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उज्जैन में गौ वध के प्रकरण में फरार मोहम्मद कासिम गिरफ्तार

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MP News: मध्य प्रदेश के उज्जैन में गौ वध एवं अवैध परिवहन के प्रकरण में फरार मोहम्मद कासिम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उसके खिलाफ कई थानों में FIR दर्ज है। कई मामलों में पुलिस उसे तलाश रही थी

थाना माकडौन के अपराध क्रमांक 127/2023 धारा 429,295-ए आईपीसी, 4, 6, 9 गौवंश वध प्रतिषेध अधिनियम, 25 आर्म्स एक्ट के प्रकरण में दो माह से फरार चल रहे आरोपी मोहम्मद कासिम पिता अब्दुर बशीर अब्बासी को गिरफ्तार कर लिया गया है। पूछताछ के दौरान कासिम ने माकडौन के ग्राम झालरा में हुए गौवध में भी संलिप्त होना स्वीकार किया है। कासिम को कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया है। गिरोह के अन्य सदस्यों को पुलिस ने पूर्व में ही गिरफ्तार कर लिया है। चार फरार आरोपियों की तलाश जारी है। आरोपी मोहम्मद कासिम पिता अब्दुर बशीर अब्बासी के विरुद्ध पूर्व में भी इंदौर तथा उज्जैन जिले के अलग-अलग थानों में कई अपराध पंजीबद्ध है। मोहम्मद कासिम पिता अब्दुर बशीर अब्बासी के खिलाफ इंदौर के सदर बाजार और चंदन नगर थाना क्षेत्रों में मादक पदार्थों की स्मगलिंग, अवैध हथियार रखने एवं अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत भी प्रकरण दर्ज है।

करण जौहर की फ़िल्म में एक नए अवतार में देंगे टाइगर श्रॉफ 

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मुंबई (अनिल बेदाग) : बॉलीवुड के यंगेस्ट एक्शन सुपरस्टार टाइगर श्रॉफ एक बड़े बजट की फिल्म के लिए करण जौहर के साथ काम करने के लिए तैयार हैं।रिपोर्टों के अनुसार, श्रॉफ धर्मा प्रोडक्शन द्वारा निर्मित एक फिल्म करने के लिए तैयार हैं, जिसमें वह पहले कभी न देखे गए अवतार में नजर आएंगे। एक सूत्र ने कहा कि कई स्क्रिप्ट्स पर विचार करने के बाद, टाइगर और करण दोनों ने इस स्क्रिप्ट पर विचार किया, दोनों को लगा कि 2025 में बड़े पर्दे पर वापसी के लिए एक्टर के लिए सबसे अच्छी फिल्म होगी। सोर्स ने कहा “तौर-तरीकों पर काम किया जा रहा है और एक घोषणा की जा रही है जून के अंत तक बनने की उम्मीद है।”

सूत्र ने आगे बताया कि यह फिल्म एक मनोरंजक फिल्म है, जिसे ग्रैंड स्केल पर पेश किया जाएगा। रिपोर्ट में आगे कहा गया, “यह किरदार उनके (टाइगर) द्वारा पिछले 10 सालों में किए गए किसी भी काम से अलग है।” टाइगेरियंस यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि प्रोजेक्ट किस बारे में होगा। एक्टर को बड़े पर्दे पर एंटरटेन करते देखने के लिए उनकी उत्सुकता आसमान छू रही है।

ट्रेड एनालिस्ट जोगिंदर टुटेजा ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर इस बड़ी खबर को शेयर करके टाइगेरियंस के बीच उत्साह बढ़ा दिया है।

हालाँकि, यह आगामी फिल्म 2025 में रिलीज़ होने वाली है, टाइगर के पास पाइपलाइन में कुछ दिलचस्प प्रोजेक्ट्स हैं। जहां उन्हें आखिरी बार ‘बड़े मियां छोटे मियां’ में देखा गया था, वहीं वह ‘सिंघम अगेन’ की रिलीज की तैयारी कर रहे हैं। टाइगेरियंस भी हाल ही में घोषित एक्शन फिल्म ‘बागी 4’ में सुपरस्टार की तरह उनका जलवा देखने का इंतजार कर रहे हैं, जो अगले साल रिलीज होने के लिए तैयार है।

