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लीजेंड दादा साहेब फाल्के अवार्ड 2024 का भव्य आयोजन कृष्णा चौहान के जन्मदिन पर हुआ संपन्न

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चीफ गेस्ट के. सी. बोकाडिया, धीरज कुमार, दिलीप सेन, सुनील पाल, रितु पाठक, दीपक सावंत, बी.एन. तिवारी, एसीपी संजय पाटिल, मुकेश साहू माहेश्वरी, ब्राइट आउटडोर मीडिया के प्रतिनिधि की उपस्थिति

मुम्बई। बॉलीवुड के फिल्म निर्देशक कृष्णा चौहान ने अपने जन्मदिन के अवसर पर 4 मई 2024 को ‘पांचवें लीजेंड दादा साहेब फाल्के अवार्ड 2024’ का आयोजन मुम्बई महानगर के उपनगर अंधेरी पश्चिम स्थित मेयर हॉल में किया। केसीएफ प्रस्तुत इस पुरस्कार समारोह में उन हस्तियों को सम्मानित किया गया जिन्होंने फिल्मी दुनिया मे अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। कृष्णा चौहान द्वारा आयोजित इस अवार्ड समारोह में कई हस्तियां मौजूद रहीं, जिनमें मुख्य अतिथि फिल्म निर्माता के. सी. बोकाडिया, फिल्म और टीवी शो निर्माता धीरज कुमार, संगीतकार दिलीप सेन, कॉमेडियन सुनील पाल, सिंगर रितु पाठक, दीपक सावंत, बी.एन. तिवारी, एसीपी संजय पाटिल, मुख्य अतिथि डॉ. मुकेश साहू माहेश्वरी (राष्ट्रीय नेता भाजपा, दिल्ली, राजनीतिज्ञ), ब्राइट आउटडोर मीडिया के प्रतिनिधि, निक्की बत्रा, भारती छाबड़िया, गायक मंगेश, एंकर जयश्री पंवार, निर्देशक आनंद डी. गहतराज, आर. राजपाल, पी. के. गुप्ता, मॉडल मालकॉम भाया, मॉडल कियारा रावत, मॉडल अनीत टी, मॉडल मेघा हेमदेव, मॉडल जिया मिश्रा, अभिनेत्री सपना सिंह, गायिका रीया पटेल, कैमरामैन राजू गौली, गायक सागर आचार्य, सिंगर डॉ. अंजली दमनगांवकर, एडवोकेट अभिनेत्री रूपाली शेट्टी, निर्माता रमेश मल्होत्रा, मेकअप आर्टिस्ट सिवानी कक्कड़, मेकअप आर्टिस्ट तबस्सुम अली, गायक जायद खान, ऎक्ट्रेस प्रोड्यूसर सोमू मित्रा और इसहाक खान का नाम प्रमुख है।
स्टेज पर शानदार केक काटकर कृष्णा चौहान का जन्मदिन भी मनाया गया।


बता दें कि कृष्णा चौहान पिछले दो दशक से फिल्म जगत में फिल्ममेकर के रूप में काम कर रहे हैं। इसके साथ ही वह सामाजिक कार्यों में भी हमेशा आगे रहते हैं। कोविड काल के दौरान उन्होंने न सिर्फ जरूरतमंदों को राशन वितरित किया बल्कि भगवतगीता भी लोगों को भेंट किया।
अपने सभी अवार्ड समारोह की तरह इस समारोह में भी फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के साथ साथ कृष्णा चौहान ने इस बार भी कई पत्रकारों, फोटोग्राफर को सम्मानित किया।
गौरतलब हो कि कृष्णा चौहान अपनी नेक्स्ट हॉरर थ्रिलर फिल्म ‘आत्मा डॉट कॉम’ की शूटिंग भी जल्द शुरू करने जा रहे हैं। इस फिल्म में प्रसिद्ध संगीतकार दिलीप सेन संगीत देने वाले हैं।
उल्लेखनीय है कि डॉ कृष्णा चौहान न सिर्फ एक बॉलीवुड डायरेक्टर हैं, एक्टिव सोशल वर्कर हैं बल्कि अवार्ड्स फंक्शन्स करने के मामले में हमेशा आगे रहते हैं। उनका एक अवार्ड फंक्शन सम्पन्न होता है और वह अपने अगले पुरुस्कार समारोह की तैयारियों में लग जाते हैं।

अग्निशिखा मंच का मजदूर विषय पर कवि सम्मेलन संपन्न

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नवी मुंबई। अखिल भारतीय अग्निशिखा मंच एक सामाजिक सांस्कृतिक साहित्यिक मंच है जो विगत 30 वर्षों से सामाजिक और साहित्य कार्यक्रम करता आ रहा है। इसी कड़ी को आगे बढ़ते हुए मजदूर दिवस के उपलक्ष्य में एक ऑनलाइन कवि सम्मेलन रखा गया जिसमें करीब 20 कवियों ने शिरकत की।

