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गौ संरक्षण एवं संवर्धन के लिए मप्र. की अभिनव पहल

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गुना: गौ संरक्षण एवं संवर्धन के लिए मप्र. की अभिनव पहल –  गुना जिले की समस्त पंजीकृत शासकीय एवं अशासकीय गौशालाओं में गोवर्धन पूजा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। डॉ. आर.के. त्यागी उप संचालक पशुपालन एवं डेयरी विभाग द्वारा बताया गया कि कलेक्टर डॉ. सतेंद्र सिंह के मार्गदर्शन में जिला स्तरीय कार्यक्रम महावीर गौशाला ए.बी. रोड गुना में आयोजित किया गया। कार्यक्रम के दौरान मुख्‍यमंत्री जी के राज्‍य स्‍तरीय आयोजन का सजीव प्रसारण दिखाया गया। गौ-ग्रास एवं गौशाला अवलोकन के बाद विधि-विधान से गोवर्धन पूजा एवं गाय का पूजन किया गया। श्री आर.के. त्यागी जी द्वारा कार्यक्रम की रूपरेखा बताई गई। जिसमें उन्होंने पशुपालन संबंधित योजनाएं, पशु एंबुलेंस एवं पशु बीमा संबंधित जानकारी साझा की।

गुना विधायक श्री पन्‍नालाल शाक्‍य ने कहा कि गौसेवा हम सबकी प्राथमिकता होनी चाहिये। प्रतिदिन एक रोटी हर घर में गाय को देने की परंपरा होनी चाहिये। इसके उपरांत कार्यक्रम में गौ कथावाचक, गौ सामग्री उत्‍पादक एवं गौ सेवा के क्षेत्र में उत्‍कृष्‍ट कार्य करने वालों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में गोपी और कृष्ण का रूप धारण करने वाले बच्चों को सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर  नगर पालिका अध्यक्ष श्रीमती सविता अरविन्‍द गुप्‍ता, भाजपा जिलाध्यक्ष श्री धर्मेन्‍द्र सिकरवार, गौशाला के अध्यक्ष श्री गिर्राज अग्रवाल, श्री विकास जैन, अन्य जनप्रतिनिधि सहित कलेक्‍टर डॉ. सिंह गोवर्धन पूजा कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। कार्यक्रम में गौपालक एवं गौ सेवक उपस्थित रहे।कार्यक्रम का मंच संचालन सीएम राइज प्राचार्य श्री आशीष टाटिया द्वारा किया गया।

Jashpur News: गौ-तस्करी कर रहे आरोपी गिरफ्तार

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जशपुर। जशपुर पुलिस को क्षेत्र के जागरूक ग्रामीणों का लगातार साथ मिल रहा है। ग्रामीणों की सूचना पर पुलिस ने कुल 13 नग गौ-वंश को तस्करी होने से बचाया। पुलिस ने रातभर कड़ी मेहनत कर पीकअप वाहन से 11 नग मवेशी को तस्करी होने से बताया एवं थाना तुमला ने भी ओड़िसा की ओर 2 नग गौ-तस्करी कर रहे आरोपी ध्रुर्वा यादव को गिरफ्तार किया।

मामले का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है कि पुलिस अधीक्षक जशपुर शशि मोहन सिंह को कांसाबेल थाना क्षेत्र के जागरूक ग्रामीणों से 5 नवबंर की रात्रि में सूचना मिला कि मवेशी तस्कर पीकअप वाहन में भारी मात्रा में गौ-वंश की तस्करी करते हुये रायगढ़ क्षेत्र की ओर से कांसाबेल के रास्ते झारखंड की ओर जाने वाले हैं। इस सूचना पर उप पुलिस अधीक्षक विजय सिंह राजपूत के नेतृत्व में पुलिस स्टाॅफ की टीम पतासाजी एवं गिरफ्तारी हेतु लगाया गया था।

पुलिस टीम द्वारा रात्रि में कांसाबेल मेन रोड में बैरिकेट लगाकर पत्थलगांव की ओर से आने-जाने वाली वाहनों को रोक-रोककर चेक किया जा रहा था, इसी दौरान पत्थलगांव की ओर से तेज रफ्तार में पीकअप वाहन क्र. JH 07 L 9443 आया, उक्त वाहन के चालक को रोकने का प्रयास किया गया जो वाहन को नहीं रोककर तेज गति से भागने लगा, पुलिस द्वारा तत्काल उक्त वाहन का पीछा किया गया, उक्त पीकअप वाहन के चालक ने कुसुमताल चैक के पास वाहन को छोड़कर अंधेरे का फायदा उठाकर भाग गया। पुलिस टीम द्वारा वाहन के तिरपाल को हटाकर देखने पर उक्त वाहन के अंदर 11 नग मवेषी मिलने पर उन्हें सुरक्षार्थ रखवाया गया है। मामले में अज्ञात आरोपी के विरूद्ध पशु तस्करी का अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना में लिया गया है। अज्ञात पशु तस्कर का रिकार्ड खंगाला जा रहा है। इस कार्यवाही में थाना कांसाबेल से स.उ.नि. राजेश यादव, प्र.आर. 399 इग्नासियुस एक्का, आर. 7498 प्रषांत पैंकरा, सै. पूरन खूंटे, सै. गंगा राम का योगदान रहा है।

इसी तरह थाना तुमला क्षेत्र के जागरूक ग्रामीणों से सूचना मिला कि दिनांक 05.11.2024 को थाना तुमला क्षेत्र के ग्राम कोरंगामाल के रास्ते में एक व्यक्ति 02 बैल को पैदल मारते-पीटते ओड़िसा की ओर ले जा रहा है। इस सूचना पर तत्काल थाना तुमला से पुलिस टीम मौके पर भेजकर गौ-तस्करी कर रहे आरोपी को घेराबंदी कर अभिरक्षा में लिया गया। पूछताछ में उक्त व्यक्ति ने अपना नाम ध्रुवा यादव बताया एवं उक्त मवेशी को ओड़िसा तस्करी करते हुये ले जाना बताया। आरोपी का कृत्य पशु तस्करी का अपराध घटित करना पाये जाने पर आरोपी ध्रुर्वा यादव उम्र 56 साल निवासी भगोरा थाना फरसाबहार को गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में भेजा गया है। प्रकरण की विवेचना कार्यवाही एवं आरोपी की गिरफ्तारी में निरीक्षक कोमल नेताम, स.उ.नि. टेकराम सारथी, प्र.आर. 358 आनंद प्रकाष लकड़ा, आर. 665 रामवृक्ष राम का योगदान रहा है।

पुलिस अधीक्षक जशपुर शशि मोहन सिंह द्वारा कहा गया है कि – “कांसाबेल एवं तुमला क्षेत्र के जागरूक गा्रमीणों की सूचना पर पुलिस द्वारा तस्करी में प्रयुक्त पीकअप वाहन एवं कुल 13 नग गौ-वंश को जप्त कर 01 आरोपी को गिरफ्तार करने में सफलता प्राप्त की है, सीमावर्ती क्षेत्र ओड़िसा की ओर भी जशपुर पुलिस की कड़ी निगाह है। अपने आस-पास किसी भी प्रकार की तस्करी हो रही हो तो तत्काल उसकी सूचना पुलिस को देवें।”

