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देश को कंगाल बनाने की घृणित राजनीति* 

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(शिव शरण त्रिपाठी – विनायक फीचर्स)
यदि चुनाव के समय राजनीतिक दलों द्वारा अपने घोषणा पत्रों के माध्यम से अपनी राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध के लिये नाना प्रकार की मुफत की रेवाडिय़ा बांटने की संस्कृति पर लगाम न लगाई गई तो देश को कंगाल होने से कोई बचा नहीं सकता।
इससे अधिक दुर्भाग्य और विडम्बना हो भी क्या सकती है कि सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बार-बार चिंता जताने और इस पर रोक लगाने की मंशा जताने के बावजूद आज तक न तो सुप्रीम कोर्ट का कोई आदेश आ सका और न सरकार कोई कानून बना सकी।
चुनाव में मुफ्त की रेवडिय़ा बांटकर सत्ता में आने वाली पार्टियों के कार्यकाल में उनके राज्यों की आर्थिक बदहाली का ही नतीजा रहा है कि कहीं बिजली नहीं मिल पा रही है तो कहीं पानी नहीं मिल पा रहा है। विकास के लिये तो मानों धन का अकाल ही पैदा हो गया है।
हाल ही में यदि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार को डीजल व पेट्रोल के दामों में भारी वृद्धि करने को विवश होना पड़ा है तो यह मुफत रेवडिय़ां बांटे जाने का ही नतीजा है। यही हाल पंजाब व दिल्ली का हो चुका है।
इस दिशा में 3 अक्टूबर 2022 को भारतीय स्टेट बैंक की एक रपट आंखे खोल देने को काफी है। रपट में मुफ्त रेवड़ी संस्कृति को देश की अर्थ व्यवस्था के लिये घातक बताया गया था।
ज्ञात रहे 2022 में सुप्रीम कोर्ट और मोदी सरकार ने इस दिशा में कड़े कदम उठाये जाने की मंशा जताई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि समस्या के निदान के लिये एक समिति का गठन किया जाना चाहिये। इसके बाद 2023 में उसने मुफ्त रेवडिय़ां बांटे जाने को लेकर ही एक याचिका पर मध्य प्रदेश राजस्थान और केन्द्र सरकार को नोटिस भी जारी किया था।
16 जुलाई 2022 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुदेलखण्ड एक्सप्रेस वे जनता को सौंपने के बाद जनपद जालौन के कैथोरी गांव में एक जनसभा में कहा था कि देश की राजनीति से मुफ्त रेवड़ी संस्कृति खत्म करेगें। युवाओं को चेताया कि ऐसी राजनीति कर वोट बटोरने वालों से सावधान रहे, ये घातक है। उससे देश को नुकसान हो रहा है। रेवड़ी संस्कृति वाले कभी एक्सप्रेस वे, डिफेंस कॉरीडोर एयरपोर्ट नहीं बनायेगें। वो तो रेवड़ी में  फसाकर खुद के खजाने भरेगें।
ऐसे में एक ही रास्ता बचता है कि देश की प्रबुद्ध जनता ही मुफ्त रेवड़ी संस्कृति को सदा-सदा के लिये खत्म करने को आगे आये वरन देश की आर्थिक बदहाली के नतीजे भोगने के लिये सभी को तैयार रहना ही होगा।
एक प्रत्याशी एक ही सीट से चुनाव लड़े- भारत निर्वाचन आयेाग को सरकार से जल्द से जल्द ये कानून बनाने की मांग करनी चाहिये कि एक प्रत्याशी सिर्फ  एक सीट से चुनाव लड़ सकेगा।  फिलहाल जब तक कानून नहीं बनता तब तक निर्वाचन आयोग को इस दिशा में स्वयं पहल करनी चाहिये।
कौन नहीं जानता कि खासकर बड़े नेताओं की दो-दो सीटों से चुनाव लडऩे की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है दोनो सीटे जीतने पर वे मनचाही एक सीट से प्रतिनिधित्व करते हैं और दूसरी सीट छोड़ देते हैं। नतीजतन उनके द्वारा छोड़ी गई ऐसी सीटों पर दुबारा चुनाव कराया जाता है और जिस पर देश की आम जनता की गाढ़ी कमाई दुबारा फूंकी जाती है।
यह भी कम विचारणीय नहीं है कि ऐसे उपचुनावों से देश की आर्थिक स्थिति पर अनायास बोझ बढ़ जाता है और यह बोझ देश का करदाता उठाने को मजबूर होता है।
और पिसता ही जा रहा है देश का मध्यम वर्ग- चाहे निजी राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि हेतु चुनावी रेवडिय़ां बांटे जाने की बढ़ती परम्परा हो, चाहे गरीबों हेतु चलाई जाने वाली मुफ्त की योजनायें हों और चाहे दो सीटों से जीतने वाले प्रत्याशियों का एक सीट छोड़े जाने से होने वाले उपचुनाव, आखिर इनका बोझ कौन उठाता है? साफ  है देश का करदाता। अब सवाल यह है कि समाज का कौन सा वर्ग है कि करदाता के रूप में जिसकी संख्या देश में सर्वाधिक है। सपाट उत्तर आता है मध्यम वर्ग। मध्यम वर्ग में अधिसंख्य व्यवसायी समाज और नौकरीपेशा लोग आते हैं। सरकारी नौकरी में उच्च पदों पर कार्यरत लोगों को छोड़ दिया जाये तो अधिसंख्य सरकारी व निजी क्षेत्रों के नौकरी पेशा लोगों को समाज का सर्वाधिक बोझ उठाने वाला वर्ग कहा जा सकता है। समाज में ऐसी ही दशा उन छोटे व्यापारियों की भी है जो पारिवर, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने में ही अपनी सारी जिदंगी खपा देते है और मृत्यु पर्यंत उन्हे सुकून नहीं मिल पाता।
 हर बजट में चाहे केन्द्रीय बजट हो और चाहे राज्यों का बजट मध्यम वर्ग की नजरें हमेशा आयकर में छूट को लेकर ही जिज्ञासु रहती है । इसका कारण उसे तंगहाली से राहत मिलने की उम्मीद जो होती है। यह भी किसी को बताने की जरूत नहीं है कि राष्ट्र व समाज की रीढ़ होते हुये भी सरकारी योजनाओं का उसे कोई लाभ नहीं मिल पाता। सारा का सारा लाभ निम्न वर्ग व उच्च वर्ग को प्राप्त होता है।  मध्यम वर्ग को इससे इंकार नहीं है कि सरकार उसके करों से समाज के जरूरतमंद लोगों के लिये लाभ की योजनायें न बनाये, न लागू करें। उसे खीझ व गुस्सा इस बात से है कि राजनीतिक दलों की स्वार्थ पूर्ति हेतु ही उसे बलि का बकरा बनाया जाता है।  चुनाव में रेवड़ी बांटने की संस्कृति का होता विस्तार, दो-दो सीटों से चुनाव लड़कर एक सीट छोडऩे की परम्परा को आखिर मध्यम वर्ग क्यों ढोता फिरे? सरकार व विपक्षी दलों को इस दिशा में गहन विमर्श करना ही होगा और जितनी जल्द हो सके उतना जल्द किया जाये। यदि कहीं मध्यम वर्ग ने कंधा डाल दिया तो हालात संभाले न संभलेगें। (विनायक फीचर्स)

