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गौ रक्षा शाला ट्रस्ट में आयोजित कार्यक्रम में गोसेवकों को किया सम्मानित

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हरिद्वार : अध्यक्ष राज्य गो सेवा आयोग उत्तराखंड डॉ. पंडित राजेन्द्र अंथवाल ने आर्यावर्त गौ रक्षा शाला ट्रस्ट की ओर से पथरी मार्ग धनपुरा में गौ सेवा कर रहे लोगों को सम्मानित किया। कार्यक्रम में 100 से अधिक गौ सेवकों को सम्मानित किया गया।  अध्यक्ष राज्य गो सेवा आयोग उत्तराखंड डॉ. पंडित राजेन्द्र अंथवाल ने कहा कि आर्यावर्त गौ रक्षा शाला ट्रस्ट पिछले लंबे समय से सराहनीय कार्य कर रही है। यहां अच्छी गौ सेवा देखने को मिलती है। ट्रस्ट के संचालक और अध्यक्ष बलराम कश्यप अपने निजी जीवन के सुख और विलासिता को त्याग कर यहां गौ सेवा में एक बड़ी मिसाल कायम कर रहे हैं।

 

 

अध्यक्ष राज्य गो सेवा आयोग उत्तराखंड डॉ. पंडित राजेन्द्र अंथवाल ने कहा कि जिस जगह गो माता निवास करती है, वहां 33 कोटि हिंदु देवी देवता वास करते हैं, ऐसे में देवभूमि जल्द ही देश भर में गो सेवा का के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित करेगा। राज्य सरकार द्वारा गोवंश के संरक्षण और संवर्धन के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही है,राज्य सरकार द्वारा गोवंश के संरक्षण और संवर्धन के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही है।

रींगस रोड़ पर एक बछड़े का कटा हुआ सिर मिलने से सनसनी

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Chomu News: एक कहावत आपने सुनी होगी करे कोई भरे कोई… यह कहावत चौमूं शहर में हुई एक घटना पर चरितार्थ हुई. दरअसल, रींगस रोड़ पर एक बछड़े का कटा हुआ सिर मिलने से सनसनी फैल गई.इधर, गौ-रक्षकों में घटना को लेकर आक्रोश व्याप्त हो गया. बछड़े के कटे हुए एक सिर को एक युवक दीवार पर रखता हुआ नजर आया. तभी मौके पर लोगो की भीड़ जमा हो गई. लोगों ने युवक की धुनाई कर दी .

मामले की सूचना मिलने पर चौमूं थाना पुलिस मौके पर पहुंची. पुलिस ने युवक को हिरासत में ले लिया. बाद में थानाधिकारी प्रदीप शर्मा ने घटनास्थल के आसपास के सीसीटीवी कैमरे खंगाले तो पूरी वारदात का खुलासा हो गया.

फुटेज में एक कुत्ता कटा हुआ सिर लेकर भागता हुआ नजर आया यानी कुत्ते ने सिर को दीवार के पास रख दिया तभी वहां से गुजर रहे युवक ने सिर को उठाकर दीवार के ऊपर रख दिया. तभी किसी राहगीर ने युवक को सिर रखते हुए देख लिया और हंगामा शुरू कर दिया. आसपास के लोग एकत्र हो गए. आक्रोशित लोगों ने युवक की धुनाई कर दी जबकि इस युवक दोष इतना था की कटे हुए सिर को दीवार पर रख दिया.

दीपिका पादुकोण ने हालिया सर्वे में हासिल किया भारत की #1 हीरोइन का स्थान!

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दीपिका पादुकोण को इंडिया टुडे मूड ऑफ द नेशन सर्वे में एक बार फिर भारत की टॉप एक्ट्रेस चुना गया है। इससे 2023 के बाद अब भी उनका राज जारी रहेगा, जिससे इस साल भी देश की लीडिंग एक्ट्रेस के रूप में उनकी पोजीशन बनी हुई है।

दीपिका पादुकोण की पॉपुलैरिटी में बढ़त हुई है, पिछले साल उनके पोल नंबर 23.8% से बढ़कर इस साल 24.7% हो गए हैं। वह न सिर्फ भारत की टॉप सुपरस्टार हैं, बल्कि एक प्रॉमिनेंट ग्लोबल एंबेसडर भी हैं, जो इंटरनेशनल लेवल पर देश को रिप्रेजेंट करती हैं, जैसा कोई और नहीं कर सकता।

दीपिका पादुकोण ने सिर्फ़ एक साल में बॉक्स ऑफिस पर 3000 करोड़ की जबरदस्त कमाई करके इंडस्ट्री में अपना दबदबा दिखाया है। यह उपलब्धि साबित करती है कि वह सिर्फ़ एक लीडिंग एक्ट्रेस नहीं हैं, बल्कि बॉलीवुड की टॉप एक्ट्रेस हैं।

दीपिका पादुकोण अपनी हालिया हिट फिल्मों से बड़ी सक्सेस को एंजॉय कर रही हैं। उनकी फ़िल्में, जिनमें “पठान” (₹1050.3 करोड़), “जवान” (₹1150 करोड़), “फाइटर” (₹337.2 करोड़) और “कल्कि* (₹1200 करोड़) शामिल हैं, ने दुनिया भर में ₹3680 करोड़ से ज़्यादा की कमाई की है। बॉक्स ऑफ़िस पर इस शानदार परफॉर्मेंस ने उन्हें भारत की टॉप एक्ट्रेस के रूप में स्थापित कर दिया है।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर पद्मश्री अनुप जलोटा बने मिशन पत्रकारिता के आर्ट एंड कल्चर विंग के संरक्षक

