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अनंत अंबानी की ‘वंतारा’ ने मुंबई में वन्यजीव मूर्तियों का अनावरण किया

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                          अनंत भाई अंबानी द्वारा स्थापित ‘वंतारा’, प्रदूषण से लेकर आवास विनाश तक आधुनिक जीवन के व्यापक पर्यावरणीय परिणामों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए डिज़ाइन की गई एक नई सार्वजनिक कला पहल की शुरुआत की है। शुरआती दौर में पिछले दिनों अनंत भाई अंबानी की ‘वंतारा’ ने मुंबई में प्लास्टिक प्रदूषण के छिपे हुए खतरे को उजागर करने के लिए आकर्षक वन्यजीव मूर्तियों का अनावरण किया। 4 से 6 अक्टूबर  तक, मुंबई के प्रमुख स्थानों- कार्टर रोड, शिवाजी पार्क और जुहू बीच पर तीन वन्यजीव-प्रेरित मूर्तियां प्रदर्शित की गई, जिनमें से प्रत्येक मानव गतिविधि के कारण जानवरों के सामने आने वाली चुनौतियों को दर्शाती है। तार की जाली और स्थानीय रूप से प्राप्त सामग्रियों से बनी ये मूर्तियाँ न केवल कलात्मक अभिव्यक्ति हैं, बल्कि चिंतन का आह्वान भी हैं। प्रत्येक कलाकृति में वन्यजीवों को मानव अपशिष्ट के साथ बातचीत करते हुए दिखाया गया है, जो एक सूक्ष्म लेकिन मार्मिक अनुस्मारक है कि कैसे हमारी दैनिक आदतें- प्लास्टिक के उपयोग से लेकर शहरी विस्तार तक- पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करती हैं। एक इंस्टॉलेशन में एक एशियाई काले भालू को दिखाया गया है जिसका सिर एक फेंके गए प्लास्टिक कंटेनर में फंसा हुआ है, जो दर्शाता है कि कैसे जानवर अनजाने में मानव अपशिष्ट का शिकार बन जाते हैं। एक अन्य मूर्ति में प्लास्टिक में उलझे दो फ्लेमिंगो को दर्शाया गया है, जो प्रदूषण के कारण पक्षियों के आवासों में व्यवधान का प्रतीक है। जुहू बीच पर, समुद्री जीवन पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जिसमें जाल में फंसे और कचरे से घिरे कछुओं की एक सरल लेकिन आकर्षक मूर्ति है, जो समुद्री जीवों के सामने आने वाली चुनौतियों का प्रतिनिधित्व करती है।
यह पहल वंतारा के वन्यजीवों की रक्षा और पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करने के व्यापक मिशन को दर्शाता है। गुजरात में 3,500 एकड़ में फैले अपने अभयारण्य के साथ, वंतारा ने वन्यजीव बचाव, पुनर्वास और पुनर्वनीकरण के प्रयासों का नेतृत्व किया है, जिसने 1 मिलियन से अधिक जानवरों के संरक्षण और 100 मिलियन पेड़ लगाने में योगदान दिया है। ये प्रयास मानव प्रगति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बहाल करने के एक बड़े दृष्टिकोण का हिस्सा हैं। जहाँ मूर्तियाँ मुंबई के निवासियों को इस विश्व पशु दिवस पर विचार करने और चिंतन करने के लिए प्रेरित करती हैं, वहीं ‘वंतारा’ देश के नागरिकों को अपने पर्यावरणीय पदचिह्न पर पुनर्विचार करने और छोटे बदलाव करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
प्रस्तुति : काली दास पाण्डेय

गौ हत्या के आरोपियों पर चला हरिद्वार पुलिस का हंटर

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🔆 हरिद्वार पुलिस की कार्यवाही से गौ तस्करों में मची अफरा तफरी

गौ तस्करी करके अर्जित की संपत्ति, हरिद्वार पुलिस ने घर के चौखट दरवाजे भी उखाड़े, अब हो गए पैदल

🔆 दोनो आरोपी थाना भगवानपुर के हिस्ट्रीशीटर

“गौ हत्या के आरोपियों को किसी भी सूरत में बख्शा नही जाएगा:: एसएसपी”

गौ तस्करों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करने के साथ साथ गौ हत्या पर अंकुश लगाने हेतु एसएसपी हरिद्वार द्वारा कड़े दिशा निर्देश जारी किए गए हैं।

जिसके अनुपालन में पुलिस अधीक्षक ग्रामीण एवं क्षेत्रधिकारी मंगलौर के पर्यवेक्षण में थाना भगवानपुर में दर्ज मु0अ0सं0 85/2024 में वांछित आरोपी असलम उर्फ टांडा पुत्र सुल्तान व सनव्वर पुत्र सुल्तान निवासीगण ग्राम सिकरोड़ा के विरुद्ध माननीय न्यायालय से कुर्की के आदेश प्राप्त कर ग्राम सिकरोड़ा में अभियुक्तगणों के घरों की कुर्की गई और इनके घरों से तीन ट्रैक्टर, दो डीसीएम भर कर कुर्की का समान जब्त किया गया। खिड़की दरवाजों के चौखट भी उखाड़े गए।

