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शिंदे गुट और महानायक ने असम बाढ़ पीड़ितों के लिए दान किए 51 लाख रुपए

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महाराष्ट्र में सियासी संकट जारी है। इस बीच एक बड़ी खबर सामने आई है। महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने 30 जून को स्पेशल सेशन बुलाया है। उन्होंने सीएम ठाकरे को फ्लोर टेस्ट कराने को कहा है। इसके अलावा एक खबर ये भी सामने आई है कि बागी नेता एकनाथ शिंदे कल यानी गुरुवार को मुंबई जाएंगे। वह फ्लोर टेस्ट में शामिल होंगे। आज शिंदे ने कामाख्या देवी मंदिर में दर्शन भी किए हैं।

वही खबर ये भी है कि इस गुट ने असम बाढ़ के राहत कोष में ५१ लाख का अनुदान किया है। महानायक अमिताभबच्चन ने भी आगे बढ़ कर मानवता की मिशाल पेश करते हुए ५१ लाख की धनराशि धान की है
असम में बाढ़ की वजह से जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित हुआ है।

बाढ़ की चपेट में काजीरंगा नेशनल पार्क भी आ गया है, जिससे जानवरों को भी परेशानी हो रही है। बाढ़ से बिगड़े हालात के बाद मदद के लिए कई लोग सामने आए हैं। मदद करने वालों में बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन भी शामिल हैं।

अमिताभ न सिर्फ बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए आगे आए हैं बल्कि उन्होंने दूसरों से भी मदद की अपील की है। महानायक ने ट्वीट कर कहा है कि ‘असम संकट में है, बाढ़ ने बहुत नुकसान पहुंचाया है। हमारे भाइयों और बहनों के लिए देखभाल और सहायता भेजें। सीएम राहत कोष में उदारता से योगदान करें। मैंने अभी-अभी किया है, क्या आपने किया?’

जघन्यहत्या , निर्मम हत्या , मज़हबी हत्या , तालिबानी हत्या ,जिहादी बनने की स्पेशल ट्रेनिंग

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उदयपुर हत्याकांड का पाक कनेक्शन सामने आया है। बताया जा रहा है कि कन्हैया का गला काटने वाले दोनों आरोपी पाकिस्तान के दावत-ए-इस्लामी संगठन से जुड़े हुए थे। यह संगठन 100 से ज्यादा देशों में सक्रिय है और इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए कई तरह के ऑनलाइन कोर्स भी चला रहा है। इससे पहले भारत में इस इस्लामी संगठन पर धर्मांतरण के भी आरोप लग चुके हैं। ऐसी भी खबरें आई हैं कि इस संगठन द्वारा जगह-जगह पर दान पेटियां रखी जाती हैं। आरोप है इनके माध्यम से आने वाले धन को गलत गतिविधियों में इस्तेमाल किया जाता है। आइए जानते हैं क्या है दावत-ए-इस्लामी, किस तरह से 100 से ज्यादा देशों में फैला है इसका नेटवर्क…

जानते हैं क्या है दावत-ए-इस्लामी?

दावत-ए-इस्लामी खुद को गैर राजनीतिक इस्लामी संगठन करार देता है। इसकी स्थापना 1981 में पाकिस्तान के कराची में हुई थी। मौलाना अबू बिलाल मुहम्मद इलियास ने इस इस्लामिक संगठन की स्थापना की थी। भारत में यह संगठन पिछले चार दशकों से सक्रिय है। शरिया कानून का प्रचार-प्रसार करना और उसकी शिक्षा को लागू करना संगठन का उद्देश्य है। इस समय यह संगठन करीब 100 से ज्यादा देशों में अपना नेटवर्क फैला चुका है।
कौन से 32 ऑनलाइन कोर्स चला रहा?
दावत-ए-इस्लामी की अपनी खुद की वेबसाइट है। वेबसाइट के माध्यम से यह इस्लामिक संगठन कट्टर मुसलमान बनने के लिए शरिया कानून के तहत इस्लामी शिक्षाओं का ऑनलाइन प्रचार-प्रसार कर रहा है। करीब 32 तरह के इस्लामी कोर्स इसकी वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। महिलाओं व पुरुषों दोनों के लिए अलग-अलग तरह के कोर्स हैं। इसके अलावा यह संगठन कुरान पढ़ने और मुसलमानों को हर तरीके से शरिया कानून के लिए तैयार करता है।

जिहादी बनने की दी जाती है स्पेशल ट्रेनिंग

दावत-ए-इस्माली संगठन पर कई बार धर्मांतरण के आरोप भी लगे हैं। यह संगठन अपनी वेबसइट पर एक न्यू मुस्लिम कोर्स भी संचालित करता है। यह कोर्स भी पूरी तरह से ऑनलाइन है। इसका उद्देश्य धर्मांतरण कर नए-नए मुसलमानों को इस्लामी शिक्षाओं से रूबरू कराना है। इस कोर्स के माध्यम से धर्मांतरण करने वालों को जिहादी बनने की स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है।

ऑनलाइन कोर्स से जुड़े थे दोनों आरोपी

मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि उदयपुर में कन्हैयालाल की हत्या करने वाले दोनों आरोपी मोहम्मद रियाज और गौस मोहम्मद ‘दावत-ए-इस्लामी’ नाम के संगठन से जुड़े हुए हैं। ये दोनों इस्लामी संस्था के ऑनलाइन कोर्स से जुड़े हुए हैं। हत्या के बाद दोनों आरोपी अजमेर दरगाह जियारत के लिए जाने वाले थे। दरअसल, यह संगठन दुनिया भर में सुन्नी कट्टरपंथ को बढ़ावा देता है।

एनआईए और एसआईटी करेगी जांच

हत्या की जांच करने के लिए राज्य सरकार ने एसआईटी का गठन किया। एसआईटी टीम उदयपुर पहुंच गई है। इस हत्याकांड की जांच एनआईए भी करेगी। एनआईए की टीम भी आज उदयपुर पहुंचेगी। दरअसल, इस हत्याकांड के पीछे अंतरराष्ट्रीय साजिश की बात भी सामने आ रही है। नुपुर शर्मा की पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी के बाद आतंकवादी संगठन अलकायदा भी धमकी दे चुका है।

शौर्य चक्र पैरा कमांडो मधुसूदन सुर्वे पर बायोपिक बनाएंगे नीरज पाठक!