इस कवि सम्मेलन की अध्यक्षता डॉ. कुंवर वीर सिंह मार्तंड ने की। वहीं मुख्य अतिथि थे राम राय, विशिष्ट अतिथि जनार्दन सिंह, संतोष साहू, शिवपूजन पांडे पन्नालाल शर्मा थे। मंच संचालन मंच की अध्यक्ष डॉ अलका पांडे ने किया, सरस्वती वंदना रवि शंकर कोलते ने की और आभार प्रदर्शन नीरजा ठाकुर ने किया। कवियों ने अपनी स्वरचित रचनाएं प्रस्तुत की। प्रतिभागी थे रामेश्वर प्रसाद गुप्ता, ओमप्रकाश पांडे, रवि शंकर कोलते, सुरेंद्र हरदे, अलका पांडे, नीरज ठाकुर, रानी अग्रवाल, ब्रिज किशोरी त्रिपाठी, मीना कुमारी परिहार, प्रतिभा द्विवेदी, रागनी मित्तल, चंद्रिका व्यास, अनिता झा, अरविंद कुमार, डॉ महताब अहमद आज़ाद, हीरा लाल आदि।
प्रस्तुत है कविता की कुछ लाइन :-
मजबूर ना हो मजदूर कभी

मजबूर ना हो मजदूर कभी ।
बहाते नित्य है पसीना सभी।।
हर पल मेहनत करतें आए है।
हार जीवन में न मानी कभी।।
सब का महल चौबारा बनाते।
बड़ी बड़ी अट्टालिकाएं गढ़ते।।
नदी नालों का बांध बनाते ।
सब के लिए अन्न ,फल उपजाते।
मजबूर ना हो मजदूर कभी
पर्वत काट पक्की सड़क बनाते ।।
हमारी जरूरत के हर काम को अंजाम देते।
रूखी सूखी खाकर भूख शांत करते।
मजदूरों पर ही सब काम निर्भर है
कोई काम इनके बिना हो सकता नही है।
पर इनकी तकलीफ कोई समझता नहीं।
इनकी जरूरत का कोई ख्याल करता नही है ।।
मजदूरों का भी आत्मसम्मान होता है ।
प्यार स्नेह की जरूरत उन्हें भी है ।।
पूरा हक उन्हें उनका मिल जाए तो।
आखों में आंसू ना होगे मजदूर, मजबूर ना होगा ।।
– अलका पाण्डेय, मुम्बई

बाल मज़दूर
भूख का वज़न तो भारी होता है
इन नन्हें हाँथों में ईंट का वजन भी भारी हैं!
इन नन्हें हाँथों का कमाल तो देखिए ! जनाब
चाय की प्याली में तूफ़ान ला
आम से ख़ास और प्रधान हो जाते हैं जनाब !
अनिता शरद झा

शीर्षक – ऐसा भी होता है
कोई कुबेर बांधे है मुट्ठी में, कोई कौडी़-कौड़ी रोता है।
ऐसा भी होता है।
– रागिनी मित्तल, कटनी, म.प्र.

आज के इस महंगाई के दौर में।
हर एक गरीब की जिंदगी बेहाल है ।।
दर-दर भटकता है रोजगार की खातिर।
गर काम न मिले जीना मुहाल है।।
– डॉ महताब अहमद आज़ाद, उत्तर प्रदेश

श्रम ही है श्री राम हमारा।
पूजा ही है काम हमारा ।।
धर्म हमारा है सेवा भक्ति ।
है मुक्ति का संगम हमारा ।।
– प्रो रविशंकर कोलते, नागपुर

मजदूर दिवस
एक मई है मजदूरों के नाम, दिवस महान,
मजदूर दिवस के रूप में मनाता
सारा जहान।
अपनी खुशी से कोई न बनना
चाहे मजदूर,
पेट पालने को करे मजदूरी,
होकर मजबूर।
– रानी

मजदूर
मैं मजदूर हूं, मजदूर हूं
इसलिए मजदूरी करनी पड़ती है
पढा लिखा होने पर भी
पेट के लिए मजदूरी करनी पड़ती है।
– सुरेंद्र

मजदूर
जी हाॅं मैं मजदूर हूॅं
एक दिन दिहाड़ी ना मिलने पर
परिवार सहित भूखा सो जाता हूॅं
मैं जानता हूॅं, मैं देश का पहिया हूॅं
देश की गाड़ी मैं ही तो चलाता हूॅं।
– नीरजा ठाकुर नीर
पलावा, मुंबई महाराष्ट्र

कॉर्डिस क्रिटी केयर हॉस्पिटल के डॉक्टर रघुवीर सिंह देवरा ने किया ताराचंद जैन का उपचार

