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देश में पहली बार एक साथ ३८ लोगों को फांसी की सजा अहमदाबाद बमकांड : पांच राज्यों में रचा षड्यंत्र और लक्ष्य थे नरेंद्र मोदी

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  • राजेश झा (विश्व संवाद केंद्र ,मुंबई )

अहमदाबाद बम धमाके के ४९ आरोपियों में ३८ को मृत्युदंड और शेष ११ को जीवन के अंतिम सांस तक जेल में रखने का आदेश विशेष न्यायालय ने दिया है।करीब १४ साल बाद, २००८ अहमदाबाद सीरियल बम ब्‍लास्‍ट केस में स्‍पेशल कोर्ट का फैसला आया है। इस बम कांड की रचना पांच राज्यों दिल्ली -मध्यप्रदेश -गुजरात -उत्तरप्रदेश और बिहार में की गयी थी।बम फोड़ने से पहले ईमेल द्वारा इसकी घोषणा आतंकियों ने की थी जो देश में हुए आतंकी घटनाओं में पहली बार तब देखा गया था। यह सीधे -सीधे भारतीय गणतंत्र को चुनौती थी।


हमारे देश में पहली बार एक साथ ३८ लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई है। इसके पहले राजीव गांधी हत्या काण्ड में २० लोगों को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी। पूरा ट्रायल साबरमती जेल के अंदर हुआ है।कुल ११०० गवाह थे ।इस बीच सैफू और उसके साथियों ने २१३ फीट लंबी सुरंग खोद कर भागने का भी प्रयास किया था , मगर सफल नहीं हो सके थे।आतंकियों को पता था कि घायलों को देखने तत्कालीन सीएम मोदी अस्पताल जाएंगे और वो उन्हे्ं भी निशाना बनाना चाहते थे. सरकारी वकील भी यही बात कह रहे हैं। २५ जुलाई २००८ को बंगलुरु और उसके ठीक दूसरे दिन अहमदाबाद में सीरियल बम फोड़कर आतंकियों ने भारतीय गणतंत्र को सकते में ला दिया था। बंगलुरु में एक की मृत्यु हुई और अहमदाबाद में ५६ की जानें गयीं। अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट एक आतंकी हमला था , हमले में शामिल जिन दोषियों को फांसी हुई सबसे पहले एक बार उनके नाम इस प्रकार हैं -:
१ .पहला नाम है आतिफ अमीन ये इंडियन मुजाहिद्दीन से जुड़ा हुआ आतंकी था, आजमगढ़ मॉड्यूल का चीफ भी. जिसे दिल्ली पुलिस ने सिंतबर 2008 में हुए बाटला हाउस एनकाउंटर में मार गिराया था
२ इमरान इब्राहीम शेख
३ . इकबाल शेख
४ . समसुद्दीन शाहबुद्दीन शेख
५ . गयासुद्दीन अब्दुल हलिम अंसारी
६ . मोहम्मद आरिफ
७ . अनीस अगरबत्तीवाला
८ . यूनुस महम्मद मंसूरी
९ . कमरुद्दीन चाँद मोहम्मद नागोरी
१० . आमिल परवाज काजी सैफुद्दीन शेख
११ . अब्दुल करीम मुस्लिम
१२ . इकबाल जहरुल नागोरी
१३ . हाफिस हुसैन उर्फ अदनान मुल्ला
१४ चौदहवां नाम है मोहम्मद साजिद, इसे भी बाटला हाउस एनकाउंटर में मार गिराया गया था
१५ . मुफ्ती अबु बशर
१६ . अब्बास समेजा
१७ . जावेद अहमद सगीर अहमद शेख
१८ . मोहमद इस्माइल
१९ . अफजल उस्मानी
२० . मोहम्मद आरिफ उर्फ जुम्मन शेख
२१ . आसिफ उर्फ़ हसन बशीरुद्दीन शेख
२२ . सरफुद्दीन कापडिया
२३ . मोहम्मद सेफ
२४ . जीशान अहमद
२५’ जियाउर रहमान
२६ मोहम्मद शकील
२७ . मोहम्मद अकबर
२८ . फजले रहमान उर्फ सलाउद्दीन दुर्रानी
२९ . अहमद बावा उर्फ अबू बकर बरेलवी
३० . सरफुद्दीन उर्फ सलीम
३१ . सैफुर रहमान
३२ .अब्दुल करीम मुस्लिम
३३ . मोहम्मद तनवीर
३४ . राजा अय्यूब शेख
३५ . मोहम्मद मुबीन
३६ मोहम्मद रफीक
३७ . तौसीफ खान
३८ . मोहम्मद आरिफ
ये कुल 38 दोषी हैं जिसे अहमदाबाद की स्पेशल कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई है.