Gopashtami 2024-क्यों करते है गायों की पूजा

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Gopashtami 2024: कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी का पर्व मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन गौ पूजन करने से कभी भी दुखों का सामना नहीं करना पड़ता है। हिंदू धर्म में गायों की पूजा का विशेष महत्व है। गाय को माता का दर्जा भी दिया गया है।
इस साल गोपाष्टमी का पर्व 9 नवंबर रविवार को है। इस दिन गायों की पूजा की जाती है। गाय-बछड़े दोनों को सजाया जाता है। और सुख-समृद्धि की कामना से उनकी पूजा की जाती है। मान्यता है कि इसी दिन से भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने गौ चरण की लीला शुरू की थी यह पर्व मथुरा, वृदांवन और ब्रज के क्षेत्रों में प्रसिद्ध त्योहार है।

क्यों करते है गायों की पूजा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गाय को माता माना जाता है। इसी प्रकार गाय को धन-समृद्धि की देवी और लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। इसलिए गाय को माता के रुप में पूजा जाता है। गाय का संंबध भगवान विष्णु से भी है, जिन्हें ब्रह्मांड के रक्षक और पालनकर्ता के रूप में जाना जाता है। ऐसा भी माना जाता है, गाय में 33 करोड़ देवी-देवता वास करते हैं, इसलिए गाय को पूजा जाता है। माना जाता है कि जो लोग गौ माता को पहली रोटी खिलाते हैं उनके घर से कभी बरकत खत्म नहीं होती है। गौ माता का दूध तो पौष्टिक होता ही है साथ ही साथ गौ माता के मूत्र से भी अनेक दवाईयां भी बनाई जाती हैं।
अमृत मंथन में जितने भी रत्न प्राप्त हुए थे उनमें से एक कामधेनु गाय माता भी थी, और शेष गाय उन्हीं की संतिती है। कामधेनु ऐसी गाय थी जो सबकी इच्छा पूरी कर दिया करती थी। और हिन्दू धर्म में गाय को बड़ा शुभ माना जाता है जो इसको पालन करते हैं, उनके घर में शुभता रहती है। इसलिए कहते हैं कि गायों को चारा देना और उसकी सेवा करना चाहिए। गौ माता को देव तुल्य समझा जाता है।
साथ ही कहा जाता है कि जहां गौ माता खड़ी होती हैं उस जगह का वास्तु दोष भी अपने आप ही खत्म हो जाता है। गौ माता का दूध अगर बच्चे पीते हैं तो बच्चे हष्ट- पुष्ट और बलवान बनते हैं। उनकी बुद्धि भी तीव्र होती है। गौ माता के गोबर की धूनी घर में देने से नकारात्मक दोष समाप्त होते हैं। इसके साथ ही गौ माता के दान को महादान भी माना गया है।
गाय की पूजा का महत्व 
गोपाष्टमी के दिन गाय की पूजा का बहुत महत्व है। कहा जाता है कि इस दिन गाय माता की अराधना करने से जीवन में नवग्रहों के दोष दूर हो जाते है। और धन संकट की समस्या भी दूर हो जाती है।
गोपाष्टमी का महत्व
गोपाष्टमी का महत्व और किंवदंतियाँ भगवान कृष्ण और गायों के प्रति उनके प्रेम से जुड़ी हैं। दरअसल, इसी दिन भगवान कृष्ण ने तय किया था कि वे गाय चराने वाले या हिंदी में ‘ग्वाला’ बनना चाहते हैं।
हिंदू किंवदंतियों के अनुसार, भगवान कृष्ण ने अपना बचपन गोकुल और वृंदावन में बिताया, जो हरियाली और मवेशियों के झुंड से घिरा हुआ था। वहाँ, उन्हें गायों से विशेष प्रेम हो गया और उन्होंने देखा कि कैसे गायें सभी प्राणियों का पोषण करती हैं। अपने बछड़े से लेकर इंसान के बच्चे तक, गाय ही उन्हें दूध के रूप में पोषण देती थी। और इसलिए, भगवान कृष्ण गोपों में से एक बनना चाहते थे।
कुछ लोग यह भी मानते हैं कि गोपाष्टमी के दिन ही कृष्ण के पालक पिता नंद महाराज ने उन्हें गायों की देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी थी।

गोपाष्टमी पर अनुष्ठान

गोपाष्टमी का दिन कुछ सरल अनुष्ठानों और समारोहों के साथ मनाया जाता है, और परिवार के सभी सदस्य इसमें भाग ले सकते हैं। सुबह की प्रार्थना से लेकर गौ पूजा तक, गोपाष्टमी लोगों को ‘गौ माता’ के साथ उनकी निकटता का एहसास कराती है।
गोपाष्टमी के दिन, जो लोग गाय पालते हैं, वे सुबह-सुबह उन्हें नहलाते हैं और फिर उन्हें फल, फूल और अन्य चीजें अर्पित करते हैं। दरअसल, गायों को माला भी पहनाई जाती है और उनके सींगों को सुंदर रंगों से रंगा जाता है। 
उन्हें गुड़, मिठाई और उच्च गुणवत्ता वाले चारे जैसे भोजन भी दिए जाते हैं और भगवान कृष्ण की पूजा करते समय उन्हें गाय का दूध, दही, घी और अन्य चीजें चढ़ाई जाती हैं।
कुछ राज्यों में, लोग अपने घरों को गाय के गोबर से भी सजाते हैं और इस प्रक्रिया को ‘लिपाई’ कहा जाता है।
गायों को सजाने के साथ-साथ, कई गांवों में लोग गायों को एक साथ लाने के लिए जुलूस भी निकालते हैं। वे अपने बच्चों को भगवान कृष्ण की पोशाक पहनाते हैं, जिनके हाथ में बांसुरी और सिर पर मोरपंख होता है तथा गायें छोटे कृष्ण के साथ-साथ चलती हैं।

वृंदावन में भव्य समारोह

वृंदावन में विशेष रूप से गोपाष्टमी को बड़े प्रेम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। मंदिरों को रोशनी से सजाया जाता है, गायों को नहलाया जाता है और उन्हें चमकीले रंगों के कपड़े पहनाए जाते हैं, हर मंदिर में भगवान कृष्ण के मंत्र और भजन गाए जाते हैं, और भी बहुत कुछ।  वास्तव में, कुछ भक्त इस दिन गोवर्धन परिक्रमा भी करते हैं।
हिंदू धर्म में गायों के प्रति प्रेम और सम्मान मवेशी, विशेष रूप से गाय, हिंदुओं के दिल में एक पवित्र स्थान रखते हैं। हिंदुओं के लिए, गायें केवल गौशालाओं में रखे जाने वाले जानवर नहीं हैं, बल्कि उन्हें एक माँ का दर्जा प्राप्त है जो उनका पालन-पोषण करती है और उन्हें जीवन में आगे बढ़ने में मदद करती है।
कुछ लोगों के लिए, गाय एक पवित्र जानवर है जिसके अंदर हर हिंदू भगवान और देवी निवास करते हैं, और दूसरों के लिए, वह माँ लक्ष्मी का एक रूप है जो उन्हें स्वास्थ्य के धन का आशीर्वाद देती हैं। साथ ही, अनादि काल से, गायों को भगवान कृष्ण से जोड़ा गया है, और उन्हें अक्सर गायों के झुंड के साथ अपनी बांसुरी बजाते हुए देखा जाता है।
धार्मिक कारणों से अलग, भारत जैसे देश में गायों का महत्व सभी जानते हैं। ‘कृषि प्रधान’ देश होने के नाते, भारत हमेशा खेतों की जुताई, दूध और डेयरी उत्पादों के उत्पादन और खाद उपलब्ध कराने के लिए गायों पर निर्भर रहा है, जिसका उपयोग प्राकृतिक उर्वरक के रूप में किया जाता है। कई ग्रामीण घरों में गाय के गोबर का भी ईंधन के स्रोत के रूप में उपयोग किया जाता था।

