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पशुओं में खुरपका और मुंहपका बीमारी के बचाव हेतु टीकाकरण जारी

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भारत सरकार पशुपालन, मत्स्य एव डेयरी विभाग के राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम अंतर्गत जिले के समस्त गौ व भैंस वंशीय पशुओं में खुरपका और मुंहपका बीमारी (एफएमडी) की रोकथाम के लिए निःशुल्क टीकाकरण कार्यक्रम जारी है। यह अभियान 01  अक्टूबर से प्रारंभ होकर 15 नवम्बर 2025 तक संचालित किया जाएगा। अभियान के अंतर्गत जिले के सभी ग्रामों व शहरी क्षेत्रों के सभी गौ व भैंस वंशीय पशुओं में निःशुल्क टीकाकरण कार्य पशु चिकित्सा विभाग के सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्राधिकारी, गौ सेवक, मैत्री व सम्बंधित कर्मचारियों द्वारा किया जा रहा है।

उप संचालक, पशु चिकित्सा  डॉ जी.एस. सोलंकी ने सभी पशु पालकों  से अनुरोध किया है कि वह अपने 4 माह से अधिक उम्र के सभी गौ व भैंस वंशीय पशुओं का टीकाकरण अवश्य ही कराएं। यह  बीमारी  विषाणु जनित होकर पशुओं के लिए बहुत ही घातक है। इस  बीमारी से पशुओं के मुख व खुरों में छाले, घाव व जंतु हो जाते  हैं । जिससे दुधारू पशुओं का दुग्ध उत्पादन अत्यंत ही कम हो जाता है और कार्य करने योग्य बैलों के खुर खराब हो जाते  हैं । जिससे पशु पालकों को आर्थिक हानि का सामना करना पड़ता है। डॉ. सोलंकी ने बताया कि जिला अंतर्गत समस्त पशु चिकित्सा संस्थाओं में पर्याप्त मात्रा में टीका द्रव्य की व्यवस्था की गई है। टीकाकरण से  संबंधित  विस्तृत जानकारी के लिए निकटतम संस्था से संपर्क कर सकते  हैं ।

अखंड प्रचंड पुरुषार्थी अमित शाह

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(सत्येंद्र कुमार जैन-विनायक फीचर्स)

पवित्र ग्रंथ श्रीमद् भागवत गीता में लिखा गया है कि – यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।

अर्थात श्रेष्ठ मनुष्य जो आचरण करते हैं,अन्य मनुष्य वैसा ही आचरण करते हैं। श्रेष्ठ मनुष्य जो कुछ प्रमाण देते हैं,अन्य मनुष्य उसी के अनुसार आचरण करते हैं।  भारत के सबसे अधिक समय तक गृह मंत्री होने का कीर्तिमान रचने वाले केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह उन्हीं श्रेष्ठ मनुष्यों की श्रेणी में आते हैं।उन्होंने अपने तप से, त्याग से, कर्तव्य निष्ठा से, संगठन निष्ठा से, कृतित्व से, अखंड प्रचण्ड पुरुषार्थ से प्रमाणित किया है। मन,वचन,काय से कर्तव्य पालन हेतु सर्वस्व समर्पण भाव से सिद्ध किया है।

उन्होंने 140 करोड़ भारतीयों के मन मस्तिष्क में, हृदय प्रदेश में अमिट छाप छोड़ी है। 22 अक्टूबर 1964 को मुंबई में गुजराती परिवार में जन्मे अमित शाह की प्रारम्भिक शिक्षा, गुजरात में अपने दादा के घर मानसा में हुई। उनको भारतीय शास्त्रों ,व्याकरण तथा महाकाव्य का अध्ययन भी बचपन में कराया गया। भारतीय दर्शन के प्रति उनकी अध्ययनशीलता उनके संभाषणों में समय-समय पर प्रकट होती रहती है उनके जीवन में उनकी माँ श्रीमती कुसुम बेन का विशेष प्रभाव रहा है। उन्हें खादी और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग की प्रेरणा माता से प्राप्त हुई है।

आपातकाल के पश्चात 1977 में जब आम चुनाव हो रहे थे,तब 13 वर्ष के अमित शाह मेहसाणा लोकसभा सीट से प्रत्याशी रही सरदार वल्लभभाई पटेल की बेटी मणि बेन पटेल के लिए गलियों में पोस्टर,स्टीकर लगाने निकल पड़ते थे। इसी समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनका जुड़ाव हुआ।राष्ट्रवाद,सेवा समर्पण,तप और त्याग के भाव का बीजारोपण हुआ। 1980 में 16 वर्ष की आयु में वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े।1982 में उनको अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद गुजरात का संयुक्त सचिव भी बनाया गया।उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के 1984 में नारायणपुर वार्ड में सांघवी बूथ के एजेंट के रूप में कार्य किया। 1987 में वह भाजपा युवा मोर्चा से जुड़े । अध्ययन शील होने के कारण 80 के दशक में दीनदयाल शोध संस्थान से उनका लगाव रहा। वे राष्ट्र ऋषि नानाजी देशमुख के निकट रहे,उनसे सीखने का अवसर भी प्राप्त हुआ। 1989 में भाजपा के अहमदाबाद के नगर सचिव बने। 1995 में अमित शाह को गुजरात प्रदेश के वित्त विकास निगम का अध्यक्ष बनाया गया।उन्होंने निगम की आर्थिक स्थिति को सशक्त किया। घाटे में चल रहे निगम को 214 प्रतिशत का लाभ हुआ। उन्होंने अनेक नवाचार जैसे पट्टा क्रय विक्रय, कार्यशील पूंजी अवधि लोन और ट्रक लोन प्रदान किए।

वर्ष 1997 में अमित शाह को भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चा का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया। कुछ समय बाद ही गुजरात की सरखेज विधानसभा के उपचुनाव में पार्टी द्वारा उन्हें प्रत्याशी बनाया गया। वह पहली बार 25000 से अधिक वोटो से जीतकर विधायक बने। वह निरंतर 2017 तक विधानसभा के सदस्य रहे हैं ।अमित शाह 36 वर्ष की आयु में 2002 में अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक के सबसे युवा अध्यक्ष बने। बैंक को घाटे से निकालकर मुनाफे में ले आए।