मुनमुन चक्रबर्ती बहुमुखी प्रतिभा की है धनी

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मुनमुन चक्रबर्ती कलकत्ता की पृष्टभूमि से है मगर वह बचपन से मुम्बई में पली बढ़ी हैं और यहीं शिक्षा प्राप्त की है। जल्द ही उनकी वेब सीरीज, म्यूजिक वीडियो और शार्ट फिल्म रिलीज होने वाली है वह कई प्रोजेक्ट्स में काम कर रही है।’सुंदरी’ नाम की उनकी म्यूजिक वीडियो रिलीज़ होने वाली है। वह अभिनय के क्षेत्र में व्यस्त हैं। उनकी ‘स्टाइल एजेंट’ नाम की कंपनी है। उनकी इस कंपनी के बैनर तले भी वह कई प्रोजेक्ट्स में काम कर रही है। वह फैशन डिजाइनर, मॉडल और अभिनेत्री के रूप में कई अवार्ड से सम्मानित हो चुकी हैं।हाल ही में उन्हें बैंकॉक में मन्नारा चोपड़ा द्वारा इंडिया इंटरनेशनल इन्फ्लुएंसर अवार्ड 2024 से सम्मानित किया गया है, जहां अभिनेत्री नोजा शेख शो स्टॉपर रही, सुनीता एस बावा क्रिएटिव रही और राजेश राय ने वीडियोग्राफी की है, उन्हें बॉलीवुड लाइफस्टाइल में ईशा कोप्पिकर द्वारा भी सम्मानित किया गया है। लीजेंड दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड, बॉलीवुड लीजेंड अवार्ड, राष्ट्रीय रत्न सम्मान, बॉलीवुड आइकोनिक अवॉर्ड से सम्मानित हुई हैं, जो इन्हें प्रसिद्ध गायक कुमार शानू और पद्मश्री उदित नारायण जैसे दिग्गजों के हाथों प्राप्त हुआ है। मुनमुन ने बंगला फिल्म इंडस्ट्री में काम किया है। मॉडलिंग और फैशन शो किया है, उसके बाद मुम्बई में फिल्म इंडस्ट्री में काम कर रही हैं। टी सीरीज जैसे कई कंपनियों के म्यूजिक वीडियो में दिखाई दे चुकी हैं। मुनमुन ने कई साड़ी, ज्वैलरी और भारतीय परिधानों के ब्रांड्स की विज्ञापनों में काम किया है।

मुनमुन चक्रबर्ती बहुमुखी प्रतिभा की धनी है। अभिनय, नृत्य, फैशन डिजाइनिंग और मॉडलिंग करती हैं जिनमें वह बेहतर हैं। वह एक अच्छी स्वीमर है, डिफरेंट और व्यवसायिक स्तर पर कुकिंग करने में निपुण और जुडो कराटे में भी निपुण है। मुनमुन को हमेशा कुछ नया करना और सीखना अच्छा लगता है। मुनमुन कथक नृत्य में पारंगत है साथ में हिपहॉप और बॉलीवुड डांस में बहुत अच्छी है। उन्होंने फ़ैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया है और उनका खुद का ब्रांड है जिसमें कई सेलेब्स और फिल्मों में कलाकारों के लिए डिजाइनर कपड़े बनाये जाते हैं। कुकिंग का कोर्स भी इन्होंने सीखा है। मुनमुन चक्रबर्ती अभिनेता शाहरुख खान, सलमान खान, प्रियंका चोपड़ा और नवाजुद्दीन सिद्धिकी के अभिनय की बहुत बड़ी प्रसंशक है। उन्हें हॉट, बिंदास और ग्लैमरस भूमिकाएं पसंद हैं। मुनमुन को कुछ नया और अलग करना अच्छा लगता है। वह हमेशा कुछ नया सीखती रहती है। उनका कहना है कि आप कभी भी हार मत मानो आपके अंदर प्रतिभाएं छिपी हुई हैं उसे पहचानो। मुनमुन सकारात्मक सोच वाली स्वाभिमानी और रिलिजियस है। बेहद लगनशील और काम के प्रति समर्पित व्यक्ति हैं। वह जल्द हार नहीं मानती। मुनमुन का कहना है कि यदि आप किसी विशेष व्यवसाय या फील्ड में काम करने का निर्णय लेते हैं और सफल नहीं हो पाते तो ऐसे स्थिति में धैर्य से काम लो और शांत मन से सोचो कि क्या उनके लिए सही होगा। क्योंकि पहली बार में ही हर इंसान को सफलता प्राप्त नहीं होती। इस जीवन में आगे बढ़ने के लिए विकल्पों की कमी नहीं है, कोई ना कोई राह आपको मिल ही जायेगा, बस अपने कौशल और खुद पर विश्वास रखें। हमेशा सकारात्मक रहें और मेडिटेशन करें। क्योंकि न्यूटन का नियम है हर क्रिया की विपरीत और बराबर प्रतिक्रिया होती है वैसे ही जो आप इस यूनिवर्स को दोगे वह आपको जरूर वापस करेगा।

ईज़ी परफ्यूम्स का ट्रैवल-साइज़ वेरिएंट लॉन्च

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सफर के दौरान इत्र के शौकीनों के लिए इस्तेमाल होने वाला फ्रेगरेंस