सड़क पर मरे हुए गौ वंश के चलते आपस में टकराए कई वाहन एक की मौत

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हाथरस: सिकंदराराऊ कोतवाली क्षेत्र में राष्ट्रीय राज मार्ग पर देर रात गांव जिमिसपुर के निकट मरे हुए गौ वंश की वजह से बड़ा हादसा हो गया. इस दौरान एक के बाद एक कई वाहन आपस में टकरा गए. हादसे में एक महिला की मौके पर ही मौत हो गई. विभिन्न वाहनों के 11यात्री घायल हो गए. पुलिस ने मृतिका के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा है. वहीं, घायलों को इलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया है.
दिवाली त्योहार के बाद सभी को अपने काम, ड्यूटी एवं अपने गंतव्य पर पहुंचने की जल्दी है. जिसके चलते बीती रात सिकंदराराऊ कोतवाली क्षेत्र के गांव जिमिसपुर के निकट एक ट्रक ने सड़क पर एक गौवंश को टक्कर मार दी थी. गौवंश सड़क पर पड़ा था. इस गौवंश से हरदोई से परिवार को ला रहा ऑटो और थ्री व्हीलर टकरा गया. वहीं उसके पीछे से आ रही हुंडई की एक कार और इको कार भी आपस में टकरा गई.
हादसे में हुंडई कार सवार एक महिला सुनीता देवी की मौके पर ही मौत हो गई. दुर्घटनाग्रस्त हुए वाहनों में 11 लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं. सूचना पर पहुंची पुलिस ने सभी घायलों को एंबुलेंस की मदद से सिकंदराराऊ के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया. जहां घायलों को प्राथमिक उपचार दिया गया. प्राथमिक उपचार देने के बाद 6 से 7 लोगों को हायर सेंटर रेफर किया गया है.
फर्रुखाबाद से नोएडा जा रहे हैं शिव प्रताप सिंह ने बताया, कि गाय बीच में मरी पड़ी थी. टेंपो का एक्सीडेंट हुआ था. जब उन्होंने गाड़ी साइड में रोकी वह और जीजा कार से बाहर निकाल कर आए. मां को निकालने को ही दे तभी पीछे से ही ईको वाले ने टक्कर मार दी. इस हादसे में उनकी मां की मौत हो गई.
सीओ श्यामवीर सिंह ने बताया, कि इस सड़क हादसे में एक महिला की मौत हुई है. जबकि 11 लोग घायल हुए हैं. घायलों में 6 से 7 लोगों को अलीगढ़ और एटा रेफर किया गया है.

गौपालकों के लिए सरकार10 हजार रुपए इनाम देने जा रही है

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सुल्तानपुर: गौपालकों के लिए सरकार द्वारा खुशखबरी आई है. प्रगतिशील पशुपालक योजना के तहत अब सरकार गौपालकों को 10 हजार रुपए इनाम देने जा रही है. तो आईए जानते हैं कि इसके लिए कौन से लोग पात्र हैं और उनके द्वारा कहां और कैसे आवेदन किया जाएगा. इसके साथ यह भी जानेंगे कि इस योजना का लाभ लेने के लिए कौन-कौन से डॉक्यूमेंट लगेंगे.

इस प्रजाति की गायों पर मिलेगा लाभ
प्रगतिशील पशुपालक प्रोत्साहन योजना के तहत उन किसानों को लाभ मिलेगा जो डेयरी चलाते हैं अथवा उन्नत नस्ल एवं उच्च उत्पादकता वाली देसी गायों को पालें हैं. इसके लिए उन्हें सरकार द्वारा 10 से 15 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाएगी. इससे सुल्तानपुर जिले के पशुपालकों को इस योजना का लाभ मिल सकेगा.
क्या होनी चाहिए पात्रता
नंद बाबा दुग्ध मिशन के अंतर्गत चलाई जा रही है प्रगतिशील पशुपालक योजना में वे लोग पात्र हैं, जिनके पास अच्छे उत्पादकता वाली देसी गाय हैं. लोकल 18 से बातचीत के दौरान मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर अशोक कुमार तिवारी ने बताया कि वह लोग जिनके पास देसी गाय हैं और 24 घंटे में 10 से 12 लीटर दूध देती हैं, उनको इस योजना के तहत प्रोत्साहन राशि सरकार द्वारा दी जाएगी. मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि इसके लिए गाय की फोटो, आधार कार्ड और चार बार दुहान की फोटो लगेगी. 15 सितंबर से आवेदन लिए जा रहे हैं और 15 नवंबर तक लिए जाएंगे. अगर कोई पशुपालक इस योजना का लाभ लेना चाहता है, तो वह निर्धारित मानदडों के तहत अपने नजदीकी पशु चिकित्सा केंद्र पर डॉक्यूमेंट के साथ आवेदन कर सकता है.