वर्ष 2001 में उन्हें भाजपा की राष्ट्रीय सहकारिता प्रकोष्ठ का संयोजक नियुक्त किया गया। वह वर्ष 2002 से 2010 तक गुजरात सरकार में महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे हैं। उन्होंने खेलों को भी बढ़ावा दिया। सर्वप्रथम अहमदाबाद के प्राथमिक विद्यालय में शतरंज का प्रयोग किया,जिससे बच्चों के मानसिक विकास में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके सुझाव पर गुजरात के समस्त प्राथमिक स्कूलों में सुझाव को लागू किया। उन्होंने क्रिकेट को भी बढ़ावा दिया वर्ष 2009 में गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन का उपाध्यक्ष बनाया गया। 2013 में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया एवं उत्तर प्रदेश राज्य का प्रभार दिया गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से भारतीय जनता पार्टी को 73 सीटों पर विजय श्री प्राप्त हुई। इस महा विजय के सूत्रधार अमित शाह रहे हैं।

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गाय, गोविंद और गौशाला : संस्कृति से समृद्धि की ओर मध्यप्रदेश की ‘गौ कथा’

मुझे भी उनके साथ विमर्श करने का अवसर प्राप्त हुआ है। उनसे वर्ष 2013 में भाजपा संवाद प्रकोष्ठ के प्रदेश सह संयोजक रूप में संवाद प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक के समय राष्ट्रीय कार्यालय में भेंट हुई।उनका राष्ट्रव्यापी सूक्ष्म दर्शी एवं वृहद दृष्टिकोण,समर्पण और कर्तव्य निष्ठ मार्गदर्शन आज भी प्रेरणा देता है। फिर अनेक बार भाजपा संवाद प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य रूप में उनसे दिल्ली प्रवास के समय मार्गदर्शन मिलता रहा। जुलाई 2014 में अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए।उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में महा सदस्यता अभियान संचालित कर भारतीय जनता पार्टी को विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनाया। 11 करोड़ से अधिक सदस्य देश भर में बनाए गए। अनेक नवाचार उनके द्वारा किए गए। अनेक विभागों और प्रकल्पों को बनाया गया। कार्यालय ,पुस्तकालय और ई पुस्तकालय पर उन्होंने विशेष जोर दिया। आज भाजपा के लगभग 2000 स्वयं के कार्यालय देश भर में बन रहे हैं या बन चुके हैं। वह वर्ष 2017 में गुजरात से राज्यसभा सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष के कार्यकाल में भाजपा को सबसे बड़ी ऐतिहासिक जीत अर्जित हुई। 303 सीट जीतीं। 2019 में उन्हें केंद्रीय गृहमंत्री के रूप में दायित्व दिया गया। सर्वप्रथम उन्होंने 5 अगस्त 2019 को कश्मीर से धारा 370 और आर्टिकल 35 अ को निष्प्रभावी किया। एक भारत श्रेष्ठ भारत की संकल्पना को सिद्ध किया।कश्मीर घाटी में शांति और प्रगति के रास्ते को खोला है। अलगाववाद और आतंकवाद पर कार्रवाई की है। पूर्वोत्तर राज्यों की सीमाओं तथा वहां की आंतरिक सुरक्षा से संबंधित अनेक समस्याओं को शांतिपूर्वक हल किया है। ब्रू रियांग समझौता, असम मेघालय सीमा विवाद का हल,बोडो समस्या का निदान जैसे प्रमुख समझौते सम्मिलित हैं। 50 साल से जारी नक्सलवादी तिरुपति से पशुपतिनाथ,नेपाल तक का रेड कॉरिडोर बना कर भारत के लगभग 126 जिलों में आतंक फैला रहे थे। विकास की राह में रोड़ा बनते थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रबल इच्छा शक्ति और अमित शाह की जीरो टॉलरेंस की नीति के कारण वह उग्रवाद महज 11 जिलों में सिमट गया है। आज 3 जिले ही अति उग्रवाद से पीड़ित हैं। वामपंथी रेड कॉरिडोर को ध्वस्त कर दिया गया है। नक्सलवाद को मार्च 2026 तक समाप्त करने की संकल्पना भी अमित शाह पूर्व में ही व्यक्त कर चुके हैं। आज नक्सलवादी प्रभावित जिलों में विकास से लोगों को लाभ मिल रहा है। समाज में व्याप्त नशे पर उन्होंने कड़े कदम उठाए हैं। संसद में युगांतकारी निर्णय लिए हैं। वर्ष 2021 में वह भारत के सहकारिता विभाग के पहले मंत्री बनाए गए। उन्होंने सहकार से समृद्धि का नया मंत्र दिया है। 2 लाख से अधिक सहकारी समितियों का गठन किया गया है। गांव-गांव में छोटे से छोटे किसानों को भी लाभ प्राप्त हो रहा है। सहकार से समृद्धि के मंत्र को फलीभूत किया जा रहा है।

अखंड प्रचंड पुरुषार्थी अमित शाह

भारतीय जनता पार्टी के सर्वोत्कृष्ट संगठक हैं,संगठन शिल्पी हैं,संगठन के महारथी हैं। वह एक भारत, श्रेष्ठ भारत के मंत्र को आत्मसात करने वाले,जम्मू-कश्मीर में 70 साल से प्रभावी धारा 370 को निष्प्रभावी करने वाले, 50 साल से अधिक से प्रभावी नक्सलवाद का उन्मूलन करने वाले गृह मंत्री मंत्री हैं।वह लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के सच्चे अनुयायी हैं। इसीलिए अमित शाह 21वीं सदी के भारत के लौह पुरुष हैं, आयरन मैन हैं,फौलादी व्यक्तित्व हैं। (विनायक फीचर्स)

गाय, गोविंद और गौशाला : संस्कृति से समृद्धि की ओर मध्यप्रदेश की ‘गौ कथा’

