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संत शिरोमणि रैदास जी : मेवाड़ की महारानी मीराबाई ने संत रविदास जी के पास गुरु दीक्षा ग्रहण की थी

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संत शिरोमणि रैदास जी :

“प्रभु जी तुम चंदन हम पानी,
जाकी अंग अंग बासी समानी

संत शिरोमणि रविदास जी का जन्म रवि वार के दिन होनेसे उनका नाम रैदास रखा है, संत रविदास जी का जन्म वाराणसी (बनारस) के नजदीकी गांव सिर गोवर्धन पुर में हुआ था, उनके दादाजी का नाम जास्साल था, और दादीजी का नाम लख पति था, रविदास जी के माता का नाम कलसीदेवी और पिताजी का नाम था संतो ख दास, असली रविदास रामायण के ग्रंथ के अनुसार उनके पिताजी का नाम रघु और माता का नाम कर्मा देवी था, विक्रम संवत 1433 के माघ मास में सूद पूनम के दिन 19 फरवरी को हुआ था, जब कि, विक्रम संवत 1584 मे राजस्थान के चीतोड़ गढ़ में उनका निर्वाण हुआ था, वो 151 साल तक जिए थे, महाराष्ट्र के संत तुकाराम संत रविदास जी से प्रभावित थे, सीखो के महान गुरु नानक देवजी ने कहा कि संत रविदास गोविंद रूप हे,, चार वर्ण के लोग रविदास जी के चरणों में वंदन करते हैं,
    मेवाड़ की महारानी मीराबाई ने संत रविदास जी के पास गुरु दीक्षा ग्रहण की थी, उनका सम्मान किया गया था,
“मेरा मन लगा गुरु सौ,
अब न रहूँगी अटकी,
मीरा के प्रभु ते ही स्वामी श्री रविदास गुरु तू”
            – – – – मीराबाई
संत शिरोमणि रैदास जी भक्ति युग के एक महान संत थे, वो कर्म कांड के विरोधी थे, डॉ धरम्वीर का कहना है कि, संत रविदास जी कबीर के बड़े भाई थे, ये दौनो दलितों के गुरु और सद्गुरु थे, वो मानते थे कि जातिवाद को खतम किए बिना दलितों का विकाश नहीं होगा, उन्होने जातिवाद और ब्राह्मण वाद परकड़ी आलोचना की है और तीखे वचन बोले थे, ये दौनो सामाजिक क्रांति के पथ दर्शक थे, भक्ति आंदोलन आज तक के इतिहास में सभी आंदोलनओ से सब से बड़ा आंदोलन था,
यदु जी की 28 वी पीढ़ियों में से एक सुर सेन हुए थे, और उनकी 17 वी पीढ़ी मे चंव र सेन हुए थे, चंवर सेन की 43 वी पीढ़ी मे हरि नंदन का जन्म हुआ था, हरीनंदन की शादी चित्र कौर नामक सुशील कन्या से करवाई गई थी, काशी (बनारस) के करीब गुणवान भक्त हरि नंदन वो चमार थे, उन्हे संतान नहीं होने से सुनंदन रूषि के आशीर्वाद से उनके यहा एक पुत्र का जन्म हुआ था उसका नाम रघु रखा गया था, ये रघु संत रविदास जी के पिता थे, और माता करमा देवी के पुत्र संत रविदास जी थे, उनकी शादी 16 साल की उम्र. में लोना देवी के साथ की गई थी, वो भी धार्मिक थी, संत रविदास जी घर में चप्पल बनाने का काम करते थे और उन्हें लीनादेवी मदद करती थी, संत शिरोमणि  रैदास जी का ब्राह्मण लोगो ने विरोध किया था और बताया गया था कि ये तो पाखंडी हे लेकिन राजा के सामने शास्त्रार्थ मे ब्राह्मण लोग की हार होनेसे राजाजी ने संत रैदास जी को सुवर्ण पालकी में बिठाकर काशी शहर में प्रदक्षिणा करवाने के लिए आदेश होनेसे संत रविदास जीको सुवर्ण पालकी में बिठाकर पूरे काशी नगर में घुमाए गए थे, संत रविदास जी के चरण छुए और उनसे क्षमा मांगी थी, संत रविदास जी के लिए हिन्दी, गुजराती, अंग्रेजी में बहुत सारा साहित्य लिखा गया है, पंजाब मे संत  जी को मानने वाले लोगों को रविदासइया कहा जाता है, गुजरात के गाँधी नगर मे सैक्टर 6 में बड़ा मन्दिर संत रैदास जी का बनाया गया है, उनके जन्म दिन पर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं और उनके चरणों में सिर झुकाकर वंदन करते हैं.