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मुंबई। युवा बिजनेसमैन डॉ निकेश जैन माधानी के पिता ताराचंद जैन माधानी पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य संबंधी रोग से ग्रसित थे। उनकी अस्वस्थता से पूरा परिवार शोकमय रहने लगा था। चूंकि माधानी परिवार कई प्रकार के बिजनेस से जुड़ा है और घर के मुखिया के बीमार पड़ जाने से घर के सभी सदस्यों को दुख झेलना पड़ रहा था। फिर निकेश ने अपने पिता को कॉर्डिस क्रीटी केयर हॉस्पिटल, मीरा रोड में भर्ती किया। हॉस्पिटल में डॉक्टर रघुवीर सिंह देवरा की देखरेख में ताराचंद जैन की तबियत में सुधार हुआ और वे पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गए।

निकेश और उनके पिता ताराचंद ने डॉक्टर से प्राप्त सहयोगात्मक रवैया से प्रसन्न होकर उनका आभार व्यक्त किया।
डॉ रघुवीर अब तक कई रोगियों का सफलतापूर्वक उपचार कर चुके हैं।

भारत सरकार करेगी संगीतकार अली गनी को पद्मश्री से सम्मानित

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मुंबई। राजस्थान की मिट्टी और संस्कृति से जुड़े मांड के प्रसिद्ध गायक और संगीतकार अली गनी को भारत सरकार बहुत जल्द पद्मश्री से सम्मानित करेगी।

2024 की पद्मश्री लिस्ट में जब उनका नाम अली मोहम्मद और गनी मोहम्मद के तौर पर सामने आया तो ना केवल राजस्थान के लोगों के चेहरे खिल उठे बल्कि फ़िल्म इंडस्ट्री में भी ख़ुशी की लहर दौड़ गई। अली और गनी दोनों सगे भाई हैं और पिछले अनेक वर्षों से संगीत के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, बड़े बड़े गायक उनके संगीत निर्देशन में गा चुके हैं और वे ख़ुद भी बेहतरीन गायक हैं। उनके संगीत का जादू उस वक्त नज़र आया जब पंकज उधास की कई एल्बम हिट हुईं। जॉन अब्राहम, विद्या बालन, तारा शर्मा जैसे कई सितारों ने भी उनकी एल्बम से फ़िल्मी दुनिया में प्रवेश किया।
अति मिलनसार, सरल, और मधुर स्वभाव अली गनी को जब इस संबंध में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह मेरा नहीं पूरे राजस्थान का सम्मान है, पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री का सम्मान है।

विपक्ष मतदाताओं के विश्वास का सम्मान करें

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पूरन चन्द्र शर्मा –

हम सभी जानते हैं कि लोकतंत्र के हित में एक मजबूत विपक्ष का होना जरूरी है। विपक्ष को सदन में जनता ही भेजती है जिससे सत्ताधारी पार्टी किसी प्रकार की मनमानी न कर सके और देश सुचारु रूप से चलता रहे। यह स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए आवश्यक भी है।

लेकिन आज विपक्ष ही लोकतंत्र को कमजोर करने में लगा हुआ है। विपक्षी पार्टियों के नेता जनहित के स्थान पर अपने ही हित के बारे में सोचने लगे हैं जो कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है।

लोकतंत्र में जनता को मालिक और जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि को जनसेवक कहा जाता है।  इसे एक विडम्बना ही कहेंगे कि अधिकांश जनसेवक चुनाव जीतने के बाद जनता से दूरी बनाने लग जाते हैं।

जनता के साथ विश्वासघात कर बेशर्मी से ये जनता के पैसे को लूटने में लग जाते हैं। भारतीय राजनीति में भ्रष्ट  नेताओं की एंट्री हो जाने के कारण देश और देश की जनता को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इधर  देखने में आ रहा है कि कुछ सालों से भारतीय न्यायपालिका भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ कठोरता से पेश आ रही है जो कि देश के लिए  शुभ संकेत है।

पश्चिम बंगाल में एक-एक करके भ्रष्टाचार के नए केस सामने आ रहे हैं। पश्चिम बंगाल पुलिस निष्पक्ष हो कर काम नहीं कर पा रही। यहां की पुलिस को सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस पार्टी के नेताओं के इशारों पर काम करना पड़ रहा है। स्थानीय पुलिस प्रशासन चाह कर भी अपराधियों को गिरफ्तार नहीं कर पा रही है। ऐसी परिस्थिति में कलकत्ता हाई कोर्ट को बाध्य हो कर केंद्रीय जांच ब्यूरो एवं  अन्य केंद्रीय एजेंसियों को जांच करने के आदेश देने पड़ रहे हैं। पश्चिम बंगाल में शिक्षक भर्ती घोटाले के आरोप में पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी एवं उनकी करीबी अर्पिता मुखर्जी सहित कई नेता एवं मंत्री  जेल में बंद हैं।  शिक्षक भर्ती घोटाले के चलते राज्य की शिक्षा व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हुई है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी यदि समय रहते भ्रष्ट तरीके से नियुक्त किए गए शिक्षकों की सूची कलकत्ता हाई कोर्ट को सौंप देती तो बाकी के करीब 20 हजार शिक्षकों की नौकरी बच जाती।