गौ-तस्करी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर हरिद्वार पुलिस द्वारा साफ तौर पर आगाह किया गया है कि गौ तस्करों को किसी भी सूरत में बक्शा नहीं जाएगा। पुलिस से बचकर भागने का कोई फायदा नहीं, आज नहीं तो कल, जेल जाना ही होगा।

नाम पता आरोपी–
1.असलम उर्फ टांडा पुत्र सुल्तान निवासी ग्राम सिकरोडा थाना भगवानपुर हरिद्वार।
2.सनव्वर पुत्र सुल्तान निवासी ग्राम सिकरोडा थाना भगवानपुर हरिद्वार।

सरसंघचालक ने 13 नवंबर को गौ विज्ञान पर होने वाली परीक्षा का किया पोस्टर विमोचन

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बारां, 7 अक्टूबर।    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन राव भागवत ने रविवार को बारां में गौ विज्ञान अनुसंधान एवं सामान्य ज्ञान परीक्षा के पोस्टर का विमोचन किया।  इस दौरान मंच पर विमोचन के लिए सरसंघचालक डॉ. भागवत के साथ क्षेत्र संघचालक रमेश अग्रवालप्रांत संघचालक जगदीश सिंह राणाक्षेत्र गौ सेवा संयोजक राजेंद्र पामेचा और सह प्रान्त गौ सेवा संयोजक धनराज मालव भी उपस्थित रहे।

सह प्रांत गौ सेवा संयोजक धनराज मालव ने बताया कि इस परीक्षा का उद्देश्य गौ माता के प्रति छात्रछात्राओं में सेवा और सुरक्षा का भाव जगाना है। गौ माता का पंचगव्य और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। परीक्षा के माध्यम से गौ माता के संरक्षण व संवर्धन के लिए गौ उत्पाद पंचगव्यगौ काष्ठ आदि की व्यवसायिक एवं विज्ञान आधारित जानकारी विद्यार्थियों को होनी है। प्रदेश में वर्ष 2011 में पहली बार इस परीक्षा का आयोजन हुआ था और अब तक 8 बार आयोजित हो चुकी है। इस वर्ष यह परीक्षा 13 नवंबर 2024 को होनी है

