घरवापसी और मंदिरों के पुनर्निर्माण को राजकीय दायित्व बतानेवाले शिवाजी का ‘हिंदवी -साम्राज्य’ आज भी राज-काज का आदर्श है

महाराजा विक्रमादित्य हमारे वह पुण्यतीर्थ हैं जिन्होने राजकाज के हर पक्ष की नीतियां बनाकर राष्ट्रजीवन को दिशा दी लेकिन शिवाजी वह गौरवपुंज हैं जिन्होने रामराज को विक्रमादित्य के अनुशासन से बंधकर जीवन में उतारा।विक्रमादित्य दैवत्व प्राप्त पूर्वज हैं जिनके आगे मस्तक स्वतः श्रद्धा से नत हो जाता है तो शिवाजी हमारे अद्यतन इतिहास का वह ऊर्जाकेंद्र है जो शक्ति का संचार कर राष्ट्र के नवनिर्माण में स्वयं को होम कर देने का बल देते हैं। विक्रमादित्य अपने कार्यों से किंवदंती बन चुके हैं और शिवाजी अभी हाल की सदियों में बीता जीवन है जिसकी यादों का पन्ना इतिहास में आज भी कच्चा ही है। विक्रमादित्य राजा के रक्तीय उत्तराधिकारी थे जबकि शिवाजी राजवंशीय होते हुए भी राजपुत्र नहीं थे। उनके पिता शाह जी भोंसले सैन्य टुकड़ी के अधिपति थे और शिवाजी ने पिता को मिली जागीर को साम्राज्य की ऊंचाइयां दी।उनके द्वारा स्थापित हिंदवी- साम्राज्य हमारे जीवन -नक्षत्र का वह तारा है जो हमसे सबसे नजदीक है। शिवाजी की किरणों से तेज़ पाना अधिक व्यावहारिक और प्रेरणादायी है।

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Edited By – Rajesh Jha

कथ्य

शिवाजी का महत्त्व आज भी इसलिए बहुत अधिक है कि उन्होने बलपूर्वक मुसलमान बनाये गए लोगों को समारोहपूर्वक वैदिक रीति से पुनः हिन्दू बनवाया , मुगलों द्वारा तोड़े गए मंदिरों के पुनर्निमाण को राजकीय दायित्व के रूप में करने की परम्परा शुरू की और भाषा-शुद्धि द्वारा देश की संस्कृति की रक्षा में अमूल्य योगदान दिया। शिवाजी ने शासन को जनहितकारी बनाकर उसको ईश्वर की इच्छा की संज्ञा दी।’ दैहिक – दैविक -भौतिक तापा,रामराज कबहूँ नहीं व्यापा’ इसलिए रामराज को विश्व की सर्वोत्तम शासनप्रणाली कहा जाता है।बाल्यावस्था में ही रामायण और महाभारत की शिक्षा से समृद्ध हुए शिवाजी ने अपनी शासनप्रणाली को इसके अनुरूप ही गढ़ा और ‘ प्रजाहितकारी राजा ‘ यानी जाणता-राजा कहलाए।उनके द्वारा स्थापित हिंदवी- साम्राज्य का अनुकरण करके आज कोई भी राष्ट्र समृद्ध और शक्तिशाली बनाया जा सकता है।

मूल कथा

अपनी माता जीजाबाई की गोद में बैठ रामायण और महाभारत का पारायण करते हुए बड़े होनेवाले छत्रपति शिवाजी ,उपलब्ध भारतीय इतिहास साहित्य
के सर्वाधिक लोकप्रिय राजा हैं जिन्होने; रामराज की नीतियों को अपनी शासन -व्यवस्था के मूल में रखकर ‘हिन्दवी साम्राज्य ‘ की नींव रखी और उसका सुसंचालन किया। उन्होंने १६४० में प्रमुख निंबालकर परिवार से साईबाई से शादी की । १६४५ की शुरुआत में किशोरवय के शिवाजी ने एक पत्र में हिंदवी स्वराज्य (भारतीय स्व-शासन) के लिए अपनी अवधारणा व्यक्त की।उन्होने ५०० प्रमुख सैन्य पदों में मात्र २ प्रतिशत ही मुसलमान रखे थे वह भी सिर्फ इसलिए कि मराठी सैनिक उनसे नौसैनिक -प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें। वामपंथियों द्वारा शिवाजी को हिन्दू -मुसलमान एकता का पैरोकार बताया जाना बिलकुल गलत है।वे मुसलमानों को बिलकुल पसंद नहीं करते थे और यह बात उन्होने अपने सौतेले भाई को लिखे पत्र में भी कही है।
” यौवनारम्भघृतं मलेच्छमक्षयदीक्षा शिवाजी ” ( अर्थात यौवन के आरम्भ से ही जिसने मलेच्छों के नाश की दीक्षा ली है वैसे शिवाजी ) का श्रीशिवभारत के अद्याय १७ में उल्लेख है और आदिलशाही के अधिकृत फरमान ” शिवा – ए -मकहूर ” में १६ जून १६६९ को लिखा गया है कि इस्लाम की वृद्धि या विस्तार के लिए शिवाजी का क़त्ल आवश्यक है इसलिए अफजल खान को यह दायित्व दिया गया है।शिवाजी ने अपने सौतेले भाई वयंको जी को नवंबर १६७७ को भेजे पत्र में लिखा है कि” मेरे ऊपर श्री महादेव और श्री तुजे भवानी की विशेष कृपा है और मैं दुष्ट तुर्कों का संहार ही करता हूँ यह जानते हुए भी आपने मेरी सेना पर हमला किया ,आपकी सेना में मुस्लिम और तुर्क भरे पड़े हैं तो फिर आप मुझपर विजय कैसे पा सकते हैं ?” उनके पिता शाहजी भोंसले की सेना में मुसलमानों की संख्या अधिक थी जिसे उन्होने घटाते हुए २ प्रतिशत तक कर दिया तथा उनका कद छोटा बनाये रखा।

औरंगजेब ने सरदार नेतोजी पालकर को जबरन मुसलमान बनाकर उनका नामकरण मोहम्मद कुली खान कर दिया तो शिवाजी ने २४ जुलाई १६७६ को समारोहपूर्वक वैदिक रीति से उनको पुनः हिन्दू बनवाया। इसी तरह मुसकलमान बना दिए गए अपने साले निम्बालकर की भी उन्होने धूमधाम से घर-वापसी कराई थी। इन दोनों घटनाओं का उल्लेख औरंगजेब के द्वारा लिखवाये ‘जेरे शेखावळी ‘ में भी है।