सिर्फ 5000 के आसपास शिक्षकों को ही नौकरी से निकाला जाता जो रिश्वत देकर शिक्षक बने थे।  राज्य सरकार की अदूरदर्शिता के कारण योग्य शिक्षकों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है।

संदेशखाली में  महिलाओं पर हो रहे अत्याचार, टीएमसी नेताओं द्वारा जमीनों पर जबरन कब्जा करना आदि मुद्दों पर राज्य सरकार ईमानदारी से काम करती तो इस मामले में न्यायालय को राज्य सरकार के कार्यों में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

एक बार तो टीएमसी के एक नेता ने पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी शहर में स्थित 125 वर्ष पुराने श्री हनुमान मंदिर को दिन दहाड़े बुलडोजर से तोड़ दिया, जबकि मंदिर के पुजारी के पास जमीन के वैध कागजात भी थे। जलपाईगुड़ी नगर पालिका द्वारा हनुमान मंदिर की जमीन पर एक मार्केट काम्प्लेक्स का निर्माण करना था।  इस घटना की सूचना स्थानीय प्रशासन को दी गई थी पर प्रशासन मौनी बाबा बना रहा।  इसी प्रकार सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) शहर के समीप फुलवारी इलाके में एक टीएमसी नेता ने होलिका दहन की जमीन पर कब्जा कर उसे बेच दिया। शिकायत करने पर भी प्रशासन चुप बैठा रहा।

राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समय पर अपनी पार्टी के भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करती तो पार्टी की साख बनी रहती। चारों तरफ से राज्य सरकार की किरकिरी हो रही है।  आज तृणमूल कांग्रेस को बहुत ज्यादा कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। लोकसभा चुनाव के समय घोटाले का पर्दाफाश होने से राज्य की सत्ताधारी  पार्टी तृणमूल कांग्रेस को कितना नुकसान होगा तथा  राज्य की मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी भारतीय जनता पार्टी को कितना फायदा होगा यह तो मतगणना के बाद ही मालूम पड़ेगा। (विनायक फीचर्स)

रिट्रीट सेरेमनी में घटते पाकिस्तानी, बढ़ते हिन्दुस्तानी*

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सुभाष आनंद – विभूति फीचर्स
भारत पाक सीमा स्थित हुसैनी वाला बॉर्डर पर रिट्रीट सेरेमनी में दिनोंदिन पाकिस्तानी दर्शकों की संख्या घट रही है हिन्दुस्तानी दर्शक रोज बढ़ते जा रहे हैं।रीट्रीट सेरेमनी का नाम लेते ही  भारतीयों  की आंखों के सामने सीमा सुरक्षा बलों के जवानों और पाकिस्तानी रेंजरों की जोशीली परेड का दृश्य  घूमने लगता है।
हिंद-पाक सीमा पर हर शाम होने वाली इस बीटिंग -द-रिट्रीट बार्डर सेरेमनी में जहां भारत की तरफ से दर्शकों द्वारा भारत माता की जय, वंदे मातरम, हिंदुस्तान के नारे से आकाश गूंज उठता है, वहीं पाकिस्तान की तरफ से पाकिस्तान जिंदाबाद की नारेबाजी होती है। हालांकि पाकिस्तान की ओर से रिट्रीट सेरेमनी देखने आने वाले दर्शकों की घटती संख्या के कारण जोश कम होता नजर आ रहा है। वहीं भारत  में दर्शकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। सीमा सुरक्षा बल के एक उच्च अधिकारी ने बताया कि परेड देखने वालों की बढ़ती संख्या के कारण जगह कम पडऩे लगी है। जिसके कारण हमें लगातार दर्शकों की सीटिंग कैपेसिटी बढ़ानी पड़ रही है, यहां भारतीय दर्शकों में देशभक्ति का बढ़ता जोश देखकर सीमा सुरक्षा बल के जवानों को कुछ अन्य प्रबंध भी बैठने के लिए करने पड़ते हैं। वीआईपी लोगों के लिए अस्थाई अतिरिक्त कुर्सियां लगाई जाती है।
भारतीय दर्शकों में देशभक्ति का जोश  लगातार देखने को मिल रहा है ,जिसके कारण दर्शक दीर्घा फुल रहती है।
दूसरी तरफ यदि पाकिस्तान की बात की जाए तो वहां सीटिंग कैपेसिटी 3000 से भी कम है , अन्य अस्थाई कुर्सियां तथा वीआईपी लोगों को लेकर ज्यादा से ज्यादा 4000 लोगों द्वारा ही रिट्रीट सेरेमनी देखी जा सकती है।
सीमा सुरक्षा बल के एक अधिकारी ने बताया कि कोई समय था जब दोनों देशों के दर्शकों की संख्या बराबर रहती थी, शुक्रवार को पाकिस्तानी लोगों की संख्या ज्यादा होती थी जबकि रविवार को हिंदुस्तानी लोगों की संख्या ज्यादा होती थी, दोनों तरफ से जमकर नारेबाजी होती थी, लेकिन अब भारत की तरफ से लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है जबकि पाकिस्तानी दर्शकों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है।
विदेशों बसे भारतीय जब फिरोजपुर आते हैं तो वह अपने सम्राट शहीदों भगत सिंह ,राजगुरु ,सुखदेव को श्रद्धांजलि भेंट करने के लिए यहां भी जरूर आते हैं। यह स्थान अब दुनिया भर में एक पर्यटन स्थल बनता जा रहा है जबकि  पाकिस्तान के लिए  सिर्फ एक बॉर्डर है। (विभूति फीचर्स)

