Home Blog Page 361

शिल्पशास्त्र के आविष्कारक और सर्वश्रेठ ज्ञाता माने जाते हैं भगवान विश्वकर्मा

0
विश्वकर्मा पूजा एक ऐसा त्योहार है जहां शिल्पकार, कारीगर, श्रमिक भगवान विश्वकर्मा का त्योहार मनाते हैं। कहा जाता है कि हिंदू भगवान ब्रह्मा के पुत्र विश्वकर्मा ने पूरे ब्रह्मांड का निर्माण किया था। विश्वकर्मा को देवताओं के महलों का वास्तुकार भी कहा जाता है। इसलिए भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का सबसे पहला इंजीनियर और वास्तुकार माना जाता है। विश्वकर्मा दो शब्दों से विश्व (संसार या ब्रह्मांड) और कर्म (निर्माता) से मिलकर बना है। इसलिए विश्वकर्मा शब्द का अर्थ है। दुनिया का निर्माता यानि की दुनिया का निर्माण करने वाला। 
विश्वकर्मा शिल्पशास्त्र के आविष्कारक और सर्वश्रेठ ज्ञाता माने जाते हैं। जिन्होने विश्व के प्राचीनतम तकनीकी ग्रंथों की रचना की थी। इन ग्रंथों में न केवल भवन वास्तु विद्या, रथ आदि वाहनों के निर्माण बल्कि विभिन्न रत्नों के प्रभाव व उपयोग आदि का भी विवरण है। माना जाता है कि उन्होनें ही देवताओं के विमानों की रचना की थी। भगवान विश्वकर्मा की उत्पत्ति ऋग्वेद में हुई है। जिसमें उन्हें ब्रह्मांड (पृथ्वी और स्वर्ग) के निर्माता के रूप में वर्णित किया गया है। भगवान विष्णु और शिव लिंगम की नाभि से उत्पन्न भगवान ब्रह्मा की अवधारणाएं विश्वकर्मण सूक्त पर आधारित हैं।
धर्मग्रंथों में विश्वकर्मा को सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी का वंशज माना गया है। ब्रह्माजी के पुत्र धर्म तथा धर्म के पुत्र वास्तुदेव थे। जिन्हें शिल्प शास्त्र का आदि पुरुष माना जाता है। इन्हीं वास्तुदेव की अंगिरसी नामक पत्नी से विश्वकर्मा का जन्म हुआ। अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए विश्वकर्मा भी वास्तुकला के महान आचार्य बने। मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ इनके पुत्र हैं। इन पांचों पुत्रों को वास्तु शिल्प की अलग-अलग विधाओं में विशेषज्ञ माना जाता है।
विश्वकर्मा प्रकाश को वास्तु तंत्र का अपूर्व ग्रंथ माना जाता है। इसमें अनुपम वास्तु विद्या को गणितीय सूत्रों के आधार पर प्रमाणित किया गया है। ऐसा माना जाता है कि सभी पौराणिक संरचनाए भगवान विश्वकर्मा द्वारा निर्मित हैं। भगवान विश्वाकर्मा के जन्म को देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन से माना जाता है। पौराणिक युग के अस्त्र और शस्त्र भगवान विश्वकर्मा द्वारा ही निर्मित हैं। वज्र का निर्माण भी उन्होने ही किया था।
पौराणिक साक्ष्यों के मुताबिक स्वर्गलोक की इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, असुरराज रावण की स्वर्ण नगरी लंका, भगवान श्रीकृष्ण की समुद्र नगरी द्वारिका और पांडवों की राजधानी हस्तिनापुर के निर्माण का श्रेय भी विश्वकर्मा को ही जाता है। पौराणिक कथाओं में इन उत्कृष्ट नगरियों के निर्माण के रोचक विवरण मिलते हैं। उड़ीसा का विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर तो विश्वकर्मा के शिल्प कौशल का अप्रतिम उदाहरण माना जाता है। विष्णु पुराण में उल्लेख है कि जगन्नाथ मंदिर की अनुपम शिल्प रचना से खुश होकर भगवान विष्णु ने उन्हे शिल्पावतार के रूप में सम्मानित किया था।
माना जाता है कि विश्वकर्मा ने ही लंका का निर्माण किया था। इसके पीछे कहानी है कि शिव ने माता पार्वती के लिए एक महल का निर्माण करने के लिए भगवान विश्वकर्मा को कहा तो विश्वकर्मा ने सोने का महल  बना दिया। इस महल के पूजन के दौरान भगवान शिव ने राजा रावण को आंमत्रित किया। रावण महल को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया और जब भगवान शिव ने उससे दक्षिणा में कुछ देने को कहा तथा उसने महल ही मांग लिया। भगवान शिव ने उसे महल दे दिया और वापस पर्वतों पर चले गए।
भगवान विश्वकर्मा ने भव्य और सुरक्षित महलों के साथ देवताओं के उड़ने वाले रथों का निर्माण भी किया था। कहा जाता है कि भगवान विश्वकर्मा ने वज्र का निर्माण किया था। जो भगवान इंद्र का हथियार है। वज्र को ऋषि दधीचि और अज्ञेयस्त्र की हड्डियों से बनाया गया है। भगवान कृष्ण का सुदर्शन चक्र उनकी शक्तिशाली रचनाओं में से एक था।
विश्वकर्मा वैदिक देवता के रूप में सर्वमान्य हैं। इनको गृहस्थ आश्रम के लिए आवश्यक सुविधाओं का निर्माता और प्रवर्तक भी कहा गया है। अपने विशिष्ट ज्ञान-विज्ञान के कारण देव शिल्पी विश्वकर्मा मानव समुदाय ही नहीं वरन देवगणों द्वारा भी पूजित हैं। देवता, नर, असुर, यक्ष और गंधर्व सभी में उनके प्रति सम्मान का भाव है। इनकी गणना सर्वाधिक महत्वपूर्ण देवों में होती है। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा के पूजन- अर्चन किये बिना कोई भी तकनीकी कार्य शुभ नहीं माना जाता। इसी कारण विभिन्न कार्यो में प्रयुक्त होने वाले औजारों, कल-कारखानों और विभिन्न उद्योगों में लगी मशीनों का पूजन विश्वकर्मा जयंती पर किया जाता है।
इसी प्रकार विश्व कर्मा की एक कहानी और है कि महाभारत में पांडव जहां रहते थे उस स्थान को इंद्रप्रस्थ के नाम से जाना जाता था। इसका निर्माण भी विश्ववकर्मा ने किया था। कौरव वंश के हस्तिनापुर और भगवान कृष्ण के द्वारका का निर्माण भी विश्वणकर्मा ने ही किया था। सतयुग का स्वर्ग लोक, त्रेता युग की लंका, द्वापर की द्वारिका और कलयुग के हस्तिनापुर आदि के रचयिता विश्वकर्मा जी की पूजा अत्यन्त शुभकारी है। सृष्टि के प्रथम सूत्रधार, शिल्पकार और विश्व के पहले तकनीकी ग्रन्थ के रचयिता भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं की रक्षा के लिये अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया था।
विष्णु को चक्र, शिव को त्रिशूल, इंद्र को वज्र, हनुमान को गदा और कुबेर को पुष्पक विमान विश्वकर्मा ने ही प्रदान किये थे। सीता स्वयंवर में जिस धनुष को श्रीराम ने तोड़ा था वह भी विश्वकर्मा के हाथों बना था। जिस रथ पर निर्भर रह कर श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन संसार को भस्म करने की शक्ति रखते थे उसके निर्माता विश्वकर्मा ही थे। पार्वती के विवाह के लिए जो मण्डप और वेदी बनाई गई थी वह भी विश्वकर्मा ने ही तैयार की थी।
विश्वकर्मा के यथाविधि पूजन और उनके बताये वास्तुशास्त्र के नियमों का अनुपालन कर बनवाये गये मकान और दुकान शुभ फल देने वाले माने जाते हैं। इनमें कोई वास्तु दोष नहीं माना जाता। मान्यता है कि ऐसे भवनों में रहने वाला सुखी और सम्पन्न रहता है और ऐसी दुकानों में कारोबार फलता-फूलता है। विश्वकर्मा पूजन भगवान विश्वकर्मा को समर्पित एक दिन है। हर वर्ष 17 सितम्बर को विश्वकर्मा जयंती मनायी जाती है। यह कन्या संक्रांति पर पड़ता है। यह वह दिन है जब सूर्य सिंह राशि से कन्या राशि में प्रवेश करता है। इस दिन का औद्योगिक जगत और भारतीय कलाकारों, मजदूरो, इंजीनियर्स आदि के लिए खास महत्व है। विश्वकर्मा जयन्ती भारत के जम्मू कश्मीर, पंजाब, हिमाचल, हरयाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा, त्रिपुरा, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में मनायी जाती है। नेपाल में भी विश्वकर्मा पूजा को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।
औद्योगिक श्रमिकों द्धारा इस दिन बेहतर भविष्य, सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों और अपने-अपने क्षेत्र में सफलता के लिए प्रार्थना की जाती हैं। विश्वकर्मा जयन्ती के दिन देश के कई हिस्सों में काम बंद रखा जाता है और खूब पंतगबाजी की जाती है। विभिन्न प्रदेशों की सरकार विश्वकर्मा जयन्ती पर अपने कर्मचारियों को सावेतनिक अवकाश प्रदान करती है।
यह त्योहार मुख्य रूप से दुकानों, कारखानों और उद्योगों द्वारा मनाया जाता है। इस अवसर पर, कारखानों और औद्योगिक क्षेत्रों के श्रमिक अपने औजारों की पूजा करते हैं और भगवान विश्वकर्मा से उनकी आजीविका सुरक्षित रखने के लिए प्रार्थना करते हैं। वे मशीनों के सुचारू संचालन के लिए प्रार्थना करते हैं और विश्वकर्मा पूजा के दिन अपने उपकरणों का उपयोग करने से परहेज करते हैं।

