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वीर संवत 2550 पर विशेष- भगवान महावीर के नाम पर है सबसे प्राचीन संवत है

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संदीप सृजन-विनायक फीचर्स
विश्वभर में समय गणना के लिए वर्तमान में जो सन या संवत मुख्य रूप से आज भी उपयोग में लाए जाते है उनमें विक्रम संवत् एवं ईस्वी सन को ही अधिकांश लोग जानते है । लेकिन भारत की समय गणना परम्परा में और भी संवत है जो ईसा के पूर्व से प्रचलित थेऔर आज भी प्रचलित है।
वर्तमान में ईस्वी सन 2023 चल रहा है। लेकिन ईसा से 527 वर्ष पूर्व भारत में ‘वीर संवत’ प्रारम्भ हो चुका था और विक्रम संवत भी 57 ईसा पूर्व में ही प्रारम्भ हो चुका था। ये दोनों संवत आज भी प्रचलन में है। और समय गणना के लिए इनका उपयोग होता है। दोनों की गणना में महिनों के नाम या सौर मंडल के चक्र का कोई भेद नहीं है। केवल इतना अंतर है कि विक्रम संवत  सम्राट चक्रवर्ती महाराजा विक्रमादित्य के विजय उत्सव दिवस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है। जिसे वर्तमान में 2080 वर्ष हो गये है। और वीर संवत जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर के निर्वाण दिवस याने कार्तिक कृष्णअमावस्या के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है। वर्तमान में दीपावली 2023 के अगले दिन से वीर संवत 2550 प्रारम्भ हो गया है।
महावीर निर्वाण संवत और विक्रम संवत दोनों ही भारतीय संवत है और प्रमाणिक भी है। वीर निर्वाण संवत और इसकी सर्व उपयोगिता की पुष्टि सुप्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ गौरीशंकर हीराचंद ओझा द्वारा की गई थी। वर्ष 1912 में अजमेर जिले के बडली गाँव (भिनय तहसील) से प्राप्त ईसा से 443 वर्ष पूर्व के एक शिला लेख जो कि प्राकृत में है उस पर “84 वीर संवत” लिखा है। यह शिलालेख अजमेर के ‘राजपूताना संग्रहालय’ में संग्रहित है।
इस प्राचीन षट्कोणीय पिलर पर अंकित चार लाइनों वाले शिलालेख की प्रथम लाइन में “वीर” शब्द भगवान महावीर स्वामी को संबोधित है और दूसरी लाइन में निर्वाण से 84 वर्ष अंकित है, जो भगवान महावीर के निर्वाण के 84 वर्ष बाद लिखे जाने को दर्शाता है। ईसा से 527 वर्ष पूर्व निर्वाण में से 84 वर्ष कम करने पर 443 वर्ष आता है जो शिलालेख लिखे जाने का वर्ष है।यानि यह शिलालेख ईसा से 443वर्ष पूर्व स्थापित हो चुका था।
भारतीय धर्मग्रंथों और ऐतिहासिक शिला पर प्राप्त तथ्यों के आधार पर यह पूर्णतः प्रमाणिक है कि  सबसे प्राचीन प्रचलित संवत वीर संवत ही है।(विनायक फीचर्स)

Happy Govardhan Pooja 2023 , गोवर्धन पूजा हमें बहुत सी चीजें सिखाता है

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Happy Govardhan Pooja 2023: गोवर्धन पूजा एक हिंदू त्योहार है, जो पूरे देश में व्यापक रूप से मनाया जाता है। यह त्योहार देवों के राजा इंद्र पर भगवान कृष्ण की विजय का प्रतीक है। गोवर्धन पूजा दिवाली के अगले दिन मनाई जाती है और पांच दिवसीय उत्सव के चौथे दिन आती है। इस साल गोवर्धन पूजा 13 नवंबर को मनाई जा रही है। 
भारत त्योहारों का देश है और यहाँ पर देश के अलग-अलग हिस्सों में आप हर दिन एक नया त्यौहार पायेंगे। इसी तरह से, दिवाली भी हिन्दुओं के सबसे बड़े त्यौहार में से एक है और यह समूर्ण राष्ट्र में मनाया जाता है। हालाँकि यह एक दिन का त्यौहार होता है, लेकिन इसके साथ-साथ 5 अन्य त्योहार भी मनाये जाते हैं जिनमे से एक है गोवर्धन पूजा। 
गोवर्धन पूजा एक भारतीय त्योहार है जो दिवाली के बाद मनाया जाता है। यह दिवाली के बाद दूसरे दिन मनाया जाता है। यह ज्यादातर राष्ट्र के उत्तरी हिस्से में मनाया जाता है। इसे अन्नकूट पूजा के साथ-साथ गोवर्धन पूजा के रूप में भी जाना जाता है।
गोवर्धन पूजा कैसे मनाई जाती है?
इस अवसर पर, हर वर्ष लोग इस दिन को बहुत उत्साह के साथ मनाते हैं। देवी अन्नपूर्णा को प्रभावित करने के लिए बड़ों के साथ-साथ बच्चे भी जल्दी स्नान कर लेते हैं और इस दिन 56 से भी अधिक प्रकार की विभिन्न वस्तुएँ बनाई जाती हैं।
लोग पवित्र गाय माता की पूजा करते हैं और इस दिन को मनाते हैं। जब गोवर्धन पर्वत को बचाया गया था तो लोगों नें खुशी जताई कि उनके भोजन का स्रोत बच गया है; और श्रद्धांजलि के रूप में, लोग भोजन की देवी यानी माँ अन्नपूर्ण को विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्री प्रदान करते हैं।
गोवर्धन पूजा में क्या है खास?
गोवर्धन पूजा हमें बहुत सी चीजें सिखाता है और उसमे सबसे पहली चीज है, हमेशा वही करना जो सही हो और भगवान किसी भी कीमत पर हमेशा आपकी मदद करेंगे।
हमें हमेशा अपने अवसरों का जश्न मनाना चाहिए और यह मान्यता है कि हमें इस दिन खुश होना चाहिए क्योंकि जो लोग त्यौहार के दिन दुखी होंगे वे पूरे वर्ष दुखी रहते हैं, जबकि जो लोग इस दिन खुश रहेंगे, वे पूरे वर्षभर खुश रहते हैं।