पौराणिकता, धार्मिकता, लोक संस्कृति, और प्रकृति की आराधना से परिपूर्ण  छठ पर्व* 

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(विजया भारती-विभूति फीचर्स)
लोक आस्था का महापर्व, छठ पर्व मेरा सबसे प्रिय पर्व है। इसलिए भी क्योंकि छठ लोक का पर्व है और यह अपने भीतर पौराणिकता, धार्मिकता, लोक संस्कृति, और प्रकृति की आराधना का अनोखा संगम समेटे हुए है। इस पर्व में सूर्यदेव की पूजा के माध्यम से हम अपनी जड़ों से जुड़ते हैं, अपनी आस्थाओं को पोषित करते हैं। यह पर्व सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि यह ईश्वर के प्रति लोक आस्था के जनज्वार जैसा है, जो पीढ़ियों से हमें विरासत में मिला है। जब भी छठ का समय आता है, मानो मेरे अंदर एक अलग ऊर्जा और उल्लास का संचार हो जाता है। यह पर्व हमारी लोक संस्कृति और पहचान का वह हिस्सा, वह अहसास है जो मुझे मेरे पूर्वजों, मेरे गांव और हमारी सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ता है।
हम बिहारियों के लिए तो छठ पर्व हमारी सांस्कृतिक पहचान है। यह हमारा बड़का पर्व है। बिहारी जहाँ जहाँ गये, अपना छठ पर्व भी लेकर गये और इसीलिए यह दुनिया भर  में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है।  भगवान सूर्यदेव की पूजा-आराधना का यह पवित्र पर्व आज दुनिया के उन तमाम देशों में भी मनाया जाता है, जहां भारतीय खासकर उत्तर भारत के लोग निवास करते हैं।
    छठ पर्व, छठ या षष्‍ठी पूजा के अनुपम लोकपर्व के रूप में सुविख्यात कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाया जाने वाला सूर्योपासना का यह हिन्दू पर्व कई अन्य धर्मावलम्बी लोगों द्वारा भी मनाया जाने लगा है।
छठ व्रत का यह समय आते ही नदियों और तालाबों पर लोगों का जनसैलाब उमड़ता है। मेरे मन में यह भाव आता है कि छठ पूजा के ये दृश्य न केवल एक आस्था के हैं, बल्कि यह एक जनसंस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो एक समान धरातल पर आस्था और उल्लास को लाकर खड़ा कर देती है।
 *धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व*
छठ पूजा का धार्मिक पक्ष अत्यंत पवित्र और गहन है। ऋग्वेद से लेकर स्कंद पुराण तक, सूर्य की उपासना का यह पर्व हमारे शास्त्रों में प्राचीनतम स्वरूपों में वर्णित है। प्राचीन कथाओं में देवताओं और असुरों की रक्षा हेतु सूर्य का आवाहन अदिति द्वारा किया गया था, जिन्होंने मार्तंड सूर्य का जन्म किया। उन्हीं सूर्यदेव के उगते और डूबते स्वरूप की आराधना छठ पर्व के मुख्य अनुष्ठान में होती है। हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य को प्राणों का आधार माना और उनकी उपासना से जीवन में ऊर्जा, स्वास्थ्य और धन की प्राप्ति का मार्ग दिखाया। इस पर्व की पवित्रता ही इसका सबसे बड़ा आकर्षण है। व्रतियों का विश्वास है कि सूर्य उपासना से उनके सारे कष्ट दूर होंगे, जीवन में सुख और समृद्धि आएगी।
छठ पर्व का धार्मिक महत्व तो अद्वितीय है ही, लेकिन इसमें सांस्कृतिक रंग भी कम नहीं। हमारे समाज में छठ न केवल पूजा है बल्कि यह एक सामाजिक कार्यक्रम बन चुका है, जहां सब एक साथ मिलकर पूजा करते हैं। बचपन से मैंने अपने घर में नानी, दादी, माँ और अन्य रिश्तेदारों को छठ व्रत करते देखा है। उस समय जो सामूहिक उत्साह और जोश का माहौल होता था, वह अनुभव मेरे भीतर आज भी जीवित है।
 *लोक संस्कृति और संगीत*
छठ पर्व की एक खास विशेषता इसके साथ गाए जाने वाले भक्ति-लोकगीत हैं, जो पूजा को न केवल आध्यात्मिक बल्कि संगीतात्मक रूप में भी समृद्ध करते हैं। बचपन से मैंने पद्मश्री विंध्यवासिनी देवी और पद्मभूषण शारदा सिन्हा जैसी महान कलाकारों के कंठों से छठ गीतों को सुना और सीखा। उनके गाए “कांचहिं बांस के बहंगिया” और “केरवा जे फरेला घवद से” जैसे गीत हर छठ के समय मन को उसी पुरानी भावनाओं से भर देते हैं। इन गीतों को सुनते ही मानो छठ का माहौल चारों ओर फैल जाता है। बाद में मुझे इन गीतों को सीखने और गाने का सौभाग्य अपने गांव घर की बुजुर्ग महिलाओं से मिला। माँ, नानी, चाचियों और मौसियों ने मुझे सिखाया कि इन गीतों में हमारी आत्मा, हमारी संस्कृति की ध्वनि समाहित है। छठ के गीत भोजपुरी ही नहीं, बिहार की अन्य लोक भाषाओं – मैथिली, अंगिका, वज्जिका आदि में भी खासे गाये और सुने गये हैं। लेकिन उनका मूल सुर और स्वर रवीन्द्र संगीत की तरह अक्षुण्ण रहा है। मेरे मन में एक खास जगह है इन छठ गीतों की, क्योंकि ये केवल शब्द नहीं, बल्कि हमारी भावनाओं की अभिव्यक्ति हैं।
छठ गीतों के कई रूप और शैलियां हैं। मैथिली, अंगिका, वज्जिका, और मगही बोलियों में गाए जाने वाले इन गीतों का अंदाज और भाव दोनों अपने-अपने ढंग के होते हैं। भोजपुरी में जैसे “कोपि कोपि बोलेली छठी माई,” तो मगही में “चलs चलs अरघ के बेरिया” जैसे गीतों में लोक संस्कृति की गूंज है। आज संगीत कंपनियों और सोशल मीडिया के माध्यम से ये गीत पूरी दुनिया में बजते हैं, लेकिन उस पुराने दौर की सादगी और भक्ति भरी धुन आज भी दिल को छू जाती है।
 *आधुनिकता में पारंपरिकता का संगम*
आज के युवा कलाकार भी छठ गीतों को नयी धुनों पर गाने की कोशिश करते हैं, लेकिन जो कर्णप्रियता और आत्मीयता पारंपरिक धुनों में है, वह अनमोल है।
छठ पर्व भारतीय लोक संस्कृति में सबसे ज्यादा भक्ति भाव, नेम धर्म और पवित्रता के साथ मनाया जाता है। इसीलिए इस पर्व के अवसर पर गाये जाने वाले भक्ति के गीत भी घरों, घाटों और गांवों-चौबारों में काफी प्रचलित हैं। आकाशवाणी के माध्यम से ये गीत जब घर-घर में पहुंचे, तो इनकी लोकप्रियता ने एक नया आयाम छू लिया। बाद में ये दूरदर्शन, मंचों और फिर संगीत कंपनियों से होते हुए आज निजी चैनलों और सोशल मीडिया के माध्यम से दुनिया भर में लोकप्रिय हो गये हैं।
आज बाजार में छठ गीतों का स्वरूप बदल चुका है। कई कंपनियों ने इन गीतों को एक नए रूप में प्रस्तुत किया है, जहां अनुराधा पौडवाल, उदित नारायण, सोनू निगम जैसे कलाकारों की आवाजें भी इन गीतों में गूंजने लगी हैं। परंतु जो सरलता, भावुकता, और अपनत्व पुराने गीतों में है, उसे कोई छू नहीं सकता।
जिन कलाकारों के छठ गीत घाटों पर ज्यादा बजते और सुने जाते हैं वे हैं – विंध्यवासिनी देवी, शारदा सिन्हा, भरत शर्मा व्यास, कल्पना पटवारी और विजया भारती आदि हैं, परंतु छठ गीतों की लोकप्रियता के मामले में पद्म भूषण शारदा सिन्हा सर्वोपरि हैं।
    मेरे लिए छठ के गीत, चाहे वह नए हों या पुराने, अपनी पवित्रता में संजीवनी की तरह हैं। कई नए गीतकार भी छठ गीतों को अपने ढंग से प्रस्तुत कर रहे हैं। परंतु पारंपरिक गीतों से जुड़ी आस्था और भक्ति को बनाए रखना हम सबका कर्तव्य है। जरूरी है कि इस पर्व पर गाए जाने वाले गीत पवित्रता की सीमा में ही रहें, तो उनके माध्यम से छठ और छठ गीतों की गरिमा बची रहेगी।
 *छठ: आस्था का महोत्सव*
जब सूर्य के डूबने और उगने पर अर्ध्य देने का समय आता है, घाट पर खड़े होकर मैं महसूस करती हूं कि यह क्षण कितना विराट है। मुंबई में जुहू बीच पर छठ का बड़ा आयोजन संजय निरुपम पिछले तीन दशकों से करते आ रहे हैं। उस कार्यक्रम की शुरुआत 17 सालों तक मेरे गाये छठ गीतों से होती रही है। जन आस्था के उस समंदर में गोता लगाते हुए श्रोता दर्शक चारों ओर गूंज रहे छठ गीतों के मधुर स्वर को सुन जिस तरह भक्तिरस से आह्लादित व तरंगित हो उठते हैं, वह देखने लायक होता है। छठ गीत न केवल छठ का पर्याय हैं बल्कि हमारी उस आत्मीयता के प्रतीक हैं जो हमें हमारी माटी से जोड़ते हैं। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि वह बंधन है जो मुझे अपने पूर्वजों और अपने लोक से जोड़ता है।
इस पर्व में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के लोग भी शामिल होते हैं। छठ का यह अनूठा पर्व आज देश की सीमाओं को पार कर विदेशों तक अपनी जगह बना चुका है। मुझे गर्व है कि मैं इस परंपरा का हिस्सा हूं, और हर वर्ष छठ के आते ही मेरे अंदर का यह भाव और मजबूत हो जाता है कि हमारी संस्कृति, हमारी आस्था और हमारा लोक कभी पुराना नहीं होता।(लेखिका विजया भारती आकाशवाणी-दूरदर्शन की टॉप ग्रेड कलाकार, बिहार की सुप्रसिद्ध लोकगायिका, कवयित्री और लोक संस्कृति की मर्मज्ञ हैं। उन्होंने भारतीय लोक संगीत को देश और दुनिया में पहुंचाया है।विजया भारती के 8 काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विजया जी को पत्र लिखकर कुपोषण और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है। *(विभूति फीचर्स)*

