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शराब बेचकर गौ सेवा का प्रस्ताव, स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरी ने दिया ये सुझाव

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मध्य प्रदेश में शराब बेचकर गौ सेवा करने का प्रस्ताव आया है. पशुपालन और गौ संवर्धन बोर्ड के उपाध्यक्ष स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरी (Akhileshwaranand Giri) ने मांग की है कि शराब पर गौ सेवा सेस लगाया जाए. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि जब तब प्रदेश में शराबबंदी नहीं होती है तब तक इस नीति से गायों के लिए पर्याप्त बजट का इंतजाम आसानी से हो जाएगा.

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बैठक दिया गया था सुझाव

महामंडलेश्वर स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरी ने जबलपुर में पत्रकारों से चर्चा में बताया कि पिछले दिनों मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में गौ संवर्धन बोर्ड की बैठक हुई थी. इसमें गौ सेवा के लिए बजट का विषय आया था. उस समय सुझाव दिया गया कि गौ सेवा के लिए शराब पर सेस लगा कर पैसों का इंतजाम किया जा सकता है. उत्तर प्रदेश और राजस्थान सरकार ने भी शराब पर ऐसा सेस लगाया है. हालांकि इस प्रस्ताव को पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की शराबबंदी की मुहिम के चलते अधिकारियों के विवेक पर छोड़ दिया गया. ऐसा कहा गया कि इससे उमा भारती रुष्ट हो जाएंगी.

स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरी का सुझाव

राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरी ने सुझाव दिया है कि जब तक पूर्ण शराबबंदी लागू नहीं की जाती, तब तक शराब पर गौ सेस लगा दिया जाए. इसके तहत प्रति बोतल 5-10 पैसे सेस लगाकर इससे 300 करोड़ का एक्स्ट्रा रेवेन्यू जेनरेट किया जा सकता है. माना जा रहा है कि शराबबंदी पर दो संतों दीदी उमा भारती और स्वामी अखिलेश्वरानंद के बीच यह मत भिन्नता आगे चलकर मध्य प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा सकती है. उमा भारती शराबबंदी की मांग को लेकर पहले से ही शिवराज सरकार से नाराज चल रही है.

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गौ संवर्धन से ही संभव है भारतीय संस्कृति की रक्षा- उपेंद्र भाई त्यागी

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नवादा 18 नवम्बर। भारतीय संस्कृति की रक्षा के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्वावधान में नवादा जिले के वारसलीगंज प्रखंड के दौलतपुर तथा नारोमुरार गांव में भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रमोद कुमार चुन्नू की अध्यक्षता में गौ संवर्धन समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक उपेंद्र भाई त्यागी उपस्थित थे।

ग्रामीणों को भारतीय संस्कृति की रक्षा के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हुए श्री त्यागी ने कहा कि हमारी संस्कृति में गाय, गंगा, गीता ,गुरु और गायत्री का सर्वोपरि महत्व है ।इसके आधार पर ही सनातन धर्म की रक्षा संभव है ।उन्होंने कहा कि आज गांव से भाग कर लो शहरों में आकर पाश्चात्य सभ्यता को ग्रहण कर अपने को धन्य महसूस कर रहे हैं। लेकिन उनका कितना नुकसान हो रहा है, इसका अहसास तक नहीं करते।

उन्होंने कहा कि गांव की संस्कृति में गाय की पूजा से लेकर उसके संवर्धन की व्यवस्था की गई थी । गाय और गंगा को माता की संज्ञा दी गई है ।दूध व पानी के बिना संसार नहीं चल सकता। इंसान का जीवन रोग ग्रस्त होकर नष्ट हो जाएगा। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए गौ संवर्धन बहुत जरूरी है ।जिसके लिए व्यापक पैमाने पर ग्रामीणों को पहल करनी चाहिए।

इस अवसर पर धनंजय कुमार ,आशीष कुमार ,सरपंच संजय कुमार आदि उपस्थित थे। ग्रामीणों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक उपेंद्र भाई त्यागी का जमकर स्वागत किया ।उन्हें कई गांव के लोगों ने भी गौ संवर्धन समारोह के लिए आमंत्रित करते हुए अपने को धन्य बताया ।भाजपा नेता व वरिष्ठ समाजसेवी प्रमोद कुमार चुन्नू ने कहा कि गौ संवर्धन अभियान के तहत गांव-गांव घूमकर व्यापक अभियान चलाया जाएगा ,ताकि हम भारतीय संस्कृति की रक्षा कर सकें।

सामंजस्य का प्रतीक : सोनपुर मेला ! (20 नवंबर 2022) यह मेला मात्र मवेशी मेला नहीं है

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के. विक्रम राव

कभी भारत का सबसे लंबा रेलवे प्लेटफॉर्म सोनपुर होता था। आज पूर्व-मध्य रेलवे के इस महत्वपूर्ण स्टेशन का प्लेटफार्म घटकर सातवें पायदान पर आ गया है। पहले नंबर पर कर्नाटक का हुबली है। बीच में गोरखपुर, कोल्लम, खड़गपुर, बिलासपुर और झांसी आ गए। ऐसी ही उपेक्षा सोनपुर के विश्वविख्यात पशु मेले की भी हुई है। पारंपरिक कार्तिक पूर्णिमा (8 नवंबर 2022) के स्थान पर इस वर्ष यह उत्सव रविवार (20 नवंबर 2022) को होगा। कारण है कि उस दिन चंद्र ग्रहण लगा था। अतः नई तिथि है माघ माह की एकादशी (रविवार 20 नवंबर 2022)। चंद्र ग्रहण के कारण सूतक लगा था। इसका प्रभाव आठ घंटे पहले से ही लागू हो गया। इस वजह से हरिहर नाथ मंदिर का पट बंद रहा। यह प्रथम बार है कि कार्तिक मेले पर चंद्र ग्रहण लगा। इसका असर धार्मिक महत्ता के हिसाब से बुरा पड़ रहा है।

यह मेला मात्र मवेशी मेला नहीं है। वैदिक आस्था से जुड़ा उपलक्ष्य है। हालांकि इस पर संकट तो छा गया है। वैसा ही देश की पुरातन धरोहर पशु हाथी पर भी है, जो मेले का खास आकर्षण है। इसके बेशकीमती धवल दंत के कारण इसके अस्तित्व पर भी मुसीबत आई है। एशिया के अन्य हाथियों की तुलना में भारत का सर्वाधिक महंगा होता है। इसे 1959 में ही संकटग्रस वन्यजीव घोषित किया गया था। इसीलिए आठवीं पंचवर्षीय योजना से इसके संरक्षण हेतु विशेष प्रावधान रखे गए थे। इन्हीं हाथियों के कारण सोनपुर चर्चित हो गया। आस्थावानों के लिए तीर्थ स्थल भी। यहीं भगवान विष्णु ने अपने भक्त हाथी की मगरमच्छ के दांतो से रक्षा की थी। यहीं अलौकिक सूत्र गजेंद्र मोक्ष उच्चारित हुआ था। इस पूरे भूभाग को हरिहर (विष्णु-शिव) क्षेत्र कहा गया है। बिहार प्रदेश का तीर्थविशेष। हरिहर का यह संयुक्त तीर्थस्थान है। यह गंगा यह नारायणी (बड़ी गंडक) के संगम तट पर पटना के पास सोनपुर में स्थित है। यही समन्वयात्मक हरिहरनाथ का मंदिर है। कार्तिक पूर्णिमा को यहां विशाल मेला होता है। इसमें देशदेशांतर के लाखों लोग सम्मिलित होते हैं। वाराह पुराण में हरिहरक्षेत्र का माहात्मय निगदित है।