शिवाजी ने नर्वे ( गोवा ) में मुगलों और पुर्तगालियों द्वारा मंदिर को ध्वस्त कर बनवाये गए चर्च को तोड़कर १३ नवंबर १६६८ को सप्तकेटेश्वर मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था। इसका शिलालेख उपलब्ध है। तत्कालीन कर्नाटक ( अब तमिलनाडु का अंश ) में सोणाचलपति मंदिर , श्रीमुषांवृद्धगिरि मंदिर और रूकमसमद्धि का पुनर्निर्माण कर शिवाजी ने वहां पूजा – पाठ फिर से शुरू करवाया।उनकी परम्परा पर चलकर शिवाजी के सरदार मल्हार होल्कर ने काशी के विश्वनाथ मंदिर के उद्धार के लिए ज्ञानवापी मस्जिद को गिराकर वहां मंदिर निर्माण के लिए कैम्प किया था। स्थानीय लोगों ने इससे होनेवाले भयावह नरसंहार की कल्पना कर पेशवा को १८ जून १७५१ को पत्र लिखा की वे मल्हार होल्कर को ऐसा करने से रोकें क्योंकि तब दिल्ली के सुलतान का कहर उनपर बरपेगा।

शिवाजी का जब पहली बार राज्याभिषेक हुआ तो उसमें फारसी शब्दों की भरमार थी।मराठी भाषा की शुद्धता के लिए आपने अमात्य रघुनाथ पंडित को ‘राज्य व्यवहार कोष ‘ की रचना का निर्देश दिया। शिवजी के सौजन्य से मराठी के लुप्त हो चुके १३८० शब्द पुनः चलन में आये।

छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम लेते ही दिमाग में एक ऐसे साहसी पुरुष की छवि बनती है जो युद्ध कौशल में पूरी तरह से पारंगत हो। शिवाजी ने औरंगजेब जैसे शक्तिशाली मुगल सम्राट की विशाल सेना से कई बार टक्कर ली। उनकी विशेषता केवल युद्ध में ही नहीं थी बल्कि वह भारत के एक कुशल प्रशासक और रणनीतिकार के रूप में भी जाने जाते हैं। शिवाजी महान् विजेता होने के साथ-साथ एक कुशल प्रशासक भी थे। मध्यकालीन शासकों की तरह शिवाजी के पास भी शासन के सम्पूर्ण अधिकार सुरक्षित थे। शासन कार्यों में सहायता के लिए शिवाजी ने मंत्रियों की एक परिषद, जिसे ‘अष्टप्रधान’ कहते थे, की रचना की थी, पर इन्हें किसी भी अर्थ में मंत्रिमंडल की संज्ञा नहीं दी जा सकती। उनके मंत्री वास्तव में ‘सचिव’ के रूप में कार्य करते थे। वह प्रत्यक्ष रूप में न तो कोई निर्णय ले सकते थे और न ही नीति-निर्धारित कर सकते थे। उनकी भूमिका मात्र परामर्शकारी होती थी, किन्तु मंत्रियों से परामर्श के लिए शिवाजी बाध्य नहीं थे।

१६३९ में, शिवाजी के पिता शाहजी को बैंगलोर में तैनात किया गया था, जिसे उन नायकों से जीत लिया गया था जिन्होंने विजयनगर साम्राज्य के निधन के बाद नियंत्रण कर लिया था । उन्हें क्षेत्र को पकड़ने और बसने के लिए कहा गया था। शिवाजी को बैंगलोर ले जाया गया जहां उन्हें, उनके बड़े भाई संभाजी और उनके सौतेले भाई एकोजी प्रथम के साथ औपचारिक रूप से प्रशिक्षित किया गया। १६४५ में, १५ वर्षीय शिवाजी ने तोरणा किले के बीजापुरी सेनापति इनायत खान को किले का कब्जा सौंपने के लिए रिश्वत दी या राजी किया। चाकन किले पर कब्जा करने वाले मराठा फिरंगोजी नरसला ने शिवाजी के प्रति अपनी वफादारी का दावा किया और बीजापुरी के राज्यपाल को रिश्वत देकर कोंडाना का किला हासिल कर लिया गया। २५ जुलाई १६४८ को, शिवाजी को नियंत्रित करने के लिए, बीजापुरी शासक मोहम्मद आदिलशाह के आदेश के तहत शिवाजी के पिता शाहजी को बाजी घोरपड़े ने कैद कर लिया था ।

आदिलशाह,शिवाजी की सेना द्वारा किये गए नुकसान से अप्रसन्न थे, जिसे उनके जागीरदार शाहजी ने अस्वीकार कर दिया था। मुगलों के साथ अपने संघर्ष को समाप्त करने और जवाब देने की अधिक क्षमता रखने के बाद, १६५७ में आदिलशाह ने शिवाजी को गिरफ्तार करने के लिए एक अनुभवी जनरल अफजल खान को भेजा।’तारिख -ए -आदिलशाही ‘ में १६ जून १६६९ को लिखा है कि इस्लाम के विस्तार के लिए काफिर शिवाजी का क़त्ल बहुत जरूरी है।इसलिए यह काम अफजल खान को सौंपा जाता है। बीजापुरी सेना द्वारा पीछा किए जाने पर, शिवाजी प्रतापगढ़ किले में पीछे हट गए , जहां उनके कई सहयोगियों ने उन पर आत्मसमर्पण करने के लिए दबाव डाला। शिवाजी की घेराबंदी को तोड़ने में असमर्थ होने के साथ, दोनों सेनाओं ने खुद को एक गतिरोध में पाया, जबकि अफजल खान, एक शक्तिशाली घुड़सवार सेना के बाद भी किले पर अधिकार जमाने में असमर्थ था। दो महीने के बाद, अफजल खान ने शिवाजी के पास एक दूत भेजा, जिसमें दोनों नेताओं को किले के बाहर अकेले मिलने का सुझाव दिया गया।

