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सनातन धर्म में नवीन चेतना के संचारक शंंकरावतार जगद्गुरू आदिशंकराचार्य

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(श्रीमती कुसुमलता गुप्ता – विनायक फीचर्स)
भारतवर्ष में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार की शक्तियां उभरने लगी थीं। वेदमत भी अनेक शाखाओं में बंट रहा था। कुछ लोग शैव, कुछ वैष्णव, कुछ शाक्त इत्यादि मतों के मानने वाले थे। कर्मकाण्ड अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया था। भारत में विभिन्न प्रकार के अनाचार बढ़ रहे थे। लगभग बारह सौ वर्ष पूर्व ऐसे संक्रमण काल में सदाशिव भूतभावन शंकर के अवतार आदि जगद्गुरू शंकराचार्य ने अवतरित होकर देश में फैले वितण्डावाद को समाप्त कर अद्वैतवाद का प्रचार किया और सनातन वैदिक धर्म में नवीन चेतना का संचार किया।
दक्षिण प्रान्त केरल के कालाडी नामक ग्राम में शिवगुरू नाम के एक वैदिक ब्राह्मण निवास करते थे। अपने पिता की इच्छा से ही उन्होंने विवाह किया था। उनकी पत्नी आर्यम्बा भी धर्म की साक्षात प्रतिमा थी। प्रौढ़ावस्था में भी अपनी गोद सूनी देखकर दोनों ने दिन रात शिव की आराधना करनी शुरू कर दी। इसके फलस्वरूप उस दम्पति ने वैशाख शुक्ल पक्ष पंचमी को एक अत्यन्त कमनीय, अलौकिक प्रतिभा सम्पन्न पुत्र की प्राप्त की जिसका नाम उन्होंने शंकर ही रखा।
बालक शंकर श्रुतिधर थे वे जो कुछ पढ़ते सुनते उसकी वे तत्काल पुनरावृत्ति भी कर सकते थे। पांच वर्ष की अवस्था में उपनयन संस्कार के बाद गुरूकुल में वे विद्याध्ययन के लिए गये। सात वर्ष की उम्र में ही शंकर उपनिषद, पुराण, इतिहास, धर्मशास्त्र, न्याय, सांख्य, पातंजल, वैशेषिक आदि अनेक शास्त्रों में पारंगत होकर विद्वान हो गये।
एक बार गुरू गृह में रहते हुए नियमानुसार एक निर्धन ब्राह्मïणी के यहां भिक्षा मांगने गये। ब्राह्मणी ने अपनी असमर्थता प्रकट कर एक आंवला ही शंकर को दिया। उसकी निर्धनता से दुखी हो शंकर ने भोले भाले मन से मां लक्ष्मी की स्तुति की, जिसको कनकधारा स्रोत के नाम से सभी जानते हैं। शंकर की प्रार्थना पर लक्ष्मी ने ब्राह्मणी के भाग्य में धन न होते हुए भी उसके यहां सोने के आंवले के रूप में धन की वर्षा कर दी।
इस चमत्कृत शक्ति को देख ग्रामवासियों ने शंकर का यशोगान किया। इसके बाद शंकर अपने घर आकर अपनी वृद्घा मां की सेवा करने लगे और प्रस्थानत्रयी पर भाष्य लिखने लगे। अनेक विद्वान शंकर से समस्या समाधान कराने आते और कहते कि इसकी माता धन्य है जिसने इसे जन्म देकर और वैधव्य के होते हुए इतना सुयोग्य बनाया है। शंकर ने  मैं कौन हूं इसका विचार करते हुए आत्मबोध की रचना कर डाली।
एक दिन प्रात:काल माता के साथ शंकर नदी में नहाने गये। नहाते समय शंकर का एक मगर ने आकर पैर पकड़ लिया। शंकर ने रक्षा के लिए माता को पुकारा। सभी शंकर को बचाने का प्रयास करने लगे किन्तु मगर जल में खीचें ले जा रहा था। तब शंकर ने मां से सन्यास लेने की आज्ञा मांगी।
विवश मां ने पुत्र को मुक्ति लाभ होने के लिए संन्यास की आज्ञा दे दी। शंकर को तभी मगर छोडक़र गहरे पानी में चला गया। शंकर ने मां से तीन प्रतिज्ञा करके तपस्या के लिए प्रस्थान किया कि मां की मृत्यु के समय शंकर उपस्थित होंगे, मां को ईश्वर का दर्शन करायेंगे तथा अपने हाथों से मां का अन्तिम संस्कार करेंगे। इसके बाद शंकर चलते-चलते दो महीने में नर्मदा के तट पर ओंकारेश्वर में आ गये और योगी गोविन्दपाद की गुफा में प्रवेश किया। गोविन्दपाद ने बाल संन्यासी शंकर को हठयोग, राजयोग, ज्ञान योग इत्यादि की शिक्षा दी। एक बार गुरू के समाधिस्थ होने पर नर्मदा नदी में बाढ़ आ गई और जल गुफा के अन्दर घुसने लगा तो शंकर ने एक घड़े को गुफा के दरवाजे पर रख दिया। देखते ही देखते किसी दैवीय शक्ति से जल घड़े में भरता गया और बाढ़ रूक गई।
