केंद्र सरकार ने जारी की सीएए की अधिसूचना, शरणार्थियों को मिल सकेगी नागरिकता
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आज नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) नियमों को अधिसूचित कर दिया है। इसके तहत शरणार्थियों को देश की नागरिकता मिल सकेगी।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आज नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) नियमों को अधिसूचित कर दिया है। इसके तहत शरणार्थियों को देश की नागरिकता मिल सकेगी।
नई दिल्ली. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और अन्य चुनाव आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति से रोकने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर की गई है. सरकार द्वारा इस सप्ताह के अंत में दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति किए जाने की उम्मीद है.
कांग्रेस नेता जया ठाकुर ने यह याचिका दायर करते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल की शर्तें) अधिनियम, 2023 के प्रावधानों को चुनौती दी है. उन्होंने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उनकी याचिका पर सुनवाई लंबित रहने के दौरान ‘निर्वाचन आयोग के एक सदस्य अरुण गोयल ने 9 मार्च 2024 को इस्तीफा दे दिया, जिसे राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी है.’ उन्होंने कहा कि उनकी याचिका पर 12 जनवरी को एक नोटिस जारी किया गया था.
कांग्रेस नेता ने क्या दी दलील?
याचिका में कहा गया है, ‘याचिकाकर्ता ने सम्मानपूर्वक कहा है कि तथ्यों के मद्देनजर लोकसभा चुनाव 2024 के लिए तारीखों की घोषणा जल्द ही की जा सकती है इसलिए नए निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की तत्काल आवश्यकता है, जिसके लिए इस अदालत ने नियुक्ति प्रक्रिया के बारे में ‘अनूप बरनवाल बनाम केंद्र सरकार’ (दो मार्च 2023 के फैसले) मामले में स्पष्ट निर्णय दिया है.’ इसमें कहा गया है, ‘इसलिए इस अदालत से अनूप बरनवाल बनाम केंद्र सरकार के मामले में पारित फैसले के अनुसार प्रतिवादियों को भारत के निर्वाचन आयोग के सदस्यों की तत्काल नियुक्ति करने का निर्देश देने का अनुरोध किया जाता है.’
नए कानून के अनुसार, ‘राष्ट्रपति एक चयन समिति की सिफारिश पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्त करेंगे. इस समिति में प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा में विपक्ष के नेता (सदस्य) और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री (सदस्य) होंगे.’ विपक्ष ने इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर चयन समिति से भारत के प्रधान न्यायाधीश को हटाकर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करने का आरोप लगाया है.
भारत में गाय को माता कहकर पुकारा जाता है, वहीं भारत के अंदर यूं तो गाय की कई नस्लें मौजूद हैं, लेकिन इनमें से भी कुछ नस्ल ऐसी हैं, जिनका इतिहास और हिंदू धर्म से एक अनोखा रिश्ता है। दरअसल हम बात कर रहे हैं कपिला गाय के बारे में | ये एक ऐसी नस्ल है, जो न केवल हिंदू आस्था के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि इसके जरिए प्राप्त दूध और अन्य उत्पादों से ओटिज्म जैसे रोगों से भी बचा जा सकता है। आज हम अपने इस लेख में कपिला गाय के महत्व से लेकर इससे जुड़ी कुछ जरूरी जानकारियां साझा करने जा रहे हैं जैसे – कपिला गाय की पहचान कैसे करें, कपिला गाय 1 दिन में कितना दूध दे सकती है, कपिला गाय कहां पाई जाती है और सस्ती कपिला गाय कैसे खरीदें आदि। ऐसे में अगर आप कपिला गाय से जुड़ी किसी भी तरह की जानकारी हासिल करना चाहते हैं तो इस लेख पर अंत तक बने रहें।
कपिला गाय की नस्ल सबसे पहले भारत में ही पाई गई थी, लेकिन ये सबसे पहले कर्नाटक में मिली थी या गोवा में इसके बारे में कुछ भी साफ नहीं कहा जा सकता। हालांकि जानकार कपिला गाय को दोनों ही स्थानों की गाय मानते हैं। कपिला गाय अपने गुणों के चलते आज देश के लगभग हर कोने तक पहुंच गई है।
कपिला गाय की नस्ल को गौंटी और गवती के नाम से भी जाना जाता है। इस नस्ल की गाय अधिकतर सफेद रंग की होती हैं, लेकिन इन्हें काले, ब्राउन या हल्के लाल रंग में भी देखा जा सकता है। कपिला गाय की नस्ल मध्यम आकार की होती हैं और इनका चेहरा सफेद एवं इनकी बोंहे भी सफेद होती हैं। इसके अलावा इस कपिला गाय की नस्ल का कूबड़ उठा हुआ होता है और इनका वजन 200 से लेकर 225 किलो तक जा सकता है।
कपिला गाय भारत की उन चुनिंदा नस्लों में से एक है जिन्हें पालना काफी सरल है। इन्हें अधिक आहार की आवश्यकता नहीं होती .