साभार – प्रभा साक्षी

Vishwakarma Jayanti 2022 – भगवान विश्वकर्मा की पूजा का शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

0
विश्वकर्मा के जन्मदिवस के रूप में विश्वकर्मा पूजा की जाती है। ऋग्वेद के अनुसार विश्वकर्मा भगवान यांत्रिकी और वास्तुकला ज्ञाता माने जाते हैं। कुछ किंवदंती की मानें, उन्होंने भगवान कृष्ण के पवित्र शहर द्वारिका का निर्माण किया था। आज हम इस लेख में भगवान विश्वकर्मा की पूजा कब और कैसे की जाती है, इस संबंध में विस्तार से जानेंगे। साथ ही उनके कुछ रोचक विवरण का भी यहां उल्लेख किया गया है।

पूजा का शुभ मुहूर्त

– इस वर्ष 17 सितंबर शनिवार को चंद्रमा वृषभ राशि में होगा। जबकि शुभ रोहिणी नक्षत्र दोपहर के 12:21 तक रहेगा।

– संक्रांति का 1 : 46 तक रहेगा और राहुकाल 17 सितंबर को 9 से 10 : 30 मिनट तक रहेगा।

– विश्वकर्मा पूजा के लिए शुभ मुहूर्त चौघड़िया प्रात:काल 7 : 38 से 9 : 11 तक होगा।

– विश्वकर्मा पूजा चौघड़िया दोपहर 12 : 15 से 1: 47 तक होगा और लाभ चौघड़िया दोपहर 1 : 47 से लेकर 3 : 20 तक होगा।