अटूट आस्था का केंद्र है कर्ण की आराध्या माँ दशभुजी दुर्गा का मंदिर

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(कुमार कृष्णन-विभूति फीचर्स)
बिहार के मुंगेर का ऐतिहासिक माँ दशभुजी दुर्गा मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और श्रद्धा का केन्द्र है। शारदीय नवरात्र और बासंती नवरात्र में तो यहां भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है।भक्तों का मानना है कि देवी के मंदिर में जो भी भक्त श्रद्धा और भक्ति के भाव से आता हैं। उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं
माँ दशभुजी को कर्ण की आराध्य देवी माना जाता है। महादानी, महातेजस्वी एवं महारथी कर्ण महाभारतकालीन भारत के महानायकों में अपने शौर्य, और पराक्रमी राजा के रूप में प्रसिद्ध हैं। तत्कालीन अंगदेश के राजा के रूप में उनका अधिकांश समय मुंगेर में व्यतीत हुआ है। अपनी दानशीलता के लिए इतिहास के अमर व्यक्तित्व राजा कर्ण की अधिष्ठात्री देवी दशभुजी दुर्गा के नाम से आज भी मुंगेर में स्थापित है और उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर पर स्थित प्रसिद्ध शक्ति पीठ चंडिका स्थान में उनकी आराधना की कथा जनश्रुतियों में आज भी व्याप्त है। वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त बिहार योग विद्यालय के गंगा दर्शन को कर्णचौरा ही कहा जाता है। इसी कर्णचौरा से महाराज कर्ण प्रतिदिन सवा मन सोना दान किया करते थे जो उन्हें देवी की आराधना और अपने बलिदान के फलस्वरूप प्राप्त होता था।
कर्ण, पाण्डवों की माता कुंती के प्रथम पुत्र थे, लेकिन कुमारी अवस्था में उनका जन्म होने के कारण उन्हें एक दलित मां-बाप के बेटे के रूप में जाना गया। उनकी माता का नाम राधा और पिता का नाम अधिरथ था। अधिरथ राजा धृतराष्ट्र के यहां सारथी का काम करते थे। एक कथा के अनुसार राजा पृथु की पुत्री कुन्ती को महर्षि दुर्वासा के आदर-सत्कार का मौका मिला और उनके सत्कार से प्रसन्न हो ऋषि ने उन्हें ऐसा आशीर्वाद दिया कि वे किसी भी दिव्य शक्ति को अपने पास बुला सकतीं थीं। ऋषि से प्राप्त आशीर्वाद का प्रयोग कौतुहलवश कुन्ती ने सूर्य के आह्नवान से किया। सूर्य तुरंत उपस्थित हो गए और दोनों के ससंर्ग से कर्ण जैसा तेजस्वी और जन्मजात कवचकुण्डधारी पुत्र उत्पन्न हुआ। चूंकि कर्ण का जन्म कुन्ती की कुमारी अवस्था में ही हुआ अत: कुन्ती ने उसे नदी में प्रवाहित कर दिया जिसका राधा और अधिरथ के यहां पालन पोषण हुआ। इसी कारण कर्ण को सूत पुत्र तथा राधेय नामों से भी जाना गया। राजघराने का वारिस नहीं होने के कारण कर्ण को कई अवसर पर अपमान एवं तिरस्कार का सामना करना पड़ा। पांडवों की शिक्षा पूरी होने के उपरान्त शस्त्र विद्या के प्रदर्शन के समय कर्ण द्वारा दी गयी चुनौती इस कारण स्वीकार नहीं की गयी कि वह सूत पुत्र है। दुर्योधन ने इसी अवसर पर कर्ण को अंगदेश का राजा घोषित करते हुए उसके सिर पर राजमुकुट रख दिया। दुर्योधन के इस व्यवहार से कर्ण उनके ऋणी बन गए और जीवनपर्यन्त कर्ण ने इस कृतज्ञता का ज्ञापन मैत्री,समर्थन एवं सदैव सहयोग के लिए तत्पर रहकर किया ही, अपना बलिदान देकर भी अपने सत्चरित्र का परिचय दिया।
कर्ण और अर्जुन के बीच बैर भाव की नींव भी उसी समय पड़ गयी। मत्स्य भेदन के समय यह बैर और गहरा गया जब उसे सूतपुत्र कहकर द्रोपदी ने विवाह करने से इंकार कर दिया। फिर अर्जुन द्वारा मत्स्य भेदन करने पर द्रोपदी ने उनका वरण किया।
कर्ण की आराध्य देवी दशभुजी थीं। यह स्थान मुंगेर के मंगल बाजार में अवस्थित है। जन श्रुति है कि यहां स्थापित प्रतिमा महाभारतकाल की है, यह मूर्ति दानवीर राजा कर्ण की अधिष्ठात्री देवी की है। वर्तमान स्थिति में मूर्ति की स्थापना के लगभग तीन सौ वर्ष हो चुके हैं। पूरी मूर्ति काले रंग के एक ही पत्थर की बनी हुई है। नवरात्रि में लाखों भक्त यहां पूजा अर्चना करते हैं। यहां पर बलि प्रथा वर्जित है। पहले यह मूर्ति पूरबसराय के किसी स्थान पर थी जहां यह वर्षो तक अज्ञात पड़ी रही। कालान्तर में इसे अंग्रेजों के शासनकाल में बैलगाड़ी में छुपाकर ले जाया जा रहा था, परन्तु वर्तमान स्थान पर जहां मूर्ति स्थापित है उससे आगे बैलों ने चलना बंद कर दिया, परिणामस्वरूप लोगों ने इसे दैवी कृपा मानते हुए उस स्थान पर ही मूर्ति को स्थापित कर दिया, जहां एक विशाल मंदिर बनाया गया। मुंगेर स्थित शक्तिपीठ चण्डिका स्थान में कर्ण प्रतिदिन अपने को एक जलते तेल कड़ाह में डालते हुए देवी की आराधना करता था। इससे देवी प्रसन्न होकर कर्ण को सवा मन सोना देती थी तथा उसकी हर मनोकामना पूर्ण करने का वरदान देकर उसे श्री सम्पन्न बना देतीं थी। आज भी दशभुजी देवी, चण्डिका स्थान तथा मां गंगा के बीच एक त्रिकोण है जिसे एक तांत्रिक स्थल के रूप में जाना जाता है। यहीं पर कर्णचौरा के रूप में विख्यात स्थान मुंगेर बिहार योग विद्यालय बना है जो उसके तांत्रिक स्वरूप को और समृद्ध बना देता है। दशभुजी मंदिर का जीर्णोद्धार कर नया रूप दिया गया है। मंदिर का उत्तरोतर विकास हो रहा है। यहां साल भर लोग पूजा के लिए आते हैं लेकिन शारदीय नवरात्र पर भक्तों की जबरदस्त भीड़ उमड़ती है।
धनुर्विद्या में प्रवीणता के साथ कर्ण महादानी भी थे। उनकी दानशीलता अपने चरमोत्कर्ष पर तब पहुंची जब इंद्र द्वारा मांगे जाने पर उन्होंने अपने शरीर से छीलकर कवच और कुण्डल का दान किया और महाभारत युद्ध के समय कुन्ती की याचना पर उन्होंने अर्जुन को छोड़कर सभी पाण्डव पुत्रों के जीवन का अभयदान दे दिया। कर्ण का जीवनादर्श बड़ा उच्च कोटि का था। वे त्याग और मैत्री को सर्वाधिक महत्व देते थे और यही जीवन आदर्श उनको अति उच्च कोटि का मानव बनाता है। मैत्री को सर्वाधिक महत्व देने वाले कर्ण को महाभारत युद्ध से पहले कृष्ण ने उन्हें दुर्योधन को छोउ़कर युधिष्ठिर के साथ आने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन दिए। पांडवों का अग्रज बताकर सम्राट बनाने की बात कही, भारत का चक्रवर्ती राजा बनाने का वादा किया परन्तु कर्ण पर इस प्रलोभन का कोई असर नहीं पड़ा। वो तो हिमालय के समान अडिग थे, उन्हें दुर्योधन के हित के सिवा कुछ भी नहीं प्रिय नहीं था। एक बार का दुर्योधन द्वारा दिया गया सम्मान उन्हें चक्रवर्ती बनने से ज्यादा प्रिय लगा। राष्ट्रकवि रामधारी सिहं दिनकर ने अपनी रचना रश्मिरथी में कर्ण के संबंध में उल्लेख किया है:
हृदय का निष्कपट, पावन क्रिया का,
दलित तारक, समुद्धारक त्रिया था।
बड़ा बेजोड़ दानी था, सदैव था,
युधिष्ठिर ! कर्ण का अद्भुत हृदय था।।
कर्ण की दानशीलता ने महाभारत युद्ध की दिशा ही बदल दी। एक बार इंद्र को कवच कुण्डल देना और दूसरी ओर युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव को अभयदान देकर उन्होंने अपनी दानशीलता पर होने वाले आक्षेप से अपने को बचाया। कर्ण को भगवान कृष्ण के वास्तविक रूप का ज्ञान था,फिर भी अंत तक वे अपने सिद्धांत पर डटे रहे और उनके प्रतिपक्ष में ही बोलते रहे। महाभारत युद्ध की दो घटना कर्ण के चरित्र को और उद्धात बनाती है। अश्वसेन नामक सर्प जिसके पूर्वजों ने अर्जुन को समाप्त करने के लिए कर्ण के बाण से अर्जुन के पास भेजने का अनुरोध किया तो कर्ण ने ऐसी विजय से मृत्यु का वरण करना श्रेष्ठ माना और अश्वसेन को भगा दिया। इसी तरह युधिष्ठिर के मामा शल्य जो कर्ण के सारथी थे, भगवान कृष्ण की सीख पर बार-बार उन्हें दुर्वचनों से हतोत्साहित करते रहे ताकि कर्ण की ओजस्विता और रणकौशल धूमिल हो परन्तु इसका कोई प्रभाव उन पर नहीं पड़ा और वे अंत तक अपने पराक्रम के बल पर अपराजेय बने रहे। कर्ण का वध छलपूर्वक किया गया। गड्डे में फंसे अपने रथ के चक्के को बाहर कर रहे थे तो कृष्ण के उकसावे पर अर्जुन ने अनीति से उसका वध कर दिया। इस प्रकार अंग देश सम्प्रति मुंगेर के सत्यनिष्ठ, पराक्रमी, दानशील एवं तेजोमय व्यक्तित्व का अंत हुआ। (विभूति फीचर्स)