जयंती 7 मई*विश्व बंधुत्व और मानव एकता के प्रतीक थे गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर*

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(इंजी. अतिवीर जैन – विनायक फीचर्स)
रविंद्रनाथ टैगोर को आज भी भारत ही नहीं विश्व में एक महान कवि, उपन्यासकार, कथाकार, नाटककार, संगीतकार और चित्रकार के रूप में याद किया जाता है। उनका साहित्य उनके व्यक्तित्व के अनुरूप जीवन के सभी क्षेत्रों में उभरकर सामने आया। वे साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रथम एशियाई व्यक्ति थे।
विश्व साहित्य के प्रकाश पुंज रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म कोलकाता के जोड़ासांको ठाकुरवाडी में सात मई 1861 को चौदहवी संतान के रूप मे हुआ था। आपके पिता का नाम देवेंद्रनाथ ठाकुर था। वे ब्राह्मण समाज के बड़े नेता थे। उनका परिवार कोलकाता का एक संपन्न और प्रतिष्ठित परिवार था। आपकी माता का नाम शारदा देवी था। जमींदार होने के कारण इन्हें ठाकुर कहा जाता था।
अंग्रेजों को ठाकुर बोलने में परेशानी होती थी।  तो उन्होंने ठाकुर का अपभ्रंश टैगोर कर दिया जो आज तक प्रचलन में है। आपके माता का निधन आपके बाल काल में ही हो गया था। आपकी परवरिश घर के नौकरों ने की। आपकी प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता के ओरियंटल सेमिनरी  स्कूल में और घर पर नियुक्त शिक्षक की देखरेख में हुई। आप उस समय की स्कूली शिक्षा पद्धति से संतुष्ट नहीं हुए और स्कूल छोड़ दिया।  इसी समय कोलकाता में महामारी फैलने के कारण इन्हें बोलपुर भेज दिया गया। बोलपुर गांव में जाने पर उन्हें खुला प्राकृतिक वातावरण मिल गया। जिससे उनकी काव्य रचना में और निखार आया।
सितंबर 1878 को अपने बड़े भाई सत्येंद्रनाथ के साथ शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए। लंदन में कानून की पढ़ाई के लिए ब्रिजस्टोन पब्लिक स्कूल में एडमिशन ले लिया। पर उसे पूरा करने से पूर्व ही 1880 में भारत वापस आ गए। उनका मन वहां पर नहीं लगा। 22 वर्ष की उम्र में आपका विवाह  मृणालिनी  नाम की 11 वर्षीय कन्या से हो गया। उनके विवाह समारोह में वंदे मातरम के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय भी आए थे और उनकी प्रतिभा को देखकर उन्होंने कहा था-यह साहित्य के आकाश का उदीयमान नक्षत्र है।
आठ वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पहली काव्य रचना का सृजन किया था। शुरुआत में वह पारिवारिक पत्रिका भारती और बालक के लिए शिशु गीत ,कविताएं ,कहानियां ,नाटक , लघु उपन्यास आदि लिखने लगे। साधना नामक पत्रिका में लगभग 20 वर्षों तक उनके विचार कविताएं, लेख, कहानी, उपन्यास छपते रहे। इस बीच दुबारा लंदन जाकर उन्होंने अपने ज्ञान को बढ़ाया।  कुछ समय बाद पुन: भारत आ गए। इस समय तक रविंद्र नाथ टैगोर लेखक के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुके थे। परंतु पिताजी के कहने पर अपने बीवी बच्चों सहित सियालदह चले गए। जहां पर उनकी जमींदारी खेती आदि थी। उनका गाँव  गंगा और ब्रह्मपुत्र के संगम पर स्थित है।
यहां से प्राकृतिक दृश्य अत्यंत सुंदर और लुभावने लगते थे। और गांव में दूर-दूर तक जाने के लिए नौका में जाना पड़ता था। इस प्रकार जल बिहार में उनका प्राकृतिक प्रेम और भी ज्यादा विकसित हुआ। इनकी आत्मा से कविता का झरना फूट पड़ा। जमींदार के रूप में अपने उन्होंने अपने गांव के गरीब और निर्धन लोगों की सहायता की और गांव के प्राकृतिक वातावरण को अपनी लेखन कला में समेटा। इसी समय उन्होंने बाल कहानी डाकपाल और प्रसिद्ध रचना काबुलीवाला की भी रचना की।
1901 में अपने दो पुत्रों रविथींद्रनाथ और शर्मींदनाथ तथा पांच विद्यार्थियों के साथ अपने पिता के द्वारा स्थापित किए गए शांतिनिकेतन में एक विद्यालय की स्थापना की। इस विद्यालय का नाम ब्रह्मचर्य आश्रम रखा।  रविंद्रनाथ को खुले वातावरण हरियाली और पेड़ों के नीचे शिक्षा देना और प्राप्त करना बड़ा अच्छा लगता था।
इसी बीच उनकी पत्नी गंभीर रूप से बीमार पड़ गई और 1902 में इस संसार को छोड़ गई। आपके गीतों में एक आंतरिक प्रेम की पुकार के स्थान पर वैश्विक प्रेम के विचार आने लगे। उनकी चंचलता गंभीरता में परिवर्तित होने लगी। 1905 में उनके पिता महर्षि देवेंद्रनाथ का  देहांत हो गया। इस सबसे आप और भी ज्यादा अंतर्मुखी हो गए।