संत रैदास ने संत रामानन्द के शिष्य बनकर उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित  किया था, इन्हें स्वामी रामानंद जी को कबीर साहेब जी के कहने पर गुरु बनाया था, जबकि उनके वास्तविक आध्यात्मिक गुरु कबीर साहेब जी ही थे।उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे। प्रारम्भ से ही रविदास जी बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था। साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था। वे उन्हें मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उन्होंने रविदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से भगा दिया। रैदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग इमारत बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे।

इन्होंने बेगम पूरा की कल्पना की थी, ऎसा देश हो जहा कोई दुखी और भूखा न हो, रविदास. 15वीं शताब्दी के कवि. “मन चंगा तो कठौती में गंगा”, लिखा. और साफ़ किया कि भगवान और मंदिर की ज़रुरत इंसान को रोटी और मानवीयता से ज्यादा नहीं है. कई बातें और कई चीज़ें हैं. अपने लिखे में ईश्वर को मानने की बाध्यता और आडंबर से समाज को मुक्त किया. और देखते-देखते रविदास को संत रविदास कहा जाने लगा. बहुत से लोग उनके समर्थक हो गए. और समर्थकों को कहा गया रैदासी. यूपी, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब तक रैदासियों की रिहाईश हुई. और हर साल देश भर से तमाम रैदासी रविदास जयन्ती के दिन उनके घर बनारस में जुटते हैं. रविदास ने आंदोलन के तहत कविताएं लिखीं. अभी बात उनके कुछ फेमस दोहों की-

ब्राह्मण मत पूजिए जो होवे गुणहीन,

पूजिए चरण चंडाल के जो होने गुण प्रवीण

अंतरराष्ट्रिय महा पीठ महा पीठ के द्वारा दिनांक :21 फरवरी 2021 को सुबह मे 11. 00 बजे विज्ञान भवन न्यू दिल्ली मे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन  संपन्न हुआ है, इस कार्यक्रम का उद्घाटन आदरणीय राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविद के कर कमलों से किया गया था, जिसमें हम भी सहभागी बने हुए थे.संत रैदास के भक्ति काव्य का सामाजिक सरोकार 