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मुंबई। श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर विश्व प्रसिद्ध भजन सम्राट पद्मश्री अनुप जलोटा को मिशन पत्रकारिता के आर्ट एंड कल्चर विंग का संरक्षक नियुक्त किया गया है। इस महत्वपूर्ण घोषणा के साथ ही, विख्यात संगीतकार विवेक प्रकाश को राष्ट्रीय महासचिव के रूप में नियुक्त किया गया। यह नियुक्तियाँ मिशन पत्रकारिता के राष्ट्रीय अध्यक्ष शैलेश जायसवाल के मार्गदर्शन में, आर्ट एंड कल्चर विंग के राष्ट्रीय अध्यक्ष शैलेंद्र भारती द्वारा की गईं।

इस विशेष कार्यक्रम का आयोजन मुंबई के जुहू स्थित जेडब्लयू मेरिएट पंचसितारा होटल में किया गया, जहाँ कला और संस्कृति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली इन विभूतियों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में मिशन पत्रकारिता के वरिष्ठ फोटोग्राफर बंटी राव, समाजसेवी विजय पाठक, और पत्रकार कंचन यादव समेत अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

अनुप जलोटा, जिन्हें भारतीय भजन संगीत के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है, ने इस नई जिम्मेदारी को लेकर अपने विचार साझा करते हुए कहा, “मुझे गर्व है कि मुझे मिशन पत्रकारिता के आर्ट एंड कल्चर विंग का संरक्षक बनने का अवसर मिला। मैं इस विंग के माध्यम से भारतीय कला और संस्कृति के संवर्धन के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देने का प्रयास करूंगा।”

वहीं, संगीतकार विवेक प्रकाश, जो कई प्रसिद्ध फिल्मों और एलबम्स के संगीत निर्देशक रह चुके हैं, ने भी अपने मनोभाव व्यक्त करते हुए कहा, “राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में मेरी यह भूमिका चुनौतीपूर्ण और प्रेरणादायक है। मैं आर्ट एंड कल्चर विंग के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए तत्पर हूँ।”

कार्यक्रम के अंत में, मिशन पत्रकारिता के राष्ट्रीय अध्यक्ष शैलेश जायसवाल ने इन नियुक्तियों को संगठन के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा कि यह कला और संस्कृति के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत है। उन्होंने कहा, “हमारा उद्देश्य भारतीय कला और संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देना है, और मुझे विश्वास है कि अनुप जलोटा जी और विवेक प्रकाश जी के नेतृत्व में यह विंग अपनी महत्ता को और भी अधिक सिद्ध करेगा।”

गोकुलाष्टमी, गौ माता को जरूर खिलाएं ये 4 चीजें

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Gokul Ashtami 2024: हिन्दू धर्म में भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव को बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. इस दिन को जन्माष्टमी के अलावा गोकुलाष्टमी, अष्टमी रोहिणी, श्रीकृष्ण जयंती और श्री जयंती जैसे नामों से भी जाना जाता है. पुराणों के अनुसार, भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को ही भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था. इसलिए इस दिन लोग नंदलाल कृष्ण कन्हैया की विधि विधान से पूजा करते हैं. भगवान कृष्ण से गाय का गहरा नाता माना जाता है आपने कई चित्रों में भी उन्हें गाय के साथ देखा होगा. वहीं हिंदू धर्म में गाय को माता का दर्जा दिया गया और इसलिए इन्हें गौ माता भी कहा जाता है. ऐसे में जन्माष्टमी के दिन गाय को चीजें खिलाने का बड़ा महत्व बताया गया है. आइए जानते हैं इनके बारे में विस्तार से भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा से.

1. हरा चारा
पुराणों में गौ माता से जुड़ी कथाएं मिलती हैं और सदियों से हम गौ सेवा को देखते आ रहे हैं. गाय को हरा चारा खिलाना भी बड़ी सेवा है. ऐसा कहा जाता है कि, गोकुलाष्टमी के दिन गौ माता को हरा चारा खिलाने से ग्रह दोषों से छुटकारा मिलता है.

2. अनाज
गौ माता को अन्न खिलाना भी पुण्य का काम माना गया है. ऐसा माना जाता है कि जन्माष्टमी के दिन गाय को अन्न खिलाने से उत्तम फलों की प्राप्ति होती है. ऐसे में आप इस दिन गाय को अनाज जरूर ​खिलाएं.

3. गुड़
यदि आप पितृ दोष का सामना कर रहे हैं तो जन्माष्टमी के दिन आप गाय को गुड़ जरूर खिलाएं, ऐसा करने से पितृ दोष से छुटकारा मिल सकता है. साथ ही इससे मंगलदोष भी दूर होता है.

4. मिठाई
गाय को माता का दर्जा दिया गया है और त्योहारों पर गाय की पूजा भी की जाती है. ऐसे में आपको जन्माष्टमी के दिन गाय को मिठाई खिलाना चाहिए. इससे घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है.