सन् 1905 में आपके नेतृत्व में कोलकाता में रक्षाबंधन उत्सव पर बंग भंग आंदोलन का प्रारंभ हुआ। और इसी आंदोलन से देश में  स्वदेशी आंदोलन का प्रारंभ हुआ। उस समय राष्ट्र परिवर्तन के नए दौर से गुजर रहा था।
सन 1909 से 1910 के बीच आपके लिखे गीतों का एक संकलन गीतांजलि नाम से बांग्ला भाषा में  प्रकाशित हुआ। 1912 में जब उन्हें तेज ज्वर हो गया तो वह आराम के लिए सियालदह आ गए। और यहीं पर उन्होंने गीतांजलि का अंग्रेज़ी अनुवाद किया।  इस अंग्रेजी अनुवाद को इंडिया सोसाइटी ऑफ लंदन द्वारा 1912 में प्रकाशित किया गया।  इसके अंग्रेजी में छपते ही रविंद्रनाथ की प्रसिद्धी पूरे विश्व में फैलने लगी। और नवंबर 1913 में उन्हें गीतांजलि के लिए नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गई।
उस समय साहित्य के क्षेत्र में किसी भी एशियाई को दिया जाने वाला यह प्रथम पुरस्कार था। आपकी  विद्वत्ता से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने आपको 1915 में नाइट हुड सर की उपाधि प्रदान की। परंतु 1919 में अंग्रेजी सरकार द्वारा जलियांवाला  बाग के हत्याकांड के विरोध में उन्होंने इस उपाधि को वापस कर दिया।
1915 में  गांधीजी शांतिनिकेतन आए। और यहीं पर दो महान विभूतियों का मिलन हुआ। गांधी जी ने रविंद्रनाथ को गुरुदेव के नाम से संबोधित किया और रविंद्रनाथ ने गांधी जी को महात्मा की उपाधि दी। और तब से ही इन दोनों विभूतियों के नाम के साथ यह शब्द जुड़ गए। रविंद्रनाथ साहित्यिक और दार्शनिक क्षेत्र में प्रसिद्धि पा चुके थे। तो गांधी जी राजनीतिक क्षेत्र में। इन महान विभूतियों का संबंध जीवन के अंत तक बना रहा। आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक से भी रविंद्रनाथ ठाकुर जी की तीन बार मुलाकात हुई। आइंस्टीन रविंद्रनाथ को रब्बी अर्थात मेरे गुरु कहते थे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस रविंद्रनाथ टैगोर के कहने पर ही गांधी से मिले थे।
रविंद्र नाथ बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।
कविता निबंध नाटक कहानी उपन्यास संगीत चित्रकला सभी में उनका हाथ और कलम चली। वे भारत की पुरातन कुरीतियों का विरोध करते थे। उनका कहना था कि स्त्री और दलितों को साथ लिये बिना हमारी उन्नति पूर्ण नहीं हो सकती। अन्यथा जब हम  चलेंगे तब ये हमारा पैर पकड़ कर नीचे खींच लेंगे और इस प्रकार हमारी प्रगति में सहायक ना होकर हमें  पतन की ओर ले जाएंगे।  आपकी सबसे बड़ी विशेषता विश्व बंधुत्व और मानव आत्मा के प्रति  विशेष आकर्षण था। आप समस्त विश्व के अत्याचार और विरोध को नष्ट करके प्रेम और एकता की स्थापना करना चाहते थे।
आप अकेले ऐसे कवि हुए हैं जिनके  गीत आज भी दो देशों के राष्ट्रगीत के रूप में चल रहे हैं।  हमारे देश का राष्ट्रगीत जन गण मन और दूसरा बांग्लादेश का राष्ट्रगीत  अमार सोनार बांग्ला आपके द्वारा ही रचित है।  टैगोर ने करीब 2230 गीतों की रचना की। आपकी अधिकांश रचनाएं बांग्ला में है।
जिनके बाद में हिंदी,  अंग्रेजी और  विश्व  की  अनेक भाषाओं में अनुवाद किए गए। आपने 1921 में शांतिनिकेतन को विश्व भारती विश्वविद्यालय का दर्जा दिया और अपनी सारी नोबेल पुरस्कार की राशि और कॉपीराइट शांतिनिकेतन को दे दिए। 1926 में मुसोलिनी के निमंत्रण पर आप इटली के नेपल्स में गए। मुसोलिनी से मुलाकात करने के बाद वहां से स्विट्जरलैंड और जर्मनी गए। उन्होंने उस समय कई देशों की यात्रा की। कई साल विदेश में भ्रमण करने के बाद 1934 में फिर शांतिनिकेतन लौट आए।  1940 में गांधी जी कस्तूरबा गांधी के साथ शांतिनिकेतन में उनसे मिलने आए। उन्होंने कहा- हालांकि मैं इस यात्रा को तीर्थ यात्रा कहता हूं।  मैं यहां अजनबी नहीं हूं। मुझे ऐसा लगता है जैसे कि मैं अपने घर पर लौट आया हूं। मुझे गुरुदेव का आशीर्वाद मिल गया और मेरा हृदय आनंद से विभोर हो उठा।
वृद्धावस्था में रविंद्रनाथ का स्वास्थ्य बीमारी के कारण गिरता जा रहा था। इस कारण जुलाई 1941 को उनको अपने पैतृक घर जोड़ासांको ले जाया गया। उन्होंने अंतिम चरण तक कविताएं लिखी और 7 अगस्त 1941 को दोपहर 12:10 पर विश्व साहित्य का यह प्रकाश स्तम्भ सदा के लिए इस संसार से विदा हो गया।
आज भी सारे भारत में  राष्ट्र गीत  जन गण मन के माध्यम से प्रतिदिन ही गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर को स्मरण किया जाता है। पर उनकी 163 वीं  जन्मतिथि पर हम विश्व बंधुत्व और मानव एकता के उनके संदेश को अपना ले , तो वही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी। (विनायक फीचर्स)