– ऊपरोक्त सभी समय और तिथि जानने के बाद आप घर में सुबह 7 : 38 से 9 बजे तक विश्वकर्मा की पूजा कर सकते हैं।

– जो लोग वाहनों का कारोबार करते हैं, उन्हें इस दिन 12 : 15 से 1 : 46 तक विश्वकर्मा पूजा करने के लिए शुभ मुहूर्त है।

– कल-कारखाने में भी विश्वकर्मा पूजा का समय दोपहर 12 से लेकर 1 : 46 तक काफी शुभ रहेगा।

पूजा का विधि-विधान

विश्वकर्मा पूजा के संबंध में विशेषज्ञों का कहना है कि पूजा के दिन सुबह-सुबह पूजा करनी चाहिए। इसके लिए पूजा के दिन फैक्ट्री, वर्कशॉप, दुकान आदि के स्वामी को प्रात:काल स्नान कर लेना चाहिए। इसके बाद साफ-सुथरे वस्त्र धारण करके पूजा के शुभ मुहूर्त के दौरान पूजा स्थल पर बैठ जाना चाहिए। पूजा के दौरान भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा को अपने सामने रखें। इसके लिए बेहतर रहेगा कि जातक पूजा चौकी पर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद अपने सामने पूजा की सभी सामग्री रखें। इसमें हल्दी अक्षत और रोली भी शामिल करें। इसके साथ ही भगवान विश्वकर्मा को अक्षत, फूल, चंदन, धूप, अगरबत्ती, दही, रोली, सुपारी, रक्षा सूत्र, मिठाई, फल आदि अर्पित करें और भगवान केसामने धूप-दीप जलाएं और इससे आरती करें। आपको भगवान के सामने वे सभी यंत्र या लौहे के सामान भी रखने के चाहिए जो आपके कामकाजी जीवन के लिए उपयोग में आते हैं। इसके बाद कलश को हल्दी और चावल के साथ रक्षासूत्र चढ़ाते हुए ‘ॐ आधार शक्तपे नम: और ॐ कूमयि नम’, ‘ॐ अनन्तम नम:’, ‘पृथिव्यै नम:’ मंत्र का जप करें। मंत्र जाप करने के लिए रुद्राक्ष की माला का उपयोग करें। अंत में विश्वकर्मा भगवन की आरती करें और पंडित को दान-दक्षिणा दें। इस बात का ध्यान अवश्य रखें कि पूजा के समय आपका मन बिल्कुल साफ होना चाहिए। शुद्ध मन से की गई पूजा ही सफल होती है।

 

कहां मनाई जाती विश्वकर्मा जयंती

विश्वकर्मा पूजा के दिन सूर्य सिंह राशि से कन्या राशि में प्रवेश करता है। इस दिन का औद्योगिक क्षेत्र, भारतीय कला, मजदूर, अभियंत्रिकी आदि का विशेष महत्व होता है। विश्वकर्मा जयंती को भारत के जम्मू कश्मीर, पंजाब, हिमाचल, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा, त्रिपुरा, बिहार और झारखंड जैसे कई राज्यों में मनाया जाता है। नेपाल में भी विश्वकर्मा पूजा को बड़े उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

ये हैं कुछ रोचक विवरण

पौराणिक कथाओं में विश्वकर्मा द्वारा कई उत्कृष्ट नगरियों के निर्माण के रोचक विवरण मिलते हैं जैसे स्वर्गलोक की इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, रावण की स्वर्ण नगरी लंका, भगवान श्रीकृष्ण की समुद्र नगरी द्वारिका। इन सब अद्भुत कीर्तियों के निर्माण का श्रेय विश्वकर्मा भगवान को ही जाता है। यही नहीं उन्होंने पांडवों की राजधानी हस्तिनापुर का भी निर्माण किया है। पौराणिक कथाओं में इन मिलते हैं। इसके अलावा उड़ीसा का जगन्नाथ मंदिर भी विश्वकर्मा के कौशल का ही अप्रतिम उदाहरण है।

कैराना के जंगल में की जा रही थी गोकशी, पुलिस ने मुठभेड़ के बाद गौ तस्कर को पकड़ा

0
Kairana News: कैराना (Kairana) के जंगल में गोकशी की सूचना पर पुलिस ने छापा मारा. जहां पर पुलिस की गौ तस्करों के साथ मुठभेड़ हो गई. जिसमें एक शातिर गौ तस्कर पुलिस की गोली लगने से घायल हो गया. पुलिस ने मौके से भारी मात्रा में गौमांस, अवैध हथियार और गोकशी के उपकरण बरामद किए हैं. इसी के साथ मौके से करीब आधा दर्जन आरोपी फरार हो गए. जिसके बाद पुलिस आरोपियों की तलाश में जुट गई है.
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, कैराना पुलिस को गांव इस्सोपुर खुरगान स्थित जंगल में गोकशी करने की सूचना मिली. सूचना पर कोतवाली प्रभारी अनिल कपरवा, एसएसआई राधेश्याम पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंचे और गोकशी की घेराबंदी शुरू कर दी. जिसके बाद आरोपियों ने पुलिस पर फायर झोंक दिए. पुलिस की जवाबी कार्रवाई में एक शातिर गौ तस्कर मोबीन पैर में गोली लगने से घायल हो गया. पुलिस ने मौके से करीब डेढ़ क्विंटल गौमांस बरामद कर डॉक्टरी परीक्षण कराने के बाद गौमांस को दबा दिया.
आरोपयों को जल्द किया जाएगा गिरफ्तार 
इसी के साथ मौके से गोकशी के उपकरण, अवशेष, एक अवैध तमंचा, 3 जिंदा कारतूस और एक 315 बोर का खोखा कारतूस बरामद किया गया. पुलिस ने घायल गौ तस्कर को कैराना सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर भर्ती कराया. गौ तस्कर ने बताया कि वह पिछले दिनों लॉकडाउन के दौरान भी गोकशी करने के आरोप में जेल जा चुका हैं और काफी समय से गोकशी के कार्य को अंजाम दें रहा हैं. उसके चार-पांच साथी मौके से फरार हो गए हैं. कोतवाली प्रभारी अनिल कपरवान ने बताया कि आरोपी गोकश के आपराधिक इतिहास की जानकारी जुटाई जा रहीं हैं. अन्य आरोपियों को भी जल्द गिरफ्तार कर लिया जायेगा. कोतवाली क्षेत्र में गोकशी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी.