उंगली पर नाचता लोकतंत्र 

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(विवेक रंजन श्रीवास्तव – विभूति फीचर्स)

भारत के लोकतंत्र की रीढ़ उसके चौंकाने वाले निर्णय लेते मतदाता हैं।  सारे कथित बुद्धिजीवी और ढ़ेरों वरिष्ठ पत्रकार, आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस तथा एक्स्ट्रा पोलेशन के ग्राफ से हर चुनाव के परिणाम के पूर्वानुमान लगाते रह जाते हैं और देश के मतदाता अपने  तरीके से निर्णय लेकर बरसों से कुरसियों पर काबिज क्षत्रपों को भी उठा कर खड़ा करने की ताकत रखते हैं। भारत में जनता खुद पर राज करने के लिये खुद ही अपने नेता चुनकर अपनी सरकारें बना लेते हैं। विशेषज्ञ एनालिसिस करते रह जाते हैं। भारत के मतदाता के निर्णय में भावना भी होती है , राष्ट्रभक्ति भी और दीर्घगामी परिपक्व सोच भी दिखती है। फ्री बीज से मताधिकार को प्रभावित करने के क्या कुछ प्रयत्न नहीं होते हैं, पर क्या सचमुच उससे परिणाम बदलते हैं ? सरे आम धर्म और जाति के कार्ड खेले जाते हैं , राजनैतिक दल वोटर आबादी के अनुसार उम्मीदवार चुनते दिखते हैं किंतु क्या इससे पिछले 77 सालों में लोकतंत्र कमजोर होता दिखता है? क्षेत्रीयता, आरक्षण, प्रलोभन, धन बल, बाहुबल, झूठा डर हमारे परिपक्व और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को कितना प्रभावित कर पाता है? दुनियां की अनेक विदेशी शक्तियां देश के चुनावों को प्रभावित करने के लिये स्पष्ट रूप से मीडिया के जरिये  मनोवैज्ञानिक चालें चलती हैं और परोक्ष तरीकों से विदेशी धन हमारे चुनावों में इस्तेमाल करने की कोशिशें होती हैं, लेकिन कुछ बात है कि हमारी हस्ती हम ही हैं। क्या भारत के संविधान को बदलने की जरूरत है? क्या डेढ़ महीनों की लम्बी अवधि तक सरकारों को ठप्प करके चुनाव चलने चाहिये?

संविधान संशोधन आवश्यक हैं भी  तो कितने और क्या? ये सारी बातें प्रत्येक बुद्धिजीवी , साहित्यकार, पत्रकारिता में अभिरुचि रखने वालों और हमारे युवा कहे जाने वाले देश की नव युवा आबादी को हमेशा से परेशान करती रही हैं। सब इसके उत्तर चाहते हैं। घर परिवार में , मित्रों में आपस में, टी वी चैनलों पर पैनल डिस्कशन्स में खूब बहस होती हैं, चाय की गुमटियों पर जाने कितनी चाय पी जाती है, कितने ही पान खाये जाते हैं, बहस होती है,  किन्तु गणना से पहले कोई निर्णायक अंतिम परिणाम नहीं निकल पाते।