सुशांत सिंह राजपूत के दोस्त सुरजीत सिंह ने की सगाई और 2025 में बजेगी शहनाई

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सुशांत सिंह राजपूत के दोस्त और करणी सेना नेता सुरजीत सिंह राठौड़ की हुई सगाई, अगले साल हो सकती है शादी !

जयपुर। फिल्मी सितारे हो या फिल्म इंडस्ट्री से संबंध रखने वाले निर्माता या निर्देशक अपनी निजी जीवन को जल्दी से सार्वजनिक नहीं करते। हाल ही में जयपुर में सुशांत सिंह राजपूत के दोस्त और एक्टर सुरजीत सिंह राठौड़ ने सगाई कर ली और अगले साल नवंबर में शादी करेंगे लेकिन अभी शादी की तारीख़ तय नहीं हुई।
सुरजीत सिंह की होने वाली दुल्हनियां जयपुर की है।

ताराचंद जैन माधानी का आयुर्वेदाचार्य डॉ प्रकाश टाटा ने किया उपचार

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मुंबई। युवा बिजनेसमैन डॉ निकेश जैन माधानी के पिता ताराचंद जैन कुछ समय से अस्वस्थ हो गए हैं। उनके उपचार के लिए निकेश कई स्पेशलिस्ट डॉक्टरों से संपर्क कर रहे हैं। पिछले दिनों महान व्यक्तित्व के धनी आयुर्वेदाचार्य डॉ प्रकाश टाटा अपना कीमती समय निकाल कर निकेश के पापा को देखने पहुंचे और उनका उपचार भी किया। उसी अवसर पर आयुर्वेदाचार्य का माधानी परिवार ने भरपूर आदर सत्कार किया। डॉ प्रकाश टाटा ने अपना पूरा जीवन आयुर्वेद शोध में लगाया है, उन्होंने जड़ी बूटी में तरह तरह का अनमोल खोज किया है। सबसे पहले स्वयं के काले रंग के शरीर को गोरा किया, फिर सिर पर झड़ चुके बाल को दोबारा उगा लिया। इसके बाद स्वयं को युवा भी बना लिया है। दिखने में तो वह 50 साल के हैं और वर्तमान में उनकी आयु 84 साल हैं।