मुंबई – सवाई फ्रेगरेंस के घराने से ईज़ी परफ्यूम ने अपने परफ्यूम लाइन के तहत 18ml वेरिएंट लॉन्च की है। खुशबू के तत्वों के साथ अपनी विशेषज्ञता के लिए मशहूर, इस ब्रांड ने इन कॉम्पैक्ट परफ्यूम्स को मार्च 2023 के डेब्यू कलेक्शन के विस्तार के रूप में पेश किया है, जो आधुनिकता के साथ ही यात्रा-प्रिय ग्राहकों की जरूरतों को पूरा करता है, जो हमेशा से बहुमुखी प्रतिभा और विलासिता की सराहना करते रहे हैं। यह ब्रांड वैश्विक स्तर पर एसेंशियल ऑइल्स (कई महत्वपूर्ण तेल) और फ्रेग्रेंस का निर्माण, निर्यात करने में मशहूर है। ईज़ी जो इग्बो शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘राजा’ यह राजसी और लालित्य का प्रतीक है। इसकी जीवंत, बेलनाकार डिज़ाइन वाली बोतलों में भी यह गुण दिखाई देता है, जो कांच के बेस और स्लीक क्लिक-ऑन कैप से बना है।

नए 18ml वेरिएंट्स, परफ्यूम के शौकीनों के लिए यात्रा के अनुकूल समाधान पेश करते हैं, जहां भी ये जाते हैं, कई तरह की खुशबू भी साथ ले जाना पसंद करते हैं। पुरुषों के लिए खट्टे (citrusy), ताजे और वुडी परफ्यूम (एलेशन, सर्ज, नोमैड), महिलाओं के लिए फ्लोरल, ताजा और मीठी खुशबू (फ्लो, अवे, जॉय) और दो ज़ेस्टी, परिष्कृत यूनिसेक्स विकल्प (आईडी, वाइब) सहित एक लाइनअप के साथ, ईज़ी परफ्यूम विविध स्वाद और प्राथमिकताओं को पूरा करता है।

पुष्कर जैन, सीईओ और परफ्यूम, सवाई फ्रेगरेंस ने कहा,”हमें खुशी है कि हम इज परफ्यूम्स के वेरिएंट्स का लॉन्च कर रहे हैं, जिसमें सुविधाओं को विलासिता और गुणवत्ता के साथ मिला कर तैयार किया गया है। है। यह परिचय नवाचार के प्रति हमारे समर्पण और हमारे समझदार ग्राहकों की बदलती प्राथमिकताओं को पूरा करने की पुष्टि करता है। ये परफ्यूम ले जाने में आसान हैं, जो हमेशा घूमने वाले लोगों के लिए काफी उपयुक्त है। और गर्व की बात है कि इसे भारत में बनाया गया है। प्रत्येक खुशबू एक परिष्कृत और बढ़िया अनुभव का वादा करती है, जो हर बोतल में उत्कृष्टता की हमारी खोज को दर्शाती है।”

समझदार परफ्यूम के शौकीनों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन की गई, ये कॉम्पैक्ट बोतलें समृद्ध, विशिष्ट खुशबू के साथ समझौता किए बिना बहुमुखी प्रतिभा सुनिश्चित करती हैं, जिसके लिए ईज़ी परफ्यूम (Eze Perfumes) की पहचान है। चाहे वह एलेशन और फ्लो के जीवंत नोट हों, सर्ज और अवे की ताजगी भरी खुशबू हो, नोमैड और जॉय की तरोताजगी से भर देने वाली खुशबू हो, या फिर आईडी और वाइब की विविधता से भरा आकर्षण हो, प्रत्येक खुशबू लालित्य और व्यक्तित्व के लिए ईज़ी परफ्यूम की प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह परफ्यूम साथ में कहीं भी ले जाने में आसान है, यह ट्रैवल फ्रेंडली एडिशन हैं, जो शानदार खुशबू की कीमत को समझते हैं। यह व्यक्तिगत उपयोग और उपहार देने के लिए भी आदर्श हैं।

फाइव स्टार होटल में संपन्न होगा बॉलीवुड आइकॉनिक अचिवमेंट अवार्ड्स 2024

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मुंबई। महानगर में जुहू स्थित फाइव स्टार होटल जे डब्ल्यू मैरियट में आज दिनांक 27 जून 2024 को बॉलीवुड आइकॉनिक अचीवमेंट अवॉर्ड्स 2024 समारोह संपन्न होने जा रहा है।

इस अवॉर्ड शो में प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता सोनू सूद और अर्जुन रामपाल के अलावा बॉलीवुड, कॉरपोरेट, राजनीति, प्रशासन से कई दिग्गज हस्तियां अपनी गरिमामयी उपस्थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाएंगे।
बॉलीवुड आइकॉनिक अचीवमेंट अवॉर्ड्स (BIAA) 2024 के प्रस्तुतकर्ता राजकरण तिवारी, पूजा तिवारी, अमित ठाकुर और नेहाल सिंह हैं।
प्रमुख हस्तियों की सूची में फिल्म अभिनेता सोनू सूद ,अर्जुन रामपाल, एक्शन डायरेक्टर टीनू वर्मा (घायल, घातक, गदर, गदर 2 फेम), निर्माता विनोद बच्चन (फिल्म तनु वेड्स मनु फेम), शिवसेना प्रवक्ता आनंद दुबे, युवा बिजनेसमैन डॉ निकेश ताराचंद जैन माधानी, आरजे अनुराग पांडेय, गरुड़ा राम (फिल्म केजीफ फेम), गोल्डन गाइज ऑफ इंडिया और ब्राइट आउटडोर के कर्ताधर्ता योगेश लखानी सहित कई नामी गिरामी हस्तियां बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित हैं।

5वें बॉलीवुड आइकोनिक अवार्ड 2024 का भव्य आयोजन कृष्णा चौहान द्वारा सम्पन्न

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निर्माता निर्देशक धीरज कुमार, ‘भाभी जी घर पर है’ फेम एक्टर सानंद वर्मा, दिलीप सेन, सुनील पाल, के के गोस्वामी, एसीपी संजय पाटिल, ब्राइट आउटडोर मीडिया की उपस्थिति