74 करोड़ से प्रदेश के गौ पालकों को स्वावलंबी बनाएगी योगी सरकार

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UP News: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के गौ पालकों की आय बढ़ाने, आत्मनिर्भर बनाने एवं स्वदेशी नस्ल की गायों के प्रति रुझान बढ़ाने के लिए नन्द बाबा दुग्ध मिशन के द्वितीय चरण को हरी झंडी दे दी है। ऐसे में योगी सरकार मिशन के तहत विभिन्न योजनाओं को परवान चढ़ाने के लिए वित्तीय वर्ष 2024-25 में 74 करोड़ 21 लाख रुपये खर्च करेगी। इससे प्रदेश के दस हजार से अधिक गौ पालकों को लाभ मिलेगा और उनकी आय में वृद्धि होगी।

2566 लाभार्थियों को मिलेगा मुख्यमंत्री स्वदेशी गौ संवर्धन का लाभ, खर्च होंगे 2052.40 लाख
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गौ पालकों की आय बढ़ाने एवं स्वदेशी नस्ल की गायों के प्रति रुझान बढ़ाने के लिए पिछले वर्ष नन्द बाबा दुग्ध मिशन को लांच किया था। सीएम योगी ने इस पंचवर्षीय मिशन के लिए 1 हजार करोड़ रुपये के फंड का प्राविधान किया था। इसी के तहत सीएम योगी ने मिशन के दूसरे चरण को हरी झंडी दे दी है। सीएम योगी के इस कदम से वर्तमान वित्तीय वर्ष में 2566 लाभार्थियों को मुख्यमंत्री स्वदेशी गौ संवर्धन योजना का लाभ मिलेगा। इसके लिए 2052.40 लाख का बजट प्राविधानित है।

इसी तरह मुख्यमंत्री प्रगतिशील पशुपालक प्रोत्साहन योजना का 7028 लोगों को लाभ मिलेगा। इसके लिए 790 लाख रुपये खर्च किये जाएंगे। वहीं नन्दिनी कृषक समृद्धि योजना का 90 लाभर्थियों को लाभ मिलेगा। इस योजना में 1015 लाख रुपये खर्च किये जाएंगे। इसके अलावा 330 प्रारंभिक दुग्ध सहकारी समितियों के गठन का लक्ष्य रखा गया है। इस मद में 722.70 लाख रुपये खर्च किये जाएंगे। गौ पालकों को पशु स्वास्थ्य एवं दुग्ध गुणवत्ता के लिए 621 परीक्षण किट वितरित की जाएंगी। इसके लिए 25 लाख की धनराशि आवंटित की गयी है। प्रदेश के डेयरी हित धारकों की डेयरी की क्षमता बढ़ाने के लिए 1447 डेयरी धारकों को प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिसके लिए 64.30 लाख रुपये खर्च किये जाएंगे।