गोविन्दपाद को समाधि से जागने पर इस घटना का पता चला तो उन्होंने कहा कि मैंने अपने गुरू गौडपाद से पहले ही सुना था  कि शिव का अंशावतार होगा और एक कुंभ में नर्मदा के जल को प्रविष्टï करा देगा। अब यह शंकर ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखेगा और संसार में अद्वैत वेदान्त की पताका फहरायेगा। यह कहकर गुरू गोविन्दपाद ने चिर समाधि ले ली। योग विधि से गुरू का जल संस्कार कर शंकर काशी पहुंचे और अनेक लोगों का मार्ग प्रशस्त किया।
चोल देश का निवासी उनका प्रथम शिष्य बना। चाण्डाल रूप में भगवान शंकर ने छुआछूत के विचार को नष्ट करने के लिए दर्शन दिये और प्रत्यक्ष दर्शन देकर वितर्कवादी मतों का खंडन करने का आदेश दिया। इसके पश्चात भास्कर, अभिनव गुप्त, नीलकंठ प्रभाकर से शास्त्रार्थ किया। मंडन मिश्र और शंकराचार्य के शास्त्रार्थ में मध्यस्थ मंडन की पत्नी उभयभारती बनी। दोनों के गले में फूलों की माला उन्होंने डाल दी कि जो हारेगा उसकी माला मुरझा जायेगी। अठारह दिन तक शास्त्रार्थ चला और मंडन मिश्र हार गए। इसी बीच व्यास और जैमिनी ऋषि के भी दर्शन हुए। मंडनमिश्र की अर्द्धांगिनी होने के कारण उभयभारती ने शंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया और काम शास्त्र से संबंधित प्रश्र किये जिनका उत्तर, शंकराचार्य ने एक महीने का समय मांग कर योगबल से मृत राजा अमरूक के शरीर में प्रविष्ट होकर दिया। पति के हारने पर उभय भारती ने योगबल से शरीर त्याग दिया और मंडन मिश्र शंकराचार्य के शिष्य बने और सुरेशाचार्य कहलाये।
भ्रमण करते करते शंकराचार्य श्रीबलि नामक स्थान पर गये और प्रभाकर के पागल पुत्र को ज्ञान दिया और नाम रखा तोटकाचार्य। उनके प्रमुख चार शिष्य सनन्दन, सुरेशाचार्य, तोटकाचार्य और हस्तमलक, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष स्वरूप थे। अपनी माता के अन्तिम समय में योगबल से शंकराचार्य ने वहां पहुंचकर उन्हें ईश्वर दर्शन कराया और उनका अन्तिम संस्कार किया। केरल नरेश ने इनका सम्मान किया। शंकराचार्य ने अपनी चमत्कृत शक्ति से एक पंडित मंडली को एक समय में दो सभाओं में प्रकट होकर शास्त्रार्थ किया और हराया।
कश्मीर के शारदा पीठ मंदिर के चारों द्वारों के रक्षक विद्वानों ने शास्त्रार्थ किया तब स्वयं सरस्वती देवी ने शंकराचार्य को विजयी घोषित किया। तब शंकर सर्वज्ञपीठ पर अधीश्वर रूप में आसीन हुए। इसके बाद बदरी क्षेत्र में जाकर अपने गुरू के गुरू गौडपादाचार्य के दर्शन किये और जलमग्र नारायण की मूर्ति को निकालकर बदरीनारायण के नाम से स्थापित किया।
शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की इनमें वेदाध्ययन की व्यवस्था की जहां ज्ञान पिपासुओं को शिक्षा दी जाती थी। प्रहरी की भांति ये चारों मठ चारों सीमाओं की रक्षा रकते हुए आज भी हिन्दू धर्म की विजयध्वजा को फहरा रहे हैं। उन्होंने ज्योतिर्मठ में अथर्ववेद का प्राधान्य, गोवर्धन मठ में ऋग्वेद, श्रृंगेरी में यजुर्वेद और शारदामठ में सामवेद की प्रधानता रखी थी।
 शंकराचार्य जब केदारनाथ पहुंचे तो शिव ने प्रसन्न होकर अपने चरणों से गर्म जल का स्त्रोत प्रवाहित किया और जो गौरी कुण्ड के नाम से प्रसिद्घ है। शंकराचार्य की अल्पायु आठ से बढकर सन्यासी होने के कारण सोलह वर्ष हुई। महर्षि वेद व्यास के आशीर्वाद से सोलह से बत्तीस वर्ष हुई। अब बत्तीस वर्ष के होने पर शंकराचार्य का कार्य भी समाप्त हो गया था और उनकी भौतिक देह भी परमात्मा में विलीन हो गयी। उन्होंने गुरू प्रदत्त विद्या अपने शिष्यों को दी।
शंकराचार्य के अद्घेैतवाद से भारतवर्ष में ऐसी आंधी आई कि अनेक मतों को अपने साथ उड़ा ले गयी। सब जगह वेद सम्मत सनातन धर्म की शाश्वत पताका फहराने लगी। यदि शंकराचार्य न होते तो सनातन धर्म रसातल में चला जाता। उनके कठोर परिश्रम व त्याग से धर्मरूपी वृक्ष की जड़ ज्ञानामृत जल से सींची गयी है, जिससे वह आज भी हरी भरी है।
 आज भी वह धर्म रूपी वृक्ष मीठें फलों से शोभायमान हो रहा है। शंकराचार्य की ही कृपा से सनातन वैदिक धर्म को अभी भी प्रतिष्ठा मिल रही है। यदि शंकराचार्य न होते तो स्वार्थी लोगों की नीति के कारण दो चार हिन्दू शुतुरमुर्ग की तरह केवल चिडिय़ा घर में ही दिखाई देते। (विनायक फीचर्स)