नेशनल सिनेमा डे को सेलिब्रेट करते हुए दर्शकों को मिलेगा सस्ते में ‘धोखा’

0

मुम्बई। शीर्षक पढ़कर चौकिए मत! दरअसल आर माधवन, खुशाली कुमार, अपारशक्ति खुराना और दर्शन कुमार की आने वाली थ्रिलर धोखा राउंड डी कॉर्नर 23 सितंबर 2022 को सिनेमाघरों में दस्तक दे रही है। इस दिन नेशनल सिनेमा डे भी सेलिब्रेट किया जाता है। ऐसे में इस खास मौके को सेलिब्रेट करते हुए कूकी गुलाटी की इस दिलचस्प क्राइम ड्रामा को सिने लवर्स महज 75 रुपए में एंजॉय कर सकते हैं।
इस तरह की फिल्म बनाकर मेकर्स ने नेशनल सिनेमा डे पर एक दिलचस्प कहानी लाकर सिनेमा की सुंदरता में और चार चांद लगा दिए है, जो निश्चित रूप से दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करेगी।
ये कहानी मुंबई में सेट है। फिल्म की कहानी एक ऐसी हाउसवाईफ के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे पर्सनालिटी डिसऑर्डर है। उसे एक आतंकवादी द्वारा बंधक बना लिया जाता है और उसके पति पर अपनी पत्नी को धोखा देने का आरोप लगाया जाता है। तो रिएलिटी के हमेशा दो पहलू होते हैं, हमे पता नही चलता कि क्या सच है और क्या झूठ ? धोखा – राउंड डी कॉर्नर झूठ और कड़वी सच की इसी कहानी को दर्शाता है।
भूषण कुमार की टी-सीरीज़ द्वारा निर्मित एवं खुशाली कुमार, आर माधवन, दर्शन कुमार और अपारशक्ति खुराना स्टारर और कूकी गुलाटी निर्देशित ‘धोखा-राउंड डी कॉर्नर’ 23 सितंबर, 2022 को सिनेमाघरों में रिलीज की जाएगी।

पशुओं के लिए चारे की पर्याप्त उपलब्धता पर काम करने की जरूरत: श्री नरेंद्र सिंह तोमर

0
ग्रेटर नोएडा में चल रहे अंतरराष्ट्रीय डेयरी महासंघ के विश्व डेयरी शिखर सम्मेलन के तीसरे दिन बुधवार को केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर की अध्यक्षता में “फीड, फ़ूड एंड वेस्ट” पर विशेष सत्र हुआ। श्री तोमर ने देश-विदेश के उपस्थित प्रतिनिधियों का ध्यान कृषि और डेयरी क्षेत्र की चुनौतियों की ओर आकर्षित करते हुए उस पर मिल-जुलकर काम करने की बात कही। उन्होंने कहा कि चुनौतियों का समाधान करने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने छोटी-छोटी चीजों पर बल दिया, जिससे इस पर समग्र उत्साह जाग्रत हुआ है। प्रमुख रूप से पशुओं के लिए चारे की पर्याप्त उपलब्धता कैसे हो, इसके लिए क्या किया जा सकता है, क्या माध्यम हो सकता है, इस पर विचार कर काम करने की आवश्यकता है।
श्री तोमर ने हर तरह से ‘वेस्ट टू वेल्थ मैनेजमेंट’ पर जोर देते हुए कहा कि सामान्य तौर पर हम वेस्ट का सही तरीके से उपयोग नहीं करते हैं। फसलों का अपशिष्ट हो या घरों में फल-सब्जियों के वेस्ट का निस्तारण, इन्हें वेल्थ में बदलना आज की जरूरत है। वेस्ट का विविध प्रकार से कैसे प्रयोग कर सकते हैं, उस पर विचार करने और काम करने की जरूरत है, जैसे- पराली को ही ले लें, पराली के लिए टेक्नोलॉजी का उपयोग करते हुए पूसा संस्थान ने डीकंपोजर बनाया है। इससे खेत की उत्पादकता बढ़ेगी, वहीं पशुओं के लिए चारा भी उपलब्ध होगा, इस दिशा में बड़े पैमाने पर काम करने की जरूरत है।
श्री तोमर ने कहा कि भारत कृषि प्रधान देश है, कृषि का क्षेत्र पशुपालन व सहकारिता के बिना  अधूरा है, इसी के मद्देनजर प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कृषि व सम्बद्ध क्षेत्रों के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत डेढ़ लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के विशेष पैकेज घोषित किए है। पशुपालन व दुग्ध क्षेत्र में महिलाओं का बड़ा योगदान है, इनमें महिला सशक्तिकरण भी निहित है।  प्रधानमंत्री ने पशुपालन व सहकारिता मंत्रालयों को अलग से बनाकर इनका बजट भी बढ़ाया है। इन सबके पीछे मूल भावना किसानों को लाभ पहुँचाना है। अब एग्री स्टार्टअप्स भी बढ़ रहे है।
केंद्रीय कृषि मंत्री ने अपने संसदीय क्षेत्र के गोरस इलाके का उदाहरण देते हुए बताया कि यह इलाका गिर गाय का क्लस्टर हुआ करता था। वर्तमान में भी यहां करीब 30 हजार गौधन है, लेकिन गर्मी के दिनों में चारे की कमी के कारण पशुओं को चराने के लिए दूर ले जाना होता है, इस दिशा में अब काम शुरू कर दिया गया है। पशुओं को आहार कैसे मिले, इसके लिए जागरूकता कैसे बढ़े, इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि गोबर भी वेस्ट है। केंद्र सरकार ने गोबर धन योजना शुरू की है। गोबर का ऊर्जा के रूप में उपयोग कर सकते हैं। इससे जहां आमदनी बढ़ेगी, वहीं पर्यावरण को नुकसान से बचाया जा सकेगा। इसके साथ ही प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा मिलेगा।
उन्होंने कहा कि कोविड के बाद लोग स्वास्थ्य के प्रति सचेत हुए हैं। स्वच्छ और अच्छे उत्पादन की ओर बढ़ रहे हैं। प्राकृतिक खेती की तरफ लोगों का ध्यान गया है। आर्गेनिक फार्मिंग व नेचुरल फार्मिंग का काम बढ़ रहा है। दुनिया में इसकी मांग है। हाल में देश ने पौने चार लाख करोड़ रु. के एग्रीकल्चर प्रोडक्ट का एक्सपोर्ट किया है। इसमें बड़ी मात्रा आर्गेनिक प्रोडक्ट की है। उन्होंने कहा कि इस पूरे विमर्श में जो भी निष्कर्ष सामने आएंगे, सरकार उसे गंभीरता से लेगी और विचारपूर्वक आगे बढ़ेगी।