हिन्दी भक्ति काव्य के सामाजिक सरोकारहिन्दी भक्ति काव्य मीराबाई, कबीर और संत रविदास ने रचे थे | वो शिक्षा में पारंगत न होने के बावजूद एक उमदा भक्ति काव्य समाज को दिया गया है | सामाजिक चेतना और आध्त्यात्मिकता की ओर ले जाने वाले ये हिन्दी भक्ति काव्य ने भारत में संस्कृति का सिंचन किया है | मीराबाई ने कृष्ण भाक्ति में लीन हो कर, राजा राणा के राज्य को तिलांजलि दे दी थी | राणाजी ने मीरा की परीक्षा के लिए जहर दिया था | वो कृष्ण के प्यार में झहर भी पी लेती है फिर भी, उसे कोई तकलीफ नहीं हुई थी | मीरा के पद समाज को श्री कृष्ण की भक्ति की ओर ले जाने में सफल हुए है | कबीरजी भी उतने ही धार्मिक थे | उनका साहित्य भी समाज के जीवन के साथ सरोकार रखता है | हिन्दी भक्ति काव्य के रूप में वाल्मिक रचित रामायण, हिन्दी महा भक्ति काव्य है | रामायण समाजीक जीवन कैसे जिया जाता है, पितृ प्रेम, मात्रु प्रेम, पत्नी प्रेम, भात्रू भाव, प्रजा प्रेम, मित्र प्रेम आदि की रीत समाज को दी है |महाभारत भी एक उमदा हिन्दी महा काव्य है | जिसकी रचना वेद व्यासजी ने की थी | रामायण और महाभारत दोनों पहले भारतीय धर्म भाषा, संस्कृत में लिखे गए थे, लेकिन उसका हिन्दी में संस्करण भी किया गया है | ये दोनों हिन्दी भक्ति ग्रन्थ सामाजिक जीवन में उन्नति लाते है | सामजिक जीवन की परिभाषा शिखाते है |इसी तरह, संत रैदास जी के द्वारा रचे गए भक्ति काव्य भी एक नयी दिशा देता है | उन्हों ने मांसाहार और नशे से दूर रहने की सीख दी है | वो कर्म कांड और मूर्ति पूजा के विरोधी थे | इरान की यात्रा मुलाकात दरम्यान, वो बेगमपुरा शहर की कल्पना करतें है | बेगमपुरा ऐसा होना चाहिए, जहाँ जात-पात में भेदभाव न हो, सब को अन्न मिले, सब सुख चेन से जिए और धर्म भावना के साथ अपना जीवन व्यतीत करे, ऐसी सुन्दर कल्पना संत रविदासजी ने ६०० साल पहले की है | संत रविदास के ४० भक्ति पद जो पंजाब में गुरु नानकजी के ‘ग्रन्थ साहिब’ में शामिल है | जो जन जीवन को एक नयी ऊर्जा प्रदान करता है | इसी तरह, हिन्दी भक्ति काव्य सामाजिक चेतना और संस्कृति के जतन के लिए एक उमदा हिन्दी भक्ति काव्य है | वो समाज जीवन से बहुत गहरा सरोकार रखता है |  हिन्दी भक्ति काव्यकी रचना संत रविदास, मिराबाई और संत कबीरने बहुत की है | संत रविदास का साहित्य हिन्दी, अंग्रेजी और पंजाबी में बहुत ही उपलब्ध है |संत रैदास की वाणी
जो तुम गिरिवर तो हम मोरा,जो तुम चन्द्र तो हम भये है चकोरा ||माधवे तुम न तोरो तो हम नहीं तोरी,तुम सो तोरी तो किन सो जोरी ||जो तुम दिवरा तो हम बाती,जो तुम तीरथ तो हम जाती ||रैदास राती न सोइए, दिवस न करिये स्वाद,अहिनिसी हरिजी सुमिरिए, छांड सकल अपवाद ||चित सुमिरन करो नैन अवलोकनों,श्रवण वाणी सौ जस पूरी राखौ ||मन सो मधुकर करो, चरण ह्रदय धरो,रसना अमृत सम नाम भाखो ||मेरी प्रीती गोविन्द खोजनी घेरे,मैं तो मोल महँगी लई लिया सतै ||साध संगत बिना भाव नहीं उपजे,भाव बिना भक्ति नहीं होय तेरी ||कहे रविदास एक बिनती हरी स्यो,पैज राखो राजा राम मोरी  ||