मुंबई। कृष्णा चौहान द्वारा 24 जून को बॉलीवुड आइकोनिक अवार्ड 2024 के 5वें सीज़न का भव्य आयोजन किया गया। वह पिछले पांच वर्षों से भव्य रूप से इस समारोह का आयोजन करते आ रहे हैं। प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी समारोह में बॉलीवुड की जानी मानी हस्तियों ने शिरकत की।
कृष्णा चौहान फाउंडेशन के संस्थापक कृष्णा चौहान फिल्म डायरेक्टर और प्रोड्यूसर भी हैं साथ ही वह केसीएफ टाइम्स एवं केसीएफ इंटरटेनमेंट (पत्रिका) के संपादक भी हैं। मुम्बई के अंधेरी पश्चिम स्थित मेयर हॉल में इस पुरुस्कार समारोह का आयोजन किया गया।
केसीएफ प्रस्तुत इस पुरस्कार समारोह में उन हस्तियों को सम्मानित किया गया जिन्होंने फिल्मी दुनिया मे अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। कृष्णा चौहान द्वारा आयोजित इस अवार्ड समारोह में कई हस्तियां मौजूद रहीं, जिनमें मुख्य अतिथि धीरज कुमार, सीरियल ‘भाभी जी घर पर है’ में अनोखे लाल सक्सेना का किरदार निभाने वाले एक्टर सानंद वर्मा, दिलीप सेन, सुनील पाल, एसीपी संजय पाटिल, शशि शर्मा, निक्की बत्रा, के के गोस्वामी, मुकेश साहू माहेश्वरी, डॉ सुनील बी. गायकवाड़ रहे।


संजय अमान ने एंकरिंग की और उन्हें अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। जिन हस्तियों को यह सम्मान मिला उनमें निर्देशक आलोक नाथ दीक्षित, अभिनेता के के गोस्वामी, डॉ मुस्तफा अली गोम, शशि शर्मा, प्रियांश सोनी, नैना छाबड़ा सोनिक, सागर आचार्य, लेखक दीपक, रमेश मुल्तानी, सय्यद मोईन, शाहिदा, पूजा पांडे, दीपिका, असंता यादव, सोनू मित्रा, निक्की बत्रा, अनिल श्रीवास्तव, तरुणा सहानी, ज़ैद खान, इशाक खान सिंगर, आलिया खान, नाफ़े खान, मेघा हेमदेव, आर राजपाल, डॉ रूपांशी सिंह, पी के गुप्ता, पूनम गिरी, पिनाल राडाडिया, उपेंद्र पंडित, नासिर तगाले, पराग जोशी, कृष्णा शर्मा, आनंद पटेल, दिनेश परेशा, चन्द्र प्रकाश माझी, केवल कुमार, गाजी मोइन, नईम सिंह, तजेन्द्रसिंह जडेजा का नाम प्रमुख है।
अवॉर्ड शो में डॉ रूपांशी सिंह ने अपना प्रोडक्ट भी लांच किया।
उल्लेखनीय है कि कृष्णा चौहान पिछले 23 वर्षो से फिल्म जगत में फिल्ममेकर के रूप में काम कर रहे हैं। इसके साथ ही वह सामाजिक कार्यों में भी हमेशा तत्परता दिखाते रहते हैं। कोविड के दौरान उन्होंने न सिर्फ जरूरतमंदों को राशन वितरित किया बल्कि भगवतगीता भी लोगों को भेंट किया।
बता दें कि डॉ कृष्णा चौहान अपनी हॉरर थ्रिलर फिल्म ‘आत्मा डॉट कॉम’ की शूटिंग भी जल्द शुरू करने जा रहे हैं जिसमें प्रसिद्ध संगीतकार दिलीप सेन का संगीत देने वाले हैं।

मध्य प्रदेश गऊ हत्या -आरोपियों पर 10-10 हजार का इनाम घोषित

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सिवनी: Seoni Gohatya Case: मध्य प्रदेश पुलिस ने बीते रविवार को सिवनी जिले में 17 जून को 62 गोवंशियों (गाय और बैल) की हत्या में कथित रूप से शामिल नागपुर के सात निवासियों पर दस-दस हजार रुपये का इनाम घोषित किया है. एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सिवनी की सीमा महाराष्ट्र के नागपुर से लगती है, जहां एमपी की तरह गोहत्या पर कानूनी प्रतिबंध है.

गत शनिवार को सिवनी जिले में एक नदी और जंगल क्षेत्र में गायों के शव पाए गए थे, जिसके बाद पांच व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया था और मध्य प्रदेश की मोहन सरकार ने जिला कलेक्टर एवं पुलिस अधीक्षक को हटा दिया गया था और संस्कृति जैन को नया कलेक्टर बनाया था. एसपी जबलपुर ने बताया कि गोवंशियों की हत्या का उद्देश्य सांप्रदायिक हिंसा फैलाना था .

पुलिस महानिरीक्षक (जबलपुर क्षेत्र) अनिल सिंह कुशवाह ने सिवनी में संवाददाताओं से कहा, ‘जांच से पता चलता है कि गोवंशियों की हत्या का उद्देश्य सांप्रदायिक उन्माद भड़काना था, लेकिन मकसद की पुष्टि नागपुर के सात आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद ही हो सकेगी। हमने इन सातों लोगों पर दस-दस हजार रुपये का इनाम घोषित किया है.

मुख्यमंत्री ने मामले की गंभारता को देखते सिवनी कलेक्टर और एसपी को हटाया

गौरतलब है गोहत्या मामले में गंभीर सीएम मोहन ने शनिवार देर रात सिवनी के कलेक्टर क्षितिज सिंघल और पुलिस अधीक्षक (एसपी) राकेश कुमार सिंह का तबादला किया और सोशल मीडिया पर ट्वीट कर बताया कि घटना में संलिप्त प्रत्येक आरोप पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जा रही है.

क्षितिज सिंघल की जगह संस्कृति जैन को बनाया गया सिवनी का नया कलेक्टर

एक सरकारी विज्ञप्ति में कहा गया कि सिवनी जिले में क्षितिज सिंघल की जगह संस्कृति जैन को नया कलेक्टर नियुक्त किया गया है, जबकि राकेश कुमार सिंह की जगह सुनील कुमार नए सिवनी एसपी बनाए गए है. बता दें,  जिले में दो दिन पहले एक नदी और जंगली इलाके में 40 से अधिक गायों के शव मिले थे, जिसके बाद पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया था.

