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आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद मरीजों का कम लागत पर इलाज करते हैं डॉक्टर एम डी पुजारी

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अब तक 5000 हजार से अधिक सफल सर्जरी कर चुके हैं स्पाइनल व न्यूरो सर्जन डॉक्टर एम डी पुजारी

मुम्बई। डॉक्टर एम. डी. पुजारी ब्रेन और स्पाइन सर्जन और कंसलटेंट है। डॉक्टर पुजारी पिछले 15 वर्षों से जरूरतमंद पेशेंट की स्पाइन सर्जरी और न्यूरो सर्जरी कर इलाज करते हैं।
डॉ पुजारी कहते हैं कि मुख्य रूप से ट्रस्ट हॉस्पिटल की सहायता से वह आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद मरीजों का कम लागत पर इलाज करते हैं। क्योंकि ब्रेन और स्पाइन से जुड़ी सर्जरी में इलाज का खर्च लगभग 8 से 10 लाख आता है जिसे कुछ मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार वहन नहीं कर पाते तो कुछ इलाज के आभाव में विकट परिस्थिति में चले जाते हैं। ऐसे ब्रेन और स्पाइन से बीमार व्यक्ति जिनको सर्जरी की आवश्यकता है किंतु उनका परिवार खर्च वहन नहीं कर पाता तो असहाय लोगों का न्यूनतम लागत या कभी निःशुल्क इलाज ट्रस्ट हॉस्पिटल की सहायता से डॉक्टर एम डी पुजारी कर देते हैं।

26 जनवरी 2024 को मुम्बई में डॉ पुजारी को सिंगर कुमार शानू और अवार्ड शो आयोजक व फिल्ममेकर डॉ कृष्णा चौहान ने राष्ट्रीय रत्न सम्मान 2024 की ट्रॉफी देकर सम्मानित किया है। डॉक्टर पुजारी ने अपनी एमबीबीएस की शिक्षा बीएलडीई मेडिकल कॉलेज बीजापुर कर्नाटक से की है। उन्होंने एमएस की डिग्री ग्रैंड मेडिकल कॉलेज जेजे हॉस्पिटल से प्राप्त की है और न्यूरो सर्जरी की डिग्री कोलकाता से प्राप्त की है। डॉ. पुजारी मुम्बई में कूपर हॉस्पिटल, जेजे हॉस्पिटल, होली फैमिली हॉस्पिटल जैसे कई ट्रस्टी हॉस्पिटलों में कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में वह होलीफैमिली हॉस्पिटल बांद्रा में कार्यरत हैं। डॉक्टर पुजारी बताते हैं कि उन्होंने अब तक लगभग 5000 से अधिक ब्रेन और स्पाइनल सर्जरी सफलतापूर्वक की है। उनका कहना है कि मरीज की आधी समस्या तो आपकी मोटिवेशनल बातों और हौसला दिलाने से ही ठीक हो जाती है बाकी दवाइयां ठीक करती है। डॉ पुजारी ने बताया कि उनके इलाज द्वारा 90 से 95% लोग आज भी स्वस्थ और अपने कार्यों में व्यस्त हैं। डॉक्टर बताते हैं कि बड़े हॉस्पिटलों पर ब्रेन सर्जरी और स्पाइन सर्जरी का खर्च बहुत अधिक आता है ऐसी स्थिति में मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार खर्च वहन करने में अयोग्य रहते हैं। डॉक्टर पुजारी न्यूनतम खर्च पर और कभी-कभी निशुल्क ब्रेन और स्पाइन से पीड़ित ऐसे व्यक्तियों की सर्जरी कर देते हैं। डॉक्टर पुजारी अपने परिवार में पहले डॉक्टर हैं और उनकी पत्नी भी डॉक्टर हैं। डॉक्टर ने बताया कि हर मरीज अपने डॉक्टर को भगवान समझता है लेकिन मेरा भगवान तो मेरे मरीज है, अगर मरीज मेरे इलाज से संतुष्ट है तो इससे बड़ी संतुष्टि और खुशी मेरे जीवन की कुछ और हो ही नहीं सकती।

डॉ पुजारी ने बताया कि लोग ब्रेन और स्पाइन सर्जरी करवाने से डरते हैं लेकिन ब्रेन, स्पाइन, हार्ट, स्ट्रोक और ब्लीडिंग जैसी समस्या आने पर हमें तुरंत नजदीकी अस्पताल पर संपर्क करना चाहिए। अच्छे अस्पताल की खोज में समय बर्बाद ना करते हुए पहले नजदीकी अस्पताल में जाये और प्रारंभिक इलाज करवायें अन्यथा स्थिति बिगड़ सकती है, फिर समस्या से जुड़े डॉक्टर से संपर्क करें यदि अस्पताल में डॉक्टर उपलब्ध ना हो तो स्थिति संभालने के बाद स्पेशलिस्ट डॉक्टर के पास जाएं। यदि कभी ब्रेन या स्पाइनल से जुड़ी समस्या है तो किसी न्यूरो सर्जन से तुरंत संपर्क करना चाहिए तथा अतिशीघ्र जाकर इलाज प्रारंभ कर देना चाहिए। लोग ब्रेन और स्पाइन से जुड़ी समस्याओं में डॉक्टर के पास जाने से डरते हैं कभी गिर गए या सिर पर चोट लग गई ऐसे समय में इलाज को नज़रअंदाज़ नहीं करनी चाहिए वरना समस्या गंभीर हो सकती है।
डॉक्टर ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि 95 साल के एक मरीज का उन्होंने सफल स्पाइन का सर्जरी किया है और आज वो 99 वर्ष की उम्र में स्वस्थ है, चल फिर रहा है। लोगों को स्पाइन की समस्या आती है तो यथाशीघ्र यदि इसका इलाज कर लिया जाए तो वह दूसरे के भरोसे नहीं रहेंगे और चल फिर सकेंगे और अपना कार्य कर सकेंगे। आपका साथ दूसरा कोई कुछ समय तक ही निभाएंगे। किसी पर आश्रित होकर रहना जीवन को अधिक कष्टकारी बना देता है इसीलिए अपनी बीमाती का शीघ्र इलाज कर आत्मनिर्भर बन सकते हैं और आपको सहारे की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। खासकर बुजुर्ग व्यक्ति जो स्पाइन की समस्या से जूझ रहे हैं उन्हें इलाज जल्द करवा लेनी चाहिए।
ब्रेन और स्पाइनल का इलाज करना काफी जोखिम भरा होता है लेकिन अब तक इन्होंने सफल सर्जरी किया है। जिसके लिए वह विज्ञान और भगवान दोनों का आभार मानते हैं।
एक तरफ सभी डॉक्टर को भगवान का दर्जा देते हैं, मगर डॉक्टर पुजारी कहते हैं कि मेरे मरीज ही मेरे भगवान है यदि वे स्वस्थ और प्रसन्न हैं तो इससे ज्यादा सुखद अनुभूति और कुछ नहीं। यही मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार है। मैं पैसों के लिए काम नहीं करता बल्कि ऐसे लोगों का उपचार करता हूं जिन्हें आर्थिक रूप से असक्षम होते हैं। क्योंकि सेवा ही परमधर्म है।
डॉक्टर ने आगे बताया कि अपने 15 साल के करियर पर उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखें हैं। कई मरीज जब स्वस्थ होकर तीन-चार महीने बाद उनके पास आते हैं तो वह उनको पहचान भी नहीं पाते क्योंकि ऑपरेशन के समय को उनके सिर का मुंडन कर दिया जाता है और जब तीन-चार महीने बाद उनके घने बाल आते हैं तो मैं पहचान भी नहीं पता। कुछ मरीज केवल मुझसे मिलने और बात करने आते हैं तो यह देखकर एक सुखद अनुभूति होती है और मैं सदैव भगवान का स्मरण कर प्रार्थना करता हूँ कि प्रभु आपके आशीर्वाद से लोग स्वस्थ हो पाये।