भारतीय चुनावों को समझने के इच्छुक युवाओं के लिये आदर्श आचार संहिता, चुनाव प्रक्रिया, उम्मीदवारों की योग्यता , राजनैतिक दलों की पात्रता हर वोटर को समझना जरूरी है।  हमारी संस्कृति में भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठा कर प्रजा जनों को वृष्टि आपदा से बचा लिया था। हर गृहणी पर आरोप लगता है कि वह अपनी उंगली पर अपने पति को नचा रही है। उसकी उंगली में ताकत प्रधानमंत्री जितनी शक्ति संहित होती है, या केवल राष्ट्रपति की ताकत सी नजर भर आती है, यह वास्तविकता तो सारी गृहस्थी का भार उठाये वह महिला ही जानती है। मतदाता के वोट डाल चुकने की सहज पहचान के लिये उसकी उंगली पर त्वरित रूप से न मिटने वाली स्याही से निशान लगा दिया जाता है , पोलिंग बूथ पर खड़ा मतदाता  दरअसल वह मदारी है जिसकी  उंगली पर लोकतंत्र  नाचता है, उसे रिझाने मनाने बड़ी बड़ी रैलियां , रोड शो, सभायें होती हैं। धडक़ने थामें खुद मतदाता भी चुनाव परिणामों का इंतजार करते हैं, यह जानते हुये भी कि बहुत कुछ रातों रात बदलने वाला नहीं है, कोई नृप होय हमें का हानि, चेरी छोड़ न हुई हैं रानी! (विभूति फीचर्स)

पाकिस्तानी प्रेस में भारतीय चुनाव

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(सुभाष आनंद – विनायक फीचर्स)

भारतीय चुनाव में पाकिस्तान के नागरिक विशेष रुचि ले रहे इसीलिए इस पर और पाकिस्तान के समाचार पत्रों में लंबे-लंबे लेख लिखे जा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी को लेकर पाकिस्तान के समाचार पत्र बहुत सख्त है। उनका कहना है कि यदि भारतीय जनता पार्टी तीसरी बार सत्ता में आती है तो भारत-पाकिस्तान के संबंधों में कुछ खास सुधार देखने को नहीं मिल सकता।

इस्लामाबाद से प्रकाशित होने वाले उर्दू समाचार पत्र जंग में महिला पत्रकार करीना लोधी ने लिखा है कि पाकिस्तान मे हवाओं का रुख बदल गया है । पाकिस्तान सरकार भारत में  मधुर संबंध  बनाने की इच्छुक है।  नई सरकार चाहे किसी भी पार्टी की बने, उन्हें भी मित्रता का हाथ बढ़ाना चाहिए। उन्होंने लिखा है कि युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है, भारत-पाक पहले भी दो परतयज्ञ  युद्ध लड़ चुके हैं। 1965 और 1971 के युद्ध में दोनों देशों का नुकसान हुआ था। जब से पाकिस्तान में नई सरकार बनी है तभी से पाकिस्तान के व्यापारी सरकार पर दबाव बना रहे है कि दोनों देशों के बीच व्यापार का रास्ता खोला जाए।

एक अन्य पत्रकार नूर अकरम ने अपने समाचार पत्र में लिखा है कि दोनों देश आतंकवाद से पीडि़त है, दोनों सरकारों को मिल जुल कर आतंकवाद की समाप्ति के लिए कदम उठाने चाहिए।  हालांकि पाकिस्तान सरकार को मालूम है कि भारत में आतंकवाद  फैलाने और नशीले  पदार्थ भेजने के लिए कौन-कौन से लोग सक्रिय है। पाकिस्तानी मीडिया ऐसे गिरोहों का पर्दा फाश करती है लेकिन पाकिस्तान सरकार इन पर कोई एक्शन नहीं लेती।

डॉन समाचार पत्र के सिद्दीकी रहमान ने लिखा है कि यदि भारत में मोदी सरकार दोबारा रिपीट होती है तो हिंद पाक के संबंध सुधरने वाले नहीं है। क्योंकि मोदी हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम करेंगे। मोदी सरकार ने मुस्लिम समाज का शोषण किया है और अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करके राम मंदिर का निर्माण किया है। मोदी सरकार संविधान में संशोधन करके मुसलमान को दूसरे दर्जे का नागरिक बना सकती है। यदि भारत में कांग्रेस सरकार आए तो मुस्लिम समाज को कुछ राहत मिल सकती है, मुस्लिम समाज सदा कांग्रेस के शासनकाल में सुरक्षित रहा है। गुजरात के दंगों से प्रभावित हुए मुसलमान आज भी मोदी को कसाई कहते हैं। मोदी के शासनकाल में मुस्लिम समाज सुरक्षित नहीं है। एक के बाद एक मस्जिदों को शहीद किया जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक चालेें चल कर पाकिस्तान को बदनाम किया जा रहा है।