लंपी रोग कहर – वायरल मैसेज ने सरकार की और पुलिस प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है

0
जयपुर:  गोवंश की हो रही लगातार मौत के बीच सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं, मगर इस बीच एक वायरल मैसेज ने सरकार की और पुलिस प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है. एक बार फिर राजस्थान बंद का आह्वान हुआ है, लेकिन इसके पीछे किसी सामाजिक संगठन या राजनीतिक दल का नाम नहीं है. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे मैसेज में लिखा है कि 15 सितंबर 2022 को राजस्थान बंद किया जाए. गौ माता के लिए लंपी रोग का इलाज नहीं होने के कारण सभी भाइयों से विनती है कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में यह स्टेटस लगाएं, जिससे गौ माता के इलाज के लिए सरकार की तरफ से कोई ठोस कदम बढ़ाया जाए. एक स्टेटस  गौ माता के नाम जरूरी है.
राजस्थान में पिछले दो महीने से गायों में लंपी रोग कहर बरपा रहा है. इसके कहर से अब तक हजारों गायों की मौत हो चुकी है. गायों के लिए यह बीमारी सरकार से लेकर पशुपालक तक को चिंता में डाल दिया है. फिलहाल इस बीमारी से राजस्थान में 29 लाख 24 हजार 157 गायें संक्रमित हुईं हैं. अब तक इस बीमारी से देश में 50 हजार 366 गायों की मौत हो चुकी है.

नेशनल ज्वेलरी अवार्ड 2021-22 जूरी राउंड का समापन, 23 सितंबर को ग्रैंड फिनाले के लिए मंच तैयार

