महिला स्व-सहायता समूहों की होगी भागीदारी
कार्तिक आर्यन को लेकर ‘आशिकी 3’ का निर्देशन करने वाले हैं अनुराग बसु
मुकेश भट्ट और भूषण कुमार द्वारा निर्मित आशिकी के इस तीसरी कड़ी में प्रीतम का संगीत होगा
मुम्बई। 1990 में आई फिल्म आशिकी के साथ टी सीरीज और विशेष फिल्म्स ने अपनी पहली पार्टनरशिप की थी, और अब 32 साल बाद एक बार फिर निर्माता मुकेश भट्ट और निर्माता भूषण कुमार आशिकी 3 के लिए एक साथ आ रहे हैं। इस थर्ड इंस्टालमेंट को अनुराग बसु डायरेक्ट करेंगे और फिल्म का म्यूजिक प्रीतम कंपोज करेंगे। आप को बता दें कि इस फिल्म में लीड रोल में नज़र आयेंगे अभिनेता कार्तिक आर्यन। गणेश महोत्सव के इस पावन अवसर पर और उनके आशीर्वाद के साथ टीम ने इस कॉलेबोरेशन की जबरदस्त शुरुआत की है।
आशिकी के फ्रैंचाइजी, प्यार, रोमांस और रिश्तों के इर्द-गिर्द घूमती है और इसने आज तक सभी के दिलों में अपनी जगह बनाए रखी है। प्रेम कहानी और संगीत के जादू के साथ राज करने के लिए पूरी तरह तैयार है! लाखों दिलों की धड़कन माने जाने वाले कार्तिक आर्यन हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय फ्रैंचाइजी के थर्ड इंस्टालमेंट में मुख्य भूमिका निभाएंगे। जो इस देश के युवाओं द्वारा पसंद की जाने वाली एक टाइमलेस क्लासिक है।
निर्माता मुकेश भट्ट ने बताया कि आशिकी की रिलीज से एक दिन पहले 16 अगस्त 1990 की शाम, गुलशन जी और मैं बहुत घबराए हुए थे, अगले दिन सारे रिकॉर्ड ब्रेक हो गए और एक नया इतिहास रच दिया गया। आज भूषण, प्रीतम, अनुराग और कार्तिक के साथ, मैं सभी को इस बात का विश्वास दिलाना चाहता हूं कि आशिकी 3 पहले की तरह प्यार का जश्न मनाएगी।
निर्माता भूषण कुमार ने कहा कि जिन फिल्मों की कहानी और संगीत ने हमारे दिलों को छुआ है, उन्हें फिर से जीने का समय आ गया है! मुकेश जी के सहयोग से हमें आशिकी 3 की घोषणा करते हुए बेहद खुशी हो रही है जिसे मेरे ऑल टाइम फेवरेट निर्देशक अनुराग बसु डायरेक्ट करने जा रहे हैं। हमें कार्तिक से बेहतर अभिनेता नहीं मिल सकता था, जो इस समय एक सच्चे रॉकस्टार बन चुके हैं और बड़े अभिनेताओं के बीच दर्शकों का प्यार सिर्फ उन्हीं पर उमड़ रहा है। रोमांटिक म्यूजिकल में म्यूज़िक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, और प्रीतम के साथ हमारा लक्ष्य इसे और ऊंचा उठाना है। मैं इस ड्रीम टीम के साथ हमेशा से काम करना चाहता था और मुझे इस मैजिक के रीक्रिएट होने का बेसब्री से इंतजार है।
अभिनेता कार्तिक आर्यन ने कहा कि टाइमलेस क्लासिक आशिकी एक ऐसी फिल्म है जिसे देखकर मैं बड़ा हुआ हूं और आशिकी 3 पर काम करना एक सपने के सच होने के समान है मैं इस ऑपर्च्युनिटी और कोलेबोरेशन के लिए भुषण सर और मुकेश सर का आभारी हूं। मैं अनुराग सर के काम का बहुत बड़ा फैन रहा हूं और उनके साथ जुडना निश्चित रूप से कई तरह से दिशा प्रदान करेगी।
निर्देशक अनुराग बसु ने कहा कि विशेष फिल्म्स के साथ काम करना सचमुच घर आने जैसा है और मुझे बेहद खुशी है कि मैं आशिकी 3 को डायरेक्ट कर रहा हूं। भूषण जी और मैं एक लॉन्ग स्टैंडिंग रिलेशनशिप शेयर करते हैं। वह एक सॉलिड सहयोगी है जिसे पाकर मैं खुद को सौभाग्यशाली महसूस करता हूं। आशिकी और आशिकी 2 प्रशंसकों के लिए एक इमोशन फिल्म रही है जो आज तक दिलों में बनी हुई है। इसका उद्देश्य विरासत को बेहतरीन तरीके से आगे बढ़ाना है। यह कार्तिक आर्यन के साथ मेरा पहला वेंचर होगा, जो अपने काम के प्रति अपनी कड़ी मेहनत, समर्पण, धैर्य और दृढ़ संकल्प के लिए जाने जाते हैं और मैं वास्तव में इसके लिए उत्सुक हूं।
संगीतकार प्रीतम ने कहा कि आशिकी की फ्रैंचाइज़ी अपने बेहतरीन संगीत के लिए जानी जाती है और मैं इस अद्भुत फ्रैंचाइज़ी का हिस्सा बनकर वास्तव में बेहद खुश हूँ और इसे अगले स्तर पर ले जाने की पूरी कोशिश करूँगा।