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(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स)
भारत की सभ्यता की जड़ें केवल मिट्टी में नहीं, बल्कि उस चेतना में हैं जो करुणा, सहअस्तित्व और संवेदनशीलता को जीवन का सार मानती है। उस चेतना का सबसे जीवंत प्रतीक गाय है। जो केवल एक पशु नहीं, बल्कि भारतीय मन, माटी और धर्म का नितांत अभिन्न अंग है। वह खेतों की हरियाली में, लोकगीतों की धुन में, और हमारे उत्सवों के उल्लास में बराबरी से सहभागी रही है। उसे ‘माता’ कहा गया, और यह केवल श्रद्धा नहीं थी। यह उस संबंध की अभिव्यक्ति थी जो जीवन, प्रकृति और मानव के बीच संतुलन को सबसे स्वाभाविक रूप में दिखाता है।
वैदिक दृष्टि और सांस्कृतिक सभ्यता ऋग्वेद का मंत्र “गावो विश्वस्य मातरः” केवल धार्मिक उद्घोष नहीं, बल्कि सहअस्तित्व की सर्वोच्च घोषणा है। गाय को ‘विश्वमाता’ कहना यह मानना है कि पोषण और करुणा, धर्म और जीवन, एक-दूसरे से विलग नहीं। भारतीय चिंतन में गाय वह माध्यम रही जिससे ग्रामीण समाज में आत्मनिर्भरता आती है, खेत उपजाऊ बनते हैं और परिवार समृद्ध होता है। महाभारत में कहा गया है- “गावः सर्वसुखप्रदाः,” अर्थात गायें समस्त सुख देनेवाली हैं। यह सुख केवल भौतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी है।
गोपालन, केवल दुग्ध उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन है। जिसमें त्याग, सेवा और संतुलन का भाव निहित है। मध्यप्रदेश इस दृष्टि से भारत का एक जीवित उदाहरण है। जहाँ परंपरा, नीति और ग्रामीण जीवन एक-दूसरे में रचे-बसे हैं।
नर्मदा की पवित्रता, मालवा की मिट्टी की सुगंध और बुंदेलखंड के लोकगीतों में ‘गोविंद’ और ‘गौ’ की भावना सहज रूप में प्रकट होती है। यहाँ की संस्कृति में गोपालन केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि अस्तित्व का हिस्सा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार ने इस परंपरा को केवल धार्मिक आयोजन के सीमित दायरे से निकालकर नीति की मुख्यधारा में स्थापित किया है।
उन्होंने गाय को न केवल श्रद्धा का विषय माना, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के स्थायी स्तंभ के रूप में देखा। ‘गौशाला विकास’, ‘गोवर्धन पूजा’ और ‘गोपालन संवर्धन’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से यह दृष्टि क्रियान्वित होती दिख रही है।

परंपरा से नीति तक की यात्रा

जहाँ पहले गोवर्धन पूजा केवल घर-आँगन का धर्मिक उत्सव थी, वहीं अब यह मध्यप्रदेश में सामूहिक संकल्प का प्रतीक बन चुकी है। 21 और 22 अक्टूबर, 2025 को राज्यभर में जिस भव्यता से यह पर्व मनाया गया, उसने यह संदेश दिया कि शासन और संस्कृति के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं रहनी चाहिए। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने इस पर्व को राज्यव्यापी स्वरूप देते हुए ‘गौशाला’ को ग्रामीण अर्थव्यवस्था का केंद्र घोषित किया। यह कदम प्रशासनिक दृष्टि से उतना ही दूरदर्शी है जितना सांस्कृतिक रूप से गहरे अर्थों वाला। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि गाय अब केवल पूजा की मूर्ति नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वावलंबन, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की धुरी है।

नई ग्रामीण अर्थव्यवस्था का केंद्र
आज मध्यप्रदेश की गौशालाएँ केवल आश्रय स्थल नहीं रहीं। वे ग्रामीण जीवन के आत्मनिर्भर मॉडल के रूप में विकसित हो रही हैं। गोबर और गौमूत्र आधारित जैविक खेती, वर्मी-कम्पोस्ट निर्माण, पंचगव्य उत्पादों तथा गोबर गैस संयंत्रों ने गाय को कृषि और उद्योग के संगम में पुनः प्रतिष्ठित किया है। यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि दार्शनिक भी है, क्योंकि यह उस विचार का पुनर्जागरण है जिसमें प्रकृति का दोहन नहीं, उसका संवर्धन होता है। गौशालाएँ अब ग्रामीण जनजीवन की प्रयोगशालाएँ हैं, जहाँ सामाजिक आस्था, पर्यावरणीय संरक्षण और आजीविका का समन्वय एक साथ दिखाई देता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है कि “गावः सर्वं प्राप्यते लोके”, अर्थात गाय से संसार के सभी श्रेष्ठ लाभ प्राप्त होते हैं। यह आज के संदर्भ में और भी प्रासंगिक है। जैविक खेती को बढ़ावा देने से लेकर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने तक, गाय आधुनिक पारिस्थितिकी का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।

गोवर्धन पूजा का सामाजिक रूपांतरण

गोवर्धन पूजा अब केवल धार्मिक विधि नहीं रही। यह अब ‘नीति और लोक’ के संगम का अवसर बन चुकी है। जब प्रशासन, समाज और संस्कृति एक साथ किसी पर्व को मनाते हैं, तब वह अनुष्ठान से आगे बढ़कर नीतिगत उद्घोषणा बन जाता है। राज्य के प्रत्येक जिले, गाँव और पंचायत स्तर पर आयोजित गोवर्धन पर्व में जब अधिकारी, किसान, महिलाएँ और विद्यार्थी एक मंच पर आए, तो यह सामाजिक साझेदारी की अनूठी मिसाल बनी। यह आयोजन एक प्रकार से ‘सांस्कृतिक जननीति’ का उदाहरण है, जो विश्वास दिलाता है कि धर्म और विकास विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

पर्यावरण और आत्मनिर्भरता की नयी दिशा
‘गोपालन संवर्धन योजना’ के तहत पंचगव्य आधारित उद्योग और जैविक उत्पादों के निर्माण ने गाँवों में नए अवसर खोले हैं। गोबर से ऊर्जा, खाद और औषधि का निर्माण ग्रामीण भारत की उस परंपरा का पुनर्जीवन है जो आत्मनिर्भरता और सतत जीवनशैली पर आधारित थी।मध्यप्रदेश में अब कई गौशालाओं ने गोबर गैस संयंत्रों के ज़रिए न केवल ऊर्जा संकट को घटाया है, बल्कि स्थानीय स्तर पर बिजली और ईंधन का भी उत्पादन प्रारंभ किया है। इससे पर्यावरण प्रदूषण घटा है और ग्रामीण समुदायों की आर्थिक बचत भी हुई है। यही वह दृष्टिकोण है जिसमें ‘धर्म नीति बनता है और नीति धर्म का विस्तार करती है।’