0

मुम्बई। ऑल इंडिया जेम एंड ज्वैलरी डोमेस्टिक काउंसिल (जीजेसी) नेशनल ज्वैलरी अवार्ड्स (एनजेए) 2021-22 के 11वें संस्करण के विजेताओं की घोषणा करने के लिए पूरी तरह तैयार है। इसका ताज होटल, मुंबई में जूरी राउंड का सफलतापूर्वक समापन सम्पन्न हुआ। जूरी सदस्यों में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से प्रतिष्ठित हस्तियां शामिल थे जिनमें जयकुमार मखीजा (फैशन डिजाइनर), विद्या मजूमदार (वैश्विक अनुपालन निदेशक – एचआरडी एंटवर्प), गौतम शाह (उद्यमी), आनंद शाह (आनंद शाह ज्वेल्स), गौतम बनर्जी (गौतम बनर्जी ज्वैलरी), कामाक्षी कुमार (सौराष्ट्र के राजघराने से), दीपाल पात्रावाला (उद्यमी), पूनम नरूला (टेलीविजन अभिनेत्री) का नाम प्रमुख है।
एनजेए के 11वें संस्करण के विजेताओं की घोषणा 23 सितंबर 2022 को की जाएगी।
ब्राइड्स प्राइड (गोल्ड, डायमंड, जडाऊ, ब्राइडल ज्वैलरी) जैसी कुल 17 श्रेणियों को पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे।
एनजेए उत्कृष्टता पुरस्कार, स्टोर पुरस्कार, डिजाइनर पुरस्कार, कारीगर पुरस्कार, वर्ष का छात्र पुरस्कार, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व पुरस्कार, महिला उद्यमी पुरस्कार और विशेष पुरस्कार (अनमोल रत्न पुरस्कार, युवा रत्न पुरस्कार और उत्तर, पूर्व के लिए वर्ष का रत्न) भी प्रदान करता है।
एनजेए के जूरी राउंड के समापन के बारे में आशीष पेठे (अध्यक्ष, जीजेसी) ने कहा, “जीजेसी का एनजेए पुरस्कार सबसे बड़ा मंच है जो भारत के रत्न और आभूषण क्षेत्र के सभी क्षेत्रों को मान्यता देता है और उनकी सराहना करता है। हमारे उत्कृष्ट डिजाइन उद्योग के छिपे हुए रत्न हैं और एनजेए पुरस्कार इस राष्ट्रीय खजाने को केंद्र-स्तर पर ले जाने के लिए ऊंचा करते हैं। प्रतिभागियों द्वारा किए गए प्रयासों को देखकर खुशी होती है जो भारतीय ज्वैलर्स की प्रतिस्पर्धी भावना को दर्शाता है। एनजेए उद्योग द्वारा उद्योग के लिए पुरस्कार है और मैं सभी प्रतिभागियों को शुभकामनाएं देता हूं।
नीलेश शोभावत (संयोजक-एनजेए, जीजेसी) ने कहा, ”हमें इस वर्ष राष्ट्रीय आभूषण पुरस्कारों के लिए व्यापक प्रतिक्रिया मिली है। लोगों ने अपने ज्वैलरी पीस बनाने के लिए बहुत प्रयास किए हैं और हमें 850 से अधिक प्रविष्टियां प्राप्त हुई हैं। पूरे देश को उनकी अथक भावना, ऊर्जा और उत्साह की सराहना करनी चाहिए क्योंकि वे कारोबारी माहौल में कई चुनौतियों के बावजूद आगे बढ़ रहे हैं। एनजेए साबित करता है कि भारत में कारीगरों और शिल्पकारों के साथ-साथ युवा छात्रों की प्रतिभा का एक विशाल पूल है जो इस पेशे को अपना रहे हैं। ग्रैंड जूरी राउंड का समापन हो गया है और उद्योग एनजेए के 11वें संस्करण के विजेताओं के पथप्रदर्शक डिजाइनों को देखने के लिए उत्साहित है।
एनजेए सदस्यों को आभूषण उद्योग में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त करने का सुनहरा अवसर प्रदान करता है। यह उद्योग के साथ-साथ बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष ग्राहकों के साथ एक स्थायी इमेजरी बनाने में मदद करता है। एनजेए उद्योग के नवीनतम रुझानों और फैशन के साथ व्यक्तियों के ज्ञान को बढ़ाने में योगदान देता है। एनजेए परोक्ष रूप से उद्योग के डिजाइन और रुझानों के संदर्भ में किसी की क्षमता को प्रोत्साहित करने में मदद करता है। यह सदस्यों को उद्योग में अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर प्रदान करता है। एनजेए अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर प्रदान करता है और उद्योग में प्रतिभागियों के लिए एक अप्रयुक्त व्यावसायिक अवसर खोलता है।
जीजेसी के बारे में बता दें कि अखिल भारतीय रत्न और आभूषण घरेलू परिषद (जीजेसी) घरेलू रत्न और आभूषण उद्योग के निर्माताओं, थोक विक्रेताओं, खुदरा विक्रेताओं, वितरकों, प्रयोगशालाओं, जेमोलॉजिस्ट, डिजाइनरों और संबद्ध सेवाओं सहित लाखों व्यापार घटकों का प्रतिनिधित्व करती है। उद्योग के हितों की रक्षा करते हुए, परिषद अपने विकास को बढ़ावा देने और प्रगति करने के लिए 360° दृष्टिकोण के साथ उद्योग, उसके कामकाज और उसके कारण को संबोधित करने के उद्देश्य से कार्य करती है। GJC, पिछले 15 वर्षों से, उद्योग की ओर से और उद्योग के लिए विभिन्न पहल करके सरकार और व्यापार के बीच एक सेतु का काम कर रहा है।