Photo Curtesy the guardian

गोधरा काण्ड के बाद मुस्लिम आतंकियों ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मार डालने की बड़ी कोशिश की। अहमदाबाद बम कांड का लक्ष्य मोदी थे और उसमें ५६ लोग मारे गए और २०० लोग घायल हुए थे। सबसे अचरज की बात है कि पहली बार पूर्व सूचना देकर बम फोड़े गए । अगर दुर्भाग्य से आतंकी सफल हो जाते तो भारत को ‘बनाना कंट्री ‘ विश्व स्तर पर सिद्ध करने की आवश्यकता फिर कभी नहीं होती।
आजमगढ़ जिले (उत्तरप्रदेश ) के सरायमीर के अबू बशर को अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट का मास्टर माइंड माना गया। इसके अलावा आजमगढ़ के मोहम्मद सैफ, मोहम्मद आरिफ, शकीब निसार और शैपुर रहमान भी दोषी पाया गया है ।आजमगढ़ के ही रहने वाले पांच को मौत की सजा दी गई है, जबकि तीन अन्य को बरी कर दिया गया है। अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट में सजा सुनाए जाने के बाद आजमगढ़ का नाम सामने आया है। बाटला हाउस एनकाउंटर में भी आजमगढ़ का कनेक्शन सामने आया था।सराय मीर के निवासी मोहम्मद यासिर ने कहा कि यह एक स्थानीय अदालत की ओर से कठोर निर्णय है। हम निश्चित रूप से उच्च न्यायालय का रुख करेंगे।

बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद आजमगढ़ को एक आतंक का केंद्र बताया गया क्योंकि मारे गए दो संदिग्ध और गिरफ्तार किए गए तीन सभी जिले के सराय मीर इलाके के संजरपुर गांव के थे।बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद गिरफ्तार किए गए इंडियन मुजाहिदीन (IM) के चार आतंकवादी २००८ के अहमदाबाद सीरियल बम विस्फोटों में मौत की सजा पाने वालों में शामिल हैं। चार अन्य दोषी उसी साल दिल्ली सीरियल बम विस्फोट की साजिश में शामिल थे।पुलिस की ओर से दाखिल चार्जशीट में कहा गया था कि तीन आतंकवादी २२ जुलाई को अहमदाबाद में विस्फोट करने के लिए पहुंचे थे। इनके पहुंचने के तीन दिन बाद ९ दूसरे आतंकवादी भी पहुंचे। इन सभी ने बम लगाए और उसी शाम को वापस ट्रेन पकड़ ली। विस्फोटों की जांच के दौरान पता चला कि आतंकवादी बटला हाउस में छिपे हुए हैं और बाद में उसी साल सितंबर में मुठभेड़ हुई।