यूं तो आश्चर्य की बात है कि सबसे बलशाली चौपाये हाथी को तुलनात्मक रूप से उससे कम शक्तिवाले मगर से टक्कर हुई। दोनों मे जंग लंबी अवधि तक चली। इसी नारायणी-गंगा के संगम तट पर हुआ था। पौराणिक कथा है की यहां कोणाहार घाट पर विष्णु के दो भक्त गस और ग्रह भिड़ गए थे। इस संदर्भ में एक गाथा है। द्रविड़ देश में एक पाण्ड्यवंशी राजा राज्य करते थे। नाम था इंद्रद्युम्न। वे भगवान की आराधना में ही अपना अधिक समय व्यतीत करते थे। उनकी आस्था थी कि भगवान विष्णु ही मेरे राज्य की व्यवस्था करते है। अतः वे प्रभु की उपासना में ही दत्तचित्त रहते थे। एकदा महर्षि अगस्त्य अपने समस्त शिष्यों के साथ वहां पहुँच गए। मौनव्रती राजा इंद्रद्युम्न परम प्रभु के ध्यान में निमग्न थे। इससे महर्षि अगस्त्य ने कुपित होकर इंद्रद्युम्न को शाप दे दिया- “इस राजा ने गुरुजनो से शिक्षा नहीं ग्रहण की है और अभिमानवश परोपकार से निवृत होकर मनमानी कर रहा है। ऋषियों का अपमान करने वाला यह राजा हाथी के समान जड़बुद्धि है इसलिए इसे घोर अज्ञानमयी हाथी की योनि प्राप्त हो।”

गजेन्द्र योनि मे जन्मे राजा ने एक दिन अपने साथियो सहित प्यास से व्याकुल था। वह कमल की गंध से सुगंधित वायु को सूंघकर एक चित्ताकर्षक विशाल सरोवर के तट पर जा पहुंचा। गजेन्द्र ने उस सरोवर के निर्मल,शीतल और मीठे जल में प्रवेश किया। पहले तो उसने जल पीकर अपनी तृषा बुझाई, फिर जल में स्नान कर अपना श्रम दूर किया। तभी अचानक गजेन्द्र ने सूंड उठाकर चीत्कार की। पता नहीं किधर से एक मगर ने आकर उसका पैर पकड़ लिया था। गजेन्द्र ने अपना पैर छुड़ाने के लिए पूरी शक्ति लगाई परन्तु उसका वश नहीं चला, पैर नहीं छूटा।” निश्चय के साथ गजेन्द्र मन को एकाग्र कर पूर्वजन्म में सीखे श्रेष्ठ स्त्रोत द्वारा परम प्रभु की स्तुति करने लगा।” गजेन्द्र की स्तुति सुनकर भगवान विष्णु प्रकट हुये। गजेन्द्र को पीड़ित देखकर भगवान विष्णु गरुड़ पर आरूढ़ होकर अत्यंत शीघ्रता से सरोवर के तट पर पहुंचे। जब जीवन से निराश तथा पीड़ा से छटपटाते गजेन्द्र ने हाथ में चक्र लिए गरुड़ारूढ़ भगवान विष्णु को तेजी से अपनी ओर आते देखा तो उसने कमल का एक सुन्दर पुष्प अपनी सूंड में लेकर ऊपर उठाया और बड़े कष्ट से कहा- “नारायण ! जगद्गुरो ! भगवान ! आपको नमस्कार है।” तब भगवान विष्णु गरुड़ की पीठ से कूद पड़े और गजेन्द्र के साथ ग्राह को भी सरोवर से बाहर खींच लाए और तुरंत अपने तीक्ष्ण चक्र से ग्राह का मुंह फाड़कर गजेन्द्र को मुक्त कर दिया।

यह हरिहर योग है जिसका उल्लेख कई ग्रंथों तथा इतिहास में है। श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कंध अध्याय में 33 श्लोक है जिसे हाथी ने सुनाया फिर विष्णु की मदद मांगी थी। सोनपुर के संगम तट पर ऐसा हुआ था। जनकपुरी स्वयंवर में जाते वक्त राम यहीं आए थे। आराधना की थी।

वैदिक धर्म के अनुरूप गमनीय तथ्य यह है कि शैव तथा वैष्णव जन सदैव युद्धरत रहते थे। इस हरिहर योग में दोनों में सामंजस्य स्थापित हो गया। भले ही बिहार राज्य में आजकल राजनैतिक सामंजस्य संभव नहीं हो पाया है इन नेताओं की अभी ग्रह शांति होनी शेष है। सोनपुर आकर सीखें।

 

 

 

इंदिरा जयंती : मोम की गुड़िया से आयरन लेडी बनीं इंदिरा

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डॉ0 घनश्याम बादल

19 नवंबर 1917 को मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुई इंदिरा गांधी अगर आज जिंदा होती, और कांग्रेस सता में होती तो भी सारा देश उन्हे कमोबेश वैसे ही याद कर रहा होता जैसे अटल या दीनदयाल उपाध्याय याद किये जाते हैं आज । यदि पलट कर भारत के इतिहास पर नजर डालें तथा स्वाधीन भारत को एक मजबूत राष्ट्र के रूप में खड़ा करने वाली लौह महिला के अवदान का मूल्यांकन किया जाए तो इंदिरा गांधी हर सम्मान की हकदार हैं ।
वही इंदिरा , जिसे कामराज जैसे ताकतवर नेताओं ने इसलिए प्रधानमंत्री बनने दिया था ताकि उनका राजनैतिक इस्तेमाल अपने हित साधने के लिए किया जा सकें । मोम की गुड़िया सी दिखती इंदिरा, जिसे नेहरु परिवार ने फूलों की पंखुड़ियों की तरह संभाल कर पाला था । वही इंदिरा, जिसने 1966 में प्रधानमंत्री बनकर, नई कांग्रेस बना ली थी, और समय के साथ जिसने पुरानी कांग्रेस को दफन कर दिया, पाकिस्तान को ऐसा घेरा कि बंगलादेश ही नहीं बनाया वरन् पाक के मन में एक भय भर दिया था ।

इंदिरा ने देश को डरा रहे आतंकियों को धता बताकर ऑप्रेशन ब्ल्यूस्टार से उसकी कमर तोड़, फिर से देश को विकास की राह पर डाल उसे अपने पैरों पर खडे करने का रास्ता बनाया आज उसी इंदिरा की जयंती है ।
बेशक, उस इंदिरा को याद करना तो बनता है आज बिना यह सोचे कि वह किस दल की थी या आज किस दल की सरकार सत्ता में है यही इस देश की संस्कृति भी है, पर संस्कारों एवं संस्कृति की बात करने वाली सरकार अपनी पूर्व कांग्रेसी सरकारों के द्वारा किए गए व्यवहार को आधार बनाकर इंदिरा कोएक हाशिए पर रख रही है बिना यह सोचे कि वह इस देश की पहली महिला प्रधानमंत्री थी और अब तक की आखरी भी।

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प्रियदर्शनी व लौह महिला दोनों विशेषण फिट बैठते हैं इंदिरा पर । जिसे विपक्ष तक ने ‘दुर्गा’ माना था। आनंद भवन में जन्मी, पली बढ़ी जवाहरलाल व कमला नेहरु की इकलौती पुत्री इंदिरा ने कालांतर में भारतीय राजनीति व विश्व राजनीति के क्षितिज पर अमिट प्रभाव छोड़ा