फरीदपुर के गांव पऊनगला में करीब 13 साल से जलकुंभी और अमर बेल से घिरा तालाब अमृत की एक-एक बूंद के लिए तरस रहा है। जिला प्रशासन ने अमृत योजना के तहत कई तालाबों को अमृत सरोवर में बदला लेकिन इस तालाब की अनदेखी की वजह से इसका अस्तित्व ही समाप्त नहीं हुआ बल्कि यह गोवंशीय पशुओं की कब्रगाह बन रहा है। जनवरी में कई गोवंशों को कुछ लोगों ने दौड़ा दिया, जिनमें से कई गोवंश तालाब में जाकर जलकुंभी और अमरबेल फंस गए और डूबकर उनकी मौत हो गई। अब तालाब से बदबू आने से स्थानीय लोग परेशान हैं। शनिवार को लोगों ने तालाब के पास जाकर विरोध भी जताया।
कुछ दिन से आबादी से घिरे तालाब में गोवंशीय पशुओं के सड़ने से तेज बदबू आ रही है। इससे ग्रामीणों का सांस लेना मुश्किल हो गया। ग्रामीणों ने कई बार तालाब की सफाई कराने के लिए मुख्यमंत्री हेल्पलाइन (1076) पर कॉल करने के साथ प्रधान और ग्राम विकास अधिकारी से शिकायत की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। शनिवार सुबह ज्यादा दुर्गंध आने पर तमाम महिलाएं तालाब के पास एकत्र हो गईं और सरकारी व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश जताया।
खंड विकास कार्यालय भुता स्थित नरेगा में कार्यरत एक कर्मचारी ने ग्राम प्रधान से लेकर सचिव और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन तक समस्या हल न होने पर अमृत विचार को गंभीर मामले से अवगत कराया है। कर्मचारी का कहना है कि कई दिनों से तालाब से आने वाली बदबू ने ग्रामीणों को रहना मुश्किल कर दिया है। साल 2010 में बसपा सरकार में इस तालाब की खुदाई हुई थी। पूरे गांव का गंदा पानी भी इसी तालाब में पहुंचता है। गहरे तालाब में जलकुंभी इतनी हो गयी है कि जानवर फंस जाए तो उसका निकलना मुश्किल है।
लोग पड़ने लगे बीमार, संक्रमण फैलने की आशंका
जनवरी में डूबकर मरे गाेवंशीय पशुओं में से तीन के शव तालाब के ऊपर दिख रहे हैं। कौवे मांस नोच रहे हैं और कुत्ते भी पहुंच रहे हैं। नाराज लोगों का कहना है कि लोग बीमार पड़ने लगे हैं। यदि अभी भी सफाई नहीं हुई तो संक्रमण फैलने से हालात और ज्यादा खराब हो जाएंगे। तालाब में आए दिन ग्रामीणों के पालतू पशु भी गिरते रहते हैं, जिन्हें बड़ी मुश्किल से निकाला जाता है।
गेहूं की फसल खाने गए गोवंश को लोगों ने दौड़ा दिए थे