१० नवंबर १६५९को प्रतापगढ़ किले की तलहटी में एक झोपड़ी में शिवाजी और अफजल खान मिले। तय हुआ था कि दोनों निहत्थे मिलेंगे और सहायता के लिए उनके साथ एक – एक अनुयायी ही होंगे । शिवाजी को संदेह था या तो अफजल खान उनको गिरफ्तार कर लेंगे या उस पर हमला करेंगे,इसलिए उन्होंने अपने कपड़ों के नीचे कवच पहना था, अपने बाएं हाथ पर एक बाघ नख (धातु “बाघ का पंजा”) छुपाया था, और उसके दाहिने हाथ में खंजर थी। अफजल ने शिवाजी को मारने की कोशिश की। अफजल खान के खंजर को शिवाजी के कवच ने रोक दिया, और शिवाजी के बाघनख ने अफजल की आंतें फाड़ दी। शिवाजी ने तब बीजापुरी सेना पर हमला करने के लिए अपने छिपे हुए सैनिकों को संकेत देने के लिए एक तोप चलाई। प्रतापगढ़ की लड़ाई 10 नवंबर 1659 को हुई जिसमें शिवाजी की सेना ने निर्णायक रूप से बीजापुर सल्तनत को पराजित कर दिया। बीजापुर सेना के ३,००० से अधिक सैनिक मारे गए और उच्च पद के एक सरदार, अफजल खान के दो पुत्रों और दो मराठा प्रमुखों को बंदी बना लिया गया।

इतिहासकार पी सी सरकार के अनुसार, १६४९ में शाहजी को रिहा कर दिया गया था जब जिंजी पर कब्जा करने के बाद कर्नाटक में आदिलशाह की स्थिति सुरक्षित हो गई थी। इन घटनाओं के दौरान, १६४९-१६५५ तक शिवाजी अपनी विजय में रुके और चुपचाप अपने लाभ को समेकित किया।अपनी रिहाई के बाद, शाहजी सार्वजनिक जीवन से सेवानिवृत्त हो गए।अपने पिता की रिहाई के बाद, शिवाजी ने फिर से छापा मारा, और १६५६ में, विवादास्पद परिस्थितियों में, बीजापुर के एक साथी मराठा सामंत चंद्रराव मोरे को मार डाला, और वर्तमान महाबलेश्वर के पास जावली की घाटी को जब्त कर लिया। इसी समयखण्ड में शिवाजी ने सावंत की सावंतवाडी , की घोरपडे मुधोल , निंबालकर की फलटन , शिर्के, माने और मोहिते आदि शक्तिशाली परिवारों को वश में करने के लिए विभिन्न रणनीतियाँ अपनाईं जैसे कि उनकी बेटियों से विवाह करना, देशमुखों को दरकिनार करने के लिए सीधे गाँव पाटिल से निपटना, या उनसे लड़ना आदि।

शिवाजी के शासन प्रबंध में उनकी मौलिक प्रतिभा दिखती है। वह एक विजेता एवं सैनिक प्रतिभा संपन्न ही नहीं थे बल्कि वह कुशल संगठनकर्ता तथा प्रशासक भी थे।उनके प्रशासन का क्रमिक विकास अनुभव के आधार पर हुआ था। शासन में नियुक्तियां योग्यता के आधार पर होती थी। पद वंशानुगत नहीं थे एवं जागीर प्रथा नहीं थी। कर्मचारियों को नगद वेतन दिया जाता था। राजस्व क्षेत्र में रैयतवाड़ी प्रणाली लागू की गई थी। करों का भार कम था। प्रशासन की इकाई दुर्ग थे जिनका जाल बिछा हुआ था। केवल धार्मिक उद्देश्य को छोड़कर भूमि का अनुदान नहीं दिया जाता था।

प्रशासनिक इकाइयां –

शिवाजी के राज्य को स्वराज कहा जाता था। यह महाराष्ट्र में ही सीमित था। जिन मुगल क्षेत्रों पर मराठों का वास्तविक आधिपत्य था, उन्हें मुगलाई कहा जाता था। स्वराज के नीचे संभाग था। संभाग प्रांतों (जिलों) में विभाजित थे। प्रांत का अधिकारी सूबा कहलाता था। प्रान्त महालों में बँटे हुए थे।महाल में कई ग्राम होते थे।

दुर्ग –

प्रशासनिक व्यवस्था का मुख्य आधार दुर्ग थे। राज्य की सुरक्षा दुर्गों पर ही निर्भर करती थी। उनके राज्य में लगभग 280 दुर्ग थे। किलो में रसद सामग्री तथा सैनिकों के बारे में कठोर नियम थे।

शाह जी ने जब अपनी पहली पत्नी जीजाबाई को पुणे भेजा था तो उनको आदिलशाह द्वारा दो बार जलाकर रख बना दी गयी पुना की जमींदारी देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली थी।पुणे की जमीन पर गधे से हल चलवाकर आदिलशाह ने उसके बंजर हो जाने की मुनादी कर दी थी जिसको बारहवर्षीय शिवाजी द्वारा स्वर्ण के हल से जोतवाकर माता जीजाबाई ने हरितक्षेत्र बनाने की घोषणा कर दी थी। जो टोटका आदिल शाह ने आजमाया उसी के पीड़ित ने आदिलशाही की ताबूत में कील ठोंककर जब कहा कि यह श्री यानी ईश्वर की इच्छा से बना हिंदवी राज है तो जनता को अपना राजा मिला। जिस धरती पर अनाज का एक दाना नहीं उगता था उसको शिवाजी ने हरितक्षेत्र बना दिया। मानव संसाधन का प्रयोग इतना कुशल कि जो सैनिक थे वे ही किसानी भी करते थे। जो किसान थे वे सेना में शामिल रहते थे। ‘ जय जवान , जय किसान’ के नारे का जन्म संभवतः यहीं से हुआ और ‘राजतंत्रीय- लोकतंत्र’ की राजनीती का जन्म भी शिवाजी के शासन पद्धति से हुआ।

शिवाजी के शासन में (क) जनता का सम्मान (ख ) प्रतिभा को प्राथमिकता (ग) संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण (घ) मानव संसाधनों का सृजन तथा विकास (च) योजनाबद्ध कार्य (छ) लक्ष्य भेदने की तीव्रता (ज ) प्रशासन में अनुशासन (झ) धर्मानुकूल आचरण (ट) संसाधनों का अधिकतम उपयोग (ठ) सबको उन्नति का अवसर (ड) न्याय और उसका कठोरता से अनुपालन (ढ) सबका सम्मान ,सबको न्याय (ण) शत्रुशमन (त) ईश्वरीय कार्य मान न्यासी भाव से राजकाज करना जैसे तत्व थे जिनको अपनाकर आज भी विश्व का कोई भी देश समृद्ध -सुदृढ़ -और शक्तिशाली राष्ट्र बन सकता है।

