जिलाध्यक्ष की तारीफ कर रहे लोग, घायल गौ माता की सेवा में लगे
कोरिया। जिले के गौ रक्षा वाहिनी के जिलाध्यक्ष की ओर से गायों और लोगों को सड़क हादसे से बचाने के लिए एक अभिनव पहल किया जा रहा है। इस पहल के तहत जिलाध्यक्ष ने कोरिया सहित मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के नेशनल हाइवे सहित अन्य प्रमुख चौक-चौराहों पर घूमने वाले लगभग 350 गोवंशों को रेडियम पट्टी बांधी है। ताकि सड़क पर बैठी गाय दुर्घटना का शिकार होने से बच सके।
उल्लेखनीय है कि गौ रक्षा वाहिनी की ओर से पिछले 7-8 सालों से लगातार कोरिया जिले में गोवंशों की सड़कों पर सुरक्षा की दृष्टिकोण से उनकी जानमाल की रक्षा के लिए विशेष अभियान चला कर समय-समय पर गोवंशों के गले में चमकदार रेडियम पट्टी लगा रहे हैं। यह रेडियम बैल्ट (पट्टी) सड़क पर घूमने वाले पशुओं को रात के अंधेरे में दुर्घटना का शिकार होने से बचाने के लिए लगाया जाता है। इससे सामने की ओर से आने वाले वाहन चालक आसानी से देख सके और अपनी सहित गोवंश की भी रक्षा की जा सके।
आज के ही दिन सात नवंबर 1966 को गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने का कानून मांगने के लिए संसद के बाहर जुटी साधु-संतों की भीड़ पर गोलियां चलाई गई थीं
आज के ही दिन सात नवंबर 1966 को गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने का कानून मांगने के लिए संसद के बाहर जुटी साधु-संतों की भीड़ पर गोलियां चलाई गई थीं। इस गोलीबारी में कितने साधुओं की मौत हुई थी, इस पर आज भी विवाद है। यह संख्या आठ-दस से लेकर सैकड़ों के बीच बताई जाती है, लेकिन यह भारतीय इतिहास की एक बड़ी घटना थी, जिसने तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के लिए परेशानी खड़ी कर दी थी। इस घटना की 53वीं वर्षगांठ पर गुरुवार को कुछ संगठनों ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर पूरे देश में गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। जिस चौराहे पर साधुओं पर गोली चलाई गई थी, संगठनों की मांग है कि उस चौक का नाम ‘गो भक्त बलिदानी चौक’ रख दिया जाए।
क्या था मामला
दरअसल, पचास के दशक के बहुत प्रसिद्ध संत स्वामी करपात्री जी महाराज लगातार गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक कानून की मांग कर रहे थे। लेकिन केंद्र सरकार इस तरह का कोई कानून लाने पर विचार नहीं कर रही थी। इससे संतों का आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा था। उनके आह्वान पर सात नवंबर 1966 को देशभर के लाखों साधु-संत अपने साथ गायों-बछड़ों को लेकर संसद के बाहर आ डटे थे।
नंदा को देना पड़ा था इस्तीफा
संतों को रोकने के लिए संसद के बाहर बैरीकेडिंग कर दी गई थी। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी सरकार को यह खतरा लग रहा था कि संतों की भीड़ बैरीकेडिंग तोड़कर संसद पर हमला कर सकती है। कथित रुप से इस खतरे को टालने के लिए ही पुलिस को संतों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया गया। एक रिपोर्ट के मुताबिक, तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा को इस बात का अहसास था कि वे बातचीत से हालात को संभाल लेंगे, लेकिन मामला हाथ से निकल गया और गोलीबारी तक पहुंच गई। नंदा को इस घटना के बाद इस्तीफा देना पड़ा था।
सरकार को अस्थिर करने की कोशिश
इस घटना के पीछे कुछ लोग तत्कालीन राजनीति को भी जिम्मेदार बताते हैं। जानकारी के मुताबिक इंदिरा गांधी को सत्ता संभाले कुछ ही समय हुआ था। कई दूसरे दलों के नेताओं के साथ-साथ कांग्रेस के भी कुछ लोग उनके नेतृत्व से असहज थे, इसलिए सोच-समझकर इस आंदोलन के बहाने इंदिरा सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की गई थी। स्वामी करपात्री जी महाराज के इस आंदोलन को आरएसएस और जनसंघ का भी पूरा समर्थन हासिल था।