दीपावली लक्ष्मी जी के स्वागत का उत्साह

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राकेश अचल – विनायक फीचर्स
देश के पांच राज्यों में भले ही विधानसभा चुनाव का बुखार है लेकिन इन पांच राज्यों के साथ पूरे देश में सरस्वती की बहन यानि हमारी लक्ष्मी मौसी के आगमन की उत्सुकता के साथ ही उनके स्वागत की तैयारियों की धूम है। इस धूम में तंगी, बीमारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे ज्वलंत मुद्दों का कोई जिक्र नहीं है ।  किसी को आने वाले तीन दिनों तक इनकी फिक्र भी नहीं है। राजा हो रंक सबके सब सरस्वती मौसी के स्वागत की तैयारी पूरे उत्साह से कर रहे हैं। महाराष्ट्र वालों ने तो वसु  बारस  मानकर पांच दिन पहले से ही इस त्यौहार का श्रीगणेश कर दिया है। बाकी लोग धनतेरस  के साथ ये आगाज कर रहे हैं।
दीपावली सचमुच एक बड़ा प्रकाश पर्व है। इसकी वजह से भारत के घर-घर में स्वच्छता अभियान चलता है ।  इतना कूड़ा करकट घरों से निकलता है कि कभी-कभी तो कचरा ढोने और हटाने वाले स्थानीय निकाय भी हार मान जाते हैं। हमारे देश में वैसे भी कचरे की कोई कमी नहीं है।  भारत में हर साल कितना कचरा निकलता है ये कोई नहीं जानता, लेकिन जो आंकड़े हैं वे कहते हैं कि भारत में सालाना 277  अरब किलो कचरा निकलता है। यानि हर व्यक्ति कम से कम एक साल में 205  किलो कचरे का विसर्जन करता है। इस कचरे में 34 लाख टन  कचरा अकेले प्लास्टिक का होता है और इसमें से भी कुल 30  फीसदी कचरा ही रीसाइकल हो पाता है।
मजे की बात ये है कि  इस कचरे के बाद भी भारत में हर साल लक्ष्मी मैया आतीं है।  उनके आगमन पर देश में घर-घर रोशनी की जाती है ।  लिपाई -पुताई होती है ।  सब कुछ नया-नया करने के प्रयास होते हैं। लक्ष्मी मैया की कृपा से भारत की इकॉनमी यानि अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन बनाने की हमारी कोशिश जारी है। देश में पहली बार धनतेरस की तर्ज पर किताबें छापने  और बेचने वाले किताब तेरस का आयोजन  कर रहे हैं। दरअसल भारत में धन तेरस पर कुछ न कुछ खरीदने की रीत है। जिसे जिस चीज की जरूरत होती है ,वो चीज खरीदता है। आदमी खरीदना तो चाँद-तारे भी चाहता है लेकिन उसकी जेब उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं देती।
हमने बचपन में देखा है कि हमारे घर में धनतेरस के दिन धातु का कोई न कोई बर्तन खरीदा जाता था। सबसे सस्ती चीज होती थी कटोरी,ग्लास,चमचा या पूजा के लिए तांम्बे के छोटे-छोटे बर्तन।
आजकल धनतेरस पर बर्तनों के साथ ही और दूसरी तमाम चीजें खरीदी जातीं हैं। जिनके पास लक्ष्मी माँ की कृपा है वे बर्तनों के बजाय सोना-चांदी  से भी मंहगा डायमंड  यानि हीरे से बनी चीजें खरीदते हैं। अब धनतेरस पर इलेक्ट्रानिक उपकरण , रसोईघर में इस्तेमाल होने वाले मंहगे उपकरण, साड़ियां,कपडे,सजावट का सामान प्रमुखता और प्रचुरता से खरीदा जाता है। लेकिन मै देखता हूँ कि  चीनी सामान  की उपलब्धता के बावजूद आज भी मिटटी के दिए, शक्कर के बताशे और रंगीन खिलौने तथा चावल के पापकार्न यानि खीलें, कपास, लक्ष्मी जी का पन्ना, आज भी बिक रहा है।  इस त्यौहार के मौके पर पुलिस और स्थानीय प्रशासन मिलजुलकर अपने गांव, शहर में फुटपाथ और सड़कें तक बेच देते हैं ताकि गरीब आदमी भी अपना कारोबार कर कमा-खा सके।
हमारे देश में खरीद-फरोख्त के लिए ज्योतिषी और पंडित बाकायदा मुहूर्त निकालते है।  वे ये भी बताते हैं कि  किस राशि के जातक को धनतेरस के दिन क्या खरीदना चाहिए और क्या नहीं ? मुझे लगता है कि  ज्योतिषियों की भी बाजार से सांठगांठ है, अन्यथा ये ज्योतिषी और उनके पंचांग दीपोत्सव  पर पुष्य नक्षत्र की खोज न करते और कर भी लेते तो उस दिन मंहगा सामान खरीदने की सिफारिश बिल्कुल न करते। लेकिन ऐसा धड़ल्ले से हो रहा है। अखबार ज्योतिषी के खरीद-फरोख्त मुहूर्तों का प्रचार करने के लिए भौंपू बने हुए हैं। भारत   के इस प्रमुख त्यौहारी सीजन में हमारे अखबारों की सेहत और सूरत दोनों बदल जाती है।  आजकल एक ही दिन में तीन-तीन अखबार आ रहे है। और इन अख़बारों में आधे से ज्यादा पन्नों में केवल कुछ  ज्वेलरों  बिल्डरों के विज्ञापन होते हैं।
दर असल ज्योतिषयों ने सुझाव दिया है कि  धनतेरस पर  खरीदी करते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए क्योंकि ऐसा नहीं करने पर आप के द्वारा की जाने वाली खरीददारी का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है ।  ज्योतिषी कहते हैं कि धनतेरस पर आपको नुकीली और धारदार वस्तुएं सुई, पिन, कैंची, चाकू, छिलनी, इत्यादि नहीं खरीदना चाहिए मान्यता है कि इससे घर में नकारात्मक प्रभाव पड़ता है धनतेरस के दिन कांच से बनी वस्तुओं को नहीं खरीदना चाहिए। कांच में राहु का स्थान यानी राहु से संबंधित है इस लिए इसकी खरीदी शुभ नहीं होती।
अब सवाल ये है कि  जनता देवताओं की फ़िक्र करे या अपनी जरूरतों की ? ज्योतिषी कहते हैं कि धनतेरस में लोहे की खरीदी करने से धन के देवता कुबेर रूष्ट हो जाते हैं इसलिए लोहे से निर्मित वस्तुओं की खरीदी से परहेज़ करना चाहिए। वे कहते हैं कि धनतेरस को प्लास्टिक की वस्तुओं की खरीददारी से बचें इस दिन किसी धातु की खरीदी ही करें अन्यथा धनतेरस की खरीददारी का कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा। ज्योतिषियों का सुझाव है कि धनतेरस के एक दिन पहले ही तेल या घी  खरीद लें क्योंकि धनतेरस को तेल और घी की खरीदी को अशुभ माना गया है.
ज्योतिषी लगता है अपना पंचांग जनता कि लिए नहीं बल्कि व्यापारियों कि लिए बनाते है।  वे कहते हैं  कि  धनतेरस को सोना, चांदी के आभूषण, सिक्के खरीदने चाहिए। भूल कर भी आर्टिफिशियल आभूषण नहीं खरीदें यह अशुभ होता है। पंडित जी धनतेरस पर आपको   कांस्य, पीतल, तांबा, चांदी आदि के बर्तन खरीदने की सलाह देते हैं साथ ही चेतावनी भी देते हैं कि  आप  स्टील के बर्तन खरीदी से बचें और एल्युमुनियम, लोहे से निर्मित बर्तन भूल कर नहीं ले। पंडितों का मशविरा होता है कि  बाजार से बर्तन खरीददारी के बाद घर के अंदर खाली बर्तन नहीं लाएं उसमें अंदर कुछ भर के लाएं जैसे अनाज या कोई अन्य खाद्य वस्तु। मेरा चूंकि खरीद-फरोख्त करते समय ज्योतिषियों से अधिक विश्वास अपनी जेब पर होता है इसलिए मैं अपनी जेब की सुनता हूँ ,पंडित की नही।  आपकी आप जाने।  (विनायक फीचर्स)

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बेटे कार्तिकेय सिंह चौहान से विशेष बातचीत.* राजनीति में व्यक्तिगत आरोप लगाए जाते हैं तो मन को तकलीफ होती है- कार्तिकेय

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(पवन कुमार वर्मा – विनायक फीचर्स )

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बडे बेटे कार्तिकेय सिंह चौहान पिता के विधानसभा क्षेत्र बुधनी में चुनाव प्रचार की कमान संभालें हुए हैं। वे हर दिन सुबह से क्षेत्र में  निकलते हैं और देर रात तक जनसंपर्क करते हैं। उनका मानना है कि राजनीति में व्यक्तिगत आरोप लगाना मन को तकलीफ पहुंचा देता है। वहीं उन्होंने यह भी दावा किया कि प्रदेश की जनता के दिल के सिंहासन में उनके पिता शिवराज सिंह चौहान हैं। उन्होंने अपने पिता के रिश्तों को आगे बढ़ाते हुए कहा कि प्रदेश में उनकी ढाई करोड़ बुआएं हैं। गौरतलब है कि बुधनी विधानसभा क्षेत्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ कांग्रेस ने टीवी सीरियल रामायण – 2  में हनुमान की भूमिका निभाने वाले विक्रम मस्ताल को उम्मीदवार बनाया है। प्रस्तुत है भाजपा के युवा नेता कार्तिकेय सिंह चौहान से विनायक फीचर्स के लिए पवन कुमार वर्मा से खास बातचीत के अंश…

सवाल- लॉ के स्टूडेंट को चुनाव प्रचार करनें में आनंद आ रहा है या पिता चुनाव लड़ रहे इसलिए प्रचार करना पड़ा रहा है ?