२६ जुलाई २००८ को जब कुछ न्यूज़ एजेंसियों और पत्रकारों को एक ई -मेल आया (जो अनजान जगह से भेजा गया था) तो मजाक मान अधिकांश ने उसे पढ़ने की भी आवश्यकता नहीं समझी क्योंकि ई -मेल में लिखा गया था कि हम नरेंद्र मोदी को बता देंगे की उसकी औकात क्या है ।भेजने वाले की जगह लिखा था- IM (आई एम मतलब इंडियन मुजाहिदीन) मगर शाम होते -होते कहर बरप चुका था। यश व्यास तब सिर्फ १० वर्ष का था। उसका पूरा परिवार अहमदाबाद बम धमाके की चपेट में आ गया। उसके पिता और भाई की मौत हो गई, जबकि वह महीनों असरवा इलाके में एक अस्पताल में भर्ती रहा। वह आज २४ साल का हो गया है। विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई कर रहा है, लेकिन उसकी आंखों के सामने आज भी १३ साल पहले की घटना घूमती है। यश व्यास की तरह कई लोगों ने अपनों को आंखों के सामने तड़पते, कर्राहते और मरते देखा।ब्लास्ट में घायल हुए यश ने बताया कि वह विस्फोट में ५० प्रतिशत से ज्यादा जल गए थे। उन्हें चार महीने तक आईसीयू में रखा गया। वह आज भी पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाए हैं। उनके सुनने की क्षमता कम हो गई थी। यश के बड़े भाई १२ साल के थे, पिता के साथ वह भी इस धमाके की चपेट में आ गए थे। अपनी मां और दादी के साथ वह अकेले परिवार में जिंदा बचे। मां को उनके इलाज से लेकर पालने-पोसने और पढ़ाने में काफी संघर्ष करना पड़ा। उनके पिता दुष्यंत व्यास सिविल अस्पताल में कैंसर चिकित्सा सुविधा में लैब टेक्नीशन थे।दुष्यंत अपने दोनों बेटों को साइकिल चलाना सिखाने के लिए अस्पताल के एक खुले मैदान में ले गए थे। शाम करीब साढ़े सात बजे थे। उनके पिता को पता चला कि विस्फोट पीड़ितों को एम्बुलेंस में लाया जा रहा है। वह सिविल अस्पताल के ट्रॉमा वॉर्ड के पास पहुंचे, लेकिन तभी एक तेज आवाज के साथ विस्फोट हुआ। उसके बाद आंखों के सामने सब बिफर गया।

बीजेपी नेता प्रदीप परमार ने बताया कि वह भी इस ब्लास्ट में घायल हुए थे। वह असहनीय दर्द से कराह रहे थे। डॉक्टरों ने उनके शरीर को और संक्रमण से बचाने के लिए पैर काटने का फैसला किया लेकिन सौभाग्य से उनका पैर काटने की नौबत नहीं आई। हालांकि आज भी उनके पैरों में घावों के गहरे निशान नजर आते हैं। उन्होंने बताया कि वह असरवा इलाके में हुए ब्लास्ट पीड़ितों से मिलने सिविल अस्पताल पहुंचे थे, जहां ब्लास्ट हुआ और वह भी चपेट में आ गए।
पुराने शहर की जमालपुर-खड़िया सीट से भाजपा के पूर्व विधायक भूषण भट्ट ने याद किया कि कैसे यहां के रायपुर चाकला इलाके में एक विस्फोट के बाद वह बाल-बाल बचे थे। उन्होंने कहा, ‘शनिवार का दिन था…मैं और भाजपा के कुछ अन्य स्थानीय कार्यकर्ता एक सैंडविच विक्रेता के ठेले के पास बैठे थे। अचानक, पास स्थित एक मेडिकल दुकान के पास एक विस्फोट हुआ और लोग उस जगह की ओर भागने लगे जहां हम बैठे थे। मैं और अन्य कर्मचारी उठे और दुकान के पास जाकर देखने लगे कि क्या हुआ है।’ सैंडविच विक्रेता की पत्नी, हसुमती कादिया, अपने पति के लिए कुछ घर का बना नाश्ता लेकर आई और एक मेज के पास बैठ गई जहां भट्ट कुछ मिनट पहले बैठे थे। उन्होंने कहा, ‘कुछ समय बाद, उस टेबल के पास एक और विस्फोट हुआ, जिसमें हसुमतिबेन की मौत हो गई। पास की एक दुकान के एक अन्य कर्मचारी अंकित और तीन अन्य की मौके पर ही मौत हो गई।’ भट्ट ने कहा कि विस्फोट के बाद, यहां के लोग घायलों को उनके स्कूटर पर, और ऑटो-रिक्शा और एम्बुलेंस में ले गए।