शासन और संस्कृति का अभिन्न संबंध

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब राज्य व्यवस्था अपने सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ी रहती है, तब समाज की स्थिरता और विकास साथ-साथ चलते हैं। गाय का संरक्षण, केवल एक प्रशासनिक योजना नहीं, बल्कि ‘संवेदनशील शासन’ की पहचान है। मध्यप्रदेश की यह पहल राजनीतिक अर्थों में नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना के धरातल पर खड़ी है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने जिस प्रकार गौशालाओं को नीति के केंद्र में रखा, उसने यह सिद्ध किया कि विकास मात्र निर्माण नहीं, बल्कि सभ्यता की आत्मा की रक्षा भी है। अथर्ववेद का श्लोक “गोभिः प्रजाः सुवृता भवन्ति” आज इसी नीति में साकार होता दिखता है। जब गाँवों में गाय की सेवा के माध्यम से जैविक खेती, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और सामाजिक सहभागिता बढ़ती है, तब यह श्लोक केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि नीति का प्रत्यक्ष रूप बन जाता है।

भारतीयता की परम्परा
गाय की सेवा का अर्थ केवल दूध का संग्रह या धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस सोच का पुनर्पाठ है जो कहती है कि मनुष्य और प्रकृति प्रतियोगी नहीं, सहचर हैं। यह दर्शन भारतीयता का मूल है। हमारे यहाँ अर्थ और धर्म कभी एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे। आज, जब वैश्विक स्तर पर ‘सस्टेनेबिलिटी’ का विमर्श बढ़ रहा है, तब भारत की यह परंपरा आधुनिक विकास का आधार बन सकती है। गाय, गौशाला और गोवर्धन पूजा इस सोच का जीवंत उदाहरण हैं कि परंपरा केवल अतीत का बोझ नहीं, बल्कि भविष्य का मार्गदर्शन भी है। ग्रामीण पुनर्जागरण की ओर मध्यप्रदेश की ‘गौ कथा’ अब केवल संस्कृति की रक्षा नहीं, बल्कि ग्रामीण पुनर्जागरण का संग्राम बन चुकी है। आज गाँवों में नयी पीढ़ी समझ रही है कि गोबर सिर्फ अपशिष्ट नहीं, बल्कि संसाधन है। गौमूत्र औषधि का स्रोत है। गाय केवल खेत की सहचरी नहीं, बल्कि पर्यावरण की प्रहरी है। सरकार ने जब इन पहलों को आर्थिक प्रशिक्षण और अनुसंधान से जोड़ा, तब यह योजना आत्मनिर्भर भारत की भावना के अनुरूप बन गई। यह वही आत्मनिर्भरता है जिसके केंद्र में स्वदेशी, स्वावलंबन और स्वाभिमान तीनों समाहित हैं।
धर्म और विकास का संगम

स्कन्दपुराण में कहा गया है- “गावो मां पातु सर्वतः,” अर्थात गाय मेरी सर्वत्र रक्षा करे। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक तंत्र का सूत्रवाक्य है, जो बताता है कि जो समाज गाय की रक्षा करता है, उसकी रक्षा स्वयं धर्म करता है। जब शासन इस सिद्धांत को अपनाता है, तो नीति में केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं रहते, बल्कि लोककल्याण की भावना जुड़ जाती है। मध्यप्रदेश ने यह दर्शाया है कि धर्म और नीति, भावनाएँ और प्रशासन, परंपरा और तकनीकी नवाचार सब साथ चल सकते हैं, यदि दृष्टि संवेदनशील और दिशा स्पष्ट हो।

संस्कृति से समृद्धि
21वीं सदी का भारत एक ऐसे दोराहे पर है जहाँ उसे विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना है। मध्यप्रदेश का ‘गौशाला मॉडल’ इस चुनौती का भारतीय उत्तर प्रस्तुत करता है। यहाँ विकास, संस्कृति से पोषण लेता है और संस्कृति विकास से दिशा। जैविक खाद, पंचगव्य औषधियाँ, गोबर गैस संयंत्र और पशुधन आधारित उद्योग न केवल अर्थव्यवस्था को गति देते हैं, बल्कि प्रदूषण को भी घटाते हैं। यह आधुनिक अर्थशास्त्र का भारतीय संस्करण है जो बताता है कि लाभ और लोककल्याण में संघर्ष नहीं, संगति संभव है।

संवेदनशील शासन की नई पहचान
मध्यप्रदेश की इस पहल ने यह भी सिद्ध किया है कि शासन केवल कानून लागू करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवनमूल्यों को संरक्षित रखने की प्रक्रिया भी है। जब नीति करुणा और संस्कृति से संलिप्त होती है, तब वह ‘शासन’ नहीं, ‘सेवा’ बन जाती है। गोवर्धन पूजा का व्यापक आयोजन केवल प्रशासनिक दक्षता का उदाहरण नहीं, बल्कि उस भावनात्मक एकता का प्रतीक है जो समाज और सरकार को एक सूत्र में बांधती है। जब पंचायत स्तर पर अधिकारी स्वयं गोसेवा में भाग लेते हैं, तब यह कार्यक्रम धार्मिकता से आगे बढ़कर लोकनीति बन जाता है।

गाय भारतीय जीवन का प्रतीक
“गावो धनं गावो मे जीवनं” गोपालसहस्रनाम का यह श्लोक गाय की भूमिका को सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित करता है। गाय न केवल धन है, बल्कि जीवन का पर्याय है। गाँव की आत्मा उसके साथ बसती है। खेत की उपज, परिवार की आराधना और समाज की स्थिरता, तीनों उसकी उपस्थिति से आलोकित होती हैं।आज जब शहरी केंद्रों में जीवन उदासीनता और भौतिकता में उलझा है, तब मध्यप्रदेश का ग्रामीण भारत गाय के माध्यम से पुनः अपनी जड़ों से जुड़ता हुआ दिखता है। यह दृश्य केवल धार्मिक पुनर्जागरण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मस्मरण का संकेत है।