– गायत्री साहू

संदेशखाली के संदेशों को सुना जाना आवश्यक

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डॉ वंदना गाँधी –
माँ,माटी और मानुष के नारे के साथ पश्चिम बंगाल में स्थापित हुई सर्वभारतीय तृणमूल कांग्रेस के ‘राज’ में माँ, माटी और मानुष तीनों बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। माँ काली को प्रथम देवी के रूप में पूजने वाली इस संस्कृति में महिलाओं की स्थिति संदेशख़ाली की घटनाओं से ही उजागर हुई है। राज्य सरकार संरक्षित नेताओं द्वारा किए जा रहे श्रृंखलाबद्ध अत्याचारों के बारे में इससे पहले देश दुनिया को पता भी न था कि कालिंदी नदी के इस तटीय क्षेत्र में महिलाएँ योजनाबद्ध षडयंत्र के तहत किए जा रहे हैं दैहिक शोषण का शिकार हो रही थीं।
किसानों और महिलाओं के साथ जो अत्याचार पूर्ववर्ती लेफ़्ट सरकार के लोग पश्चिम बंगाल में करते रहे उसे तृणमूल कांग्रेस ने और आगे ही बढ़ाया है। तृणमूल जो ‘सर्वभारतीय’ शब्द को छोड़ बैठी है और तुष्टीकरण की नीति के साथ माफ़िया समूह के साथ ‘राज’ कर रही है इसीलिए महिलाओं के शोषण की आवाज़ को दबाया जाता रहा। माफ़िया और गुंडों को सरकारी संरक्षण कितना अधिक है इसका पता इसी बात से लगता है कि हज़ारों करोड़ के घोटाले और महिलाओं के साथ जघन्य अत्याचार के आरोपी अपने जिला स्तर के एक कार्यकर्ता को पकड़ने में ही राज्य की पुलिस 55 दिन लगा देती है। बहरहाल  संदेशख़ाली की घटना समाज को कई संदेश दे रही है जिन्हें सुनना और अमल में लाया जाना आवश्यक है।
पश्चिम बंगाल के संदेशख़ाली क़स्बे का सच तब दुनिया के सामने आया जब आठ फ़रवरी को क्षेत्र की महिलाओं ने बड़ा प्रदर्शन किया। झाड़ू और लाठी हाथ में लेकर ये महिलाएँ इस ‘भद्रदेश’ में अपने साथ लंबे समय से किए जा रहे जघन्य दैहिक शोषण के विरुद्ध प्रदर्शन करने सड़क पर उतरी थीं। यह प्रतिरोध भी शायद सामने न आ पाता यदि पाँच जनवरी के ईडी पर हमले के घटनाक्रम के बाद मामले का मुख्य आरोपी शाहजहाँ शेख यहाँ से फ़रार न हुआ होता। तृणमूल कांग्रेस का नेता शाहजहाँ शेख़ लगभग 10,000 करोड़ रुपए के मनरेगा और राशन वितरण घोटाले का आरोपी है। इसी आर्थिक अपराध की जाँच करने के लिए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम ने पाँच जनवरी को संदेशखाली में शाहजहाँ शेख़ के आवास पर छापा मारा था। तब सत्ता संरक्षित इस माफ़िया के गुंडों ने ईडी की टीम पर हमला कर उसके अधिकारियों को घायल कर मार भगाया था।
शाहजहाँ तृणमूल में कितनी हैसियत रखता है इसे इस बात से समझा जा सकता है कि ईडी पर हमले के बाद भी तृणमूल शाहजहाँ शेख का बचाव ही कर रही थी। शाहजहाँ का आतंक इतना ज़्यादा था कि उसके फ़रार होने के लगभग एक महीने बाद पीड़ित महिलाएँ अपनी आपबीती बताने का साहस जुटा सकीं। इन महिलाओं का दर्द है कि संदेशख़ाली क्षेत्र में ऐसी कौन महिला है जिसकी इज़्ज़त को शाहजहाँ शेख और उसके गुंडों शिवप्रसाद हज़ारा व उत्तम सरदार के हाथों तार-तार न किया गया हो। कभी बांग्लादेश से अवैध रूप से घुसपैठ करके आया शाहजहाँ एक मज़दूर हुआ करता था लेकिन तत्कालीन सत्ताधारी लेफ़्ट पार्टी का कार्यकर्ता बनने के बाद उसने उन्हीं किसानों की ज़मीनों पर क़ब्ज़े शुरू कर दिए लेफ़्ट पार्टी जिनके दम पर बंगाल में शासन करती थी और ख़ुद को उनकी सबसे बड़ा हमदर्द बताती थी। वह किसानों से ज़मीन बटाई पर लेता और उसमें खारा पानी भर के झींगा मछली का उत्पादन करता। इससे मोटी कमाई होती लेकिन किसान के खेत खारे पानी से बंजर हो जाते थे। तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद 2012 में शाहजहाँ शेख़ ने तृणमूल कांग्रेस ज्वाइन कर ली। इसके बाद ‘ऊपर तक पहुँच का फ़ायदा उठाकर’ उसने अपने आतंक और ज़मीन क़ब्ज़ाने के काम को और ज़्यादा तेज कर दिया। किसानों को दबाए रखने के लिए उसने संदेशख़ाली की स्त्रियों पर अपनी बुरी नज़र डालनी शुरू कर दी।
कभी पीठापुली (बंगाल का एक ख़ास पकवान जो चावल के आटे में खोया भरकर बनाया जाता है) बनाने के नाम पर महिलाओं को ज़बरन उनके घरों से उठाकर शाहजहाँ के यहाँ ले जाया जाता। इसके बाद पार्टी मीटिंग के नाम पर उन्हें बुलाया जाने लगा। महिलाओं और उनके परिवारजनों के पास न कह पाने का कोई विकल्प नहीं रहता क्योंकि ऐसा करने पर शाहजहाँ के गुंडे आकर महिलाओं और परिवार के लोगों से बर्बरता के साथ मारपीट करते। महिलाओं ने जो व्यथा बतायी है उसके मुताबिक़ सुन्दर स्त्रियों को छाँट-छाँट कर जबरन उठवा लिया जाता। रात में पार्टी मीटिंग के नाम पर गाँव वालों को पार्टी ऑफ़िस में बुलाया जाता और वहीं कुछ महिलाओं को छांटकर अंदर ले जाया जाता फिर दरवाज़े बंद करके जो किया जाता अब भी कोई महिला उसे बताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। संदेशख़ाली और उसके आस पास के क्षेत्र की महिलाएं सालों से शाहजहाँ और उसके गुंडों की इस बर्बरता के दर्द से गुज़र रही थीं। पुलिस में शिकायत करने पर पुलिस कार्रवाई करने की बजाय उलटे कहती कि जाकर शाहजहाँ से समझौता कर लो। इस प्रकार राज्य संरक्षित गुंडों के आतंक को ये महिलाएँ और उनके परिजन अपने भीतर ही ज़ब्त किए रहे।
संदेशख़ाली में महिलाओं और किसानों के साथ हुए अत्याचारों के इस घटनाक्रम में महत्वपूर्ण संदेश छिपे हुए हैं। इससे पश्चिम बंगाल में राज्य संरक्षित गुंडों के सालों से चले आ रहे आतंक की ख़बर तो मिलती ही है साथ ही पता चलता है कि यह राज्य कितनी अराजकता का शिकार है। ऐसे में सभी राजनीतिक दलों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शासन, पुलिस और विशेष रूप से महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का दायित्व है कि वे यह पता करें कि कहीं ऐसे और संदेशख़ाली तो नहीं जहाँ शाहजहाँ शेख़ और उसके गुंडों जैसे बर्बर नरपिशाच तो नहीं पनप रहे। इस घटनाक्रम से यह भी संदेश लिया जा सकता है कि स्त्री सम्मान किसी एक राजनीतिक संगठन का ही दायित्व नहीं है बल्कि यह सभी की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। यह प्रश्न इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि संदेशख़ाली मामले में केवल भारतीय जनता पार्टी और सामाजिक सांस्कृतिक राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रतिरोध ही सामने आया है, माँ,माटी और मानुष की बात करने वाली तृणमूल कांग्रेस तो इस अतिसंवेदनशील मामले को दबाने में ही लगी रही। आरोपी शाहजहाँ को हिरासत में लेने में पश्चिम बंगाल पुलिस को 55 दिन लग गए। कोलकाता हाईकोर्ट के आदेश के बाद उसे हिरासत में लिया जा सका। इसके बावजूद तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता ने प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में यहाँ तक कहा कि हिरासत में लिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि कोई अपराधी साबित हो गया है। इस मामले में अन्य राजनीतिक दलों की चुप्पी भी ख़तरनाक है। महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का चुप भी यह बताता है कि वे कितने सिलेक्टिव हैं। जबकि इस घटनाक्रम का सीधा संदेश है कि ऐसे बर्बर स्त्री विरोधी आतंकी मानसिकता वाले लोगों के साथ निपटने में सब को एक साथ खड़े होना चाहिए।
संदेशख़ाली का एक संदेश यह भी है कि पुलिस, प्रशासन और राज्य का जनता के प्रति क्या दायित्व होना चाहिए। क्या ये संस्थाएं किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं का बचाव करने के लिए हैं या जनता के अधिकारों की रक्षा करने के लिए हैं? इसकी पड़ताल कौन कर रहा है कि हमारे समाज में ऐसे शाहजहाँ शेख तो नहीं पल रहे हैं। यदि कहीं ऐसा हो रहा है तो अब दलगत राजनीति, भेदभाव और व्यक्तिगत लाभ-हानि छोड़कर पूरे समाज को साथ आने की आवश्यकता है जिससे ऐसा तीव्र प्रतिरोध खड़ा किया जा सके कि देश में कहीं दूसरा संदेश ख़ाली न बन सके और कोई शाहजहाँ किसानों और स्त्रियों के साथ ऐसी बर्बर हरकत करने के बारे में सोच भी न सके।(विनायक फीचर्स)