रामकमल मुखर्जी की ‘नटी बिनोदिनी’ बनी बॉलिवूड अभिनेत्री रुक्मणी मैत्रा
मुम्बई। बंगाल रंगमंच की दिग्गज अदाकारा बिनोदिनी दासी की जीवनी पर आधारित फिल्म ‘नटी बिनोदिनी’ का निर्माण शैलेन्द्र कुमार, सूरज शर्मा और प्रतीक चक्रवर्ती करने जा रहे हैं। यह बायोपिक देव इंटरटेनमेंट वेंचर की प्रस्तुति होगी।
शिक्षक दिवस के शुभ अवसर पर फिल्म निर्देशक राम कमल मुखर्जी ने अपनी बहुचर्चित बायोपिक ‘बिनोदिनी एकती नातिर उपाख्यान’ के मुख्य कलाकारों की घोषणा की। बंगाल की जानी मानी अदाकारा रुक्मिणी मैत्रा इस बहुप्रतीक्षित भूमिका को रुपहले पर्दे पर निभाएंगी। फिल्म के निर्माताओं ने फिल्म का पोस्टर जारी कर दिया है जिसमें रुक्मणी मैत्रा श्री चैतन्य महाप्रभु की भूमिका में दिखेंगी। इस भूमिका को बिनोदिनी दासी ने रंगमंच पर निभाया था। रंगमंच पर निभाई इस भूमिका को बिनोदिनी दासी ने नए मुकाम पर पहुंचाया था। जो दर्शकों के मन पर सराहनीय और विशेष प्रभाव छोड़ता है।

एकता भट्टाचार्य ने मोशन पोस्टर का डिजाइन बनाया है। नीलायन चॅटर्जी ने मीडिया और दर्शकों के लिए म्यूजिक कंपोज किया है।
फिल्म का निर्माण मुम्बई बेस्ड प्रोडक्शन हाउस प्रमोद फिल्म्स, एस एस वन एंटरटेनमेंट और पी के एंटरटेनमेंट, ऐसोर्ट मोशन पिक्चर्स के सहयोग से कर रहे हैं। कहानी, पटकथा, संवाद प्रियंका पोद्दार ने लिखा है। उनका कहना है कि वह हमेशा से चाहती थी कि बंगाल के दर्शकों के लिए एक बेहतरीन और दिल छू लेने वाली कहानी लिखे। इस संगीतमय फ़िल्म के लिए पिछले दो साल से अच्छे बजट की प्रतीक्षा थी। इस समय मेरे साथ चट्टान की तरह केवल रुक्मणी मित्रा का ही साथ और विश्वास था। उन्होंने ‘सीजन ग्रीटिंग’ और ‘एक दुआ’ में मेरे काम को देखा और सराहा था। उन्हे विश्वास था कि बंगाली दिग्गज अभिनेत्री बिनोदिनी दास के सफर और दर्द को बखूबी एक सूत्र में पिरो सकती है ऐसा
बॉलीवुड फिल्म निर्देशक रामकमल मुखर्जी का कहना है | रुक्मणी मैत्रा का बिनोदिनी के रूप में चयन करके मुझे बहुत हर्ष हो रहा है। पिछले दो वर्षों से रुक्मणी मौन रहकर फिल्म से जुड़ी हैं और इसमें अभिनय कर रही है। उन्होंने उस समय के भारतीय क्लासिकल डांस को सीख कर और उस काल में स्त्रियों की दशा और उनकी सामाजिक स्थिति के बारे में पुस्तकों से पढ़कर अध्ययन किया। यह सब मेरे लिए एक अद्भुत सपने के सच होने जैसा था। मैं जनता था कि यह कहानी अलग विषय और दृष्टिकोण पर है लेकिन मैंने बिना किसी सवाल के उन पर पूर्ण विश्वास कर यह काम अपने हाथों में लिया।
रुक्मणी मैत्रा का कहना है कि गत दो वर्षों से कोरोना महामारी ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया है। इससे हमारे मनोरंजन उद्योग को सबसे अधिक नुकसान हुआ।लेकिन इस फिल्म को बनाने वाले एक प्रतिष्ठित बैनर और निर्माता और खासकर बोर्ड में देव के आने से यह फिल्म वास्तव में एक नया आयाम बनाएगी।
इस बायोपिक का फिल्मांकन सिनेमैटोग्राफर मोधुरा पालित द्वारा बंगाल और बनारस के खूबसूरत जगहों पर किया जाएगा और अगले साल (बंगाली न्यू ईयर) में रिलीज होगी। चूंकि यह एक पीरियड ड्रामा है इसलिए निर्माताओं को प्राचीन कालीन दृश्य को फिर से बनाने के लिए पर्याप्त समय की आवश्यकता होगी।
बंगाल के सुपरस्टार देव ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि राम कमल एक विशेष व्यक्तित्व के धनी और मुंबई के एक प्रतिभाशाली फिल्म निर्माता हैं। मुझे यह ज्ञात नहीं था कि वह रुक्मिणी के साथ इस फिल्म की योजना बना रहे थे। फिल्म के टीज़र पोस्टर साझा होने पर इसके बारे में जानकारी मिली। फिल्म के बारे में मुझसे छुपा कर रखा गया था। लेकिन जब मैंने इस प्रोजेक्ट को लेकर उनके जोश और जुनून को देखा तो पता चला कि वो एक क्रिएटिव व्यक्ति हैं। बिनोदिनी दासी जैसे अद्भुत विषय पर फिल्म को बनाने के लिए इनका बहुत आभार।हम इन दिनों ऐसी फिल्में नहीं बनाते हैं और ऐसी फिल्मों को बनाने में समय लगता है। रामकमल ने नाटी बिनोदिनी जैसे संवेदनशील विषयों को छूने का साहस किया जो सराहनीय है। मुझे यकीन है कि रुक्मिणी और राम कमल पर्दे पर जादू अवश्य बिखेरेंगे।