निष्काम कर्मयोगी भगवान श्रीकृष्ण

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डॉ. मुकेश कबीर

भगवान श्रीकृष्ण को ज्यादातर प्रेम के प्रतीक के रूप में पूजा गया जबकि प्रेम के अलावा भी श्रीकृष्ण बहुत विराट हैं पूर्ण पुरुषोत्तम हैं। बेशक प्रेम उनका स्वभाव है इसीलिए उनका प्रेम इतना विशाल इतना अनंत है कि वे सम्पूर्ण कलाओं के स्वामी बन सके  और हर कला में पूर्ण। श्रीकृष्ण जितने अच्छे प्रेमी हैं उतने ही अच्छे कूटनीतिज्ञ हैं। जितने अच्छे संगीतकार हैं उतने ही महान योद्धा हैं और जितने  समर्पित रसिया हैं उतने ही समर्पित कर्मयोगी लेकिन श्रीकृष्ण के कर्मयोगी स्वरूप की चर्चा कम होती है।

ज्यादातर कवि और कथाकार श्रीकृष्ण के प्रेमी रूप को महिमा मंडित करते रहे और उनको रासबिहारी ही बना दिया गया। श्रीकृष्ण से हमें सिर्फ प्रेम नहीं सीखना था बल्कि कर्म सीखना था, निष्काम कर्म सीखना चाहिए था तभी दुनिया से अन्याय और अधर्म समाप्त होता लेकिन हुआ उल्टा जब हम प्रेम करते हैं तो परिणाम की चिंता नहीं करते लेकिन कर्म तभी करते हैं जब उसमेें कोई फायदा हो, हमारे कर्म रिजल्ट ओरिएंटेड हो गए इसीलिए सारा तनाव और फसाद जीवन में आया। कृष्ण के जीवन को देखें तो उन्होंने जो भी किया उससे उन्हें कभी कोई व्यक्तिगत फायदा नहीं हुआ लेकिन फिर भी वे अथक, अनवरत कर्म करते रहे और उनके जीवन में कभी अवसाद और आलस्य भी नहीं रहा चाहे परिणाम विपरीत रहा हो। गीता में वे कहते भी हैं कि ”मुझे कुछ भी वस्तु प्राप्त करने की जरूरत नहीं है फिर भी मैं कर्म करता हूं, सारी दुनिया में जो कुछ भी होता है वो सब मेरे पास है फिर भी मैं कर्म करता हूं।”

श्रीकृष्ण सिर्फ कर्मयोगी नहीं हैं बल्कि निष्काम कर्मयोगी हैं, कर्मो में न उनको आसक्ति है न विरक्ति बल्कि अनासक्ति है यही कारण है कि उनके जीवन में किसी भी तरह का अहंकार नहीं रहा और उन्होंने छोटे बड़े काम में भेद नहीं किया, राजा होने के बाद भी उन्होंने सारथी बनना स्वीकार किया और मान अपमान से परे होकर युद्ध में हथियार न उठाने की प्रतिज्ञा भी तोड़ी यह उनका अर्जुन और भीष्म के प्रति प्रेम भी था। अपने युग के सबसे बड़े योद्धा और परम प्रतापी होने पर भी उन्होंने युद्ध से भागने से भी गुरेज नहीं किया, उनको रणछोड़ कहा गया  लेकिन उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार किया क्योंकि तब यही उचित था ,कालांतर में हमने यह भी देखा कि बहुत सी सेनाएं इसलिए युद्ध हार गईं क्योंकि उन्होंने वक्त पर पलायन नहीं किया और विपरीत हाल में भी युद्ध में डटे रहे, यह वीर का लक्षण तो है लेकिन कूटनीतिज्ञ का नहीं।

श्री कृष्ण की कूटनीति देखिए कि युद्ध से भागकर भी युद्ध नहीं छोड़ा बल्कि सही समय का इंतजार किया और आखिर में जरासंध को समूल नष्ट किया ही। श्रीकृष्ण का युद्ध छोडऩा न तो किसी तरह का डर है और न पराजय वे जय पराजय से ऊपर उठकर लडऩे वाले योद्धा हैं तभी उन्होंने युद्ध से पलायन करने वाले अर्जुन को रोका और अंत तक युद्ध लडऩे को प्रेरित किया, यह काम कोई  रणछोड़ नहीं कर सकता बल्कि एक कुशल राजनीतिज्ञ ही कर सकता है,ऐसा ही विरोधाभासी व्यक्तित्व है कृष्ण का इसीलिए वो पूर्ण है। गीता के अनुसार वे जय भी हैं पराजय भी, सत्य भी हैं और असत्य भी वे पाप भी करते हैं पुण्य भी इसीलिए इनको वरदान भी मिलते हैं और शाप भी लेकिन फिर भी उनके मन में कोई दुख, ग्लानि,कोई संदेह,कोई अहंकार नहीं सिर्फ अपने प्रत्यक्ष काम के प्रति पूर्ण समर्पित परिणाम की चिंता किए बिना ,परिणाम अनुकूल हो या प्रतिकूल दोनों में उतने ही खुश क्योंकि वे निष्काम कर्मयोगी हैं इसीलिए उनके जीवन में अवसाद का स्थान नहीं है। यह निष्काम कर्मयोग ही हमेें सीखना था कृष्ण से लेकिन इसकी चर्चा साहित्य में कम मिलती है और उनके रास की चर्चा ज्यादा मिलती है,यही हाल कथाकारों का है,कथा पंडालों में कृष्ण के विवाह को ज्यादा प्रमुखता दी जाती है।
उनके त्याग, संघर्ष की चर्चा नहीं होती यही कारण है कि हम कृष्ण के संघर्ष को लगभग भूल ही चुके हैं जबकि सृष्टि में अकेले कृष्ण ही हैं जिनका जन्मदिन से ही संघर्ष शुरू हो गया था, वे कभी नाजों में नहीं पले और न ही छप्पन भोग से बड़े हुए बल्कि माखन, मिश्री, मूंगफली और चने खाकर भी राज कुमारों की तरह शान से रहे। उनका भोग से ज्यादा ध्यान कर्तव्य पर रहा, जनसेवा और जनकल्याण पर रहा।
उनके बचपन को छोड़ दें तो उनके पास रास रचाने का उतना वक्त ही नहीं था जितना हमने रास की चर्चाएं की हैं ,उनकी व्यस्तता का अंदाज इस बात से लगा लीजिए कि युद्ध से पहले जब वे भीम की पत्नी हिडिंबा से मिलने गए तब उन्होंने व्यस्तता के कारण हिडिंबा के घर भोजन भी नहीं किया था और घटोत्कच को युद्ध की सूचना देकर तुरंत निकल गए,महाभारत की क्षेपक कथाओं में इसका उल्लेख मिलता है। महाभारत के युद्ध को भी सिर्फ कुरुक्षेत्र तक ही सीमित समझा और समझाया गया जबकि युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण ने दिन रात कितनी यात्राएं की इसका जिक्र कथावाचक नहीं करते, जिसे आज की भाषा में फील्डिंग कहा जाता है युद्ध के लिए वो फील्डिंग अकेले कृष्ण ने ही की थी,उनके कहने से ही कई राजा पांडवों के समर्थन में आए थे और युद्ध में भोजन का प्रबंध भी कृष्ण ने ही करवाया था, खाने के लिए उडुपी की ड्यूटी उन्होंने ही लगाई थी और खास बात यह है कि उन्होंने दोनों सेनाओं के भोजन का प्रबंध किया था। युद्ध में सबसे ज्यादा मेहनत, संघर्ष, सक्रियता, प्लानिंग कृष्ण की ही थी लेकिन इसकी चर्चा कम होती है।