स्मृति शेष  *मौन हुई लोक संगीत की मुखर गायिका शारदा सिन्हा

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(कुमार कृष्णन-विनायक फीचर्स)
पद्मभूषण शारदा सिन्हा का जाना, न सिर्फ बिहार-पूर्वांचल, बल्कि भारतीय लोक संगीत के एक युग का अंत है। ये उद्गार राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश के हैं।  
दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में ज़िन्दगी मौत के जंग में वे हार गयीं और सैप्टीसिमिया के कारण रिफैक्ट्ररी शाक के कारण उनका निधन हो गया । 
 शारदा सिन्हा ने मैथिली , भोजपुरी के साथ साथ बिहार की  सभी लोक भाषाओं में  गायन किया है। उनका गायन लोक जीवन, संस्कारों, और रीति रिवाजों से जुड़ा हुआ था।
उनकी पहचान हिंदी सिनेमा की पार्श्व गायिका के रूप में भी है। अपने प्रशंसकों के बीच ‘ बिहार की समृद्ध लोक परंपराओं को राज्य की सीमाओं से बाहर भी लोकप्रिय बनाने वालीं शारदा सिन्हा के कुछ प्रमुख गीतों में ‘‘छठी मैया आई ना दुआरिया’’, ‘‘कार्तिक मास इजोरिया’’, ‘‘द्वार छेकाई’’, ‘‘पटना से’’, और ‘‘कोयल बिन’’ शामिल थे। इसके अलावा उन्होंने बॉलीवुड फिल्मों में भी गाना गया था। इनमें ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर- टू’ के ‘तार बिजली’, ‘हम आपके हैं कौन’ के ‘बाबुल’ और ‘मैंने प्यार किया’ के ‘कहे तोसे सजना ये तोहरी सजनिया’ जैसे गाने शामिल हैं।
उनकी आवाज में विरह है, मिठास है, सुकून है, माटी का सुखद एहसास है। इसी कारण से भौतिक रूप में न रहने के बावजूद लाखों-करोड़ों संगीत प्रेमियों की आत्मा में बसती हैं। खासकर, बिहार में। बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में शायद ही कोई ऐसा घर हो जहां विवाह, उपनयन या मुंडन संस्कार में शारदा सिन्हा की मौजूदगी न हो। अपने दमदार व पारंपरिक गीतों के माध्यम से मौजूदगी। कड़वा सच है कि आज बिहार, यूपी ही नहीं, राजस्थान में भी लोक गीतों का प्रचलन खत्म होेने को है, जबकि इन लोकगीतों में हमारे प्राण बसते हैं।
अपने स्पन्द-प्रदायी कोकिला-कंठ से लोकधुन और लोक-परंपराओं को उन्होंने अप्रतिम ऊँचाई प्रदान की। वे अब  किसी मंच पर गाती हुईं दिखाई नहीं देंगी, किन्तु जब तक पृथ्वी पर सूर्योपासना का यह महापर्व होता रहेगा, शारदा जी अनन्त काल तक अपने स्वर में जीवित रहेंगी।
जिस आवाज़ से छठ की शुरूआत हुआ करती थी, वही आवाज़ छठ के शुरू होते ही ख़ामोश हो गई। शारदा सिन्हा जी अब हमारे बीच नहीं हैं। शारदा सिन्हा ने अपनी गायकी से ऐसी सामूहिकता का सृजन किया जिसे पहचानने के लिए ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना नहीं पड़ता है बल्कि चुपचाप अपने भीतर महसूस करना होता है। उनके गीत छठ का हिस्सा हैं। कहते हैं छठ में कुछ भी बाहरी परिवर्तन नहीं हुआ, जो पुराना है वही चला आ रहा है सिवाय शारदा सिन्हा के छठ गीतों के। क्या कोई छठ को शारदा सिन्हा की आवाज़ से अलग कर सकता है? इन्हीं दिनों उनके गीत लाउड स्पीकर पर बजने लगते हैं। खेत, खलिहानों और नदी किनारे बने घाटों से आ रही उनकी आवाज़ गांव-घर बुलाने लग जाती थी। शारदा सिन्हा की आवाज़ बिहार जैसे ग़रीब राज्य को समृद्ध बनाती थी। आज बिहार की समृद्धि थोड़ी कम हो गई।
जब भी भारत के गाँवों में, विशेषकर बिहार और पूर्वांचल में, कोई मंगल अनुष्ठान होगा, उनके गाए गीतों के स्वर शताब्दियों तक हमारे मन-प्राण को झंकृत करते रहेंगे!
शारदा सिन्हा ने करीब 50 साल पहले यानी साल 1974 में पहला भोजपुरी गाना गाया था।लेकिन इसके बाद उनका संघर्ष जारी रहा। फिर साल 1978 में उन्होंने छठ गीत ‘उग हो सुरुज देव’ गाया। इस गाने ने रिकॉर्ड बनाया और यही से शारदा सिन्हा और छठ पर्व एक दूसरे के पूरक हो गए। करीब 46 साल पहले गाए इस गाने को आज भी छठ घाटों पर सुना जा सकता है।
शारदा सिन्हा के छठ पूजा में।गाए गीत लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं।शारदा सिन्हा ने छठ पूजा पर कई लोक और पारंपरिक गीत गाए। उनके गीतों के बगैर तो छठ पर्व अधूरा होता है और छठ पूजा भी। छठ में सूप,डाला और ठेकुआ की तरह जरूरी है शारदा सिन्हा के छठ गीत।उन्होंने भोजपुरी, मगही, बज्जिका और मैथिली जैसी भाषाओं में कई छठ गीत गाकर छठ पर्व को भक्ति और उत्साह से भर दिया।उनके छठ गीतों में बिहार की माटी की सोंधी सुगंध, भाव और भक्ति विभोर करने वाले शब्द होते थे।उनके छठ गीतों में हे दीनानाथ (सूर्य देव) और छठी मैया की पुकार होती थी, सुहाग और संतान रक्षा की मुराद होती थी।
उनके चेहरे पर मासूमियत और कंठ में  सरस्वती विराजमान थीं। वे प्रशिक्षित शास्त्रीय गायिका थीं, जिन्होंने अपने कई गीतों में लोक संगीत का मिश्रण किया। उन्हें अक्सर ‘मिथिला की बेगम अख्तर’ कहा जाता था। वह हर साल छठ पर्व पर एक नया गीत जारी करती थीं। बिहार कोकिला’ के नाम से मशहूर एवं सुपौल के हुलास गाँव में 1 अक्टूबर 1952 को जन्मीं सिन्हा छठ पूजा एवं विवाह जैसे अवसरों पर गाए जाने वाले लोकगीतों के कारण अपने गृह राज्य बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मशहूर थीं।
उनके पिता सुखदेव ठाकुर शिक्षा विभाग में अधिकारी  थे।  वे अपने पिता को पहला गुरू मानती थीं। उन्होंने आरंभ से ही प्रोत्साहन और हौसला दिया। गाँव के नाटक में पहली बार उन्होंने सरस्वती वंदना का गीत गाया था। बचपन से ही उन्होंने संगीत को जीवन बना लिया था। शुरूआती दौर में संगीत सीखने को लेकर मां नाराज थीं। उनके पिता बहुत बडे़ विद्वान और दूरदर्शी थे। उनका मानना था कि बच्चों का रूझान जिस ओर हो,उसे उसी दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित  करना चाहिए। इस दौरान गाना बहुत ही चुनौतीपूर्ण था। स्टेज पर लड़कियों के गाना गाने को लेकर समाज का नज़रिया प्रगतिवादी नहीं, बल्कि रूढ़िवादिता से ग्रस्त था। तमाम विरोधों को झेलते हुए पिता ने गाँव के कार्यक्रम में गाने की इजाजत दी।
पिता ने रूढ़िवादिता से ग्रस्त लोगों को दो टूक लहजे में कहा-” आपको शरम आती है तो आप घरों में बैठिए, उसने सीखा है तो आगे बढ़ने का अवसर तो मिलना चाहिए।” इनके पिता ने अपनी बेटी के संगीत प्रेम को  बचपन में ही पहचान लिया और ट्रेनिंग शुरू करा दी। घर पर ही इन्हें संगीत की शिक्षा मिलने लगी। हालांकि, पढ़ाई भी साथ-साथ जारी रही। उन्होंने नहीं समझा होता तो आज शारदा सिन्हा नहीं होती। नाटकों के एक दृश्य से दूसरे दृश्य के बीच का जो अंतराल होता था, उस बीच वह गाती थीं।
उन्होंनें स्टेज पर पहला पहला गाना ‘जय जगदीश्वरी मातु  सदा पालनहारी’ गाया ।शादी के बाद उनकी गायकी को लेकर ससुराल में आपत्ति हुई लेकिन उनके पति ने उनका साथ दिया और संगीत साधना में रमी रहीं।सिन्हा ने 1970 के दशक में पटना विश्वविद्यालय में साहित्य का अध्ययन किया और उसी दौरान उनके मित्रों और शुभचिंतकों ने उन्हें गायन के प्रति अपने जुनून को निखारने के लिए प्रेरित किया था। बार-बार उनको इस तरह की सलाह मिलती थी, खुद उनकी भी संगीत के प्रति रुचि भी उनको आखिरकार एक प्रसिद्ध गायिका बनने की राह दिखाती चली गयी।
उन प्यार और समर्थन से ही उन्होंने गायन के प्रति अपने जुनून को आगे बढ़ाया और जल्द ही प्रसिद्धि उनके पीछे-पीछे चली गई। बकौल शारदा सिन्हा  “हमारी शादी 1970 के दशक में हुई थी और मेरे ससुराल का घर मेरे अपने घर से काफी अलग था… जहां घर पर भजन गाना ठीक था, मेरे ससुराल की महिलाओं को सार्वजनिक रूप से गाने की अनुमति नहीं थी।”लेकिन उनके ससुर और पति बृजकिशोर सिन्हा ने उनका पूरा समर्थन किया। ससुर की प्रेरणा से उन्हें ठाकुरबाड़ी में भजन गाने का मौका मिला, जिससे उनके संगीत का सफर फिर से शुरू हो पाया।  उनके ससुर से जुड़ा एक किस्सा काफी लोकप्रिय है, जब शारदा जी ने  सिर पर पल्लू लेकर तुलसीदास जी का भजन मोहे रघुवर की सुधि आई गाया। गाने के बाद समारोह स्थल पर मौजूद उनके ससुर सहित सभी लोगों ने उन्हें आशीर्वाद दिया।
शारदा सिन्हा बिहार के बेगूसराय की रहने वाली थीं। बेगूसराय शारदा सिन्हा का ससुराल था। उनके पति बृजकिशोर सिन्हा भी शिक्षा विभाग में ही काम करते थे।
शारदा सिन्हा लोक गायिका के साथ-साथ समस्तीपुर कॉलेज में प्रोफेसर भी थीं।दोनों पति-पत्नी सेवानिवृत्ति  के बाद दिल्ली से सटे इंदिरापुरम में अपने बेटे के साथ सालों से रह रहे थे।
उन्होंने दरभंगा स्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से संगीत में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की और साथ ही लोक गायिका के रूप में अपनी पहचान भी बनाई। इसके बाद फिल्म जगत में भी सिन्हा को पहचाने जाना लगा।
शारदा सिन्हा ने 1990 की मशहूर बॉलीवुड फिल्म ‘‘मैंने प्यार किया’’ में ‘‘कहे तोसे सजना’’ गीत गाया था और लोगों ने इस गाने को बहुत ज्यादा पसंद किया था। इस फिल्म में सलमान खान ने मुख्य भूमिका निभायी थी। शारदा सिन्हा इसके बाद और ज्यादा लोकप्रिय हो गईं और उन्होंने अपनी आवाज के माध्यम से लोक संगीत की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाना जारी रखा। हालांकि उन्होंने इस बात का ध्यान भी रखा कि वह कभी भी घटिया और द्विअर्थी गीत न गाएं।
शारदा सिन्हा को उनके संगीत योगदान के लिए कई पुरस्कार मिले, जिनमें 1991 में पद्मश्री, 2000 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2006 में राष्ट्रीय अहिल्या देवी अवार्ड, 2015 में बिहार सरकार पुरस्कार और 2018 में पद्मभूषण शामिल हैं।(विनायक फीचर्स)