शिवाजी महान् विजेता होने के साथ-साथ एक कुशल प्रशासक भी थे।शासन कार्यों में सहायता के लिए शिवाजी ने ‘अष्टप्रधान’ नामक प्रशासकीय सहयोगियों का समूह गठित किया था जिसके सदस्य शिवाजी के ‘सचिव’ के रूप में कार्य करते थे। वह प्रत्यक्ष रूप में न तो कोई निर्णय ले सकते थे और न ही नीति निर्धारित कर सकते थे। उनकी भूमिका मात्र परामर्शदाता की होती थी, किन्तु मंत्रियों से परामर्श के लिए शिवाजी बाध्य नहीं थे। ‘अष्टप्रधान’ में पेशवा का पद सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होता था। पेशवा राजा का विश्वसीय होता था।

शिवाजी के अष्टप्रधान का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

(क ) पेशवा – यह राज्य के प्रशासन एवं अर्थव्यवस्था की रेख-देख करता था तथा राजा की अनुपस्थिति में राज्य की बागडोर संभालता था। उसका वेतन १५००० हूण प्रतिवर्ष था।

(ख ) सर-ए-नौबत (सेनापति) – इसका मुख्य कार्य सेना में सैनिकों की भर्ती करना, संगठन एवं अनुशासन और साथ ही युद्ध क्षेत्र में सैनिकों की तैनाती आदि करना था।

(ग) मअमुआदार या अमात्य – अमात्य राज्य के आय-व्यय का लेखा जोखा तैयार करके उस पर हस्ताक्षर करता था। उसका वेतन १२००० हूण प्रतिवर्ष था।

(घ )वाकयानवीस – यह सूचना, गुप्तचर एवं संधि विग्रह के विभागों का अध्यक्ष होता था और घरेलू मामलों की भी देख-रेख करता था।

(च)शुरुनवीस या चिटनिस – राजकीय पत्रों को पढ़ कर उनकी भाषा-शैली को देखना, परगनों के हिसाब-किताब की जाँच करना आदि इसके प्रमुख कार्य थे।

(छ ) दबीर या सुमन्त (विदेश मंत्री) – इसका मुख्य कार्य विदेशों से आये राजदूतों का स्वागत करना एवं विदेशों से सम्बन्धित सन्धि विग्रह की कार्यवाहियों में राजा से सलाह और मशविरा आदि प्राप्त करना था।

(ज) सदर या पंडितराव – इसका मुख्य कार्य धार्मिक कार्यों के लिए तिथि को निर्धारित करना, ग़लत काम करने एवं धर्म को भ्रष्ट करने वालों के लिए दण्ड की व्यस्था करना, ब्राह्मणों में दान को बंटवाना एवं प्रजा के आचरण को सुधारना आदि था। इसे ‘दानाध्यक्ष’ भी कहा जाता था।

(झ) न्यायधीश – सैनिक व असैनिक तथा सभी प्रकार के मुकदमों को सुनने एवं निर्णय करने का अधिकार इसके पास होता था।

उपर्युक्त अधिकारियों में अन्तिम दो अधिकारी- ‘पण्डितराव’ एवं ‘न्यायधीश’ के अतिरिक्त अष्टप्रधान के सभी पदाधिकारियों को समय-समय पर सैनिक कार्यवाहियों में हिस्सा लेना होता था। सेनापति के अतिरिक्त सभी प्रधान ब्राह्मण थे। इन आठ प्रधानों के अतिरिक्त राज्य के पत्र-व्यवहार की देखभाल करने वाले ‘चिटनिस’ और ‘मुंशी’ भी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति थे। शिवाजी के समय बालाजी आवजी चिटनिस के रूप में और नीलोजी मुंशी के रूप में बहुत सम्मानित थे। प्रत्येक प्रधान की सहायता के लिए अनेक छोटे अधिकारियों के अतिरिक्त ‘दावन’, ‘मजमुआदार’, ‘फडनिस’, ‘सुबनिस’, ‘चिटनिस’, ‘जमादार’ और ‘पोटनिस’ नामक आठ प्रमुख अधिकारी भी होते थे।

छत्रपति शिवाजी ने किसी भी मंत्री के पद को आनुवंशिक नहीं होने दिया। ‘अष्टप्रधान’ में पेशवा का पद सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सम्मान का होता था। पेशवा राजा का विश्वसीय होता था। संभवतः अपनी अनुभव शून्यता के कारण शिवाजी पौरोहित्य एवं लेखा विभाग में हस्तक्षेप नहीं करते थे। शिवाजी ने रघुनाथ पण्डित हनुमन्ते के निरीक्षण में चुने हुये विशेषज्ञों द्वारा ‘राजव्यवहार कोष’ नामक शासकीय शब्दावली का शब्दकोष तैयार कराया था। संभवतः अपनी अनुभव शून्यता के कारण शिवाजी पौरोहित्य एवं लेखा विभाग में हस्तक्षेप नहीं करते थे। शिवाजी ने रघुनाथ पण्डित हनुमन्ते के निरीक्षण में चुने हुये विशेषज्ञों द्वारा ‘राजव्यवहार कोष’ नामक शासकीय शब्दावली का शब्दकोष तैयार कराया था।

सैनिक प्रशासन –

शिवाजी सैनिकों की नियुक्ति स्वयं करते थे। सैनिकों को योग्यता के अनुसार वेतन दिया जाता था। सेना के दो भाग थे-सवार तथा पैदल। सवार सेना के दो भाग थे- प्रथम, पागा या बारगीर अश्वारोही सैनिक जिन्हें घोड़े राज्य की ओर से दिए जाते थे। द्वितीय, सिलहदार सवार जो अपने घोड़े तथा अस्त्र-शस्त्र स्वयं लाते थे। पैदल सैनिकों को पाइक कहते थे। शिवाजी के अंगरक्षकों की टुकड़ी पृथक थी। पैदल कारभारी सैनिक तथा सिलहदार कृषि कार्य करते थे। कृषि कार्य समाप्त होने पर वह मुल्कगीरी के लिए सेना में सम्मिलित हो जाते थे।

राजस्व नीति –
राज्य के अधिकारियों को नगद वेतन दिया जाता था। किसानों से भूराजस्व राजा सीधे लेता था। उत्पत्ति के आधार पर लगान निश्चित किया गया था, जो उत्पादन का 2/5 होता था।प्राकृतिक आपदा के समय किसानों को तकावी दी जाती थी। कृषक नगद या अनाज में लगान दे सकता था।
राज्य को चौथ और सरदेशमुखी से भी आए होती थी। मुगल क्षेत्रों से शिवाजी राजस्व का 1/4 भाग की मांग करते थे, इसे चौथ कहा जाता था। यह सैनिकों के व्यय के लिए थी। सरदेशमुखी भी चौथ के साथ वसूल की जाती थी। यह राजस्व का एक 1/10 भाग था। शिवाजी स्वयं को सरदेशमुख मानते थे। चौथ तथा सरदेशमुखी के बदले मराठे उस क्षेत्र को सुरक्षा प्रदान करते थे।