ग्राम प्रधान सुखवंत सिंह की बागडोर संभालने वाले उनके भाई मुख्त्यार का कहना है कि तालाब के आसपास गेहूं की फसल खड़ी है। गोवंशीय पशु गेहूं की फसल खाने को जाते हैं तो गांव के लोग उनकी जान की फिक्र किए बगैर उन्हें दौड़ाया, जिस वजह से पशु गहरे तालाब में जाकर फंस गए और निकल नहीं सके। इससे उनकी मौत हो गई, जिन लोगों ने पशुओं को दौड़कर तालाब में किया था, यदि वह लोग बता देते तो शायद उनकी जान बच जाती। अब उनके शव पानी में सड़ गल गए और उतराने लगे, उसी से बदबू आ रही है। पुआल मंगाकर मोटा कर ढक दिया है। गोवंशीय पशुओं के शव बुरी तरह से गल गए हैं। उन्होंने अधिकारियों के लिए तालाब की जेसीबी से सफाई के लिए परमिशन लेने के लिए कागजी कार्रवाई कर दी है। कहा कि अब तक वह 31 गायों को दफना चुके हैं और चार गायों को आईवीआरआई भेज चुके हैं। तालाब काफी पुराना और गहरा है। तालाब में बेल की बेल बहुत लंबी-लंबी और घनी झाड़ियां हैं।
क्या कहते हैं पीड़ित ग्रामीण
यहां ये तीसरी बार है जब गोवंशीय पशु तालाब में ऊपर आए हैं और बदबू से यहां रुकना मुश्किल होता है। हमारा घर तालाब के पास ही है, जिससे बच्चों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है– सर्वेश कुमार।
ग्रामीणों के पालतू पशु तालाब में चले जाते हैं। पिछले सप्ताह हमारी भैंस भी तालाब में गिर गई थी, जिससे काफी मशक्कत के बाद निकालना संभव हुआ। यदि सफाई नहीं हुई तो कोई भी हादसा हो सकता है ।
संघ प्रिय गौतम
कई बार अधिकारियों से शिकायत करने के बाद भी समस्या का निस्तारण नहीं हुआ है। इस तालाब की सफाई 13 साल पहले हुई थी, उसके बाद कोई काम नहीं किया गया। अधिकारियों को इसकी सुध लेनी चाहिए- ममता सिंह।
सफाई में बोले बीडीओ और वीडीओ
बस्ती में पानी के मोटर और सबमर्सिबल घर-घर होने की वजह से लोग बेवजह पानी बहुत बर्बाद करते हैं। सारा पानी तालाब में जाता है। तालाब गहरा भी है। गांव जाकर प्रधान और गांव के लोगों के साथ बैठकर तालाब की सफाई के लिए कोई रास्ता निकालेंगे और साफ कराएंगे।
आदेश यादव, ग्राम विकास अधिकारी पाऊनगला
पांच महीने पहले गांव के लोगों ने कुछ गोवंशीय पशु दौड़ा दिये जो तालाब में जाकर फंस गए। अब शव ऊपर आए हैं। तालाब गहरा और खरपतवार से भरा हुआ है। बीच बस्ती में है समस्या बड़ी है फिर भी समस्या का समाधान करने में टीम के साथ लगा हूं-विनय शंकर मनी खंड विकास अधिकारी भुता।
Chhattisgarh News: गौ हत्या के विरोध में और गौ माता को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने को लेकर जगद्गुरु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अब सड़क तक लड़ाई लड़ेंगे. इस संकल्प को पूरा करने के लिए सनातनियों के सबसे बड़े धर्मगुरु अब सड़क पर उतरेंगे. इसकी शुरुआत उन्होंने भिलाई से की, जहां आज 10 मार्च को सुबह 10 बजकर 10 मिनट पर 10 मिनट के लिए संकेत स्वरूप धरना दिया. उन्होंने सभी देशवासियों से अपने-अपने स्थानों पर रहते हुए इसके लिए 10 मिनट के सांकेतिक भारत बंद का आह्वान भी किया था.