नीति, संस्कृति और संवेदना का संगम

गाय, गोविंद और गौशाला। ये तीन शब्द केवल परंपरा का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की त्रिविध आत्मा हैं। इनका संगम यह सिखाता है कि विकास तब ही टिकाऊ हो सकता है जब वह संस्कृति से प्रेरित और समाज से जुड़ा हो।मध्यप्रदेश ने यह सिद्ध किया है कि धर्म और शासन का मेल किसी टकराव का नहीं, बल्कि सृजन का माध्यम है। यहाँ गोवर्धन पूजा, गौशाला विकास और गोपालन संवर्धन केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि नीति का वह रूप हैं जो “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” को भारतीय आत्मा देता है। जब शासन संवेदनशील और दूरदर्शी होता है, तो वह केवल योजना नहीं बनाता,वह जीवन को गढ़ता है, संस्कृति की रक्षा करता है, और समाज को दिशा देता है। यही वह संदेश है जो गाय, गोविंद और गौशाला से निकलता है कि संवेदनशील विकास ही सच्चा धर्म है, और धर्मसम्मत नीति ही सच्चा विकास है। (विनायक फीचर्स)

पोल्ट्री फार्म के पास मिला था गाय का सींग, खून; 11 साल बाद आया फैसला

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रतलाम में 11 साल पहले गौ मांस परिवहन के बहुचर्चित मामले में पकड़े गए 11 लोगों को कोर्ट ने 2-2 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। सभी पर 10-10 हजार रुपए का अर्थदंड भी लगाया है। फैसला न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अरुण सिंह ठाकुर ने दिया है।

पशु शेड गौ पालक रामफल के लिए बना आमदनी का जरिया

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रायपुर : सुविधा एवं साधन विहीन ऐसे हितग्राही जो जीवन में आगे बढ़ने की ललक रखते है उनके लिए सफलताओं का मार्ग भी प्रशस्त होता है। व्यवसाय करने के लिए शासकीय योजनाओं से जुड़कर सफलता के द्वार खुलते है और लक्ष्य की प्राप्ति तब और सूखद अनुभव में परिलक्षित होता है जब मन चाहा काम पूरा हो जाता है। ऐसी ही कहानी है कबीरधाम ज़िले के विकासखंड पंडरिया के ग्राम पंचायत चारभाठाखुर्द के हितग्राही रामफल पिता विश्राम की। महात्मा गांधी नरेगा योजना में दैनिक मजदूरी से अपना जीवन-यापन करने वाले रामफल का सपना छोटा सा व्यवसाय करने का था। गौ पालक बनकर आगे बढ़ने की इच्छा थी लेकिन संसाधनों की कमी आड़े आ रही थी। समस्याओं का समाधान महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना से निकला। जिसमें पशु शेड का निर्माण करने से व्यवसाय ने गति पकड़ी और बढ़ती आमदनी से जीवन आसान हो गया। पशु शेड बन जाने से गौ माता को सभी मौसमों में सुरक्षित रखने की सुविधा अलग से मिल गई।

आमदनी में बढ़ोतरी और पशुओं की सुरक्षा का साधन बना पशु शेड

पशु शेड नहीं होने से अनेकों परेशानियां थी जिसमें प्रमुख रूप से सभी मौसमों से पशुधन को बचाना। खुले में पशुधन रहने के कारण यहा वहां चले जाना, किचड़ एवं गंदगी के कारण गायों को होने वाली बिमारियां और साथ ही इस पर होने वाले खरचो की परेशानी बनी रहती थी। पशु शेड़ बनने के पहले शुरूआत में आमदनी कम हुआ करती थी और पशुधन के देखरेख में ज्यादा पैसे खर्च हो जाते थे। इन सभी समस्याओं का समाधान पशु पालन शेड निर्माण के रूप में स्थायी तौर पर हो गया।

पशुशेड निर्माण कार्य पर एक नजर

हितग्राही रामफल को अपने पंचायत से पता चला कि महात्मा गांधी नरेगा योजना की सहायता से उनके पशुधन के लिए पक्का शेड निशुल्क बनाया जा सकता है। फिर क्या था उनकी मांग एवं समस्याओं को देखकर ग्राम पंचायत ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के द्वारा इसका हल निकाला। पंचायत ने प्रस्ताव पारित कर पशु शेड निर्माण कार्य 68 हजार 500 रूपए राशि से स्वीकृत कराया गया। स्वीकृति पश्चात् माह अक्टुबर 2023 को पशु शेड निर्माण प्रारंभ किया गया। कार्य प्रारंभ होने पर ऐसा लगा जैसे व्यवसाय में आगे बढ़ने का रास्ता खुल गया हो। देखते ही देखते लगभग एक माह के अल्प समय में निर्माण कार्य पूरा हो गया। पशु शेड निर्माण में स्वंय हितग्राही को 48 दिवस का रोजगार मिला साथ ही 12 मानव दिवस का रोजगार सृजन करते हुए अन्य परिवारो सहित सभी ग्रामीणों को मजदूरी के रूप में 7 हजार 500 रूपए प्राप्त हुए।

पशुशेड का महत्व रामफल बहुत अच्छे से जानते थे क्योंकि यही वह जगह है जो उनके व्यवसाय को समय के साथ आगे बढ़ाने में प्रमुख योगदान देकर आजिविका को आगे बढ़ाने का सपना सच होता दिख रहा है। पक्का एवं हवादार पशु शेड बन जाने से व्यवसाय में प्रगति हो रहीं है। 3 से 4 हजार रूपए प्रतिमाह की आमदनी दुध बेचकर होने लगा साथ मे घर के लिए भी दूध मिल रहा है। सारा व्यवसाय अपने घर से संचालित करने की खुशी अलग से।आजीविका के नए साधन बन जाने से परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है और समाज में प्रतिष्ठा बढ़ रही है। आमदनी परिवार के बहुत काम आ रहा है। जिसमें छोटी सी 2 एकड़ के खेतीहर भूमि में उपयोग कर कृषक कार्य कर रहें और अलग से आमदनी का स्त्रोत बन रहा है।