समुद्री किले और नौसेना –
शिवाजी ने समुद्री किलों का निर्माण कराया था। इनकी रक्षा तथा तटों की पहरेदारी के लिए उन्होंने नौसेना का भी गठन किया था। उनके बेड़े में 700 जहाज थे, जो दो भागों में विभाजित थे। एक का अधिकारी दरिया सारंग था, दूसरे का अधिकारी मायनायक कहा जाता था।

धार्मिक सहिष्णुता –

शिवाजी हिंदू धर्म के रक्षक तथा उद्धारक थे लेकिन उनके प्रशासन का आधार धार्मिक सहिष्णुता थी। उन्होंने मुसलमानों को भी सेना व प्रशासन में स्थान दिया था।

राज्य का स्वरूप –

मराठा राज्य राजतंत्र था। इसे निरंकुश या स्वेच्छाचारी नहीं कहा जा सकता। राज्य को निरंतर युद्ध की स्थिति में रहना पड़ता था। इसलिए शिवाजी के नियम स्पष्ट और कठोर थे, जिससे अधिकारियों में स्वावलंबन की भावना उत्पन्न हो।

शिवाजी का भू-राजस्व प्रयोग

शिवाजी ने भू-राजस्व एवं प्रशासन के क्षेत्र में अनेक कदम उठाए. राजस्व व्यवस्था के मामले में अन्य शासकों की तुलना में शिवाजी ने एक आदर्श व्यवस्था बनाई। शिवाजी ने राजस्व व्यवस्था को लेकर एक सही मानक इकाई बनाया था जिसके अनुसार रस्सी के माप के स्थान पर काठी और मानक छड़ी का प्रयोग आरंभ करवाया। यह व्यवस्था काफी सुगम थी जबकि बीजापुर के सुल्तान, मुगल और यहां तक कि स्वयं मराठा सरदार भी अतिरिक्त उत्पादन को एक साथ ही लेते थे जो इजारेदारी या राजस्व कृषि की कुख्यात प्रथा जैसी ही व्यवस्था थी।

किसानों के लिए अनुदान

शिवाजी ने अपने प्रशासनिक सुधार में भूरास्व विभाग से बिचौलियों का अस्तित्व समाप्त कर दिया था। कृषकों को नियमित रूप से बीज और पशु खरीदने के लिए ऋण दिया जाता था जिसे दो या चार वार्षिक किश्तों में वसूल किया जाता था।अकाल या फसल खराब होने की आपात स्थिति में उदारतापूर्वक अनुदान एवं सहायता प्रदान की जाती थी। नए क्षेत्र बसाने को प्रोत्साहन देने के लिए किसानों को लगानमुक्त भूमि प्रदान की जाती थी।

जमींदारी प्रथा

शिवाजी महाराज के समय जमींदारी प्रथा अपने चरम पर थी. इस प्रथा ने भारत के किसान को गरीबी की ओर ढकेल दिया। लेकिन यह कह पाना कि शिवाजी ने जमींदारी प्रथा को समाप्त कर दिया था थोड़ा मुश्किल है। फिर भी उनके द्वारा भूमि एवं उपज के सर्वेक्षण और भूस्वामी बिचौलियों की स्वतंत्र गतिविधियों पर नियंत्रण लगाए जाने से ऐसी संभावना के संकेत मिलते हैं कि उन्होंने जमीदारी प्रथा को समाप्त करने के लिए कुछ काम किए थे।

सरदेशमुखी और चौथ

वैसे शिवाजी के शासन काल में भू-राजस्व के अलावा राज्य की आय के दो और स्रोत थे सरदेशमुखी और चौथ. यह एक तरह का सैनिक कर था जिसे अनाज के रूप में वसूला जाता था। सरदेशमुखी लोगों के हितों की रक्षा करने के बदले वसूला जाता था जबकि चौथ बाह्य शक्ति के आक्रमण से सुरक्षा प्रदान करने के बदले लिया जाने वाला कर था।

शिवाजी की प्रशासनिक व्यवस्था काफी सीमा तक दक्षिणी राज्यों की व्यवस्था पर आधारित थी साथ ही मुगलों की प्रशासनिक व्यवस्था की भी उस पर कुछ छाप थी। शिवाजी अपनी मां जीजाबाई के प्रति समर्पित थे , जो बहुत धार्मिक थीं। हिंदू महाकाव्यों, रामायण और महाभारत के उनके अध्ययन ने भी हिंदू मूल्यों की उनकी आजीवन रक्षा को प्रभावित किया। वे धार्मिक शिक्षाओं में गहरी रुचि रखते थे, और नियमित रूप से हिंदू संतों की संगति चाहते थे। इस बीच शाहजी ने मोहित परिवार की दूसरी पत्नी तुका बाई से शादी कर ली थी । मुगलों के साथ शांति स्थापित करने के बाद, उन्हें छह किलों का हवाला देते हुए, वह बीजापुर की सल्तनत की सेवा करने गए। वह शिवाजी और जीजाबाई को शिवनेरी से पुणे ले गए और उन्हें अपने जागीर प्रशासक दादोजी कोंडदेव की देखरेख में छोड़ दिया, जिन्हें युवा शिवाजी की शिक्षा और प्रशिक्षण की देखरेख का श्रेय दिया जाता है।

अपने जीवन के दौरान, शिवाजी मुगल साम्राज्य , गोलकुंडा की सल्तनत और बीजापुर की सल्तनत के साथ-साथ यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों के साथ गठबंधन और शत्रुता दोनों में लगे रहे । शिवाजी के सैन्य बलों ने मराठा प्रभाव क्षेत्र का विस्तार किया, किलों पर अधिकार किया तथा ६ निर्माण कराया। उन्होने एक मराठा नौसेना का गठन किया । शिवाजी ने सुव्यवस्थित प्रशासनिक संगठनों के साथ एक सक्षम और प्रगतिशील नागरिक शासन की स्थापना की। उन्होंने प्राचीन हिंदू राजनीतिक परंपराओं और अदालती सम्मेलनों को पुनर्जीवित किया और मराठी भाषा के उपयोग को बढ़ावा दिया ।