Cow Economy -गौ आधारित खेती कर बंजर जमीन में फूंक दी जान

0
Cow Based Natural Farming: भारत में रसायनिक खेती के दुषपरिणामों (Harms of Chemical farming) को देखते हुये ज्यादातर राज्यों में गाय आधारित प्राकृतिक खेती (Natural Farming in India) का चलन बढ़ता जा रहा है. प्राकृतिक खेती अपनाने के लिये किसान ट्रेनिंग (Natural Farming Training) ले रहे हैं और कम खर्च में गौ आधारित खेती (Cow Based Farming) करके हजारों का खर्चा बचा रहे हैं. खासकर बात करें गुजरात राज्य की तो यहां अब ज्यादातर किसानों ने पूरी तरह रसायनों मुक्त खेती (Natural Farming in Gujarat) करके फसलें उगाना शुरू कर दिया है. इससे कीटनाशक और उर्वरक का खर्चा कम और मुनाफा बढ़ रहा है. दुनिया के सामने प्रकृतिक खेती पर इसी तरह का उदाहरण प्रस्तुत किया है, गुजरात के मोरबी जिले में माथक गांव में खेतीहर किसान दाजी गोहिल ने, जिन्होंने 10 एकड़ जमीन पर प्राकृतिक खेती (Chemical Free Farming) करके दूसरे किसानों के सामने मिसाल पेश की है.
80,000 की लागत में कमाये 4.5 लाख रुपये
किसान दाजी गोहिल भी साधारण किसानों की तरह ही रसायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों का इस्तेमाल करके खेती किया करते थे, लेकिन खेती की  लागत दिन पर दिन बढ़ती और मुनाफा कम होता जा रहा है. वो हर साल फसलों से बेहतर उत्पादन  के लिये 1.5 लाख रुपये तक खर्च करते थे, जिसके बाद सिर्फ 4 लाख रुपये की आमदनी होती थी. किसान दाजी गोहिल बताते हैं कि उन्होंने गौ आधारित प्राकृतिक खेती के बारे सुना तो था, लेकिन सही तरीका ना पता होने के कारण प्राकृतिक खेती शुरू नहीं कर पाये. इसके बाद साल 2019 में राजकोट के ढोलरा गांव में सुभाष पालेकर की 7 दिवसीय प्रशिक्षण आयोजित किया गया, जिसमें ट्रेनिंग लेकर दाजी गोहिल ने प्राकृतिक खेती के गुर सीखे. उन्होंने बताया कि गाय आधारित खेती करने पर शुरुआत में 80,000 तक की लागत आई और आमदनी बढ़कर 4.5 लाख रुपये तक पहुंच गई.
एक घटना ने बदल दी जिंदगी
हर इंसान के जीवन में किसी बड़ी घटना के बाद ही बड़ा बदलाव आता है. ऐसा ही दाजी गोहिल के साथ भी हुआ. प्रगतिशील किसान दाजी गोहिल ने प्राकृतिक खेती से जुड़े कई सेमिनार और शिविरों में जाकर जीवामृत से खेती करने के नुस्खे सीखे, लेकिन प्राकृतिक खेती शुरू करने में काफी झिझक हो रही थी. एक दिन किसी रिश्तेदार की ब्लड़ कैंसर के कारण मौत हो गई, जबकि वो शुद्ध शाकाहारी भोजन और स्वस्थ दिनचर्या का पालन किया करते थे. बस इसी घटना से दाजी गोहिल की जिंदगी को बदल दिया और उन्होंने जहरमुक्त प्राकृतिक खेती करने का मन बनाया. गौ आधारित खेती करने पर शुरूआत में खेती का लागत काफी हद तक कम और आमदनी में बढ़त दर्ज होने लगी.
बंजर जमीन में फूंकी जान
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रसायनिक खेती के दौरान दाजी गोहिल को आर्थिक और खेती से जुड़ी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता था. कभी-कभी कम उत्पादन के कारण फसल में रसायनिक दवा, खाद, खरपतवारनाशी का प्रयोग करने लगे, जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो गई और धीरे-धीरे जमीन बंजर होने लगी. खेती में लगातार बढ़ते कैमिकल के प्रयोग से खेती का मुनाफा कम हो गया, जिसके कारण कर्ज के जाल फंसते चले गये. खेती में रोजाना बढ़ते इस खर्च को बोझ को कम करने के लिये काफी समय तक गेहूं, मूंगफली, बाजरा, जीरा,आजवाइन, धनिया, हल्दी, सौंफ, मूंग, तिल, अरहर, सहजन, सब्जियां, गन्ना और पशुओं के चारे के लिये शुद्ध और गाय आधारित प्राकृतिक खेती की. इससे कुछ महीनों में ही खेती की लागत कम होने लगी और मुनाफा भी धीरे-धीरे बढ़ने लगा.
जैव विविधता को भी फायदा
खेती में रसायनों के इस्तेमाल के चलते दाजी गोहिल (Farmer Daaji Gohil) की जमीन लगभग बीमार और बंजर हो गई थी, लेकिन प्राकृतिक खेती के जरिये किछ समय बाद ही मिट्टी की उपजाऊ शक्ति वापस लौट आई. जमीन में भूजल स्तर (Ground Water) बढ़ने लगा और खेत-खलिहानों में हरियाली फैल गई. इसके बाद खेत में केंचुआ, मधुमक्खी, तितली और खेती के मित्र कीट नजर आने लगे. बता दें कि प्राकृतिक खेती (Natural Farming) से उपजे उत्पादों से इंसान के साथ-साथ पशुओं का भी काफी फायदा होता है. साफ-शुद्ध चारा मिलने पर गाय-भैंसों की सेहत अच्छी रहती है, जिससे दूध उत्पादन (Milk Production Tips) बढ़ने लगता है. इससे मिट्टी में जीवांशों की संख्या बढ़ती ही है, साथ ही  किसानों को भी धीरे-धीरे अच्छी आमदनी मिलने लगती है.

गौ हत्या करते हुए एक परिवार रंगे हाथों पकड़ा गया

0
रायपुर। नवगठित मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में गौ हत्या करते हुए एक परिवार रंगेहाथों पकड़ा गया है। आरोपियों के नाम खुर्शीद अनवर (60 वर्ष), उसकी बेटी शहाना, बहू रिजवाना और बेटा अशरफ है। पुलिस ने 3 आरोपियों खुर्शीद, शहाना और रिजवाना को हिरासत में ले लिया है, वहीं बेटा अशरफ फरार हो गया है, जिसकी तलाश की जा रही है। पुलिस ने आरोपियों के पास से गाय का सिर, चारों पैर और दूसरे अंगों को जब्त कर लिया है।
मनेंद्रगढ़ थाना प्रभारी सचिन सिंह ने बताया कि मुस्लिम कब्रिस्तान मोहल्ले के वार्ड नंबर 4 का रहने वाला परिवार जिस हथियार से गाय को काट रहा था, उसे जब्त कर लिया गया है। पुलिस आरोपियों के खिलाफ पशु क्रूरता अधिनियम के तहत कार्रवाई कर रही है।
इधर गौ रक्षा वाहिनी और सर्व हिंदू संगठन ने घटना के खिलाफ उग्र आंदोलन की चेतावनी दी है। आरोपी परिवार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद का रहने वाला है। ये परिवार पिछले 2-3 सालों से यहां रह रहा है। पड़ोसियों ने बताया कि ये लोग हमेशा कहीं-न-कहीं से गाय लेकर आते थे। उसे घर के बाहर 2-3 दिनों तक बांधकर रखते थे, लेकिन उसके बाद गाय का कुछ पता नहीं चलता था। अभी 2 दिन पहले भी एक गाय ये लोग लेकर आए थे, लेकिन आज सुबह से ही वो दिखाई नहीं दे रही थी।

 

2019 में ही लंपी वायरस की जानकारी मिल चुकी थी , इन तीन सालों में सरकारों ने क्या किया?