मुम्बई के प्रमोद फिल्म्स और दिग्गज फिल्म निर्माता प्रमोद चक्रवर्ती के पोते प्रतीक चक्रवर्ती का कहना है कि मैं फिल्म की कहानी और टीज़र से बेहद प्रभावित हूँ। मुझे पूरा भरोसा है कि यह बंगाली फिल्म्स इंडस्ट्री के लिए गेम चेंजर साबित होगा। रुक्मणी मैत्रा का जानदार अभिनय बिनोदिनी दास के चरित्र को जीवंत बना देगा। एक टीज़र शूट के लिए चरित्र को जीवंत करना, पूरी यूनिट की दक्षता के बारे में बहुत कुछ कहता है। चूंकि हमने भारतीय सिनेमा में निर्माता के रूप में 60 शानदार वर्ष पूरे किए हैं, इसलिए हमने रचनात्मक रूप से संतोषजनक और व्यावसायिक रूप से आशाजनक इस विषय पर साथ काम करने के लिए सोचा।
एस एस वन एंटरटेनमेंट के शैलेंद्र कुमार कहते हैं कि कोलकाता और बंगाल के साथ मेरा व्यक्तिगत संबंध है। चूंकि मैं एक गायक और संगीतकार हूं, इसलिए मैं हमेशा बंगाली कला और साहित्य का प्रशंसक रहा हूं। मैं निर्देशक राम कमल मुखर्जी के निर्देशन में उनकी पहली फिल्म ‘केकवॉक’ देखी। उसके बाद मैं उनसे जुड़ा और मैं जानता हूँ कि वह पिछले दो वर्षों से नाटी बिनोदिनी बनाना चाहते थे। जब उन्होंने मुझे कहानी सुनाई और मुझे रुक्मिणी जी की चैतन्य महाप्रभु के रूप में छवि दिखाई तो मुझे पूरा विश्वास हो गया कि यह फिल्म बेहद खास होगी।
पी के इंटरटेनमेंट के युवा निर्माता सूरज शर्मा ने कहा, यह बेहद खुशी की बात है कि फिल्म निर्माताओं ने रिस्क लेकर इस प्राचीन अनकही कहानी को बताया है। मैंने बिनोदिनी एकती नातीर उपाख्यान को सुना है और महसूस किया है कि इसकी भावना सभी महिलाओं के साथ जुड़ेंगी जिन्होंने इस पुरूष प्रधान समाज में उत्पीड़न को झेला है।
मेकर्स द्वारा फिल्म के कलाकारों और टेक्निशियन का चयन किया जा रहा है। गिरीश घोष, अमृतलाल, रामकृष्णा, कुमार बहादुर और रंगा बाबू जैसे पात्रों के लिए योग्य कलाकार की चयन प्रक्रिया भी जारी है।
– गायत्री साहू
जब रिश्ते हैं टूटते, होते विफल विधान। गुरुवर तब सम्बल बने, होते बड़े महान
मनुष्य के जीवन में जन्म से ही ज्ञान, विचारों, मूल्यों का क्रमिक विकास होता है, जो उसे अन्य पशुओं से अलग कर मनुष्य बनाता है। परिवार के बाद, शिक्षक इस विकास में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। हालांकि, भारतीय समाज में, शिक्षकों को बहुत उच्च सम्मान में रखा जाता है, प्राचीन काल से वे नैतिकता का प्रमुख स्रोत रहे हैं और समाज में शिक्षा को महत्व देंते रहे है। शिक्षकों ने पूरे समाज के लिए एक दार्शनिक-मार्गदर्शक-मित्र के रूप में कार्य करने के लिए अपने ज्ञान का इस्तेमाल किया, उनमें से कई ने सामाजिक बुराइयों के खिलाफ काम किया।
समकालीन दुनिया में भी, अकादमिक प्रतिभा के अलावा, वे नैतिकता के लिए खड़े हैं और हमारे अत्यधिक ग्रामीण और अनपढ़ समाज में, लोग शिक्षकों को अपने बच्चों के भविष्य के निर्माता के रूप में देखते हैं।
बच्चों के विकास में, शिक्षकों की आदर्श भूमिका सही मूल्यों और गुणों के प्रवर्तक और प्रेरक की होनी चाहिए। इस प्रकार, छात्रों को ज्ञान सीधे चम्मच खिलाने के बजाय, उन्हें बच्चों में पूछताछ, तर्कसंगतता की भावना विकसित करने का प्रयास करना चाहिए, ताकि वे अपने दम पर, जुनून के साथ सीखने के लिए सशक्त महसूस करें। साथ ही, शिक्षकों को अच्छे नैतिक मूल्यों जैसे सत्य, ईमानदारी, अनुशासन, नम्रता, धार्मिक सहिष्णुता, लिंग समानता आदि को बच्चों में विकसित करने का प्रयास करना चाहिए ताकि अच्छे इंसानों की नींव रखी जा सके।