अहमदाबाद में लगातार २१ बम धमाके हुए ,एक- के- बाद एक ,७० मिनट के अंदर , सब पूरी तरह योजनाबद्ध । उसमें ५६ लोग मारे गए और २०० लोग घायल हुए थे। सबसे अचरज की बात है कि पहली बार सूचना देकर बम फोड़े गए । आतंकवादी जानते थे कि बाज़ार में बम- विस्फोट होने के बाद घायलों को अस्पताल ले जाया जाएगा और इतनी बड़ी दुर्घटना होने के कारण राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अस्पताल अवश्य आएंगे इसलिए उन्होंने उस इलाके के अस्पताल में पहले से दो कारों में विस्फोटक सामग्री जमा कर रखी थी।जैसे ही घायलों को लेकर एम्बुलेंस, टेंपो,कार ,बस वहां पहुंचे और घायलों को स्ट्रेचर पर लाद कर अंदर ले जाया जाने लगा वहाँ विस्फोट हुए और कुल ३६ घायलों की मृत्यु सिर्फ अस्पताल में हो गई । ये विभत्सतम और अकल्पनीय था – अस्पताल में विस्फोट !! ऐसा तो सीरिया और फिलिस्तीन में भी नहीं होता है , लेकिन यह अहमदाबाद में हुआ।

बम विस्फोट मणिनगर इलाके में हुआ था जो नरेन्द्र मोदी का विधान सभा क्षेत्र था ।जो मेल भेजा गया था उसके आई पी एड्रेस की जांच की गई तो पता चला कि एक पब्लिक लाइब्रेरी के फ्री वाई -फाई से वह भेजा गया है और IM का मतलब था इंडियन मुजाहिदीन जो कि सिमी के बैन होने के बाद बना नया संगठन था। हांलांकि खुफिया एजेंसियों को पता था कि यह सिर्फ दुनिया की नजरों में धूल झोंकने की कवायद थी असल खिलाड़ी तो लश्कर का था।जांच शुरू हुई तो कहीं कोई सुराग नहीं मिला।केंद्रीय और स्थानीय एजेंसी बहुत हाथ पैर मार रही थी पर कहीं कुछ नहीं, कोई लीड नहीं मिल रही थी। रोड चेकपोस्ट, होटलों,लौजों की तलाशी, मस्जिदों की जांच के बाद भी कुछ नहीं मिला ऐसे ही हताशा व् निराशा के काल में भरुच से एक पुलिस कॉन्स्टेबल का फोन आया तो सबके आँखों में बिजली कौंध गयी।

भरूच के एक कांस्टेबल याकूब अली ने विशेष जांचदल के प्रमुख (एस आई टी चीफ) को फोन किया कि जिन गाड़ियों में बम रखे गए थे तथा जिनकी फोटो समाचार- पत्रों में छपी है उन्हें उसने भरूच में एक हफ्ते पहले देखा है। टीम भरूच पहुंची और याकूब अली के साथ बिस्मिल्लाह लौज गई जहां दोनों कारें खड़ी देखी गई थीं ।लौज के मालिक ने बताया कि टूरिस्ट आए थे जिन्होंने दो कमरे किराये पर लिये थे; उन्ही की गाड़ियां थीं। दोनों कमरों की बारीकी से जांच की गई , सबके पहचानपत्र भी नकली थे।सी सी टी वी का चलन था नहीं, मोबाइल फोन भी उतना ज्यादा नहीं चल रहा था। मगर उनमें से एक आदमी ने होटल के फोन से एक कौल किया था जिसका पेमेंट चेक आउट के समय बिल के साथ दिया था। जाँच से पता चला कि वह फोन आजमगढ़ किया गया था । और जब आजमगढ़ के उस फ़ोन मालिक के घर पर पुलिस पहुंची तो मिल गया सफदर नागौरी उर्फ सैफू इंडियन मुजाहिदीन का सरगना…. फिर धीरे- धीरे सब पकड़े गए ।आठ लोग तो आजमगढ़ के ही हैं।