एनसीबी अधिकारी ज्ञानेश्वर सिंह पर गिरी मुम्बई हाई कोर्ट की गाज

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मुंबई। ज्ञानेश्वर सिंह हिमाचल प्रदेश कैडर के 1999 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं जो कॉर्डेलिया ड्रग मामले में बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को क्लीन चिट देने के लिए कुख्यात हैं। खान के साथ उनका संबंध बहुत पुराना है जब सिंह बीसीसीआई के एक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व के ओएसडी और खान के करीबी सहयोगी थे।

ज्ञानेश्वर सिंह ने पूर्व जोनल डायरेक्टर समीर वानखेड़े के बॉस की भूमिका में कदम रखा, एनसीबी ने ड्रग मामले में शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को क्लीन चिट दी।
ज्ञानेश्वर सिंह इस समय अपने खिलाफ कुछ गंभीर शिकायतों को लेकर चर्चा में हैं।
कर्तव्य में लापरवाही और अवैध संबंध रखना साथ ही एक महिला का शोषण करना जो सिंह के आधिकारिक दौरे पर उनके साथ अहमदाबाद गई थी। उसने कहा कि सिंह के बगल वाले कमरे में आम दरवाजा है और उसका कमरा एक एनसीबी अधिकारी के नाम पर बुक किया गया था। संबंधित महिला को छोड़ने और लाने के लिए कार्यालय के वाहनों का उपयोग किया गया। उसका सिंह से क्या रिश्ता था कि वह तीन दिन तक दिन-रात उसके साथ रही? और कमरे का भुगतान जूनियर एनसीबी अधिकारियों द्वारा किया गया था। सभी को आश्चर्य और अविश्वास हुआ कि यह पहली बार नहीं था जब सिंह ने अपनी अधर्मी और अनैतिक गतिविधियों के लिए कार्यालय मशीनरी का उपयोग किया था।
दिल्ली, जम्मू और लखनऊ इकाइयों की दवाओं को नष्ट करने के लिए एक उच्च स्तरीय ड्रग डिस्पोजल कमेटी का गठन किया गया और एक बैठक की गई। सदस्य की भौतिक उपस्थिति अनिवार्य है और सरकारी अधिसूचना 2022 के अनुसार ज्ञानेश्वर सिंह को एक ही समय में सभी स्थानों पर पूर्व निर्धारित दिखाया गया था। हालाँकि वह दिल्ली में तैनात था, लेकिन उसे धोखे से लखनऊ और जम्मू जैसे कई स्थानों पर दिखाया गया था।

इससे दवाओं की चोरी और हेराफेरी हो सकती है क्योंकि सिंह उस दवा के वजन और सील की जांच करने के लिए मौजूद नहीं थे जिससे छेड़छाड़ की जा सकती थी। इसे धोखे से बाजार में बेचा जा सकता था। जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के पास से पकड़ी गई इस ड्रग्स का वजन टनों में था और इसकी कीमत हजारों करोड़ रुपये थी। ड्रग निपटान को गृह मंत्री अमित शाह द्वारा बहुत गंभीरता से लिया जाता है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ड्रग मुक्त भारत का सपना देखते हैं और सिंह ने ड्रग निपटान स्थल पर उपस्थित नहीं होकर भी पूरी घटना को हल्के में लिया।

शिकायत की गंभीरता को देखते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने भारत सरकार, डीजी एनसीबी एसएन प्रधान, सीबीआई और महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा है कि उन्होंने ज्ञानेश्वर सिंह पर क्या कार्रवाई की है!

राज्य के लिए उत्सव है चार धाम यात्रा-पुष्कर सिंह धामी

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देहरादून,10 मई ,मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रदेश में शुक्रवार 10 मई से प्रारम्भ हो रही चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं को शुभकामना देते हुए उनकी मंगलमय यात्रा की कामना की है।
मुख्यमंत्री ने चारधाम यात्रा हेतु आए सभी श्रद्धालुओं का स्वागत करते हुए कहा कि वे बाबा केदार, मां गंगोत्री और मां यमनोत्री एवं बद्रीविशाल से प्रार्थना करते हैं कि विगत वर्ष की भांति इस वर्ष भी चारधाम यात्रा हर्षोल्लास एवं धूमधाम से सकुशल संपन्न हो। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस वर्ष की चारधाम यात्रा अपने पिछले सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ेगी। राज्य सरकार सुरक्षित चारधाम यात्रा के लिए प्रयासरत है। सरकार द्वारा प्रत्येक स्तर पर चारधाम यात्रा संबंधी तैयारियों की निरंतर समीक्षा की जा रही है। हमारा प्रयास रहेगा कि जो भी श्रद्धालु, यात्रा खत्म होने के उपरांत अपने घर लौटे वह देवभूमि उत्तराखंड में बिताए गए समय की स्वर्णिम यादों को साथ लेकर जाए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि चार धाम यात्रा राज्य के लिए एक उत्सव के समान है। उन्होंने कहा देश विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु उत्तराखंड आते हैं। इस वर्ष अभी तक लगभग 20 लाख से अधिक लोगों द्वारा यात्रा हेतु रजिस्ट्रेशन करवाया गया है। सभी श्रद्धालुओं की यात्रा सुगम तथा सुरक्षित हो इसकी व्यवस्था की जा रही है। उन्होंने कहा कि चार धाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं पर भगवान की विशेष कृपा रहती है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार का प्रयास है कि जब श्रद्धालु चारधाम यात्रा पर आएं तो उन्हें हर सुख-सुविधा उपलब्ध कराई जाए, ताकि वे भविष्य में बार – बार उत्तराखंड आने का मन बनाएं, जिससे हमारे पर्यटन उद्योग को बढ़ावा मिल सके। मुख्यमंत्री ने कहा कि चारधाम यात्रा पर आने वाले सभी श्रद्धालुओं की यात्रा सुगम व सफल हो इसके लिये हम सबको सहयोगी बनना होगा ताकि अधिक से अधिक श्रद्धालु हमारी देवभूमि के संदेश को देश व दुनिया में पहुंचाने में भी मददगार बने।
मुख्यमंत्री ने चार धाम यात्रा में लगे सफाई कर्मचारियों से लेकर सुरक्षा में तैनात रहने वाले प्रत्येक पुलिस के जवान और प्रशासनिक अधिकारी से अपील करते हुए कहा कि हम सभी अपने स्तर में सर्वश्रेष्ठ कार्य करें। जिससे यात्रा में आने वाले किसी भी श्रद्धालु को असुविधा का सामना न करना पड़े। आपसी सहयोग और भगवान के आशीर्वाद से हम सभी इस बार की यात्रा को भी सुरक्षित संपन्न कराने में सफल होंगे।

शुभ फल देने वाला त्यौहार अक्षय तृतीया*

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(अतिवीर जैन * पराग *-विनायक फीचर्स )