छात्रा के रूप में सिल्क पहनने वाली इंदिरा को शांति निकेतन में खादी की साड़ी पहननी पड़ती थी और नंगे पैर रहना होता था। शांति निकेतन का अनुशासन भी काफी कड़ा था। सामान्यतः अमीरी में पले बच्चों के लिए वहाँ टिक पाना कठिन था। लेकिन इंदिरा ने सख्त अनुशासन तथा अन्य नियमों का पूर्णतया पालन किया इंदिरा में अध्ययन से इतर लोककला और भारतीय संस्कृति में भी रुचि जाग्रत की गई। इंदु ने शीघ्र ही मणिपुरी शास्त्रीय नृत्य में दक्षता हासिल कर ली। उसका नृत्य काफी मनमोहक होता था। इंदिरा ने 13 वर्ष की अल्पायु में बच्चों के सहयोग से ‘वानर सेना’ का गठन कर अपने इरादों को स्पष्ट कर दिया था । बालिका के रूप में इंदिरा ने बचपन में ही स्वाधीनता के लिए संधर्ष करते हुए यह समझ लिया था। कि किसी भी राष्ट्र के लिए उसकी आजादी का कितना अधिक महत्त्व होता है और आजीवन इंदिरा ने भारत की आजादी के महत्व को पहचाना तथा अलग-अलग कोनों से उस पर उठने वाली कुटिल निगाहों एवं नीतियों को धता बताया ।

इंदिरा के व्यक्तित्व में आई कठोरता प्रतिकूल परिस्थितियों का परिणाम थी , अन्यथा तो उनके अंदर भी एक प्रेम की प्यासी कोमल महिला का दिल था । उसी के चलते 1942 में इंदिरा को प्रेम हुआ, पारसी युवक फीरोज गाँधी से । इंदिरा का परिचय फीरोज से उस समय से था जब वह आनंद भवन में एक स्वतंत्रता सेनानी की तरह आते था। फीरोज गाँधी ने कमला नेहरू को अपनी मां जैस मान दिया था। जर्मनी में जब कमला नेहरू को चिकित्सा के लिए ले जाया गया तब फिरोज मित्रता का फर्ज पूरा करने के लिए जर्मनी पहुँच गए थे। लंदन से भारत वापसी का प्रबंध भी फिरोज ने एक सैनिक जहाज के माध्यम से किया था दोनों की मित्रता इस हद तक परवान चढ़ी कि विवाह करने का निश्चय कर लिया।
नेहरू भले ही एक धर्मनिरपेक्ष एवं उदारवादी छवि के नेता थे लेकिन एक पिता के रूप में वह सोच भी नहीं सकते थे कि इंदिरा उस फीरोज गाँधी से शादी करना चाहती है जो उनके समाज-बिरादरी का नहीं है। उन्होंने कई प्रकार से इंदिरा को समझाने का प्रयास किया लेकिन इंदिरा की जिद कायम रही। अस्तु इंदिरा की जिद के आगे नेहरू हार गए और फिरोज तथा इंदिरा का विवाह कहा तो कुछ ने दुर्गा व लौह महिला भी बताया ।

धर्मांतरण का सबसे बड़ा खेल राजस्थान की कांग्रेस सरकार के राज में  खुलेआम खेला जा रहा है!

इंदिरा का पूरा जीवन उतार चढ़ाव भरा था। जिद्दी, दृढव्रती, साहसी, निरंकुश राजनेता, कूटनीतिज्ञ, प्रशासक, रणनीतिकार, जाबांज, देशभक्त, सदय, कठोर, ममतामयी, हार न मानने वाली, मोम की गुड़िया से लौह महिला में तब्दील हो जाने वाली इंदिरा है ही ऐसी शख्सियत जिसे न दोस्त भुला सकते हैं और न दुश्मन ।

शास्त्री जी की मृत्यु के बाद 1966 में अप्रत्याशित रूप से प्रधानमंत्री बनी इंदिरा एक कठोर शासक एवं देश के प्रति पूर्णतया समर्पित नेता, विरोधियों के लिए निर्मम, समर्थकों के लिए पूर्णतया पक्षपाती,किसी भी हद तक जाकर अपने लक्ष्य हासिल करने को कटिबद्ध, राजनीति में सारे उतार-चढ़ावों से उबरने में सिद्धहस्त इंदिरा ने सत्ता भोगी भी और सत्ता से निर्वासन भी सहा । उसी संसद में उन्हें फटकार भी सहनी पड़ी जिसकी कभी वह नेता होती थी । वह चुनाव हारी भी और जीती भी, गिरी भी और उठी भी मगर अपने ही विश्वस्त अंग रक्षकों की गोलियों से लहूलुहान इंदिरा का मृत शरीर शक्ति स्थल पहुंचकर फिर कभी नहीं उठा ।

आनंद भवन से शुरू हुआ इंदिरा का सफर भौतिक रूप से शक्ति स्थल की चिता पर समाप्त हो गया लेकिन उनकी नीतियां, पाकिस्तान को सिखाए गए सबक, बांग्लादेश का निर्माण, आपातकाल लागू करना, 1977 में हारकर 1980 में वापसी करना इतिहास में दर्ज हो चुका है । (युवराज)

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सवालों के घेरे में न्याय व्यवस्था

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  • आशीष वशिष्ठ 

 सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2012 के छावला सामूहिक बलात्कार मामले में 19 वर्षीय लड़की की हत्या और बलात्कार के आरोपी तीन लोगों को बरी कर दिया। उन्हें पहले ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराया गया था और मौत की सजा सुनाई गई थी जिसकी 26 अगस्त 2014 को दिल्ली हाईकोर्ट ने पुष्टि की थी। दोषियों को जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया, उससे हर कोई स्तब्ध है। आरोपियों को बरी करने के बाद पीड़िता के पिता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से उन्हें निराश किया है और 11 साल से अधिक समय तक लड़ाई लड़ने के बाद न्यायपालिका से उनका विश्वास उठ गया है।

मूल रूप से उत्तराखंड की ‘अनामिका’ (बदला हुआ नाम) दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के छावला के कुतुब विहार में रह रही थी। 9 फरवरी 2012 की रात नौकरी से लौटते समय उसे कुछ लोगों ने जबरन अपनी लाल इंडिका गाड़ी में बैठा लिया। 3 दिन बाद उसकी लाश बहुत ही बुरी हालत में हरियाणा के रिवाड़ी के एक खेत मे मिली। बलात्कार के अलावा उसे असहनीय यातना दी गई थी।  मगर, गैंगरेप के बाद भयंकर यातनाएं देकर मारी गई ‘अनामिका’ को इंसाफ नहीं मिल सका।

अब सुप्रीम कोर्ट ने तीनों आरोपियों को बरी कर दिया है। इसकी वजह पुलिस की खराब जांच और निचली अदालत में मुकदमे के दौरान बरती गई लापरवाही है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में यह भी कहा कि मामले की सुनवाई के दौरान कई स्पष्ट खामियां थीं। अभियोजन पक्ष द्वारा परीक्षण किए गए कुल 49 गवाहों में से 10 सामग्री गवाहों से जिरह नहीं की गई और कई अन्य महत्वपूर्ण गवाहों से बचाव पक्ष के वकील द्वारा पर्याप्त रूप से जिरह नहीं की गई। पीठ ने यह भी कहा कि विभिन्न फैसलों में अदालत ने बार-बार देखा कहा कि जज को ट्रायल में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए और गवाहों से पूछताछ करनी चाहिए, लेकिन वर्तमान मामले में न्यायाधीश ने एक निष्क्रिय अंपायर की भूमिका निभाई।

ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या न्यायालय को पुलिसिया जांच और सम्पूर्ण व्यवस्था से यह नहीं पूछना चाहिए कि माना कि जिन्हें आरोपी बनाया गया है, वह निर्दोष है तो फिर ‘अनामिका’का असली गुनाहगार कौन है? वह कैसे बच गया पुलिस की नजरों से ? अगर तमाम व्यवस्था -चाहे कार्यपालिक यो या न्यायपालिका- की नजरों से अपराधी बच जा रहे हैं तो इस देश की करोड़ो बेटियां खुद को कैसे सुरक्षित महसूस करेंगी? सिक्के का दूसरा पहलू यह कि एक बार मान भी लें कि ये तीनों आरोपी असली गुनाहगार नहीं हैं तो फिर जेलों में बंद रहने के कारण इनके जीवन के जो 10 साल बर्बाद हुए हैं, उसकी भरपाई कैसे की जाएगी और कौन करेगा ?