नवभारत टाइम्स (मुंबई ) के क्राइम बीट पर लगभग ३० वर्षों से कार्यरत सुनील मल्होत्रा ने लगातार एक सप्ताह तक अहमदाबाद बमकांड की रिपोर्टिंग कर सबको हतप्रभ कर दिया था। वे बताते हैं -‘कल जब अहमदाबाद कोर्ट ने ३८ लोगों को फांसी की सजा सुनाई और ११ को आजीवन कारावास दिया, तो अपने आप वह पुराने दिन याद आ गए। सोचा, उन संस्मरण को शेयर करूं, क्योंकि अहमदाबाद केस का सीधा कनेक्शन मुंबई से था और हर पत्रकार की तरह मुझमें भी तब कुछ एक्सक्लूसिव पाने की भूख थी। दिप्तीमान तिवारी उन दिनों मुंबई मिरर में मुंबई में थे, इन दिनों इंडियन एक्सप्रेस (दिल्ली) में है। वह किसी स्टोरी के बारे में मुझसे ऑफिस में या प्रेस रूम में बात कर रहे थे। मैंने उन्हें मुंबई क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी का नाम और मोबाइल नंबर दिया और कहा कि यह अधिकारी आपकी स्टोरी में बहुत मदद कर सकते हैं। दो तीन दिन बाद मुंबई मिरर में वह स्टोरी पब्लिश हुई। उस अधिकारी का नाम भी । क्राइम ब्रांच के उस अधिकारी ने मुझसे कहा कि मेहरोत्रा जी, क्या आपने मुंबई मिरर में मेरी स्टोरी पढ़ी? मैंने जवाब हां में दिया, लेकिन साथ ही मुस्करा भी दिया । वह अधिकारी बोले, आप मुस्करा क्यों रहे हैं ? तब मैंने उनसे कहा, कि आपका मोबाइल नंबर मैंने ही तिवारी को दिया था।जवाब में वह अधिकारी बोले- बदले में मैं आपको १५ दिन में एक एक्सक्लूसिव खबर दूंगा । मैंने जवाब में उस अधिकारी से कहा कि राकेश मारिया के क्राइम ब्रांच चीफ रहते आप मुझे एक्सक्लूसिव खबर देंगे, मुझे संदेह है। उस अधिकारी ने फिर वादा किया कि मुझ पर यकीन करो।
लगभग १५ दिन बाद मुंबई पुलिस प्रेस रूम से फोन आया कि आज शाम पांच बजे ( या चार बजे)आजाद मैदान पुलिस क्लब में मुंबई क्राइम ब्रांच की प्रेस कॉन्फ्रेंस है। आजाद मैदान पुलिस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस का मतलब ही होता है कि बड़ा मामला है। बहरहाल, शाम को वहां पहुंचे, तो क्राइम ब्रांच चीफ राकेश मारिया वहां मौजूद थे। मुंबई पुलिस कमिश्नर हसन गफूर और एटीएस चीफ हेमंत करकरे भी आए थे।उस पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्राइम ब्रांच के वह अधिकारी भी मिल गए । मेरा उनसे सामना हुआ, तो मैंने उनसे कहा कि १५ दिन पहले क्या इसी एक्सक्लूसिव खबर की बात आप कर रहे थे? वह बोले, हां । मैंने उन्हें याद दिलाया कि मैंने तब जवाब में आपसे क्या कहा था? वह बोले, चिंता न करो, तुम्हें एक्सक्लूसिव खबर ही दूंगा, बस यहां खामोश रहो।