पाकिस्तान के उर्दू समाचार पत्र भारतीय चुनाव से भरे पड़े हैं। उनका मानना है कि यदि हिंदुस्तान में दोबारा मोदी जीतता है तो वह पाकिस्तान के विकास में कांटे खड़े कर सकता है। यदि भारतीय जनता पार्टी ने 400 का आंकड़ा पार कर लिया तो मोदी पाकिस्तान के खिलाफ सख्त फैसले  ले सकता है जिससे पाकिस्तान को बड़ा नुकसान हो सकता है।

नवाए वक्त समाचार पत्र में हिमा

कुरैशी ने लिखा है कि भारतीय जनता पार्टी मुस्लिम समाज से इतनी नफरत करती है कि उन्होंने भारतीय लोकसभा की 542 सीटों पर एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया।

पाकिस्तान के प्रसिद्ध पत्रकार हैदर हुमायूं ने अपने लेख में लिखा है कि मोदी की मुस्लिम विरोधी नीतियों के कारण उत्तर प्रदेश ,बिहार के मुसलमान नेशनल एलायंस के पक्ष में खड़े हो गए हैं , उससे लगता है कि मुस्लिम बाहुल्य धनी आबादी वाले प्रदेशों में मोदी को बहुत नुकसान होने वाला है जिसके कारण वह तीसरी बार सत्ता में नहीं आ सकते।

भारत की अन्य राजनीतिक पार्टियों जैसे कांग्रेस, एस.पी इत्यादि ने बड़े पैमाने पर मुसलमानों  को टिकट दिए हैं जो आपसी भाईचारे का अच्छा प्रतीक है।

पाकिस्तान सरकार के साथ-साथ पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज की निगाहें भी भारतीय चुनाव पर लगी हुई है। मरियम नवाज भी चाहती हैं कि भारत के साथ खुला व्यापार खोला जाए, जिससे दोनों देशों की अर्थव्यवस्था सुधर सके।

पाकिस्तान के बड़े कालम नवीस डॉक्टर सुल्तान अहमद ने लिखा है कि जहां पाकिस्तान में हाल ही में नई सरकार का गठन हुआ है वहीं भारत में दो माह बाद चुनाव प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, देखना होगा कौन सी पार्टी सत्ता में आती है। दोनों बड़ी शक्तियां हैं युद्ध के बारे में कोई सोच नहीं सकता। एक तरफ पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर है इसलिए वह युद्ध के बारे में सोच भी नहीं सकता।

उधर भारत विश्व की चौथी महान शक्ति बनने के नजदीक पहुंच रहा है, भारत को चाहिए कि वह पाकिस्तान को अपने छोटे भाई की तरह व्यवहार करें ताकि दोनों देशों की गरीबी दूर हो सके। शिक्षा के क्षेत्र में पाकिस्तान बहुत कमजोर है वही आपसी संबंधों से शिक्षा स्तर का सुधार होना चाहिए, पाकिस्तान के दिल के रोगियों की आधुनिक सर्जरी को भारत में करवाने में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। मोदी को हिंदू-मुसलमान का नारा छोड़ एशिया में विकास का नारा बुलंद करना चाहिए। पाकिस्तान हिंदुस्तान से निकला हुआ एक राष्ट्र है ,दोनों देशों के प्रतिनिधियों को  आपसी दुश्मनी भुलाकर विकास के पथ पर चलना चाहिए। (विनायक फीचर्स)

एक्ट्रेस स्नेहा उल्लाल के हाथों हिंदुस्तान रत्न अवार्ड से सम्मानित हुए बिजनेसमैन डॉ निकेश जैन माधानी