हितग्राही रामफल अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि पशुशेड बनाने के पूर्व अपने पशुओं को सुरक्षित रखने की बहुत चिंता रहती थी। खुले में पशुधन को बरसात के दिनों में पानी से बचाने एवं सर्दी के दिनों में ठण्ड से बचाना बड़ी समस्या था। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण पशुशेड नही बन पा रहा था। रोजगार गारंटी योजना से मेरी सभी चिन्ताएं दूर हो गई और अब पशुधन के सुरक्षा की चिन्ता नही रही। पशुधन से होने वाली आमदनी गौसेवा में लगा रहा हूं और साथ ही अपने व्यवसाय को आगे बढ़ने के लिए और अधिक गाय पालने में समर्थ हो गया हूं।

गाय से टकराया स्कूटी सवार मौत

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लखनऊ। गोमतीनगर विस्तार में बृहस्पतिवार रात स्कूटी सवार हरदोई के कोथावां भैन गांव निवासी सत्येंद्र कुमार (25) गाय से टकराकर घायल हो गए। अस्पताल में उनकी मौत हो गई। सिर में गहरी चोट से जान गई। हादसे के वक्त सत्येंद्र हेलमेट नहीं लगाए थे।भाई अजय ने बताया कि सत्येंद्र बाराबंकी के सफेदाबाद में रहकर लखनऊ में लोगों के घरों में खाना बनाते थे। बृहस्पतिवार रात वह खाना बनाकर स्कूटी से टहलने निकले थे। रात 10 बजे हेल्थ सिटी के सामने से गुजरते समय अचानक सामने से आई गाय से वह टकरा गए। लहूलुहान सत्येंद्र ने चिनहट निवासी दोस्त को सूचना दी। दोस्त ने लोगों की मदद से उन्हें अस्पताल पहुंचाया, जहां कुछ ही देर में सत्येंद्र की जान चली गई।

हेलमेट लगाए होते तो शायद बच जाती जान

परिजनों ने बताया कि सत्येंद्र हेलमेट नहीं लगाए थे। उनके सिर में गहरी चोट आई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हेड इंजरी से मौत की पुष्टि हुई है। सत्येंद्र हेलमेट लगाए होते तो शायद जान बच जाती। सत्येंद्र के परिवार में पत्नी राधा व एक बेटी है।

मवेशियों से टकराकर पहले भी लोग गंवा चुके हैं जान

– तीन अक्तूबर को पारा चौकी के पास अचानक कुत्ता सामने आने से आशियाना के किला निवासी रवि कुमार बाइक के साथ गिर गए थे, जिससे उनकी मौत हो गई थी।

– 21 जून को गाय सामने आने से माल के जल्लाबाद में श्रद्धालुओं से भरा पिकअप पलट गया था। हादसे में गाजीपुर के रामधारी सिंह यादव की मौत हो गई थी। 12 अन्य घायल हो गए थे। 19 जून को गोसाईंगंज में कुत्ते को बचाते समय कार सड़क किनारे खड़ी गाड़ी से टकरा गई थी। हादसे में महिगवां निवासी कार चालक राम मिलन सिंह की जान बाल-बाल बची थी।

अलवर में पहली बार आई वेंकटेश बालाजी धाम में 18 इंच की गाय

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इस बार भक्तों की गोपाष्टमी पर छोटी गाय को देखने और उसकी पूजा करने की मनोकामना पूरी होने वाली है। अलवर शहर के वेंकटेश बालाजी धाम में पुंगनूर नस्ल की गाय को लाया गया है। जो देखने में बहुत सुंदर है और आकार बहुत छोटा होने के कारण यह सबको आकर्षित कर रही है।

कई लोग इन्हें अपने घर पर पालते हैं. इन गायों की सुंदरता और कद काठी की वजह से ही लोग इन्हें अपने साथ रखते हैं और उसकी सेवा करते हैं। यह गाय आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में सबसे ज्यादा पाई जाती हैं, यहां के शहर पुंगनूर पर ही इनका नाम रखा गया है। आश्रम में इनकी अठखेलियां देखने और दर्शन के लिए भक्त पहुंच रहे हैं।

स्वामी सुदर्शनाचार्य ने बताया कि दिल्ली और कानपुर के भक्तों ने यह दान दी है जो कि तेलगांना के पुंगनूर जिले से करीब 56 घंटे के सफर के बाद यहां आई है। राजस्थान में संभवत: तीसरी गाय है। इनकी कीमत करीब ढाई लाख रुपए है। जबकि दूध देने वाली गाय की कीमत वहां पर करीब 11 लाख रुपए के लगभग है।

यह जोड़ा है इनको राधा-किशन नाम दिया गया है। फिलहाल इनकी लंबाई करीब 18 इंच है और यह बड़ी होने पर 25 से 27 इंच तक रहेगी। यह प्रजाति लुप्त प्राय: होने को थी, इसे तेलंगाना में संरक्षित किया गया है। अलवर में भी इसकी वंश वृद्धि और संरक्षण के प्रयास किए जाएंगे। यह प्रजाति बहुत ही संवेदनशील है और समझदार है, जो सेवा करता है उनको पहचानती है।

पीएम मोदी ने जब मकर संक्रांति के मौके पर इस गाय के साथ अपना एक वीडियो जारी किया तो देशभर के लोगों को इसके बारे में पता चला, तभी से इसकी मांग भी बढ़ गई और महंगी होने के बावजूद गोपालक इसे खरीदना पसंद कर रहे हैं। पुंगनूर नस्ल की गाय के दूध में कई पोषक तत्व और एंटी बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं। इस नस्ल की गायें करीब तीन लीटर तक दूध देती हैं। इनके दूध में काफी कम मात्रा में फैट होता है। इसका जिक्र पुराणों में भी आया है। इसका वजन भी कम होता है और रखरखाव आसान होता है।

गौ पालकों के लिए खुल रहे हैं कमाई के द्वार

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भारत में गाय के गोबर को पारंपरिक रूप से केवल ईंधन (उपले) या खेतों के लिए साधारण खाद के तौर पर ही देखा जाता रहा है. लेकिन अब समय बदल गया है. जो गोबर कल तक सिर्फ ग्रामीण उपयोग की वस्तु था, वह आज एक अहम  वैश्विक और घरेलू उत्पाद बन गया है. दुनिया भर में ऑर्गेनिक उत्पादों की बढ़ती मांग और रासायनिक खादों के दुष्प्रभावों के प्रति बढ़ती जागरुकता के बीच, भारतीय गाय के गोबर की मांग तेजी से बढ़ी है. यह भारत के पशुपालकों और नए उद्यमियों के लिए ‘कचरे से कंचन’ बनाने का एक शानदार अवसर बनकर उभरा है.