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मुम्बई। मराठा शूरवीर योध्या, शौर्य चक्र से सम्मानित और देश के लिए अपनी जान तक न्योछावर कर देने वाले भारत के सपूत पैरा कमांडो मधुसूदन सुर्वे की जीवनी पर फ़िल्म बनने वाली है। बॉलीवुड के डायरेक्टर नीरज पाठक ने मधुसूदन सुर्वे की बायोपिक बनाने के राइट खरीद लिए हैं और हाल ही में उनके गाँव शिवतर (खेड़ डिस्ट्रिक्ट) में जाकर उनसे मिलकर फिल्म बनाने की घोषणा की।
मराठा फ्रीडम फाइटर पर फिल्मी इतिहास में अद्भुत फिल्में बनी जिसमें उनकी शौर्य गाथा को बड़े पर्दे पर जीवंत किया और अब मराठा पैरा कमांडो जिन्होंने देश के लिए 11 गोलियां खाई और अपना एक पैर तक गंवा दिया उनके बलिदान और मातृप्रेम को सलामी देने का इससे बेहतर तरीका नही हो सकता।
लेखक-निर्माता-निर्देशक नीरज पाठक, इस युद्ध नायक के जीवन की अमरगाथा को दिखाने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं, और पैरा कमांडो सुर्वे के गांव शिवतर में मेगा बायोपिक लॉन्च करने की घोषणा की, जो देशभक्ति में डूबा हुआ एक गांव है।
मराठा युद्ध के नायक मधुसूदन सुर्वे जी को शॉल देकर सम्मानित करने का फैसला करते हुए भावुक नीरज पाठक कहते हैं कि भारत तब तक आजाद रहेगा, जब तक यहां मधुसूदन सुर्वे जैसे वीरों का घर है। नीरज पाठक के रोंगटे खड़े हो गए जब उन्होंने सुना कि एक युद्ध के दौरान साथी सिपाही को बचाते हुए मधुसूदन सुर्वे को 11 गोलियां लगी। उनका पैर बुरी तरह से जख्मी हो गया था और उन्होंने अपने बाएं पैर के अवशेषों को घुटने तक काट दिया।
अस्पताल से पूर्व-विच्छेदन सर्जरी के दौरान भी अपनी पत्नी को फोन करके कहा कि वह फुटबॉल खेलते समय घायल हो गए थे और उनके आस-पास के लोगों के अलावा कोई भी भाप नहीं सकता था कि वो मौत के मुँह से बचकर आ गए।


डायरेक्टर नीरज पाठक ने इस बायोपिक के बारे में बताया कि मैंने पैरा कमांडो मधुसूदन सुर्वे जी की बायोपिक बनाने के राइट खरीद लिए है और रिसर्च वर्क शुरू करने वाले हैं। मधुसूदन सुर्वे जी हमारे बीच है, जिनके जरिये हमे उनके बारें में रिसर्च वर्क करने में आसानी होगी। फ़िल्म बहुत ही जल्द फ्लोर पर जाएगी और हम बॉलीवुड के किसी ‘ए’ लिस्टर से बात करेंगे, जिन्होंने आज तक कोई भी कमांडो ऑफिसर का रोल नही निभाया या बायोपिक नही की है। इसके अलावा अगले साथ तक हम फिल्म को रिलीज करेंगे।
नीरज पाठक आगे कहते हैं कि युद्ध में केवल विजेता होते हैं, कोई उपविजेता नहीं। एक सैनिक या तो तिरंगा फहराता है या उसमें लिपटा हुआ वापस आता है। मधुसूदन सुर्वे की बहादुरी विस्मयकारी है, यही कारण है कि मैंने उनकी बायोपिक के अधिकार लिए।


ज्ञात हो कि मधुसूदन सुर्वे एक पूर्व पैराकमांडो हैं जिन्हें दुश्मन की रेखाओं के पीछे काम करने और दुश्मन के बचाव को विफल करने के लिए चुना गया। उन्हें दुश्मन की रेखाओं के पीछे गहरी पैठ और सर्जिकल स्ट्राइक के माध्यम से महत्वपूर्ण दुश्मन बुनियादी ढांचे और संचार के खुफिया सुधार, तोड़फोड़ और तोड़फोड़ करने के लिए प्रशिक्षित किया गया था।
कोंकण के रत्नागिरी, खेड़ जिला के शिवतर गाँव के रहने वाले पैरा कमांडो मधुसूदन सुर्वे के सैनिकों के गांव से आते हैं। वह असम में ऑपरेशन राइनो, जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन रक्षक, कारगिल में ऑपरेशन विजय, नागालैंड में ऑपरेशन ऑर्किड और मणिपुर में ऑपरेशन हिफाजत पर ड्यूटी पर रहे, जहां उन्होंने और उनकी टीम ने एक अंग खोने और लगभग घातक रूप से घायल होने के बावजूद 32 से अधिक आतंकवादियों का सफाया कर दिया। वह कांगो, दक्षिण अफ्रीका में संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षा निगरानी मिशन पर भी थे। उनके परिवार की अगली पीढ़ी भी देश की सेवा के लिए काम कर रही है। उनका बेटा एनडीए की तैयारी कर रहा है और बेटी मेडिकल क्षेत्र में काम कर रही है। मधुसूदन सुर्वे को 2005 में मणिपुर में नक्सलियों के खिलाफ असाधारण लड़ाई के लिए शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था, और इस घटना के बाद उन्होंने छह साल की सेवा की और 2011 में सक्रिय ड्यूटी से सेवानिवृत्त हुए।
आपको बता दें कि रत्नागिरी के खेड़ तालुका के शिवतर गांव को सैनिकों के गांव के रूप में जाना जाता है। इस गांव के हर घर से भारतीय सेना में शामिल होने की परंपरा आज भी जारी है। प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों में 18 बहादुर सैनिक इस गांव के बेटे थे, और अधिकांश निवासी अभी भी सेना में सेवारत हैं। गाँव के हाई स्कूल में महाराष्ट्र के वीर किलों के नाम पर कक्षाएं हैं। वास्तव में, कमांडो सुर्वे के परिवार की कई पीढियां सेना में रही हैं। वहां के ग्रामीण निवासी गर्व से कहते हैं कि उन्हें स्कूली दिनों से ही भारतीय सेना में शामिल होने का अवसर मिला। वहाँ पर देश के लिए लड़ने के लिए और शारीरिक बल को मजबूत करने के लिए फिटनेस क्लब हैं। इस गाँव में सेना ही नहीं, गांव की युवा पीढ़ी भी पुलिस बल और चिकित्सा के क्षेत्र में देश की सेवा कर रही हैं। जन गण मन खेड़ के छत्रपति संभाजी राजे सैनिक स्कूल में हर कक्षा में गूंजता है, जहां आज, युवा लड़के शिवतर गांव के शहीद पुत्रों के सम्मान में शहीद स्तम्भ की ओर मार्च पास्ट करते हैं।
तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने देश के लिए उनके योगदान को याद करने के लिए शिवतर में शहीद सैनिकों का एक वीर स्मारक बनवाया।

