ती मुसलमान के हाथ से पकाया और लाया हुआ भोजन करने पर बाध्य किया। वह जानता था कि इसके बाद कोई हिन्दू सुबुद्धिराय को अपने समाज में शामिल नहीं करेगा। इस प्रकार सुबुद्धिराय को जीवन्मृत ढंग से अपमान भरे दिन बिताने के लिए ‘एकदम मुक्त’ छोड़कर हुसैनख़ाँ हुसैनशाह बन गया। चैतन्य प्रभु ने ‘कृष्ण महामंत्र ‘ देकर कालांतर में सुबुद्धिराय का उद्धार किया।
अस्तु ,उन दिनों देश में छूआछूत ओर ऊंच-नीच का भेद बहुत था।विशेषतः वैष्णव और ब्राह्मण अपने या अपने घरवाले के ही हाथ का पका हुआ खाना खाते थे।एक दिन एक ब्राह्मण निमाई के यहां आया।पिता जगन्नाथ मिश्र ने उसकी बड़ी आवभगत की। शचीदेवी ने उन्हें सीदा ( बिना पकाया हुआ भोज्य सामग्री ) दिया।ब्राह्मण ने चौका लीप-पोत कर तैयार किया और खाना बनाया। खाने से पहले वह आंखें बन्द करके विष्णु भगवान को भोग लगाने लगा। तभी निमाई ने आकर उसकी थाली में से खाना खाना शुरू कर दिया। यह देखकर ब्राह्मण चिल्लाने लगा।उनकी आवाज सुनते ही मिश्रजी और शचीदेवी दौड़े आये। मिश्रजी ने निमाई को पकड़ लिया और उन्हें पीटना ही चाहते थे कि ब्राह्मण ने छुड़ा दिया।मिश्रजी और शचीदेवी के आग्रह पर ब्राह्मण ने दूसरी बार भोजन तैयार किया। निमाई को अलग जाकर रस्सी से बांध दिया, पर भगवान को भोग लगाते समय फिर वही घटना घटी। निमाई रस्सी खोलकर आ गये और थाली में से चावल खाने लगे। अब की बार मिश्रजी के गुस्से का ठिकाना न रहा। वह मारने को लपके, पर ब्राह्मण ने उन्हें रोक दिया। उसी समय पाठशाला से पढ़कर निमाई के बड़े विश्वरूप आ गये। सबने मिलकर ब्राह्मण से फिर खाना बनाने का आग्रह किया।ब्राह्मण मान गया। विश्वरूप और माता ने निमाई के रस्सी से बांधकर अपने पास बिठा लिया। कहते हैं, जब ब्राह्मण ने भोजन बनाकर भगवान विष्णु को भोग लगाया तो भगवान चतुर्भुज रूप में उसके सामने आ खड़े हुए और बोले, “तुम्हारे बुलाने पर मैं बालक के रूप में दो बार तुम्हारे पास आया, पर तुम पहचान नहीं पाये। अब जो इच्छा हो, मांगो।” ब्राह्मण गदगद् हो गया। बस, मुझे यही वर दीजिए कि आपकी मूर्ति सदा मेरे हृदय में बसी रहे।” विष्णु भगवान ने कहा, “ऐसा ही होगा।” ब्राह्मण ने बड़ी खुशी से भोजन किया। फिर वह निमाई को देखने गया। वह सो रहे थे। ब्राह्मण ने मन-ही-मन उन्हें प्रणाम किया और अपने घर लौट गया।जिसके घर से जो कुछ मिलता, निमाई भी वही खा लेते थे । पड़ोसिन प्यार से उन्हें खिलातीं। कोई-कोई कहतीं, “निमाई ब्राह्मण होकर हर किसी का छुआ खा लेता है।” निमाई हंसकर कहते, “हम तो बालगोपाल हैं। हमारे लिए ऊंच-नीच क्या! तू खिला, हम तेरा खा लेंगे।”
Chaitnya Mhaprabhu
एक दिन की बात है। बालक के स्वभाव की जांच करने के लिए पिताजगन्नाथ मिश्र ने उसके सामने खिलौने, रुपये और भगवतगीता रख दी। बोले, “बेटा, इनमें से कोई-सी एक चीज़ उठा लो।” बालक ने भगवतगीता उठा ली। पिता समझ गये कि आगे चलकर यह बालक भगवन का बड़ा भक्त होगा। एक बार निमाई काले नाग से खेलते हुए पाये गए।उनके चारों ओर सांप-कुंडली मार कर बैठा हुआ था ओर वह बड़े प्यार से उसके शरीर पर हाथ फेर रहे थे। लोगों को पक्का विश्वास हो गया कि हो-न-हो, इस बालक के शरीर में कोई महान आत्मा रहती है। निमाई बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा संपन्न थे। साथ ही, अत्यंत सरल, सुंदर व भावुक भी थे। बाल्यावस्था में इनका नाम विश्वंभर था, परंतु सभी इन्हें ‘निमाई’ कहकर पुकारते थे। गौरवर्ण का होने के कारण लोग इन्हें ‘गौरांग’, ‘गौर हरि’, ‘गौर सुंदर’ आदि भी कहते थे।
निमाई जितने शरारती थे, बड़े भाई विश्वरूप उतने ही गम्भीर और अपने विचारों की दुनिया में खोये रहने वाले आदमी थे।विश्वरूप की उम्र इस समय १६-१७ साल की थी। माता-पिता विश्वरूप के विवाह की बात सोचने लगे, किन्तु उनकी लगन दूसरी ही ओर थी। मां-बाप ने जोर दिया तो अवसर पाकर एक दिन वह रात को घर से निकल गये और संन्यासी हो गये। बहुत ढूंढ़ने पर भी उनका पता न चला। मिश्रजी और शचोदेवी के दु:ख की सीमा न रही। निमाई पर भी इस घटना का बहुत असर पड़ा। वह भी अब गम्भीर रहने लगे।निमाई का मन अब पढ़ने की ओर झुका, पर पिता को उसमें रस न था। वह सोचते थे कि एक लड़का तो खो ही गया, कहीं दूसरा भी हाथ से न चला जाय। वह निमाई को पढ़ते देखते तो बहुत नाराज होते। पर निमाई जब पढ़ने पर ही तुले थे, तो उन्हें कौन रोक सकता था! वह पिता से छिपकर पढ़ते।इस समय उनकी अवस्था ग्यारह वर्ष की थी। इस छोटी-सी उम्र में ही उन्होंने बहुत-कुछ पढ़ डाला। पिता अपने पुत्र की चतुराई की बातें सुन-सुनकर बहुत खुश होते। पर भाग्य के आगे किसका बस चलता है! एक दिन अचानक जगन्नाथ मिश्र को जोर का बुखार चढ़ा और कुछ ही दिनों में वह चल बसे।घर पर दु:ख का पहाड़ टूट पड़ा। पर निमाई ने हिम्मत से काम लिया। अपने-आपको तो सम्भाला ही, मां को भी को भी धीरज बंधाया।