भारतीय संस्कृति में वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का बड़ा महत्व है l इसे अक्षय तृतीया या आखातीज भी कहा जाता है l आदि काल से इस दिन की महता चली आ रही है l पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी कार्य किया जाता है उसका अक्षय फल मिलता है इसलिए इसे अक्षय तृतीया कहते हैं l अक्षय तृतीया का दिन स्वयं सिद्ध मुहूर्त होता है lइस दिन किसी भी मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश ,वाहन, जमीन ,आभूषण  की खरीदारी आदि किसी भी कार्य को करने के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती l इस दिन सूर्य में चंद्रमा अपनी उच्च राशि में रहते हैं l

जैन दर्शन में इसे श्रवण संस्कृति के साथ युग का प्रारंभ माना जाता है l जैन दर्शन के अनुसार भरत क्षेत्र में इस समय भोगभूमि का काल पूर्ण होकर कर्मभूमि का काल प्रारंभ हो गया था l भोगभूमि में दस कल्पवृक्ष होते थे जो मनुष्य की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करते थे l मनुष्य को कोई काम नहीं करना पड़ता था l धीरे-धीरे काल के प्रभाव से यह कल्पवृक्ष लुप्त होते गए और मनुष्य के सामने भूख प्यास ,गर्मी सर्दी और बीमारियों की समस्याएं आने लगी l ऐसे समय में राजा ऋषभदेव या भगवान आदिनाथ ने संसारी रहते हुए प्रजाजनों  को असी , मसी, कृषि, विद्या,वाणिज्य,शिल्प, छह उपाय बताएं l इन्हें  षटकर्म कहा गया l राजा ऋषभदेव ने प्रजा को योग एवं क्षेम  के नियम ( नवीन वस्तु की प्राप्ति तथा प्राप्त वस्तु की रक्षा) बताएं l गन्ने के रस का उपयोग करना बताया l खेती के लिए बैल का प्रयोग करना सिखाया l इसीलिए ऋषभनाथ को वृषभनाथ , आदि पुरुष और युग प्रवर्तक भी कहा जाता है l

एक बार जब महाराज ऋषभदेव के जन्मदिन का  उत्सव मनाया जा रहा था l स्वर्ग की अप्सराएँ नृत्य कर रही थी l उनमें एक मुख्य अप्सरा नीलांजना नृत्य करते-करते मृत्यु को प्राप्त हो गई  क्योंकि उसकी आयु पूर्ण हो गई थी l यह देखकर राजा ऋषभदेव को वैराग्य हो गया तबउन्होंने अपने सबसे बड़े पुत्र भरत का राज्याभिषेक कर दीक्षा ले ली l
अयोध्या से दूर सिद्धार्थ नामक वन में पवित्रशिला पर विराजकर छह माह का मौन लेकर उपवास और तपस्या की l जब छह माह का ध्यान योग समाप्त हुआ तो वे आहार के लिए निकल पड़े l जैन दर्शन में  श्रावकों द्वारा मुनियों को आहार दान दिया जाता है  परंतु उस समय किसी को भी आहारचर्या  का ज्ञान नहीं था l

जिसके कारण सात माह तक उन्हें  निराहार रहना पड़ा l भ्रमण करते हुए मुनि आदिनाथ वैशाख शुक्ल तीज के दिन हस्तिनापुर में पहुंचे l वहां का राजा सोमयश मुनि आदिनाथ का पौत्र था l राजा सोम और उनके पुत्र श्रेयांश कुमार ने  रात्रि में एक सपना देखा जिससे उन्हें अपने पिछले भव के मुनि को आहार देने की चर्या का स्मरण हो आया l उन्होंने आदिनाथ को पहचान लिया और शुद्ध आहार के रूप में महाराज को प्रथम आहार  गन्ने के रस का दिया l भगवान ने दोनों हाथों की अंजलि बनाकर खड़े रहकर उसमें गन्ने का रस इक्षारस  का आहार  लिया  और अपने व्रत का पारायण किया l इसे पारणा भी कहा जाता है l हस्तिनापुर में आज भी एक  पारणा मंदिर बना हुआ है l मुनि श्री आदिनाथ ने लगभग 400 दिवस के पश्चात पारायण किया था l जो  एक वर्ष से भी अधिक की अवधि थी l इसे जैन धर्म में वर्षीतप के नाम से भी जाना जाता है l आज भी जैन अनुयायी वर्षीतप करते हैं l

यह व्रत प्रतिवर्ष कार्तिक के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से प्रारंभ होता है l और दूसरे वर्ष वैशाख के शुक्ल पक्ष की अक्षय तृतीया के दिन पारायण कर उसकी पूर्णता की जाती है l इस अवधि में पूरे वर्ष श्रावक प्रति मास चौदस को उपवास करता है lऔर उसके बाद उसका पारायण करता है l तभी से आज तक जैन मुनियों द्वारा खड़े होकर अपनी अंजलि में लेकर आहार करने की परंपरा चली आ रही है l वैशाख शुक्ल तृतीया के इसी दिन को अक्षय तृतीया कहते हैं l इस समय से  ही आर्यखंड में आहार दान की प्रथा प्रारंभ हुई l भगवान की रिद्धि तथा तप के प्रभाव से राजा सोम की रसोई में भोजन कभी ना खत्म होने वाला अक्षय हो गया था l

तभी से इसे अक्षय तृतीया के नाम से भी जाना जाता है l तीर्थंकर मुनि को प्रथम आहार दान देने वाला अक्षय पुण्य का अधिकारी होता है l अतः इसे अक्षय तृतीया भी कहते हैं l