जवाब- मैं अकेला लॉ का स्टूडेंट नहीं हूं जो भाजपा की  विचारधारा से प्रभावित हूं। मेरे लिए सौभाग्य का विषय है कि जिस विचारधारा पर मैं विश्वास कर रहा हूं उसका नेतृत्व देश में प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी और प्रदेश में  नेतृत्व मेरे पिता शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री के रूप में कर रहे हैं। जब ऐसे नेता हमारे सामने हो तो पीछे रहकर काम करने में आनंद ही आता है। उसी आनंद के लिए हम काम करते हैं।

सवाल-  हम देख रहे हैं कि आप भी अपने पिता (शिवराज सिंह चौहान) की तरह ही रिश्तों के तार मतदाताओं से जोड़ रहे है?

जवाब-  बुधनी हमारा परिवार है। मेरे परिवार में पिता जी, अम्माजी (मां साधना सिंह ), कुणाल(छोटा भाई) ही नहीं हैं, बुधनी के सवा तीन लाख लोग हमारे परिवार के सदस्य है। जिन्हें मेरे पिता ने बहन माना है, वे मेरी बुआ हैं। इसलिए मैं अपनी बुआओं के पैर छू कर आशीर्वाद लेता हूं, वे भी उसी नाते आशीर्वाद देती हैं।

सवाल- चुनाव में समय ही इस क्षेत्र के एक-एक गांव वालों से मिलने के लिए आते हैं?

जवाब- आपने भी देख लिया हैं कि मैं सबको जानता हूं सब मुझे जानते हैं। मैं तो यहां हमेशा ही आता जाता रहता हूं। यह रुटीन है। इस वक्त तो मुझ कम घूमना पड़ रहा है। आपको भी देखकर लगा होगा कि इसे कोई मेरा दौरा नहीं मान रहा, क्योंकि सब जानते हैं कि यह मेरा घर है, मेरे परिवार के लोग हैं। परिवार के बीच जाना आना सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं हैं।

सवाल – आपके पिता बताते हैं कि सलकनपुर में उनकी एक बहन ने उन्हें अंगूठी दी उसे वे उतारते नहीं हैं।

जवाब-  सलकनपुर में जिन्होंने यह अंगूठी दी थी उनकी फूल की छोटी सी दुकान है। खासबात  यह है कि उन्होंने मेरे पिता के लिए अपने बचत के पैसों से वह अंगूठी खरीदी थी। जब वे सामने आई और अंगूठी देने की बात की तो पिताजी, अम्मा जी और मुझे भी लगा कि उस बुआ के लिए यह अंगूठी अमूल्य है। यह पवित्रता का भाव था, यह सगे रिश्ते से भी बड़ा रिश्ता है। वैसे तो मेरे पिताजी की एक बहन हैं, लेकिन अब प्रदेश की ढाई करोड़ महिलाएं उनकी बहन और इस नाते इतनी मेरी बुआएं हैं।

सवाल – सन् 2013और 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने बाहरी प्रत्याशी उतारा था, इस बार स्थानीय नेता उतारा है, कितनी चुनौती है?

जवाब- बुधनी में किसी का वोटर आईडी बना हैं, इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें जनता यह मान ले कि वे यहीं के हैं।  उनका यहां आना चार महीने पहले हुआ हैं। इससे पहले वे मुंबई, भोपाल में  रहते थे। उनका यहां पर रहना न के बराबर है। इसलिए यह कहना कि वे बुधनी के हैं तो मैं इसे उचित नहीं मानता।

सवाल – फिर आप क्या मानते हैं?

जवाब- पहले जो दो प्रत्याशी थे, इनमें और उनमें कोई फर्क नहीं हैं। इसी का कारण है कि कांग्रेस में भी इस बात को लेकर असंतोष है। कांग्रेस के यहां के नेताओं के साथ मेरी सहानभूति है। कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं, नेता हैं, वे सरकार तक अपनी

कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय द्वारा स्वच्छता विशेष अभियान 3.0 का सफलतापूर्वक समापन

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प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जो स्वच्छता को संस्थागत बनाने और सरकारी प्रक्रियाओं में नौकरशाही से जुड़े लंबित मामलों को कम करने की वकालत करते हैं। उनके दूरदर्शी और मिशन-संचालित नेतृत्व से प्रेरित होकर कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय ने 2 अक्टूबर से 31 अक्टूबर, 2023 तक विशेष अभियान 3.0 कार्यान्वित करने की पहल की। इस अभियान का प्राथमिक उद्देश्य लंबित मामलों का शीघ्र निपटान, कुशल स्थान प्रबंधन और स्वच्छ और हरित पर्यावरण को प्रोत्साहन देना था।

स्वच्छता पर विशेष अभियान 3.0 का सफलतापूर्वक समापन मंत्रालय की प्रतिबद्धता का साक्षी है। यह व्यापक पहल पूरे मंत्रालय के साथ-साथ देश के विभिन्न क्षेत्रों में फैले इसके संबद्ध/अधीनस्थ कार्यालयों और स्वायत्त निकायों तक फैली हुई है। 15 सितंबर, 2023 से शुरू किए गए प्रारंभिक चरण ने अभियान अवधि के दौरान सफाई के लिए विशिष्ट लक्ष्यों की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस आयोजित अभियान में न केवल लंबित मामलों के निपटान पर बल दिया गया, बल्कि कार्यालयों में स्थान उपयोग को अनुकूलित करने और समग्र कार्यस्थल अनुभव को बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया गया। इस पूरे प्रारंभिक चरण और अभियान के दौरान, पूरे देश में 8354 स्वच्छता स्थलों की पहचान की गई। इस अभियान द्वारा अपेक्षित परिणाम लगभग 660 वर्ग फुट जगह को साफ करना था, साथ ही 4579 से अधिक भौतिक फाइलें गहन समीक्षा के लिए रखी गई थीं। इसके अलावा, स्क्रैप के निपटान से कुल 20,94,013/- रुपये के राजस्व की प्राप्ति हुई। एक समर्पित टीम द्वारा कर्मठतापूर्वक कार्य प्रगति की निगरानी की गई और प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग द्वारा आयोजित किए गए लंबित मामलों के निस्तारण हेतु विशेष अभियान (एससीपीडीएम) पोर्टल पर इसे लगातार अपडेट किया गया।

इसके अलावा, कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय के सचिव श्री अतुल कुमार तिवारी ने विशेष अभियान 3.0 के दौरान हुई प्रगति का आकलन करने के लिए विभिन्न प्रभागों का दौरा करके और नियमित समीक्षा बैठकें आयोजित करके सक्रिय कदम उठाए। उनके गहन मार्गदर्शन से विशेष टीमों को अभियान के हिस्से के रूप में क्षेत्रीय संस्थानों का दौरा करने के लिए रणनीतिक रूप से संगठित किया गया, ताकि इसके प्रभावी कार्यान्वयन और प्रभाव को सुनिश्चित किया जा सके। कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय के सचिव श्री अतुल कुमार तिवारी ने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छ और अधिक कुशल सुशासन के विजन की भावना में, विशेष अभियान 3.0 विशिष्टता के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। रणनीतिक योजना, औचक दौरे और समर्पित टीम वर्क के माध्यम से, हमने न केवल कचरा साफ करके स्थान खाली किया है, बल्कि स्वच्छता और कार्य क्षमता के अभियान को भी आगे बढ़ाया है। यह पहल परिवर्तनकारी बदलाव के लिए हमारे संकल्प का एक प्रमाण है, जो एक कार्यस्थल को स्वच्छता और परिचालन उत्कृष्टता के आदर्शों के अनुरूप श्रेणीबद्ध करने के लिए प्रोत्साहित करता है।’’