दुखी मां का अब निमाई ही सहारा थे। पढ़ने से जो समय बचता, उसमें वह माता की खूब सेवा करते।व्याकरण के साथ-साथ निमाई अब अन्य विषय भी पढ़ने लगे। धीरे-धीरे उनके ज्ञान की चर्चा चारों ओर होने लगी। उनकी उम्र सोलह साल की हो चुकी थी। लोग उन्हें ‘निमाई पंडित’ कहने लगे।निमाई के एक मित्र थे पं० रघुनाथ। वह उन दिनों एक पुस्तक लिख रहे थे। उनका विचार था कि इस पुस्तक को लिख लेने पर उस विषय का उनसे बड़ा विद्वान कोई नहीं होगा। तभी उन्हें पता लगा कि निमाई पंडित भी उसी विषय पर पुस्तक लिख रहे हैं। वह जानते थे कि निमाई इस विषय के पंडित हैं। वह उनके घर पहुंचे। रघुनाथ ने कहा, “सुना है, तुम न्याय पर कोई पुस्तक लिख रहे हो!” हंसते हुए निमाई ने कहा, “अजी, छोड़ो। तुम्हें किसी ने बहका दिया होगा। कहां मैं और कहां न्याय जैसा कठिन विषय ! मन-बहलाव के लिए वैसे ही कुछ लिख रहा हूं।” “फिर भी मैं उसे सुनना चाहता हूं।” रघुनाथ ने जोर देकर कहा।
“जैसी तुम्हारी इच्छा! चलो, गंगाजी पर नाव में सैर करेंगे और पुस्तक भी सुनायेंगे।”
दोनों गंगा-घाट पर पहुंचे और नाव में बैठकर घूमने लगे। निमाई ने अपनी पुस्तक पढ़नी शुरू की। सुनकर रघुनाथजी रोने लग गये।
“निमाई ने हैरानी से पूछा, “क्यों, क्या हुआ? रो क्यों रहे हो?”
“निमाई, मेरी बरसों की मेहनत बेकार गई। तुम्हारी इस पुस्तक के सामने मेरी पुस्तक पर कौन ध्यान देगा? अपनी जिस पुस्तक पर मुझे इतना गुमान था, वह तो इसके सामने कुछ भी नहीं है ” रघुनाथ ने कहा।
निमाई हंसने लगे। बोले, “बस इतनी-सी बात के लिए परेशान हो!” यह कहकर उन्होंने झट अपनी पुस्तक गंगाजी में फेंक दी। बोले, “यह तो एक पुस्तक है। मित्र के लिए मैं अपने प्राण भी दे सकता हूं।”
उस दिन के बाद से फिर निमाई पाठशाला में पढ़ने नहीं गये। घर पर ही पिता और भाई की किताबों से पढ़ने लगे।कुछ दिन बाद उन्होंने लड़कों को पढ़ाने के लिए एक पाठशाला खोली। धीरे-धीरे उसमें बहुत-से विद्यार्थी हो गये। उनमें कई तो उम्र में उनसे बड़े थे। निमाई अपने विद्यार्थियों को खूब मेहनत से पढ़ाते और मित्र की तरह उनसे प्रेमभाव रखते। माता के बहुत दबाव डालने पर उन्होंने पंडित बल्लभाचार्य की पुत्री लक्ष्मीदेवी से विवाह कर लिया। लक्ष्मीदेवी को वह बचपन से ही जानते थे।इन्ही दिनों नवद्वीप में एक पंडित आये। उन्हें अपने ज्ञान का बड़ा घमंड था, लेकिन निमाई के सामने उन्हें मुंह को खानी पड़ी। इससे निमाई का नाम और प्रचारित हो गया। उनकी पाठशाला विद्यार्थियों से भरी रहती। कुछ दिनों के लिए निमाई पूर्वी बंगाल की यात्रा पर गये। इसी बीच घर पर सर्पदंश से लक्ष्मीदेवी की मृत्यु हो गई। बेचारी मां को उस समय धीरज बंधानेवाला कोई न था। लौटने पर निमाई को जब यह समाचार मिला तो वह बहुत दुखी हुए। इसी तरह एक-दो बरस निकल गए। निमाई विद्वानों और माता की सेवा करते अपनी पाठशाला में छात्रों को पढ़ाते।अपनी मां का वह बहुत मान करते थे। माता की आज्ञा और आग्रह से उन्होंने पंडित सनातन मिश्र की कन्या विष्णुप्रिया से विवाह कर लिया। सूने घर में फिर चहल-पहल हो गई। विष्णुप्रिया के अच्छे स्वभाव के कारण धीरे-धीरे शचीदेवी और निमाई लक्ष्मीदेवी के विछोह का दु:ख भूल-सा गये।
गया जाकर बहुत-से लोग अपने पितरों का श्राद्ध करते हैं। इस बार नवद्वीप से गया आनेवालों में निमाई भी थे। वह वहां जाकर अपने पिता का श्राद्ध करना चाहते थे। गया में इस समय बड़ी भीड़ थी। माने हुए सिद्ध-महात्मा वहां आये हुए थे। वहीं पर संन्यासी माधवेन्द्र पुरी से निमाई की भेंट हुई। नवद्वीप में एक बार वह पहले भी मिल चुके थे। पर तब के और अब के निमाई में बड़ा अन्तर था। भेंट होते ही निमाई ने श्रद्धा से उनके चरण पकड़ लिये। संन्यासी ने उन्हें प्यार से आशीर्वाद दिया। निमाई बोले, “स्वामी! संसार की गति के साथ यह जीवन इसी तरह बीत जायगा। अब हमें भी कृष्ण-भक्ति दीजिये।” संन्यासी ने सरलता से कहा, “आप तो स्वयं कृष्णरूप हैं। पहुंचे हुए पंडित हैं। आपको कोई क्या दीक्षा देगा!”