कृष्ण कितने महान कर्मयोगी थे कैसे निष्काम कर्मयोगी थे कि खुद सर्व समर्थ होने के बाद भी उन्होंने देश का सम्राट युधिष्ठिर को बनाया और खुद एक छोटे राज्य के राजा बने रहे क्योंकि उनके जीवन में श्रेय का महत्व नहीं रहा, क्रेडिट लेने में उनकी रुचि नहीं रही सिर्फ कर्म करने में लगे रहे इसीलिए श्रीकृष्ण हर हाल में प्रसन्न रहे और यही प्रेरणा उन्होंने गीता के माध्यम से दुनिया को दी है। बस जरूरत है रास बिहारी के विश्वरूप को समझने की और समझाने की, क्योंकि श्रीकृष्ण पूर्ण ब्रह्म हैं वे सिर्फ राधा रमण  या गोपी बल्लभ नहीं हैं, वे तो जगतपति हैं…जय श्री कृष्णा।

(विनायक फीचर्स)

भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश हर युग में प्रासंगिक और प्रेरणादायी

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 डॉ. मोहन यादव-
भगवान श्रीकृष्ण का जीवन दर्शन धर्म, जाति, व्यक्ति एवं लिंग से बहुत ऊपर है। लोक मान्यता है कि गुणातीत देवकीनंदन श्रीकृष्ण का अवतरण जन्माष्टमी के दिन हुआ। यह पावन संयोग है कि विष्णु जी के अष्टम अवतार श्रीकृष्ण माता देवकी के अष्टम पुत्र के रूप में अष्टमी तिथि को अवतरित हुए। जन्माष्टमी के पावन अवसर की प्रतीक्षा कर रहे भारत सहित दुनिया के कई देशों में बसे कृष्ण भक्तों में आनन्द और हर्षोल्लास है। द्वापर युग में आसुरी शक्तियों के अधर्म, अन्याय, पापाचार, अनाचार का प्रभाव चरम पर था। धर्म की रक्षा और अधर्मियों का नाश करने स्वयं भगवान को श्रीकृष्ण स्वरूप में पृथ्वी पर आना पड़ा। उन्होंने समस्त संसार को पाप, अधर्म, अत्याचार से मुक्त कर धर्म की संस्थापना की।

नन्हें कान्हा से योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण बनने की जीवन यात्रा में घनश्याम श्रीकृष्ण ने मनुष्य की भांति जीवन की अनेक बाधाएं, संघर्ष, दुःख, कष्ट, अपमान तथा पीडाओं को सह कर संसार को यह शिक्षा दी कि मनुष्य फल की इच्छा छोड़कर केवल अच्छे कर्म कर स्वयं पर विश्वास करें। योगेश्वर बनने में सबसे महत्वपूर्ण योगदान उनके गुरु सांदीपनि जी का है, जिन्होंने प्रिय शिष्य कृष्ण को धर्म, भक्ति, ज्ञान, योग, वेद, शास्त्र, संगीत, शस्त्र, पुराणों, गुरु सेवा एवं गुरु दक्षिणा आदि विषयों की दुर्लभ शिक्षाएं प्रदान की।

गुरु दक्षिणा में भगवान श्रीकृष्ण ने महर्षि सांदीपनि जी एवं गुरूमाता को उनका खोया हुआ पुत्र पुण्डरक वापस लाकर दिया। हम सब परम सौभाग्यशाली हैं कि भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षा-दीक्षा के साथ उनके योगेश्वर बनने की गाथा मध्यप्रदेश में लिखी गई।