एमएसडीई द्वारा स्वीकृत सराहनीय प्रक्रियाओं में से एक है बेंगलुरु में होसुर रोड पर सरकारी मॉडल औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान के परिसर में 25 विभिन्न स्थानों पर कृत्रिम पुनर्भरण गड्ढों के निर्माण की शुरुआत। ये गड्ढे लगभग 12 मिलियन लीटर वर्षा जल की प्रभावशाली संयुक्त क्षमता प्रदर्शित करते हैं, जो वार्षिक वर्षा के लगभग 10 प्रतिशत के बराबर है। इस प्रयास के परिणामस्वरूप आईटीआई के भीतर 25 अन्त:स्रवण कुओं की स्थापना होगी, जो लगभग 3.2 मिलियन लीटर वर्षा जल को संरक्षित करने में सक्षम होंगे, और इस प्रकार स्थायी जल प्रबंधन पहल में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

1 अक्टूबर को, सरकारी आईटीआई बेहरामपुर, ओडिशा ने भी एक अभिनव और दीर्घकालिक उद्देश्य के साथ स्वच्छता अभियान का उल्लेख किया। इस आयोजित उत्सव में 23 फुट ऊंचे स्क्रैप हाथी ढांचे के अनावरण ने रचनात्मक और पर्यावरण के प्रति प्रबुद्ध मोड़ ले लिया। इस अनूठी स्थापना को 30,000 प्रयुक्त प्लास्टिक की पानी की बोतलों का उपयोग करके तैयार किया गया था, इस संग्रह प्रयास का नेतृत्व बेहरामपुर के 3000 प्रशिक्षुओं ने किया था, जिन्होंने शहर के विभिन्न स्थानों से इन बोतलों को परिश्रमपूर्वक इकट्ठा किया था। इस पहल ने न केवल स्वच्छता के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित की, बल्कि दृष्टिगत रूप से प्रभावशाली और पर्यावरण-अनुकूल उत्सव के लिए सामग्रियों के पुनर्चक्रण और पुन: उपयोग के लिए एक अभिनव दृष्टिकोण को भी प्रदर्शित किया।

झारखंड : अखिल भारतीय गौ रक्षक संघ ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर गौ हत्या पर प्रतिबंध की मांग की

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झारखंड : अखिल भारतीय गौ रक्षक संघ ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर गौ हत्या पर प्रतिबंध की मांग की

रांची, 12 नवंबर (भाषा) अखिल भारतीय गौ रक्षक संघ की झारखंड इकाई ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से देश में गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया।

प्रधानमंत्री को लिखे एक पत्र में अखिल भारतीय गौ रक्षक संघ की झारखंड इकाई के अध्यक्ष जय प्रकाश पांडे ने मोदी से देश में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध सुनिश्चित करने का आग्रह किया।

सिंह ने पत्र में कहा, ”हिंदुओं के लिए गाय पवित्र है, जिसे पूजा जाता है और उनका इससे धार्मिक विश्वास जुड़ा हुआ है। हिंदू, गाय को माता के रूप में पूजते हैं। गाय की सुरक्षा के लिए कदम उठाने के अलावा देश में गौ हत्या पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।”

उन्होंने गौ संरक्षण के लिए दुग्ध उत्पादों पर आधारित खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों और गाय के गोबर से खाद बनाने वाली इकाइयों की स्थापना जैसी योजनाओं के लिए वित्तीय एवं अन्य संसाधनों की भी मांग की। पांडे ने कहा, ”देशभर की पंचायतों को गौरक्षा का काम सौंप दिया जाना चाहिए।” उन्होंने देश में गोहत्या रोधी कानून की जरूरत पर भी जोर दिया।

भीतर का अंधकार दूर हो यही दीपोत्सव का संदेश

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(संदीप सृजन -विभूति फीचर्स)
दीपावली का पर्व भारतीय सनातन परम्परा का लौकिक और अलौकिक पर्व माना गया है। लौकिक स्वरूप में जहां खानपान,वैभव और उत्साह का वातावरण इस पर्व को प्रमाणिकता प्रदान करता है। वहीं अलौकिक रूप में यह पर्व आत्मोकर्ष का प्रमुख पर्व है। लौकिक और अलौकिक के बीच तंत्र साधकों के लिए परालौकिक स्वरूप भी इस पर्व का है। लेकिन जन सामान्य के लिए लौकिक और अलौकिक इन दो रूपों में ही इसकी महत्ता है। सनातन धर्म की वैष्णव परम्परा में भगवान राम का अयोध्या आगमन उत्सव लौकिकता तो श्रमण परम्परा (जैन धर्म) में भगवान महावीर का निर्वाण अलौकिकता का स्वरूप है।
कार्तिक अमावस्या की रात्रि में भगवान महावीर स्वामी को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इस दिन महावीर का निर्वाणोत्सव मनाया जाता है। अपनी आयु के 72 वें वर्ष में जब महावीर पावापुरी नगरी के मनोहर उद्यान में चातुर्मास के लिए विराजमान थे।  चतुर्थकाल पूरा होने में तीन वर्ष और आठ माह बाकी थे। तब कार्तिक अमावस्या के दिन सुबह स्वाति नक्षत्र के दौरान भगवान महावीर अपने औदारिक शरीर से मुक्त होकर मोक्षधाम को प्राप्त हो गए। उस समय इंद्रादि देवों ने आकर भगवान महावीर के शरीर की पूजा की और पूरी पावा नगरी को दीपकों से सजाकर प्रकाशयुक्त कर दिया। 2550 वर्ष भगवान महावीर को निर्वाण हुए हो गये है। उस समय से आज तक यही परंपरा जैन धर्म में चली आ रही है। प्रतिपदा के दिन भोर में महावीर के प्रथम शिष्य गौतम को कैवल्यज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इससे दीपोत्सव का महत्व जैन धर्म में और बढ़ गया।
भगवान महावीर अरिंहत है, और अरिहंत को संसार में गुरु के रूप में माना जाता है। भगवान महावीर के सिद्द गमन को तब विद्वजनों ने ज्ञान दीप का राज होना (बुझना) माना और मिट्टी के दीप प्रज्जवलित कर संसार को आलोकित करने का प्रयास किया था। भगवान महावीर ने दीपावली वाले दिन मोक्ष जाने से पहले आधी रात तक जगत के कल्याण के लिए आखिरी बार उपदेश दिया था, जिसे ‘उत्तराध्यान सूत्र’ के नाम से जाना जाता है। इस ग्रंथ में सर्वाधिक बार कोई वाक्य आया है तो वह है ‘समयं गोयम ! मा पमायए’ गौतमस्वामी को जो कि भगवान महावीर के प्रधान शिष्य थे, प्रधान गणधर थे, उनको संबोधित करते हुए यह प्रेरणा महावीर ने दी कि आत्मकल्याण के मार्ग में चलते हुए क्षण भर के लिए भी तू प्रमाद मत कर। ढाई हजार वर्ष पहले दी गई वह प्रेरणा आज भी महत्वपूर्ण है। प्रमाद अज्ञानता की ओर ले जाता है।ज्ञान जीवन में प्रकाश करने वाला होता है। शास्त्र में भी कहा गया- ‘नाणं पयासयरं’ अर्थात ज्ञान प्रकाशकर है। इसीलिए ज्ञान को प्रकाश और अज्ञान को अंधकार की उपमा दी जाती है । दीपक हमारे जीवन में प्रकाश के अलावा जीवन जीने की सीख भी देता है, दीपक हमारे जीवन की दिशा को उर्ध्वगामी करता है, संस्कारों की सीख देता है, संकल्प की प्रेरणा देता है और लक्ष्य तक पहुंचने का माध्यम बनता है। दीपावली मनाने की सार्थकता तभी है, जब भीतर का अंधकार दूर हो। अंधकार जीवन की समस्या है और प्रकाश उसका समाधान। जीवन जीने के लिए सहज प्रकाश चाहिए। प्रारंभ से ही मनुष्य की खोज प्रकाश को पाने की रही।
उपनिषदों में भी कहा गया है- ‘असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय॥‘ अर्थात-मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो। इस प्रकार हम प्रकाश के प्रति, सदाचार के प्रति, अमरत्व के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करते हुए आदर्श जीवन जीने का संकल्प करते हैं। आज के समय में चारों ओर फैले अंधेरे ने मानव-मन को इतना कलुषित किया है कि वहां किसी दिव्यता, सुंदरता और सौम्यता के अस्तित्व की कोई गुंजाइश नहीं बचती। परंतु अंधकार को चीरकर स्वर्ण-आभा फैलाती प्रकाश की प्राणशक्ति और उजाले को फैलाते दीपक की जिजीविषा अद्‍भूत है।
दीपावली का संदेश जितना अध्यात्मिक है उतना ही भौतिक भी है। राम, महावीर, दयानंद सरस्वती, नानकदेव आदी कई महापुरुषों के जीवन की विशिष्ट घटनाएँ इस पर को अलौकिक बनाती है। और सभी के ज्ञान का सम्मान दीपक के रूप में किया जाना सभी के आदर्षों को स्वीकार कर जीवन को उत्साह पूर्वक जीना इस पर्व को भौतिक रूप से समृद्ध करता है।(विभूति फीचर्स)