भारतीय राजव्यवस्था में मिट्टी के बाँधों व तालाबों के निर्माण का विशेष महत्त्व है। पेयजल के लिये कुएँ बावड़ी और कृषि आधारित सभी कार्यों के लिये बड़े जलाशयों का निर्माण हर सुशासन में होता है। उस दौर में सैनिक भी शान्ति के समय खेती करते थे। उन दिनों किसानों से कुल उपज का ३३ फीसदी कर के रूप में लिया जाता था। बंजर भूमि पर यह दर कम थी। लेकिन कई ऐसे प्रसंग भी सामने आते हैं, जब अकाल या फसलें खराब होने पर उदारता से किसानों को अनुदान और सहायता दी जाती रही। इसके साथ ही खेती को नए क्षेत्रों में बढ़ाने के लिये किसानों को लगान मुक्त जमीनें भी बाँटी गई।केंद्रीय पर्यावरण राज्य मंत्री अनिल माधव दवे की पुस्तक ' शिवाजी एन्ड सुराज 'बताती है कि साढ़े तीन सौ साल पहले शिवाजी के राजकाज में उन्होंने पानी और पर्यावरण को बहुत महत्त्व दिया था। इस किताब में शिवाजी के कार्यकाल के दौरान किये गए पानी और पर्यावरण के साथ उन दिनों खेती की स्थिति और शिवाजी के शासन काल में हुए खेती के सुधारों पर भी विस्तार से बात की गई है।

    उनका राज्य छोटे से भू-भाग खासतौर से महाराष्ट्र तक उत्तर में सूरत से पूना, दक्षिण पश्चिम में समुद्र तटीय प्रदेश दक्षिण पूर्व में सतारा, कोल्हापुर, बेलगाँव और थारवार तक तथा दक्षिण में जिंजी और उसके आसपास कायम था। १६३० से १६८० के कुल ५० वर्षों के अपने जीवन में शिवाजी १६७० -८० यानी दस वर्ष तक ही अपने राज्य पर शासन कर सके। १६७४ में रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक किया गया। लेकिन इस छोटे से समय में भी सुशासन और जन केन्द्रित शासन के कारण वे आज तक पहचाने जाते हैं। उन्होंने बरसाती पानी को रोकने और उसको सहेजने के लिये मिट्टी के बाँध और बड़े तालाब बनवाए और पेड़ काटने पर सख्त पाबन्दी लगाई। उनके शासन में ही पहली बार १६७० में अन्नाजी दत्तो ने व्यापक स्तर पर भू-सर्वेक्षण करवाकर उपज के अनुरूप भूकंडों को चार श्रेणियों में बांटकर कराधान के चार वर्ग निर्धारित किये गए जो किसानों के लिए अधिक सुविधाकारी थे । शिवाजी के शासन से पहले अकबर ने टोडरमल द्वारा भूमि सर्वेक्षण कराया था तो कुतुबशाह ने नीलांबर के द्वारा भू सर्वेक्षण कराया था ,लेकिन उन्होने कराधान की ऐसी व्यवस्था नहीं कराई थी जो शिवाजी ने सुस्पष्ट रूप में कराई।

शिवाजी से पूर्व के राजाओं ने भूमि का दान बिना किसी सोच के ही किया और जमींदारी -जागीरदारी प्रथा शुरू कर उसके द्वारा अपने ही शासितों में प्रतियोगिता पैदा की थी। शिवाजी ने स्वराज में जागीरी प्रथा को खत्म कर दिया या कम कर दिया था। वह धार्मिक व सामाजिक कार्य को छोड़कर अन्य किसी भी उद्देश्य से राज्य की भूमि को बाँटना उचित नहीं समझते थे। उनकी मान्यता थी कि भूमि तो राज्यलक्ष्मी है, उसका विभाजन कैसे हो सकता है। शिवाजी अपने राज्य में विभिन्न प्रकार की पैदावार का आग्रह करते थे।

शिवाजी ने ‘अष्ट प्रधान’ की व्यवस्था में किसानों पर ध्यान देने के लिये अलग से व्यवस्था की। ‘ शिवाजी एन्ड सुराज’ के पृष्ठ ६१ पर उल्लेख मिलता है कि शिवाजी के समय में कृषि की स्थिति पूरी तरह से बारिश आधारित थी। इसलिये हमेशा अतिवृष्टि और अल्पवर्षा का डर बना रहता था। भारत जैसे कृषि प्रधान देश का राजा कृषि के महत्त्व को समझें और उसके लिये योग्य दिशा में प्रयत्न करें यह अनिवार्य है। इतिहास मंडल के सचिव श्री पांडुरंग बलकवडे बताते हैं कि शिवाजी ने कृषि भूमि प्रबन्धन जल संग्रह और उसके विविध पक्षों पर गहन विचार कर व्यवस्थाएँ खड़ी की थी। बारिश का पानी रोका जाये, उसका उपयोग साल भर तक पशुपालन और खेती के विभिन्न कार्यों के लिये किया जाये इसका उनका सदैव आग्रह रहता था। महाराष्ट्र के पुणे शहर में स्थित पर्वती के नीचे अम्बील ओढा नामक झरने पर शिवाजी ने स्वयं बाँध बनवाया था, जिसे आज भी देखा जा सकता है। इसी प्रकार उन्होंने पुणे के पास कोंडवा में भी बाँध बनवाया था।भारतीय राजव्यवस्था में मिट्टी के बाँधों व तालाबों के निर्माण का विशेष महत्त्व है। पेयजल के लिये कुएँ बावड़ी और कृषि आधारित सभी कार्यों के लिये बड़े जलाशयों का निर्माण हर सुशासन में होता है। उस दौर में सैनिक भी शान्ति के समय खेती करते थे।

    उन दिनों किसानों से कुल उपज का ६६ प्रतिशत तक कर के रूप में लिया जाता था, शिवाजी ने उसको घटाकर ३३ प्रतिशत कर दिया। बंजर भूमि पर यह दर कम थी।इसका परिणाम हुआ कि लोगों ने अधिक भूमि पर खेती शुरू कर दी जिससे दानों को मुंहताज शिवाजी द्वारा स्थापित ‘स्वराज'(जो आगे चलकर हिंदवी-राज कहलाया ) अगले पांच वर्षों में अनाज का निर्यातक भी बन गया और सरकारी खजाने का राजस्व भी ३०० प्रतिशत तक बढ़ गया। जिसके पास कभी पेशेवर सैनिकों को पैसे नहीं थे उस राजा की मृत्यु बाद कोषागार को खंगाला गया तो नौ करोड़ स्वर्ण मुद्राएं थीं – यह शिवाजी के इस दूरदर्शी कार्य का ही परिणाम था। कई ऐसे प्रसंग भी सामने आते हैं, जब अकाल या फसलें खराब होने पर उदारता से किसानों को अनुदान और सहायता दी जाती रही। इसके साथ ही खेती को नए क्षेत्रों में बढ़ाने के लिये किसानों को लगान मुक्त जमीनें भी बाँटी गई।किसानों को बीज, पानी और मवेशियों की जरूरत के लिये आसान ऋण भी मुहैया कराया जाता था। बड़ी बात यह है कि उन्होंने किसानों को जमींदारी और जागीरदारी के आतंक से मुक्त कराने के लिये रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू की। दक्षिण और मुगलकालीन व्यवस्था की भी अच्छी बातों को उन्होंने अंगीकार किया।