कंस वध के बाद भगवान श्रीकृष्ण अपने बड़े भ्राता बलराम के साथ मथुरा से शिक्षा प्राप्ति के लिए महर्षि सांदीपनि की शरण में उज्जैन आये थे। नारायण (उज्जैन) में उनकी मित्रता सुदामा से हुई। श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता की मिसाल युग-युगांतर से है। भगवान श्रीकृष्ण से मित्रता की संसार को जो शिक्षा मिली, वह अनुकरणीय है। भगवान श्रीकृष्ण ने जिस जगह शिक्षा प्राप्त की थी, उनके गुरु सांदीपनि जी का आश्रम आज भी उज्जैन में विद्यमान है, जो भगवान श्रीकृष्ण के योगेश्वर बनने का साक्षात प्रमाण है। भगवान श्रीकृष्ण, सांदीपनि जी के गुरुकुल में 64 दिन रहे। इन 64 दिनों में 64 विद्या और 16 कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया। चार दिन में 4 वेद, 18 दिन में 18 पुराण, 6 दिन में 6 शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया।

अपनी विनम्रमा और श्रद्धा के कारण गुरु कृपा से भगवान श्रीकृष्ण को इन्दौर के समीप जानापाव में परशुराम जी से सुदर्शन चक्र रूपी अमोघ शस्त्र की प्राप्ति हुई। धार के पास अमझेरा में वीरता के बल पर रूक्मणी हरण में रूक्मी को हराया। बदनावर का ग्राम कोद वे पवित्र स्थान हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण की पौराणिक जागृत लीलास्थली हैं। मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि मध्यप्रदेश सरकार ने राम वन-पथ-गमन की तरह अब “श्रीकृष्ण पाथेय” निर्माण का संकल्प लिया है। इसके अंतर्गत मध्यप्रदेश में जहां-जहां भगवान श्रीकृष्ण के चरण पड़े थे, उन्हें तीर्थ क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाएगा। इससे पूरी दुनिया को यह पता चलेगा कि भगवान श्रीकृष्ण का अटूट सम्बंध गोकुल, मथुरा, नंदगांव, वृंदावन और द्वारिका से ही नहीं बल्कि मध्यप्रदेश से भी है। विश्व के लोग यहां आकर इन तीर्थों का दर्शन कर पुण्य लाभ ले सकेंगे।

श्रीकृष्ण ने नारी सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। जनश्रुति है श्रीकृष्ण ने दैत्य नरकासुर का वध कर बन्दी बनाई गईं 16 हजार स्त्रियों को मुक्त कराया था। साथ ही कुटिल कौरवों के चीरहरण से द्रौपदी की रक्षा भी की। गोपाल श्रीकृष्ण गौ-माता को बहुत मानते थे। गौ-वंश उन्हें प्राणों से प्रिय रहा। गायों की रक्षा के प्रति हमारी सरकार भी प्रतिबद्ध है। इस दिशा में गौ-शालाओं के विकास के लिये विशेष प्रयास भी किये जा रहे हैं।

श्रीकृष्ण का आदर्श जीवन हर युग मे प्रासंगिक तथा प्रेरणादायी है। प्राणी उनके द्वारा बताए गए मार्ग का अनुकरण कर महान बन सकता है। वर्तमान पीढ़ी को चाहिए कि वह भौतिकता की चमक-दमक में अपने पौराणिक इतिहास को विस्मृत न होने दें।जय श्री कृष्ण।(लेखक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं) (विभूति फीचर्स)

कलाभूमि 2024 में कथकबीट्स के नर्तकों ने अपनी खूबसूरती से बिखेरा जलवा

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मुंबई। कथकबीट्स के छात्रों ने शालीनता, समर्पण और कलात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए शनिवार को मुंबई में विलेपार्ले के मास्टर दीनानाथ मंगेशकर नाट्यगृह में कलाभूमि 2024 – एक शास्त्रीय कथक नृत्य कार्यक्रम में पूरे सभागृह में उपस्थित अतिथियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कथकबीट्स द्वारा आयोजित और यूरीवरगेट कर्जत द्वारा प्रस्तुत इस कार्यक्रम ने न केवल कलाकारों के कौशल के लिए बल्कि प्रत्येक रूटीन में बुने गए गहरे सांस्कृतिक महत्व के लिए भी ध्यान आकर्षित किया, जिसे सानिका प्रभु ने क्यूरेट किया। कार्यक्रम की शुरुआत एक भव्य गणपति आरती के साथ हुई, जिसे कार्यक्रम की क्यूरेटर – सानिका प्रभु ने खुद प्रस्तुत किया, जिनके अनुशासित आंदोलनों में वर्षों के प्रशिक्षण और जुनून की झलक दिखाई दी। इस कार्यक्रम में सुदेश भोसले, नेहा सरगम, अदिति भागवत, एताशा संसगिरी एवं कथक गुरु मंजरी देव और तालमणि पंडित मुकुंदराज देव सहित कई प्रतिष्ठित अतिथियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को गरिमामय बना दिया।

अगले सेट का नेतृत्व सानिका के गुरु नृत्य अलंकार हर्षदा जाम्बेकर ने अपनी शिष्याओं अनुष्का घाग, राधिका जोशी और समीक्षा मालंकर के साथ किया, जिन्होंने पूरी सटीकता के साथ तीनताल का प्रदर्शन किया। यह पूरी तरह से नृत्य पर आधारित नृत्य सेट था और इसमें अंग, उपांग और प्रत्यंग की बारीकियाँ शामिल थीं।