सीएम ने कहा, गोमाता के खिलाफ कोई भी अपराध बर्दाश्त नहीं किया जाएगा

इससे पहले, मुख्यमंत्री यादव ने ‘एक्स’ पर ट्वीट करते हुए लिखा, ‘गोमाता के खिलाफ कोई भी अपराध बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. मामले में सीआईडी ​​एडीजी पवन श्रीवास्तव और उनकी टीम को नृशंस गोवंश हत्याकांड की उच्चस्तरीय जांच करने का काम सौंपा गया है. उन्होंने कहा, “मामले में शामिल हर आरोपी को कड़ी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा”

गोवंश हत्याकांड में पांच आरोपी पुलिस हिरासत में भेजे गए, दो पर लगा रासुका

गौरतलब है सिवनी पुलिस ने दिन में चार आरोपियों को स्थानीय अदालत में पेश किया, जिसने संतोष कवरेती (40) और रामदास उइके (30) को न्यायिक हिरासत में भेज दिया और आरोपी शादाब खान (27) व वाहिद खान (28) को तीन दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया है. पुलिस अधिकारियों ने बताया कि शादाब और वाहिद के खिलाफ रासुका लगाया गया है.

शनिवार को मामले में एक आरोपी इरफान मोहम्मद को गिरफ्तार किया गया

रिपोर्ट के मुताबिक गत शनिवार को एक और आरोपी इरफान मोहम्मद (57) को गिरफ्तार किया गया. सभी आरोपियों पर मप्र गोहत्या प्रतिषेध अधिनियम, 2004, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 और सांप्रदायिक तनाव भड़काने से संबंधित आईपीसी की धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है. गोहत्या अपराध में 7 साल तक की कैद की सज़ा का प्रावधाना है.

 

नई सरकार के सामने चुनौतियां* 

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(आर. सूर्य कुमारी – विनायक फीचर्स)
आज देश के सामने ऐसी पांच विभीषिकाएं हैं , जिनसे देश को मुक्त करना बहुत शीघ्र अपेक्षित है , नहीं तो देश ऐसे भयानक दौर में फंस जाएगा कि बाहर निकलना मुश्किल होगा और भारतीय सभ्यता – संस्कृति का अस्तित्व ही दांव पर लग जाएगा। आइए अब ये चर्चा करते हैं क्या – क्या हैं ये पांच विभीषिकाएं 
 1. आई एस आई के कारनामें- आई एस आई पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी है और यह भारत में खतरनाक कारनामों को अंजाम देने में तुली है। इसका पूरा नाम है इंटर सर्विस इंटेलिजेंस। किशोर व नवयुवकों जो बाहर से आकर भारत के शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं या भारत के तमाम हिस्सों में मारे – मारे फिर रहे हैं, उनको धन का लालच देकर, भड़काकर, उनके धर्म का वास्ता देकर आई एस आई आतंकवाद के गहरे कूप में डाल रही है। देश के कई राज्यों में आई उन्हें एस आई अपने पैर पसार रही है और विघटनकारी गतिविधियों को अंजाम देने की कोशिश कर रही है। आई एस आई को ध्वस्त करना आज की पहली जरूरत है। भला तो यही है शरणार्थी किशोरों को बांग्लादेश या म्यांमार डिपोर्ट किया जाए। अगर उनमें से कुछ अल्पवयों को शरण मिलती भी है तो उन्हें देश की मुख्य धारा में शामिल किया जाए। आंतरिक खुफिया तंत्र सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है।
2. सीमा पार आतंकवाद- सीमा पार आतंकवाद दूसरी बड़ी विभीषिका है। सीमा पर आए दिन झड़पें होती रहती हैं। पाकिस्तान के आतंकवादी हर रोज सीमा से भारत में प्रवेश करने की कोशिश करते रहते हैं। सीमावर्ती कश्मीर में खून – खराबे को अंजाम देने की कोशिश करते रहते हैं। जम्मू – कश्मीर की कुछ अतिवादी आबादी अपने बीच हिंदुओं को आकर बसने देना नहीं चाहती। वह सिर्फ यही चाहती है कि जम्मू-कश्मीर सिर्फ़ मुसलमानों का बना रहे। जम्मू-कश्मीर की उदारवादी आबादी अमन और शांति चाहती है। पाकिस्तान की दखलंदाजी पसंद नहीं करती है। इस कारण क्षेत्र हमेशा तनाव व अशांति में पड़ा रहता है। संघर्ष होता रहता है। पाकिस्तान के पक्ष में व विरोध में नारे लगते रहते हैं। हालांकि धारा 370 के हटने व नए माहौल के बनने के बाद परिस्थिति सुधरी है , मगर इतनी भी नहीं सुधरी कि चैन की नींद सोया जाए।
3. खालिस्तानी मूवमेंट- खालिस्तानी मूवमेंट देश की विभीषिकाओं में से एक जटिल विभीषिका है। यह मूवमेंट गलत आधार पर खड़ा है। खालिस्तानी आतंकवाद न तो गुरु तेग बहादुर की देन है न ही गुरु गोविंद सिंह की। यह अवधारणा किसी भी सच्चे सिख की नहीं है। पाकिस्तान भारतीय युवाओं को बरगलाकर उन्हें खालिस्तानी मूवमेंट में लगा रहा है। कुछ भारतीय राजनीतिज्ञ भी खालिस्तानी आतंकवाद के लिए उत्तरदायी हैं।
4.नक्सली  आतंक- नक्सली आतंक को विभीषिका का रूप दिए बगैर रहा नहीं जा सकता। नक्सली जंगलों के अंदर – अंदर ही तमाम आतंकी गुटों के संपर्क में रहते हैं व हथियार व युद्ध सामग्री हासिल करते रहते हैं। इन हथियारों व युद्ध सामग्री का उपयोग उपद्रव मचाने में करते रहते हैं। हालांकि नक्सली उपद्रव एक हद तक नियंत्रण में है , मगर यह एक ऐसी विभीषिका है , जिस पर पल भर के लिए भी नजर हटाना मुश्किल को न्योता दे सकता है।
5. माफियावाद- माफियावाद आज की एक ऐसी समस्या है , जो तूती की तरह बोल रही है। आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं , जहां माफियावाद न आया हो। खनिज माफिया, शिक्षा माफिया , स्वास्थ्य माफिया, रोड माफिया हर क्षेत्र में माफिया सर चढ़कर बोल रहा है। और ये माफिया सबसे ज्यादा कतिपय प्रशासनिक हलकों में सक्रिय रहते हैं। साथ ही साथ अपने – अपने स्तर पर रंगदारी ङ्घह्म्वसूल करते हैं। आज के समय में नशा – माफिया सबसे ख़तरनाक माफिया है , जिसने एक बड़ी आबादी का जीना दूभर कर दिया है। आज माना जाता है कि देश की संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा माफिया के हाथों में हैं। कुल मिलाकर यही समझा जा सकता है कि इन पांच दानवों से देश को मुक्त कराना, मोदी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए ताकि आम जनता , चाहे कोई भी हो चैन , की सांस ले व निश्चिंत जिंदगी जिए।
(विनायक फीचर्स)