भारत की विशाल गोबर संपदा

भारत की इस नई अर्थव्यवस्था का आधार यहां की विशाल पशुधन संख्या है. भारत में लगभग 30 करोड़ मवेशी हैं. एक अनुमान के अनुसार, ये मवेशी मिलकर प्रतिदिन लगभग 30 लाख टन गोबर का उत्पादन करते हैं. लंबे समय तक इस विशाल संसाधन का सही उपयोग नहीं हो पाया और यह केवल ईंधन के उपले बनाने तक सीमित था. लेकिन अब, इस ‘गोबर धन’ को सही मायने में राष्ट्रीय धन में बदला जा रहा है.

क्यों बढ़ रही गोबर खाद की मांग?

आज दुनिया भर में जैविक उत्पादों की मांग बढ़ने का एक बड़ा कारण रासायनिक उर्वरकों के गंभीर दुष्प्रभाव हैं. इन रसायनों ने हमारी खेती और स्वास्थ्य को बहुत नुकसान पहुंचाया है रासायनिक खादों के लगातार उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुंचता है और वह बंजर होने लगती है. यह मिट्टी को अधिक अम्लीय भी बना देते हैं. ये रसायन बारिश के पानी के साथ बहकर नदियों, झीलों और तालाबों में मिल जाते हैं. इससे पानी जहरीला होता है और जलीय जीवन को नुकसान पहुंचता है.

रासायनिक उर्वरकों के अवशेष हमारे भोजन में रह जाते हैं, जिनके सेवन से कैंसर और रक्तचाप जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. ये खादें मिट्टी में रहने वाले केंचुओं और अन्य फायदेमंद सूक्ष्मजीवों को मार देती हैं, जो असल में मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं.

गोबर वेस्ट’ से ‘वेल्थ’ तक

जैसे पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर उसे बेहतर और स्वच्छ बनाया जा रहा है, ठीक उसी तरह अब गोबर को भी साधारण खाद से आगे बढ़कर ‘वैल्यू- उत्पादों में बदला जा रहा है. यही कारण है कि इसकी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग आसमान छू रही है. गोबर अब सिर्फ उपला नहीं है. इसे कई उन्नत रूपों में तैयार किया जा रहा है. यह गोबर से बनने वाली सबसे लोकप्रिय और उच्च गुणवत्ता वाली खाद है. किसान इसे 7 से 8 रुपये प्रति किलो तक बेचकर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं.

गोबर का उपयोग बायो-गैस प्लांट में ऊर्जा बनाने के लिए किया जा रहा है. गैस निकलने के बाद जो स्लरी (तरल खाद) बचती है, वह भी एक बेहतरीन जैविक उर्वरक होती है. गोबर को गौ-मूत्र और अन्य प्राकृतिक चीजों के साथ मिलाकर ‘जीवामृत’ जैसा शक्तिशाली तरल खाद और जैविक कीटनाशक बनाए जा रहे हैं. अब गोबर का उपयोग सिर्फ खाद तक सीमित नहीं है. इससे अगरबत्ती, मच्छर भगाने वाली कॉइल, गमले, कागज, बायो-प्लास्टिक और निर्माण सामग्री भी बनाई जा रही है.

गोबर का बढ़ता ग्लोबल बाजार

घरेलू मांग के साथ-साथ गोबर का वैश्विक बाजार भी तेजी से बढ़ रहा है. भारत दुनिया में गाय के गोबर का शीर्ष निर्यातक है. साल 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने 125 करोड़ रुपये मूल्य के ताजे गोबर और 173.7 करोड़ रुपये मूल्य के गोबर-आधारित उर्वरकों का निर्यात किया. शिपमेंट की संख्या 2025 में भारत से गोबर की 1,328 शिपमेंट भेजी गईं. इस व्यापार में 181 भारतीय निर्यातक शामिल हैं, जो दुनिया भर के 327 खरीदारों को गोबर की आपूर्ति कर रहे हैं.

भारतीय गोबर की मांग दुनिया के कई कोनों में है. भारत के शीर्ष निर्यात गंतव्य मालदीव, संयुक्त राज्य अमेरिका और सिंगापुर हैं. अगर हम गोबर के उपलों (cow dung cake) के खरीदारों की बात करें, तो शीर्ष देश मालदीव, कंबोडिया और वियतनाम हैं. इनके अलावा चीन, नेपाल, ब्राजील, अर्जेंटीना, कुवैत, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देश भी भारतीय गोबर के प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं.

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेलतरा और सुकलकारी क्षेत्र में लगातार हो रही गायों की मौतों पर संज्ञान लिया

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेलतरा और सुकलकारी क्षेत्र में लगातार हो रही गायों की मौतों के मामले पर स्वतः संज्ञान लिया है। न्यायालय ने इसे जनहित याचिका (PIL) के रूप में दर्ज करते हुए राज्य प्रशासन और पशुपालन एवं पशु चिकित्सा सेवा विभाग से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की खंडपीठ ने आदेश में कहा कि समाचारों में वर्णित स्थिति “प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर उदाहरण” है और इसे तत्काल राज्य प्रशासन के संज्ञान में लाना आवश्यक है। न्यायालय ने यह भी कहा कि जब राज्य सरकार गौ संरक्षण की योजनाएं चला रही है, ऐसी परिस्थितियों में गायों की लगातार मौत मानवीय संवेदनाओं पर प्रहार है। अदालत ने पशुपालन एवं पशु चिकित्सा सेवा विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिया कि वे व्यक्तिगत रूप से हलफनामा दाखिल करें, जिसमें गायों की मौत के कारणों, घटनाओं के स्थलों और उठाए गए कदमों का विस्तृत ब्यौरा हो।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल संक्षिप्त रिपोर्ट या मीडिया रिपोर्ट पर ही मामला नहीं छोड़ा जाएगा, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों को स्पष्ट और संपूर्ण विवरण प्रस्तुत करना होगा। अदालत ने आगामी सुनवाई की तारीख 27 अक्टूबर 2025 तय की है। इस दौरान न्यायालय राज्य प्रशासन और संबंधित विभाग से संपूर्ण जानकारी मांगकर यह सुनिश्चित करेगा कि गायों की मौत के पीछे के कारणों की जांच हो और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएँ। यह मामला केवल पशु संरक्षण का नहीं बल्कि सार्वजनिक हित और प्रशासनिक जवाबदेही का भी है। कोर्ट का स्वतः संज्ञान लेना यह संकेत देता है कि राज्य में गौ संरक्षण और पशुपालन संबंधित मामलों में प्रभावी निगरानी की आवश्यकता है। हाईकोर्ट की इस कार्रवाई से राज्य प्रशासन पर भी दबाव बढ़ गया है कि वह गायों की मौत के कारणों की तत्काल और पारदर्शी जांच कराए। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि आवश्यक हुआ, तो सख्त निर्देश और सुधारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं।