ब्रिक्स और विरोधाभास,

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ब्रिक्स के गठन की नींव बीस साल पहले पड़ी थी। तब इसके पीछे मकसद अमेरिकी आर्थिक ढांचे से हट कर एक वैकल्पिक आर्थिक व्यवस्था का निर्माण करना था। यह विचार अच्छा था, पर इस पर ढंग से काम नहीं हो पाया। इसलिए 2009 के बाद से ब्रिक्स के औचित्य पर ही सवाल खड़े किए जाने लगे।

हाल में ब्रिक्स देशों की चौदहवीं शिखर बैठक में सदस्य देशों ने अलग-अलग बातें कहीं। रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने अमेरिका और पश्चिमी देशों पर निशाना साधा और रूस पर आर्थिक प्रतिबंध थोपने की निंदा की। साथ उन्होंने मौजूदा वैश्विक आर्थिक संकट के लिए इन देशों को दोषी ठहराया। दूसरी तरफ सकारात्मक पहलू को रेखांकित करते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व आर्थिक व्यवस्था को बेहतर और लोकतांत्रिक बनाने पर जोर दिया और महामारी से निपटने के लिए बेहतर स्वास्थय व्यवस्था को भी अपने भाषण का हिस्सा बनाया। जबकि चीन ने दुनिया को शीत युद्ध से बचने की नसीहत दी। दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील ने भी महामारी और उससे निपटने में ब्रिक्स के योगदान का जिक्र किया। इससे यह साफ हो गया कि ब्रिक्स के सदस्य देशों की प्राथमिकताएं क्या हैं।

ब्रिक्स की सार्थकता और गतिशीलता को देखा जाए तो कई विसंगतियां और विरोधाभास सामने आते दिखाई देते हैं। भारत और चीन के बीच जिस तरह का गतिरोध बना हुआ है और भारत को लेकर चीन का जो आक्रामक रुख कायम है, उससे ब्रिक्स की एकता कहीं न कहीं प्रभावित होती है। ताजा विवादों को लेकर चीन अपनी जिद पर अड़ा है। भारत ने 1950 से लेकर 2019 तक चीन की हर मुसीबत में साथ दिया। इसके बावजूद चीन की नजर में भारत एक सहयोगी नहीं, बल्कि विरोधी है, इस सोच ने दोनों देशों के बीच तल्खी पैदा कर दी।

आज भारत को ब्रिक्स और पश्चिमी कूटनीति के बीच जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है, वैसी स्थिति पहले शायद ही कभी बनी हो। लेकिन जिस कुशलता के साथ भारत ने क्वाड और ब्रिक्स में संतुलन साधा है, वह विदेश नीति के मोर्चे पर कम बड़ी बात नहीं है। जर्मनी में जी-7 देशों की बैठक में भी ब्रिक्स के दो सदस्य भारत और दक्षिण अफ्रीका मौजूद हैं। यह भी कि यूक्रेन युद्ध के मसले पर संयुक्त राष्ट्र में तटस्थ नीति छोड़ने के लिए भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका पर दबाव भी बनेगा। जबकि भारत पहले भी अपनी बात स्पष्ट कर चुका है।

ब्रिक्स की प्रासंगिकता का को लेकर भी सवाल उठ ही रहे हैं। दरअसल चीन ब्रिक्स का विस्तार करने की कोशिश में लगा है। ब्रिक्स प्लस बनाने के पीछे चीन की योजना यही है कि वह अमेरिकी और पश्चिमी ताकतों के समांतर नया समूह खड़ा कर सके। लेकिन उसकी यह कोशिश क्या सिरे चढ़ पाएगी, यह बड़ा सवाल है। अगर ब्रिक्स का विस्तार होता है तो भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की क्या भूमिका होगी, यह स्पष्ट नहीं है। गौरतलब है कि भारत अमेरिका के नेतृत्व वाले क्वाड समूह का भी महत्त्वपूर्ण सदस्य है।

ब्रिक्स के गठन की नींव बीस साल पहले पड़ी थी। तब इसके पीछे मकसद अमेरिकी जनित आर्थिक ढांचे से हट कर एक वैकल्पिक आर्थिक व्यवस्था का निर्माण करना था। यह विचार अच्छा था, पर इस पर ढंग से काम नहीं हो पाया। इसलिए 2009 के बाद से ब्रिक्स के औचित्य पर ही सवाल खड़े किए जाने लगे। अब इस बात की आशंकाएं गहराती जा रही हैं कि कहीं ब्रिक्स के विस्तार की आड़ में इसके विघटन की शुरूआत न होने लगे। इसके कारण हैं।

पहला कारण यह कि ब्रिक्स का विस्तार चीन अपने नक्शे कदम पर करना चाहता है। उसकी कोशिश जी-20 संगठन से कुछ देशों को ब्रिक्स में शामिल करने की है। इसमें इंडोनेशिया भी है। गौरतलब है कि इंडोनेशिया को लेकर भारत के रिश्ते अच्छे हैं। चीन अफ्रीका के दो महत्त्वपूर्ण देशों- नाइजीरिया और सेनेगल को भी ब्रिक्स में शामिल करने की कोशिश करेगा। इनके शामिल होते ही संगठन में दक्षिण अफ्रीका की अहमियत घटने लगेगी। दक्षिण अफ्रीका की सहमति के बिना इनको खेमे में लेना ब्रिक्स के विघटन का कारण बन सकता है।

इसी तरह अर्जेंटीना के ब्राजील से अच्छे रिश्ते नहीं है। अगर ब्राजील की सहमति के बिना अर्जेंटीना को ब्रिक्स में लिया गया तो यह भी कम पेचीदा स्थिति नहीं होगी। चीन की सूची में कई और भी देश हैं। चीन की पूरी कोशिश एक ऐसा नया खेमा खड़ने की है जो अमेरिका और उसके वर्चस्व वाले खेमे को चुनौती दे सके।

दूसरा कारण यह है कि ब्रिक्स का आर्थिक आधार अभी भी बहुत कमजोर है। अभी पांचों देशों की कुल आबादी तकरीबन दुनिया की चालीस फीसद के करीब है। पांचों देशों की जीडीपी वैश्विक जीडीपी का एक चौथाई है। पच्चीस लाख करोड़ डालर की अर्थव्यवस्था अठारह लाख करोड़ तो केवल चीन का हिस्सा है, जबकि भारत साढ़े तीन लाख करोड़ के साथ दूसरे स्थान पर है। बाकी तीन देशों की स्तिथि बेहद नाजुक है। वैश्विक महामारी में ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका काफी पीछे रह गए हैं। ब्रिक्स का आपसी व्यापार मुश्किल से बीस फीसद रह गया है। ऐसे हालात में इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि ब्रिक्स यूरोपियन महासंघ या जी-7 की बराबरी कर पाएगा?