हरियाणा के करनाल के सांसद स्वामी रामेश्वरानंद इस आंदोलन का पूरा समर्थन कर रहे थे। आंदोलन के बाद कई सालों तक संघ ने इस मुद्दे को उठाया भी, लेकिन यह एक बड़ा मुद्दा नहीं बन सका। इस घटना की जांच के लिए एक कमेटी भी बनाई गई थी। इस कमेटी में कई हिंदूवादी नेता शामिल थे, लेकिन इसका भी कोई बड़ा परिणाम नहीं निकला। बाद में इस कमेटी को भंग कर दिया गया।
लाखों लोग पहुंचे थे संसद
इस घटना के प्रदर्शन के समय कितने लोग संसद पहुंचे थे, इस पर भी विवाद है। कुछ हजारों से लेकर इस संख्या को लाखों तक में बताया जाता है। इसी प्रकार इस गोलीबारी की घटना में कितने साधुओं की मौत हुई थी, इस पर भी विवाद है। लोग यह संख्या आठ-दस से लेकर सैकड़ों में बताते हैं। इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी रहे विश्व हिंदू परिषद के नेता डॉक्टर सुरेंद्र जैन ने अमर उजाला को बताया कि वे अपने नाना जी के साथ इस प्रदर्शन में भाग लेने आये थे। उनका कहना है कि इस गोलीबारी में मरने वालों की संख्या सौ से ऊपर थी। पुलिस ने प्रदर्शनकारी गोभक्तों को डीटीसी की बसों में भरकर गुड़गांव जैसे दूर इलाकों में ले जाकर छोड़ दिया था।
इन राज्यों में है गोहत्या कानून
सिक्किम देश का पहला राज्य माना जाता है, जिसने गोहत्या पर प्रतिबंध का कानून बनाया है। सिक्किम के अलावा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में गोहत्या पर प्रतिबंध है। दिल्ली और चंडीगढ़ में भी गोहत्या प्रतिबंधित है। केंद्र सरकार के स्तर पर गोहत्या रोकने के लिए अभी तक कोई कानून नहीं बनाया गया है, जबकि कई हिंदू संगठन इसके लिए लगातार मांग करते रहे हैं। हालांकि, केंद्र सरकार ने मई 2017 में द प्रिवेंशन ऑफ क्रूएलिटी टू एनीमल्स कानून को नोटिफाई कर दिया था।
इसके तहत यह सुनिश्चित करना था कि मवेशी बाजार में कोई पशु हत्या के लिए न बेचा जा सके। तब इस कानून पर खूब विवाद हुआ था। दक्षिण और पूर्व के राज्यों से इसको लेकर विरोध व्यक्त किये गए थे। केंद्र सरकार ने ‘कामधेनु आयोग’ का गठन किया है जिसका काम दुधारु पशुओं की रक्षा और संवर्धन करना है।
Video News -असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की ललकार यहाँ सिर्फ बीजेपी ही जीतेगी -Assam Chief Minister Himanta Biswa Sarma’s challenge, only BJP will win here
असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा, “अगर त्रिपुरा में दुनिया के सभी राजनीतिक दल एक साथ आ जाएं, तो भी बीजेपी को यहां जीतने से कोई नहीं रोक सकता है।”
EWS Quota SC Verdict: आर्थिक आधार पर जारी रहेगा 10 फीसदी आरक्षण, SC के 5 में 3 जजों ने जताई सहमति
SC On EWS Reservation: आर्थिक आधार पर देश में आरक्षण अब आगे भी जारी रहेगा. चीफ जस्टिय यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संवैधानिक बेंच में से तीन जजों ने आरक्षण के पक्ष में अपना फैसला दिया है. जबकि दो जजों ने पर अपनी असहमति जताई है. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय बेंच की तरफ से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था पर फैसला सुनाया जा रहा है. पांच जजों में से तीन जजों ने आर्थिक आधार पर आरक्षण का समर्थन किया है. जस्टिस माहेश्वरी ने कहा कि आर्थिक आरक्षण संविधान के मौलिक ढांचे के खिलाफ नहीं है. उन्होंने आगे कहा कि 103वां संशोधन वैध है.