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मुंबई। 18 माई 2024 को मुक्ति कल्चरल हब अंधेरी, मुंबई में बॉलीवुड एक्ट्रेस स्नेहा उल्लाल (सलमान खान स्टारर फिल्म लकी फेम) के हाथों हिंदुस्तान रत्न अवार्ड अवॉर्ड से युवा बिजनेसमैन डॉ निकेश ताराचंद जैन माधानी सम्मानित हुए। यह अवार्ड शो में डॉ निकेश जैन गेस्ट ऑफ ऑनर थे और उन्हें बेस्ट बिजनेसमैन के रूप में पुरस्कृत किया गया। इस पुरस्कार समारोह का आयोजन राजकुमार तिवारी के साथ पुनीत खरे ने किया।

आपको बता दें कि हाल ही में ग्लैमर एंड लाइफ स्टाइल अवॉर्ड अभिनेत्री महिमा चौधरी के हाथों और प्रीति झंगियानी के हाथों नेशनल इंपैक्ट अवार्ड 2024 बिजनेसमैन डॉ निकेश ताराचंद जैन माधानी को प्राप्त हुआ है। इस अवॉर्ड शो में निकेश जैन वीआईपी गेस्ट थे साथ ही उनकी कंपनी माधानी ग्रुप और पुष्पा गृह उद्योग तथा पुष्पम पापड़ इस शो का सहयोगी पार्टनर था।
विदित हो कि कुछ माह पूर्व बिजनेसमैन डॉ निकेश ताराचंद जैन माधानी को फिल्म तेरे नाम की अभिनेत्री भूमिका चावला ने तमस आईकॉनिक अवॉर्ड्स 2024 से सम्मानित किया था। वहीं निकेश को दिग्गज अभिनेता निर्माता निर्देशक धीरज कुमार, गदर 2 के एक्शन डायरेक्टर टीनू वर्मा और डिस्को डांसर गीत के गायक विजय बेनेडिक्ट एवं शो के ओर्गेनाइजर संजीव कुमार के हाथों बेस्ट बिजनेसमैन कैटेगिरी में राष्ट्रीय अचीवर अवार्ड 2024 से सम्मानित किया गया था। तो वहीं डॉ निकेश जैन माधानी रामायण धारावाहिक में सीता की भूमिका निभाने वाली दीपिका चिखलिया के हाथों दादासाहेब फाल्के इंडियन टेलीविजन अवार्ड 2024, पार्श्वगायक उदित नारायण के हाथों अखंड भारत गौरव अवार्ड 2024 और अभिनेता सोनू सूद के हाथों एशियन एक्सीलेंस अवार्ड 2024 से सम्मानित हुए हैं।
इसके साथ ही उन्हें सुप्रसिद्ध अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे, एसीपी संजय पाटिल के हाथों दादासाहेब फाल्के अवार्ड प्रस्तुत आईआईएफए अवार्ड 2023 प्राप्त हुआ है।
विदित हो कि कुछ माह पूर्व दिल्ली में डॉ निकेश ताराचंद जैन माधानी को वर्ल्ड पीस ऑफ यूनाइटेड नेशन यूनिवर्सिटी द्वारा प्रसिद्ध अभिनेत्री काजल अग्रवाल एवं भारतीय पहलवान नरसिंह पंचम यादव के हाथों ऑनरेरी डॉक्टरेट डिग्री एवं बिजनेस अवार्ड और विंदू दारा सिंह के हाथों आत्मनिर्भर एक्सीलेंस अवार्ड भी मिल चुका है।
इसके साथ ही 2022 में निकेश जैन मधानी को महाराष्ट्र राज्य के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के हाथों गऊ भारत भारती अवार्ड तथा कैबिनेट मंत्री परषोत्तम रूपाला (मत्स्य, दुग्ध व उद्योग मंत्री) के हाथों से गऊ भारत भारती सर्वोत्तम सम्मान 2023 एवं नेताजी सुभाष चंद्र बोस पुरस्कार 2023 प्राप्त हो चुके हैं। उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज गौरव पुरस्कार 2021 भी मिल चुका है। ब्राइट आउटडोर के सीएमडी योगेश लखानी ने अपने जन्मदिन पर निकेश जैन को बिज़नेस आइकॉनिक ब्राइट अवार्ड एवं ब्राइट आउटडोर बी.एस.सी. आईपीओ आने की खुशी में बिज़नेस अवार्ड 2023 से सम्मानित किया। निकेश को परफेक्ट वुमेन अचीवर अवॉर्ड, गोल्डन ह्यूमेनिटी अवॉर्ड भी मिल चुका है। वहीं आईपीएस कृष्ण प्रकाश नायर 2021 और 2022 में उन्हें अवॉर्ड देकर सम्मानित कर चुके हैं।
विदित हो कि डॉ निकेश जैन मधानी फाइनेंस एडवाइजर हैं और इनके कई बिजनेस हैं जैसे कि माधानी फाइनेंस, माधानी एंटरटेनमेंट एंड प्रोडक्शन, माधानी ट्रेडिंग कंपनी, माधानी न्यूज लाइव 24×7 और मधानी इंटरप्राइज इत्यादि। इसके साथ ही निकेश की माँ के नाम पुष्पा गृह उद्योग कंपनी और पुष्पम पापड़ कंपनी है। जल्द ही मधानी कंपनी की लिस्टिंग हो जायेगी।
डॉ. निकेश ताराचंद जैन मधानी ने एक हिंदी कॉमेडी फिल्म प्रोड्यूस की है। इसके पहले उन्होंने 12 म्यूजिक एल्बम ओर शॉर्टफिल्म को माधानी एंटरटेनमेंट और प्रोडक्शन यूट्यूब चैनल पर रिलीज किया है।
निकेश ताराचंद जैन मधानी ने लॉ बुक में इतिहास बनाया है। दरअसल उनके ऊपर 2014 में ईडी पीएमएलए का केस हो गया था। फिर उन्होंने लंबी लड़ाई लड़ते हुए 2017 में सुप्रीम कोर्ट से धारा 45 ए रद्द हुआ जिससे कानून के किताब में डॉ निकेश जैन मधानी का नाम दर्ज हुआ और उनके ऊपर लगे धारा को हटाने में प्रसिद्ध वकील मुकुल रोहतगी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। निकेश जैन की कानून लड़ाई में जाने माने वकील साजल यादव, वकील नेमीचंद शर्मा और वकील मनीष वोरा ने भी सहयोग किया।
डॉ. निकेश ताराचंद जैन मधानी सबसे सफल व्यवसायी रतन टाटा, मुकेश अंबानी, गौतम आडानी और लक्ष्मी मित्तल से प्रेरित हैं।