दुर्गम क्षेत्र के गांव को गोद लेने की अपील – मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी

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देहरादून,5 मार्च,मंगलवार को सचिवालय में विभिन्न देशों में निवास कर रहे प्रवासी उत्तराखण्डियों से वर्चुअल संवाद करते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रवासियों को विदेशों में उत्तराखण्ड का ब्रांड अम्बेसडर बताया। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रवासी उत्तराखण्ड वासियों ने अपनी मेहनत, लगन एवं बौद्धिक क्षमता से उत्तराखण्ड के बाहर देश-विदेश में अपनी पहचान बनायी है। उन्होंने सभी से अपेक्षा की कि वे अपनी जन्म भूमि के किसी दुर्गम क्षेत्र के गांव को गोद लेकर उसके समग्र विकास में सहयोगी बनें। इसमें राज्य सरकार भी सहयोगी रहेगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रवासी उत्तराखण्डवासियों के सहयोग एवं सहायता के लिये पूर्व में प्रवासी सेल बनाया गया था। इसे और अधिक सुविधा युक्त बनाये जाने के लिये शीघ्र ही प्रवासी उत्तराखण्ड बोर्ड का भी गठन किया जायेगा। साथ ही प्रवासी भारतीय दिवस की भांति राज्य में देश व विदेशों में रहने वाले प्रवासियों का सम्मेलन आयोजित किया जायेगा ताकि उनके विचार एवं सुझावों पर चिन्तन एवं मनन किया जायेगा। इस मंथन से निकलने वाला अमृत निश्चित रूप से देश व प्रदेश के विकास में फलीभूत होगा।

संवाद के दौरान मुख्यमंत्री ने आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, चीन, अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस सहित 12 देशों में रह रहे 22 प्रवासी उत्तराखण्डियों के विचार व सुझाव जाने। मुख्यमंत्री ने सभी के सुझावों पर आवश्यक कार्यवाही का आश्वासन देते हुए प्रदेश हित में संचालित योजनाओं की जानकारी भी साझा की। सभी प्रवासियों ने प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, सूचना तकनीकि आदि के क्षेत्र में सहयोग का भी आश्वासन मुख्यमंत्री को दिया। सभी प्रवासी लोग अपने पैतृक क्षेत्रों से जुड़ने के लिये भी उत्साहित नजर आये ताकि उनकी भावी पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ सके।

संवाद के दौरान जिन्होंने अपने सुझाव रखे उनमें आस्ट्रेलिया से सुरेन्द्र सिंह रावत, न्यूजीलैण्ड से जोत सिंह बिष्ट, चीन से श देव रतूड़ी, अमेरिका से शैलेश उप्रेती, जापान से इंदिरा भट्ट, यू.के. से मनीष जुगराण, थाईलैंड से चन्द्रशेखर सिलोड़ी, सिंगापुर से सुनील थपलियाल, फ्रांस से उत्तम रावत, ओमान से राकेश बेलवान प्रमुख रहे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि अब राज्य का युवा रिवर्स माइग्रेशन की ओर बढ़ रहा है। स्वरोजगार के प्रति ध्यान दे रहा है। इसके लिये राज्य सरकार द्वारा अनेक योजनायें भी संचालित की हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में आयोजित वैश्विक निवेश सम्मेलन में 50 से अधिक देशों के उद्यमियों ने प्रतिभाग कर प्रदेश में उद्योग व व्यापार इच्छा जताई है। अब तक 71 हजार करोड़ की ग्राउंडिंग हो चुकी है। राज्य में भी उद्योग की स्थापना से युवां को रोजगार के और अधिक अवसर उपलब्ध होंगे। मुख्यमंत्री ने प्रवासियों से अपेक्षा की कि देवभूमि उत्तराखण्ड आपके पूर्वजों की पैत्रिक भूमि है। आपकी भावी पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे इसके लिये भी प्रयासरत रहने की उन्होंने जरूरत बतायी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कुशल नेतृत्व में देश व दुनिया में भारत का मान- सम्मान बढ़ा है। भारतीयों को विदेशों में आदर व सम्मान से देखा जा रहा है।
कोरोना महामारी के बावजूद देश की अर्थ व्यवस्था 11 वीं से 5वी में रही।
इस अवसर पर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी ने सभी प्रवासियों को धन्यवाद दिया।
उन्होंने कहा कि सभी प्रवासी विकसित भारत के साथ विकसित उत्तराखण्ड में अपना योगदान दें।
इस कार्यक्रम में प्रमुख सचिव आर.के. सुधांशु, पुलिस महानिदेशक अभिनव कुमार, सचिव शैलेश बगौली, विनय शंकर पाण्डेय, नीरज खैरवाल सहित अन्य अधिकारीगण भी उपस्थित थे।

भारत सरकार के पूर्व उपसचिव बसंत कुमार मछलीशहर लोकसभा सीट से भाजपा के प्रबल दावेदार।