हमारे देश में आज भी जैन धर्म के हजारों अनुयाई वर्षी तपश्चार्य करते हैं l यह व्रत संयमी जीवन यापन करने के लिए , मन को शांत करते ,विचारों में शुद्धता और कर्मों में धार्मिक कार्यों में रुचि उत्पन्न करते हैं l  मन ,वचन एवं श्रद्धा से वर्षीतप करने वालों को महान समझा जाता है l इसी कारण जैन धर्म में आज भी अक्षय तृतीया का विशेष धार्मिक महत्व है l
हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार भी अक्षय तृतीया का बहुत महत्व है l स्कंद पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप में अवतार लिया था l इस दिन परशुराम की जयंती पूरे देश में बड़े धूमधाम से बनाई जाती है l हिंदू धर्म के अनुयाई अक्षय तृतीया के दिन गंगा में स्नान करके विधि पूर्वक देवी देवताओं विशेष रूप से भगवान विष्णु की  पूजा करते हैं l  ब्राह्मणों को दान देते हैं l  बुंदेलखंड ,राजस्थान, मालवा आदि अलग-अलग  प्रांतों में अक्षय तृतीया का उत्सव अलग-अलग लोक परंपरा के अनुसार बनाया जाता है l आज के दिन बसंत ऋतु का समापन और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ माना जाता है l पुराणों के अनुसार सतयुग और त्रेता युग का आरंभ और द्वापर युग का समापन भी इसी तिथि को हुआ था l

द्वापर युग को भोगकाल और त्रेता युग को कर्मकाल भी समझा जा सकता है l इसी दिन बद्रीनाथ तीर्थ के कपाट खुलते हैं l वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी के मंदिर में बिहारी जी के चरणों के दर्शन होते हैं l अपने नाम के अनुरूप अक्षय तृतीया हमें अपने कर्मों के अनुसार अक्षय फल की प्राप्ति देती है lयह आदिकाल से हिंदू और जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा मनाई जा रही है l य़ह प्राचीन भारतीय सनातन संस्कृति का एक धार्मिक त्यौहार है  जो ग्रहों की गति से संचालित होता है और हमें शुभ फल देता है l ( *विनायक फीचर्स)(लेखक रक्षा मंत्रालय के पूर्व उपनिदेशक हैं)*

पाकिस्तान में गधों की हत्या पर रोक

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सुभाष आनंद –

हुसैनीवाला के पार से प्राप्त सूचनाओं के अनुसार पाकिस्तान में गधों की हत्या पर पूर्ण रूप से पाबंदी लगा दी गई है लेकिन गौ हत्या पर किसी प्रकार की पाबंदी नहीं है। भारत में प्रत्येक वर्ष करोड़ों रुपये का मोटा मांस यूरोपीय देशों के साथ अरब देशों में निर्यात किया जा रहा है। वहीं पाकिस्तान में गधों के मांस और उसकी खालों के निर्यात पर पूर्ण रूप से पाबंदी लगा दी है क्योंकि पाकिस्तान के पहाड़ी क्षेत्रों में इसका प्रयोग काफी होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में रसद की सप्लाई के लिए यह एक मात्र साधन है। पाकिस्तान में गधे बहुत मूल्यवान माने जाते हैं। दुनिया भर में पाकिस्तान में गधों की संख्या 50 लाख से ऊपर है। यह पाकिस्तान का कौमी सरमाया एवं विदेशी मुद्रा की कमाई का सबसे बड़ा साधन माना जाता है।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पिछले वर्ष गधों के मांस और खाल के निर्यात से पाकिस्तान को 150 अरब डालर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई थी। पाकिस्तानी गधे चीन में सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। गधों का अचार भी चीन में सप्लाई किया जा रहा है। गधों का मांस अधिकतर हांगकांग और वियतनाम को निर्यात किया जा रहा है। गधों का मांस बड़ा शक्तिवर्धक होता है जबकि गधे की खाल सौंदर्य सामग्री बनाने के लिए प्रयोग की जाती है। पाकिस्तान में दो वर्ष के भीतर गधों की कीमतों में बहुत ज्यादा बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है जो गधा पहले 2000-3000 में आसानी से मिल जाता था अब 5000-6000 में मिलने लगा है। पाकिस्तान में गधों की कीमतें बढऩे से गधों की चोरी की वारदातें भी बढऩे लगी है, पाकिस्तान के कबीलों में अब गधों को दहेज में देने की प्रथा बढ़ती जा रही है। पंजाब पुलिस को बड़े पैमाने पर गधा चोरी की शिकायतें प्राप्त हो रही है। अब लोगों ने गधों की चोरी के भय से चौकीदार रखने शुरु कर दिए हैं।

प्राप्त सूचनाओं के अनुसार गधे के व्यापार में बहुत तेजी देखने को मिल रही है। पाकिस्तान में बीमारी से मरे गधों का मीट लोग खाते रहे हैं। पाकिस्तान में मांसाहार की बहुलता के कारण वहां भेड़ बकरियां और मुर्गे के अलावा मोटे मीट के रूप में गाय, बैल, भैस और ऊंट का मीट भी आम खाने को मिल रहा है। पाकिस्तान में इसी प्रवृत्ति की आड़ में वहां के दो नगरों मुल्तान और कसूर में 10 कसाई ऐसे मिले हैं जो बीमारी से मरे गधों का मांस बेचते पकड़े गए हैं। पाकिस्तान के प्रसिद्ध समाचार पत्र डॉन ने प्रकाशित समाचार के अनुसार एक किसान अतीक अहमद का गधा गंभीर बीमारी से भर गया था। उसने गधे का शव निकटवर्ती डम्प में फैंक दिया अगले दिन उसने देखा कि उसके मृतक गधे की खाल दो व्यक्ति उतार रहे हैं और शव के छोटे-छोटे टुकड़े करके बोरी में डालकर अपनी दुकान पर ले गए। सूत्रों से मिली जानकारी गधे का मीट 800 रुपये से 1000 रुपये प्रति किलोग्राम में बेच रहे हैं।  इसी प्रकार कसूर में दो भाईयों की दुकान पर पंजाब पुलिस द्वारा रेड करने के पश्चात पाया गया है कि वह मृतक गधों की खरीद करते हैं और उसके मांस को बाजार में बेच देते हैं। वहां डॉक्टर अनीक रहमान का कहना है कि बीमार गधों का मांस खाने के कारण कसूर की कई कॉलोनियों के लोग गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। कई कसाईयों ने माना है कि हम पिछले दो महीनों से बीमारियों से मर रहे गधों के मीट का व्यापार कर रहे हैं। अब पंजाब पुलिस ने उनके विरुद्ध कार्रवाई शुरु कर दी है। पाकिस्तान में गधों को लेकर पंजाब की मरियम सरकार बहुत चिंतित है और पंजाब पुलिस को नए-नए आदेश जारी किए जा रहे हैं। (विनायक फीचर्स)