निमाई के बहुत जोर देने पर माधवेन्द्र पुरी स्वामी ने उन्हें दीक्षा दे दी। ज्यों ही निमाई के कान में मंत्र फूंका गया, वह बेहोश हो गए और उसी हालत में चिल्लाने लगे, “अरे प्यारे कृष्ण, तुम कहां हो? मुझे भी अपने पास बुला लो।” होश आने पर अपने साथियों से बोले, “भैया, तुम घर लौट जाओ। हम तो अब कृष्ण के पास वृन्दावन जाते हैं।”
पर पुरी स्वामी ने उन्हें समझाकर कहा, “वृन्दावन बाद में जाना। पहले नवद्वीप में कृष्ण-भक्ति की गंगा बहाओ। पहले अपने यहां के लोगों का उद्धार करो।” गुरु की आज्ञा से निमाई नवद्वीप लौट आये।
गया से लौटने के बाद निमाई का मन पाठशाला में न लगा। वह हर समय कीर्त्तन में लीन रहने लगे। व्याकरण पढ़ाते-पढ़ाते श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन करने लगते, फिर कृष्ण-वियोग में फूट-फूटकर रोने लगते।धीरे-धीरे पाठशाला का अन्त हो गया। निमाई के कारण नवद्वीप के वैष्णवों में एक नई लहर आ गई। जोरों का कीर्त्तन होता। निमाई कीर्त्तन करते-करते नाचने लग जाते। उनके साथ-साथ और भी भक्त नाचने लगते।भक्तों की संख्या बढ़ने लगी। बिना जात-पांत के भेद के सब लोग उनके कीर्त्तन में शामिल होते थे। लोग उनको भगवान कृष्ण का अवतार मानने लगे।निभाई के विरोधी उन्हें नीचा दिखाने के उपाय सोचते रहते थे। बंगाल का यह इलाका उन दिनों गौड़ देश के नाम के नाम से प्रसिद्ध था। वहां पर मुसलमान बादशाह का राज्य था। राज्य की ओर से हर बड़े नगर में काजी की अदालत थी।एक बार उन्होंने काजी से शिकायत की कि उनके कीर्त्तन से हम बड़े परेशान हैं। वह शोर मचाकर राज को सोने नहीं देते और कीर्त्तन से हम बड़े परेशान हैं। वह शोर मचाकर रात को सोने नहीं देते और कीर्त्तन के बहाने बुरे-बुरे काम करते हैं। साथ ही उन्होंने मुसलमानों को कृष्ण भक्त बना लिया है। यह सुनते ही काजी जलभुन गया। उसने फौरन आज्ञा दी कि कहीं भी कीर्त्तन नहीं होगा। भक्तों ने आकर जब काजी की यह आज्ञा सुनाई तो निमाई पंडित मुस्कुराते हुए बोले , “घबराते क्यों हो? उन्होने नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि निमाई पंडित आज शहर के बाजारों में कीर्त्तन करता हुआ काजी के मकान के सामने जाएंगे और वहां कीर्त्तन करेंगे क्योंकि काजी साहब के उद्धार का समय आ गया है।” इस मुनादी को सुनकर लोगों की खुशी की कोई सीमा न रही। लोगों ने नगर के बाजार सजाये। दूसरे मत को माननेवाले लोगों ने भी अपने मकानों को सजाया। निमाई पंडित अपने भक्तों के साथ कीर्त्तन करते चले “हरिबोल ! हरिबोल !” जुलूस कीर्त्तन करता हुआ बाजारों से गुजरने लगा। निमाई प्रभु-भक्ति में लीन होकर नृत्य कर रहे थे। उनकी आंखों से कृष्ण-विरह में आंसू बह रहे थे। उन्हें देखकर विरोध करनेवालों के भी हृदय उनके चरणों में झुके जा रहे थे।
जनता में काजी की आज्ञा के खिलाफ जोश पैदा होने लगा। जनता चिल्लाने लगी, “काजी का मकान जला दो, काजी को मार दो।” लोग गुस्से में भरे हुए काजी के मकान की ओर बढ़ने लगे।निमाई पंडित कीर्त्तन में मस्त थे। जब भक्तों ने उन्हें लोगों के जोश की बात बतलाई तो उन्होंने कीर्त्तन बन्द कर दिया और गुस्से से भरी हुई जनता के सामने जाकर बोले, “काजी का बुरा करनेवाला मेरा बुरा करेगा। मैं काजी को प्रेम से जीतना चाहता हूं, डर दिखाकर नहीं। इसलिए आप मेरे काम में रुकावट न डालें।”
काजी डर के मारे अपने घर में छिपकर बैठा था। निमाई ने उसके नौकरों से कहा, “काजीसाहब को मेरे आने की खबर दो। उनसे कहो कि डर की कोई बात नहीं। वह मुझ पर यकीन करें। मेरे होते हुए उनका बाल भी बांका न होगा।” गांव के नाते काजी निमाई के मामा लगते थे। नौकरों के समझाने-बुझाने पर काजी बाहर आये।
निमाई पंडित ने प्यार से कहा, “मामाजी, भानजा मिलने आये और मामा मकान के द्वार बन्द करके अन्दर जा बैठे, यह भी कोई बात हुई!” काजी ने कहा, “तुम्हारे कीर्त्तन में रुकावट डालने का मुझे दु:ख हैं। मैं लोगों के बहकावे में आ गया था। अब तुम खूब कीर्त्तन करो, तुम्हें कोई नहीं रोकेगा।”
इस घटना से निमाई पंडित के हृदय में एक बड़ा परिवर्तन आने लगा। संन्यास लेने की इच्छा पैदा होने लगी। वह सोचते थे कि मेरे यश और वेश से डाह करनेवालों को सीधे रास्ते पर लाने का केवल एक ही उपाय है और वह है त्याग। त्याग करके ही मैं दुनिया की भलाई में लग सकता हूं। यह इच्छा जब उन्होंने भक्तों, अपनी माता और पत्नी के बताई तो सब रोने लगे। सबने उन्हें समझाने की कोशिश की, पर बेकार। निमाई पंडित चट्टान की तरह अटल थे।बाद में सबने उनकी बात मान ली। एक रात को माता और पत्नी को सोता छोड़ वह संन्यास लेने के लिए घर से निकल पड़े। घर से निकलकर वह केशव भारती की कुटी पर पहुंचे और उनसे दीक्षा देने की प्रार्थना की। उस समय निमाई की उम्र चौबीस साल की थी। केशव भारती ने उन्हें बहुत समझाया। कहा, “अभी तुम्हारी उम्र छोटी है। तुम्हारे कोई बाल-बच्चा भी नहीं है। इस हालत में तुम्हारे लिए संन्यास लेना ठीक नहीं होगा। जाओ, घर लौट जाओ।” निमाई ने हाथ जोड़कर कहा, “गुरुदेव, घर में रहते हुए मैं वह काम नहीं कर सकता, जो करना चाहता हूं। देश में नास्तिकता, हिंसा और वाम-मार्ग के कारण बड़ी बुरी-बुरी बातें फैल रही है। मैं अज्ञान के अंधेरे को दूर करना चाहता हूं। घूम-घूमकर कृष्णभक्ति का सन्देश सारे देश को सुनाना चाहता हूं। जात-पांत के बंधनों से लोगों को निकालना चाहता हूं। आप मुझ पर दया करें, मुझे दीक्षा दें।” केशव भारती कुछ सोचते हुए बोले, “अच्छा, निमाई पंडित, एक शर्त पर मैं तुम्हें दीक्षा दे सकता हूं। तुम अपनी माता और पत्नी से आज्ञा ले आओ।” निमाई ने कहा, “गुरूदेव उन दोनों ने मुझे आज्ञा दे दी है। मैं उनसे पहले ही पूछ चुका हूं।”