समकालीन दुनिया में एक गहरे मूल्य संकट का सामना करना पड़ रहा है, अगर हमें विकसित और समृद्ध होना है, तो हमारे शिक्षकों की एक बड़ी भूमिका है। शिक्षक का मूल्य प्राचीन भारत के सुंदर श्लोक द्वारा स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है – गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरा:, गुरु साक्षात परम ब्रह्मा, तस्मै श्री गुरुवे नम:। जिसका अर्थ है “गुरु निर्माता (ब्रह्मा) हैं, गुरु संरक्षक (विष्णु) हैं, गुरुदेव संहारक (महेश्वर) हैं। गुरु स्वयं पूर्ण (एकवचन) भगवान हैं, उस श्री गुरु को नमस्कार” शिक्षक केवल पैसे के लिए पढ़ाने वाला नहीं है, पढ़ाने का जुनून बहुत आगे है।
यह हमारे समाज का कड़वा सच है कि कुछ शिक्षकों में वास्तव में पढ़ाने के लिए जुनून और ज्ञान नहीं है, ऐसे कई उदाहरण हैं जैसे बिहार के स्कूलों में क्या हो रहा है, अगर शिक्षक में शिक्षण की गुणवत्ता की कमी है तो हम छात्रों से क्या उम्मीद कर सकते हैं, शिक्षा प्रणाली में बदलाव की जरूरत है, एनसीईआरटी का पैटर्न पुराना है और इसे 2015 से संशोधित नहीं किया गया है। साक्षर शिक्षक होने चाहिए लेकिन शिक्षित शिक्षक भी होने चाहिए।
किसी भी बच्चे की पहली शिक्षिका माँ होती है, जिसके द्वारा बच्चा उन बुनियादी बातों को सीखता है जिनका उसके व्यक्तित्व पर मौलिक प्रभाव पड़ता है। शिक्षक के पास ज्ञान का पोषण करके अपने छात्रों के माध्यम से क्रांति लाने की शक्ति है। इसलिए शिक्षक छात्रों के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वह छात्रों को प्रेरित करके सही मार्गदर्शन करता है और छात्रों की जरूरतों और समस्याओं को भी समझता है और सर्वोत्तम समाधान प्रदान करके इसका समाधान करता है।
शिक्षक का मिलनसार स्वभाव वाकई काबिले तारीफ है। इस प्रकार एक शिक्षक में वे सभी गुण होते हैं जिनके द्वारा वह किसी भी छात्र को सर्वोत्तम शिक्षा प्रदान करके और उसे प्रेरित करके उसका भाग्य बदल सकता है। भारतीय समाज में गुरु का स्थान ऊँचे पद पर आसीन था।
शास्त्रों में, गुरु को अक्सर भगवान के समान माना गया है। यहां तक कि सामाजिक-धार्मिक सुधारकों ने भी अपने जीवन में गुरुओं की सर्वोत्कृष्टता पर टिप्पणी की। गुरु को न केवल एक मार्गदर्शक, शिक्षक, मित्र, सत्य साधक के रूप में देखा गया है, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति भी है जो ब्रह्मांड में किसी की क्षमता और स्थान को महसूस करने में सक्षम बनाता है।
बच्चे और मानव के भविष्य को आकार देने में शिक्षक की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण रही। वर्तमान में समाज ने मानवीय स्पर्श खो दिया है – करुणा, सहानुभूति, मूल उद्देश्य और सहिष्णुता का सार, अब समय आ गया है कि ऐसे मूल्यों को बच्चों में विकसित किया जाए।
इस संदर्भ में गुरु महत्वपूर्ण है। सामाजिक मूल्य, सद्भाव, उत्कृष्टता की भावना समय की मांग है। इसलिए शिक्षक की भूमिका केवल पाठ्य विकास तक ही सीमित नहीं है, बल्कि मानव आत्म के समग्र विकास तक – सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और प्रासंगिक – अधिकतम क्षमता की प्राप्ति के लिए है। भारत में अनादि काल से गुरु-शिष्य परम्परा विद्यमान रही है। शिष्यों के सभी मुद्दों के लिए गुरु एकल बिंदु संदर्भ हुआ करते थे और साथ ही वे मूल्यों और गुणों के प्रतीक थे और उन्हें विद्यार्थियों में स्थापित करना उनका कर्तव्य था।
नैतिक और नैतिक मूल्यों में बहुत उच्च आदर्शों पर नागरिकों का एक वर्ग बनाना, अहिंसा और सहानुभूति का प्रचार करना और विद्यार्थियों को गरीबी, दर्द और समाज की जरूरतों के प्रति संवेदनशील बनाना था। आजकल यह सब लुप्त हो रहा है और स्कूल रटने वाले लेकिन बौद्धिक पक्ष की कमी के साथ यांत्रिक छात्रों को पैदा कर रहे हैं। आधुनिक समय के शिक्षक स्वयं मूल्य प्रणालियों में अच्छी तरह से सुसज्जित नहीं हैं और अक्सर राजनीतिक विचारधाराओं के अग्रदूत होते हैं जो शिक्षण को प्रचार से बदल देते हैं और छात्रों और राष्ट्र दोनों के लिए खतरनाक होते हैं।