रामकथा के यज्ञ में विश्वास देशपांडे और मीना श्रीवास्तव की आहुतियां

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विवेक रंजन श्रीवास्तव – विनायक फीचर्स

दैनिक संघर्षो का ही दूसरा नाम जीवन है। अपनी योग्यता और शक्ति के अनुरूप प्रत्येक मनुष्य जीवन रथ हांकते हुये संकटों का सामना करता है पर अनेकानेक विपत्तियां ऐसी होती हैं जो अचानक आती हैं , जो हमारी क्षमताओं से बड़ी हमारे बस में नहीं होतीं। उन कठिन परिस्थितियों में हमें एक मार्गदर्शक और सहारे की जरूरत पड़ती है। ईश्वर उसी संबल के लिये रचा गया है। भक्ति मार्ग पूजा, पाठ,जप, प्रार्थना और विश्वास का सरल रास्ता प्रशस्त करता है। ज्ञान मार्ग ईश्वर को , जीवन को, कठिनाई को समझने और हल खोजने का चुनौती भरा मार्ग बताता है। कर्म मार्ग स्वयं की योग्यता विकसित करने और मुश्किलों से जूझने का रास्ता दिखाता है।

 

ईश्वर की परिकल्पना हर स्थिति में मनोवैज्ञानिक सहारा बनती है। राम, कृष्ण या अन्य अवतारों के माध्यम से ईश्वर के मानवीकरण द्वारा आदर्श आचरण के उदाहरणों की व्याख्या की गई है। आजकल कापीकैट चेन मार्केटिंग में मैनेजमेंट गुरू बताते हैं कि बिना किसी घालमेल के उनके व्यापारिक मॉडल का अनुकरण करें तो लक्ष्य पूर्ति अवश्यसंभावी होती है। जीवन की विषम स्थितियों में हम भी राम चरित्र का आचरण अपना कर अपना जीवन सफल बना सकें इसलिये वाल्मिकी ने रामायण में ईश्वरीय शक्तियों से विलग कर श्रीराम को मनुष्य की तरह विपत्तियों से जूझकर जीतने के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है।

 

रामायण नितांत पारिवारिक प्रसंगो से भरपूर है। राम चरित्र में आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति, जिम्मेदार शिष्य, कर्तव्य परायण राजा, विषम परिस्थितियों में धैर्य के संग चुनौतियों का सामना करने वाला राजकुमार, नेतृत्व क्षमताओं से भरपूर योद्धा, इत्यादि सारे गुण इनमें परिलक्षित होते हैं।

राम चरित्र भारत की सांस्कृतिक धरोहर है। धार्मिक मनोवृत्ति वाले सभी भारतीय, जन्मना आस्था और आत्मा से श्रीराम से जुडे हुये हैं। श्री राम का जीवन चरित्र प्रत्येक दृष्टिकोण से हमारे लिये मधुर, मनोरम और अनुकरणीय है।  मानस के विभिन्न प्रसंगों में हमारे दैनंदिक जीवन के संभावित संकटों के श्रीराम द्वारा मानवीय स्वरूप में भोगे हुये आत्मीय भाव से आचरण के मनोरम प्रसंग हैं। किन्तु कुछ विशेष प्रसंग भाषा, वर्णन, भाव, प्रभावोत्पादकता की दृष्टि से बिरले हैं। इन्हें पढ, सुन, हृदयंगम कर मन भावुक हो जाता है।

श्रद्वा, भक्ति, प्रेम, से हृदय आप्लावित हो जाता है। हम भाव विभोर हो जाते हैं। भक्तों को अलौलिक आत्मिक सुख  का अहसास होता है। इतिहास साक्षी है कि आक्रांताओ की दुर्दांत यातनाओं के संकट भी भारतीय जन मानस राम भक्ति में भूलकर अपनी संस्कृति बचा सकने में सफल रहा है। ज्ञान मार्गी रामायण की जाने कितनी व्यापक व्याख्यायें करते रहे हैं, अनेक ग्रंथ रचे गये हैं। कितनी ही डाक्टरेट की उपाधियां रामायण के किसी एक चरित्र की व्याख्या पर ली जा चुकी हैं। किन्तु सच है कि  हरि अनंत हरि कथा अनंता।

मूल मराठी लेखक विश्वास देशपांडे जी ने भी रामायण महत्व और व्यक्ति विशेष के अंतर्गत रामायण के पात्रों और प्रसंगो पर छोटे छोटे लेखों में उनके सारगर्भित विचार रखे हैं। ईश्वरीय प्रेरणा से डॉ. मीना श्रीवास्तव उन्हें पढ़कर इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने इन लेखों का हिन्दी , अंग्रेजी अनुवाद कर डाला। यही अनुवाद इस छोटी सी किताब का कलेवर है। व्यक्तित्व खण्ड में श्री राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, उर्मिला , हनुमान, विभीषण , कैकेयी, रावण पर संक्षिप्त, पठनीय लेख हैं। इन समस्त चरित्रों पर हिन्दी साहित्य में अलग अलग रचनाकारों ने कितने ही खण्ड काव्य रचे हैं और विशद व्याख्यायें, टीकायें की गई हैं। उसी अनवरत राम कथा के यज्ञ में ये लेख भी सारगर्भित आहुतियां बन पड़े हैं।

राम कथा का महत्व , रामायण पारिवारिक संस्था , रामायण कालीन समाज, रामायण कालीन शासन व्यवस्था, रामायण की ज्ञात अज्ञात बातें जैसे आलेख भी जानकारियों से भरपूर हैं। अस्तु पुस्तक पठनीय , और संग्रहणीय है। (विनायक फीचर्स)

BRITISH PRIME MINISTER RISHI SUNAK WITH GO DHARMIC

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The British Prime Minister, Rishi Sunak, joined charity Go Dharmic in lending a hand to prepare meals in the kitchen with volunteers in London.