निमाई के बहुत कहने पर केशव भारती उन्हें दीक्षा देने को तैयार हो गए। इतने में निमाई को ढ़ूंढ़ते हुए नवद्वीप के अनेक भक्त वहां आ पहुंचे। वह बड़ा ही हृदयविदारक दृश्य था। यह सुनकर कि एक युवक पत्नी और मां को छोड़कर संन्यासी बन रह है, आसपास के गांव के नर-नारी इकट्ठे हो गये। वे उन्हें मना करते और केशव भारती को गालियां देते। कोई भी नाई निमाई पंडित के सुन्दर बाल काटने को तैयार न हो रहा था । तब निमाई ने अपनी मधुर वाणी से सबको शान्त किया। उनके अनुरोध पर एक नाई ने उनके केश कटे पर उसने कसम खा ली कि आगे से वह यह काम नहीं करेगा। वह कृष्ण-भक्त हो गया। सन 1510 में संत प्रवर श्री पाद केशव भारती से संन्यास की दीक्षा लेने के बाद निमाई का नाम कृष्ण चैतन्य देव हो गया।
अपने समय में सम्भवत: इनके समान ऐसा कोई दूसरा आचार्य नहीं था, जिसने लोकमत को चैतन्य के समान प्रभावित किया हो। एक बार चैतन्यप्रभु अकेले ही चेरानन्दी वन में जा रहे थे। उस वन में मशहूर डाकू नौरोजी रहता था। उसका नाम सुनकर लोग कांप उठते थे। चैतन्य को इस वन में से जाने के लिए लोगों ने बहुत मना किया, पर उनके मन में नौरोजी को सही रास्ते पर लाने की धुन समाई हुई थी।नौरोजी उनको देखते ही उनका भक्त हो गया और वह संन्यासी बनकर महाप्रभु के साथ रहने लगा। पश्चिम बंगाल में अद्वैताचार्य और नित्यानन्द को तथा मथुरा में रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी को अपने प्रचार का भार संभलवाकर चैतन्य नीलांचल (कटक) में चले गए और वहाँ 12 वर्ष तक लगातार जगन्नाथ की भक्ति और पूजा में लगे रहे। चैतन्यप्रभु अधिकतर जगन्नाथपुरी में रहते थे और जगन्नाथजी की मूर्ति के आगे खड़े होकर घंटों रोया करते थे। वह प्रभु प्रेम की मस्ती में ‘श्री कृष्ण, श्री कृष्ण, मेरे प्राणाधार, श्री हरि तुम कहां हो’ पुकारते हुए कीर्तन करने लगे। उनके बहुत से शिष्य बन गए जो मिलकर ‘हरि हरये नम:,गोपाल गोबिंद, राम श्री मधुसूदन’ का संकीर्तन करते हुए प्रभु को ढूंढने लगे। उनके व्यक्तित्व का लोगों पर ऐसा विलक्षण प्रभाव पड़ा कि बहुत से अद्वैत वेदांती व संन्यासी भी उन के संग से कृष्ण प्रेमी बन गए और उनके विरोधी भी उनके अनुयायी बन गए।
कृष्ण-भक्ति के गीत गाते हुए वह जनता के हृदय में भगवत् भक्ति की भावना भरने लगे। वे कहते थे कि गिरिजाघरों या मस्जिदों में पूजा का प्रसार सम्भव नहीं, क्योंकि लोगों की रुचि इसमें नहीं रही, किन्तु हरे कृष्ण का कीर्तन कहीं भी और कभी भी किया जा सकता है | इस प्रकार श्री चैतन्य की पूजा करते हुए लोग सर्वोच्च कर्म कर सकते है और परमेश्वर को प्रसन्न करने का सर्वोच्च धार्मिक प्रयोजन पूरा कर सकते हैं | उन दिनों अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग राजाओं के राज्य थे; किन्तु चैतन्यप्रभु इतने प्रसिद्द और सम्मानित थे कि उन्हें कहीं भी जाने की रोक-टोक न थी। एक यात्रा में उन्हें पता चला कि उनके बड़े भाई विश्वरूप दो वर्ष साधु रहकर मर गये।साधु बनने के बाद दो बार चैतन्य अपनी माता से मिले। वैसे माता के समाचार वह समय-समय पर अपने भक्तों से पूछते रहते थे। एक बार जब वह नवद्वीप गये, तो विष्णुप्रिया उनसे मिली। चैतन्य बोले, “देवी, इस संन्यासी के लिए क्या आज्ञा है?” विष्णुप्रिया ने सिर झुकाकर कहा, “महाराज, मुझे आपके खड़ाऊं चाहिए।” चैतन्यप्रभु ने खड़ाऊं दे दिया। बाद में विष्णुप्रिया ने कृष्ण-भक्ति की दीक्षा ले ली।
चैतन्य महाप्रभु ने बंगाल की विधवाओं की दयनीय दशा और सामाजिक तिरस्कार को देखते हुए उनके शेष जीवन को प्रभु -भक्ति की ओर मोड़ा और इसके बाद ही उनके वृंदावन आने की परंपरा शुरू हो गई।वे 1515 में वृंदावन आए और उन्होंने अपना शेष जीवन वृंदावन में व्यतीत किया।वृंदावन करीब 500 वर्ष से विधवाओं के आश्रय स्थल के तौर पर जाना जाता है। कान्हा के चरणों में जीवन की अंतिम सांसें गुजारने की इच्छा लेकर देशभर से यहां जो विधवाएं आती हैं, उनमें ज्यादातर करीब 90 फीसद बंगाली हैं। अधिकतर अनपढ़ और बांग्लाभाषी। वृंदावन की ओर बंगाली विधवाओं के रुख के पीछे मान्यता यह है कि भक्तिकाल के प्रमुख कवि चैतन्य महाप्रभु का जन्म 1486 में पश्चिम बंगाल के नवद्वीप गांव में हुआ था।उन्होने विलुप्त वृन्दावन को फिर से बसाया और अपने जीवन का अंतिम भाग वहीं व्यतीत किया।कहा जाता है कि यदि गौरांग ना होते तो वृंदावन आज तक एक मिथक ही होता। वैष्णव लोग तो इन्हें श्रीकृष्ण का राधा रानी के संयोग का अवतार मानते हैं।