दीवाली में रॉनी रोड्रिग्स ने फिर दिखाई दरियादिली, दिया हाउसकीपिंग स्टाफ, सुरक्षा कर्मियों, कलाकारों को विशेष उपहार

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मुम्बई। भारत में दिवाली का त्यौहार सबसे बड़े पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह सभी भारतीयों के लिए एक विशेष त्योहार है और इसे हर धर्म के लोग बहुत उत्साह के साथ मनाते हैं, दीये जलाते हैं, रंगोली सजाते हैं, आतिशबाजी करते हैं जिससे पांच दिन पूरा समाज जगमग हो उठता है। पर्ल ग्रुप ऑफ कंपनीज, जिसमें हाल ही में पीबीसी एजुकेशन एंड फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड शामिल हुई है, के सीएमडी रॉनी रॉड्रिग्स पिछले कुछ वर्षों से इस त्योहार को अपने आसपास के वंचित लोगों के साथ मनाते आ रहे हैं और उन्हें विशेष उपहार के साथ आर्थिक सहयोग भी करते हैं। दीवाली के पूर्व उन्होंने सांताक्रुज पश्चिम स्थित पूरे धीरज हेरिटेज परिसर के हाउसकीपिंग स्टाफ, सुरक्षा कर्मियों और छोटे कर्मचारियों की खुशी का स्तर बढ़ाया, जहां पर्ल ग्रुप ऑफ कंपनीज और पीबीसी एजुकेशन एंड फाइनैंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के कार्यालय स्थित हैं।


रॉनी द्वारा आयोजित दीवाली स्नेह मिलन समारोह में अभिनेता दीपक तिजोरी, अभिनेता पंकज बेरी, आरती नागपाल, ज्योति सक्सेना, निर्माता नीलेश मल्होत्रा, गायक-अभिनेता अरुण बख्शी और संगीतकार दिलीप सेन उपस्थित रहे। उसी अवसर पर दीपक तिजोरी ने कहा, यह आश्चर्यजनक है कि आज के युग में भी रॉनी रॉड्रिग्स जैसे लोग दूसरे लोगों की खुशी को सबसे ऊपर रखते हैं। मैंने इन सभी लोगों के चेहरे खुशी से चमकते हुए देखे हैं। रॉनी रॉड्रिग्स का भाव प्रेरणादायक है और मैं इस दिलचस्प व्यक्तित्व से मिलकर अभिभूत हूं।


रॉनी रॉड्रिग्स एक फिल्म पत्रिका सिनेबस्टर भी प्रकाशित करते हैं। पत्रिका के संपादक कीर्ति कुमार कदम और प्रेस फोटोग्राफर रमाकांत मुंडे बताते हैं कि रॉनी सर लाखों में एकमात्र ऐसे दरियादिल बॉस हैं जो अपने ऑफिस बॉय, मैसेंजर, ड्राइवर आदि सहित पूरे स्टाफ को छुट्टी मनाने के लिए विदेश ले जाते हैं। इस वर्ष भी, वह पर्ल ग्रुप ऑफ कंपनीज, सिनेबस्टर मैगज़ीन और पीबीसी एजुकेशन एंड फाइनेंशियल सर्विसेज के कर्मचारियों को दिवाली मनाने के लिए लंदन ले जा रहे हैं।
रॉनी रोड्रिग्ज विनम्रतापूर्वक कहते हैं कि कुछ लेने के बजाय देने में विश्वास करता हूं। इन सभी लोगों से जो आशीर्वाद मुझे मिलता है उससे उत्कृष्टता प्राप्त करने की अतिरिक्त शक्ति मुझे मिलती है। ईश्वर ने मुझे वंचितों की मदद करने के लिए अपने दूत के रूप में चुना होगा। मैं इस अवसर पर आप सभी को दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं।

– संतोष साहू

धनतेरस धन्वंतरि देव की जयंती है धनतेरस की खरीददारी , उत्सव यानि देवता का दिन यानि शुभ दिन

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स्वाति व्यास – विभूति फीचर्स
हिन्दू धर्म आध्यात्म के मामले में अत्यंत सम्पन्न है। इसे संपूर्ण विश्व में आध्यात्म गुरू का दर्जा प्राप्त है। जिस धर्म
में तैंतीस करोड़ देवी देवताओं की मान्यता है वहां पूरा वर्ष उत्सवों और त्यौहारों से सजा-बंधा रहना कोई आश्चर्य की
बात नहीं। साथ ही भारत विविध धर्मानुयाइयों की आश्रयस्थली भी है अत: यहां वर्ष भर विविध धर्म व संप्रदायों के
उत्सव व त्यौहारों की छटा बिखरी रहती है। वर्ष के अंतिम अद्र्घांश से विशेषकर शारदीय नवरात्रि से ही भारतीय
जनमानस त्यौहारों की क्रमिक आमद के लिए तैयार हो जाता है। दुर्गा पूजा से लेकर देव उठनी एकादशी तक बाजार में
त्यौहारों की रौनक रहती है।

त्यौहार व उत्सव यानि देवता का दिन यानि शुभ दिन। इस दिन की गई खरीद-फरोख्त को जनमानस की विशिष्टï
स्वीकृति प्राप्त होती है। इसी परिप्रेक्ष्य में धनतेरस का िजक्र प्रासंगिक है। धनतेरस के विषय में हिन्दुओं की
मान्यता है कि इस दिन खरीददारी करना विशेष शुभ होता है।

धनतेरस धन्वंतरि देव की जयंती है। जी हां, ये वही धन्वंतरि हैं जो प्रसिद्घ गुप्त नरेश चंद्रगुप्त द्वितीय
विक्रमादित्य के नौ रत्नों में से एक थे। ऋग्वेद के उपवेद आयुर्वेद के रचयिता और आयुर्विज्ञान के प्रकाण्ड विद्वान।
ज्ञातव्य है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार में रस चिकित्सा के क्षेत्र में नागार्जुन और आयुर्वेद के क्षेत्र में धन्वंतरि ने
गुप्तकाल को स्वर्णयुग की उपाधि दिलाने में खासी भूमिका निभाई थी।

आयुर्वेद मूलत: प्राकृतिक माध्यमों के प्रयोग से स्वास्थ्य के विविध उपाय निकालने वाली चिकित्सा पद्घति है।
विविध औषधीय गुणों से युक्त पौधे एवं वृक्ष, उनकी छाल, पत्ते, फूल, फल, जड़ें, बीज और कंद भी आयुर्वेद में अपना
महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। स्पष्ट है यह प्रकृति व पर्यावरण से मानव को जोडऩे वाली चिकित्सा पद्घति है।
अनेक कहावतें कहती हैं कि स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है। धन्वंतरि इसी धन के रक्षक थे। इस संदर्भ में धन्वंतरि शब्द
में निहित धन का अर्थ स्वास्थ्य से है न कि लक्ष्मी से। किसी शब्द की गलत व्याख्या का एक उदाहरण प्रसिद्घ