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का क्रूर अध्याय है आपातकाल

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(डॉ. मोहन यादव-विनायक फीचर्स)
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 को लागू किया गया आपातकाल एक काले और क्रूर अध्याय के रूप में है। इस दिन भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने आपातकाल के प्रावधानों के तहत हजारों विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था। भारतीय लोकतंत्र में कांग्रेस पार्टी आपातकाल के कलंक से कभी मुक्त नहीं हो सकती।
कांग्रेस शासन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए विपक्षी दलों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन के कारण देश की कानून व्यवस्था की स्थिति खराब होने का बहाना बनाते हुए इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल लगाया था। इंदिरा गांधी ने तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक 21 महीने की अवधि के लिए हर छह महीने में आपातकाल लगाने के लिए कहा था।

आपातकाल के दौरान, इंदिरा गांधी ने खुद को सर्वशक्तिमान के रूप में स्थापित किया था। उन्होंने पार्टी के कुछ करीबी सदस्यों और अपने छोटे बेटे संजय गांधी के परामर्श से कई सारे निर्णय लिए जिसका भारत के सामाजिक तानेबाने पर दूरगामी प्रभाव पड़ा।

आपातकाल को अक्सर स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक काला दौर माना जाता है। इस अवधि में बेलगाम सरकारी कैद, असहमति को दबाना और नागरिक स्वतंत्रता पर सरकारी दमन की घटनाएं हुईं। मानवाधिकारों के लगातार उल्लंघन और प्रेस पर दमनकारी हद तक सेंसरशिप की खबरें आती रहीं। आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों के निलंबन को पर्यवेक्षकों और संवैधानिक विशेषज्ञों द्वारा चिंता के साथ याद किया जाता है।
दरअसल आपातकाल की बुनियाद 1967 के गोलकनाथ मामले से ही पड़ गई थी। गोलकनाथ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि यदि परिवर्तन मौलिक अधिकारों जैसे बुनियादी मुद्दों को प्रभावित करते हैं तो संसद द्वारा संविधान में संशोधन नहीं किया जा सकता है। इसके बाद इस निर्णय को निष्प्रभावी करने के लिए, सरकार ने 1971 में 24वाँ संशोधन पारित किया। सर्वोच्च न्यायालय में सरकार द्वारा तत्कालीन राजकुमारों को दिए गए प्रिवी पर्स के मामले में भी इंदिरा गांधी की किरकिरी हुई थी।

न्यायपालिका-कार्यपालिका की यह लड़ाई ऐतिहासिक केशवानंद भारती मामले में जारी रही, जहां 24वें संशोधन पर सवाल उठाया गया था। 7-6 के मामूली बहुमत के साथ, सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने संसद की संशोधन शक्ति को यह कहते हुए प्रतिबंधित कर दिया कि इसका उपयोग संविधान के “मूल ढांचे” को बदलने के लिए नहीं किया जा सकता है। इंदिरा गांधी को यह नागवार लगा और उन्होंने केशवानंद भारती मामले में अल्पमत में शामिल लोगों में सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश ए.एन. रे को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया।

न्यायपालिका को नियंत्रित करने की इंदिरा गांधी की प्रवृत्ति की प्रेस और जयप्रकाश नारायण (जेपी) जैसे राजनीतिक विरोधियों ने कड़ी आलोचना की। जयप्रकाश नारायण ने देश में घूम-घूम कर इंदिरा सरकार के खिलाफ रैलियां की और कुछ राज्यों में छात्रों ने आंदोलन भी किये।

इस बीच, सार्वजनिक नेताओं पर हत्या के प्रयास हुए और साथ ही तत्कालीन केन्द्रीय रेल मंत्री ललित नारायण मिश्रा की बम से हत्या कर दी गई। इन सभी बातों से पूरे देश में कानून और व्यवस्था की समस्या बढ़ने का संकेत मिलने लगा, जिसके बारे में इंदिरा गांधी के सलाहकारों ने उन्हें महीनों तक चेतावनी दी थी। इसके बाद मामले को हाथ से निकलता देख इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाने का फैसला किया। कांग्रेस पार्टी का यह फैसला देश के लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हुआ और इसे एक काला दिन के रूप में याद किया जाने लगा।

18 वीं लोकसभा के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आपातकाल को लेकर कांग्रेस पर तीखा हमला किया और आपातकाल की घोषणा को भारत के लोकतंत्र पर एक “काला धब्बा” बताया। 18वीं लोकसभा के पहले सत्र से पहले मीडिया को संबोधित करते हुए देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने कहा, “कल 25 जून को भारत के लोकतंत्र पर लगे उस कलंक के 50 साल हो रहे हैं। भारत की नई पीढ़ी कभी नहीं भूलेगी कि भारत के संविधान को पूरी तरह से नकार दिया गया था, संविधान के हर हिस्से की धज्जियां उड़ा दी गई थीं, देश को जेलखाना बना दिया गया और लोकतंत्र को पूरी तरह से दबा दिया गया था।” उन्होंने कहा, “अपने संविधान की रक्षा करते हुए, भारत के लोकतंत्र की, लोकतांत्रिक परंपराओं की रक्षा करते हुए, देशवासी यह संकल्प लेंगे कि भारत में फिर कोई ऐसा करने की हिम्मत नहीं करेगा जो 50 साल पहले किया गया था। हम एक जीवंत लोकतंत्र का संकल्प लेंगे। हम भारत के संविधान के निर्देशों के अनुसार आम लोगों के सपनों को पूरा करने का संकल्प लेंगे।”