गौरतलब हो कि श्रीलंका क्रिकेट टीम के धुरंधर बल्लेबाज सनथ जयसूर्या ने पूरी दुनिया में अपने पैरों का इलाज करवाया था लेकिन उन्हें कही भी आराम नहीं मिला। फिर आयुर्वेदाचार्य डॉ प्रकाश टाटा ने आयुर्वेद जड़ी बूटी से जयसूर्या को स्वस्थ किया और उन्हें फिर से मैदान में दौड़ा दिया। डॉ टाटा ने कई नामचीन बड़ी हस्तियों सहित बॉलीवुड के दिग्गजों का आयुर्वेद चिकित्सा से उपचार कर उन्हे चुस्त दुरुस्त किया है।

महान संत रविदास के जीवन पर बनी हिन्दी फिल्म ‘गंगा संग रवि दास’ सिनेमाघरों में हुई रिलीज, दर्शको को आ रही है खूब पसंद

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नई दिल्ली। सरस एंटरटेनमेंट, सत्या ऑनलाइन प्रोडक्शन और मया प्रोडक्शन के बैनर तले बनी महान संत रविदास के जीवन पर बनी चर्चित हिन्दी फिल्म ‘गंगा संग रवि दास’ 3 मई से सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है जिसमे संत रविदास के जीवनी को शानदार तरीके से दर्शाने का प्रयास किया गया है जिसके लिए इसके मेकर की जितनी तारीफ की जाये कम है। विशेष बात यह है कि हाल ही में इसका पोस्टर और प्रोमो हरि की नगरी हरिद्वार में किया गया था जिसमे मुख्य अतिथि रविदासाचार्य सुरेश राठौड़ व अन्य लोगों ने संयुक्त रूप से दीप प्रजव्लित कर लांच किया। इस अवसर पर फिल्म की स्टार कास्ट के साथ साथ फिल्म के प्रोड्यूसर एवं अन्य गणमन्य लोग भी शामिल हुए थे।

संत रविदास के जीवन पर बनी इस चर्चित हिन्दी फिल्म के निर्माता हैं उत्तराखंड फिल्मों के सुपरस्टार कहे जाने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी अभिनेता राजेश मालगुड़ी, पुरुषोत्तम शर्मा और राकेश धामी और फिल्म के निर्देशक सब्बीर सय्यद हैं। जबकि इस फिल्म में तकनीकी निर्देशक की भूमिका राज नेगी की रही है।
महान संत रविदास के जीवन पर बनी इस फिल्म में की शूटिंग 100 फ़ीसदी गंगा किनारे हरिद्वार में शूट की गई है। फिल्म के अधिकतर कलाकार उत्तराखंड के हैं। जिसमे मुख्य रूप से राजेश मालगुडी, संदीप मोहन, पुरुषोत्तम शर्मा, मंजू सिंह, राज नेगी, मुकेश घनशाला, पूनम सकलानी, नवल किशोरे, मानसी मगरी, पुरुषोत्तम जेठुड़, आनंद रना, अमित शर्मा, रामेक्श्वर दयाल शर्मा, अक्षय कुमार, दीपक ब्यास आदि चर्चित व मजे हुए कलाकार शामिल हैं। यह फिल्म 2017 से बन रही थी फिल्म को बनने में निर्माताओं को कई तरह की बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, कभी कोरोना का टाइम तो कभी अनुमति कभी कुछ और समस्या लेकिन निर्माताओं ने अपना प्रयास नहीं छोड़ा और आज एक शानदार फिल्म बनकर सिनेमाघरो तक पहुंच गई है। यह फिल्म 3 मई को वेव सिनेमा हरिद्वार, आर आर सिनेमा रूडकी और आर आर सिनेमा सहारनपुर उत्तर प्रदेश में रिलीज हुई है और जल्दी ही उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के अलावा दर्शक देश के और अन्य शहरो में भी देख पाएंगे।
सिनेमाघरों के बाद इस फिल्म को बड़े ओटीटी चैनल्स पर भी रिलीज किया जायेगा। उस अवसर पर अपने संबोधन में पर बोलते हुए पूर्व विधायक रविदासाचार्य सुरेश राठौड़ ने बताया कि फिल्म को उन्होंने ही लिखा है और वह इस फिल्म को एक अभियान के तहत ले जाना चाहते हैं ताकि आज की युवा पीढ़ी जाने की संत रविदास कौन थे ?