समय की मांग है कि शिक्षकों को उचित प्रशिक्षण दिया जाए और उन्हें सख्ती से निर्देश दिया जाए कि वे प्रचार में न उलझें, बल्कि संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता और समावेशिता के सिद्धांतों पर बच्चों के दिमाग का विकास करें। भारतीय समाज में शिक्षक को ईश्वर के समान स्थान दिया गया है। बच्चों के दूसरे अभिभावक माने जाने वाले शिक्षक की तुलना अक्सर अंधेरे में आशा के प्रकाश से की जाती है।
मनुष्य की नींव बनाने में उनके द्वारा निभाई गई बहुत महत्वपूर्ण भूमिका के कारण शिक्षक को बहुत उच्च स्थान पर रखा गया है। न केवल ज्ञान बल्कि वे व्यक्ति के नैतिक, सामाजिक मूल्यों के स्रोत भी हैं। भारत को गुरु-शिष्य संबंध की एक महान परंपरा विरासत में मिली है।
माता-पिता जन्म देते हैं शिक्षक छात्र को मूल्य और चरित्र सम्मान देते हैं। हमें याद नहीं है कि शिक्षक ने क्या पढ़ाया है लेकिन शिक्षक कैसा है, याद रहता है इसलिए शिक्षक रोल मॉडल बनकर इस उम्र में अनुशासन और चरित्र के मूल्यों को विकसित करता है, बच्चे जो देखते हैं उसे दोहराते हैं। शिक्षक को यह नहीं सिखाना चाहिए कि क्या सोचना है बल्कि कैसे सोचना है ताकि व्यक्तिगत लक्षण विकसित हों। शिक्षक को चाहिए कि वह बच्चे की सीमाओं को आगे बढ़ाए और उन्हें खुद का अन्वेषण करने में सक्षम बनाए। शिक्षक को प्रश्न करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करना चाहिए। लीक से हटकर सोच के कन्फ्यूशियंस ने वही किया और अब्दुल कलाम हमेशा प्रश्न उठाते रहे, सरल शब्दों में एक शिक्षक को बच्चों के आत्म विकास के लिए एक आईना रखना चाहिए।
-प्रियंका सौरभ
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)-127045
TMC सांसद अभिषेक बनर्जी के बिगड़े बोल लगाया गृह मंत्री अमित शाह पर गलत आरोप
नई दिल्ली: TMC सांसद अभिषेक बनर्जी आज कोयला घोटाला मामले में प्रवर्तन निदेशालय के समक्ष पेश हुए. इस पेशी के बाद अभिषेक ने एक बार फिर से बीजेपी पर निशाना साधा है. साथ ही उन्होंने बीजेपी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर गंभीर आरोप लगाए हैं. समाचार एजेंसी के अनुसार उन्होंने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा है कि, ‘मैं उनके सामने झुकने को तैयार नहीं हूं. जो हमसे राजनीतिक रूप से नहीं लड़ सकते, वे हमें डराने के लिए ईडी और सीबीआई का इस्तेमाल कर रहे हैं.’
उन्होंने आगे कहा कि, ‘यह कोयला घोटाला या मवेशी घोटाला नहीं है. यह गृह मंत्री घोटाला है. उन्हें इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी. बीएसएफ की मौजूदगी में गायों की तस्करी कैसे हो सकती है? गौ तस्करी का पैसा सीधे गृह मंत्री अमित शाह के पास गया.’
अभिषेक ने आगे कहा है कि, ‘अगर मेरे खिलाफ आरोप सही साबित होते हैं तो मैं मौत की सजा को स्वीकार करने के लिए तैयार हूं.’
केंद्रीय जांच एजेंसी ED ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के भतीजे अभिषेक बनर्जी से अनुप मांझी के कोयला घोटाले मामले में पूछताछ कर रही है.
मैं उनके सामने झुकने को तैयार नहीं हूं। जो हमसे राजनीतिक रूप से नहीं लड़ सकते, वे हमें डराने के लिए ईडी और सीबीआई का इस्तेमाल कर रहे हैं: अभिषेक बनर्जी, टीएमसी सांसद, कोलकाता
अभिषेक बनर्जी आज कोयला घोटाला मामले में प्रवर्तन निदेशालय के समक्ष पेश हुए। pic.twitter.com/i0oUeeshEB
— ANI_HindiNews (@AHindinews) September 2, 2022
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा है कि, ‘सिर्फ इसलिए कि मैंने राष्ट्रीय ध्वज के मुद्दे पर अमित शाह के बेटे पर हमला किया, मुझे ईडी या सीबीआई द्वारा धमकी नहीं दी जा सकती.’
खबरों के अनुसार, जांच एजेंसी ने अभिषेक बनर्जी की साली मेनका गंभीर को भी इस मामले में पांच सितंबर को पूछताछ के लिए नोटिस भेजा है.