एक उल्लेखनीय आकर्षण युवा लड़कियों के एक समूह द्वारा एक मंत्रमुग्ध करने वाला कथक प्रदर्शन था, जिन्होंने बंसी बट्ट का प्रदर्शन किया – जिसमें भगवान कृष्ण की लीलाएँ शामिल थीं, जब वे गायों को चराते हुए बांसुरी बजाते थे।

कथकबीट्स (एक शास्त्रीय नृत्य अकादमी जो मुंबई और ऑनलाइन कथक प्रशिक्षण आयोजित करती है) के वरिष्ठ छात्रों ने अपने नाजुक कदमों और अभिव्यंजक हाथों के इशारों के माध्यम से मनमोहक प्रदर्शन प्रस्तुत किए। छात्रों द्वारा आत्मविश्वास और कौशल के साथ प्रदर्शन किए जाने पर गर्वित माता-पिता और रिश्तेदार खुश हो गए, जिन्होंने हफ्तों के कठोर अभ्यास के परिणामों का प्रदर्शन किया।

कलाभूमि 2024 के शीर्षक प्रायोजक यूरीवरगेट कर्जत के निदेशक प्रतीक धारकर ने कहा, “युवा पीढ़ी को कथक की कला को इतने अनुशासन और स्पष्टता के साथ प्रस्तुत करते देखना अद्भुत है।” इस कार्यक्रम की शानदार मेजबानी सानिका गाडगिल और तेजश्री वैद्य ने की, जिनकी आकर्षक उपस्थिति ने कार्यक्रम के आकर्षण को और बढ़ा दिया। प्रदर्शन के बीच उनके सहज बदलाव, साथ ही प्रत्येक सेट के महत्व के बारे में किस्से, ने पूरे कार्यक्रम के दौरान दर्शकों को बांधे रखा।
कार्यक्रम का सबसे बड़ा आकर्षण रामायण एक्ट था, जिसमें एकॉस्टिक प्रोडक्शंस और टीम द्वारा स्थापित तकनीक और एलईडी विजुअल की सहायता से “सीता अपहरण” से लेकर “रावण वध” तक के अनुक्रम को दर्शाया गया।
सभागार कथकबीट्स के प्रतिभाशाली छात्रों के लिए गर्व और प्रशंसा से भर गया, जो बैंगलोर, चेन्नई, उदयपुर, सूरत और नेपाल से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने मुंबई आए थे।

इस तरह जन्में श्रीकृष्ण भगवान

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(श्री आनंद बल्लभ गोस्वामी जी महाराज-विभूति फीचर्स)

लीला पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा में कंस के कारागार में हुआ।  प्रातः काल से ही रिमझिम- रिमझिम बरसात हो रही थी। श्री ब्रह्मा जी ने देवताओं को जिस प्रकार समझाया था उसी के अनुसार अष्टमी तिथि की प्रतीक्षा संपूर्ण सृष्टि कर रही थी। गायों के थन से स्वत: ही दुग्ध धारा प्रवाहित होने लगी। खानों से अचानक रत्न प्रकट होने लगे और स्वत: ही ऋषि मुनियों के यज्ञ कुंड से अग्नि प्रज्वलित होने लगी। धीरे-धीरे संध्याकाल हुई तो बरसात तीव्र गति से होने लगी। यमुना की हिलोरे तीव्र गति से प्रवाहित होने लगी। गरज गरज कल बिजली चमकने लगीअंततः सुंदर समय आ गया।

मध्यरात्रि ठीक बारह बजे कंस के कारागार में देवकी मैया के गर्भ से वसुदेव जी के आंगन में भगवान श्री कृष्ण का प्राकट्य हो गया।
ब्रह्मा जी सहित समस्त देवताओं ने भगवान की स्तुति की जिसे श्रीमद्भागवत में गर्भ स्तुति के नाम से जाना गया।
सत्यव्रतम सत्यपरम त्रिनेत्रन, सत्यस्य योनिम निहितं च सत्ये।
सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रम सत्यात्मकम त्वां शरणं ।।
स्तुति करके देवताओं ने प्रस्थान किया। इसके बाद भगवान ने वसुदेव जी एवं माता देवकी को समझाया कि किस प्रकार नंद बाबा के आंगन में भगवान कृष्ण को तथा मैया यशोदा की कन्या को कारागार तक पहुंचाना है, बाकी सब काम वे स्वयं कर लेगें। ।
समस्त पहरेदार सो गये, जेल के ताले अपने आप खुल गए तथा वसुदेव- देवकी की हथकड़ी और बेड़ियां अपने आप खुल गईं। श्री वसुदेव जी एक सूप में कन्हैयाजी को अपने सिर पर धारण करके, मथुरा की गलियों से होते हुए यमुना किनारे तक पहुंच गए। उस समय घनघोर गर्जना के साथ बरसात आरंभ हो गई। यमुना का जलस्तर भी हिलोरें मार कर बढ़ने लगा। श्री वसुदेव जी यमुना के जल में प्रविष्ट हो गये। धीरे-धीरे यमुना का पानी बढ़ने लगा यहां तक कि वसुदेव जी की दाढ़ी भी डूबने लगी। वसुदेव जी घबराकर विचार करने लगे कि कोई आ जाए और मेरे लाल को ले जाए। तभी भगवान ने अपने चरण सूप से नीचे लटका कर यमुना जल में स्पर्श कर दिए तो धीरे-धीरे यमुना महारानी नीचे होने लगी।वसुदेव जी आराम से नंद बाबा के आंगन में मैया यशोदा के कक्ष में प्रविष्ट हो गए।नंद बाबा और यशोदा से उनकी कन्या को साथ लेकर सीधे मथुरा में कारागृह में ले जाकर कन्या को देवकी को सौंप दिया। हथकड़ी और बेड़ियां अपने आप पुनः बंद हो, गई पहरेदार जाग गये। कन्या का रोना सुनकर कंस आया और ठहाका लगाकर हंसने लगा। कन्या का पैर पकड़कर कंस ने पत्थर पर पटक कर मारना चाहा तो कन्या आसमान में पहुंच गई। तभी आकाशवाणी हुई कि अरे दुष्ट कंस तू मुझे क्या मारेगा, तेरा मारने वाला तो ब्रज में जन्म ले चुका है।
उधर ब्रज में नंद बाबा के आंगन में बधाइयां बजने लगी। समस्त ग्वाल बाल और ब्रज की गोपियां यशोदा मैया तथा नंद बाबा को बधाइयां देने लगे । बोलिए कृष्ण कन्हैया लाल की जय।( लेखक श्रीमद् विष्णुस्वामीहरिदासीया संप्रदाय के आचार्य तथा ठाकुर श्रीबांकेबिहारीजी मंदिर, श्रीधाम वृंदावन के सेवायत हैं।)(विभूति फीचर्स)