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जौनपुर। आज हम उत्तर प्रदेश मे मछली शहर लोक सभा सीट से भाजपा के ऐसे प्रबल दावे दार की बात कर रहे है जो शिक्षित, सक्षम्, मेहनती, मृदुभाषी होने के बावजूद भाजपा से लगातार इसलिए वंचित किये जाते रहे है क्योकि वे जिस बिरादरी से संबंध रखते है उसे बसपा का पारंपरिक वोट माना जाता रहा है पर अपनी राष्ट्रवादी सोच के कारण उन्होंने बसपा की ओर से पार्टी जॉइन करने के ऑफर को ठुकरा दिया और एक दशक से अधिक समय से भाजपा मे एक कार्यकर्ता के रूप मे लगे हुए हैं। हम बात कर रहे है जनपद जौनपुर के ग्राम पिपरा के निवासी व भारत सरकार के पूर्व उपसचिव व एन डी ए 1 सरकार मे एम एस एम ई मंत्रालय में सलाहकार रहे बसंत कुमार की।
उन्होंने सरकारी सेवा से स्वैक्षिक सेवा निर्वित्ति के पश्चात् वर्ष 2011 मे सदस्यता ग्रहण की तथा भाजपा के   वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र के सानिध्य मे हिंदुत्व व राष्ट्रवाद के विषय को गहराई से जाना और भाजपा के नीतियों और कार्यक्रमो के प्रचार प्रसार में कड़ी मेहनत की और 2011 मे लाल कृष्ण अडवाणी और कलराज मिश्र के नेतृत्व मे जन स्वाभिमान यात्रा मे पूरे प्रदेश का भ्रमण किया।
जब वर्ष 2014 मे कलराज मिश्र देवरिया से चुनाव लड़ रहे थे तो बसंत कुमार की कड़ी मेहनत की और पूरे क्षेत्र मे अपनी मौजूदगी का एहसास कराया और पूरे क्षेत्र में उन्हे कलराज मिश्र का करीबी कहा जाता था और जब नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल मे कलराज मिश्र एम एस एम ई मंत्री बनाये गए तो बसंत कुमार को इस मंत्रालय मे सलाहकार बनाया गया।
एक लेखक के रूप मे उन्होंने निम्न किताबे लिखी 1- राष्ट्रवादी कर्म योगी 2- हिंदुत्व एक जीवन शैली 3- युवाओ के प्रेरणा स्रोत स्वामी विवेकानंद 4- एकात्म वाद भाजपा का संकल्प 5- भारत में उदयमिता 6- आंबेडकर और राष्ट्रवाद इन पुस्तको का लोकार्पण भाजपा के शिखर पुरुष लाल कृष्ण अडवाणी, डा मुरली मनोहर जोशी, राज नाथ सिंह, कलराज मिश्र, डा सत्य नारायण जटिया, योगी आदित्यनाथ आदि महान व्यक्तियों द्वारा किया गया। इसके अतिरिक्त वे जाने माने स्तंभकार है, उनके द्वारा लिखे गए स्तंभ प्रति सप्ताह प्रमुख दैनिक अखबरो व पत्र पत्रिकाओं मे प्रकाशित होते रहते हैं जिनमे बड़ी बेबाकी से अपने विचार रखते हैं।
उनके पिता गुरु प्रसाद(बड़े बाबू) प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने अपनी कालेज शिक्षा वर्ष 1941 मे कठिन परिस्थितियों में पूरी की,क्योकि उस समय कालेज मे शिक्षा प्राप्त करना सिर्फ सवर्ण जमीदारो का एकाधिकार होता था, शिक्षा के प्राप्त 1946 मे भारत सरकार मे डाक तार विभाग मे बिना आरक्षण के नौकरी प्राप्त की। उनके देहांत के 7 वर्ष बाद भी क्षेत्र के लोग गुरु प्रसाद ( बड़े बाबू) का नाम बड़ी श्रद्धा से लेते है।अपने पिता की भाति बसंत कुमार ने भी शिक्षा मे टापर रहे और मड़ियाहु महाविधालय में वर्ष 1977-78 मे टाॅपर होने के कारण कालेज छात्र यूनियन मे प्रतिनिधि के नाम से मनोनीत किये गए। वे हमेशा इस बात के पक्ष धर रहे कि आरक्षण का लाभ वंचित समाज के निर्धन व्यक्तियों को ही मिले और जो लोग एक बार आरक्षण का लाभ लेकर संपन्न हो चुके है,उन्हे अपने बच्चो के लिए आरक्षण का लाभ स्वत: छोड़ देना चाहिए जिससे उसका लाभ वंचित समाज के निर्धनों को मिल सके, अपनी इसी सोच के कारण उन्होंने अपने दोनों बेटो को दिल्ली के टॉप की शिक्षण संस्थाओ मे शिक्षा दिलाई और आरक्षण का लाभ लेकर आईएएस या आईपीएस बनाने के बजाय ऐसी फील्ड चुनी जहा आरक्षण का ठप्पा न हो,उनका बड़ा बेटा अजीत रंजन दिल्ली क्रिकेट टीम का प्रतिनिधित्व करने के बाद इंग्लैंड मे काउंटी क्रिकेट खेल रहा है,जबकि छोटा बेटा विनीत रंजन सर्वोच्च् न्यायालय मे एडवोकेट है।
बसंत कुमार एक पहल नामक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव है और अपनी संस्था के माध्यम से वंचितो और निर्धनों की शिक्षा और रोजगार मे मदद करने के लिए तत्पर रहते है। वे विधायक या सांसद न होते हुए भी मछली शहर ( जौनपुर) के लोगो की मदद हर समय करते हैं चाहे वह दिल्ली मे काम हो या मछली शहर मे। बसंत कुमार की विशेषता जो उन्हे अन्य लोगो से अलग रखती हैं कि वे अपने प्रतिद्वंदियों को भी दिल्ली मे बड़े राष्ट्रीय नेताओ से मिलाने में कोताही नही करते।
ऐसे सरल स्वभाव के बहुमुखी प्रतिभा के धनी व विद्वान लेखक बसंत कुमार को भाजपा अपना प्रत्याशी बनती है,तो भाजपा की भारी मतो से जीत होगी और क्षेत्र मे चहुंमुखी विकास होगा।

प्रधानमंत्री श्री मोदी ने पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास को नया आयाम दिया है : श्री मुंडा

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NEW DELHI – केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री अर्जुन मुंडा ने आज आईएआरआई, दिरपई चापोरी, गोगामुख, असम में प्रशासनिक-सह- शैक्षणिक भवन, मानस गेस्ट हाउस, सुबनसिरी गर्ल्स हॉस्टल और ब्रह्मपुत्र बॉयज हॉस्टल का वर्चुअल माध्यम से उद्घाटन किया। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री श्री कैलाश चौधरी उद्घाटन समारोह में उपस्थित थे और उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, असम में प्रदर्शनी स्टाल का दौरा किया।

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केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास पर विशेष बल है।  उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर राज्यों में कृषि के विकास की कमियों को दूर कर उन्हें मुख्यधारा में लाने का काम किया है। इस क्रम में  प्रधानमंत्री ने पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास को एक नया आयाम दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार 2047 तक देश को विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प के साथ काम कर रही है, जिसमें कृषि की भूमिका बेहद अहम है। श्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि खाद्य तेल आयात का बोझ कम करने और तिलहन में आत्मनिर्भर बनने के लिए 11 हजार करोड़ रुपये का मिशन चलाया जा रहा है। हमें इस सोच के साथ काम करना है कि आने वाले दिनों में हम आयात नहीं बल्कि निर्यात करेंगे। उन्होंने कहा कि जब हम एक विजन के साथ काम करते हैं, तो हमें सफलता जरूर मिलती है।

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श्री अर्जुन मुंडा ने जलवायु अनुकूल फसल किस्मों के विकास पर भी बल दिया और कहा कि कृषि शिक्षा को आजीविका व रोजगार के अवसरों से जोड़ा जाना चाहिए।  श्री मुंडा ने कहा कि जैव विविधता अध्ययन पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि एक साल में यह संस्थान शोध के लिए सबसे पसंदीदा विकल्प होगा। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि प्रौद्योगिकियों को जलवायु और लैंगिक स्तर पर तटस्थ होना चाहिए।

 

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राज्य मंत्री श्री कैलाश चौधरी ने वैज्ञानिकों से उत्तर पूर्व क्षेत्र में मौजूद प्राकृतिक विविधता का दोहन करने का आग्रह किया।  उन्होंने प्रकृति के करीब प्रौद्योगिकियों के विकास पर भी बल दिया और कहा कि हमें जैविक और प्राकृतिक खेती से जुड़ना चाहिए। उन्होंने दलहन और तिलहन से संबंधित अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित करने पर बल दिया, ताकि देश को दालों के निर्यात पर बहुत अधिक पैसा खर्च न करना पड़े। उन्होंने कहा कि कृषि अनुसंधान को उद्यमिता से जोड़ना होगा; और यह सब तभी संभव है जब विभिन्न संगठनों के बीच विचारों का मुक्त आदान-प्रदान हो।

 

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असम सरकार के शिक्षा, सामान्य जनजाति और पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री डॉ. रनोज पेगु ने आईएआरआई, असम के प्रयासों की सराहना की।  उन्होंने इस बात पर बल दिया कि आईएआरआई, असम द्वारा किया जाने वाला शोध कार्य पौधों, पशुओं और मत्स्य विविधता पर विचार करने के साथ-साथ पर्यावरण के संरक्षण में भी सहायक होगा।

 

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लखीमपुर के सांसद श्री प्रदान बरुआ ने कहा कि यह हमारा स्वप्न था कि असम में इस स्तर का एक संस्थान बने। हमें आशा है कि यह संस्थान पूरे उत्तर-पूर्व भारत के युवा प्रतिभाओं की उम्मीदों पर खरा उतरेगा।

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डीएआरई के सचिव और आईसीएआर नई दिल्ली के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने वर्चुअल माध्यम से उपस्थितजनों को संबोधित किया और आईएआर आई असम के उद्देश्यों व दायित्वों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि उत्तर-पूर्व भारत में अपार संभावनाएं हैं, जिन्हें अनुसंधान और विकास के माध्यम से तलाशने की जरूरत है। उन्होंने आश्वासन दिया कि आईसीएआर यह सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा कि संस्थान तेजी से प्रगति करता रहे। इस संस्थान का खुलना आईसीएआर के इतिहास में एक यादगार दिन है। उन्होंने संस्थान के विकास से जुड़े लोगों को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी।

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आईएआरआई के निदेशक डॉ. ए.के. सिंह ने आईएआरआई, असम की श्रमिक समिति द्वारा किए गए सभी प्रयासों की सराहना की।  इस अवसर पर डॉ. डी.के.सिंह, डॉ. अनिल सिरोही, डॉ. मनोज खन्ना, डॉ. अनुपम मिश्रा, भार्गव शर्मा, डॉ. वाई.एल.सिंह, डॉ. के.बी.पुन, श्री अंकुर भराली और धेमाजी के जिला कमिश्नर भी उपस्थित थे।