तीसरी वजह यूक्रेन युद्ध ने एक नई मुसीबत खड़ी कर दी है। एक बार फिर से दुनिया दो खेमों में बंट गई है। नए शीत युद्ध का आगाज होता दिख रहा है। यूक्रेन युद्ध के कारण कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के दामों में भारी इजाफा हुआ है। दरअसल चीन इस युद्ध को लेकर अपनी चौकड़ी बनाने की कवायद में लगा है। सैन्य रूप से मजबूत रूस आर्थिक रूप से पूरी तरह से कमजोर पड़ता जा रहा है। युद्ध ने उसकी हालत और जर्जर बना दी है। इसलिए चीन रूस को लेकर एक ऐसा गुट बनाना चाहता है जो दुनिया का मठाधीश बनने के उसके सपने को पूरा कर सके। इसके लिए वह ताइवान पर हमले का पत्ता भी चलने को तैयार दिखता है।

चौथा कारण यह कि चीन तेजी से विस्तारवादी नीति पर चल रहा है। श्रीलंका, पाकिस्तान, मलेशिया, आस्ट्रेलिया और कई अफ्रीकी देश चीन की इस कुटिलता का दंश झेल रहे हैं। जहां तक सवाल है भारत का, तो भारत और चीन के बीच दो साल से गंभीर टकराव चल रहा है। हालांकि चीन इसे गंभीर सीमा विवाद के रूप में नहीं देख रहा, पर भारत के लिए यह बेहद नाजुक मसला बन गया है। भारत ने साफ कर दिया है कि विवादित स्थलों से पहले चीनी सेना की वापसी हो तभी और बातचीत संभव होगी। चीन ने पिछले कुछ वर्षो में जिस तरीके से वैश्विक व्यवस्था को अपने तरीके से संचालित करने की साजिश रची है, उससे दुनिया के तमाम देशों का चिंतित होना स्वाभाविक है। दुनिया के सामने कभी भी इतना डर और संशय नहीं रहा जितना कि आज इस बात को लेकर है कि अगर चीन दुनिया का मुखिया बन गया तो क्या होगा?

अब यूक्रेन युद्ध की वजह से वैश्विक राजनीति के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। चीन भारत पर इस बात के लिए दबाव बनाने की कोशिश करेगा कि वह यूक्रेन के मुद्दे पर रूस और चीन के साथ खड़ा हो। लेकिन भारत जिस तरह से तटस्थता की नीति पर चल रहा है, उसमें यह आसान नहीं है। ऐसे में अगर ब्रिक्स में चीन और रूस के दबाव में कुछ ऐसे निर्णय लिए जाते हैं जो दूसरे सदस्यों की सोच सके विपरीत होंगे, तो इससे ब्रिक्स में एक तरह की फूट पड़ सकती है और इसकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े हो सकते हैं। अभी दुनियाभर के प्रमुख देशों की नजर भारत पर टिकी है। भारतीय कूटनीति के लिए यह भी अग्निपरीक्षा का समय है। हालांकि, भारत ने शुरू से साफ कर दिया है कि यूक्रेन के मुद्दे पर उसकी विदेश नीति तटस्थता की है और रहेगी।

आयुर्वेद की सलाह- खाली पेट करें घी का सेवन,

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बेहतर स्वास्थ्य के लिए आहार में जिन चीजों का शामिल करने पर विशेष जोर दिया जाता रहा है, डेयरी उत्पाद उनमें से एक हैं। इसमें भी दैनिक रूप से घी का सेवन करना आपके लिए विशेष लाभदायक हो सकता है। आयुर्वेद से लेकर मेडिकल साइंस तक, विशेषज्ञों ने घी को बेहद पौष्टिक आहार के रूप में वर्गीकृत किया है। घी, भारतीय सुपरफूड माना जाता है जो न केवल अपने विशिष्ट स्वाद बल्कि तमाम स्वास्थ्य लाभ के लिए भी काफी पसंदीदा रहा है। पर क्या आप जानते हैं कि घी का सेवन खाली पेट करना आपके लिए और भी फायदेमंद हो सकता है?

आयुर्वेद में घी को बेहद पौष्टिक आहार के रूप में बताया गया है। खाली पेट इसका सेवन करने से इसके और भी कई फायदे मिलते हैं। अपने दिन की शुरुआत घी से करने से आपका पाचन तंत्र साफ रहता है। कब्ज और पेट की अन्य कई समस्याओं को ठीक करने के लिए भी इसे बहुत ही प्रभावी माना जाता है। घी ओमेगा -3 फैटी एसिड का एक समृद्ध स्रोत है जो एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को कम करता है। आइए रोजाना खाली पेट घी के सेवन से सेहत को होने वाले फायदों के बारे में विस्तार से जानते हैं।

घी के हैं कई स्वास्थ्य लाभ,
आयुर्वेद विशेषज्ञों के मुताबिक गाय का घी एक प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट के रूप में जाना जाता है जो फ्री रेडिकल्स से शरीर की रक्षा करने के साथ ऑक्सिडेशन प्रक्रिया को रोकता है। इस प्रकार यह हमारे मस्कुलोस्केलेटल सिस्टम में अपक्षयी परिवर्तनों को रोकने के साथ समय से पहले बुढ़ापे और अल्जाइमर रोग के जोखिम को कम करने में मददगार हो सकता है। खाली पेट इसका सेवन करना आपके लिए विशेष लाभकारी साबित हो सकता है।

खाली पेट घी के सेवन के लाभ,

-आयुर्वेद में घी के सेवन के तमाम स्वास्थ्य लाभ का जिक्र मिलता है। इसका खाली पेट सेवन करने से यह लाभ कई गुना तक बढ़ जाता है।
-यह आपके पाचन तंत्र को साफ करने में मदद करता है।
-खाली पेट घी खाने से त्वचा में निखार पाने में मदद मिलती है।
-यह नियमित मल त्याग को ठीक करने में मदद करता है।
-खाली पेट घी खाने से यह भूख को लंबे समय तक नियंत्रित करने में मदद करता है।
-यह अनुकूल एंजाइमों के साथ आपकी आंत के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है।
-हड्डियों की शक्ति और शारीरिक शक्ति को बढ़ाने में भी घी का सेवन फायदेमंद माना जाता है।