 हालांकि पीड़ित परिवार के पास अभी कोर्ट में इस फैसले के मद्देनजर पुनर्विचार याचिका  का अधिकार है और उम्मीद है कि कोर्ट इसे जरूर पुनर्विचार योग्य समझेगी। क्योंकि यह मामला न सिर्फ एक अनामिका का है बल्कि देश की करोड़ो बेटियों की सुरक्षा का मामला है।

यह प्रसंग हमारी पूरी न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। इस दिल दहला देने वाली घटना को अंजाम देने के बाद भी आज अपराधी खुली हवा में सांस ले रहे हैं। सवाल तो इस बात का है कि आखिर किसी ने तो इस कांड को अंजाम दिया।

यह मामला पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े करता है। आखिर कैसे पुलिस ने जांच की? इससे तो ऐसे अपराधियों का मनोबल और बढ़ेगा। अपराधियों को लगेगा कि कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। भारत भले तमाम तरह की तरक्कियों के दावे करता रहे, लेकिन हकीकत यह है कि हमारा समाज, न्याय व्यवस्था, पुलिस आदि सब सवालों के घेरे में हैं। (युवराज)

आशीष वशिष्ठ 

भाजपा – वाममोर्चा  गठबंधन: अवसरवादिता या किसी बड़े बदलाव के संकेत

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– अमित कुमार अम्बष्ट ” आमिली “

अगर राष्ट्रीय स्तर पर या किसी भी प्रदेश में भाजपा – वामपंथी मोर्चा के गठबंधन की बात हो तो सहसा किसी को यकीन नहीं होगा , सैद्धांतिक स्तर में दो धुर विरोधी खेमा एक दूसरे के साथ कैसे आ सकते हैं ?  , लेकिन कहते है न प्यार और जंग में सब जायज है और सत्ता के गलियारे में कुछ भी असंभव नहीं होता है । ऐसा ही पश्चिम बंगाल के समवाय समिति के चुनाव में हुआ है ।

 गौरतलब है कि बंगाल के समवाय समिति के चुनाव में भाजपा ने वामपंथी मोर्चा से गठबंधन कर सबको चौंका दिया , दोनों दलों ने चुनाव से पूर्व समवाय बचाओ समिति नाम से संगठन बनाकर चुनाव लड़ा जबकि तृणमूल कांग्रेस की ओर से भी 46 सीटों पर नॉमिनेशन दाखिल किया गया था, लेकिन चुनाव से पहले ही 35 सीटों पर चुनाव से ठीक पहले ही तृणमूल उम्मीदवारों ने नामांकन वापस ले लिया था , बंगाल में पहली बार भाजपा और वाम मोर्चा ने साथ चुनाव लड़कर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को बुरी तरह पराजित कर दिया  ।

दोंनो दलों के साथ आने के बाद समनवाय समिति चुनाव के नतीजों का आलम यह रहा कि नंदकुमार के बहरामपुर को-ऑपरेटिव ऐग्रिकल्चरल सोसायटी के चुनाव में तृणमूल खाता ही नहीं खोल पाई , जबकि यहाँ कुल सीटों की संख्या 63 हैं , कुल 63 सीटों पर भाजपा – वामपंथी मोर्चा ने कब्जा जमा लिया ।

भाजपा – वामपंथी गठबंधन की यह जीत इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि पश्चिम बंगाल में अगले वर्ष यानी 2023 में पंचायत चुनाव होने हैं और पंचायत चुनावों को लेकर सभी राजनीतिक पार्टियां तैयारियों में जुटी हुई हैं , इसके अलावा 2024 में आने वाले लोकसभा चुनाव पर भी सबकी नजर है , खासकर ममता बनर्जी जी खुद को विपक्ष के नेता के तौर पर खुद को प्रोजेक्ट करने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं, ऐसी स्थिति में भाजपा भी पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है , इसमें कोई दोराय नहीं है , हालांकि  2018 में हुए पिछले पंचायत चुनाव की बात  करें तो ग्राम पंचायत की कुल 48636 सीटों में से तृणमूल कांग्रेस को 38118 बीजेपी को 5779 वाममोर्चा को 1713 कांग्रेस को 1066 एवं अन्य को 1960 सीटें प्राप्त हुई थी ।

पंचायत समिति के 9214 सीटों  में से तृणमूल कांग्रेस को 8062 बीजेपी 769 वाममोर्चा 129 कांग्रेस को 133 एवं अन्य को 121 सीटें प्राप्त हुई थी एवं जिला परिषद के कुल 824 सीटों में तृणमूल कांग्रेस को 793 बीजेपी 22 वाममोर्चा 1 कांग्रेस को 6 एवं अन्य को 2 सीट प्राप्त हुई थी, यानी लगभग लगभग 90 फीसदी सीटों पर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों को जीत मिली थी , तृणमूल कांग्रेस  ने 34 फीसदी सीटें निर्विरोध जीतने में सफल रही थी, हालांकि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस पर यह भी आरोप लगते रहते हैं कि पार्टी के दबंगों के कारण कई उम्मीदवार अपना नामांकन नहीं भरते या वापस ले लेते हैं , यही कारण है कि निर्विरोध चुनाव में जीतने वाले तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों की संख्या इतनी ज्यादा है । ऐसे में अगर वाममोर्चा भाजपा साथ आ जाते हैं तो संगठनात्मक स्तर पर भी भाजपा को अधिक बल मिलेगा और उम्मीदवार नामंकण और चुनाव लड़ने से नहीं डरेंगे।

  विगत लोकसभा चुनाव के आंकड़ों की बात करें तो पश्चिम बंगाल के कुल 42 लोकसभा सीट के लिए मतदान हुए जिसमें 22 सीटों पर संघीय मोर्चा को सफलता मिली जिसमें  तृणमूल कांग्रेस और वाम मोर्चा भी शामिल थी  जबकि बीजेपी 18 सीटों पर विजयी रही थी , अगर मतों का प्रतिशत देखे तो संघीय मोर्चा को 43.3% जबकि एनडीए को 40.7 % मत प्राप्त हुआ था , जबकि कांगेस और वाम मोर्चा को क्रमशः 5.67 % एवं 6.33% मत प्राप्त हुआ था ,  कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि दोनों ही मोर्चा के बीच कड़ा संघर्ष हुआ था लेकिन तृणमूल कांग्रेस को तकरीबन 12 सीटें गवानी पड़ी थी , ऐसे में अगर भाजपा और वाममोर्चा साथ आते है तो ग्राम पंचायत चुनाव पर तो प्रभाव पड़ेगा ही लोकसभा चुनाव में भी पश्चिम बंगाल की तस्वीर बदल सकती है , इसमें कोई दोराय नहीं है,  क्योंकि वाममोर्चा को जो 6.33% का मत लोकसभा में प्राप्त हुआ था , वो वाममोर्चा के कैडर वोटर हैं , जो किसी भी स्थिति में भविष्य में भी वाममोर्चा के साथ बने रहेंगे , ऐसे में यह आंकड़ा न सिर्फ तृणमूल कांग्रेस को चुनौती देने में सफल होगा अपितु चारों खाने चित भी कर दे सकता है ।