शंकराचार्य के मीडिया प्रभारी अशोक साहू ने बताया पूज्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज अपने आठ दिवसीय प्रवास पर छत्तीसगढ़ में हैं. इस प्रवास के दौरान उन्होंने प्रदेश के विभिन्न जिलों में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में पहुँचकर गौमाता को राष्ट्रमाता घोषित कराने चल रहे आंदोलन के लिए अपने-अपने स्थानों में रहकर सनातनियों से समर्थन मांगा है.
बता दें पूर्व में जगद्गुरु शंकराचार्य ने वृंदावन में गौ संसद का आयोजन कर गौमाता राष्ट्रमाता आंदोलन की शुरुआत की थी. फिर दिल्ली के एक सभागार में त्रिदिवसीय गौ संसद का आयोजन कर इससे संबंधित मांग पत्र मीडिया के समक्ष जारी किया गया था. इस आंदोलन में चारों पीठो के शंकराचार्यों की सहमति है.
इसके उपरांत श्रद्धालुओं को खीर का प्रसाद वितरित किया गया। इस अवसर पर श्री अखण्ड परशुराम अखाड़े के अध्यक्ष पंडित अधीर कौशिक ने केंद्र सरकार से गाय को राष्ट्रमाता का दर्जा देने की मांग की।
प्राचीन भारत के विचारकों ने गाय के महत्व को पहचाना था। उन्होंने पाया कि गाय की दूध स्वस्थ शरीर के लिए आवश्यक है,बैलों से खेती, आवागमन के साधन, एवं माल वाहन, गोमूत्र से खाद, कीटनाशक एवं औषिधिय उपयोग तथा भूमि की उत्पादकता बढ़ाने हेतु गोबर खाद ही उत्तम है।
जो आधारित कृषि की ग्राम स्वालंबन के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। उन्होंने गौ की महिमा मंडित करते हुए गाय को माता का स्थान दिया। गाय को धर्म में इस तरह गूंथ दिया की भारत के उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम क्षेत्र में अनेक धार्मिक मत-मतोतरों के होते हुए भी गाय को सभी ने पूज्यनीय माना।
भगवान श्रीकृष्ण भी गाय की सेवा करके गोपाल, गोविन्द आदि नामों से पुकारे गये। जब तक गौ आधारित स्वावलंबी खेती होती रही तब तक भारत विकसित धनवान राष्ट्र रहा, यहाँ की सम्पदा के लालच में दिया देशों को लोग भारत पर आक्रमण करते रहे .
गाँव में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए तथा कृषकों की आय में वृद्धि के लिए हमें पुन: गौ आधारित स्वावलंबी कृषि की ओर वापस जाना होगा। बदले हुए हालात में आज कम से कम गाय के दूध का उत्पादन बढ़ाकर तथा गोबर व गौमूत्र की प्रयोग से रासायनिक खाद व कीटनाशकों पर होने वाले खर्च व गौमूत्र के प्रयोग से रासायनिक खाद व कीटनाशकों पर होने वाले खर्च को बचाकर ग्राम लक्ष्मी का पुन: आह्वान किया जा सकता है।
विभिन्न देशों की गायों के दूध उत्पादन के आंकड़ों को देखकर ऐसा लगा कि विकसित राष्ट्रों के गायों का प्रति व्यात दूध उत्पादन विकासशील देशों की गायों के प्रति बयात दूध उत्पादन से कई गुना अधिक है। उदाहरण के लिए इजरायल में 9000 लीटर, अमेरिका में 7000 लीटर, हॉलैंड एवं जर्मनी में 6000 लीटर, जापान में 3000 लिटर दूध एक गाय एक व्यात में देती है जबकि भारत की एक गाय का औसत दूध उत्पदान विकास का पैमाना है। पंजाब, गुजरात, की गायें अधिक दुधारू हैं, ये प्रदेश भी विकसित