शारीरिक शक्ति को देता है बूस्ट,

घी को वर्षों से शक्तिवर्धक आहार के रूप में जाना जाता है। घी में स्वस्थ संतृप्त वसा, फैटी एसिड, विटामिन (ए, डी, ई, के 2) और एंटीऑक्सिडेंट मौजूद होते हैं। खाली पेट इसका नियमित सेवन ऊर्जा के स्तर को बढ़ाता है और दिनभर काम करने की शक्ति प्रदान करता है। घरेलू उपचार के तौर पर शारीरिक कमजोरी वाले लोगों को घी के सेवन की सलाह दी जाती रही है।

अबू धाबी में पीएम मोदी से गर्मजोशी से मिले UAE के राष्ट्रपति

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अबू धाबी,28 जून : जी-7 शिखर सम्मेलन के बाद मंगलवार को संयुक्त अरब अमीरात पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने अबू धाबी में गर्मजोशी से स्वागत किया। जानकारी के मुताबिक, पीएम मोदी और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद ने अबू धाबी में एक बैठक भी की। पीएम मोदी ने इस दौरान खाड़ी देश के पूर्व राष्ट्रपति शेख खलीफा बिन जायद अल नाहयान के निधन पर अपनी गहरी संवेदना प्रकट की। इसके बाद पीएम मोदी वहां से रवाना हो गए।

#WATCH | UAE President Sheikh Mohamed bin Zayed Al Nahyan warmly receives Prime Minister Narendra Modi in Abu Dhabi, UAE.


अरिंदम बागची ने कहा… विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने अबू धाबी से कहा, “एक बहुत ही खास अंदाज में, हिज हाइनेस शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और शाही परिवार के सदस्य पीएम मोदी से मिलने और बातचीत करने के लिए अबू धाबी के हवाई अड्डे पर आए, ताकि पीएम को पूरे रास्ते से होकर शहर न जाना पड़े।

पूर्व राष्ट्रपति के निधन पर शोक जताएंगे पीएम मोदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खाड़ी देश के पूर्व राष्ट्रपति शेख खलीफा बिन जायद अल नाहयान के निधन पर व्यक्तिगत रूप से शोक जताने के लिए अपनी संक्षिप्त यात्रा पर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) पहुंचे। पीएम ने पूर्व राष्ट्रपति के निधन पर शोक जताया। इसके बाद पीएम मोदी यूएई से रवाना हो गए। शेख खलीफा का लंबी बीमारी के बाद 73 साल की आयु में 13 मई को निधन हो गया था। कौन थे शेख खलीफा? बता दें कि, शेख खलीफा संयुक्त अरब अमीरात के संस्थापक शेख जायद बिन सुल्तान अल नाहयान के सबसे बड़े बेटे थे।

उन्होंने 3 नवंबर 2004 से अपनी मृत्यु तक यूएई के राष्ट्रपति और अबू धाबी के शासक के रूप में कार्य किया। इससे पहले उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने भी पिछले महीने संयुक्त अरब अमीरात का दौरा किया था और शेख खलीफा के निधन पर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के नेतृत्व के प्रति संवेदना व्यक्त की थी। पीएम मोदी को 2019 में मिला था यूएई का सर्वोच्च सम्मान यूएई की मोदी की अंतिम यात्रा अगस्त 2019 में हुई थी, जिस दौरान उन्हें यूएई के राष्ट्रपति द्वारा देश का सर्वोच्च पुरस्कार ‘ऑर्डर ऑफ जायद’ मिला था। विदेश मंत्रालय के अनुसार, चीन और अमेरिका के बाद वर्ष 2019-20 के लिए यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार था।

 

Udaipur Murder Case: नूपुर शर्मा के समर्थन में स्टेटस लगाने पर शख्स की निर्मम हत्या, दुकान में घुसकर उतारा मौत के घाट

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Udaipur Murder Case: राजस्थान के उदयपुर में नूपुर शर्मा के समर्थन में सोशल मीडिया स्टेटस लगाने पर एक व्यक्ति की निर्मम हत्या कर दी गई. ये वारदात उदयपुर के धानमंडी थाना क्षेत्र में हुई. मृतक कन्हैया लाल टेलरिंग की दुकान चलाते थे. हत्यारे उनकी दुकान पर कपड़े सिलवाने के बहाने आए और उसकी हत्या कर दी. इतना ही नहीं उन्होंने पूरी वारदात का वीडियो भी बनाया और उसे वायरल कर दिया. इस मामले पर सीएम अशोक गहलोत ने सभी लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है.

आरोपियों को मिलेगी सजा- सीएम गहलोत 
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा, “उदयपुर में युवक की जघन्य हत्या की भर्त्सना करता हूं. इस घटना में शामिल सभी अपराधियों कठोर कार्रवाई की जाएगी एवं पुलिस अपराध की पूरी तह तक जाएगी. मैं सभी पक्षों से शान्ति बनाए रखने की अपील करता हूं. ऐसे जघन्य अपराध में लिप्त हर व्यक्ति को कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाएगी.”

शेयर न करें वीडियो’
इसके अलावा सीएम गहलोत ने जनता से हत्या की वीडियो को शेयर न करने की भी अपील की. उन्होंने कहा, “मैं सभी से अपील करता हूं कि इस घटना का वीडियो शेयर कर माहौल खराब करने का प्रयास ना करें. वीडियो शेयर करने से अपराधी का समाज में घृणा फैलाने का उद्देश्य सफल होगा.”

आरोपियों को मिले सख्त सजा-कटारिया
वहीं इस मामले पर बीजेपी नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाब चंद कटारिया ने कहा कि उदयपुर में हृदय विदारक घटना हुई है. इसके पीछे कोई गैंग है. मेरी सीएम से बात हुई. इन लोगों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए.  कटारिया ने आगे कहा कि मेरी एसपी और कलेक्टर के अलावा वहां की जनता से बात भी बात हुई है.

मौके पर पुलिस बल तैनात- एसपी 
उदयपुर में हुई इस घटना को लेकर जिले के एसपी मनोज कुमार ने कहा कि नृशंस हत्या की जैसे ही हमें सूचना मिली पुलिस को तैनात कर दिया गया है. अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. कुछ आरोपियों की पहचान हुई है, हमने टीमें भेजी हैं. सोशल मीडिया पर जो वीडियो वायरल हो रहा है उसे भी हमने देखा है.