छत्तीसगढ़ में गौवंशों के लिए CG में बनेगा 154 एकड़ में अभ्यारण्य

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 गौवंशों के लिए CG में बनेगा 154 एकड़ में अभ्यारण्य

Cow Sanctuary: छत्तीसगढ़ में गौवंशों को बचाने के लिए प्रदेश सरकार ने गौ-अभ्यारण योजना बनाई गई है. इस योजना का मुख्य उद्देश्य सड़कों पर घूमते गौवंशों को एक निश्चित जगह देना है, जहां इनको सुरक्षित और संरक्षित रखा जा सके. कुल 4 जिलों को इस योजना के लिए चिन्हांकित किया गया है, जिसमें बिलासपुर जिला भी शामिल है.

राजधानी रायपुर के बाद बिलासपुर शहर छत्तीसगढ़ का दूसरा सबसे बड़ा शहर है, जहां सड़कों पर घूम रहे आवारा मवेशियों के कारण सड़कों पर दुर्घटनाएं लगातार होती रहती हैं, जिससे सड़क पर चलने वाले मुसाफिरों और गौ वंश सड़क दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं.

सड़कों को मवेशी मुक्त बनाने के लिए गौ-अभ्यारण का निर्माण

जिले की सड़कों को मवेशी मुक्त बनाने व आवारा मवेशियों के उचित प्रबंधन के लिए गौ अभ्यारणों की निर्माण की जाएगी. गौ अभ्यारण्य के विषय में जानकारी देते हुए बिलासपुर कलेक्टर अविनाश शरण ने कहा कि बिलासपुर के कोटा ब्लॉक के जोगीपुर ग्राम में गौ अभ्यारण्य प्रस्तावित है जिसे लेकर 154 एकड़ जमीन को चिन्हित किया गया है.