गोवंश संरक्षण में गोचर और गौरी का महत्व

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डॉ लीना

हेबीटाट इकोलॉजीकल ट्रस्ट

हम शहरों में बड़ी संख्या में गोवंश को कत्लखानों की ओर जाते देखते हैं, लेकिन यह दुखद सत्य गांवों में भी फैला हुआ है। गांवों से भी बड़ी संख्या में गोवंश या तो कत्लखानों में जा रहा है, या फिर लावारिस भटक रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है, यह समझना अत्यंत आवश्यक है।

गौरी नहीं तो गाय नहीं”

हमारे समाज में प्रकृति, खेती, घर-परिवार, बच्चे और पशुओं को ममत्व से संभालने का कार्य सदियों से महिलाओं द्वारा किया जाता रहा है। दुर्भाग्य से, पुरुषों ने इन कार्यों को अक्सर कम आंका और उन्हें हल्का माना। गांवों में महिलाएं गौपालन का अभिन्न अंग रही हैं। गायों का दैनिक खान-पान, रखरखाव, और अन्य सभी कार्य महिलाओं द्वारा अत्यंत स्नेह और समर्पण से किए जाते थे। हम गाय को केवल पशु नहीं, बल्कि अपने जैसी जीव और परिवार का अभिन्न अंग मानते आए थे।

परंतु, जब समाज ने महिलाओं के इन कार्यों और सेवाओं को कम आंकना शुरू किया और उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया, तो बदलते समय के साथ महिलाओं और लड़कियों को इसकी अनुभूति होने लगी। इस उपेक्षा के कारण उन्होंने धीरे-धीरे कृषि और गौपालन के कार्यों से दूरी बनाना शुरू कर दिया। यह दूरी गौवंश के प्रति उनके ममत्व में कमी नहीं, बल्कि समाज द्वारा उनके श्रम और समर्पण की अनदेखी का परिणाम था।

गोशालाओं की सीमाएं और वास्तविक संरक्षण

देश में हजारों गोशालाएं और पांजरापोलें चल रही हैं, जो गोवंश को बचाने का सराहनीय कार्य कर रही हैं। लेकिन इन संस्थाओं की अपनी सीमाएं हैं; वे केवल अपने आंगन में खड़े गोवंश को ही संभाल सकती हैं। देश में लाखों की संख्या में जो गोवंश सड़कों पर लावारिस भटक रहा है, उसे ये संस्थाएं नहीं बचा सकतीं।

गाय भी नारी के समान है। उसकी देखभाल उसी प्रकार से उसकी गौरी (यानी उसके जैसी नारी) ही कर सकती है, जो गाय की गरिमा और नारीत्व को समझती है। पुरुष कभी भी उस संवेदनशीलता और ममत्व से गाय की देखभाल नहीं कर सकते, जैसा एक नारी करती है। गाय को बचाने के कार्य में जब तक गौरी सम्मिलित नहीं होगी, तब तक हम गाय का वास्तविक संरक्षण नहीं कर सकते। गोशालाओं में बंद गाय केवल एक व्यापारिक पहलू है, जबकि गाय का वास्तविक संरक्षण उसके गोचर (खुले मैदानों) में विचरण में ही है।

कुल मिलाकर, गाय को वास्तविक संरक्षण के लिए गोचर और गौरी दोनों की आवश्यकता है। गोचर गाय को प्राकृतिक वातावरण और पोषण प्रदान करता है, जबकि गौरी उसे ममत्व और स्नेहपूर्ण देखभाल देती है। इन दोनों के बिना गौसंरक्षण अधूरा है।

भारत में गोवंश का दुर्भाग्य – कत्लखाना

भारत में कत्लखानों में जाने वाले गोवंश का सटीक दैनिक और वार्षिक आंकड़ा प्राप्त करना जटिल है, क्योंकि इसमें वैध और अवैध दोनों तरह की कटाई शामिल होती है। हालांकि, विभिन्न रिपोर्टों और अनुमानों के अनुसार:

  • दैनिक आंकड़ा: यह अनुमान लगाना कठिन है, लेकिन माना जाता है कि प्रति दिन हजारों की संख्या में गोवंश का वध किया जाता है, जिसमें अवैध कटाई का बड़ा हिस्सा शामिल है।
  • वार्षिक आंकड़ा: विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, भारत में सालाना लाखों गोवंश का वध किया जाता है। इनमें से एक बड़ा हिस्सा बूढ़े, बीमार, या अनुपयोगी माने जाने वाले पशुओं का होता है, और एक महत्वपूर्ण संख्या अवैध बूचड़खानों में कटाई की जाती है। सरकारी आंकड़ों में केवल वैध कटाई शामिल होती है, जबकि अवैध कटाई का आंकड़ा इससे कहीं अधिक हो सकता है। कुछ अनुमानों के अनुसार, यह संख्या सालाना 20 से 30 लाख तक या उससे भी अधिक हो सकती है, जिसमें भैंस और अन्य पशु भी शामिल हैं।

यह आंकड़ा देश में गोवंश संरक्षण की तत्काल आवश्यकता को दर्शाता है। गोचरों की कमी और महिलाओं की गौपालन से दूरी, ये दोनों ही कारक इस समस्या को गंभीर बना रहे हैं।