मुश्किल में गुजरात का 4.50 लाख गौ वंश – सरकारी सहायता नहीं मिलने से 219 पांजरापोलों व 1418 गौ शालाओं की हालत पतली
सूरत. भोजन की तलाश में शहरों और गांवों की सड़कों पर भटक रहा गौ वंश आए दिन हादसों की वजह बन रहा। हाईकोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए गौवंश को सड़कों से हटाने का आदेश दिया है। इसके बाद से गौ संरक्षण और संवर्धन को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाली गुजरात सरकार समस्या का हल ढूंढने में लगी है।
पशु बाड़े बनाने की बात की जा रही है, हालांकि ये बाड़े कहां और कैसे बनेंगे इसको लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं हैं। मालधारी समाज (पशुपालकों ) पर भी शिकंजा कसा जा रहा हैं, जिसका विरोध हो रहा है। जानकारों की माने तो गौ वंश की इस स्थिति के लिए सरकार नीति जिम्मेदार है।
गत वर्ष सितंबर में भूपेंद्र पटेल के मुख्यमंत्री बनने के बाद सरकार ने चालू वित्त वर्ष 2022-23 में “मुख्यमंत्री गौ माता पोषण योजना” के तहत 500 करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की थी। जिसे प्रदेश की विभिन्न 219 पांजरापोलों व 1418 गौ शालाओं में आधारभूत सुविधाओं के विकास पर खर्च करने का प्रावधान रखा था। इन पांजरापोलों व गौ शालाओं में गौवंश की संख्या करीब 4.50 लाख हैं।
घोषणा के महीनों बाद भी सरकार ने इस योजना के तहत एक रुपया भी खर्च नहीं किया। इतना ही नहीं कोरोना काल में प्रति गाय 25- 30 रुपए की जो सहायता राशि मिल रही थी, उसे भी बंद कर दिया है। कोई सहायता नहीं मिलने से धार्मिक व सामाजिक ट्रस्टों के माध्यम से संचालित होने वाली इन पांजरापोलों व गौ शालाओं की हालत पतली हो गई हैं।
नोटबंदी, जीएसटी व उसके बाद कोरोना की मार पड़ने से अब इन्हें पर्याप्त दान भी नहीं मिल रहा हैं। पांजरापोलों को तो किसी तरह की कोई खास आमदनी भी नहीं होती। यहां ऐसे मवेशी व पशु-पक्षी लाए जाते हैं, जो बीमार होते हैं या फिर उनका कोई उपयोग नहीं होता। उनके भोजन के साथ उपचार का अतिरिक्त खर्च वहन करना पड़ता हैं।
सहायता राशि के अभाव में पांजरापोलों को अपनी बैंक एफडी तुड़वा कर किसी तरह खर्च चलाना पड़ रहा हैं। कई पांजरापोलें नए मवेशियों को लेने से कतरा रहीं हैं। वे मवेशी के साथ उस पर होने वाले खर्च की भी दान के रूप में मांग करती हैं।
पांजरापोलों व गौ शालाओं द्वारा और अधिक मवेशियों को नहीं लिए जाने से बिना मालिक के कई मवेशी भोजन की तलाश में सड़कों पर भटकने को मजबूर हैं। यदि सरकार पांजरापोलों और गौशालाओं को घोषित योजना का तुरंत लाभ देकर सक्षम बनाए तो सड़कों पर आवारा घूमने वाले मवेशियों को भी ठिकाना मिल सकता हैं।
नहीं मिल रहा जवाब
पांजरापोलों व गौशालालों में को घोषित 500 करोड़ सरकारी मदद नहीं मिलने पर हमने गौ सेवा व गौचर विकास बोर्ड व मुख्य मंत्री कार्यालय से संपर्क किया। बोर्ड प्रमुख ने बताया कि उन्होंने प्रोजेक्ट फाइल सीएम ऑफिस भेज दिया, लेकिन वहां से कोई फंड नहीं मिला है। वहीं सीएम ऑफिस से भी कोई जवाब नहीं मिला है।
– धर्मेश गामी ( भारतीय गौ रक्षा मंच, सूरत)
मेरी टर्म खत्म हो गई
500 करोड़ के खर्च की योजना गुजरात सरकार की है। गौ सेवा व गौचर विकास बोर्ड में मेरी टर्म खत्म हो गई है। शायद अभी कोई चेयरमैन नहीं है। इस लिए मैं इस बारे में कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं हूं।
मानव कल्याण में सहभागिता निभाती है ब्रह्माकुमारी
माउंट आबू। ब्रह्मकुमारी संस्था की स्थापना सन 1930 में लेखराज कृपलानी ने की, जिन्हें यह संस्था प्रजापिता ब्रह्मा मानती है।
दादा लेखराज अविभाजित भारत में हीरों के व्यापारी थे। वे बाल्यकाल से ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। 60 वर्ष की आयु में उन्हें परमात्मा के सत्यस्वरूप को पहचानने की दिव्य अनुभूति हुई। उन्हें ईश्वर की सर्वोच्च सत्ता के प्रति खिंचाव महसूस हुआ। इसी काल में उन्हें ज्योति स्वरूप निराकार परमपिता शिव का साक्षात्कार हुआ। इसके बाद धीरे-धीरे उनका मन मानव कल्याण की ओर प्रवृत्त होने लगा।