154 एकड़ गौ अभ्यारण्य में रखा जा सकेगा एक हज़ार गौ वंश

उन्होंने बताया कि जिले में गौ अभ्यारण्य निर्माण के लिए शीघ्र ही पशुपालन विभाग को हस्तांतरित किया जाएगा. बिलासपुर में बनाए जाने वाले 154 एकड़ गौ अभ्यारण्य में लगभग एक हज़ार गौ वंशों को रखा जा सकेगा, जिसमें उनके इलाज और भोजन की समुचित व्यवस्था की जाएगी, इसके लिए बकायदा गौ पालक या चरवाहा की नियुक्ति भी की जाएगी.

महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्र बिंदु बने उद्धव ठाकरे* 

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(मुकेश कबीर-विनायक फीचर्स)
आज महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे चर्चित नाम है उद्धव ठाकरे। खासकर पिछले पांच साल से जैसी राजनीति महाराष्ट्र में चल रही है उसके कारण  उद्धव ठाकरे आज महाराष्ट्र में वही हैसियत रखने लगे हैं जो एक वक्त देश की राजनीति में चंद्रशेखर रखते थे। भारत के इस पूर्व प्रधानमंत्री के बारे में कहा जाता था कि “देश में यदि प्रधानमंत्री पद का सीधा चुनाव हो तो चंद्रशेखर ही जीतेंगे”  यह उनके चार महीने के प्रधानमंत्रित्व काल की वजह से जनता में बनी उनकी छवि का नतीजा था। आज ऐसी ही छवि महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की बन चुकी है। यही कारण है कि जितने भी सर्वे अभी तक आए हैं उनमें  सीएम के रूप में लोगों की पहली पसंद उद्धव ही हैं। उद्धव की लोकप्रियता का  सबसे बड़ा कारण तो यही है कि वे बाला साहेब ठाकरे के बेटे हैं ।
उनके प्रति लोगों की सिम्पैथी भी है और उनके ढ़ाई साल के शासन काल  से भी लोग संतुष्ट थे। हालांकि पालघर की घटना ने उनके शासन पर एक बड़ा दाग लगाया लेकिन इसमें उद्धव सीधे तौर से शामिल हैं ऐसा आरोप लगाने से विपक्ष भी पूरी तरह से बचता रहा। आमतौर पर  उद्धव की जो छवि  बनाई गई है उसके अनुसार उनको एक अच्छा राजनीतिज्ञ नहीं माना गया है लेकिन यह ज्यादातर दिल्ली और उत्तर भारत की धारणा है जो उद्धव को न तो नजदीक से जानते हैं और न ही निष्पक्ष बात करते हैं ।
वे उद्धव को उत्तर भारत का विरोधी  बताते हुए उन्हें हिंदू विरोधी भी बताने की कोशिश करते हैं । यही कारण है कि महाराष्ट्र की राजनीति और मराठी जानमानस की सही तस्वीर पूरी तरह देश के सामने आ ही नहीं पाती और फिर बीजेपी के लोग भी उद्धव की जो छवि पेश करते हैं, उसमें पूरी तरह खुद को पाक साफ और उद्धव को गलत बताते हैं साथ ही उद्धव को एक अयोग्य नेता करार देते हैं। इसी गलतफहमी में बीजेपी ने लोकसभा में महाराष्ट्र गंवा दिया वरना आज बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिल चुका होता। बीजेपी उद्धव को एक अयोग्य नेता बताती रही लेकिन इसी अयोग्य नेता के कारण महाराष्ट्र में बीजेपी को बाइस सीटों का नुकसान उठाना पड़ा और उद्धव के कारण ही महाराष्ट्र में कांग्रेस भी पुनर्जीवित हो गई ।
उद्धव ठाकरे असल में वो नहीं है जो उत्तरभारत का मीडिया दिखाता है या अलगाव के बाद बीजेपी जैसा उनको बताने लगी है बल्कि उद्धव एक सुलझे हुए नेता हैं। उद्धव भी अपने पिता की तरह स्ट्रेटफॉरवर्ड हैं । उनकी कथनी और करनी में ज्यादा फर्क नहीं होता जबकि आजकल की राजनीति में कहा कुछ जाता है और किया कुछ जाता है । अब नेतागण चुनाव के वक्त कुछ और बात करते हैं और शपथ लेने के बाद कुछ और बोलते हैं । ऐसे माहौल में सीधी बात करने वाले लोग मिसफिट होते हैं यही उद्धव के साथ हो रहा है जबकि उनके सामने एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस की कथनी और करनी में फर्क स्पष्ट दिखाई देता है।
शिंदे हिंदुत्व के नाम पर सरकार भी बनाते हैं और मजार पर चादर भी चढ़ाते हैं। ईमानदारी की बात भी करते हुए खुद को एक ऑटो वाला भी बताते हैं लेकिन चुनावी हलफनामे में करोड़ों की संपत्ति भी दिखाते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ तीखे शब्द बोलने वाले शिंदे जी की संपत्ति पिछले पांच साल में तीन गुना कैसे बढ़ गई ? लेकिन आज की राजनीति है ही ऐसी कि कहा कुछ जाए और किया कुछ और जाए  इसीलिए ज्यादातर नेता मीडिया के सामने बहुत सज्जन और मीठे नज़र आते हैं जबकि उनकी कार्यशैली एकदम विपरीत होती है ।
उद्धव ठाकरे मीडिया में भी खुलकर बोलते हैं और काम भी खुलकर करते हैं ,यही ट्रेनिंग उनको बाला साहेब से मिली है। एक बार  पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने कहा भी था कि शिंदे की चाल को उद्धव इसलिए नहीं समझ पाए क्योंकि उद्धव की ट्रेनिंग बाला साहेब ठाकरे के अंडर में हुई है,यदि उद्धव ने शरद पंवार जी से राजनीति सीखी होती तो शिंदे को पहली बार में ही समझ जाते, शिंदे को दूसरी बार बगावत का मौका ही नहीं देते।”बाला साहेब के स्कूल में डबल स्टेंडर्ड का काम नहीं था न  धोखे का और न ही बात छुपाने का ।
जो भी बात मन में है वो सामने बोलो यही नियम था बाला साहेब की पार्टी में। जब उद्धव को शिवसेना का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था तब बाला साहेब ने राज ठाकरे से पूछा था कि उद्धव के अध्यक्ष बनने से तुम्हें कोई दिक्कत है क्या या तुम खुद अध्यक्ष बनना चाहते हो ?जो भी बात हो साफ साफ बोलो तब राज ठाकरे ने भी उद्धव का विरोध नहीं किया था लेकिन बाद में  बग़ावत कर बैठे । बाला साहेब का भरोसा उद्धव पर ज्यादा था, इसलिए नहीं कि उनको पुत्रमोह था बल्कि इसलिए कि वे राज और उद्धव दोनों की क्षमताओं को जानते थे। शिवसेना में आपसी विवाद होने पर बाला साहेब ने कहा भी था कि “मैं धृतराष्ट्र नहीं हूं बल्कि वही कर रहा हूं जो सही है,वर्तमान समय में  उद्धव ही बेहतर है” और बाला साहेब का निर्णय गलत नहीं था। राज एक बेहतरीन वक्ता हैं बिल्कुल बाला साहेब की दूसरी कॉपी लेकिन मैनेजमेंट के मामले में उद्धव बहुत आगे हैं ।
उद्धव ज्यादा बोलते नहीं हैं लेकिन चुप रहकर अपना काम करते रहते हैं,मेहनती भी ज्यादा हैं,राजनीति में ऐसा ही नेता बेहतर साबित होता है जिसका मैनेजमेंट बेहतर हो सिर्फ भाषण नहीं। उद्धव ठाकरे अब तो भाषण भी अच्छा देते हैं,इस बार के विधान सभा चुनाव में उनके भाषण  बहुत पसंद किए गए थे जो सोशल मीडिया में भी बहुत पॉपुलर हुए और मैनेजमेंट भी उनका ऐसा है कि अपने छोटे बड़े सभी कार्यकर्ताओं से  पर्सनली बात करते हैं । यदि कहीं कोई कार्यकर्ता किसी कारण नाराज़ है तो उससे फोन पर चर्चा करके मसला जरूर सुलझाते हैं। यही कारण है कि बाला साहब के जाने के बारह साल बाद भी उद्धव ठाकरे प्रासंगिक बने हुए हैं जबकि बड़े बड़े नेता उद्धव का साथ छोड़कर चले गए। उनकी पार्टी भी तोड़ी गई, चुनाव चिन्ह भी छीन लिया लेकिन इसके बाद भी नए चुनाव चिन्ह के साथ उद्धव ने लोकसभा में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया ।
उद्धव ने न केवल खुद ने नौ सीट जीती बल्कि अपने सहयोगी कांग्रेस और NCP को भी मजबूती से वापस खड़ा कर दिया। अभी भी महाराष्ट्र में उद्धव को रैलियों में जो जन समर्थन मिल रहा है वह आश्चर्यचकित करने वाला है । अभी तक उद्धव को जनता का नेता नहीं माना जाता था उन्हें पैराशूट नेता बताते हुए उनके ऊपर आरोप लगाया जाता था कि वे  घर से बाहर नहीं निकलते लेकिन पिछले ढाई साल में उद्धव ने घर से बाहर निकलकर ही नई पार्टी खड़ी की और ऐसी जगह भी सभाएं की जहां से उन्हें पहले जान से मारने की धमकियां मिलती थीं।
उद्धव की चाहे कोई कितनी भी आलोचना करे लेकिन उनके जैसे नेता आजकल मिलते नहीं हैं । उद्धव न केवल पढ़े लिखे  हैं बल्कि एक ऐसे परिवार से आते हैं जिनके रक्त में भारतीयता कूट कूटकर भरी है,उद्धव को देश के धर्म और कला संस्कृति की भी गहरी समझ है। वे खुद भी बहुत अच्छे फोटोग्राफर रह चुके हैं,आज राजनीति में ऐसे लोगों का ही स्वागत होना चाहिए फिर वो चाहे किसी भी पार्टी के हों किसी भी विचारधारा के हों । हमारे देश में जब दसवीं फेल नेता मुख्यमंत्री या उप मुख्यमंत्री हो सकते हैं फिर पढ़े लिखे और संवेदनशील नेता का विरोध क्यों ? भारत की संस्कृति ही तो इसकी आत्मा है ।
दुनिया में हम अपनी संस्कृति के लिए ही जाने जाते हैं फिर हमारे नेता भी कम से कम ऐसे हों जिनको हमारी संस्कृति की जानकारी हो, इसमें रुचि हो, ठाकरे परिवार के सारे नेता ऐसे ही हैं,राज ठाकरे कार्टूनिस्ट हैं, आदित्य पेंटर हैं तो उद्धव फोटोग्राफर। उद्धव जब मुख्यमंत्री थे तब  थियेटर को भी  बढ़ावा देते थे और खुद दर्शकों में बैठकर कलाकारों की हौसला अफजाई करते थे।
यह सही है कि उद्धव की पार्टी एक छोटी पार्टी है लेकिन फिर भी वे वर्तमान में महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्रबिंदु हैं,किसी भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में देख लीजिए,यदि सारी पार्टियों के नेता एक मंच पर बैठे हों तो सबसे ज्यादा सवाल उद्धव से ही पूछे जाते हैं और कैमरा भी उन पर ही होता है जबकि वे न तो मुख्यमंत्री हैं न प्रधानमंत्री लेकिन उनका जनता से सीधा जुड़ाव है इसलिए उनको मीडिया कवरेज मिलता है।उनकी बात रोमांच पैदा करती है इसलिए उनको कवरेज मिलता है और उनको कवरेज हमेशा मिलता रहेगा उनके पिताजी की तरह क्योंकि वे उन्हीं के नक्शे कदम पर चल रहे हैं ।
बाला साहेब  सत्ता की राजनीति में यकीन नहीं करते थे,इसलिए अब यह बात महत्वपूर्ण नहीं होगी कि उद्धव सेना सत्ता हासिल करेगी या मेकर बनेगी और न ही उद्धव का अब यह टारगेट होगा क्योंकि उनको विपक्ष में बैठने की आदत है । सत्ता के खिलाफ लड़ना उनको विरासत में मिला है इसलिए उद्धव सेना यदि तीस पैंतीस सीट भी हासिल करती है तो भी उनकी राजनीति चलेगी,क्योंकि कम सीट जीतकर भी ज्यादा प्रभाव रखना वे अच्छे से जानते हैं,यह उन्होंने अपने पिता से सीखा है। बाला साहेब भी कभी सत्ता में नहीं रहे कभी सबसे बड़ी पार्टी नहीं रहे लेकिन फिर भी महाराष्ट्र के केंद्र बिंदु थे,आज उद्धव भी वही हैं  महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्रबिंदु।(विनायक फीचर्स)