क्योंकि जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस के रिश्ते कांग्रेस से भी तल्ख होते जा रहें है , इस बात की तरफ स्पष्ट संकेत करते  हैं कि तृणमूल कांग्रेस आगामी किसी भी चुनाव में शायद ही कांग्रेस को साथ लेकर चुनाव लड़े ,  क्योंकि ममता बनर्जी अक्सर गैर कांग्रेसी विपक्षी एकता की न सिर्फ बात करती है अपितु कहीं न कहीं उनके मन में यह इच्छा है कि सभी विपक्षी दल उन्हें विपक्ष के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर स्वीकार ले, इतना ही नहीं ममता बनर्जी वामपंथी मोर्चा को भी पुनः अपने पाँव फैलाने का मौका बिल्कुल ही नहीं देना चाहूगी , इसीलिए समवाय समिति के चुनाव के पहले ही तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता कुणाल घोष  ने अपना बयान जारी करते हुए कहा कि प्रदेश में भाजपा और वाम मोर्चा की मिली भगत एक्सपोज हो गयी है ।

हालांकि पश्चिम बंगाल खासकर ग्राम पंचायत चुनाव में  भाजपा – वाम मोर्चा गठबंधन को लेकर अटकले तेज हो गयी हैं ऐसे में सवाल उठता है कि समवाय समिति का चुनाव साथ लड़ना दोनों दलों की महज अवसरवादिता थी या फिर यह बीजेपी का यह एक प्रयोग है । अगर यह दोनों दलों के लिए प्रयोग है तो इस प्रयोग के प्राथमिक नतीजे दोनों ही दलों के लिए न सिर्फ उत्साहवर्धक हैं अपितु पश्चिम बंगाल में एक बड़े बदलाव की तरफ भी संकेत कर रहे हैं।  अगर भाजपा पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा को अपने साथ लाने में सफल हो जाती है तो आने वाला समय तृणमूल कांग्रेस के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकता है ।

(युवराज)- अमित कुमार अम्बष्ट ” आमिली “

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हेट स्पीच पर तल्ख टिप्पणी तो ठीक पर उसके लिए जिम्मेबार डर का क्या करें?

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– गौतम चौधरी

अभी हाल ही में हेट स्पीच मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की और उस टिप्पणी के बाद सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों वाली एक पीठ ने तीन प्रदेश के पुलिस को नोटिस जारी कर दिया। इस मामले में कोर्ट का रुख बेहद चैकाने वाला है। सामान्य तौर पर इस प्रकार के मामले राजनीतिक होते हैं लेकिन माननीय न्यायालय को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा यह हमारे देश के लोकतंत्र के लिए बुरी खबर है।

पहले तो हम यह समझें कि आखिर कोर्ट ने क्या कहा? मसलन, न्यायमूर्ति केएम जोसफ ने कहा-‘‘यह 21वीं सदी है। हम धर्म के नाम पर कहां आ पहुंच गए हैं? हमें एक धर्मनिरपेक्ष और सहिष्णु समाज होना चाहिए, लेकिन आज घृणा का माहौल है। सामाजिक ताना बाना बिखरा जा रहा है। हमने ईश्वर को कितना छोटा कर दिया है।

उसके नाम पर विवाद हो रहे हैं।’’ इस मामले में माननीय न्यायालय ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड पुलिस को नोटिस जारी करते हुए पूछा, ‘‘हेट स्पीच में शामिल लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। जिम्मेदार ऐसे बयान देने वालों पर फौरन सख्त कार्रवाई करें, नहीं तो अवमानना के लिए तैयार रहें।’’ जस्टिस केएम जोसफ और ऋषिकेश रॉय की बेंच ने अपने आदेश में कहा कि कोर्ट की जिम्मेदारी है कि वह इस तरह के मामलों में हस्तक्षेप करे।

दरअसल, शाहीन अब्दुल्ला ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। उन्होंने कोर्ट से मांग की कि वह देशभर में हुई हेट स्पीच की घटनाओं की निष्पक्ष, विश्वसनीय और स्वतंत्र जांच के लिए केंद्र सरकार को निर्देशित करें। भारत में मुस्लिमों को डराने-धमकाने के चलन को तुरंत रोका जाए। याचिकाकर्ता ने अदालत से तुरंत सुनवाई की मांग की थी। इसी याचिका के आलोक में कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की और आनन-फानन में तीन प्रदेश की पुलिस को नोटिस जारी कर दिया। यदि कोर्ट की बात करें तो यह बेहद सकारात्मक पहल है और किसी भी धर्मनिर्पेक्ष राष्ट्र के लिए यह जरूरी है। भारत के लोकतंत्र में विश्वास करने वाले हर नागरिक को इस निर्णय पर गर्व होना चाहिए लेकिन कोर्ट के इस निर्णय से देश के वैसे नागरिकों में डर भी पैदा हो गया है जो देश में कानून के राज समर्थक हैं और अपने आप को असुरक्षित महसूस करते हैं।

इस मामले में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर हेट स्पीच क्यों दिए जा रहे हैं? इस प्रकार के हेट स्पीच से फायदा किसको हो रहा है? इसके लिए इधर के दिनों कुछ बड़ी घटनाओं का जिक्र यहां जरूरी हो जाता है। एक तो उदयपुर में एक खास धर्म विशेष के दो युवकों ने कन्हैया लाल की बेरहमी से हत्या कर दी। पुलिस वहां भी थी और प्रदेश की सरकार सीना ठीक के कहती रही कि यहां कानून का राज है। दूसरी घटना अभी हाल ही में मुंबई की है। यहां भी एक खास धर्म के नौजवान ने अपनी ही प्रेमिका, जो उसके साथ लीवइन थी, उसके कई टुकड़े किए और फ्रीज में डाल दिया। डारखंड की लड़की को जिंदा जला दिया गया।

साल भर के अंदर कम से कम 10 ऐसी घटनएं घटी है, जिसमें एक खास धर्म विशेष के युवकों ने भारत के बहुसंख्यक समाज पर विभत्स और क्रूर आक्रमण किए हैं। इस प्रकार के आक्रमणों से भारत का बहुसंख्यक समाज विगत लगभग 1000 वर्षों से प्रभावित होता रहा है। कोर्ट में याचिकाकर्ता ने यह जरूर कहा कि एक खास वर्ग विशेष के लोगों को सत्ता और शासन द्वारा धमकाया व डराया जा रहा है लेकिन उन्होंने यह कबूल नहीं किया कि बहुसंख्यक समाज में जो एक खास समुदाय द्वारा लगातार डर पैदा किया जा रहा है उसका क्या होगा?