नन्दिनी कृषक समृद्धि योजना पर खर्च किये जाएंगे 1730.08 लाख

मिशन के तहत साएलेज / हे / टीएमआर मेकिंग के अध्ययन एवं ट्रेनिंग नीड एसेसमेंट (टीएनए) की योजना के लिए 35 लाख आवंटित किये गये हैं। राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत संचालित एबीआईपी-आईबीएफ ईटीटी योजना का 200 लोगों को लाभ दिया जाएगा, जिस पर 25 लाख खर्च किये जाएंगे। नन्द बाबा दुग्ध मिशन पोर्टल को विकसित करने के लिए 60 लाख रुपये खर्च किये जाएंगे। वहीं नन्दिनी कृषक समृद्धि योजना (नवीन योजना) का 294 लोगों को लाभ दिया जाएगा। इस मद में 1730.08 लाख खर्च किये जाएंगे। इसके अलावा स्टेट प्रोग्राम मैनेजमेंट यूनिट (एसपीएमयू) के संचालन के लिए 237.60 लाख, डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम मैनेजमेंट यूनिट (डीपीएमयू) के 18 जनपदों में संचालन के लिए 214 लाख आवंटित किये गये हैं। इसके अलावा अति हिमीकृत वीर्य उत्पादन केंद्र, रहमानखेड़ा लखनऊ में बोवाइन पशुओं में सेक्स्ड सार्टेड सीमेन उत्पादन की परियोजना में प्रयोगशाला निर्माण के लिए 450 लाख खर्च किये जाएंगे।

गौ पालन से हो रही है अच्छी कमाई

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जहानाबाद: जिले के काको प्रखंड के महमदपुर काजीसराय के 25 वर्षीय युवा किसान बिट्टू ने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी और बड़े पैमाने पर गौ पालन शुरू कर एक सफल किसान बने. बिट्टू आज 17 गायों का पालन कर रहे हैं, जिनमें एचएफ, क्रॉस साहिवाल, गिर और देसी नस्ल की गायें शामिल हैं. उन्होंने 2023 में बड़े पैमाने पर गौ पालन की शुरुआत की और अब इससे अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं.

15 साल की उम्र में माता-पिता को खोया
बिट्टू ने अपने संघर्ष की कहानी बताते हुए कहा, जब मैं 15 साल का था, तब मेरे माता-पिता का निधन हो गया. 2014 में एक सड़क दुर्घटना में मां की मृत्यु हो गई और एक साल के भीतर पिता भी गुजर गए. हम चार भाई-बहन थे और सबसे बड़ा होने के कारण घर की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई. उस वक्त आर्थिक तंगी के कारण मैंने प्राइवेट नौकरी करनी शुरू की, लेकिन उससे बहुत ज्यादा आमदनी नहीं होती थी. कुछ सालों तक नौकरी की, फिर छोड़ दी और पूरा ध्यान पशुपालन पर केंद्रित कर दिया.

2023 में बड़े पैमाने पर शुरू किया गौ पालन
बिट्टू बताते हैं, शुरुआत में कुछ सालों तक 2-3 गायों से ही परिवार का खर्च चलाता था. फिर मैंने कृषि विज्ञान केंद्र गंधार से पशुपालन की ट्रेनिंग ली और 2023 में बड़े पैमाने पर गौ पालन शुरू किया. आज मेरे पास उन्नत नस्ल की 17 गायें हैं. इनमें 3 एचएफ (होल्सटीन फ्रिसियन) नस्ल की गायें शामिल हैं. इसके अलावा, मेरे पास गिर, क्रॉस साहिवाल और कुछ देसी नस्ल की गायें भी हैं.

गौ पालन से हो रही है अच्छी कमाई
बिट्टू का कहना है कि गौ पालन से अच्छी कमाई की जा सकती है. वर्तमान में उनकी गायें रोजाना लगभग 70 लीटर दूध दे रही हैं और आने वाले समय में यह उत्पादन और बढ़ने की उम्मीद है, क्योंकि कई गायें गाभिन हैं. उनकी एक गाय रोजाना 20 लीटर तक दूध देती है और जैसे-जैसे अन्य गायें तैयार होंगी, दूध उत्पादन बढ़ेगा. बिट्टू ने अपने गायों के लिए शेड तैयार किया है और उन्हें चोकर दर्रा, सरसों खल्ली खिलाते हैं. एक गाय पर सालाना लगभग 65,000 रुपये का खर्च आता है, लेकिन इससे होने वाली कमाई उससे कहीं अधिक है. बिट्टू की कहानी न केवल संघर्ष की मिसाल है, बल्कि यह भी दिखाती है कि पशुपालन में संभावनाओं की कोई कमी नहीं है. उनका यह सफर अन्य युवाओं के लिए भी प्रेरणा है.

25 अक्टूबर को देहरादून में गौ ध्वज यात्रा, अविमुक्तेश्वरानंद करेंगे शिरकत

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देहरादून: 25 अक्टूबर को देहरादून में गौ ध्वज को स्थापित किया जाएगा. इसमें गौ माता को राष्ट्रमाता घोषित करने का संकल्प लिया जाएगा. इस कार्यक्रम के लिए स्वामी शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद देहरादून पहुंचेंगे. देहरादून में जगदगुरु शंकराचार्य और गोपाल मणि महाराज गौ ध्वज की स्थापना कर गौ महासभा को संबोधित करेंगे. इसके बाद गौ ध्वज यात्रा दिल्ली रवाना हो जाएगी.