 

 

गो गव्य ही है उत्कृष्ट आहार

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यज्ञ में काम लिया जाने वाला घृत केवल और केवल गो-घृत ही होना चाहिये, तभी देवता उसको ग्रहण करेंगे। बाजारू घृत जो कि चर्बीयुक्त हो सकता है या फिर अन्य पशुओं का घृत जो कि अशुद्ध माना जाता है, देवता नहीं दानव ग्रहण करेंगे। उससे देव शक्ति की बजाय दानवी शक्ति का पोषण होगा। परिणाम हमारे लिये निश्चित उल्टा ही होगा। अतः यज्ञ में केवल गो-गव्यों का ही प्रयोग करना चाहिये। शास्त्र विरुद्ध किया गया कार्य पूरी सृष्टि के लिये हानिकारक होता है। शास्त्र में जहाँ भी दूध, दही, छाछ, मक्खन, घृत आदि उल्लेख किया गया है वो केवल गाय के गव्य ही हैं, क्योंकि उस समय भैंस, जर्सी, हॉलिस्टीयन जैसे पशुओं का व्यवहार कहीं भी शास्त्र में आया ही नहीं है।

बीमारियों से बहुत दुःखी होने के बाद भी आम आदमी में यहाँ तक कि बुद्धिजीवियों और बड़े-बड़े कई साधु-संतों में भी सजगता देखने में नहीं आ रही है। दूध और घी के विषय में तो वे बिल्कुल लापरवाह या अनभिज्ञ से नजर आ रहे हैं। हृदयघात और ब्लोकेज में कॉलेस्ट्राल मुख्यतः गोघृत के अलावा खाया गया घृत है, जिससे हमारा पाचन तंत्र पचा नहीं पाया।

इसके अलावा गुणों में गाय का दूध सात्विक, भैस का राजसी व जर्सी-हॉलिस्टीयन का तामसी होता है। इनको खाने से इनके जैसा ही हमारा मन मस्तिष्क और हृदय बनता है। सफेद रंग का हरेक पदार्थ दूध नहीं होता है।
वर्तमान में गाय का जो त्याग और तिरस्कार है वो मुख्यरूप से दूध की मात्रा को लेकर किया जा रहा है। वजह केवल व्यापार। बेचने वाला तो रुपये कमाने के लिये ऐसा कर रहा है, पर खरीददार दूध के प्रति शिक्षित नहीं होने के कारण शुद्ध गाय के दूध की माँग नहीं कर रहे हैं।

लगातार अनदेखी से हमारे देश में गायों की नस्ल में भारी गिरावट आई है, जिससे वे कम दूध दे रही है। देश में दूध की माँग केवल दो फालतू के कार्यों हेतु है- 1. चाय और 2. मिठाई। अगर लोग चाय पीना छोड़ दें, जो कि जीवन निर्वाह हेतु कतई आवश्यक नहीं है, तो दूध की खपत एकदम गिर जायेगी। जो मिठाई वर्तमान में लोग खा रहे हैं, उससे स्वास्थ्य को लाभ की बजाय हानि अधिक हो रही है, केवल जीभ का स्वाद लेने के लिये बीमारी का घर खा रहे हैं। ऐसी मिठाई का भी यदि त्याग कर दें तो दूध की खपत और घट जायेगी। ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम रह गयी है जो स्वास्थ्य के लिये दूध पीते हैं। बच्चे अभी भी दूध जरूर पीते हैं।

जब माँग कम होगी तो उसकी पूर्ति केवल गायों से हो जायेगी। इससे लाभ यह होगा कि हमें वाकई में पीने को दूध मिलेगा। हमारा स्वास्थ्य और करोड़ों का खर्च बच जायेगा। चाय और मिठाई के लिये अधिक दूध की माँग ने गाय को घर से बाहर कर दिया और उसे बूचड़खानों की और धकेल दिया।

कुछ सज्जन मेरे यहाँ से गाय का शुद्ध दूध ले गये और अपने बच्चों को पिलाया। मैंने 10 दिन बाद उन बच्चों को पूछा कि गाय का दूध कैसा लग रहा है? उनका उत्तर थ कि अंकलजी हमने जीवन में व्हाइट दूध ही पहली बार पीया है। अब तक स्वाद न होने के कारण हम बोर्नवीटा मिलाकर कलर्ड (रंगीन) दूध ही पी पाते थे। अब तो वे गाय के दूध के अलावा दूध पीने को तैयार ही नहीं हैं।

अकबर ने एक बार बीरबल को पूछा कि सबसे अच्छा दूध किसका होता है। हाजिर जवाब बीरबल ने तपाक से उत्तर दिया भैंस का। अकबर को बीरबल से यह उम्मीद कतई नहीं थी। वो उसे हिन्दूवादी और गाय का प्रबल पक्षधर समझता था, इसलिये बीरबल के इस उत्तर से वह आश्चर्यचकित था। अकबर यह अच्छी तरह जानता था कि बीरबल कभी गलत उत्तर नहीं दे सकता, पर आज ऐसा कैसे हुआ? अकबर ने अगला प्रश्न किया कि- कैसे और क्यों?

बीरबल ने उत्तर दिया -जहाँपनाह, दूध तो केवल दो ही जानवर देते हैं। एक भैंस और दूसरी बकरी। इनमें भैंस का ठीक है। महाराज गाय दूध नहीं, साक्षात् अमृत देती है। मैं उसे दूध की श्रेणी में नहीं गिना सकता।
अतः मित्रों, मात्रा नहीं दूध की गुणवत्ता देखें। सफेद जहर से बचें।

सामाजिक और सामूहिक संकल्प से दूर होगी ‘नशावृत्ति’;

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सामाजिक और सामूहिक संकल्प से दूर होगी ‘नशावृत्ति’;’अति सर्वत्र वर्जयेत्’ अर्थात ‘अति का हर क्षेत्र में निषेध है।’ बुरी बात तो बुरी बात ही होती है, उसमें अति या अनीति का प्रश्न ही क्या? अच्छी बात भी जब अपनी वांछित मर्यादा का उल्लंघन कर जाती है, तो वही बुराई की कोटि में पहुंच जाती है।

आजादी के इस अमृत महोत्सव के अवसर पर हमें कुछ ऐसी बुराइयों को भी दूर करना है, जिनसे समाज के कुछ लोग गलत मार्ग पर चल पड़े।