भारत वर्ष के इतिहास में मध्यकालीन युग में लोगों की मुसीबते ज्यादा थी, देश, प्रान्तों में बटा हुआ था | मुस्लिमोने विजय नहीं पाया लेकिन तबाही मचायी, मंदिर जो रविदास को प्रिय थे उसीको तोड़ते हुए संत रविदासजी ने देखा था | क्षुद्र को अछूत माना जाता था | मुस्लिम मूर्ति पूजा के विरोधी थे | धर्म परिवर्तन कराया गया | इस युग में पंजाब में गुरु नानक और पूर्व उत्तर मैं कबीर साहबने नइ परंपराओं को जन्म दिया |संत रैदास आध्यात्मिक सूर्य की आकाश गंगा थे | उनका जन्म राजस्थान में हुआ ऐसी लोक वायका है | लेकिन, वो पश्चिम भारत में ज्यादा रहे | वो काशी में रहते थे और मोची का काम करते थे | उनका जन्म १३९९ इस्वीसन और मृत्यु १५२७ में माना जाता है | उन्हों ने जाती प्रथा और मूर्ति पूजा और क्रिया कांड का विरोध किया था | वो सहिष्णु और सादगी से जीये थे | वो ब्राह्मिन नहीं थे | शास्त्रार्थ में पंडित को उन्हों ने पराजित किये थे | चितोड की रानी मीराबाई उनकी शिष्या बनी थी |गुरु शिष्य का सम्बन्धजो तुम गिरिवर तो हम मोरा,जो तुम चन्द्र तो हम भये है चकोरा ||माधवे तुम न तोरो तो हम नहीं तोरी,तुम सो तोरी तो किन सो जोरी ||
संत रैदास जी अपने गुरु के प्रति अपनी प्रीत का वर्णन करतें है | वो कहेतें है कि प्रभु, तुम जो पर्वत हो तो में मोरा हूँ | में आप के प्यार में पागल हूँ | मेरा प्रेम आप के प्रति चन्द्र और चकोर जैसे है | रैदास जी प्रभु को माधव कहके पुकारते है | उनका एक शेर है |आरजी सो अक्स था इके इल्तफाते दोस्त का,जिसको नादानी से ऐसे जाबिंदा समजा था में ||
प्रभु आपने जब आंख घुमा ली तब पता चला कि ये तो काँटों की सेज है | संत रैदास जी अपने गुरु के प्रति प्रेम व्यक्त करते कहेते हैं कि,“जो तुम दिवरा तो हम बाती,जो तुम तीरथ तो हम जाती” ||
वो कहते है की में बाती हूँ और तुम दिया हो | संत रविदासजी आदर्श शिष्य का जीवन कैसा होता है वो बताते है | सच्चे भक्त की पहचान कराते है | “रैदास राती न सोइए, दिवस न करिये स्वाद,अहिनिसी हरिजी सुमिरिए, छांड सकल अपवाद” ||तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता ||“मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ मरतबा चाहे कि दाना खाक में मिलकर गुले गुलजार होता है” || जब बीज मिटटी में मिल जाता है तब खुद का अस्तित्व खो देता है | वो फुल का रूप धारण कर लेता है | आध्यात्मिक मार्ग भी इसी तरह है | रैदास जी कहेते है कि सच्चा शिष्य रात में सोता नहीं है | शिष्य हंमेशा गुरु के साथ जुडा हुआ होता है |“हम अपने जजबाए बेदार को रुसवा नहीं करेती,शबे गम नींद से आँखों का आलूदा नहीं करेती” ||
ये संत दर्शनजी महाराज कहते है | आशिक अपनी प्रियतमा से नजर नहीं हटाता, वो आँखों को बदनाम नहीं करता | संत रविदासजी आगे कहते है कि “ए दिल बेकरार ओ, रो ले, तडप ले, जाग ले, नींद की फ़िक्र क्यों, अभी रात मिली है बेसहर” | वो कहेते है कि रात दिन हमें प्रभु को यही करना चाहिए | सब छोडकर उनका स्मरण करना चाहिए |आध्यात्मिकता और धर्म:चित सुमिरन करो, नैन अवलोकनो,श्रवण वाणी सौ जस पूरी  राखौ ||मन सो मधुकर करो, चरण ह्रदय धरौं,रसना अमृत राम नाम भाखौ ||मेरी प्रीती गोविन्द स्योंजनी घटै,मैं तो मोल महँगी लई लिया सटै ||साध संगत बिना भाव नहीं उपजै,भाव बिनो भक्ति नहीं होय तेरी ||कहे रविदास एक बिनती हरी सयों,पैज राखो राजा राम मोरी  ||–संत रैदास —इसमें संत रैदास आदर्श शिष्य के जीवन का वर्णन कर रहे है | आध्यात्मिकता का मार्ग है | प्रेममयी बने बिना कुछ मिलता नहीं है | गुरु और शिष्य में प्रेम होता जरुरी है | जिस तरह चरवाहा अपने गौआ बकरियां को पहचानता है, उसी तरह गुरु अपने शिष्य को, अपने  जीवो को इकठ्ठा करके प्रभु के पास ले जाते है | जन्म मरण दौउ में नाही जन परोपकारी आये,           जिया दान है भक्ति भावन हरि सयों लेन मिलाये |