जस्टिस बेला त्रिवेदी ने भी इस फैसले पर सहमति जताई है. उन्होंने कहा कि मैं जस्टिस माहेश्वरी के निष्कर्ष से सहमत हूं. उन्होंने कहा कि एससी/एसटी/ओबीसी को पहले से आरक्षण मिला हुआ है. उसे सामान्य वर्ग के साथ शामिल नहीं किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि संविधान निर्माताओं ने आरक्षण सीमित समय के लिए रखने की बात कही थी. लेकिन 75 साल बाद भी यह जारी है. अब जस्टिस जेबी पारडीवाला फैसला पढ़ेंगे.
जस्टिस रविन्द्र भट ने जताई असहमति
आर्थिक आधार पर आरक्षण फैसला देते हुए जस्टिस रविन्द्र भट ने असहमति जताई है. रविन्द्र भटा ने कहा कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा SC/ST/OBC का है. उनमें बहुत से लोग गरीब हैं. इसलिए, 103वां संशोधन गलत है. जस्टिस एस रविंद्र भाट ने 50 प्रतिशत से ऊपर आरक्षण देने को भी गलत माना है. जस्टिस एस रविंद्र भाट ने 50 प्रतिशत से ऊपर आरक्षण देने को भी गलत माना है.उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 15(6) और 16(6) रद्द होने चाहिए. जबकि, चीफ जस्टिस ललित ने भी आर्थिक आधार पर आरक्षण का विरोध किया है. उन्होंने कहा कि मैं जस्टिस रविंद्र भाट के फैसले से सहमत हूँ. यानी सुप्रीम कोर्ट ने 3-2 के बहुमत से EWS आरक्षण को बरकरार रखा है.
महाराष्ट्र प्रदेश संयोजक झारखंड प्रकोष्ठ पद पर प्रेम कुमार की नियुक्ति
मुंबई. महाराष्ट्र बीजेपी ने हिंदी भाषियों को जोड़ने के लिए प्रेम कुमार को महाराष्ट्र प्रदेश संयोजक झारखंड प्रकोष्ठ पद पर नियुक्त किया है.
मूल रूप से झारखंड के रहने वाले प्रेम कुमार मुंबई और आसपास के जिलों में रहने वाले झारखंड मतदाताओं पर अच्छा खासा प्रभाव रखते हैं। उत्तर भारतीय मोर्चा, भाजपा महाराष्ट्र के अध्यक्ष डॉ. संजय पाण्डेय व उपाध्यक्ष कपिल राज वर्मा ने प्रेम कुमार को नियुक्ति पत्र दिया.
गौरतलब है कि मुंबई की 227 सीटों में से 50 से ज्यादा सीटें ऐसी हैं, जहां हिंदी भाषियों का वर्चस्व है। मुंबई से सटे मीरा-भायंदर, वसई-विरार-नालासोपारा, ठाणे, नवी मुंबई, उल्हासनगर को भी जोड़ दिया जाए, तो यह संख्या 100 सीटों के पार चली जाती है। इन सभी महानगरपालिकाओ में चुनाव होने हैं। यही कारण है कि बीजेपी पूरी तरह से सक्रिय हो गई है। इसी कड़ी में झारखंड में अपना खासा प्रभाव रखने वाले प्रेम कुमार को उत्तर भारतीय मोर्चा, महाराष्ट्र प्रदेश संयोजक झारखंड प्रकोष्ठ पद पर नियुक्त किया गया है। उत्तर भारतीय मोर्चा, भाजपा महाराष्ट्र के अध्यक्ष डॉ. संजय पाण्डेय ने नियुक्ति पत्र देकर उनसे पार्टी की विचारधारा और नीति के अनुसार पार्टी की प्रगति के लिए हर संभव प्रयास करने की प्रेरणा दी।

झारखण्ड में लोकप्रिय हैं प्रेम कुमार
बीजेपी का ये फैसला एक तीर से दो निशाने नहीं बल्कि एक तीर से कई निशाने लगाने जैसा है. मूल रूप से झारखंड के रहने वाले प्रेम कुमार मुंबई और आसपास के जिलों में रहने वाले झारखंड मतदाताओं पर अच्छा खासा प्रभाव रखते हैं। इसके साथ ही उनके पास जमीनी स्तर पर काम करने का गहरा राजनीतिक अनुभव है। ऐसे में इनको झारखंड प्रकोष्ठ पद की कमान मिलने से कार्यकर्ताओं में सीधा-सीधा संदेश ये भी गया है कि पार्टी में जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं और परिश्रम का सम्मान होता है, जो कार्यकर्ताओं के मनोबल और ऊर्जा को सातवें आसमान पर पहुंचाने में कारगर साबित होगा।