वर्तमान में जिस बुराई के कारण समाज अपने पथ से विमुख हो रहा है, वह है ‘नशावृत्ति’ । सत्य तो यह भी है कि आज के वैज्ञानिक युग में नशे का व्यापार शहरी क्षेत्रों से निकलकर गांवों में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। इसके साथ-साथ यह भी उतना ही सच है कि समाज पर जितना बुरा असर नशावृत्ति से हो रहा है, उतना कुप्रभाव शायद ही किसी दूसरी चीज का हो रहा है। यों समझिए कि नशावृत्ति के कारण ही आज समाज में अनैतिकता, उच्छृंखलता, अव्यवस्था, अशिष्टता, व्यभिचार का बोलबाला है।

आज जितनी भी बुराईयां वर्तमान समाज में बढ़ती जा रही हैं, उनकी बहुत हद तक जिम्मेदारी नशावृत्ति ही है। पाश्चात्य जगत तो यह समझता है कि नशावृत्ति केवल मनोरंजन एवं तरोताजगी का एक साधन मात्र है, वे भ्रम में हैं। इन विदेशी दुष्प्रचार के कारण आज भारत के सभी प्रांतों में नशे का कारोबार फल-फूल रहा है। जिसका दुष्प्रभाव हमारे देश के सुकुमार बालकों एवं तरुणों पर गहराई से पड़ रहा हो, उसे केवल मनोरंजन एवं दिल बहलाव का साधन मात्र समझना भूल होगी।

अनुभव तो यह बताता है कि अच्छी शिक्षा तथा शुभसंस्कार माता-पिता अपने पुत्र पर या शिक्षक अपने छात्र पर नहीं डाल सकते, पर नशे की रंग-बिरंगी विलासी दुनिया उन बालकों पर अनैतिकता के संस्कार शीघ्र और स्थाई रूप से डाल देती है। हमें ऐसी कुत्सित वृत्ति का पूर्ण बहिष्कार कर देना चाहिए, जिसमें अनैतिकता और वासना को उद्दीप्त करने के अवगुण रहते हैं। आज क्या बालक, क्या युवक और क्या बूढ़े, सभी नशे के शौकीन हो रहे हैं। महानगरीय विद्यार्थियों पर तो इसका रंग खूब चढ़ा हुआ है। उन्होंने तो नशे के उत्पादों का विज्ञापन करने वाले अभिनेताओं के चित्रों से अपने घरों को सजा रखा है।

पहले तो लोग अपने घरों को सजाने के लिए देवताओं के चित्र लगाते थे, परंतु आज उनकी जगह बैठक कक्ष में छोटे बार बना रखे हैं, जिसकी शोभा महंगी शराब की बोतलें बढ़ा रही हों, इसका चलन बढ़ रहा है। चलन बढ़े भी क्यों ना, जब हर चौराहे पर शराब की दुकानें युवाओं को आकर्षित कर रही हों, तो ऐसे नशावृत्ति का बढ़ना स्वाभाविक भी है।

चिंता उन युवक-युवतियों की ही नहीं बल्कि, उन माता-पिताओं की नासमझी की भी है, जो छोटे-छोटे कोमल मति, अबोध बालक-बालिकाओं के सामने घर पर नशा करते हैं। अभिभावकों की इसी नासमझी के कारण हो बालक बालिकाओं में नशे के प्रति स्वाभाविक रूचि उत्पन्न होती है और आगे चलकर यह वृत्ति बन जाती है।

बीड़ी-सिगरेट से शुरू होने वाली नशे की लत युवाओं को गांजे, शराब और ड्रग्स की दलदल में धकेल देती है। हाल ही में बॉलीवुड में चल रहे सुशांत सिंह राजपूत सुसाइड मामले में ड्रग्स की बात भी हम सबके ध्यान में आई थी। अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती और उनके भाई शौविक चक्रवर्तीों के बीच इग्स को लेकर हुई व्हॉट्सऐप चैट भी वायरल हुई थी। इसके बाद से युवाओं में बढ़ती नशावृत्ति पर एक बार फिर चर्चा का विषय बनीं।

वैश्विक समाज में नशावृत्ति विभिन्न रूपों में विद्यमान है और यह सभी स्तरों को प्रभावित भी कर रही है। नशावृत्ति की बदलती, बढ़ती प्रवृत्ति भारत के लिए एक गंभीर समस्या का रूप धारण करती चली जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े यह बताते हैं कि दुनिया भर में 25 लाख लोग प्रति वर्ष अल्कोहल के कारण मरते हैं। इसमें 10 प्रतिशत लोग अकेले भारत में हैं। वहाँ गुटखा, गांजा, भांग, चरस, टिंचर जिंजर के सेवन से भारत में हर वर्ष 5 लाख से अधिक लोग काल के गाल में समा जाते हैं। आज का युवा वर्ग रासायनिक तत्वों के सेवन को अच्छा मान रहा है। तुरंत नशे का सुख प्राप्त करने वाली यह प्रवृत्ति अत्याधिक पातक है।

भारत में प्रति लाख आबादी पर 40 प्रतिशत पुरूष लीवर सिरोसिस से मरते हैं। शराब, कोकिन, हेरोइन, एलएसडी, मारिजुआना, स्टेरायड्स, मेथमफेटामाइन, टीसीपी, रोहपनॉल, एक्सटेसी, रासायनिक दवाएं, निकोटिन प्रमुख हैं। इन नशीले पदार्थों के लंबे समय तक सेवन करने से दिमाग के काम करने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। धूम्रपान, मदिरापान, क्लब, विलासिता के लिए विवाह आदि समारोह में काकटेल पार्टियां आदि दुर्व्यसन आज संस्कृति का रूप ले रही है। देश में प्रति वर्ष सिगरेट की लगभग 15.215 करोड़ की बिक्री हो रही है।

मदिरा का बाजार भी 10,822 करोड़ का है। नशे के इन सभी साधनों के प्रयोग करने से प्रतिवर्ष लगभग 5 लाख लोगों की कैंसर से मौत हो रही है। नशावृत्ति से ना केवल मनुष्य अपितु उसके परिवार प्रतिष्ठा और सामाजिक स्थित की भी हानि होती है। वहीं दूसरी ओर नशा करने वालों को परिवार, समाज से मिलने वाले तिरस्कार के कारण आत्महत्या करने की दर पिछले 10 वर्षों में दुगनी से भी अधिक हो गयी है।