प्रख्यात इतिहासकार डॉ मिलिंद दत्तात्रेय पराड़कर बताते हैं कि शिवाजी की पर्यावरण दृष्टि बहुत समृद्ध थी। शिवाजी ने शासकीय आज्ञा पत्र जारी कर प्रजा में यह आदेश पहुँचाया था कि जहाँ तक सम्भव हो सके, सूखे और मृत हो चुके पेड़ों के ही प्रयोग से विभिन्न कार्य पूरे किये जाएँ। नौसेना के लिये जहाज निर्माण हेतु ठोस व अच्छी लकड़ी की आवश्यकता होती है।स्वराज्य के जंगलों में सागौन के जो वृक्ष हैं, उनमें से जो अनुकूल हों, अनुमति के साथ काटे जाएँ। ज्यादा आवश्यकता होने पर अन्य राज्य या देशों से अच्छी लकड़ी खरीद कर लाई जाये।


उनका स्पष्ट निर्देश था कि स्वराज के जंगलों में आम व कटहल के पेड़ हैं, जो जलपोत निर्माण में काम आ सकते हैं; परन्तु उन्हें हाथ न लगाया जाये, क्योंकि यह ऐसे पेड़ नहीं है, जो साल-दो-साल में बड़े हो जाएँ। जनता ने उन पेड़ों को लगाकर अब तक अपने बच्चों की तरह पाल-पोस कर बड़ा किया है। ऐसे पेड़ काटने से उनके पालकों को कष्ट पहुँचेगा।किसी को दुखी कर दिया जाने वाला कार्य और उसे करने वाले थोड़े ही समय में समाप्त हो जाते हैं तथा प्रदेश के मुखिया को प्रजा पीड़ा की हाय झेलनी पड़ती है। वृक्षों को काटने से हानि भी होती है। इसलिये आम व कटहल जैसे फलदार वृक्ष कभी न काटे जाएँ। कोई एकाध पेड़ जो जीर्ण-शीर्ण या वृद्ध हो गया हो उसे उसके मालिक की आज्ञा से ही काटा जाये। साथ ही उसके मालिक को क्षतिपूर्ति की राशि भी दी जाये। जोर-जबरदस्ती बगैर अनुमति के कोई पेड़ न काटा जाये।

कृषि का उत्पादन बढ़ाने और शासन पर भार कम करने के लिये शिवाजी ने अपने सैनिकों को वर्षाकाल के समय कृषि कार्य में लगाने का प्रावधान किया। शान्ति के समय यह किसान किले के नीचे अथवा अपने-अपने गाँव में कृषि भूमि पर खेती करने जाते थे।वर्षा समाप्ति पर विजयादशमी के दिन सैनिक गाँव की सीमा का लंघन कर फिर से एकजुट होते और अगले सात-आठ महीने के लिये मुहिम पर चले जाते हैं। श्रम का कृषि में विनियोग और कृषि कार्य पूर्ण होने पर उसका रक्षा व्यवस्था में उपयोग का यह तरीका अपने आप में राष्ट्रीय श्रम प्रबन्धन का अनूठा उदाहरण था, क्योंकि भारतीय कृषि पूरी तरह वर्षा पर आधारित थी।

कीट पतंगों और अन्य प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित होता था तो ऐसे अवसर पर राज्य की ओर से लगान वसूली में छूट दी जाती थी। यहाँ भी शिवाजी ने एक अभिनव व्यवस्था खड़ी की। उनके राज्य में किसानों को विभिन्न कारणों से हुए नुकसान की भरपाई नगद नहीं दी जाती थी, आक्रमणकर्ताओं के कारण हल बक्खर व बैलगाड़ी जैसे कृषि योजनाओं की टूट-फूट होने पर उधार के बदले औजार ही उपलब्ध कराए जाते थे। और इन सब का उद्देश्य होता था किसान की कृषि क्षमता को बनाए रखना।

स्वराज के शासक मानते थे कि नगद उपलब्ध कराई गई राशि का उपयोग व्यक्ति के द्वारा अन्य कामों में भी किया जा सकता है लेकिन सामग्री तो उपयोग के लिये ही होती है। इससे दोहरा नुकसान होता है, एक राज्य का खर्च होता है और दूसरा किसान कृषि पैदावार को यथावत रखने के या बढ़ाने में सक्षम नहीं हो पाता, अतः शासन को सहायता देने के साथ कृषि उत्पादन क्षमता बनाए रखने पर भी समान मात्रा में सोचना चाहिए। एक जैसी खेती फसल चक्र में असन्तुलन पैदा करती है। इस वैज्ञानिक दृष्टि को वे सूक्ष्मता से जानते थे। स्वस्थ भूमि – स्वस्थ उत्पादन व स्वस्थ पर्यावरण के लिये पैदावार में विविधता का आग्रह उनके समकालीन किसी अन्य शासन की राज्य कृषि व्यवस्था में देखने को नहीं मिलता। शिवाजी ने विशेष आदेश निकालकर फलदार वृक्षों को लगाने का आग्रह किया साथ ही यह सूचना भेजी कि फलों की बिक्री से पहले उसके ३० % फल राजकोष का भाग रहेंगे।

शिवाजी एन्ड सुराज’ किताब की प्रस्तावना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुशासन को लेकर काफी महत्त्व के मुद्दे उठाए हैं। वे लिखते हैं– ‘प्रजा केन्द्रित विकास ही सुशासन का मूल तत्व है इतिहास गवाह है कि जब-जब जन सामान्य को विकास का केन्द्र और साझीदार बनाया गया तब-तब उस राज्य ने सफलता और समृद्धि की ऊँचाइयों को छुआ है। प्रजा की भागीदारी के बिना किसी भी राज्य में प्रगति नहीं हो सकती हमारे सभी महानायकों ने इस तथ्य को अच्छी तरह से जाना और समझा। सदियों पहले ऐसे ही महानायक थे छत्रपति शिवाजी महाराज वह एक कुशल प्रशासक, सफल शासक थे। उन्होंने सुशासन के आधार पर समाज की स्थापना कर इस देश के इतिहास पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।’ इस तरह यह किताब शिवाजी के स्वराज सुशासन के बहाने इस विषय को मजबूती से उठाती है कि एक शासक को अपने तई समाज के हित में किस तरह पानी और पर्यावरण जैसे समाज के बड़े वर्ग से वास्ता रखने वाले बिन्दुओं पर समग्र और दूरंदेशी विचार रखते हुए काम करने की महती जरूरत है।