बीएमसी जीतने की कवायद तेज
मुंबई: एकनाथ शिंदे के मुख्यमंत्री और देवेंद्र फडणवीस के उप मुख्यमंत्री बनने के साथ ही बीजेपी ने राज्य की सत्ता पर कब्जा कर लिया। ढाई साल बाद बीजेपी उद्धव ठाकरे नीत कांग्रेस, एनसीपी सरकार को हटाने में सफल रही। एकनाथ शिंदे के साथ शिवसेना के 39 विधायकों के बीजेपी के साथ आने से मुंबई सहित पूरे एमएमआर का राजनीतिक दृश्य बदल गया है। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की मदद से और उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में बीजेपी ने देश की सबसे समृद्धशाली मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) सहित अन्य 14 महानगर पालिकाओं को जीतने का लक्ष्य रखा है। राज्य में सत्ता परिवर्तन होते ही मुंबई बीजेपी ने ट्वीट कर अपने इरादे जाहिर कर दिए। बीजेपी ने अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को सक्रिय कर दिया है।
बीएमसी का पिछला चुनाव
वर्ष 2017 के बीएमसी चुनाव में शिवसेना-बीजेपी ने आमने-सामने चुनाव लड़ा था। तब शिवसेना के 84 और बीजेपी के 82 नगरसेवक चुन कर आए थे। वहीं कांग्रेस के 31, एनसीपी के 9, मनसे के 7, सपा के 6, एमआईएम के 2 नगरसेवक चुन कर आए थे। लगभग 46 हजार करोड़ रुपये के बजट वाली मुंबई महानगर पालिका में शिवसेना 26 वर्षों से सत्ता में है।
मुंबई में 236 चुनावी वार्ड हैं
अतिरिक्त नगर आयुक्त डॉ संजीव कुमार ने कहा, “हमने चुनाव आयोग द्वारा बनाई गई मतदाता सूचियों का उपयोग किया है और इसे वार्ड-वार विभाजित किया है. शहर में 236 चुनावी वार्ड हैं. नागरिकों को वेबसाइट पर जाकर अपने नाम, पता, आयु की जांच कर सकते हैं.” कुमार ने नागरिकों से अपील की कि यदि वे अपना नाम नहीं ढूंढ पा रहे हैं या इसे गलत तरीके से दूसरे वार्ड में शामिल किया गया है या यदि कोई स्पेलिंग और क्लेरिकल मिस्टेक है, तो नागरिक संबंधित प्रशासनिक वार्ड से असेसमेंट विभाग में संपर्क कर सकते हैं और इसे मतदाता सूची सही कर सकते हैं.यदि नागरिक भारत से बाहर हैं, तो वे अपने सुधार एमसीजीएम को मेल कर सकते हैं.
पांच वर्षों में 7 लाख 12 हजार 925 मतदाताओं की वृद्धि हुई है
बीएमसी के अनुसार, वर्ष 2017 में 91,64,125 मतदाता थे और 2022 में यह बढ़कर 98,770,50 हो गए हैं. आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों में 7 लाख 12 हजार 925 मतदाताओं की वृद्धि हुई है. 4 मई को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद, राज्य चुनाव आयोग (एसईसी) ने बीएमसी को आगामी चुनाव के लिए आगे की प्रक्रिया आयोजित करने का निर्देश दिया था. तदनुसार, 30 मई को, बीएमसी ने बांद्रा के रंगशारदा सभागार में एक चुनावी वार्ड आरक्षण लॉटरी आयोजित की थी, जिसमें 118 वार्ड महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित रखे गए थे.