समाजशास्त्री मैकिम मेरियट के शोध में भी मिलता है, जिसके अनुसार गोवर्धन शब्द का अर्थ है गायों का पोषण
वर्धन करने वाला (पर्वत) किन्तु आज उसे गोबर + धन के तौर पर गोबर का पहाड़ बनाकर मनाया जाता है।
भारतीय त्यौहारों के विषय में एक रोचक तथ्य यह भी है कि इसके अधिकांश उत्सव यथा मकर संक्रांति, बसंत पंचमी,
होली, बैशाखी, नवरात्र, दीपावली, ओणम आदि कृषि से जुड़े हुए हैं। चावल की फसल पर दीपावली है तो गेहं की फसल
पर बैसाखी। धनतेरस या दीपावली तक लगभग संपूर्ण भारत में या तो धान की फसल आ चुकती है या आने वाली
होती है। यही वह समय है जब किसान गाढ़े समय के लिए संग्रहित किया गया अनाज बाजार में बेचता है, क्योंकि एक
फसल तो लगभग तैयार ही हो चुकती है, अत: अपनी फसल बेचकर वह आने वाली फसल तक के लिए जरूरत का
सामान जुटाता है। आम तौर पर वर्षभर अभावग्रस्त रहने वाला किसान इस समय क्रयशक्ति रखता है।

हिन्दू धर्म में धनतेरस का अपना ही महत्व है। इसे मुख्यत: व्यापारियों, व्यवसायी वर्ग का त्यौहार माना जाता है। इस
उत्सव की मान्यता धन्वन्तरि देव से जुड़ी होने के कारण धनतेरस का चिकित्सक वर्ग में भी महत्व है। आम तौर पर
इस दिन खरीददारी करना अत्यंत शुभ माना जाता है, यही कारण है कि धनतेरस के मौके पर हाट बाजारों के अलावा
कपड़ा मार्केट, बर्तन भंडार और सराफा भी खासा गर्म रहता है। गिलासों के सेट से लेकर फर्नीचर, अलमारी, कूलर,
फ्रिज, पंखे, ए.सी., सायकल, मोटर सायकल, स्कूटर, कार, टी.वी., रेडियो, वी.सी.डी./डी.वी.डी. प्लेयर्स आदि समस्त
वस्तुओं की खरीददारी के लिए इस दिन का लगभग सारे साल इंतजार किया जाता है। धनतेरस के साथ यह मिथक
जुड़ा हुआ है कि इस दिन स्वर्ण खरीदने से सम्पन्नता आती है। इसकी पृष्ठभूमि में भी एक किसान खड़ा नजर आता
है, जो भारतीय समाज की वास्तविक मन:स्थिति को स्पष्ट करता है। यहां शासन द्वारा जारी की गई मुद्रा (करेंसी)
का निरंतर क्रमिक अवमूल्यन हो रहा है। स्वर्ण के मामले में यह गणना उल्टी हो जाती है, तब क्यों न गाढ़े समय के
लिए स्वर्ण खरीद कर भविष्य को सुरक्षित किया जाए। वस्तुत: यह विचार ही धनतेरस पर स्वर्ण की खरीदी को प्रश्रय
देता है, किंतु नौकरी पेशा व्यक्ति को, जिसे हर महीने बंधी-बंधाई तनख्वाह मिल रही है, पी.एफ. तथा पेंशन आदि की
सुविधाएं प्राप्त हैं उसे स्वर्ण खरीद कर जमा करने की आवश्यकता क्यों पडऩी चाहिए?

आज का बाजार इन मान्यताओं से भली-भांति अवगत है, यही कारण है कि दीपोत्सव के दौरान बाजार में अनेक
किस्म की ग्राहक पटाओ योजनाएं प्रस्तुत हो जाती है। नामी गिरामी कंपनियों की पैकेज डील योजनाएं यथा मात्र
15,000 रूपये में 52 सेमी. कलर टीवी. घर ले जाइये और साथ में ओटीजी मुफ्त उपहार पाइये… ऑफर सीमित समय के लिए… जल्दी कीजिए… कहीं मौका हाथ से निकल न जाए। वाशिंग मशीन के साथ वॉकमैन फ्री है तो टी.वी के साथ ट्रॉली। बाइक के साथ मोबाइल फ्री …. चाय के साथ बाउल फ्री, शैम्पू के साथ फेयरनेस क्रीम फ्री और तो और पत्रिकाओं के साथ भी आजकल कभी फेयरनेस सोप, कभी शैम्पू सैशे और कभी-कभी मैग्नेट या जायफल की माला फ्री दी जाने लगी है। अपना पुराना स्कूटर देकर नया वाहन प्राप्त करें। एक खरीदिये, दूसरा मुफ्त पाइये। एक गंजी बनियान के निर्माता ने एक जोड़ी की खरीद पर छ: मारूति ओमनी का ड्रॉ भी निकाला। लगता है ये अपना घर लुटाने पर तुले हैं।

पुन: यदि हर व्यक्ति सोना ही खरीदना चाहे तो बाकी बाजार ठप्प ही हो जाएगा, साथ ही सोना खरीदना सबकी क्षमता
के अंदर भी नहीं होता। अत: अन्य उत्पाद भी त्यौहारों के समय उपभोक्ता की जेब पर हमला बोलने को तैयार रहते हैं।
पहले स्वर्ण न खरीद पाने की दशा में लोग स्वर्ण जैसी दिखने वाली धातुओं यथा पीतल व कांसे के बर्तन खरीदा करते
थे। स्टेनलैस स्टील के आविष्कार के बाद रसोईघरों से कांसे व पीतल के बर्तन गायब होते चले गए और
अल्युमीनियम और स्टील उनके स्थानापन्न बन गए। आज भी मध्यमवर्ग का एक बड़ा भाग धनतेरस पर बर्तन
खरीदने को महत्व देता है। किंतु सारी भीड़ बर्तन बाजार ही खींच ले यह बाकी बाजार कैसे बर्दाश्त कर सकता है। अत:
इलेक्ट्रिकल्स, ऑटोमेटिक्स और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों से अटे पड़े गोदामों में हलचल सी आ जाती है। आज बाजार ने
हमारी नब्ज को पकड़ते हुए नवरात्रि से दीपावली तक के समय को खरीददारी महोत्सव में परिवर्तित कर दिया है।
दक्षिण भारत में यह खरीददारी महोत्सव ओणम के अवसर पर होता है, जिसकी उत्तर भारत को खबर भी नहीं होती।
खरीददारी महोत्सव की चकाचौंध एवं शोर में उत्सव की मूल भावना नेपथ्य में धकेल दी जाती है।

ख्यातिप्राप्त बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर स्वदेशी उत्पादों तक के अनेक लुभावने विज्ञापन, सुनहरे स्लोगन और
रूपहले दावे और वादे उपभोक्ता को भ्रमित कर देते हैं। हाल ही में किए गए एक सर्वे से ज्ञात हुआ है कि बाजारवाद की
हवा में बह कर अमेरिका व ब्रिटेन के संपन्न वर्ग ने अरबों डॉलर की ऐसी वस्तुएं अपने घरों में जोड़ रखी हैं जिनकी
लम्बे समय से पैकिंग तक नहीं खोली गई है। मात्र क्रयशक्ति प्रदर्शन हेतु और विज्ञापनों से प्रभावित होकर किया गया
फि$जूलखर्च। हर नयी वस्तु खरीदने की मनोव्याधि से ग्रसित पश्चिम इस बीमारी को निभाने लायक क्रयशक्ति भी
रखता है, वहां शॉपिंग जरूरत न होकर शगल है, लेकिन क्या भारतीय मध्यम व निम्न वर्ग मात्र चमकदार प्रचारों से
प्रभावित हो कर अपनी चुंधियायी आंखों के साथ बा$जार में घुस जाता है….? नहीं …… कतई नहीं। 1994 के गेट
समझौते के बाद भारतीय बाजार ने अपने द्वार विदेशी प्रोडक्ट के लिए खोल दिये, फलत: भारतीय बाजार विलासिता
से जुड़े सैकड़ों-हजारों सामानों से पट गया। किंतु प्रारंभिक दौर में इन मेहमानों को निराशा का सामना करना पड़ा। हम
फूटे पाइप की मरम्मत में विश्वास करते हैं। पंचर बनवाते हैं, टूट-फूट की रिपेयरिंग करवाते हैं, पुरानी दिखने लगी
गाड़ी की डेंटिंग पेंटिग करवाते हैं……. दूर क्यों जाएं रोजमर्रा में गोभी या बैंगन में इल्ली निकलने पर प्रभावित भाग
को काट कर फेंका जाता है न कि पूरी सब्जी को। यहां पर केवल मन भर जाने की वजह से फर्नीचर, वाहन, घर का पेंट
या अन्य उपकरण बदले नहीं जाते। हां, यह भी ध्यान देने योग्य है कि हम आवश्यकता के अनुसार धन खर्च करते हैं,
न सिर्फ करने के लिए धन खर्च करते हैं। यही कारण है कि आजादी के मात्र 75 वर्षों में हम चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था के
रूप में विश्व मंच पर उभरे हैं। फिर भी बाजार ने भारतीय उपभोक्ता की मानसिकता को बदलने के लिए आज नई
रणनीति तैयार कर ली है।