‘एक अवसर पर एम्स ऋषिकेश के निदेशक पद्मश्री प्रो. डॉ. रवि कांत ने कहा था कि नशा करते रहना एक प्रवृत्ति नहीं बल्कि, एक बायोलाजिकल ब्रेन डिसआर्डर है। जिसमें व्यक्ति के दिमाग में कई अस्थायी व स्थायी बदलाव आते हैं तथा इस रोग से छुटकारा पाने के लिए उपचार की नितांत जरूरत पड़ती है। नशे के रोग को इलाज (दवाओं और स्ट्रक्चर काउंसिलिंग) की मदद से ठीक किया जा सकता है। फिर भी, नशे से बचे रहने की कोई गारंटी नहीं है, क्योंकि बाहरी दुनिया का प्रभाव बहुत शक्तिशाली होता है, लेकिन अगर परिवार संस्कारों पर ध्यान दे, अपनों को समय दिया जाए तो नशावृत्ति के प्रभाव को कम किया जा सकता है। सुबह जल्दी उठना, दौड़ लगाना, नित्प योगाभ्यास, शारीरिक श्रम यह सभी मानव को नशीले पदार्थों की ओर जाने से रोकेंगी।

आयुर्वेद को अपनाने से भी नशा की वृति से छुटकारा पाया जा सकता है। बच्चों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, इसके लिए अभिभावकों के अलावा विद्यालयों को भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करना चाहिए। मां-बाप को बच्चों के साथ अच्छा और नजदीको रिश्ता भी कायम करना चाहिए. जिससे उनके जीवन में होने वाली किसी भी अजीब घटना का पता उन्हें फौरन लग सके।

नशे के आदी व्यक्ति को सजा नहीं बल्कि दवा को जरूरत होती है। उसका बकायदा इलाज हो और उसके साथ सहानुभूति का व्यवहार भी इस समस्या का समाधान है। इसके अलावा सामाजिक स्तर पर नशावृत्ति की रोकथाम के लिए कार्यक्रम बनाना और व्यापक जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए। विद्यालयों/कॉलेजों में नशामुक्ति अभियान को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा। यातायात व्यवस्था नशे से मुक्त बनें, इसका प्रयास करना होगा। मादक दवाओं के उपयोग पर कठोर दंड दिया जाना भी नशा मुक्ति संस्कृति को बढ़ावा देने से रोकने में सहायक होगी।

हम सत्य से मुंह नहीं छिपा सकते कि वर्तमान समय में भौतिकवादी सभ्यता ने विश्व और भारत में अनेकानेक समस्याओं को जन्म दिया है। फिर भी समाज में रहकर उचित कार्यों को करना, बुरे कार्यों का त्याग करना मानव का वास्तविक धर्म कहलाता है। धर्म को जानने वालों के लिए वेदों को परम प्रमाण के रूप में स्वीकार किया है। ‘धर्मजिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः।

वर्तमान समय में समाज में व्याप्त नशावृत्ति की बुराई को दूर करने के लिए आध्यात्मिक समाधान की आवश्यकता. आज सर्वत्र अनुभव की जा रही है। यों तो सरकार द्वारा भी नशावृत्ति पर नियंत्रण रखने के लिए अनेकों उपाय किए जा रहे है और कई मामलों में सफलता भी मिल रही है, फिर भी समाज का भी कर्तव्य है कि वह नशावृत्ति और इसको बढ़ावा देने वाले साधनों का पूर्ण बहिष्कार कर अपने तन-मन और धन को व्यर्थ होने से बचाएं। यह सब कैसे किया जाए? इसका एक ही उत्तर है…’ सा प्रथमा संस्कृतिः विश्ववारा अपनी संस्कृति-हिंदू संस्कृति देव संस्कृति पर गौरव करें।

G7 संमेलन मे PM मोदी का जलवा, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन उनसे मिलने के लिए खुद चलकर आए,सदमे मे मोदी विरोधक;

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प्रधानमंत्री मोदी जब कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो से बात कर रहे थे, इस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन उनसे मिलने के लिए खुद चलकर आए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जर्मनी में G7 सम्मेंलन में शामिल होने के लिए पहुंचे हैं। सम्मलेन को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने हरित विकास, स्वच्छ ऊर्जा, सतत जीवनशैली और वैश्विक कल्याण के लिए भारत के प्रयासों के बारे में बताया। सम्मलेन से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी वायरल हो रहा है, जिसमें पीएम मोदी से मिलने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन खुद चलकर उनके पास आते हैं।

वायरल वीडियो में दिखाई दे रहा है कि पीएम मोदी से मिलने के लिए जो बाइडेन खुद चलकर पीएम मोदी के पास आते हैं और वह पीछे से आकर पीएम मोदी के कंधे पर हाथ रखते है। इसके बाद पीएम मोदी उनकी तरफ मुड़कर देखते हैं। पीएम मोदी गर्मजोशी के साथ उनसे हाथ मिलाते हैं।

वायरल वीडियो पर प्रतिक्रया देते हुए पत्रकार सुशांत सिन्हा ने लिखा है कि ‘ऊपरवाला भी बहुत निर्मम है। मोदी विरोधियों के दुख कम होने ही नहीं देता। गजबे है।’ असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने लिखा कि ‘हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के प्रति विश्व के नेताओं का स्नेह देखकर खुशी हो रही है। पुनीत नाम के यूजर ने लिखा कि ‘जब अच्छे विदेशी संबंध बनाने की बात आती है, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि मोदी सबसे अच्छे हैं।’

हरीश खुराना ने लिखा कि ‘यह तस्वीर देख कर राहुल गांधी और अन्य विपक्षी दलों को कुछ समझ में आएगा क्या?’ रवि त्रिपाठी ने लिखा कि ‘हमसे भी हाथ मिला लो भाई.. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति की G 7 मीटिंग में हाथ मिलाने का वीडियो देखकर तो यही कहा जा सकता है।’

पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने लिखा कि ‘भाई मुझसे भी मिल ले… ऐसे ही कहते हैं दोस्त, दूसरे दोस्त को। पर इस वीडियो को गंभीरता से देखें, समझें तो भारत की बढ़ती ताकत और नरेंद्र मोदी जी की बढ़ती लोकप्रियता साफ दिखती है।’ पत्रकार नीरज पाण्डेय ने लिखा कि ‘यह 130 करोड़ भारतीयों की ताकत है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने आपको नमस्ते कहने के लिए पीछा किया। गुडलक प्रधानमंत्री जी।’

पीएम मोदी ने जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो से मुलाकात की। कहा जा रहा है कि भारत ने रूस-यूक्रेन संकट, कोविड महामारी और दूसरे मसलों पर जैसी कूटनीति की है, उसका अमेरिका भी कायल हो गया है। यही वजह है कि जो बाइडेन भी पीएम मोदी को इतना महत्व देते नजर आ रहे हैं।