भारतीय गौ क्रांति मंच के पदाधिकारियों ने कहा गाय को पशु नहीं बल्कि माता की प्रतिष्ठा दी गई है. यही सनातन धर्मी हिंदुओं की पवित्र भावना है, इसी धार्मिक आस्था को लेकर और कानून में गाय को राज्य सूची से हटकर केंद्रीय सूची में प्रतिष्ठित कर गौ माता को राष्ट्र माता का सम्मान दिलाने के साथ ही गौ हत्या मुक्त भारत बनाने के उद्देश्य से गौ प्रतिष्ठा आंदोलन चलाया जा रहा है. ऐसे में ज्योतिष पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के मार्गदर्शन में समूचे भारत में गौ प्रतिष्ठा आंदोलन के तहत गौ ध्वज स्थापना यात्रा 22 सितंबर से 26 अक्टूबर तक होनी तय हुई है. ये यात्रा भारत के सभी 36 प्रदेशों की राजधानियों में पहुंचकर एक गौ ध्वज की स्थापना कर रही है.

यात्रा के राष्ट्रीय सहसंयोजक और उत्तराखंड राज्य के प्रभारी गौ भक्त विकास पाटनी ने कहा राज्य की हर राजधानी में विशाल गौ प्रतिष्ठा सम्मेलन का भव्य आयोजन किया जाएगा. जिसकी शुरुआत अयोध्या से होगी. उसके बाद पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण होते हुए 26 अक्टूबर को देश की राजधानी दिल्ली में यात्रा पहुंचेगी. 27 अक्टूबर को यह यात्रा वृंदावन में विराम लेगी. इस यात्रा के माध्यम से जगदगुरु शंकराचार्य भारत के सभी गौ भक्तों को सम्मानित भी करेंगे.

इसी कड़ी में उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में जगदगुरु शंकराचार्य और गोपाल मणि महाराज 25 अक्टूबर को दोपहर 12 बजे से 3 तक गौ ध्वज की स्थापना करके गौ महासभा को संबोधित करने जा रहे हैं. इसके बाद यात्रा के समापन दिल्ली में होगा. 7,8 और 9 नवंबर को तीन दिवसीय राष्ट्रव्यापी गौ प्रतिष्ठा महासम्मेलन भी आयोजित किया जाएगा, जो गाय को राष्ट्र माता की प्रतिष्ठा दिलाने के लिए निर्णायक होगा.

ऑटो में मांस और चमड़े की हो रही थी तस्करी

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Banswara News: बांसवाड़ा शहर में देर रात सड़क पर हंगामा हो गया. कुछ युवाओं ने सड़क से गुजर रहे एक ऑटो को रूकवाया, जिसके बाद मामला इस कदर बढ़ गया कि मौके पर पुलिस को पहुंचना पड़ा. ऑटो में मांस के साथ चमड़े के टुकड़े रखे हुए थे. इसे देखकर युवा भड़क गए और जमकर विरोध किया. मामला शहर के कस्टम तिराहे का है, जहां से गुजर रहे ऑटो में चमड़ा रखा हुआ था. करीब से गुजर रहे युवाओं को मांस की बदबू आई तो उन्होंने इसे रूकवाया. उन्होंने नवरात्रि (Navratri) के दौरान गौ मांस की तस्करी की आशंका जताई. हंगामा होने की सूचना पर राज तालाब थाना पुलिस मौके पर पहुंची और वाहन के ड्राइवर को थाने पर ले जाकर पूछताछ की.

रात 1.30 बजे गरबा खेलकर लौट रहे थे युवा

दरअसल, नवरात्रि के मौके पर शहरभर में गरबा की धूम है. रात 1:30 बजे कुछ युवा गरबा खेलकर ही घर लौट रहे थे. वह शहर के कस्टम तिराहे तक पहुंचे तो सामने से ऑटो आ रहा था. इस ऑटो में चमड़ा होने के चलते बदबू आई, इसके चलते युवाओं को गौमांस की तस्करी का शक हुआ. इस दौरान गौ रक्षक दल के कुछ सदस्य भी पहुंचे और उन्होंने इस पर आक्रोश जताया. सूचना मिलने के बाद थाना अधिकारी जाब्ते के साथ पहुंचे.

वाहन चालक समेत 2 डिटेन 

गाड़ी का रजिस्ट्रेशन नंबर दाहोद (गुजरात) का है. यह गाड़ी दाहोद से बांसवाड़ा आई थी और चमड़ा लेकर वापस दाहोद ही लौट रही थी. इस गाड़ी के ड्राइवर और एक अन्य सदस्य को पुलिस ने डिटेन कर लिया है. राज तालाब थाना प्रभारी दीपक कुमार ने बताया कि दोनों सदस्यों से पूछताछ जारी है. वहीं, बॉर्डर एरिया होने के चलते गुजरात और मध्य प्रदेश में तस्करी की सूचना अक्सर मिलती रहती है. युवाओं का गुस्सा यही है कि इस तरह की कार्रवाई नहीं रूक नहीं रही है.