मुख्यमंत्री मोहन दिलाएंगे मनमोहन मुरली वाले से मध्य प्रदेश को नई पहचान

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(पवन वर्मा-विनायक फीचर्स)

भगवान मनमोहन श्रीकृष्ण के कारण देश में अब तक मथुरा, वृंदावन, द्वारका, बेटद्वारका,नाथद्वारा,और महाभारत की युद्ध भूमि कुरुक्षेत्र खासे चर्चित और धार्मिक स्थल के रूप में विख्यात और विकसित हुए हैं।भगवान श्रीकृष्ण और मध्यप्रदेश की पावन भूमि का रिश्ता भी अटूट और अनंत हैं। जिसका उल्लेख विभिन्न धार्मिक ग्रंथों एवं पुराणों में भी विस्तार से मिलता है। भगवान मुरलीधर नंदकिशोर ने मध्यप्रदेश में लंबा समय बिताया, उनकी शिक्षा दीक्षा भी यहीं पर हुई लेकिन मध्यप्रदेश भगवान कृष्ण के उस अलौकिक समय को लगभग भूल ही गया था। अब समय बदल रहा है और यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि भगवान भूतभावन महाकाल(उज्जैन),ओंकार- मांधाता(ओंकारेश्वर) ,भगवान राम(ओरछा), देवी शारदा(मैहर),माता बगुलामुखी(नलखेड़ा, आगर मालवा) और मां पीताम्बरा (दतिया)के साथ ही अब भगवान श्रीकृष्ण मनमोहन मुरली वाले से भी मध्यप्रदेश को नई पहचान मिलने जा रही है।अब श्रीकृष्ण से भी मध्यप्रदेश जाना और पहचाना जाए इसका बीड़ा उठाया है मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव ने।

मध्यप्रदेश और योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण का बड़ा ही अद्भुत रिश्ता रहा है।।इसके कई जीवंत उदाहरण भी हैं। इस रिश्ते को और व्यापक प्रचार प्रसार देने के लिए प्रदेश में अब श्रीकृष्ण पाथेय प्रोजेक्ट की शुरूआत होने वाली है। इस दौरान भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं के स्थलों को मध्य प्रदेश सरकार तीर्थ स्थल के रूप में विकसित करने का निर्णय ले चुकी है।इस प्रोजेक्ट के जरिए श्रीकृष्ण के तीन हजार से ज्यादा मंदिरों का रख रखाव किया जाएगा।सांदीपनि गुरूकुल की पुनर्स्थापना भी की जाएगी। यह वह जगह है जहां पर भगवान श्रीकृष्ण ने शिक्षा प्राप्त की थी। इस गुरूकुल में 64 प्रकार की कलाओं की शिक्षा दी जाने की योजना प्रदेश सरकार की है। शिक्षा के अलावा संस्कृति पर भी यहां पर ध्यान दिया जाएगा। गुरुकुल में खेती से संबंधित कार्य होंगे, गोवंश का पालन पोषण भी यहां पर किया जाएगा। पौराणिक कथाओं और जानकारों के अनुसार सांदीपनि आश्रम के साथ ही इंदौर के जानापाव में भी भगवान श्रीकृष्ण आए थे। भगवान परशुराम की जन्मभूमि जानापाव में ही भगवान श्रीकृष्ण ने विनम्र भाव से भगवान परशुराम से सुदर्शन चक्र लिया था। मध्यप्रदेश में श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता हुई थी,इसके अलावा मध्यप्रदेश की महिदपुर तहसील के ग्राम नारायणा को कृष्ण-सुदामा मैत्री स्थल के रुप में जाना जाता है।यहीं के ग्राम चिरमिया में स्वर्ण गिरि पर्वत पर भी कृष्ण और सुदामा के चरण चिन्ह हैं।धार जिले के अमझेरा में रुक्मिणी हरण स्थल है। कहा जाता है कि यहां के अंबिकालय(अमका-झमका माता मंदिर) से भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी हरण किया था।यानि मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण के कई बार चरण पडे़।