0
हम भारतीय गाय को ‘माता’ मानते रहे हैं और उसकी पूजा भी करते हैं। उसमें देवत्व की छाया देखते हैं। उसके मूत्र और गोबर तक का ‘औषधि’ की तरह इस्तेमाल करते हैं, लेकिन भयावह सच यह है कि देश के 16 राज्यों में लंपी वायरस से न केवल 75,000 से अधिक गायें मर चुकी हैं, बल्कि 15 लाख से ज्यादा संक्रमित हैं। यह कोई सामान्य आंकड़ा नहीं है। राजस्थान का एक वीडियो सार्वजनिक हुआ था, जिसमें लंबे-चौड़े मैदान में सैंकड़ों गायों के शव लावारिस और बिखरे हुए पड़े थे। चील, कौए, गिद्ध उन शवों को नोंच-नोंच कर खा रहे थे।
इन पक्षी-जानवरों का यही प्राकृतिक भोजन है, लेकिन गाय हमारी माता है। हमारी मांएं मर रही हैं। क्या उनके स्वास्थ्य, पालन-पोषण के प्रति हम इतना बेपरवाह और संवेदनहीन हो सकते हैं? राजस्थान में ही 50,000 से ज्यादा गायें मर चुकी हैं, जो सर्वाधिक आंकड़ा है।
हमें तो ‘गौ माता’ वाले कथन आडंबर और स्वार्थी लगते हैं। लंपी वायरस धीरे-धीरे देश भर में फैल सकता है, लिहाजा पशुधन विशेषज्ञों ने इसे कोरोना वायरस की तर्ज पर ‘महामारी’ घोषित करने के आग्रह सरकार से किए हैं। गौ माता मर रही है अथवा संक्रमण की पीड़ा झेल रही है या उसके प्रजनन की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है, यह सब कुछ अचानक नहीं हुआ है। 2015 में तुर्की और यूनान में लंपी वायरस के मामले सामने आए थे, तो वे आपदा और त्रासदी साबित होते गए।
भारत में ओडिशा और पश्चिम बंगाल में इस संक्रमण ने गौवंश को चपेट में लेकर बीमार करना शुरू किया, तो 2019 में ही लंपी वायरस की जानकारी मिल चुकी थी। इन तीन सालों में सरकारों ने क्या किया? अब यह प्रकरण त्रासदी में तबदील हो चुका है, तो प्रधानमंत्री मोदी ने 2025 तक सभी पशुओं के टीकाकरण की बात कही है।
क्या अजीब संयोग है कि एक तरफ हमारी गौ माता मर रही है, तो दूसरी ओर ग्रेटर नोएडा में आयोजित विश्व डेयरी शिखर सम्मेलन के मंच से प्रधानमंत्री हुलहुलाते रहे कि दुग्ध उत्पादन में भारत विश्व में ‘नंबर वन’ देश है। यह उद्योग 8.5 लाख करोड़ रुपए का है, जो गेहूं और धान से भी बेहतर है। करीब 8 करोड़ छोटे किसानों, ग्रामीण महिलाओं और अन्य लोगों को रोजग़ार प्राप्त है। प्रधानमंत्री ने भारतीय मवेशियों की तगड़ी नस्लों का भी जिक़्र किया, जो मौसम और माहौल के अनुकूल खुद को ढालने में सक्षम हैं, लेकिन लंपी वायरस पर नींद अब खुली है कि टीकाकरण के बयान की शुरुआत हुई है।
दरअसल जो हाहाकार कोरोना वैश्विक महामारी को लेकर मचा था, वह चीत्कार गौवंश नहीं मचा सकता, क्योंकि कुदरत ने मनुष्य की तरह शब्द, भाषा और बोलने की क्षमता पशुओं को नहीं दी है। लंपी से संक्रमित गाय को 105 डिग्री तक बुखार हो जाता है, शरीर पर चकत्ते फूट पड़ते हैं, आंख-नाक बहने लगती हैं, दुबली हो जाती है, लार टपकने लगती है, बदबू आने लगती है, दूध देना बंद कर देती है और अंतत: वह मर जाती है।
कितनी पीड़ा और तकलीफ उसे झेलनी पड़ती है, उसके पालक ही कुछ समझ पाते होंगे! इतना कुछ होने और महामारी के आसार बनने के बावजूद केंद्रीय मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला यही कह सकते हैं कि समन्वय बनाया जा रहा है। क्या उनके पास कोई ब्लूप्रिंट नहीं है कि ऐसी बीमारी से कैसे निपटा जाए? गाय गांवों की तो अर्थव्यवस्था का प्रतीक है। औसतन गाय 50,000 रुपए से 1,00,000 रुपए तक में खरीदी जा सकती है।
यदि गाय दूध दे रही है और वह लंपी से संक्रमित होकर मर जाए, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाती है। औसत ग्रामीण इस नुकसान को नहीं झेल सकता। यदि गौवंश इसी तरह समाप्त होता गया, तो दूध-उत्पादन के उद्योग का क्या होगा? हमने गाय माता को आवारा घूमते हुए और प्लास्टिक पन्नी खाते हुए भी देखा है।
क्या माता की देखभाल इस तरह की जाती है? कमोबेश स्वास्थ्य के संदर्भ में भारत सरकार और राज्य सरकारों को बहुत सचेत रहना पड़ेगा, क्योंकि बीते दिनों कोरोना संक्रमण के आंकड़े एक बार फिर बढऩे लगे थे, तो प्रधानमंत्री को सभी मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलानी पड़ी। सरकारों के पसीने छूटने लगे थे। हम कोरोना वायरस से नई लड़ाई लडऩे की मन:स्थिति में नहीं हैं, लिहाजा गौ माता की भी चिंता करनी चाहिए।

इस महामारी के कारण तेज गति से पशुओं की मौतें हो रही हैं। पशुओं को मरने से बचाना होगा। अगर पशु इसी तरह मरते रहे, तो पशुपालन का व्यवसाय ठप पड़ जाएगा और करोड़ों लोगों के सामने रोजी-रोटी का प्रश्न खड़ा हो जाएगा। सरकार को ठोस कार्ययोजना बनानी होगी।