जब चैतन्य महाप्रभु कीर्तन करते थे, तो लगता था मानो ईश्वर का आह्वान कर रहे हैं। ” हरे-कृष्ण, हरे-कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण, हरे-हरे। हरे-राम, हरे-राम, राम-राम, हरे-हरे॥” यह अठारह शब्दीय (32 अक्षरीय) कीर्तन महामंत्र निमाई उपाख्य चैतन्य महाप्रभु की ही देन है। भक्तिमार्ग में इसे तारकब्रह्ममहामंत्र कहा गया, व कलियुग में जीवात्माओं के उद्धार हेतु प्रचारित किया गया था। कलियुग के युगधर्म श्री हरिनाम संकीर्तन को प्रदान करने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु जी ने अपने पार्षद श्री नित्यानंद प्रभु श्री अद्वैत, श्री गदाधर, श्री वासु को गांव-गांव और शहर-शहर में जाकर श्री हरिनाम संकीर्तन का प्रचार करने की शिक्षा दी। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए महामन्त्र ‘नाम संकीर्तन’ का अत्यंत व्यापक व सकारात्मक प्रभाव यूरोप,अमेरिका जैसे महादेशों में भी है। श्री चैतन्य महाप्रभु जी के जीवन का लक्ष्य लोगों में भगवद भक्ति और भगवतनाम का प्रचार करना था। वह सभी धर्मों का आदर करते थे।विश्व भर में श्री हरिनाम संकीर्तन श्री चैतन्य महाप्रभु की ही आचरण युक्त देन है। उन्होंने कलियुग के जीवों के मंगल के लिए ही उन्हें श्रीकृष्ण प्रेम प्रदान किया है, वह सांसारिक वस्तु प्रदाता नहीं बल्कि करुणा और भक्ति के प्रदाता हैं। चैतन्य महाप्रभु ने संस्कृत में कुछ लिखित कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णम्रि रिकॉर्ड किये है। चैतन्य के आध्यात्मिक, धार्मिक, महमोहक और प्रेरणादायक विचार लोगो की अंतरआत्मा को छू जाते थे। उनकी सिखाई कुछ बाते इस प्रकार हैं – :
• कृष्णा ही सर्वश्रेष्ट परम सत्य है। • कृष्णा ही सभी उर्जाओ को प्रदान करता है। • कृष्णा ही रस का सागर है। • सभी जीव भगवान के ही छोटे-छोटे भाग है। • जीव अपने तटस्थ स्वाभाव की वजह से ही मुश्किलों में आते है। • अपने तटस्थ स्वाभाव की वजह से ही जीव सभी बन्धनों से मुक्त होते है। • जीव इस दुनिया और एक जैसे भगवान से पूरी तरह से अलग होते है। • पूर्ण और शुद्ध श्रद्धा ही जीवो का सबसे बड़ा अभ्यास है। • कृष्णा का शुद्ध प्यार ही सर्वश्रेष्ट लक्ष्य है।
चैतन्य के अनुसार भक्ति ही मुक्ति का साधन है। उनके अनुसार जीवो के दो प्रकार होते है, नित्य मुक्त और नित्य संसारी। नित्य मुक्त जीवो पर माया का प्रभाव नही पड़ता जबकि नित्य संसारी जीव मोह-माया से भरे होते है। कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णम् बताता है कि कृष्ण-नाम को प्रधानता दी जानी चाहिए | भगवान् श्री चैतन्य ने कृष्णभावनामृत की शिक्षा दी और कृष्ण-नाम का कीर्तन किया | अतएव श्री चैतन्य की पूजा करने के लिए सबको मिलकर महामंत्र का कीर्तन करना चाहिए- हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण,हरे हरे |हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे ||
४८ वर्ष की उम्र में रथ-यात्रा के दिन उनकी जीवन-लीला समाप्त हो गई। उनका शरीर चला गया, पर उनका नाम सदा अमर रहेगा। भक्ति की उन्होंने जो धारा बहाई, वह कभी नहीं सूखेगी और लोगों को हमेशा पवित्र करती रहेगी।
गलिटीज़ टेलीप्ले के बैनर तले प्रथम प्रस्तुति के रूप में वेब सीरीज ‘रोहतक सिस्टर्स’ की शूटिंग इन दिनों भोपाल(मध्य प्रदेश) में तेज गति से जारी है। सत्य घटना पर आधारित इस वेब सीरीज में नवोदित कलाकारों के साथ बॉलीवुड के नामचीन कलाकार भी अपने अभिनय का जलवा बिखेरते नज़र आएंगे। मौजूदा दौर में दर्शकों के बदलते मिज़ाज़ को ध्यान में रखते हुए इस वेब सीरीज की कथावस्तु में एक्शन, कॉमेडी और ट्रेजडी का भी समावेश किया गया है।
राजोरा एंटरटेनमेंट के द्वारा प्रस्तुत की जा रही इस वेब सीरीज के निर्माता द्वय बच्चन तोमर और अज़रा सईद हैं। बॉलीवुड के चर्चित निर्देशक मनोज सिंह के निर्देशन में बन रही इस वेब सीरीज के लेखक आबिद निसार और डीओपी धर्मेंद्र बिस्वास हैं। इस वेब सीरीज के मुख्य कलाकार तेज सप्रू, बृजेश त्रिपाठी, अनिल नागरथ, मृणाल जैन, गौरव शर्मा, सोनम अरोड़ा, उर्वी सिंह, विक्रम कोचर, स्मिता शरण, विभा छिबर श्वेता खंडूरी, प्रीति मेहरा, एहसान खान, उपासना रथ, कल्याणी झा, अरुण सिंह, हेराम त्रिपाठी, सुनीत राजदान, मुनि झा, कुणाल, सिकंदर मिर्ज़ा और परेश ब्रह्मभट्ट आदि हैं।
नई दिल्ली: IPL में करोड़ों का बिकते ही इंटरनेशनल क्रिकेट का एक धुरंधर खिलाड़ी धोखेबाज बन गया है. बता दें कि ये खिलाड़ी और कोई नहीं बल्कि ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर मैथ्यू वेड हैं. मैथ्यू वेड को मेगा ऑक्शन में गुजरात टाइटंस ने 2 करोड़, 40 लाख रुपए में खरीदा है. ऑस्ट्रेलियाई विकेटकीपर बल्लेबाज मैथ्यू वेड ने लगातार 3 छक्के लगाकर पिछले साल अपनी टीम को 2021 टी20 वर्ल्ड कप जिताया था.