जाने कितने समय से भारत में दीपावली की रात जुआ खेलने की कुप्रथा जड़ें जमाए बैठी है। हमारे धर्मग्रंथों में जुए के
विरोध में लिखे उपदेश भी इस समय बेमानी हो जाते हैं। साल भर के संत भी इस दिन रस्म अदायगी के नाम पर
जुआरी बन ही जाते हैं। बाजार नई आक्रामक विपणन नीति में इस जुए को एक सशक्त प्रलोभन के रूप में प्रस्तुत

करता है। अपनी संशोधित, परिष्कृत व आक्रामक विपणन नीति तथा उच्च गुणवत्ता के कारण भारतीय बा$जार के
एक बड़े भाग पर मल्टीनेशनल्स ने कब्जा जमा लिया है और इसे चिरस्थायी या सदाजीवी बनाए रखने के लिए आज
बाजार ने त्यौहारों पर जुआ खेलने की पॉलिसी को खरीददारी का एक आवश्यक अंग बना दिया है। भारतीयों का
भाग्यवादी स्वभाव भी इस हेतु उत्प्रेरक का काम करता है। त्यौहारों के समय शायद ही ऐसी कोई बड़ी चीज उपलब्ध
होगी, जिसके साथ लकी ड्रॉ, स्क्रेच कार्ड, फ्री स्कीम, निश्चित उपहार, सौभाग्यवर्षा, नारियल फोड़ो, लूट लो, पटाखा
फोड़ो, हवा निकाल दे…., जीतो छप्पर फाड़ के, स्क्रेच एण्ड विन जैसी योजनाएं न हों।

वाशिंग मशीन या फ्रिज आदि की खरीददारी के साथ हर स्क्रेचकार्ड पर निश्चित उपहार…. लक्ष्मी आपके द्वार जैसी
लुभावनी पंक्तियों से प्रभावित और शोरूम में नुमाइश में रखी मोटर बाइक, टी.वी. आदि देखकर आप शोरूम में घुसते
हैं और निर्धारित कीमत चुका देने पर जब कार्ड स्क्रेच करते हैं तो उसमें 500 या 800 की (मुद्रित) कीमत वाला घटिया
सा वॉकमैन आपको सधन्यवाद थमा दिया जाता है। क्यों भाई…. आज तो सारी दुनिया में वॉकमैन की कोई पूछ ही
नहीं है, आपको ये वॉकमैन क्यों टिकाया जा रहा है। यदि आप इसे लेना अस्वीकार करें तो भी निर्धारित कीमत में से
500 या 800 रूपये मजाल है कि आपको वापस दिए जाएं। स्पष्टï है कि इस वॉकमैन की कीमत वस्तु में पहले से जुड़ी
है अर्थात यह फोर्स सेलिंग है। वास्तविकता यह है कि इन उपहार योजनाओं के माध्यम से मल्टीनेशनल्स आपको
अपने यहां का घटिया, बचा-खुचा और छंटा-छंटाया माल पकड़ा देते हैं। लेने वाला भी खुश कि चलो एक सामान फ्री
मिला और बेचने वाला भी कि भागते भूत की लंगोट सही। बुंदेलखंड में एक कहावत है कि जो न भाए आपको, देओ बहू
के बाप को। इसी तर्ज पर जो सामान और कहीं न बेचा जा सके वो यहां इम्पोर्टेड क्वालिटी का तमगा लगा कर कुछ
कम कीमत पर बेच दिया जाता है। फ्री स्कीम्स के जरिए मल्टीनेशनल्स भारतीय बाजार को डम्पिंग ग्राउंड बना रही
हैं। भारत में, त्यौहारों के देश में त्यौहारों से जुड़ी मान्यताएं उन्हें इस हेतु प्रोत्साहित भी करती है।
आज बाजार में एक ख्यातिप्राप्त कंपनी का माइक्रोवेव ओवन 6000 रूपये में उपलब्ध है साथ ही 4000 रूपये का एक
शानदार डिनर सेट, दस्ताने और कुकिंग स्पेशल सी.डी. भी खास आपके लिए…. ठीक है भाई….. हमें डिनर सेट नहीं
चाहिए, क्या आप 2000 रूपये में माइक्रोवेव दे सकते हैं….. जरा पूछ कर तो देखिए, नि:संदेह दुकानदार आपको बाहर का रास्ता दिखा देगा। 5990 रूपये के डी.वी.डी. प्लेयर के साथ 4000 रूपये की 10 डी.वी.डी. बिल्कुल मुफ्त मिल रही है पर बाजार डी.वी.डी. के बगैर 1990 रूपये में आपको प्लेयर नहीं देगा। आज बाजार आपको वह सामान भी थमा देता है जिसकी जरूरत आपको है ही नहीं।

भारतीय मध्यम व निम्न वर्ग सब्जी, किराना व अन्य $जरूरत के सामान लेने शॉपिंग करता है, शगल या शौक के
लिए उसके पास पैसा नहीं है। ऐसे में लुभावने झूठे विज्ञापनों व आक्रामक विपणन नीतियों द्वारा उसे जुआ खिलाना
और अनुपयोगी या कम उपयोगी वस्तुओं को खरीदने के लिए प्रेरित करना सरासर अनैतिक है। उपभोक्ता संरक्षण
अधिनियम 1986 के अंतर्गत यह दूषित व्यापार वृत्ति होने के कारण अवैध और आपराधिक है एवं दंडनीय भी है।

भारतीय उपभोक्ता को सामान बेचने का एक ही मूलमंत्र है कि सामान कम मुनाफे के साथ उन्हें बेचा जाए, उत्पाद की
कीमतें कम की जाएं।
चीन ने यह युक्ति आजमाई और भारतीय बा$जार को सस्ते खिलौने व अन्य इलेक्ट्रॉनिक आइटमों से पाट दिया। उसे
जबर्दस्त स्वीकार भी मिला लेकिन अतिशीघ्र घटिया गुणवत्ता के कारण वे चीजें भारतीय उपभोक्ता के दिमाग से उतर
गईं।
संदेश एकदम साफ है… भारतीय उपभोक्ता कम कीमत पर कम गुणवत्ता वाली वस्तु नहीं लेगा क्योंकि वह सस्ता रोए
बार-बार पर विश्वास करता है। महंगा खरीदने की उसकी क्षमता कम है अत: उच्च गुणवत्ता का सामान उसे उचित
कीमतों पर मिले। उसके साथ कोई लॉटरी या जुआ न हो, अनुपयोगी चीजें न थमाई जाए तो वह इन उत्पादों को जरूर
खरीदेगा।
यदि कोई वस्तु एक की कीमत पर दो बेची जा रही है तो आधी कीमत पर एक क्यों नहीं बेची जा सकती? खरीददार भी
तार्किक रूप से सोचे कि यदि धनतेरस के दिन कुछ खरीदने से घर में संपन्नता आती है, तो कुछ बेचने से विपन्नता
नहीं आएगी क्या? ऐसेे में दुकानदार तो कंगाल हो जाता होगा। यह आम आदमी के विश्लेषण का विषय है कि
धनतेरस पर व्यापारी-व्यवसायी कितना मुनाफा कमाते हैं। वस्तुत: धनतेरस खरीदने का नहीं बेचने का दिन है।
धन गंवाने का नहीं कमाने का दिन है। आधुनिक धन्वंतरि भी हर संभव तरीके से पैसा पीटने में लगे हैं। फिर आप क्यों
पीछे रहें…… हो सके तो अपने घर का कबाड़ा और अनुपयोगी वस्तुएं बेचकर कुछ धन कमा लें।
वैसे दीपावली सफाई का त्यौहार भी है। इस समय से गुलाबी जाड़ा आरंभ हो जाता है। प्रात: स्वच्छ हवा में टहलने का
संकल्प करें। इससे आपको उत्तम स्वास्थ्य का धन प्राप्त होगा, जो किसी भी ऊलजुलूल खरीददारी से कहीं बेहतर है।