2030 तक प्राकृतिक गैस की खपत में तीन गुना वृद्धि होगी: पेट्रोलियम मंत्री

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New Delhi शहरी  गैस वितरण (सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन-सीजीडी) नेटवर्क के विकास के लिए देश के क्षेत्र में 100% कवरेज प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड (पीएनजीआरबी) ने आज यहां  सीजीडी बोली के 12वें दौर के लिए आयोजित एक समारोह की मेजबानी की। इस कार्यक्रम का उद्घाटन पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस और आवास और शहरी मामलों के मंत्री श्री हरदीप सिंह पुरी ने प्रधानमंत्री के सलाहकार श्री तरूण कपूर, पीएनजीआरबी के अध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार जैन, बोर्ड के सदस्यों और पीएनजीआरबी के सचिव की उपस्थिति में किया। इसमें देश के तेल और गैस क्षेत्र के प्रमुख हितधारकों और 12वें सीजीडी बोली दौर के सफल बोलीदाताओं की बड़ी उपस्थिति थी।

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस तथा आवास और शहरी मामलों के मंत्री श्री हरदीप सिंह पुरी सफल बोलीदाताओं को आशय पत्र वितरित करते हुए

इस के दौरान, श्री हरदीप सिंह पुरी ने सीजीडी बोली के 12वें दौर के सफल बोलीदाताओं को उनके संबंधित भौगोलिक क्षेत्रों के लिए आशय पत्र वितरित किया। मंत्री महोदय ने एक सुदृढ़ तेल और गैस बुनियादी ढांचे के निर्माण की दिशा में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (एमओपीएनजी), पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड (पीएनजीआरबी) और सफल बोलीदाताओं के प्रयासों को स्वीकार किया। मंत्री महोदय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि सरकार ने अंतिम उपभोक्ता को स्थिर मूल्य पर प्राकृतिक गैस उपलब्ध कराने के लिए अगले छह वर्षों में प्राकृतिक गैस क्षेत्र में 67 बिलियन अमेरिकी  डॉलर का निवेश करने का लक्ष्य रखा है। उन्होंने आगे कहा कि हाल के वर्षों में देश में प्राकृतिक गैस को बढ़ावा देने के लिए नीति और नियामक ढांचे के माध्यम से सहायता प्रदान की गई है।

श्री पुरी ने बताया कि सरकार द्वारा नियोजित वर्तमान मौजूदा उपायों से प्राकृतिक गैस की खपत में 2030 तक तीन गुना यानी 185 मिलियन मीट्रिक मानक घन मीटर प्रति दिन(एमएमएससीएमडी) से 500 एमएमएससीएमडी तक वृद्धि होगी और इससे प्राकृतिक गैस पर निर्भर सहायक उद्योगों को बढ़ावा देने में भी मदद मिलेगी। मंत्री जी ने एकीकृत टैरिफ सुधार लाने के लिए पीएनजीआरबी की सराहना की, जिससे विशेष रूप से देश के दूर-दराज के क्षेत्रों के ग्राहकों को लाभ होगा।

12वें सीजीडी बोली दौर के बारे में विस्तार से विवरण देते  हुए  मंत्री महोदय ने कहा कि 12वें बोली दौर में पूर्वोत्तर के 06 राज्यों- अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, नागालैंड, सिक्किम और मिजोरम और 2 केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू और कश्मीर लद्दाख को कवर करते हुए कुल 8 भौगोलिक क्षेत्रों का प्रस्ताव किया गया था। इस दौर में कुल मिलाकर 103 जिले शामिल हुए। उन्होंने कहा कि  “इस दौर के बाद, पूरे देश में (द्वीपों को छोड़कर) सिटी गैस वितरण नेटवर्क के विकास के लिए प्राधिकरण प्रदान किया जाएगा।” उन्होंने कहा कि 12वें सीजीडी बोली दौर के लिए अनुमानित निवेश रु. 41,000 करोड़ से रोजगार के बड़े अवसर पैदा हो रहे हैं।

देश के प्राकृतिक गैस बुनियादी ढांचे की  एक तात्कालिक त्वरित झलक देते हुए, मंत्री महोदय ने कहा कि देश में 33,753 किलोमीटर से अधिक प्राकृतिक गैस ट्रंक पाइपलाइन अधिकृत हैं, जिनमें से लगभग 24,623 किलोमीटर पाइपलाइन वर्तमान में चालू हैं। उन्होंने कहा कि देश में 300 भौगोलिक क्षेत्र  (जीएएस अधिकृत हैं, जो सीजीडी नेटवर्क के विकास के लिए 98% जनसंख्या  और 88% क्षेत्र को कवर करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि “देश में अब तक 1.21 करोड़ घरेलू पीएनजी कनेक्शन और 6,258 सीएनजी स्टेशन स्थापित किए गए हैं और यह सब भारत के मजबूत गैस ग्रिड के कारण संभव हो सका है।

जन समुदाय को संबोधित करते हुए, पीएनजीआरबी के अध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार जैन ने पूरे देश में एक जीवंत और टिकाऊ गैस बुनियादी ढांचे के निर्माण पर वर्तमान फोकस को स्पष्ट किया जिसमे इन राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए इस बोली दौर की शुरुआत इन क्षेत्रों के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर स्वच्छ ईंधन प्रदान करने के लिए एक रणनीतिक कदम को दर्शाती है। डॉ. जैन ने आगे बताया कि इन राज्यों में कंप्रेस्ड नेचुरल गैस- सीएनजी) की अत्यधिक संभावनाएं हैं। इस संबंध में, पूर्वोत्तर गैस ग्रिड और गुरदासपुर-जम्मू प्राकृतिक गैस पाइपलाइन का विकास, जिन्हें अब अधिकृत किया गया है, प्राकृतिक गैस नेटवर्क के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

श्री तरूण कपूर ने बोली दौर में शहरी गैस वितरण (सीजीडी) पहल के माध्यम से पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड (पीएनजीआरबी) द्वारा की गई प्रभावशाली प्रगति की सराहना की। उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि 12वें सीजीडी बोली दौर के अंतर्गत प्रस्तुत किए गए भौगोलिक क्षेत्र (जीएएस) कठिन क्षेत्र हैं जिनके लिए उच्च पूंजी निवेश की आवश्यकता होगी। इसके अतिरिक्त, श्री तरूण कपूर ने यह भी कहा कि पीएनजी कनेक्शन और सीएनजी की कनेक्शन संख्या को और भी आगे बढ़ाने की आवश्यकता है और इसे प्राप्त करने के लिए उन्होंने वर्तमान उद्योगों को स्थिर और प्रतिस्पर्धी मूल्य प्रदान करके प्राकृतिक गैस में स्थानांतरित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। श्री तरूण कपूर ने यह भी साझा किया कि हाइड्रोजन मिश्रण या संपीड़ित बायो-गैस मिश्रण के साथ प्राकृतिक गैस के संयोजन का भी पता लगाया जाना चाहिए।

2014 तक, देश में सिटी गैस वितरण नेटवर्क के विकास के लिए केवल 57 भौगोलिक क्षेत्र अधिकृत थे। उसके बाद से  सीजीडी क्षेत्र में भारी वृद्धि हुई है और 12वें सीजीडी बोली दौर के सफल समापन के साथ, जिसमें 7 और भौगोलिक क्षेत्रों  (जीएएस)  को अधिकृत किया जा रहा है, पिछले 10 वर्षों में सीजीडी नेटवर्क के  विकास हेतु 250 जीए के अलावा, पूरे देश को सीजीडी नेटवर्क के विकास के लिए अधिकृत किया गया है।

पीएनजीआरबी की यह ऐतिहासिक उपलब्धि घरों के लिए स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन तक पहुंच प्रदान करने के साथ ही औद्योगिक और वाणिज्यिक सुविधाओं और ईंधन परिवहन का समर्थन करेगी और यह गैस आधारित अर्थव्यवस्था को प्राप्त करने की दिशा में एक बड़ी छलांग होगीI इससे देश के प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण में भी बहुत सहायता मिलेगी ।

महा शिवरात्रि पर विशेष – सुख समृद्धि कारक पारद शिवलिंग

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महर्षि डॉ.पं.सीताराम त्रिपाठी शास्त्री- 