उन्हें सांसारिक बंधनों से मुक्त होने और परमात्मा का मानवरूपी माध्यम बनने का निर्देश प्राप्त हुआ। उसी की प्रेरणा के फलस्वरूप सन् 1937 में उन्होंने इस विराट संगठन की छोटी-सी बुनियाद रखी। सन् 1937 में आध्यात्मिक ज्ञान और राजयोग की शिक्षा अनेकों तक पहुँचाने के लिए इसने एक संस्था का रूप धारण किया।
इस संस्था की स्थापना के लिए दादा लेखराज ने अपना विशाल कारोबार कलकत्ता में अपने साझेदार को सौंप दिया। फिर वे अपने जन्मस्थान हैदराबाद सिंध (वर्तमान पाकिस्तान) लौट आए। यहाँ पर उन्होंने अपनी सारी चल-अचल संपत्ति इस संस्था के नाम कर दी। सन 1950 में लेखराज जी राजस्थान स्थित आबू पर्वत पहुंचे और योग साधना करते हुए प्रजापिता ब्रह्माकुमारी संस्था का मुख्यालय स्थापित किये। प्रारंभ में इस संस्था में केवल महिलाएँ ही थी। माउंट आबू में ब्रह्मकुमारी की मुख्य प्रशासिका जगदम्बा सरस्वती, दादी मनमोहिनी, दादी प्रकाशमणि, दादी जानकी, दादी हृदयमोहिनी, दादी रत्नमोहिनी रहीं। दादा लेखराज को ‘प्रजापिता ब्रह्मा’ नाम दिया गया। सभी ब्रह्माकुमारी द्वारा उन्हें शिव बाबा भी कहा जाता है। जो लोग आध्यात्मिक शांति को पाने के लिए ‘प्रजापिता ब्रह्मा’ द्वारा उच्चारित सिद्धांतो पर चले, वे ब्रह्मकुमार और ब्रह्मकुमारी कहलाए तथा इस शैक्षणिक संस्था को ‘प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय’ नाम दिया गया।
इस विश्वविद्यालय की शिक्षाओं (उपाधियों) को वैश्विक स्वीकृति और अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त हुई है।
ओम शांति
माउंट आबू से संवाददाता संतोष साहू
फिल्म निर्माता अशोक प्रसाद ‘अभिषेक’ को बेस्ट आईटी सर्विसेज के लिए इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स काउंसिल द्वारा मिला प्रतिष्ठित अवार्ड
इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स काउंसिल द्वारा बेस्ट आईटी सर्विसेज 2022 के लिए आईटी प्रोफेशनल अशोक प्रसाद अभिषेक को प्रतिष्ठित अवार्ड से सम्मानित किया गया। ह्यूमन राइट्स काउंसिल के एंटरटेनमेंट क्षेत्र के अध्यक्ष सोनू कुंतल के हाथों अशोक प्रसाद अभिषेक को यह ट्रॉफी मिली। कोलकाता के मूल निवासी अशोक प्रसाद ‘अभिषेक’ ने लंदन से उच्च शिक्षा हासिल की। अशोक प्रसाद ‘अभिषेक’ को आइटी बिजनेस और इवेंट मैनेजमेंट का कमाल का अनुभव है और अपने कार्यों में वह उन सभी एक्सपीरियंस का भरपूर इस्तेमाल करते हैं। यही वजह है कि इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स काउंसिल द्वारा अशोक प्रसाद अभिषेक को बेस्ट आईटी सर्विसेज 2022 के लिए प्रतिष्ठित अवार्ड से सम्मानित किया गया है। वह इस सम्मान को पाकर बेहद उत्साहित हैं।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी अशोक प्रसाद ‘अभिषेक’ ने सन 2000 में आईई एरा आईटी से अपनी जर्नी स्टार्ट की, आईई एरा ट्रेंडिंग कंपनी का निर्माण कर के उन्होंने अपनी व्यवसायिक यात्रा को और अधिक विस्तार दिया।
फिलवक्त अशोक प्रसाद ‘अभिषेक’ फिल्म निर्माण के क्षेत्र में क्रियाशील हैं। वो अपने बैनर आईईव एरा फिल्म्स के बैनर तले हिंदी सहित कई रीजनल भाषाओं की फिल्मे भी प्रोड्यूस कर रहे हैं। उन्होंने रवि किशन, दिनेश लाल यादव निरहुआ और मनोज तिवारी सहित कई चोटी के कलाकारों के साथ काम किया है। वह कई बेहतरीन शार्ट फिल्मों के जाने-माने निर्माता और निर्देशक भी हैं। हाल ही में उन्होंने भोजपुरी फिल्म जगत के चर्चित सिंगर व अभिनेता दिनेशलाल यादव निरहुआ के जीवन वृत पर आधारित भोजपुरी की पहली बायोपिक फिल्म ‘ अभिनेता से राजनेता’ के निर्माण की घोषणा की है। यह फ़िल्म बहुत जल्द ही फ्लोर पर जाने वाली है।
संतोष मिश्रा इसके लेखक और निर्देशक हैं। इस फिल्म में दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ के साथ रवि किशन और मनोज तिवारी भी विशेष भूमिका में होंगे। वहीं पाखी हेगड़े और आम्रपाली दुबे भी इस फिल्म का विशेष आकर्षण होंगी।
प्रस्तुति : काली दास पाण्डेय
दिहाड़ी मजदूरों की समस्याओं को लेकर फिल्म स्टूडियो सेटिंग एंड अलाइड मजदूर यूनियन की राज्यपाल से भेंट