करोड़ों का बिकते ही ये क्रिकेटर बन गया धोखेबाज
मैथ्यू वेड की इस बार मेगा ऑक्शन में काफी डिमांड थी और गुजरात टाइटंस ने 2 करोड़, 40 लाख रुपए में मैथ्यू वेड को अपने खेमे में शामिल कर लिया. आईपीएल की इस बड़ी डील के मिलते ही अचानक मैथ्यू वेड ने इंग्लैंड की काउंटी क्रिकेट को अलविदा कह दिया. मैथ्यू वेड इंग्लैंड के घरेलू टूर्नामेंट काउंटी क्रिकेट में वॉरसेस्टरशायर क्लब के लिए खेलते थे.
अचानक इस टीम का छोड़ दिया साथ
मैथ्यू वेड ने पूरे सीजन के लिए करार किया था, लेकिन अब अपना नाम वापस ले लिया है, जो धोखा साबित हुआ है. मैथ्यू वेड यह दूसरी बार आईपीएल में खेलेंगे. इससे पहले उन्होंने 2011 सीजन में आईपीएल खेला था. मैथ्यू वेड तब दिल्ली डेयरडेविल्स के लिए क्रिकेट खेले थे. तब दिल्ली की कप्तानी वीरेंद्र सहवाग के हाथ में थी.
इस बार उन्हें आईपीएल की नई टीम गुजरात टाइटंस ने अपनी टीम में शामिल किया है. आईपीएल में इस बार कुल 10 टीमें होने से रोमांच दोगुना हो जाएगा. इस टीम की कप्तानी हार्दिक पांड्या के हाथ में रहेगी. आईपीएल 2022 का सीजन 26 मार्च से भारत में ही खेला जा सकता है. टूर्नामेंट मई के महीने तक चलेगा.
गुजराती फ़िल्म इंडस्ट्री के सुपरस्टार चंदन राठोड की ताजातरीन सस्पेंस थ्रिलर फ़िल्म हवे शु सुपर डुपर हिट हो रही है। फिल्मी दुनिया में हर अभिनेता में एक विशेषता की जरूरत होती है। लेकिन जब बात मल्टीटैलेंट की आती है तो एक ही अभिनेता की कई खासियतों की बात आती है तो गुजराती फ़िल्म इंडस्ट्री में सबसे पहले एक ही नाम होता है सुपर स्टार चंदन राठोड का। उन्होंने कई किरदारों को न सिर्फ निभाया, बल्कि उन किरदारों को फिल्म में जीवंत भी किया।
पहली फिल्म “धुलकी तारी माया लागी ” 2003 में सुपरहिट रही और इसने उन्हें सुपर स्टार का खिताब दिलाया। फिर क्या पूछना था…कई निर्माताओं को उन्हें फिल्म में साइन करने के लिए डेट्स का इंतजार करना पड़ता था। अब तक 107 फिल्में जिनमें उन्होंने 96 फिल्मों में मुख्य भूमिका निभाई है, जिनमें से 46 फिल्में सुपरहिट रही हैं। और ‘इंस्पेक्टर अर्जुन, प्रीत ना सोगन्द , प्राण जाए पन प्रीत ना जाए, खम्मा मारा लाल, भव भव ना भरथार ,सासु शेर जमाई सवाशेर, एकको बादशाह रानी। जैसी यादगार फिल्में लोग आज भी देखते हैं उन्होंने 100 से ज्यादा एलबम गाने और टीवी सीरियल्स में अपने अभिनय से लोगों के दिलों में खास जगह बना ली है। चंदन राठौर की अगली फिल्म… ‘हवे शु ?’ रिलीज हो चुकी है। एच. जी. पिक्चर्स के बैनर तले बनी इस फिल्म का निर्देशन किशोर गोटी ने किया है। कथा पटकथा, संवाद है मोबिन खान के और गीत-संगीत जयेश बारोट ने दिया है। चंदन राठोड, किरण आचार्य और ममता सोनी अभिनीत इस फिल्म में राम की सीधी-सादी कहानी है। जिसका परिवार सुखी है। वह ऑफिस और अपनी पत्नी को प्यार से संभालते है। लेकिन अचानक एक दिन राम की पत्नी की हत्या हो जाती है। यह हत्या किसने की? किसी से दुश्मनी नहीं तो अचानक हत्या क्यों? आगे क्या होगा आगे क्या होता है ये जानने के लिए ये सस्पेंस थ्रिलर फिल्म ही देखनी होगी।
संगीत की दुनिया में एक अलग संगीत को पहचान दिलाने वाले बप्पी लहरी जिन्हें डिस्को किंग कहा जाता है। संगीत का एक नया आयाम,नया इतिहास बनाया । याद आ रहा है से लेकर उलाला तक ,सभी गाने लोगों की जुबां पर हैं। गायक संगीतकार प्रकाश तिवारी मधुर बताते हैं कि,कुछ ही दिन पहले उनसे मुलाकात करने लहरी हाउस में गया था,तब एक दम स्वस्थ थे हंसते मुस्कुराते हुए बातें कर रहे थे,मुझसे गाने भी सुने और आशिर्वाद भी दिया । उनके चलें जाने की खबर से मन आहत है,क्यों चलें जाते हैं ऐसे लोग जो दुनियां को हंंसना गाना सिखाते हैं,और फिर अचानक चलें जाते हैं। लता जी के बाद भारत ने एक और रत्न खो दिया।
Singer Prakash Tiwari Madhur With Music Director Late Bappi Lahri Ji in lahri house
नई दिल्ली, एएनआइ। आयकर विभाग ने NSE के पूर्व एमडी चित्रा रामकृष्णन (FormerMD Chitra Ramkrishna) के परिसरों में छापेमारी की है। सेबी समूह संचालन अधिकारी और प्रबंध निदेशक के सलाहकार के रूप में आनंद सुब्रमण्यम की नियुक्ति से संबंधित प्रतिभूति अनुबंध नियमों में कथित उल्लंघन में उनकी भूमिका की जांच कर रहा है। यह फैसला उच्च स्तर पर लिया गया है और टीमों को सुबह से ही रामकृष्ण से जुड़े परिसरों की तलाशी के लिए लगाया गया है। छापेमारी विभाग की मुंबई जांच शाखा द्वारा की जा रही है।
यह कदम SEBI द्वारा आरोप लगाए जाने के कुछ दिनों बाद लिया गया है, जिसमें कहा गया है कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के पूर्व प्रमुख एक ‘अज्ञात व्यक्ति’ के साथ स्टॉक एक्सचेंज के बारे में गोपनीय जानकारी का संचार करते थे। नियामक ने आरोप लगाया कि रामकृष्ण ने एनएसई के पांच साल के वित्तीय अनुमान, लाभांश भुगतान अनुपात, एक्सचेंज की व्यावसायिक योजनाओं और एनएसई की बोर्ड बैठक के एजेंडे जैसी गोपनीय जानकारी ‘अज्ञात व्यक्ति’ के साथ साझा की थी।