पारद के पिरामिड, फेंगं शुई,श्रीयंत्र की स्थापना कराने से मनचाहा कार्य होता है परन्तु पारद शिवलिंग की स्थापना एवं आराधना से मनुष्य इस जीवन में भौतिक सुखभोग कर स्वर्ग में निवास करता है। महाशिवरात्रि के दिन पारे का शिवलिंग बनवाकर अपने घर पर विधि-विधान से स्थापित करने से मानवीय एवं दैविक शक्ति प्राप्त होती है।
वैसे समस्त देवताओं में सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले भगवान शिव है इसलिए उनका नाम आशुतोष भी है। शिवजी त्याग, सादगी, सरलता के साक्षात स्वरूप है। भोलेनाथ, अवढर दानी, अवधूत, परमवैरागी, महान योगी, महान दानी, कृपालु देवता, उदारता की सजीव प्रतिमा है। शिवलिंगों के रूपाकार में विभिन्न प्रतिमाओं का प्रभाव और प्राचीनता, यह सब इस तथ्य के प्रमाण है कि मानव-सभ्यता के आदि काल से ही शिवजी पूज्य रहे है। पारद शिवलिंग की यह पूजा एवं साधना, तंत्र साधना ही मानी जाती है। आप कहीं से भी शुद्घ, सिद्घ पारद शिवलिंग प्राप्त कर उस पर महाशिवरात्रि के दिन नियमित रूप से बिल्वपत्र चढावे तथा भगवान शिव के पंच्चाक्षर मंत्र ऊँ नम: शिवाय: का 11 माला जाप कर दुग्ध से अभिषेक करे।
आश्चर्यजनक फल उसी क्षण से साधक को मिलने लग जायेंगे। प्राण प्रतिष्ठा व 16 संस्कार युक्त पारद शिवलिंग होना चाहिये। शुद्घ पारे से तांत्रिक साधना द्वारा पारद शिवलिंग का निर्माण किया जा सकता है । भगवान शिव के दो रूप तत्काल सिद्घि प्रदान करने वाले है। ये रूप है पारद शिवलिंग, और जलमग्न शिवलिंग। काले पत्थर में जल का होना और उसके आधार में उपस्थित शिवलिंग महान फल प्रदान करने वाला होता है। अस्तु मेरा मुख्य बिन्दु पारद शिवलिंग है फिर भी जलमग्न शिवलिंग के दर्शन का महत्व धर्म शास्त्रों में कम नहीं है।;शताश्व मेघेन कृतेन पुप्यंगोकोटिमि:, स्वर्ण सहस्प्रदानात्ï’। ;नृणां भेवत्ï जलमग्नदर्शन मेन: यत्सर्वतीर्थ पु कृतामिषकात्’॥ अर्थात जो पुण्य 100 अश्वमेघ यज्ञ करने से, करोड़ों गोदान करने से, 1000 तोले के स्वर्ण दान करने से, तथा सभी तीर्थो के दर्शन सम्पन्न करने से प्राप्त होता है वह पुण्य जलमग्न शिवलिंग के दर्शन मात्र से सहज में ही प्राप्त हो जाता है। घर पर स्थापना की लीला ही अलग है। इसी प्रकार पारद शिवलिंग का महत्व है।
केदार दीनी लिंगनि, पृथित्यां यानि थानिचित्ï।
तानि दृष्टंवासु यत्पुण्यतत्पुण्यं रसदर्शनात्॥
अर्थात हिमालय में केदारनाथ आदि पवित्र तीर्थ स्थलों से लेकर पृथ्वी तल पर स्थित समस्त शिवलिंग तथा सम्पूर्ण भारत वर्ष में द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन से जो पुण्य मिलता है वही पुण्य फल पारद निर्मित शिवलिंग की घर में विधि-विधान से स्थापना व दर्शन मात्र से श्रावण माह एवं शिवरात्रि में सहज रूप से प्राप्त हो जाता है।
रसविधा, पराविधा, त्रैलोक्ये पिं च दुल्र्लभया।
भूक्ति-मुक्ति करी यास्यात्, तस्मात् यत्नेन गोपयेत॥
अर्थात जो पुण्य हजार स्वनिर्मित पार्थिव शिवलिंग के पूजन से प्राप्त होता है उससे करोड़ों गुना फल पारद शिवलिंग  के पूजन से प्राप्त होता है। रसविधा ही पारदविद्या कहलाती है। उड्ïडीश तंत्र भी यही कहता है कि पारद शिवलिंग भोग, मोक्ष, ऐश्वर्य का प्रदाता है। अत: मनुष्य को चाहिये कि श्रावण माह एवं महाशिवरात्रि पर पारद शिवलिंग स्थापित कर पूजन करे।
रसेन्द्र पारद: राज सूत: सूतराजच्च।
;शिवतेजो रस षप्त नामन्येनं रहस्य नं ॥
अर्थात रसेन्द्र, पारद, सूत, सूतराज, सूतक, शिव तेजरस ये सात नाम पारद के है। पारे से शिवलिंग बनाया जाय तो अपने आप में अद्ïभुत तेजस्वी तथा वर-दायक शिवलिंग बनता है। सही अर्थो में ऐसे शिवलिंग को ही पारदेश्वर शिवलिंग कहा जाता है। जहां पारद शिवलिंग होता है वहां केवल मात्र पारदेश्वर शिवलिंग ही नहीं होता अपितु भगवती लक्ष्मी, अन्नपूर्णा, कुबेर भी साथ में स्थापित हो जाते है।
ऐसे घर में लक्ष्मी पूर्ण रूप से चैतन्य होकर स्थापित हो जाती है और धन, धान्य, भूमि, भवन, कीर्ति, यश, दीर्घायु, पुत्र, पौत्र, वाहन और सम्पूण सिद्घियों के साथ लक्ष्मी का निवास उसके घर में होता है। स्वयं भगवान शिव कहते है..
पारदेश्वर स्थापित्यं लक्ष्मी सिद्घि तद् गृहें।
धनं धान्यं धरा पौत्रं पूर्ण सौभाग्य वै नर:॥
अर्थात जिसके घर में आठों संस्कारों से युक्त पारद से निर्मित पारदेश्वर शिवलिंग स्थापित होता है वहां मेरे साथ-
साथ कुबेर, विष्णु, लक्ष्मी, सौभाग्य, अवश्य मिलता है। वशिष्ठ जी ने अपने ग्रन्थ में कहा…
पारदेश्वर स्थापित्यं सर्व पाप विमुच्चते।
;सौभाग्यं सिद्घि प्राप्यन्ते पूर्ण लक्ष्मी नर:॥
अर्थात चाहे व्यक्ति ने कितने ही पाप किये हो, चाहे उसके जीवन में पूर्व जीवन कृत दोष हों चाहे विधाता ने उसके जीवन में पूर्ण सौभाग्य लिखा ही नहीं हो फिर भी यदि वह अपने घर में पारदेश्वर शिवलिंग को स्थापित करता है तो पूर्ण सौभाग्यशाली बन जाता है। एक अन्य स्थान पर महर्षि याज्ञवल्क्य ने भगवान पारदेश्वर के बारे में कहा है…किं दारिद्रयं दुख:पाप किं रोग शोकच:।
;पारदेश्वर पदं साक्षात लक्ष्मी पूर्ण सौभाग्य प्राप्यते॥
अर्थात मुझे समझ में नहीं आता है कि मनुष्य के जीवन में दरिद्रता क्यों है। वह दु:खी संतप्त और पीडि़त क्यों है। उसके जीवन में अभाव व बाधाएं क्यों है जबकि उसके पास आठों संस्कार युक्त पारद से निर्मित भगवान पारदेश्वर है।
स्वयं माता लक्ष्मी जी ने कहा कि.
पारदेश्वर सिद्घि वै साफल्यं लक्ष्मी च श्रिय।
कनक वर्षा, धनं पौत्र सौभाग्य वै नर:॥
अर्थात इस कलियुग में मानव जीवन की पूर्णता, सम्पन्नता श्रेष्ठता और सफलता का एक मात्र उपाय पारद
शिवलिंग’ प्राप्त कर महाशिवरात्रि पर स्थापित करना है। रावण ने पारद शिवलिंग का निर्माण कर उससे अपनी नगरी को स्वर्णमयी बनाकर यह सिद्घ कर दिया था कि पारदेश्वर की साधना से सब कुछ सम्भव है। स्वयं शिव भक्त
रावण ने कहा है…
पारदेश्वर महादेव स्वर्ण वर्षा करोति य्।
सिद्घिदं ज्ञानदं मोक्ष पूर्ण लक्ष्मी कुबेर य:॥
अर्थात स्वयं रावण ने कहा है कि मैने यह अनुभव किया है कि पारदेश्वर स्थापना व पूजन और साधना के आगे अन्य सभी साधनायें, प्रयोग व उपाय सभी तुच्छ है। मैंने केवल महाशिवरात्रि पर पारदेश्वर की स्थापना व पूजन कर पारद के ही माध्यम से स्वर्ण वर्षा सिद्घसूत से स्वर्ण निर्माण रसायन क्रिया कर लंका नगरी को स्वर्ण बनाने की प्रकिया सम्भव की थी। रसार्वण तंत्र व शिवपुराण में लिखा है ;धर्मार्थकाम मोक्षाख्या पुरूषार्थश्चतुर्विधा।
सिध्यंति नात्र सन्देहो पारद रस राज प्रसादत:॥
अर्थात जो मनुष्य पारद शिवलिंग की महाशिवरात्रि एवं श्रावण माह में एक बार भी पूजा कर लेता है उसे इस मानव जीवन में ही अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष, चारों पुरूषार्थो की प्राप्ति हो जाती है। (विनायक फीचर्स)