गौ सेवा, गौ संरक्षण व गौसंवर्धन का संदेश देती है गोपाष्टमी : आचार्य त्रिलोक

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गोपाष्टमी का पर्व विशेष रूप से गायों के सम्मान, महत्ता और उनके अद्वितीय योगदान को समर्पित होता है। यह जानकारी देते हुए प्राचीन सूर्यकुंड मंदिर के आचार्य त्रिलोक शास्त्री महाराज ने बताया कि इस बार गोपाष्टमी का पर्व 9 नवंबर को मनाया जाएगा। यह सनातन धर्म का एक प्रमुख पर्व है।

उन्होंने बताया कि गोपाष्टमी का दिन कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को आता है। इस दिन गायों की पूजा करके उनकी सेवा करने से समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। उन्होंने बताया कि विशेष रूप से गोपाष्टमी व्रत विधि के तहत गोमाता और उनके बछड़े की पूजा करके उन्हें विभिन्न प्रकार के पकवान खिलाए जाते हैं। उन्होंने कहा कि गायों के साथ दुर्व्यवहार कदापि न करेंं। उन्होंने कहा कि गायों को भी झूठा खाद्य पदार्थ नहीं देना चाहिए। उन्होंने कहा कि गोपाष्टमी पर्व हमें गौसेवा, गौसंरक्षण और गौसंवर्धन का संदेश देता है। भारतीय संस्कृति में गाय को माता का दर्जा दिया गया है। आचार्य त्रिलोक ने कहा कि गौ पूजन करने वालों को कभी भी दुख का सामना नहीं करना पड़ता। गो सेवा करने वालों व इसे घर में रखने वालों के यहां सुख-समृद्धि व बरकत रहती है।

आचार्य के अनुसार मान्यता है कि गाय में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास होता है। इसकी आराधना से जीवन में नवग्रहों के दोष दूर होते हैं, धन संकट की समस्या खत्म होती है। उन्होंने बताया कि गोपाष्टमी मथुरा, वृंदावन और ब्रज के अन्य क्षेत्रों में प्रसिद्ध त्योहार है। मान्यता है कि इसी दिन से भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने गौ चरण की लीला शुरू की थी। आचार्य त्रिलोक महाराज ने बताया कि 8 नवंबर को रात 11 बजकर 56 मिनट पर अष्टमी तिथि शुरू होगी और यह 9 नवंबर रात 10 बजकर 45 तक रहेगी।