अर्थव्यवस्था (राजस्व)
छत्रपति शिवाजी ने आय स्त्रोत को मजबूत बनाने के लिए भूमि- प्रबंध पर बड़ा बल दिया था। अर्थ व्यवस्था के सुधार हेतु उन्होंने निम्न कार्य किए

(१) जमींदारी प्रथा की समाप्ति – शिवाजी ने जागीरदारी प्रथा समाप्त कर दी थी क्योंकि जागीरदार शक्ति बढ़ाकर विद्रोह कर देते थे।

(२) ईमानदार अधिकारियों की नियुक्ति – लगान वसूल के लिए ईमानदार अधिकारी नियुक्त किये गये थे। घूसखोर तथा बेईमान अधिकारियों पर कड़ी कार्यवाही का प्रावधान था।

(३) जमीन की पैदाइश – जमीन की पैदाइश पर उसकी उन्होंने श्रेणियां बनवाई तथा लगान सुनिश्चित किया गया।

(४) ऋण व्यवस्था – अकाल के समय किसानों को ऋण सुविधाएं प्राप्त थी वे उसे आसान किश्तों में अदा कर सकते थे।

(५) ठेके की व्यवस्था – लगान वसूल करने वाले अधिकारियों पर कठोर नजर रखी जाती थी

स्वाभिमानी , स्वाबलंबी और सबके लिए पारदर्शी तथा सुलभ न्यायवाले एवं प्रतिभा प्रथम -सम्बन्ध व सिफारिश हाशिए पर जैसे सिद्धांतों कठोरता से गढे गए हिंदवी साम्राज्य के संस्थापक शिवाजी द्वारा निर्धारित शासकीय -आचरण को अपनाकर हम भारत को पुनः सुखी -समृद्ध – समुन्नत राष्ट्र बना सकते हैं। साथ ही मार्गदर्शन दे विश्व को सँवारनेवाला गुरु पद पुनःउपलब्ध प्राप्त करके ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः , सर्वे भवन्तु निरामया ‘ के उद्घोषक संसार की स्थापना कर सकते हैं।भारत ही नहीं विश्व के सभी देश ‘हिंदवी साम्राज्य’ की नीतियों पर चलकर विश्व को सबके लिए अनुपम निवास स्थान बना सकते हैं। शिवाजी जी के पहले विक्रमादित्य तथा चन्द्रगुप्त मौर्य ने रामराज के नियमों का अनुपालन कर चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापना की और शिवाजी ने उसको हिंदवी – साम्राज्य का नाम देकर उसे ईश्वरीय इच्छा का फल बताया। विक्रमादित्य ने ग्रह -नक्षत्रों और जीवन -विज्ञान के क्षेत्र में अतुलनीय कार्य कर स्वयं को चक्रवर्ती सम्राट से ऊपर स्थान दिलाया तो चाणक्य के शिष्य चन्द्रगुप्त ने मौर्य राजवंश नींव रखी। गुरु से विद्रोह ने चन्द्रगुप्त के पत्नी मोह को राजकाज से अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध कर उनके राजकीय चरित्र कलुषित किया। लेकिन शिवाजी ने अपने राज को ‘हिंदवी साम्राज्य ‘ का नाम देकर अपने शासन में साम -दाम -दंड -भेद के केंद्र की धुरी ‘राष्ट्र और राष्ट्रहित’ को ही रखा। अन्य राजाओं ने जहां गढ़ (किले) से राज किया वहीं शिवाजी ने गढों का उपयोग साम्राज्य की स्थापना में किया – यह भी उनकी विशिष्टता है।

महाराजा विक्रमादित्य हमारे वह पुण्यतीर्थ हैं जिन्होने राजकाज के हर पक्ष की नीतियां बनाकर राष्ट्रजीवन को दिशा दी लेकिन शिवाजी वह गौरवपुंज हैं जिन्होने रामराज को विक्रमादित्य के अनुशासन से बंधकर जीवन में उतारा।विक्रमादित्य दैवत्व प्राप्त पूर्वज हैं जिनके आगे मस्तक स्वतः श्रद्धा से नत हो जाता है तो शिवाजी हमारे अद्यतन इतिहास का वह ऊर्जाकेंद्र है जो शक्ति का संचार कर राष्ट्र के नवनिर्माण में स्वयं को होम कर देने का बल देते हैं। विक्रमादित्य अपने कार्यों से किंवदंती बन चुके हैं और शिवाजी अभी हाल की सदियों में बीता जीवन है जिसकी यादों का पन्ना इतिहास में आज भी कच्चा ही है। विक्रमादित्य राजा के रक्तीय उत्तराधिकारी थे जबकि शिवाजी राजवंशीय होते हुए भी राजपुत्र नहीं थे। उनके पिता शाह जी भोंसले सैन्य टुकड़ी के अधिपति थे और शिवाजी ने पिता को मिली जागीर को साम्राज्य की ऊंचाइयां दी।उनके द्वारा स्थापित हिंदवी- साम्राज्य हमारे जीवन -नक्षत्र का वह तारा है जो हमसे सबसे नजदीक है। शिवाजी की किरणों से तेज़ पाना अधिक व्यावहारिक और प्रेरणादायी है।

सन्दर्भ
(१ ) महाकाव्य श्रीशिवभारत (लेखक शिवाजी के दरबारी कवि परमानन्द )
(२) राजा शिवछत्रपति (पूर्वार्ध और उत्तरार्ध ) लेखक : बाबासाहेब पुरंदरे
(३) SHIVAJI & SURAJ by Anil Madhav Dave (४) ज़ेर – ए -शेखावली
(५) श्रीशिवराज्याभिषेक कल्पतरु
(६) राज्य व्यवहार कोश
(५ ) श्री पांडुरंग बलकवडे तथा डॉ मिलिंद दत्तात्रेय पराड़कर ,श्रीसत्येन वेलणकर ,श्री रुपेश पवार एवं श्री केदार फाड़के से बातचीत

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