I-T Dept is conducting searches at premises of ex-MD of NSE Chitra Ramakrishnan. SEBI is probing her role into the alleged violations in securities contract rules related to appointment of Anand Subramanian as group operating officer and adviser to the managing director: Sources
शुक्रवार को जारी नियामक के 190-पृष्ठ के आदेश के अनुसार सेबी के सामने अपने सबमिशन में रामकृष्ण ने कहा कि वह व्यक्ति एक ‘सिद्ध पुरुष’ या ‘योगी’ था, वह एक ‘परमहंस’ है। सेबी ने एनएसई, रामकृष्ण, पूर्व सीईओ रवि नारायण और दो अन्य को समूह संचालन अधिकारी और प्रबंध निदेशक के सलाहकार के रूप में आनंद सुब्रमण्यम की नियुक्ति से संबंधित प्रतिभूति अनुबंध नियमों का उल्लंघन करने के लिए दंडित किया क्या है NSE का बयान NSE का कहना है कि उक्त आदेश 2013-2016 की अवधि के दौरान एनएसई में कुछ मुद्दों से संबंधित है और इसलिए लगभग 6-9 वर्ष पुराना है। इस संबंध में पिछले कुछ वर्षों में एनएसई में बोर्ड और प्रबंधन स्तर पर कई बदलाव हुए हैं। सेबी एनएसई और अन्य एमआईआई के संचालन की बारीकी से निगरानी और पर्यवेक्षण कर रहा है। बयान के अनुसार, एनएसई ने वर्षों से विभिन्न मामलों पर सेबी के निर्देशों का संचालन किया है और टेक्नोलॉजी वास्तुकला सहित नियंत्रण पर्यावरण को और मजबूत करने के लिए विभिन्न उपाय किए हैं।
फतेहपुर के बहुआ रोड के एफसीआई के पास मैदान में फतेहपुर-बांदा और रायबरेली समेत 11 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा की जीत के लिए माहौल बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मंच पर पहुंच गए और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने स्वागत किया। वहीं भाजपा नेताओं ने भारत माता के जयकारे लगाकर उनका स्वागत किया।
फतेहपुर, संवाददाता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि सारे वाद और विवाद एक तरफ और राष्ट्रवाद एक तरफ, यूपी के लोगों ने ठान लिया है कि होली आने से पहले दस मार्च को ही रंगों की होली धूमधाम से विजय की होली मना लेंगे। फतेहपुर बुंदेलखंड के क्षेत्र में पराक्रम और वीरता यहां के लोगों के नसों और खून में है। देश का सामर्थ्य बढ़ता देखकर यहां के लोगों का उत्साह बढ़ता है। लेकिन, यूपी के घोर परिवारवादी हैं, उन्हें देश का पराक्रम कभी नहीं अच्छा लगा। देश कुछ भी अच्छा करता है ये परिवारवादी उसपर सवाल उठाते हैं। वह फतेहपुर के बहुआ रोड पर एफसीआई के पास मैदान में जनसभा को संबोधित कर रहे थे।
कहा, अब अवध और बुंदेलखंड के विकास के लिए बदला लेने वाले नहीं, जमीन पर बदलाव लाने वाले चाहिये, परिवारवाद को बढ़ावा देने वाले नहीं पलायन को रोकने वाले चाहिये, सिर्फ घोषणा करके सो जाने वाले लोग नहीं बल्कि घोर परिश्रम करने वाले लोग चाहिये। इसलिए चुनाव को महत्वपूर्ण मानिए और ठान लीजिए किए सारे काम छोड़कर मतदान करेंगे।
उन्होंने कहा कि कोरोना ने दो साल में अपनी चपेट में लिया है और मानवता को संकट में डाला है। ऐसी भयंकर महामारी के बीच एक एक जीवन बचाने के लिए दो साल से काम कर रहे हैं कोशिश कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी सरकार में आपके आशीर्वाद से हमे देश की सेवा करने का मौका मिला है, ये भाजपा सरकार देश को मुफ्त टीका लगा रही है, वैक्सीनेशन हो रहा है। घर घर एक एक व्यक्ति को सभी डोज मिल जाए इसके लिए पूरी मेहनत करती है। संकट से आपको रक्षा कवच दिया है, सच्चे अर्थ में मानवता की जिंदगी बचाने का काम किया है। लेकिन, ये परिवारवादी क्या बोल रहे हैं कि ये तो भाजपा का टीका है। अरे ये तो कोरोना से बचने का टीका है, जब यूपी के लोगों ने इनकी बात अनसुनी कर दी, कभी कभी तो लगता है कि टीके से दो लोग डरते हैं, पहला कोराना वायरस और दूसरे टीका विरोधी लोग। रिकार्ड वैक्सीन लगवा दी तो अब ये क्या शुरू किया है कि सरकार ये टीके के पीछे इतना खर्चा क्यों कर रही है। आपकी जिंदगी बचेगी तो मुझे खुशी होगी, आप लोगों ने इतना प्यार दिया सम्मान दिया और पद दिया, मुझे आप लोगों के लिए काम करते रहना है। ये परिवारवादी को टीके से भी समस्या, मोदी से भी समस्या और योगी से भी समस्या।
कहा, दशकों तक घोर परिवारवादी सत्ता में आए, इन्होंने छोटे किसानों के लिए कुछ किया। किसानों के नाम पर झूठी घोषणाएं करके अपने रिश्तेदार और परिवारवादियों की तिजोरियां भरी हैं।
कहा, बेसहारा पशुओं से होने वाली परेशानी कम हो, आपका संकट दूर करने के लिए हम चिंता करते हैं। फतेहपुर के लोग कभी नहीं भूल सकते हैं कि पिछली सरकार के लोग यहां कैसे कैसे दबंगई करते थे। सरकारी जमीनों पर कब्जा, अवैध खनन माफिया ने इस पूरे इलाके को तबाह कर दिया था। योगी जी की सरकार ने इन माफिया का इलाज करके सही किया है ना। घोर परिवारवादियों ने गन्ना मिलों को बंद किया, सिंचाई की सुविधा देने की बजाए अवैध खनन माफिया को पाला पोसा था। दशकों तक ऐसी परियोजनाओं को दबाकर रखा था, लेकिन तब इन्हें बुंदेलखंड के किसानों की याद नहीं आई।