उज्जैन में श्रीकृष्ण के दर्शन मात्र से यमलोक नहीं देखना पड़ता

स्कन्दपुराण में भी भगवान श्रीकृष्ण और उनके भाई बलराम का उल्लेख उज्जैन को लेकर मिलता है। स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड-आवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य के अंक पाद तीर्थ महिमा में इसका पूरा उल्लेख है। जिसमें बताया गया है कि अवन्ति जो अब उज्जैन है, में अंकपाद तीर्थ में भगवान श्रीकृष्ण और श्रीबलराम दोनों के दर्शन करने से मनुष्य को यमलोक नहीं देखना पड़ता। वह बैकुण्ठधाम में निवास करता है। क्षिप्रा में स्नान करने के बाद युगल अंक पादों (भगवान श्री कृष्ण के चरण चिन्ह)का दर्शन करके श्रीकृष्ण और बलराम का दर्शन किया जाता है।वैसे उज्जैनवासियों के अनुसार सांदीपनि आश्रम के नजदीक स्थित अंकपात नामक स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण अपनी अंक पट्टिका(स्लेट)धोते थे,यहां उनके अंक गिरे इसलिए यह स्थान अंकपात कहलाया।
अपने नाना के कहने पर आए थे उज्जैन
स्कन्दपुराण में यह भी उल्लेख है कि श्रीकृष्ण अपने नाना उग्रसेन के कहने पर विद्या अध्ययन के लिए उज्जैन आए थे। अंक पाद तीर्थ की महिमा में वर्णन है कि श्रीकृष्ण ने कंस और चाणूर को मारकर अपने नाना उग्रसेन का अभिषेक किया और पूछा, किअब मेरे लिए क्या आज्ञा है?इस पर राजा उग्रसेन ने कहा कि कृष्ण मेरा सब कार्य सिद्ध है, अब तुम दोनों कृष्ण और बलराम उज्जयिनी पुरी में जाकर विद्या पढ़ो। राजा का यह आदेश पाकर कृष्ण और बलराम आचार्य सांदीपनि मुनि के घर गए और उनसे विद्या ग्रहण की।
चौंसठ दिन-रात में सारा ज्ञान प्राप्त किया
स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड-आवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य के अंक पाद तीर्थ महिमा में यह भी वर्णन है कि श्रीकृष्ण और बलराम ने कितने दिन और रात में पूरा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। स्कन्दपुराण के अनुसार सांदीपनि आश्रम में जाकर उन्होंने चारों वेदों को कण्ठस्थ किया, सम्पूर्ण आचार-विचार का ज्ञान प्राप्त किया और रहस्य तथा संहार सहित धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त की और यह सारा ज्ञान मात्र चौंसठ दिन-रात में ही श्रीकृष्ण और बलराम ने प्राप्त कर लिया था।उस समय उज्जैन को अवंतिका के नाम से जाना जाता था और यहां पर राजमाता देवीराजा जयसिंह की पत्नी का शासन था। वासुदेव उन्हें अपनी मुंहबोली बहन कहते थे। इस हिसाब से वह श्री कृष्ण की बुआ थी। लगभग 5266 साल पहले श्री कृष्ण अपने भाई बलराम के साथ पैदल मथुरा से उज्जैन पहुंचे। उस समय उनकी उम्र 11 साल 7 दिन थी। 64 दिनों तक उन्होंने महर्षि सांदीपनि से 64 कलाएं सीखी। 4 दिन में चार वेद, 16 दिन में 16 विधाएं ,6 दिन में छह शास्त्र, 18 दिन में 18 पुराण और 20 दिन में उन्होंने गीता का समस्त ज्ञान प्राप्त कर लिया था।

भगवान महाकाल ने दिए थे साक्षात दर्शन
स्कन्दपुराण के इसी खंड़ में बताया गया है कि सांदीपनि मुनि ने श्रीकृष्ण और बलराम के ज्ञान प्राप्त करने के असम्भव और अलौकिक कर्म देखकर यह आभास किया कि साक्षात सूर्य और चंद्रमा उनके यहां पर आए हैं। इसके बाद वे अपने शिष्यों के साथ स्नान करने के लिए महाकाल तीर्थ में गए। इन शिष्यों में श्रीकृष्ण और बलराम भी थे। जब दोनों भाईयों ने भगवान महाकाल को प्रणाम किया तब महाकाल साक्षात प्रकट होकर बोले थे, तुम सम्पूर्ण देवताओं के स्वामी हो। अब तुम दोनों को मुनियों, सिद्धों और देवताओं का पालन करना चाहिए।

जनश्रुतियों के अनुसार उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा जी के साथ शिक्षा ग्रहण की थी।मध्यप्रदेश की महिदपुर तहसील के ग्राम नारायणा में भगवान श्रीकृष्ण व सुदामा का मैत्री स्थल है। इसी के समीप महिदपुर तहसील के ग्राम चिरमिया में स्वर्ण गिरी पर्वत स्थित है। धार्मिक व पौराणिक मान्यता के अनुसार गुरुमाता के आदेश पर श्रीकृष्ण व सुदामा भोजनशाला के लिए इसी स्वर्ण गिरी पर्वत पर लकड़ियां लेने आए थे।

इस तरह मध्यप्रदेश भी भगवान कृष्ण की लीलाओं का साक्षी रहा है और भगवान कृष्ण की ही यह अद्भुत लीला है कि अब यहां राम वन गमन पथ की तरह ही श्री कृष्ण पाथेय भी बन रहा है और इसे बनाने का भार उठाया है भगवान कृष्ण के ही एक लोकप्रिय नाम वाले मुख्यमंत्री मोहन यादव ने।(विनायक फीचर्स)