दवाई वाला चारा खाते ही मर गई गौशाला की सैकड़ों गाय

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उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती की गौशाला में बीती रात डॉक्टरों की लापरवाही के चलते सैकड़ो गांव गायों की मौत हो गई. बताया जा रहा है कि गौशाला में कुछ गायों की तबीयत खराब थी डॉक्टरों ने आकर देखा और दवा दी. सभी गायों के चारे में डॉक्टर की दी गई दवा को मिला दिया गया, जिसके बाद एक के बाद एक गायों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया. इसके बाद देखते ही देखते गौशाला शमशान घाट में तब्दील हो गया और सैकड़ो गायों की मौत हो गई.

दवाई खाते ही मरने लगी गाय

जिस गौशाला में ये सब हुआ हुआ, वो श्रावस्ती जनपद के गिलौला विकासखंड के काशीपुर के मूसा गांव में है. जहां पर कल कुछ गायों की तबीयत खराब थी, डॉक्टर ने आकर गायों के स्वास्थ्य की जांच की और चारे में दवा मिलकर गायों को देने को चारे में दवा मिलाई गई, और गायों को खिला दी गई. जिसके बाद गौ आश्रम केंद्र शमशान घाट में तब्दील होने लगा. एक के बाद एक गायों की मौत का सिलसिला जो शुरू हुआ तो सैकड़ो गायों की मौत हो गई.

गायों की मौत से पूरे जिले में हड़कंप

गायों की मौत से पूरे जिले में हड़कंप मच गया. आनन फानन में गौ आश्रम पहुंचे डीएम और SP ने मौके की जांच शुरू की. डीएम ने कहा कि डॉक्टरों की टीम बुलाई गई है और उच्च स्तरीय जांच भी होगी जांच में दोषी पाए गए लोगों के ऊपर कड़ी कार्रवाई की जाएगी. वहीं स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ गायों को गौ आश्रम के चोरी से कर्मचारियों के द्वारा गड्ढा खोदकर दफना भी दिया गया. अब सवाल यही उठ रहा है कि गौशाला में हुई सैकड़ों गायों की मौत की जिम्मेदार कौन है.