शिष्य का जीवन भंवर जैसा होना चाहिए  | जैसे भंवर फुल के आसपास घूमता रहता है, वैसे गुरु के पास शिष्य को आगे पीछे घूमते रहना चाहिए |  शिष्य होना शरणागति है | रैदास जी प्रार्थना करते है, कि हमे संगत साधू की मिले | संगत से भाव पैदा होता है | प्रभु को याद करना अपने जीवन का लक्ष्य होना चाहिए | उनके मुख में प्रभु का ही नाम होता था | अपनी आँखों से प्रभु को ही देखना चाहते थे | संत रविदास और कबीर के गुरु स्वामी रामानंद थे | रविदासजी मांसाहार और नशा के विरोधी थे, जाती भेद का विरोध किया था | कर्म कांड के विरोधी थे, मद्य और पशु हिंसा के विरोधी थे | वो महेनत की कमाई से ही जीना चाहते थे |जाती पाती के फेरे में सुलज रह्यो सब लोग,मानवता को खात है रैदास जाती को रोग ||
संत तुकाराम ने संत रैदास जी को एक साखी में कहा था, निवृति ज्ञानदेव सोपान चंगाजी, मेरे जी के नामदेव, नागाजन मित्र , नरहरी सोनार, रविदास कबीर सगा मेरे |
शिखों के गुरु नानकदेवजी ने भक्ति काव्य में कहा है कि, 
“ रैदास चमारू उस्तुति करे, हर की रीती निमख एक गाई,पतित जाती उत्तम भया, चारो चरण पये जग गाई, रैदास हयाये प्रभु अनूप, नानक गोविद रूप” 
गुरु नानक कहते है कि चरों वर्णों के लोग संत रैदास के चरणों में नमन करते है क्यों कि वो ज्ञानी है |  मेवाड़ की महारानी भक्त कवियित्री मीराबाई ने गुरु दीक्षा ले कर उनका सन्मान किया था | मीराबाई एक भक्ति काव्य में कहती है कि,“मेरा मन लागो गुरु सौ, अब न रहूंगी अटके,गुरु मिलियो रोहिदासजी, दिन्ही ज्ञान के गुटकी,रैदास मोहे मिले सद्गुरु, दिन्ही सूरत सुरई की,मीरा के प्रभु ते ही स्वामी, श्री रैदास सतगुरुजी“
संत रैदास जी भक्ति युग के महान संत थे | गुरु संत रैदास जी के ४० पद “श्री गुरु ग्रन्थ साहेब” में समाविष्ट है | सोलह रागों में अपनी वाणी संत रैदास जी करते थे | रैदास जी कहते है कि,“रैदास ब्राह्मण मत पुजिये, जो होवे गुण हिन,पुजिये चरण चंडाल के जो होवे गुण परवीन”
६०० साल पहेले मुस्लिम बादशाह ने ईरान में संत रैदास को बुलाये थे | ईरान के आबादान शहर में वो गए थे | आबादान के नाम से पर उन्हों ने अपनी कल्पना का शहर “बेगमपुरा” कैसा होना चाहिए उसका वर्णन अपनी वाणी में किया है | बेगमपुरा शहर को नाउ, दुःख अन्दोहु नहीं तीही ठाउ,  ना तसविस खिराजू न मालू, खउकु न खता, न तरसु जवाळु, अब मोहि वतन गई पाई, ॐ हाँ खैरी सदा मेरे भाई || कायमु, दायमु सदा पाति साही, दोम न सेम एक सौ आहि || आबादानु सदा मशहूर, उहाँ गनी बसही मामूर || तिह तिह शैल करही, जिह भावै || महरम महन न को अटकावे || कवि रविदास खलास चमारा ||जो हम सहरी सु मितु हमारा || उनका भक्ति काव्य,
अब कैसे छूटे नाम रट लागी, प्रभुजी तुम चंदन हम पानी,जाकी अंग अंग बास समानी, प्रभुजी तुम घनबन हम मोरा,जैसे चितवत चन्द्र चकोरा, प्रभुजी तुम दीपक हम बाती,जाकी ज्योति बरै दिन राती, प्रभुजी तुम मोती हम धागा,जैसे सोन ही मिलत सुहागा, प्रभुजी तुम स्वामी हम दासा,ऐसी भक्ति करे रैदासा,  प्रभुजी तुम चंदन हम पानी ||


आभार,डॉ गुलाब चंद एन. पटेल) कवि/लेखक/अनुवादक और   नशा मुक्ति अभियान प्रणेता‘हरिकृपा’, प्लोट नं.१२७/१,सेक्टर-१४,महात्मा मंदिर के पासगांधीनगर-३८२०१६गुजरात मो: ९९०४४ ८०७५३ईमेल: patelgulabchand19@gmail.comMo 8849794377          

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