माननीय न्यायालय का निर्णय शिरोधार्य लेकिन समाज में जो इस प्रकार की घृणा पैदा की जा रही है उसका भी समाधान ढूंढना होगा। इसका समाधान न तो न्यायालय के पास है और ही सत्ता-शासन के पास। घृणास्पद बयान देने वाले राजनेता तो घृणित राजनीति की उपज हैं लेकिन समाज को यहीं रहना है।

पड़ोस में रहने वाले राम को रहमान चाहिए और जगतलाल को मशीह। हेट स्पीच का कारण बहुसंख्यक समाज में एक खास सुमाय के प्रति बैठा हुआ वह डर है जो उन्हें शदियों से डराता रहा है। यही नहीं भारत का बहुसंख्यक समाज अपने पड़ोस के देशों से आई खबरों को भी देखता, सुनता है। हेट स्पीच के पीछे का कारण यह भी है। जब तक वह डर जिंदा है घृणा की राजनीति करने वाले हेट स्पीच देते रहेंगे। इसलिए समाज को, देश के हुक्मरानों को और माननीय न्यायालय को इस डर का भी समाधान ढूंढना होगा। (युवराज)

धर्मांतरण का सबसे बड़ा खेल राजस्थान की कांग्रेस सरकार के राज में  खुलेआम खेला जा रहा है!

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धर्मांतरण का सबसे बड़ा खेल राजस्थान की कांग्रेस सरकार के राज में  खुलेआम खेला जा रहा है!

अशोक भाटिया

हाल ही में धर्मांतरण को बहुत गंभीर मुद्दा बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व राज्यों से इस मामले में दखल देने को कहा। साथ ही यह भी कहा कि इस चलन को रोकने के लिए ईमानदारी से कोशिश करें। कोर्ट ने इस बात की चेतावनी भी दी कि अगर जबरन धर्मांतरण को नहीं रोका गया तो बहुत मुश्किल परिस्थितियां खड़ी हो जाएंगीं।उसके बावजूद धर्मांतरण का खेल राजस्थान की कांग्रेस सरकार के राज में  खुलेआम खेला जा रहा है। 

मिशनरियों की मंडलियां भोले-भाले लोगों को प्रलोभन देकर तो कभी बीमारी ठीक करने और शराब छुड़ाने के नाम पर मूर्ति पूजा का विरोध कर रही हैं। अलवर से लेकर बारां तक और गरीबों-दलितों से लेकर आदिवासियों तक ये मिशनरी अपना जाल फैला रहे हैं। धर्मांतरण की करतूतों के खिलाफ कोई कार्रवाई न होने का ही दुष्परिणाम है कि मिशनरियों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं कि अब तो राजधानी जयपुर में गहलोत सरकार की नाक के नीचे धर्मांतरण का बड़ा खेल चल रहा है लेकिन सरकार सिर्फ खुली आंख से तमाशा देखने में लगी है।

राजस्थान के बारां और अलवर आदि के बाद अब राजधानी जयपुर में भी धर्म परिवर्तन कराने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। जयपुर के वाटिका में करीब 250 लोगों को जबरन हिंदू धर्म से ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर करने का खुलासा हुआ है। हिंदू जागरण मंच का आरोप है कि 28 अक्टूबर को वाटिका में करीब 2000 लोगों के सामूहिक धर्मांतरण का कार्यक्रम था लेकिन जब इसका भारी विरोध किया गया तो इसे दबाव के चलते रद्द करना पड़ा। पुलिस ने अभी तक इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की है।

गहलोत सरकार की तरफ से कोई आदेश-निर्देश न होने के कारण पुलिस ने भी फिलहाल इस मामले में चुप्पी साध रखी है। जयपुर से 22 किमी दूर वाटिका की ढाणी बैरावाला इसका केंद्र है। 400 परिवारों वाली इस ढाणी और आसपास के गांव में हिंदुओं के धर्मांतरण के प्रयास किये जा रहे हैं।

गरीब व एससी ग्रामीणों को लालच और डर दिखाकर ईसाई में कन्वर्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि खुद को मिशनरी की मंडली बताने वाले लोग मूर्ति पूजा को खत्म कराने, हिंदू देवी-देवताओं को नहीं मानने और महिलाओं को व्रत से दूरी जैसे संदेश दे रहे हैं। ये यीशु की शरण में आने पर बीमारी से लेकर हर समस्या दूर होने का दावा कर रहे हैं। आरोप है कि धर्मांतरण का यह खेल बीमारी ठीक होने, शराब छूटने और आर्थिक स्थिति सुधारने के नाम पर खेला जा रहा था। इसके लिए हिन्दुओं से हिन्दू देवताओं की पूजा बंद करवाकर मूर्तियों का विसर्जन करवा दिया गया। धर्मांतरण के शिकार लोगों ने बताया कि उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर बहकाया गया और डराया गया।

इस मामले को लेकर हिंदू जागरण मंच आक्रोशित है। मंच का आरोप है कि मिशनरी के संपर्क में आकर ईसाई धर्म के प्रचारक बने पास्टर धर्मपाल बैरवा व उनकी टीम ने क्षेत्र में धर्म के प्रचार के लिए वर्किंग कर रही है। अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में जयपुर के सांगानेर में धर्मांतरण को लेकर एक बड़ा आयोजन था। धार्मिक सभा के आयोजन के नाम पर इसके पोस्टर पर भी लगाए गए थे। धर्म जागरण मंच के संजय सिंह शेखावत ने जांच स्थानीय नेता अमित शर्मा से कराई। मामला खुलता चला गया। फिर हिंदू संगठनों की आपत्ति के बाद यह कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। सांगानेर सदर के थानेदार बृजमोहन कविया खोखली दलील देते हैं कि आयोजकों ने कार्यक्रम की इजाजत ली थी। कार्यक्रम से दो-तीन दिन पहले आकर उन्होंने बताया कि अब कार्यक्रम नहीं कराना है। ईसाई धर्म के प्रचार के नाम पर ये लोग एससी या गरीब व्यक्ति को आर्थिक मदद या काम-धंधे का लालच देते हैं। कई लोगों को मदद भी देते हैं ताकि उन्हें जाल में फंसा सकें।

प्रार्थना में शामिल होने वाले व्यक्ति दानपात्र में जो राशि डालते हैं, वह भी धर्मांतरण के लिए काम में ली जाती है। दावा है कि ईसाई धर्म से प्रभावित लोग खुद की आय का हिस्सा तक देते हैं। बताया जाता है कि रुपये नहीं देने पर अनर्थ होने का डर भी बताया जाता है। राजधानी से पहले राजस्थान के बारां जिले में धर्म परिवर्तन का एक बड़ा मामला सामने आया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गाँव में मां दुर्गा आरती का आयोजन कराने वाले दलित युवकों से मारपीट की गई। पूरे घटनाक्रम से गुस्साए दलितों ने सामूहिक रूप से धर्म परिवर्तन कर लिया। बताया जा रहा है कि 250 दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाने से सनसनी फैल गई। वहीं, पुलिस अधिकारी पूजा नागर ने बताया कि बारां जिले के बापचा थाना क्षेत्र के भुलोन गांव बौद्ध धर्म ग्रहण किया गया है। हालाँकि पुलिस ने धर्म परिवर्तन करने वालों की संख्या काफी कम बताई है। गाँव में दलितों ने जुलूस निकालते हुए धर्मांतरण की शपथ ली और गांव की बैथली नदी में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां और तस्वीरें प्रवाहित कर दीं।