राजनीति के नये मुद्दे जलेबी,चूरमा और लड्डू* 

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(राकेश अचल -विभूति फीचर्स)
आप मानें या न मानें लेकिन हकीकत ये है कि  कड़वाहट से भरे नेताओं को भी मिष्ठान प्रिय होते हैं,भले ही नेता मधुमेह के शिकार हों लेकिन मिष्ठान सामने आ जाये तो पीछे नहीं हटता । देश के पूर्व प्रधानमंत्री और ग्वालियर के सपूत अटल बिहारी वाजपेयी को बहादुरा के लड्डू और गुलाब जामुन प्रिय थे,हालांकि वे चाची के मंगौड़ों के भी मुरीद थे। जब तक अटल जी  रोग शैय्या पर नहीं गए थे तब तक इन लड्डुओं और मंगौड़ों  का सेवन करते रहे। वाजपेयी जी से मिलने वाले उनके रिश्तेदार हों या और कोई यदि उन्हें बहादुरा के लड्डू भेंट करते थे तो उनके मुखमंडल पर एक स्निग्ध मुस्कान तैरने लगती थी। पूर्व राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा जलेबी के शौकीन थे । वे राष्ट्रपति भवन में आगंतुकों को भी जलेबी ही खिलते थे।  
हाल ही में तिरुपति के प्रसादम में मिलने वाले लड्डुओं के विवाद के बावजूद ग्वालियर में न बहादुर के लड्डुओं के प्रेमियों की संख्या कम हुई है और न लखनऊ में ठग्गू के लड्डुओं की। लड्डू  है ही ऐसी मिठाई जिसे हर जाति और धर्म के लोग खाते हैं। लड्डू मेरे हिसाब से मिठाइयों का राजा है।  कायदे से उसे अब तक राष्ट्रीय मिष्ठान घोषित कर देना चाहिए था। मुमकिन है कि महाराष्ट्र  सरकार ने जैसे हाल ही में गाय को राज्य माता का दर्जा दिया है वैसे ही आने वाले दिनों में कोई लड्डू प्रेमी सरकार लड्डू को भी राज्य या राष्ट्र मिष्ठान का दर्जा दे दे। हमारे यहां दर्जा देना या पेरोल देना बहुत आसान काम है।
हरियाणा विधानसभा के चुनाव प्रचार में गोहाना पहुंचे लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता और  राहुल गांधी भी जलेबी नाम के एक मिष्ठान के मुरीद हो गए। गोहाना की चुनवाई सभा के  मंच पर राहुल गांधी ने मातूराम हलवाई की जलेबी का स्वाद चखा। दीपेंद्र हुड्डा ने राहुल गांधी को अपने हाथों ये जलेबी खिलाई। राहुल को  इसका स्वाद इतना पसंद आया कि उन्होंने एक डिब्बा अपनी बहन प्रियंका गांधी के लिए पैक करवा लिया। उन्होंने अपनी रैली में भी इस जलेबी का जिक्र किया। बता दें कि लाला मातूराम की जलेबी कोई सामान्य जलेबी नहीं है, इनका आकार सामान्य जलेबी से ज्यादा बड़ा है। एक जलेबी ढाई  सौ  ग्राम तक की होती  है।
जलेबी केवल हम भारतीयों को ही नहीं बल्कि भारत के बाहर तमाम इस्लामिक राष्ट्रों की जनता को भी प्रिय है ।  वे इसे हिन्दू मिठाई मानकर इसका तिरस्कार नहीं करते।  जानकार बताते हैं कि  जलेबी भारतीय उपमहाद्वीप व मध्यपूर्व की एक लोकप्रिय मिठाई  है। यह किसी कर्ण कुंडल की तरह ऐसी रसभरी होती है कि  आप इसे खाये बिना रह नहीं सकते । कोई इसे दूध में डालकर खाता है तो कोई रबड़ी डालकर । किसी को जलेबी दही के साथ खाना पसंद  है लेकिन खाते सब है।  कहीं जलेबी बहुत छोटे आकार की बनती है तो गोहाना में 250  ग्राम की एक।  सागर में तो जलेबी में मावा भरा जाता है।   स्वाद में मीठी और खमीर की वजह से हल्की सी खट्टी जलेबी की लोकप्रियता ऐसी है कि हमारे यहां सुंदर  महिलाओं का नाम तक जलेबी बाई भी रखा जाता है।जलेबी की लोकप्रियता का अंदाजा  आप इसी से लगा सकते हैं कि  हमारे यहां जलेबी बाई फ़िल्मी गीत भी है ,बेव सीरीज भी है और कार्टून श्रंखला भी ।
जलेबी की धूम मैंने अपनी अनेक विदेश यात्राओं में भी देखी। भारत के अलावा  बांग्लादेश, पाकिस्तान, ईरान के साथ समस्त अरब देेेशों में भी यह जानी-पहचानी है। मैंने तो स्पेन में भी जलेबी खाई। अमेरिका में तो जलेबी आसानी से मिल जाती है। जलेबी की तारीफ़ कर इसके जरिये रोजगार की बात कर राहुल गांधी भले ही अपने विरोधियों द्वारा ट्रोल किये जा रहे हों लेकिन इससे जलेबी का तो भला ही हुआ।वैसे भी हमारे राम जी सभी का भला करते हैं  ।
जलेबी के बाद आइये बात करते हैं चूरमा की । चूरमा राजस्थान का अघोषित राज्य मिष्ठान है और इसकी धूम देश-विदेश तक है ।  हाल ही में हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी भी चूरमा खाकर  न सिर्फ गदगद हो गए बल्कि उन्हें अपनी दिवंगत माँ की याद भी आ गयी । भारत के स्‍टार जैवलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा की मां ने ये चूरमा भेजा था ।  मोदी जी ने चूरमा न सिर्फ खुद खाया बल्कि जमैका के प्रधानमंत्री को भी खिलाया और भावुक होकर नीरज की माँ श्रीमती सरोज देवी  को एक आभार पत्र भी लिख दिया । नीरज की माँ को मोदी जी ने खुद पत्र  लिखा । ये चूरमे  की ही  ताकत  तो थी ।   मोदी जी ने लिखा -, “आज इस चूरमे को खाने के बाद आपको पत्र लिखने से खुद को रोक नहीं सका। भाई नीरज अक्‍सर मुझसे इस चूरमे की चर्चा करते हैं, लेकिन आज इसे खाकर मैं भावुक हो गया। आपके अपार स्‍नेह और अपनेपन से भरे इस उपहार ने मुझे मेरी मां की याद दिला दी।”
अब आप समझ ही गए होंगे कि  मिष्ठान चाहे कोई भी हो बहुत ताकतवर चीज है। मिष्ठान शुष्क से शुष्क आदमी को भी सरस बना सकता है। मिष्ठान कड़वाहट मिटाने का सबसे बढ़िया विकल्प है ,आप इसे कड़वाहट  का ‘ ऐंटी डोज ‘ भी कह सकते हैं शायद इसीलिए हमारे यहां तीज-त्यौहारों पर मिठाइयों का आदान-प्रदान किया जाता है। मैं तो कहता हूँ कि  मिष्ठान बिना जग सूना है। सियासत में बढ़ती कड़वाहट और अदावत को मिष्ठान के जरिये दूर किया जा सकता है,फिर मिष्ठान चाहे लड्डू हो,जलेबी हो,चूरमा हो या बंगाल का रसोगुल्ला। मैं तो कहता हूँ कि  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर स्वच्छता पखवाड़ा मानते हुए आम जनता को रसोगुल्ला वितरित करना चाहिए था। यदि ऐसा होता  तो प्रधानमंत्री जी और उनकी पार्टी के तमाम लोग संदेशखाली और कोलकाता जैसे मुद्दे उठाना भूल जाते।
देश में पुरखों की विदाई के बाद देवी स्वरूपा  दुर्गा का आगमन हो चुका है ।   हमें इन नौ दिनों में मिष्ठान के जरिये सौहार्द की वापसी की कोशिश करना चाहिए। मुहब्बत  की दुकान खोलने से आपको ऐतराज हो सकता है किन्तु मिष्ठान की दुकान खोलने से नहीं।  यदि यही  मिष्ठान हमारे लिए रोजगार पैदा करने लगे तो भी क्या बुरा है।  मिष्ठान भी किसी मंगौड़े से कम नहीं है। हम तो 8  अक्टूबर को हरियाणा और जम्मू -कश्मीर के सभी नए विधायकों से मिठाई खाएंगे।(विभूति फीचर्स)