18वीं लोकसभा के चुनाव की घोषणा होने के बाद कांग्रेस पार्टी के प्रमुख मुद्दों में से एक संविधान बचाने का मुद्दा था। जिसे पार्टी आज भी जोर शोर से उठा रही है। विडंबना ये है कि जिस कांग्रेस ने संविधान में सैकड़ों संशोधन किए, उसके मूल ढांचे में संशोधन किए वह पार्टी आज संविधान बचाने की बात कर रही है। जिस भारतीय जनता पार्टी की पूरी राजनीति संविधान में दिए गए प्रावधान के तहत समाज के गरीबों, महिलाओं, वंचितों और दलितों की उत्थान के लिए है आज उस बीजेपी पर संविधान की दुर्दशा करने वाली कांग्रेस पार्टी आरोप लगा रही है।

देश के महानायक प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कई बार इस बात का जिक्र किया है कि भारत की आत्मा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के संविधान में बसती है और इसे संसद भी नहीं बदल सकती। इसके बाद भी कांग्रेस पार्टी द्वारा गलत अवधारणा फैला कर जनता को बरगलाने का काम किया जा रहा है। लोकसभा चुनावों में जनता कांग्रेस और उनके साथियों के झांसे में आ गई थी, लेकिन विपक्षी पार्टियों की काठ की यह हांडी बार बार नहीं चढ़ेगी।(विनायक फीचर्स)(लेखक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।)

रानी दुर्गावती – जनकल्याण और शौर्य का शिखर

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(डॉ. मोहन यादव-विभूति फीचर्स)
वह दुर्गाष्टमी का दिन था जब भारत भूमि पर एक ऐसी बेटी ने जन्म लिया, जिसके संस्कारों में एक तरफ तो करुणा और संवेदना समाहित थी, वहीं दूसरी ओर शौर्य, पराक्रम और सतीत्व रगों में दौड़ता था। आज पांच सौ वर्षों के बाद भी हम यदि इतनी श्रद्धा और गौरव के साथ वीरांगना रानी दुर्गावती का स्मरण कर रहे हैं तो वह किसी राज परिवार की प्रमुख होने के नाते नहीं, बल्कि उनके दूरगामी जनकल्याणकारी कार्यों और शौर्य की उस गाथा के कारण कर रहे हैं, जिसने भारत की नारी की वीरता को शिखरतम बिन्दु तक रेखांकि‍त किया है।

5 अक्टूबर 1524 को कालिंजर में पैदा हुईं दुर्गावती का बलिदान 24 जून 1564 में हुआ। अर्थात 40 वर्ष की आयु में उन्होंने एक ऐसी प्रेरक परिपाटी खड़ी कर दी, जो आज भी मानवता के लिए मिसाल बनी हुई है। महारानी की वीरता की बात करें तो उन्होंने अपने छोटे से जीवन काल में लगभग 52 युद्ध लड़े और उनमें से 51 युद्धों में विजय प्राप्त‍ हुई। मालवा के सुल्तान बाज बहादुर से लेकर अकबर तक मुगलों के अनेक भारी आक्रमणों का मुंहतोड़ जवाब देने वाली दुर्गावती ने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए आत्म बलिदान दिया। कोई दुश्मन उनकी देह को हाथ नहीं लगा सका। क्या अद्भुत अवतारी थीं रानी दुर्गावती कि विवाह के मात्र चार वर्ष बाद ही पति दलपत शाह की मृत्यु के कारण पूरे राजकाज का बोझ सिर पर आने के बाद भी न केवल एक वर्ष के अपने बेटे की परवरिश की बल्कि निरंतर युद्ध के मैदान में भी वीरता दिखाई।

सोलह वर्ष के शासन काल में एक ओर जहां दुर्गावती लगभग 52 बड़े युद्धों में रणचण्डीत की तरह टूटती रहीं, वहीं दूसरी ओर राज्य की जनता की खुशहाली के लिए पूरी संवेदनाओं के साथ सक्रिय रहीं। जल संरक्षण के क्षेत्र में रानी दुर्गावती के योगदान को वैश्विक मानकों में सबसे ऊपर रखा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। अपने सहयोगियों के प्रति ऐसा असीम स्नेह करती थीं कि उनके नाम पर कई बांध, तालाब और बाबड़ि‍यां बनाई। अपने सहयोगी के नाम पर निर्मित आधारताल आज भी जबलपुर में रानी के जल संरक्षण के उच्च मानकों की गाथा गौरव के साथ कह रहा है।
शौर्य या वीरता रानी दुर्गावती के व्यक्तित्व का एक पहलू था। वो एक कुशल योद्धा होने के साथ-साथ एक कुशल प्रशासक थीं और उनकी छवि एक ऐसी रानी के रूप में भी थी, जो प्रजा के कष्टों को पूरी गहराई से अनुभव करती थीं। इसीलिए गोंडवाना क्षेत्र में उन्हें उनकी वीरता और अदम्य साहस के अलावा उनके जनकल्याणकारी शासन के लिए भी याद किया जाता है। रानी दुर्गावती के शासन में नारी की सुरक्षा और सम्मान उत्कर्ष पर था। न्याय और समाज व्यवस्था के लिए हजारों गांवों में रानी के प्रतिनिधि रहते थे। प्रजा की बात रानी स्वयं सुनती थीं। पूरा कोइतूर गोंड समाज उनके निष्पक्ष न्याय के लिए उन्हे “न्याय की देवी” के नाम से पुकारता और जानता था। रानी दुर्गावती अपने पराजित दुश्मन के साथ भी उदारता का व्यवहार करती थीं और उन्हें सम्मानपूर्वक कीमती उपहार और पुरस्कार के साथ शुभकामनाएँ देकर अपने नियंत्रण में रखती थीं। उनकी यह रणनीति हमेशा काम करती थी इसीलिए कभी भी गोंडवाना में विद्रोह के स्वर नहीं उठे।

वे जन कल्याण की जीवंत प्रतिमूर्ति थीं। गोंड साम्राज्य में बने तमाम मठ मंदिर, कुंए, तालाब, नहरें, धर्मशालाएं इसकी गवाह हैं। उनके साम्राज्य में समृद्धि ऐसी थी कि जनता स्वर्ण मुद्राओं से व्यापार करती थी। इसी समृद्धि को लूटने के लिए अकबर जैसे आक्रांताओं ने दुर्गावती के राज्य पर बार-बार आक्रमण किए। रानी ने बार-बार अकबर को शिकस्त दी, लेकिन अकबर की सेना के साथ चौथे युद्ध में वे बुरी तरह घिर गईं। उनकी आंख और गर्दन में तीर घुस गए तब उन्होंने अपने संकल्प ”विजय नहीं तो क्या हुआ, बलिदान तो संभव है” का स्मरण करते हुए स्वयं के वक्ष में कटार घोंपकर रणभूमि में आत्‍म बलिदान कर दिया। रानी की चिता को रणभूमि में ही अग्नि दी गई। उसी स्थान को बरेला नाम से जानते हैं।