डबल इंजन की सरकार ने सिंचाई परियोजनाएं 44 हजार करोड़ लागत से अधिक खर्च से खेत खेत तक पानी पहुंचाया। केन बेतवा लिंक परियोजना को मैं पूरा करना चाहता हूं लेकिन परिवारवादियों को अगर मौका मिल गया तो ये उसमें भी रोड़ा अटकाएंगे। हमारी सरकार यहां हर घर जल अभियान चला रही है। भाजपा सरकार का फतेहपुर और इस क्षेत्र से स्नेह है। घोर परिवारवादियों ने यहां से पल्ला झाड़ लिया था लेकिन भाजपा ने फतेहपुर की आकांक्षा को समझा और उसे पूरा किया।
गोरेगांव (मुम्बई) स्थित दादा साहेब फाल्के चित्र नगरी,फिल्म सिटी स्टूडियो में भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहेब फाल्के की 78 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर फिल्मसिटी स्टूडियो प्रबंधन द्वारा एक भव्य समारोह आयेजित किया गया। इस समारोह में भारतीय फिल्म जगत से जुड़ी संस्थाओं के प्रतिनिधियों, बॉलीवुड के नामचीन शख्सियतों व महाराष्ट्र सरकार के प्रशाशनिक पदाधिकारियों के अलावा दादा साहेब फाल्के के ग्रैंडसन चंद्रशेखर कुशेलकर भी अपने पूरे परिवार के सदस्यों के साथ, अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और सभी ने दादा साहेब फाल्के की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। इसके पश्चात दिवंगत भारत रत्न लता मंगेशकर और संगीतकार बप्पी लहरी के लिए श्रंद्धांजलि स्वरूप एक मिनट का मौन रखा गया। इसके बाद दादा साहेब फाल्के की स्मृति में भारत सिने एंड टीवी राइटर एसोसिएशन तत्वाधान में निर्धारित छठे कफ(KAF) अवार्ड के लिए फिल्म विधा से जुड़े चयनित नवोदित प्रतिभाओं को रविन्द्र अरोड़ा के द्वारा अवार्ड दे कर सम्मानित किया गया। इस आयोजन में वेस्टर्न इंडिया फिल्म एंड टीवी प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन की खास भागीदारी रही।
दादा साहेब फाल्के के ग्रैंडसन चंद्रशेखर कुशेलकर ने कार्यक्रम के दौरान अपने संक्षिप्त भाषण में दादा साहेब फाल्के के संघर्ष काल की चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री पूरी दुनिया मे हर साल सबसे ज्यादा फिल्में बनाने के लिए जाना जाता है। देश का हर दूसरे नौजवान फिल्मों में काम करने की या फिर फिल्मों से जुड़ी अन्य विधाओं से खुद को जोड़ कर अपना कैरियर बनाना चाहता है। लेकिन देश में जब दादा साहेब फाल्के जी ने फिल्म निर्माण को शुरू किया होगा तो उनको कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा होगा इसको हमेशा दिल और दिमाग में रखना होगा। आज सिनेमा उद्योग कई तरह के संकटों के दौर से गुज़र रहा है। इससे घबराना नहीं है।
आज धैर्य के साथ संघर्ष करने की आवश्यकता है।विदित हो कि दादासाहब फाल्के का असल नाम धुंडीराज गोविंद फाल्के था। उनका जन्म 30 अप्रैल, 1870 को महाराष्ट्र के त्रिम्बक (नासिक) में एक मराठी परिवार में हुआ था। सन1910 में तब के बंबई के अमरीका-इंडिया पिक्चर पैलेस में ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ दिखाई गई थी। थियेटर में बैठकर फिल्म देख रहे धुंदीराज गोविंद फाल्के ने तालियां पीटते हुए निश्चय किया कि वो भी भारतीय धार्मिक और मिथकीय चरित्रों को रूपहले पर्दे पर जीवंत करेंगे। इसके बाद दादा साहेब ने फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ का निर्माण कार्य शुरू किया जो देश की पहली फीचर फिल्म के रूप में जानी जाती है। दादा साहेब अपनी इस फिल्म के सबकुछ थे। उन्होंने इसका निर्माण किया, निर्देशक भी वही थे, कॉस्ट्यूम डिजाइन, लाइटमैन और कैमरा डिपार्टमेंट भी उन्हीं ने संभाला था। वही फिल्म की पटकथा के लेखक भी थे।
3 मई 1913 को इसे कोरोनेशन सिनेमा बॉम्बे में रिलीज किया गया। यह भारत की पहली फिल्म थी। राजा हरिश्चंद्र की सफलता के बाद दादा साहेब फाल्के ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद दादा साहेब फाल्के ने देश की पहली फिल्म कंपनी’हिंदुस्तान फिल्म्स’ की स्थापना की। ‘राजा हरिश्चंद्र’ से शुरू हुआ उनका करियर 19 सालों तक चला। राजा हरिश्चंद्र की सफलता के बाद अपने फिल्मी करियर में उन्होंने 95 फिल्म और 26 शॉर्ट फिल्में बनाईं। उनकी सफल फिल्मों में मोहिनी भस्मासुर (1913), सत्यवान सावित्री (1914), लंका दहन (1917), श्री कृष्ण जन्म (1918) और कालिया मर्दन (1919) के नाम उल्लेखनीय हैं।
उनकी आखिरी मूक फिल्म ‘सेतुबंधन’ थी और आखिरी फीचर फिल्म ‘गंगावतरण’ थी। उनका निधन 16 फरवरी 1944 को नासिक में हुआ था। उनके सम्मान में भारत सरकार ने 1969 में ‘दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड’ देना शुरू किया। यह भारतीय सिनेमा का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है। सबसे पहले यह पुरस्कार पाने वाली देविका रानी चौधरी थीं। 1971 में भारतीय डाक विभाग ने दादा साहेब फाल्के के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया।आज भले ही दादा साहेब फाल्के हमारे बीच नहीं है लेकिन आज भी उनका संदेश व उनके संघर्षों को बयां करते पदचिन्ह भारतीय फिल्म जगत के फिल्मकारों को कर्मपथ पर धैर्य के साथ अग्रसर रहने के लिए सदैव प्रेरित करता है और युगों युगों तक करता रहेगा।