घोटिया आम्बा तीर्थ : पांडवों ने जहां शिव की आराधना की

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  • स्वामी गोपाल आनन्द बाबा

घोटिया आम्बा स्थल राजस्थान के जनपद बांसवाड़ा में अवस्थित है। कई किलोमीटर में छितराए पहाड़ों के आँचल में घोटिया आम्बा तीर्थ के देवस्थलों के दर्शनों तथा स्नान आदि के लिए श्रद्धालु पहुंचते रहते हैं। घोटिया यानि घोटेश्वर शिव और आम्बा यानि पार्वती का यह स्थान द्वापर युग के अन्तिम चरण यानि महाभारत काल का स्मरण कराता है। राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के सीमावर्ती अँचलों से लोगों का आवागमन यहां अधिक होता है।

तीनों तरफ पर्वत से घिरे घोटेश्वर शिवालय में रक्ताभ शिवलिंग एवं देवी पार्वती की आकर्षक प्रतिमा है। पाश्र्व में दीर्घ अधिष्ठान पर श्वेत पाषाण निर्मित पाण्डव कुल की सात मूर्तियां हैं जिनका दर्शन एवं पूजन किया जाता है। मुख्य मंदिर के द्वार पर आकर्षक देव प्रतिमाओं के अतिरिक्त दो सिंह मूर्तियां एवं मध्य में ध्यानावस्थित महात्मा की प्रतिमा यहां की शान्ति एवं समन्वय को बहुत सुन्दरता पूर्वक अभिव्यक्ति देती है। इसके पास ही हनुमान मंदिर, यज्ञ कुण्ड, गोशाला, धर्मशाला, भोजनशाला है। घोटेश्वर शिवालय के पास ही पवित्र जल से भरा पाण्डव कुण्ड है, जहां श्रद्धालु स्नान करते हैं। कुण्ड में ही शिला स्तम्भ पर शिवलिंग स्थापित है जिस पर श्रद्धालु भक्त जल व पैसे चढ़ाते हैं। श्रद्धालु केलापानी के देवालय, बजरंगबली मंदिर, वाल्मीकि मंदिर आदि में दर्शन करते हैं। शिवालय के सम्मुख धूनीवाला आश्रम भी आकर्षण का केन्द्र है।
पाण्डव कुण्ड के निकट जन-जन की अगाध आस्था का प्रतीक आम्रवृक्ष है, जिसके बारे में मान्यता है कि यह लोगों की कामनाएं पूरी करता है। घोटिया आम्बा के पठार पर पाण्डवों (युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव) ने भगवान श्रीकृष्ण की सहायता से देवराज इन्द्र से प्राप्त आम की गुठली यहां रोप दी और इस आम्रवृक्ष से उत्पन्न आम्रफलों के रस से अठासी हजार ऋषियों को भोजन कराने का पुण्य पाया। यहां आम्रवृक्ष की श्रृंखला तब से चली आ रही है। आज
भी लोग परम्परा से आम्रवृक्ष की परिक्रमा, पूजन इत्यादि करते हैं। यहां एक धूनी है, जिसमें नारियल का हवन लगातार चलता रहता है। श्रद्धालु कामना पूरी हो जाने पर यहां रंगीन ध्वज चढ़ाते हैं। नारियलों की पंक्तियां बांधते हैं और ब्राह्मणों व साधु-संतों को भोजन कराते हैं। घोटेश्वर शिवालय से कुछ ही दूर पठार के पार केलापानी नामक पवित्र धाम है, जहां शिवालय, राममंदिर, केले के मनोहारी झुरमुट, दिव्य चावल, सुरम्य झरना तथा गोमुख से सतत प्रवाहमान जलधाराएं श्रद्धा एवं आत्मीय आनन्द से भर देती हैं।
वनवास काल में प्यास लगने पर भीम के गदा प्रहार से घना सुरम्य केलापानी झरना वर्षाऋतु में हर किसी को मुग्ध कर देता है। यहां मोती गिरी महाराज की छतरी, धूनी, आश्रम तथा पाण्डवों के चरण चिन्ह भी विद्यमान हैं, जहां श्रद्धालुओं का आवागमन लगा रहता है। यहीं पर पौराणिक महत्व के साल के पौधों से गिरे चावलों को ढूंढ़कर दर्शनार्थी घर ले जाते हैं। इन चावलों को पाना सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। चैत्रकृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक परम्परागत रूप से घोटिया आम्बा मेला यहां लगता है। बांसवाड़ा जिले का यह सबसे बड़ा परम्परागत ग्राम्य मेला है, जिसे जनजातीय गण बहुत अधिक मान्यता देते हैं और उनकी सर्वाधिक भीड़ यहां पधारती है। इसमें वागड़ आंचल के हजारों मेलार्थी के साथ ही गुजरात और मध्यप्रदेश के सीमा क्षेत्रों से आने वाले नागरिकों की संख्या भी अच्छी रहती है। पाण्डवों की स्मृति में लगने वाला यह मेला शताब्दियों से जन-जन को पराक्रम एवं शौर्य एवं  सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक भी बना हुआ है।

मेला का प्रारम्भ शिवार्चन के साथ ही चैत्र कृष्ण 13 को महन्त हीरागिरी महाराज एवं महन्त रामगिरी महाराज द्वारा शिवलिंग पर रजत छत्र चढ़ाकर होता है और चैत्रशुक्ल द्वितीया को समापन होता है। यह मेला बांसवाड़ा, दोहद मार्ग स्थित बड़ोदिया से कुछ दूर घोटिया आम्बा के जंगल में लगता है। नर-नारियों को पाण्डव कुण्ड में स्नान करते देखा जा सकता है। मुख्य मेले के दिन स्नानार्थियों की भारी भीड़ यहां जमा रहती है। इस कुण्ड को पापों का शमन करने वाला और मुक्तिदायक माना गया है। स्नान में असमर्थ मेलार्थी हाथ-पांव व मुख का प्रक्षालन यहां अवश्य करते हैं।
घोटिया आम्बा का मनोहारी नैसर्गिक परिवेश ही ऐसा है कि यहां आने वाला हर कोई जीवन के संत्रासों, विषादों और भविष्य की तमाम आशंकाओं को भूलकर असीम आनन्द सागर में डूब जाता है।
मेलार्थी खाने-पीने की सामग्री अपने साथ लाते हैं एवं घोटिया आम्बा तीर्थ के देवस्थलों का दर्शन व मेलों का आनन्द लेते हैं। कई किलोमीटर छितराए पहाड़ों के आंचल में ये समूह दाल, बाटी, चूरमा आदि पकाकर परिजनों के साथ सामूहिक वन भोज का आनन्द लेते हैं। रमणीय घोटिया आम्बा क्षेत्र में चारों ओर बड़े-बड़े वृक्षों से भरी पहाडिय़ां, दुर्गम घाटियां, शीतल जल के स्रोत और वन्य जीवों की अठखेलियां प्रकृति के अनुपम वैभव को व्यक्त करती है। राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश के सीमावर्ती अंचलों से परम्परागत परिधानों में जमा जनजाति स्त्री-पुरुषों, लोकवाद्यों के साथ फाल्गुनी गीतों की झंकार और नृत्यों की मनोहारी वातावरण जनजाति संस्कृति के प्राणों को बहुत सुन्दरता से रुपायित करती है। जनजाति समाज सुधारक एवं संत महात्मा भी बड़ी संख्या में यहां पहुंचकर धार्मिक एवं सामाजिक चेतना का संचार करते हैं।