कांग्रेस सरकार जब राजधानी में ही धर्मांतरण को नहीं रोक पा रही है, तो जिलों में ऐसे मामलों में उससे कार्रवाई की क्या ही उम्मीद करें। जयपुर और बारां की तरह अलवर में भी धर्मांतरण का मामला पिछले माह ही आ चुका है। राजस्थान के अलवर जिले में माता-पिता पर अपने बेटे-बहू का धर्मांतरण कराने का आरोप लगा है। पीड़ित दंपति सोनू और उनकी पत्नी रजनी ने पिछले माह 19 अक्टूबर को इस मामले में शिकायत दर्ज कराई। इन दोनों ने शिकायत देते हुए पुलिस से कहा है कि सोनू के माता-पिता ने घर में रखी मूर्तियों को तोड़ दिया और हिंदू देवी-देवताओं के पोस्टर्स को फाड़ दिया है। वे लोग, इन पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए लगातार दवाब बना रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पीड़ित दंपति ने राजस्थान के अलवर पुलिस स्टेशन में माता-पिता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। यह भी कहा जा रहा है कि दंपति ने शिकायत दर्ज कराने के लिए बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों से मदद मांगी।

वहीं राजस्थान में बढ़ रहे धर्मांतरण के मामले को लेकर भारतीय जनता पार्टी प्रदेश सरकार को घेरने लगी है। भाजपा  प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया ने कहा है कि  राजस्थान कितना असुरक्षित इसका नमूना धर्मांतरण है। यहां लव जिहाद और लैंड जिहाद की घटनाएं होती रही हैं। धर्मान्तरण बीच में रुका था लेकिन फिर से हो रहा है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। कमजोर लोगों को टारगेट किया जा रहा है।पूनिया के अलावा उपनेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने भी कहा, “राज्य में हिंदुओं के धर्मांतरण की घटनाओं का बार-बार सामने आना और गहलोत सरकार का ऐसे गंभीर मुद्दे पर मूकदर्शक बने रहना इस बात का प्रमाण है कि कांग्रेस तुष्टिकरण की नीति पर चलकर धर्मांतरण को शह देने में लगी हुई है। राज्य सरकार जबरन धर्मांतरण करवाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें।” जल्द ही कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की  भारत जोड़ों यात्रा राजस्थान जाने वाली है उन्हें इस जबरन धर्म परिवर्तन के मसले  पर हिन्दू संगठनों का विरोध भी झेलना पड़ सकता हैं

(युवराज)– अशोक भाटिया

प्यार के तिलिस्म में फंसती युवतियां और टूटती संस्कार की कड़ियां*

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*– डॉ.नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी*

 

       आजकल युवा प्रेम को व्यवहारिक बनाने के चक्कर में प्रेम की मूल संवेदना को ही खत्म करने लगे हैं जैसे कि आए दिन प्रेम में हत्या या बलात्कार तक की घटनाएं होती रह रही हैं। आजकल युवा का आकर्षण से प्रेम तक के बीच का समय काल काफी कम हो रहा है। कुछ घटनाओं में तो अनजान से दोस्ती, दोस्ती से प्रेम और प्रेम से सेक्स और सेक्स से घर से भाग जाने तक की घटना इतने कम दिनों में हो जाती है जो समझ नहीं आ रहा है। एक दूसरे को जाने बिना समझे बिना काफी रिश्तों को काफी आगे ले जाने की बीमारी से समाज ग्रसित है। दोस्ती होती है, शादी की बात होती है और फिर इनका व्यवहार ऐसे ही मानो पति पत्नी हो. फिर कुछ दिन में सब खत्म क्योंकि जब रिश्ते  शारीरिक जरूरत के अनुसार बनते है तो टूटना स्वाभाविक है। इससे बचने के लिए युवाओं को दोस्ती और प्रेम तथा अपने और बहुरूपिये के बीच के अंतर को समझना होगा।

          आफताब श्रद्धा जैसी घटनाएं बहुत दुखद है। एक सभ्य समाज के नाम पर कलंक है। आज़ादी की चाह हमारे युवाओं को भटकाव  की ओर ले जा रही है। परिणाम लड़कियों को ही भुगतना पड़ता है। काश! हमारी बेटियों को समझ आ जाए। वे माता-पिता को अपना बैरी ना समझे। अपने जीवन के कीमती वर्ष पढ़ाई और कैरियर में लगाएं। एक निश्चित उम्र के बाद ही अच्छे बुरे की समझ भी आती है। आजकल के मां – बाप भी कैरियर बनाने के चक्कर में अपने बच्चों को जमाने के ऊंच-नीच नहीं बताते। सिर्फ पढ़ो , पढ़ो, कैरियर बनाओ। जो नसीहत उन्हें शुरू से देनी चाहिए वह उन्हें कभी नहीं मिलता। वे सिर्फ कैरियर के गुलाम बनकर रह जाते हैं। ऐसे में जब आफताब जैसा भेड़िया उनसे नकली मुहब्बत दिखाता है तो वह उसी को असली प्यार समझ कर अपने परिवार से विद्रोह कर बैठती है। फिर जो परिणाम होता है वह सर्वविदित है। लड़की की तो शत प्रतिशत गलती है जिसका परिणाम भुगत लिया उसने। इतनी निशृंस हत्या करना, एक गंदी सोच का ही नतीजा है। प्रेम शब्द का सिर्फ सहारा लिया।

          आश्चर्य है कि विदेश में रहने वाले लोग भारतीय संस्कृति की ओर आने लगें हैं और भारत के युवा विदेश के कल्चर को अपना कर आधुनिकता का आवरण ओढ़ कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। लिव इन रिलेशनशिप में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों का अधिक दैहिक और मानसिक शोषण किया जाता है। आधुनिकता के नाम पर हम आने वाली पीढ़ी को कितना गलत संदेश दे रहे हैं। माता पिता आर्थिक उपार्जन हेतु व्यस्त रहते हैं और बच्चों को समय नहीं दे पाते और बच्चे इंटरनेट पर उपलब्ध ज्ञान का गलत मतलब निकाल लेते हैं। सचमुच आने वाली पीढ़ी के लिए यह बहुत भयावह स्थिति है। वैसे लिव-इन को कानूनी मान्यता देना हमारे संस्कार के विरुद्ध है, इसका साफ-साफ अर्थ ये कि हम पाश्चात्य रंग में रंग गए। ऐसा पाश्चात्य में एक कानून था जो शादी के पहले सेक्स को निषेध करता था। यूरोप में फौर्नीकेशन नाम का कानून था जिसमें विवाह बिना सैक्स अपराध था। आज इस पर समाज के साथ-साथ माता-पिता और सरकार को भी सोचने की आवश्यकता है।

रही सही कसर वेब सीरीज और चलचित्र निकाल दे रहे हैं। बहुत दुखद और भयावह स्थिति है। संस्कार को आज दकियानूसी की निशानी बताया जा रहा है। आधुनिकता में भी एक तरह का दकियानूसीपन ही चल रहा है । लिव-इन में हो तो जब रिश्ता टूट जाये तो अलग हो जाओ बिना किसी झगड़े के लेकिन ऐसा भी नहीं करेंगे । लड़-झगड़ कर भी चिपके रहेंगे । फिर पीछा छुड़ाने के लिए हत्या तक पर उतर आएंगे । मनुष्य को पहचानने की कोई क्षमता नहीं है । जीवन में संघर्ष किया नहीं । बस किसी तरह कमाने लगे, बाल कटा कर ख़ुद को आधुनिक समझ नशा और सेक्स को आज़ादी समझ परिवार और रिश्तों को नकार खुद को आधुनिक समझने का भ्रम पाले हैं । यह अधकचरे ज्ञान वाली, पढ़ी-लिखी जाहिल युवा पीढ़ी है ।