Prime Minister Rishi Sunak actively participated in preparing Vegan Kichari – a nutritious, cost-effective, environmentally friendly meal that is distributed in various parts of the world as part of Go Dharmic’s “Feed Everyone” initiative.

In addition to cutting vegetables and stirring the hot meal in the kitchen, the Prime Minister spoke at length with dedicated Go Dharmic volunteers to assemble food parcels, gaining first-hand insight into the organization’s vision of compassion in action from Go Dharmic’s founder, Hanuman Dass.

The first British Hindu Prime Minister, spoke about the idea of Dharma when first taking office, and now serving with Go Dharmic volunteers has shown how important it is to him. In November 2023, he awarded Go Dharmic founders Hanuman Dass and Sheena Randerwala the Points of Light award, during the auspicious occasion of Diwali. In today’s interconnected world, Universal Hindu principles like Dharma, Seva, and Ahimsa hold profound significance, transcending cultural and geographical boundaries. Ahimsa, or non-violence, is a guiding force in addressing pressing issues such as climate change, food insecurity, and peace advocacy.

At the event, several Go Dharmic trustees and lead volunteers from across the UK, including Central London, Wembley, Luton, Harrow, Northampton, Leicester, Glasgow, and Edinburgh, highlighted the organization’s significant social impact, collectively serving over 50,000 meals a month to vulnerable individuals in their communities.

Reflecting on the visit, Hanuman Dass expressed gratitude, stating, “We are deeply moved by the Prime Minister’s service with Go Dharmic and his willingness to join hands with our volunteers. He has a genuine interest in Dharma and our mission of compassion in action. This profound act of kindness by the leader of the nation will inspire more seva and more volunteers for many years to come.”

About Go Dharmic: Go Dharmic, an international humanitarian and environmental apolitical NGO, unites individuals worldwide in spreading love and compassion through social action campaigns. Founded in 2011 by Hanuman Dass, the organization champions universal compassionate action. Rooted in the concept of ‘Dharma’, Go Dharmic boasts a global network of over 10,000 volunteers and serves as a steadfast ambassador of peace through extensive campaigns in Environmental Action, Poverty Alleviation, Education, Plant-Based and Organic Diets, and Crisis Response. Its founding philosophy, “Love All. Feed All. Serve All.”, epitomizes its mission.

Go Dharmic operates from 5 offices located in London (England), Glasgow (Scotland), Ahmedabad (India), Kolkata (India), and Georgia (USA).

Key Impact Figures:

  • Over 22 million Meals Distributed Globally
  • Establishment of 108+ Schools Supported in India
  • Benefitting 89,00+ Children through Education, Sanitation, and Food Campaigns
  • Planting of 260,000+ Trees
  • Distribution of 10,000+ Hot Meals in Kyiv, Ukraine, aiding those unable to Evacuate
  • Distribution of 2,000+ Food, Medicine, and Hygiene Packs to Refugees fleeing Ukraine
  • Conducting of 1,500+ Medical Checks for Indian Civil Servants
  • Restoration of sight for 16+ individuals through Cataract operations

Go Dharmic has spearheaded campaigns across the UK, India, Nepal, Morocco, Lebanon, Uganda, Nigeria, Cuba, USA, Ukraine, Poland, Romania, and Australia.

For more information about Go Dharmic and its initiatives, please visit www.godharmic.com

and explore all campaigns at www.godharmic.com/campaigns

 

भौंरंगी गौशाला में डलवाया गौ-माताओ को चारा

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अलवर के राजगढ़ कस्बे की भौंरगी गौशाला में Pay 2 Pay  फाउंडेशन की ओर से पिंकी देवी द्वारा गौ माताऔ के लिए दस हजार रुपए का  चारा डलवा कर बड़ा ही पुण्य का काम किया है। भौंरगी गौशाला के सभी गौ-भक्तो तथा गौ – सेवको ने पिंकी देवी को हार्दिक शुभकामना देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना की। ओर कहां कि हर इंसान को पिंकी देवी से गौ सेवा करने की प्रेरणा लेनी चाहिए।
वहीं बृजवासी गौरक्षक  सेना के प्रदेश अध्यक्ष महंत प्रकाश दास महाराज, जिलाध्यक्ष नागपाल शर्मा, जिला उपाध्यक्ष प्रशांत पंडित सहित अनेक गणमान्य लोगों ने पिंकी देवी को हार्दिक शुभकामना देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना की।

गाय के गोबर की चिप से रेडिएशन से बचा जा सकता है

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गाय के गोबर की चिप से रेडिएशन से बचा जा सकता है- शंकरलाल। डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय,  जोधपुर के सभागार में बुधवार को गौ संरक्षण एवं गौ उत्पादों की सार्थकता विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया।व्याख्यान के मुख्य वक्ता अखिल भारतीय गौ सेवा के संयोजक रहे समाज सेवी शंकर लाल द्वारा गौ संरक्षण एवं गौ उत्पादों की सार्थकता विषय पर विशेष व्याख्यान दिया गया।वे वर्तमान में गौ सेवा गतिविधियों के प्रशिक्षण प्रमुख हैं।

उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा कि विलुप्त हो रही देसी गाय की नस्ल सुधार और गाय के गोबर तथा गोमूत्र से भूमि का सुधार आवश्यक है। देश की अनेक समस्याओं के समाधान पर अनुसंधान का कार्य जैसे भूमिगत जल संरक्षण के द्वारा भूमिगत जल स्तर को बढ़ाना,वृक्षारोपण कर सघन वनों का विकास करना,गोचर भूमि पर निःशुल्क चारागाह का मॉडल स्थापित करना,गोबर एवं गोमूत्र पर अनुसंधान करना,अहिंसात्मक स्वावलंबी चिकित्सा पद्धतियों पर कार्य करना ऐसे अनेक गतिविधियों का संचालन किये जाने की आवश्यकता है।

भारत एवं विश्व को रोग मुक्त करने में भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद एवं गौ उत्पादों का समुचित उपयोग महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। गाय से बने हुए गाय के उत्पाद गोमूत्र, गोबर,घी,दूध ये सभी अलग-अलग प्रक्रियाओं के द्वारा शरीर में होने वाले रोग जैसे अल्सर,डायबिटीज,उच्च रक्तचाप,स्पॉन्डिलाइटिस,स्लिप डिस्क आदि अनेक रोगों में उपयोगी है।

रेडिएशन से बचने के लिए गोबर की चिप का निर्माण किया गया है जो शरीर को रेडियेशन के नुकसान से बचाता है। भारत को शत प्रतिशत रोग मुक्त करने का अभियान चलाया जा रहा है। गाय के पालन से प्रत्येक मनुष्य को सुखी,स्वावलंबी एवं रोग मुक्त बनाना मुख्य उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि हम सभी देशवासियों को मिलकर भारत को कुपोषण मुक्त, कर्जमुक्त,प्रदुषण मुक्त,रोगमुक्त तथा ऊर्जायुक्त,रोजगारयुक्त बनाना है।

इस अवसर पर कुलपति प्रोफेसर प्रदीप कुमार प्रजापति ने कहा कि आयुर्वेद की औषधियों के निर्माण में गौ उत्पादों का महत्वपूर्ण योगदान है, देशी गाय के उत्पादों से उच्च कोटि की गुणवत्तापूर्ण औषधियों का निर्माण किया जा सकता है,इसलिए देशी गाय के पालन की अत्यधिक आवश्यकता है। प्रत्येक परिवार को जहां तक संभव हो खुद के स्वास्थ्य संरक्षण के लिए एक देसी गाय का पालन अवश्य करना चाहिए।

इस अवसर पर समाजसेवी श्यामसुंदर राठी,राकेश निहाल, निर्मल,मोहन उपस्थित थे।कार्यक्रम के शुभारंभ पर कुलपति प्रोफेसर प्रजापति ने शंकर लाल का साफा पहनाकर,पुष्प गुच्छ देकर स्वागत किया। कुलसचिव प्रोफेसर गोविंद सहाय शुक्ल ने समाजसेवी शंकर लाल का परिचय देते हुए सभी का स्वागत अभिनंदन किया। इस अवसर पर प्राचार्य प्रोफेसर महेंद्र कुमार शर्मा,प्रोफेसर चंदन सिंह,प्रोफेसर राजेश कुमार गुप्ता,प्रोफेसर ए नीलिमा रेड्डी,परीक्षा नियंत्रक डॉ. राजाराम अग्रवाल सहित संकाय सदस्य एवं योग नेचूरोपैथी महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ.चंद्रभान शर्मा,स्नातकोत्तर अध्येता उपस्थित थे।संचालन क्रियाशारीर विभागाध्यक्ष एवं मीडिया प्रभारी डॉ.दिनेश शर्मा ने किया।

अयोध्या में होगा ‘उत्तराखण्ड भवन’ का निर्माण

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देहरादून,9 मई, राम जन्मभूमि अयोध्या में उत्तराखण्ड भवन (राज्य अतिथि गृह) के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। भूखण्ड के आवंटन से जुड़ी सभी औपचारिकताएं पूरी करते हुए उत्तराखण्ड सरकार ने अयोध्या में आवंटित भूखण्ड की रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली है। उत्तराखण्ड पहला राज्य है जिसने अयोध्या में राज्य अतिथिगृह के निर्माण के लिए भूखण्ड की रजिस्ट्री प्रक्रिया पूरी कर ली है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हर्ष प्रकट करते हुए कहा कि सरकार अपने वायदे के अनुरूप जल्दी से जल्दी रामनगरी अयोध्या में अतिथि गृह का निर्माण करेगी ताकि रामलला के दर्शन के लिए अयोध्या आने वाले उत्तराखण्ड के श्रद्धालुओं को ठहरने के उचित सुविधा मिल सके। यह भूखण्ड राममंदिर से महज 7 किलोमीटर (हवाई दूरी 3 किमी) की दूरी पर स्थित है।

अयोध्या में दिव्य और भव्य राममंदिर के निर्माण के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने घोषणा की थी कि उत्त्राखण्ड सरकार अयोध्या में राजय अतिथि गृह का निर्माण करेगी। इस घोषणा के साथ ही मुख्यमंत्री धामी ने भूमि खरीद के लिए फौरीतौर पर 32 करोड़ रुपए भी स्वीकृत किए थे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तराखण्ड सरकार का आग्रह स्वीकार कर भूखण्ड आवंटन की स्वीकृति प्रदान की थी, जिसके बाद उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद ने अयोध्या में उत्तराखण्ड भवन के निर्माण के लिए 5253.30 वर्ग मीटर भूखंड आवंटित किया था। अब धामी सरकार ने सभी औपचारिकताएं पूरी करते हुए आवंटित भूखण्ड अपने नाम दर्ज करवा लिया है। मंगलवार को ही भूखण्ड की रजिस्ट्री उत्तराखण्ड सरकार के नाम हुई है। भूखण्ड की रजिस्ट्री होने के साथ ही मुख्यमंत्री धामी ने उत्तराखण्ड भवन की डीपीआर बनाने का काम शुरू करने के निर्देश दिए हैं।