प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होते -होते करीब ६ बज गए। उसके बाद जैसा कि बड़े केसों से जुड़ी प्रेस कांफ्रेंस में होता है, पत्रकार प्रेस कांफ्रेंस खत्म होने के बाद केस के इन्वेस्टिगेशन से जुड़े अधिकारियों को घेर लेते हैं । मेरा सोर्स अधिकारी भी तमाम पत्रकारों से घिरा हुआ था। करीब सवा सात, साढ़े सात बजे वह अधिकारी आजाद मैदान पुलिस क्लब से बाहर निकला। लेकिन मेरी टेंशन खत्म नहीं हुई, बल्कि और बढ़ गई। कारण? उस अधिकारी के साथ और भी अधिकारी थे। वह आगे चल रहे थे, मैं पीछे चल रहा था। अखबार की डेडलाइन का अलग टेंशन था। मैंने अपने सोर्स अधिकारी को तब पीछे से जोर से आवाज दी–सर। उन्होंने मुझे लगभग अनसुना का ड्रामा करते हुए आगे से पीछे अपना हाथ हिलाया और इशारा किया कि बस, मेरे पीछे -पीछे चलते रहो। मैं एक्सक्लूसिव स्टोरी की भूख में वैसा ही करता रहा।
कुछ मिनट बाद मेरा सोर्स अधिकारी अन्य अधिकारियों और मुझे बीच रास्ते छोड़कर एसबी वन के ऑफिस में घुस गया। मुझे बहुत गुस्सा आया। लगा, इस अधिकारी ने मुझे पोपट बना दिया है। कुछ मिनट बाद मैंने उन्हें फोन लगाया, जवाब में एसबी वन से बाहर निकलते उनका चेहरा सामने आया। वह बोले कि उन अधिकारियों से खुद को अलग करने के लिए टॉयलेट जाने के बहाने वह जानबूझ कर एसबी वन गए थे। रात के करीब पौने आठ बजे रहे थे। वह मुझे इसके बाद एसबी वन ऑफिस से कुछ दूर एक अंधेरी जगह पर ले गए। सिर्फ १५ मिनट बात की और सिर्फ इतनी रिक्वेस्ट की कि १५ दिन तक तुम मुझे न कॉल करना और न ही ऑफिस आना, नहीं तो सारे बॉस समझ जाएंगे कि यह एक्सक्लूसिव ख़बर किसने दी? मैं इसके बाद लगभग दौड़ते -दौड़ते ऑफिस आया, क्योंकि एक्सक्लूसिव खबर देने के साथ डेडलाइन का प्रेशर मुझ पर बहुत ज्यादा था। पर आप लोग यकीन मानिए, अपने सोर्स अधिकारी से उस १५ मिनट की बातचीत से मैंने करीब एक हफ्ते तक रोज नई स्टोरी दीं। अब तो मैं बूढ़ा हो गया हूं, लेकिन वह मेरी पत्रकारिता के बेहद रोमांच भरे दिन थे।
मुंबई के लगभग सभी पत्रकारों ने इंडियन मुजाहिद्दीन से जुड़े उस केस को कई दिनों तक कवर किया था। उन दिनो एनडीटीवी में शैलेंद्र मोहन जी थे, जिनके सेंट्रल एजेंसियों में अच्छे सोर्स थे। उस केस की रिपोर्टिंग के दौरान, शायद PTC करते वक्त वह घायल हो गए थे और कई दिन तक अस्पताल में भर्ती थे।