सच तो यह है कि आत्म अस्मिता और स्वतंत्रता के लिए दिए जाने वाले ऐसे बलिदान ही प्रतिमान गढ़ते हैं। लेकिन यह प्रतिमान प्रतिपल ध्‍यान में रहें तो पीढ़ियों तक राष्ट्र स्वाभिमान जाग्रत रह सकता है। दुर्भाग्य से 1947 की स्वतंत्रता के बाद भी लंबे समय तक रानी दुर्गावती जैसी वीरांगनाओं और शूरवीरों की स्मृतियों को संजोए रखने के बेहतर प्रयास नहीं हुए। मुगलों, शकों, हूणों और अंग्रेजों के विरुद्ध किए गए युद्धों की श्रंखला में हमारे वनवासी, जनजाति समाज के नायकों का अतुलनीय और अविस्मरणीय योगदान है। परन्तु सच तो यही है कि रानी दुर्गावती से लेकर महानायक बिरसा मुण्डा, शंकर शाह, रघुनाथ शाह, टंट्या मामा जैसे महानायकों के शौर्य की प्राण प्रतिष्ठा का काम हमारे विचार की सरकारों ने ही किया है। भारत में जहां ”जनजातीय गौरव दिवस” जैसा आत्म-सम्मान प्रदान करने वाले प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का संकल्प हो अथवा जनजाति मंत्रालय के पृथक गठन का पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी का ऐतिहासिक फैसला हो, राष्ट्रीय विचार ने ही अपने उन भाई-बहनों के सम्मान और संसाधन पर ध्यान केन्द्रित किया है, जो कभी राजा थे लेकिन समय के थपेड़े में बिछड़ते और पिछड़ते चले गए।
जनजाति समाज की समृद्ध परंपराओं पर केन्द्रित करते हुए हमारी सरकारों ने अपने बंधुओं को सम्मान और संसाधान से परिपूर्ण बनाने के लिए ‘पेसा’ एक्ट लागू किया। महानायकों की स्मृतियों को चिरस्थायी रखने के लिए जहां संग्रहालय बनाए जा रहे हैं, वहीं माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की पहल पर भोपाल में रेलवे स्टेशन को रानी कमलापति को समर्पित कर दिया गया है। मुझे लगता है कि जनजाति महानायकों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए हमें अभी बहुत काम करने की आवश्यकता है। मेरी सरकार की पहली कैबिनेट बैठक रानी दुर्गावती की सुशासन नगरी जबलपुर में किए जाने का हमारा भावनात्मक आधार ही था। यह रानी दुर्गावती का 500वां जन्म शताब्दी वर्ष चल रहा है। हम इसे दूरगामी प्रेरणा पर्व के रूप में मनाने का प्रयत्न कर रहे हैं।

केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा संचालित अनेक जनकल्याणकारी योजनाओं का भरपूर लाभ जनजाति समाज को मिले, ऐसा भरसक प्रयास हम कर रहे हैं। जनजाति अस्मिता, संरक्षण और सांस्कृतिक संवर्द्धन हमारी सरकार का संकल्प है। जैसा कि मैंने पूर्व में कहा कि जनजाति समाज को सम्मान और संसाधन प्रदान करना हमारा नैतिक दायित्व है। यही रानी दुर्गावती जैसी शौर्य, पराक्रम और संवेदनशीलता की प्रतिमूर्ति के श्रीचरणों में सच्ची श्रद्धांजलि होगी। *(विभूति फीचर्स)(लेखक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं)*

सिंगर ऋतु पाठक ने गाया फिल्म ‘सुशासन’ के लिए सुधाकर शर्मा का लिखा गीत ढिंचक सरफिरी

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मुंबई। सलमान खान की नायिकाओं की चुनरिया उड़ाते रहे चर्चित गीतकार सुधाकर शर्मा ने अपना प्लेटफार्म तो नहीं पर पैंतरा ज़रूर बदल लिया है।

सुधाकर शर्मा ने सलमान की फिल्म प्यार किया तो डरना क्या, बीवी नंबर 1 और हैलो ब्रदर के गाने में चुनरी का प्रयोग किया था जो हिट साबित हुआ था। अब उन्होंने नये अंदाज के आइटम नंबर लिखना आरम्भ कर दिया है। अभी हाल ही में हिन्दी फिल्म “सुशासन” के लिए शर्मा ने एक आइटम नंबर लिखा जो सोशल नेटवर्किंग से संबंधित/ संदर्भित शब्दों से सराबोर एक फड़कता गीत है। इसे जलेबी बाई गीत गाकर चर्चा में आई सिंगर ऋतु पाठक ने एक बिंदास अंदाज में आया है। संगीत देने वाले युवराज मोरे ने कहा, यह गीत इतना मॉडर्न और ट्रेंडी है कि ऋतु को लोग सरफिरी सरफिरी बोलने लगेंगे। सुधाकर ने अपने पुराने ट्रेंड चुनरिया को छोड़कर यह गीत ढिंचक सरफिरी लिखा है जो काबिले तारीफ है। युवराज मोरे ने गीत के अनुसार ही नये अंदाज का म्यूजिक दिया है।
वसुन्धरा फिल्म्स प्रोडक्शन प्रा लि कृत हिन्दी फिल्म “सुशासन” का आइटम नंबर गीत “ढिंचक सरफिरी” हाल ही में ऋतु पाठक के स्वर में कृष्णा ऑडियो रिकॉर्डिंग स्टूडियो, गोरेगांव (पश्चिम), मुंबई में रिकॉर्ड किया गया। सुधाकर शर्मा द्वारा रचित इस गीत के लिए संगीत युवराज मोरे ने दिया है। फिल्म के निर्माता मनीष कुमार सिंह, सह – निर्मात्री निवेदिता देव तथा लेखक – निर्देशक दीपक पाण्डेय हैं।
इस फिल्म की शूटिंग पूरी हो चुकी है और जिसमें प्रसिद्ध अभिनेता राजपाल यादव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।