30 वर्षीय युवा निखिल आनंद बने मिस इंडिया यूनिवर्स के मालिक

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मुंबई (अनिल बेदाग) : बिहार में जन्मे व पले बढ़े निखिल आनंद आज दुनिया के सबसे बड़े सौंदर्य प्रतियोगिता मिस यूनिवर्स के फ्रैंचाइजी होल्डर हैं। मिस यूनिवर्स इंडिया के नए मालिक बनने के साथ  निखिल कई अन्य राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सौंदर्य प्रतियोगिताओं के भी मालिक हैं।
दुनिया के कुछ चुनिंदा फैशन उद्यमियों में से एक निखिल आनंद  की संस्था ग्लेमानंद ग्रुप अब दुनिया के सबसे बड़े ब्यूटी पेजेंट मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता के लिए भारतीय प्रतिनिधि का चयन करेगी। फैशन के क्षेत्र में निखिल आनंद विश्व भर में एक चर्चित नाम है और इनदिनों वह काफी चर्चा में हैं। हमेशा से भारतीय सौंदर्य प्रतियोगिता क्षेत्र में कुछ बेहतर व अनोखेपन के लिए निखिल जाने जाते हैं और अपने विचारों से इस क्षेत्र को बदलने के लिए अक्सर उनकी सराहना भी की जाती है।
 बचपन से ही फैशन व ग्लैमर की दुनिया मे रुचि रखने वाले निखिल ने अपने कॉलेज के तीसरे वर्ष में ही मिस्टर नॉर्थ इंडिया प्रतियोगिता में भाग लिया और फाइनलिस्ट भी रहें। इस दौरान कुछ घटनाओं ने उन्हें फैशन उद्योग के उनके दृष्टिकोण को बदल के रख दिया। तभी उन्हें फैशन और सौंदर्य प्रतियोगिताओं की दुनिया में क्रांति लाने की इच्छा जागृत हुई। काफी संघर्षों के बाद 2014 में, उन्होंने ग्लैमानंद एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के जरिये कई फैशन कार्यक्रम आयोजित किया और युवा महत्वाकांक्षी मॉडलों को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए एक मंच प्रदान किया।
2013 में  कंपनी की शुरुआत करने के तुरंत बाद, आनंद ने मिस अर्थ और मिस इंटरनेशनल प्रतियोगिता हासिल की। साथ ही 2016 में मिस टीन इंटरनेशनल के मालिक बने जिसका मालिकाना हक उस समय कोस्टा रिका के एनरिक गोंजालेज के पास था। कुछ ही समय बाद उन्होंने मिस मल्टीनेशनल का कार्यभार भी संभाला और इस तरह वह दुनिया के सबसे कम उम्र के सौंदर्य प्रतियोगिता निर्देशक बन गए। आज, उनकी कंपनी भारत में सबसे अधिक सौंदर्य प्रतियोगिताओं के मालिक हैं।

असफल छात्रों का मनोबल बनाए रखना आवश्य

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डॉ. गोपाल नारायण आवटे
आज की शिक्षा प्रणाली और उसमें व्यापक सुधार की गुंजाइश पर विगत दिवस एक कार्यशाला में जाने का अवसर मिला। इस कार्यशाला में भागीदारी करने वाले जितने भी सज्जन थे किसी ना किसी राजनैतिक पार्टी से जुड़े हुए थे। उनके द्वारा जो भी बातचीत निकलकर आई उसमें व्यापक सुधार की गुंजाइश की कम, अपनी पार्टी के विचारों को सम्बल देना अधिक था जो कि अत्यधिक खतरनाक था।

जब उस कार्यशाला में मेरी भागीदारी का अवसर आया, उस कार्यशाला में छात्र भी मौजूद थे, तब मैंने कहा- आज की शिक्षा तेजी से भागने वाली है। प्रतियोगिता से भरी हुई है। कोई प्रथम आने के लिए भाग रहा है और कोई प्रथम में भी विशेष योग्यता लाना चाह रहा है। इस दौड़ को छात्र के परिवार वाले प्रोत्साहित कर रहे हैं। ठीक उसी तरह जैसे घुड़ दौड़ में दर्शक घोड़े को दौडऩे के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

कोई प्रथम आता है और कोई द्वितीय और कोई तृतीय। दुर्भाग्यशाली असफल भी हो जाते हैं। विशेष योग्यता वाले से प्रथम आने वाला अपने को हीन समझता है। प्रथम आने वाले से द्वितीय आने वाला स्वयम्ï को हीन समझता है और तृतीय आने वाला तो बेचारा शर्मसार होकर बैठा रहता है।

जो असफल हो जाते हैं उन पर परिवार और परिचितों की मार पड़ती है और शाला के शिक्षकों की प्रताडऩा और ताने सुनना उनकी नियति होती है। पूरे वर्ष भर वह छात्र नए छात्रों के मध्य स्वयम्ï को अपरिचित-सा अनुभव करता है। परिणामस्वरूप उसमें उपजती है कुंठा, तनाव और अपनी पहचान बनाने की लालसा। शार्टकट से पहचान बनाने की लालसा उन्हें धकेल देतीे है अपराध जगत के दलदल में।

तब एक छात्र ने प्रश्न किया- तो क्या परीक्षाओं में प्रतियोगिता नहीं होना चाहिए? कोई भी प्रतियोगिता किसी ना किसी को पीछे धकेलने का कार्य करती है। प्रतियोगिता हो तो वह विषय ज्ञान के अतिरिक्त जीवन ज्ञान को समझने की भी होना चाहिए।

जो प्रथम आया या जिसने विशेष योग्यता अर्जित कर ली उसके पास क्या है? केवल पुस्तक ज्ञान जो अत्यधिक खतरनाक बात है। जिसके पास केवल पुस्तक ज्ञान है वह सबसे खतरनाक है क्योंकि उसमें और कोई सम्भावनाएं नहीं हैं, कोई भी गुंजाइश नहीं है, लेकिन जो द्वितीय आया या तृतीय आया उनमें सम्भावनाएं हैं, जो असफल हो गया उसमें काफी सम्भावनाएं हैं, उसमें जीवन को समझने की, जीवन रहस्यों को समझने की अपार संभावनाएं हैं क्योंकि
वह पुस्तकों से असफल हो गया। जीवन पुस्तक नहीं है। पुस्तक को जीवन बनाना सबसे बड़ी मूर्खता है। जो प्रथम श्रेणी में सफल हुआ है उसके पास केवल पुस्तक है और पुस्तक का अध्ययन मनुष्य को कहीं नहीं पहुंचाता सिर्फ अपने अनुभव से दूर ले जाता है। पुस्तक का अनुभव पुस्तक के पास ले जाता है। इसलिए जीवन का अनुभव प्रथम श्रेणी में आए छात्र के जीवन में उतारना भारी कठिन है क्योंकि वह पहले से ही भरा बैठा है।

असफल हो चुका छात्र जीवन में, मन में, मस्तिष्क में पुस्तकीय ज्ञान को भर नहीं पाया। वह कहीं न कहीं से मौलिक है। उसमें अपार संभावनाएं हैं, स्वयं भी प्रगट करने की, उसमें संभावनाएं हैं स्वयं की पहचान स्वयं बनने की। उसकी पहचान कोई माध्यम विशेष रूप से पुस्तक तो है ही नहीं। ऐसे छात्रों के साथ जीवन का अनुभव शेयर करके उसे अध्ययनशील बनाने की अपार संभावनाएं हैं।

मेरा अर्थ यह कदापि नहीं है कि पुस्तकें नहीं पढऩा चाहिए लेकिन पुस्तक के अनुभव को कभी अपना मानकर वहीं ठहर मत जाना। इसलिए असफल छात्र कई गुना सफल छात्र हैं जो प्रथम श्रेणी में पास हुए उनके मुकाबले। क्योंकि प्रथम श्रेणी में आए छात्र केवल पुस्तकों की परिभाषाएं बोलते हैं, अपने मौलिक स्वरूप को खो चुके होते हैं। इसलिए असफल हो चुके छात्र को आप निष्कृत ना मानें, असफल छात्र को कभी हीन न समझें उसे कुंठा से बाहर निकालें और अन्य संभावनाओं की ओर भी मोडऩे का प्रयास करें।

प्रसन्न हों कि वह रट्ïटू तोता नहीं है। वह पुस्तक के अतिरिक्त भी बहुत कुछ देखना व सोचना चाहता है। उसके सोच को विस्तार दें, उसके चिन्तन को मान्यता दें। हमारे देश में असफल छात्र से कोई भी बात ही नहीं की जाती है। आश्चर्य की बात तो यह है कि छात्र भी अपनी संभावनाओं को नहीं जानता। असफलता की कुंठा के नीचे वह अपने मौलिक स्वरूप को दबा देता है जिसके कारण एक अच्छी प्रतिभा भी उभरने के पूर्व मुरझा जाती है।

असफल छात्र का भी स्वागत और सम्मान करने की हममें शक्ति होना चाहिए, क्योंकि उनकी असफलता के कारण ही तो आप सफल कहलाए। असफल छात्र को भी मुख्य धारा से जोडऩे का प्रयास करना चाहिए। उसके मौलिक स्वरूप को कायम रखने का पूरे समाज का दायित्व है। – विनायक फीचर्स