सफदर नागोरी उन ३८ दोषियों में से एक है, जिन्हें गुजरात की एक अदालत ने २००८ में अहमदाबाद में हुए सीरियल ब्लास्ट मामले में शुक्रवार को मौत की सजा सुनाई। नागोरी और अन्य आरोपियों पर आतंकी वारदात के जरिए ५६ लोगों की जान लेने का दोष है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के सेंट्रल जेल में बंद नागोरी को सजा मिलने के बाद भी अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है। उसने कहा है कि भारत का संविधान उसके लिए कोई मायने नहीं रखता।
अभियोजन पक्ष के अनुसार मध्य प्रदेश के उज्जैन का रहने वाला नागोरी (५४ ) प्रतिबंधित स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) से जुड़ा था और अहमदाबाद धमाकों का मुख्य साजिशकर्ता था। जेल अधिकारियों के मुताबिक, नागोरी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अहमदाबाद की विशेष अदालत में हुई सुनवाई में हिस्सा लिया।

भोपाल सेंट्रल जेल के अधीक्षक दिनेश नरगावे ने बताया कि नागोरी ने मौत की सजा सुनाए जाने के तुरंत बाद कहा, ‘संविधान मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता। मेरे लिए कुरान के फैसले सबसे ऊपर हैं।’ सिमी के महासचिव रह चुके नागोरी पर अहमदाबाद धमाकों के लिए विस्फोटकों का इंतजाम करने और सिमी की अन्य अवैध गतिविधियों के लिए धन इकठ्ठा करने का आरोप लगाया गया था।सूत्रों के मुताबिक नागोरी लगभग १०० आपराधिक मामलों में आरोपी है। उसके विरुद्ध उज्जैन के महाकाल पुलिस स्टेशन में १९९७ में पहला आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। नागोरी को २६ मार्च २००८ को इंदौर के एक फ्लैट से गिरफ्तार किया गया था और तब से वह जेल में कैद है। नागोरी के पिता मध्य प्रदेश पुलिस की अपराध शाखा में सहायक उप-निरीक्षक थे। २६ जुलाई २००८ को अहमदाबाद में ७० मिनटों के बीच २२ धमाके हुए थे। जिधर देखो, उधर तबाही का मंजर था। सिविल अस्‍पताल हो, नगर निगम का एलजी अस्‍पताल, बसें, पार्किंग में खड़ी साइकलें, कारें… ५६ से ज्‍यादा लोगों की मौत हो गई। २०० से ज्‍यादा घायल हुए। कुल २४ बम लगाए गए थे। कलोल और नरोदा में लगा बम नहीं फटा। अदालत ने ४९ में से ३८ दोषियों को मौत की सजा सुनाई है। बाकी ११ दोषियों को उम्रकैद की सजा मिली है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरदोई में आयोजित एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए आतंकवाद का मुद्दा उठाया और कहा,‘एक समय था जब देश में हर सप्ताह बम धमाके होते थे और हिंदुस्तान के कितने शहरों में निर्दोष नागरिक मारे गये।मैं उस दिन को भूल नहीं सकता जब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था और अहमदाबाद में सीरियल बम धमाके हुए थे… मैंने उस खून से गीली हुई मिट्टी को उठाकर संकल्प लिया था कि मेरी सरकार इन आतंकवादियों को पाताल से भी खोज कर सजा देगी।अहमदाबाद धमाके में अदालत के फैसले का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा, ‘आज मैं विशेष तौर पर इसका जिक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि कुछ राजनीतिक दल ऐसे ही आतंकवादियों के प्रति मेहरबान रहे हैं और ये राजनीतिक दल वोट बैंक के स्वार्थ में आतंकवाद को लेकर नरमी बरतते रहे हैं।’ खैर मोदी मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बन चुके हैं. वो अस्पताल गए थे, मगर धमाकों के बाद। अहमदाबाद धमाकों को नहीं रोका जा सका। उसकी पीड़ा और वेदना आज भी लोगों के आंखों में तैर रही है , अस्पताल में हुए धमाकों में जो घायल हुए आज फैसले से बहुत खुश हैं जबकि सजा पाए आतंकियों पास अभी उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के विकल्प हैं।

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