हैं। म. प्र. में मालवा, निमाड़, मुरैना का गौधन दुधारू है अत: इन क्षेत्रों का किसान भी सम्पन्न है। इससे स्पष्ट है कि एक ब्यात में गाय का दूध जितना अधिक होगा, उतना ही सम्पन्न किसान, प्रदेश और राष्ट्र होगा। कृषि क्षेत्र में अब यह स्थिति आ गई है कि उत्पादन अब लगभग स्थिर हो गया है। उतनी ही उपज प्राप्त करने के लिए अब आदानों पर अधिक व्यय करना पड़ता है। परिवार के आकार बढ़ने से अब जोत के आकार भी छोटे होते जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में अब गौपालन ही एक ऐसा व्यवसाय बचा है जिसमें उत्पादन बढ़ाने की अपार संभावना है। अनुभव यह बतलाता है कि एक संकर गाय, औसत देखभाल में एक ब्यात्त में 1500 से 1800 लिटर दूध देती हैं जिसका मूल्य साधारण तथा एक एकड़ दो फसली क्षेत्र से प्राप्त उत्पादन के बराबर होता है। अत: किसान की आर्थिक हालत पता करने का यह भी एक पैमाना हो सकता है कि जिस किसा के पास जितनी दुधारू संकर गायें हैं, उसकी आमदनी उतनी ही एकड़ों में प्राप्त हो फसली क्षेत्र से प्राप्त आमदनी से होगी। गाय बढ़ाने के लिए गौपालन सर्वोत्तम साधन है।
जहाँ तक भैंस से प्रतियोगिता का प्रश्न है, विश्व में सबसे अच्छी भैंस केवल भारत में ही है। उनका एक ब्यात का दूध उत्पादन 1200 से 1500 लिटर रही है। भैंस के दूध को बढ़ाने की क्षमता सीमित है, उसमें सूखे के दिन अधिक होते हैं तथा उसका प्रजनन मौसमी होता है, उसके रख्राव का खर्च भी अधिक होता है, इसलिए भैंस एक अच्छी दुधारू गाय की तुलना में लम्बे समय तक नहीं टिक पायगी। अत: दूर दृष्टि से सोच कर गाय पालना ही लाभप्रद होगा .
गौपालन में लगे हुए उद्यमियों को निम्न बिंदूओं का ध्यान रखना आवश्यक है, अन्यथा लाभ में निरंतर कमी आती जाएगी।
क. प्रजनन
ख. आहार
ग. रोग नियंत्रण
गौवत्सों का पोषण सही तरीके से किया जाए तो वे 2.11 से 3 वर्षों की उम्र में गाय बन जायेंगे अन्यथा वे 4 से 5 साल की उम्र में गाय बनेंगे। यह स्थिति लाभप्रद नहीं हैं। गौवत्सों का पालन चिकित्सकों की राय से करें।
लेखा – पशु के दोध उत्पादन, दूध केने के दिन, सूखे दिन, दो बयात में अंतर, प्रजनन,उपचार आदि का भी लेखा- जोखा रखना चाहिए। इससे पशु के मूल्यांकन में सहायता मिलती है तथा कम लाभप्रद या अलाभप्रद पशु के छंटनी आसानी से की जा सकती है।
इसके अतिरिक्त गोबर व गौमूत्र का युक्ति- युक्त उपयोग कर रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर होने वाले खर्च को बचाकर आमदनी बढ़ाई जा सकती है। दूध एक ऐसा पदार्थ है जो जितनी भी मात्रा में उत्पादित किया जावे उसे बाजार मिलना ही है।
जैसे- जैसे समृद्धि बढ़ेगी, वैसे-वैसे भोजन में दूध से बने पदार्थ की खपत बढ़ेगी ही। अत: गौपालन को पूरक आ पूर्णकालिक व्यवसाय के रूप में अपनाकर किसान बंधु अपनी आय बढ़ाकर रोजगार के नये द्वार खोल सकते हैं।
स्रोत : जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची
Mukhyamantri Bal Gopal Yojana : जयपुर। राजस्थान के सरकारी स्कूलों में पहली से 8वीं तक के बच्चों को पाउडर दूध की जगह गाय का दूध देने की तैयारियां की जा रही थी। लेकिन, शिक्षा विभाग ने बच्चों को गाय का दूध उपलब्ध कराने वाले आदेश पर यू टर्न ले लिया है। बता दें कि शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के स्कूलों में दिए जाने वाले पाउडर दूध की जगह अच्छी व्यवस्था लागू करने की घोषणा करने के बाद बच्चों को गाय का दूध देने की तैयारी की जा रही थी।
शिक्षा विभाग ने बच्चों को गौ माता का दूध उपलब्ध कराने वाले आदेश पर यू टर्न लेते हुए सोशल साइट एक्स पर स्पष्टीकरण दिया। शिक्षा विभाग ने लिखा कि अशोक असीजा, एडिशनल डायरेक्टर माध्यमिक शिक्षा बीकानेर द्वारा 5 मार्च को आयुक्त राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद् को आवश्यक करवाई के लिए पत्र लिखा गया था। जिसमें राज्य के समस्त विद्यालयों में साफ-सुथरे शौचालय मय जल की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए कहा गया था। लेकिन, पत्र में विद्यालयों में छात्र-छात्राओं को गाय का प्राकृतिक दूध उपलब्ध कराने के कोई निर्देश नहीं दिए गए थे।
शिक्षा विभाग ने बताया कि मीड डे मील कार्यालय जयपुर से विद्यालयों में विद्यार्थियों को गाय का प्राकृतिक दूध उपलब्ध कराने के कोई निर्देश नहीं दिए गए थे। राज्य सरकार के स्तर से भी कोई ऐसा निर्देश नहीं जारी किया गया है और न ही कोई पत्र भेजा गया है। ऐसे में यह तो साफ है कि अभी बच्चोंं को स्कूलों में पाउडर वाला दूध ही पीना पड़ेगा।
शिक्षा विभाग ने स्कूलों में गौ माता का दूध सप्लाई करने और बच्चों को पाउडर के दूध से छुटकारा दिलाने के अधिकारियों को निर्देश दिए थे। लेकिन, शिक्षा विभाग के इस आदेश के बाद सवाल उठने लगे थे कि आखिर रोजाना इतना दूध कहां से आएगा? ऐसे में अब शिक्षा विभा को अपना आदेश वापस लेना पड़ा।
दरअसल, शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के स्कूलों में दिए जाने वाले पाउडर दूध की जगह अच्छी व्यवस्था लागू करने की घोषणा करने के बाद शिक्षा निदेशालय से लेकर आयुक्तालय मिड डे मील तथा राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद तक हरकत में आ गया था। माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने तो स्कूल शिक्षा परिषद के राज्य परियोजना निदेशक एवं आयुक्त को इस बारे में पत्र भी लिखा था। इसमें सरकारी स्कूलों में पाउडर वाले दूध के स्थान पर गौ माता का प्राकृतिक ताजा दूध उपलब्ध कराने के राज्य सरकार के निर्देशों का जिक्र किया गया था।
बता दे कि पहले गांव के बच्चों को गौपालक से दूध लेकर तथा शहरी स्कूलों के बच्चों को डेयरी का दूध दिया जाता था, लेकिन कोरोनाकाल में दूध वितरण योजना ठप हो गई थी। कोरोना के बाद जब इसे पुनः मुख्यमंत्री बाल गोपाल योजना के नाम से शुरू किया गया, तो पाउडर के दूध की सप्लाई देनी शुरू की। इस योजना के तहत अभी कक्षा एक से पांच तक के बच्चों को 15 ग्राम पाउडर दूध से 150 मिलीलीटर दूध तथा कक्षा छह से आठ के बच्चों को 20 ग्राम पाउडर दूध से 200 मिलीलीटर दूध मिलता है।