मुम्बई। फिल्म निर्माण क्षेत्र में कार्यरत दिहाड़ी मजदूरों की विभिन्न समस्याओं के संबंध में फिल्म स्टूडियो सेटिंग एंड अलाइड मजदूर यूनियन के जनरल सेक्रेटरी गंगेश्वर लाल श्रीवास्तव ने महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मिलकर उन्हें एक ज्ञापन सौंपा। गंगेश्वर लाल ने इस अवसर पर राज्यपाल का ध्यान दिलाते हुए कहा कि फिल्म निर्माण में काम करने वाले दैनिक वेतन भोगी प्रवासी मजदूरों की स्थिति बहुत कठिन है। गरीब दिहाड़ी मजदूरों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हमारे दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलता है और वे पीएफ, ग्रेच्युटी, ईएसआईसी जैसी सभी योजनाओं से वंचित हैं। यह बड़े खेद की बात है कि ये मजदूर दिन-रात मेहनत कर राज्य के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था में भी अपना योगदान दे रहे हैं लेकिन खुद सरकारी सुविधाओं से वंचित हैं। हाल ही में, फिल्म निर्माता तानाशाहों की तरह व्यवहार कर रहे हैं और श्रमिकों को दो-तीन महीने के लिए अपनी मेहनत की कमाई दिए बिना 20-24 घंटे काम कर रहे हैं। कई निर्माता साल-दर-साल पैसे का भुगतान करने में चूक करते हैं।गंगेश्वरलाल श्रीवास्तव ने यह भी कहा कि फिल्म निर्माता करोड़ों रुपये कमाते हैं लेकिन दिहाड़ी मजदूरों को समय पर भुगतान नहीं करते हैं। ऐसे निर्माताओं के खिलाफ आवाज उठाने वाले मजदूरों को या तो नौकरी से निकाल दिया जाता है या उनके खिलाफ झूठी शिकायत कर पुलिस कार्रवाई की जाती है। मज़दूरों का यह उत्पीड़न जारी है और पुलिस अधिकारियों की मनमानी के कारण निर्माता मज़दूरों को भुगतान किए बिना आसानी से भाग जाते हैं। कई निर्माता हैं जो हमारे कामगारों का कई तरह से शोषण कर रहे हैं। श्रमिक मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। सेट पर काम करते समय उन्हें अच्छा खाना नहीं दिया जाता है, साथ ही इन श्रमिकों को अक्सर दुर्घटनाएं और गंभीर चोटें आती हैं क्योंकि वे बहुत ऊंचाई पर काम करते हैं। ऐसे में न तो सेट पर आपातकालीन चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है और न ही सेट पर एम्बुलेंस की व्यवस्था। कई बार समय पर चिकित्सा सहायता न मिलने के कारण श्रमिकों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। बीएमसी, फायर ब्रिगेड या अन्य सरकारी विभागों द्वारा सेट का नियमित ऑडिट समय-समय पर सेट पर किया जाना अनिवार्य है। हालांकि, कोई भी निर्माता नियम का पालन नहीं कर रहा है और सेट पर कोई नियमित ऑडिट नहीं किया जाता है। यहां निर्माता केवल धनबल का उपयोग करके बिना किसी प्रतिबंध के श्रमिकों के जीवन से खेल रहे हैं। हाल के दिनों में कई आग दुर्घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें इन दिहाड़ी मजदूरों की जान चली गई है।
इन श्रमिकों और उनके परिवारों को किसी भी प्रकार की सरकारी सुरक्षा नहीं मिलती है। ये मजदूर आजीविका कमाने के लिए पलायन कर जाते हैं और उनके परिवार दूर-दराज के गांवों में रहते हैं। उक्त दिहाड़ी मजदूर यहां होने वाली आय से अपना व अपने परिवार का भरण पोषण कर रहा है। यदि श्रमिकों को उनका दैनिक वेतन मिलता है, तो वे इसमें से कुछ अपने परिवारों को खिलाने के लिए भेज सकते हैं। मजदूरों को साल-दर-साल मेहनत का भुगतान नहीं मिलेगा तो वे अपना और अपने परिवार का पालन-पोषण कैसे कर सकते हैं। यह एक गंभीर मुद्दा है और किसी भी सरकार ने इन मुद्दों पर कभी विचार नहीं किया और इसके लिए कोई ठोस समाधान नहीं दिया।
फिल्म स्टूडियो सेटिंग एंड अलाइड मजदूर यूनियन के जनरल सेक्रेटरी गंगेश्वर लाल श्रीवास्तव ने इस पत्र के माध्यम से राज्यपाल से अनुरोध किया है कि कृपया इन सभी मुद्दों पर गंभीरता से विचार करें और हमारे श्रमिकों को नियमित वेतन दिलाने में हमारी सहायता करें। यह विनम्र अनुरोध है कि संबंधित अधिकारियों और श्रम कार्यालय को दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को दैनिक आधार पर मजदूरी का भुगतान करने के निर्देश दिए जाएं।