दीपावली : गौ पूजन भारतीय संस्कृति में गाय

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डॉ. भुवनेश्वरी तिवारी – विभूति फीचर्स

धर्म’ भारतीय संस्कृति का मूलाधार है और हमारा देश भारत एक धर्मप्राण देश है। आचरण की दृढ़ता और कर्तव्य समुच्चय ही धर्म का स्वरूप है। धर्म व्यापक दृष्टि में यहां की हर वस्तु (जड़-चेतना) में देवत्व की प्रतिष्ठा है। भारतीय लोकसांस्कृतिक दृष्टि से 'गाय’ की महत्ता पर विचार करें तो इसका महत्व अक्षुण्य है। हमारी संस्कृति और समाज में गाय का सर्वोच्च स्थान है। पौराणिक ग्रन्थों में ;गाय’ की उत्कृष्टता सश्रद्ध है।

यथा- वेदादिर्वेदमाता च पौरूषं सूक्तमेव च।‘
त्रयी भागवततम् चैव द्वादशाक्षर एव च।
द्वादशात्मा प्रयागश्च काल: संवत्सरात्मक:।
ब्राम्हणाश्चाग्निहोत्रं च सुरभि द्र्वादशी तथा।
तुलसी च वसन्तश्च पुरूषोत्तम एव च।
एतेषां तत्वत: प्राज्ञेर्न पृथग्भाव इष्यते।
ऊंकार गायत्री, पुरुष सूक्त, तीनों वेद, श्रीमद भागवत, ऊं नमो भगवते वासुदेवाय-यह द्वादशाक्षर मंत्र, बारह मूर्तियों
वाले सूर्य भगवान, प्रयाग संवत्सर रूप, काल ब्राम्हण, अग्निहोत्र, गौ, द्वादशी तिथि, तुलसी, बसंत ऋतु और भगवान
पुरूषोत्तम इन सब में बुद्धिमान लोग वस्तुत: कोई अन्तर नहीं मानते।(श्रीमद् भागवत पुराण प्रथम खण्ड, अध्याय 3,
श्लोक क्रमश: 34, 35, 36)
नित्य प्रति गौ सेवा तुलसी चिंतन भागवत पाठ और भगवान चिन्तन के समान है। यथा-
उक्त भागवतं नित्यं कृतं च हरिचिंतनम्।
तुलसी पौषकं चैव धेनूनां सेवनं समम्।

(श्लोक 39 श्रीमद् भागवत प्रथम खण्ड अध्याय 3) जिस गऊ का स्थान ईश्वर के समकक्ष है वह नित्य सेवनीय,
वन्दनीय और पूज्यनीय है। भारतीय विश्वासानुसार गऊ भवसागर पार करने की नौका है। गऊ दान का महत्व जीवन
पर्यन्त है।
गऊ दान मृत्यु के समय एक पुनीत कार्य माना गया है। इतना ही नहीं वह धर्म अर्थ काम मोक्ष चारों पुरूषार्थ को देने
वाली है। हमारे धर्म ग्रन्थों में वर्णित आख्यानों के अनुसार जब पृथ्वी अनीति अत्याचार के भार से अधिक दुखी हुई
तब वह गऊ का रूप धारण करके ही भगवान विष्णु के पास गई थी और अपने उद्धार की प्रार्थना की थी।देव स्वरूप
गाय’ के अंग-अंग में देवताओं का वास है। इसका वत्स 'बछड़ा’ वृषभ या बैल कहलाता है। भारत एक कृषि प्रधान देश है और कृषि में वृषभ का योगदान कितना महत्वपूर्ण है, यह किसी से छिपा नहीं है। कृषि उत्पादन की वृद्धि के साथ हमारी सम्पन्नता बढ़ी और फिर धीरे-धीरे हमारी सभ्यता में विकास हुआ। फलत: वृषभ और उसकी जननी गाय को समाज में ऊंचा सम्मान और पूजा का स्थान दिया गया, गाय हमारी माता कहलाई, और वृषभ हमारी शक्ति
सम्पन्नता और कल्याण का प्रतीक बन गया। इसकी भी पूजा की जाने लगी। दीपावली के दूसरे दिन 'गोवर्धन पूजा’ के दिन परिवार के सभी पशुओं को नहला धुलाकर, उनके सींगों में गेरू लगाकर उनका श्रृंगार किया जाता है, और उनकी पूजा की जाती है। इसे गौधन पूजा भी कहते हैं। आगे चलकर वृषभ का चिन्ह या चित्र बनाया जाने लगा, और
इसे शुभ तथा मांगलिक माना जाने लगा। शिव वाहन को नन्दी के रूप में अधिक मान्यता मिली थी और मिलती भी
क्यों न। शिव साक्षात कल्याण की प्रतिमूर्ति जो ठहरे और उस कल्याण का वहन करने वाला वृषभ उनका नन्दी,
इसलिए वृषभ को सम्मान देने के लिये प्राय: नन्दी कहा जाने लगा। जैसे सभी वानरों को हनुमान कह दिया जाता है।
इसीलिए गोपद, अथवा वृषभ पद को नन्दी पद कहा जाने लगा। यह नंदीपद सर्वथा मांगलिक है। जिसका संबंध किसी
विशेष धर्म, सम्प्रदाय अथवा जाति से न होकर संपूर्ण समाज के कल्याण से है। गाय का दुग्ध पोष्याहार है। अर्थाजन
का साधन है।  दूध, दही, घृत का व्यवसाय इसी के बल पर होता है। गोबर ईंधन के काम आता है, कृषि के लिये खाद के रूप में प्रयुक्त होता है। गौ मूत्र औषधीय तत्व है। पंचगव्य का एक अंग है। गाय पृथ्वी पर कामधेनु स्वरूपा है। जिसकी सेवा से मनोवांछित फल प्राप्त होता है। राजा दिलीप की गऊ सेवा विश्व विदित है। प्रागैतिहासिक प्रसंग आज भी प्रेरणादायक है। गाय की महिमा को दिग्दर्शित करती साहित्यकार न्यायविद रामचन्द्र शुक्ल की एक कविता यहां प्रस्तुत है-

संस्कृति की प्रतीक, भारतीयता का गौरव।
वैतरणी भव लोक की, तारती नरक रौख।
पयस्वनी, ममतामयी, वच्छवत्सला सुभदा।
संरक्षिका श्रद्धा विश्वास की निवारती विपदा।

जीवन की ज्योति पुंज, सुख स्वास्थ्य पोषिका।
मनोरमा शुभ श्यामा, धर्म सनातन उद्घोषिका।
धरती का स्वर्ग मन रमा रमणीय वर निरूपाय।
ऋद्घि-सिद्घि समृद्घि दायिनी धन्य पावन गाय। ऐसी सर्वथा मंगलमयी गाय वन्दनीय है। नित्य सेवनीय है।