समझदार युवा पहले अपना कैरियर बनाते हैं फिर भले ही अपनी मर्जी से शादी या प्रेम करते हैं । ये तो वासनाओं, इच्छाओं के वशीभूत केवल नशा, सेक्स, आधुनिक रहन सहन के नाम पर कुछ भी खाना कुछ भी पिना परिवार से दूरी को ही आज़ादी समझने वाले लोग हैं जो एक तरह से मनोरोगी, विक्षिप्त हैं और समाज के लिए अवांछनीय, गैर सामाजिक तत्व बनते जा रहे हैं ।

           इस का दोषी जितना युवा है, उससे कम दोषी उसका परिवार , समाज , प्रशासन और सरकार नहीं है। हमें अपने नीति और नीयत पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। हम अपना दोष पश्चिमी सभ्यता या किसी अन्य के सर नहीं मढ़ सकते। हमें अपनी भावी पीढ़ी को विश्वास में लेकर चलना चाहिए। ऐसा क्या है जो कार्यालयों में लोग अधिकारी की बात मानते हैं और जिस घर परिवार ने उन्हें या हमें सब कुछ दिया तथा भरन पोषण किया, उसे नजरंदाज करते हैं। उसका विरोध भी करते हैं। इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? घर परिवार या समाज और सरकार द्वारा बनाई गई कानून व्यवस्था।

           पहले बहुत जाँच पड़ताल के बाद रिश्ते हुआ करते थे । अब सब फ़ास्ट हो गया है। सब हर बात के लिए इसी भागमभाग में लगे हैं कि कहीं बढ़िया मौका चूक न जाएं, दौड़ में पीछे न रह जाएं। स्पीड में तरक्की वैभव सुख मज़ा सब पा लेने को आतुर युवक युवतियां अंधाधुंध दौड़ रहे हैं, भूल जाते हैं कि मुंह के बल गिर भी सकते हैं। ये पश्चिम नहीं.संस्कारों की चिकनी चट्टान बहुत चोट पहुंचा सकती है. युवाओं को अब रुककर, थोडा़ सोचने की ज़रूरत है नहीं तो इसके गलत परिणाम सबके सामने है। अब विचार आपको करना है कि आगे क्या करना है। (युवराज)

   डॉ.नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी

SPECIAL STORY – क्या भारत जनसंख्या में सचमुच चीन को पछाड़ देगा ?

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  • अश्विनी कुमार मिश्र 

संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार 15 नवंबर विश्व की जनसंख्या  800 करोड़ तक पहुँच गई हैइस आबादी विस्तार में  चीन और भारत  का सबसे बड़ा हिस्सा हैं। दिलचस्प बात यह है कि इसी रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र ने भी भविष्यवाणी की है कि भारत चीन को पीछे छोड़ देगा और जनसंख्या के मामले में दुनिया में पहले स्थान पर जाएगा। इस पृष्ठभूमि में संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट क्या है? इसमें व्यक्त की गई भविष्यवाणियां वास्तव में क्या हैं? जनसंख्या के मामले में चीन को पछाड़ कर कब नंबर वन बनेगा भारत? और जनसंख्या के बारे में माल्थस का सिद्धांत क्या है

 संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार 15 नवंबर विश्व की आबाद 800 करोड़ तक पहुँच गई है. इसमें चीन और भारत का योगदान बड़ा है.  यह भी अनुमान है कि विश्व की जनसंख्या 2030 तक 850 करोड़, 2050 तक 970 करोड़ और 2100 तक 1040 करोड़ हो जाएगी। 2080 में दुनिया की आबादी चरम पर होगी। 2100 के बाद जनसंख्या घटने लगेगी।

भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश कब बनेगा?

संयुक्त राष्ट्र संघ की इस रिपोर्ट में अलग-अलग भविष्यवाणी की गई हैं । इसने यह भी भविष्यवाणी की गई है कि साल 2023 में चीन को पछाड़कर मौजूदा दर से आबादी में भारत नंबर वन देश बन जाएगा।2050 तक विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वृद्धि केवल आठ देशों में होगी। इसमें कांगो, मिस्र, इथियोपिया, भारत, नाइजीरिया, पाकिस्तान, फिलीपींस और तंजानिया शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक विश्व जनसंख्या संभावना रिपोर्ट सोमवार (14 नवंबर) को विश्व जनसंख्या दिवस पर प्रकाशित हुई थी। इसमें ये सभी भविष्यवाणियां की गई हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वर्तमान जनसंख्या वृद्धि दर 1950 के बाद से सबसे कम है। 2020 में जनसंख्या वृद्धि दर 1 प्रतिशत से भी कम थी।

दुनिया की आबादी को 700 करोड़ से 800 करोड़ होने में कुल 12 साल लगे। अब इस आबादी को 800 से बढ़ाकर 900 करोड़ करने में 15 साल लगेंगे। यानी साल 2037 में 900 करोड़ आबादी पहुंच जाएगी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके कारण विश्व की जनसंख्या वृद्धि दर धीमी हो गई है।

ब्रिटिश अर्थशास्त्री थॉमस रॉबर्ट माल्थस ने जनसंख्या वृद्धि पर एक सिद्धांत प्रतिपादित किया। उसका नाम माल्थस थ्योरी है। माल्थस के सिद्धांत के अनुसार जनसंख्या प्रत्येक 25 वर्ष में दोगुनी  हो जाती है। जबकि संसाधन सामान्य दर से बढ़ते हैं तो जनसंख्या वृद्धि दर दोगुनी हो जाती है। उदा. यदि जनसंख्या 2 से 4 और 4 से 8 हो जाती है, संसाधन 2 से 3 और 3 से 4 हो जाता है।

जनसंख्या वृद्धि के प्रभाव
माल्थस के सिद्धांत के अनुसार यदि जनसंख्या तेजी से बढ़ती है तो संसाधन कम होने लगते हैं। इससे भोजन और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव पड़ता है। माल्थस का कहना है कि ऐसी स्थिति में जनसंख्या नियंत्रण के लिए स्वतः ही प्राकृतिक घटनाएं घटित होती हैं। उदा. जनसंख्या को सूखा, महामारी, युद्ध और प्राकृतिक आपदाओं जैसी घटनाओं द्वारा नियंत्रित किया जाता है। हालाँकि, माल्थस के सिद्धांत की कई बार आलोचना की गई है।

जनसंख्या वृद्धि के पीछे कारण

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, उपचार और प्रौद्योगिकी में प्रगति सार्वजनिक स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता और चिकित्सा को अधिक सुलभ बना रही है। इसके कारण महामारी की दर में कमी आई है। महामारी हो भी जाए तो मरने वालों की संख्या पहले से कम है, क्योंकि इलाज उपलब्ध है। स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण जीवन प्रत्याशा बढ़ी है। इससे मृत्यु दर में कमी आई है और जनसंख्या में वृद्धि हुई है।

“पटाया-थाईलैंड में चल रहे अंतरराष्ट्रीय परिवार नियोजन सम्मेलन में बोलते हुए, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. नतालिया कानेम ने यह जानकारी दीकि जनसंख्याँ की रफ़्तार कई कारणों से तेज है. और 15 नवंबर जनसंख्याँ के लिहाज से विश्व के लिए ऐतिहासिक दिन होगाजब विश्व की आबादी 800 करोड़ हो गयी.   उन्होंने कहा कि ‘आठ’ अंक सांकेतिक है। यदि इसे क्षैतिज रूप से घुमाया जाए तो अनंत की तस्वीर बनती है। इस संख्या को पार कर रही दुनिया में महिलाओं और लड़कियों के लिए विकास की अनंत संभावनाएं पैदा की जानी चाहिए।” (युवराज)

अश्विनी कुमार मिश्र