– संतोष साहू

कांग्रेस का आखिरी दांव बनती प्रियंका गांधी

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(अंजनी सक्सेना – विनायक फीचर्स)
अठारहवीं लोकसभा के चुनाव कई दृष्टियों से अलग और दिलचस्प साबित हो रहे हैं। इसमें सर्वाधिक दिलचस्प तथ्य तो यह है कि अब इस देश में कोई भी ऐसा दल नहीं है जो कि लोकसभा की सभी सीटों पर चुनाव लड़ रहा हो। एक समय कश्मीर से कन्या कुमारी तक देश की लगभग सभी सीटों पर चुनाव लडऩे वाली कांग्रेस अब गठबंधन के नाम पर दूसरे दलों के लिए कई सीटें छोडऩे के लिए विवश है। कभी एकला चलो की नीति पर विश्वास करने वाली कांग्रेस कई छोटे राजनैतिक दलों से गठबंधन कर चुकी है। इसी तरह भाजपा भी अनेक छोटे-छोटे दलों को साथ लेकर ही चुनाव लड़ रही है।

कांग्रेस की राजनीति नेहरू-गांधी परिवार की धुरी पर ही घूमती रही है। मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, श्रीमती सोनिया गांधी और अब राहुल और प्रियंका गांधी कांग्रेस का इतिहास इन नामों के बिना अधूरा है। दुनियां में शायद ही ऐसा कोई परिवार होगा जिसके तीन-तीन सदस्य (जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी एवं राजीव गांधी) किसी लोकतांत्रिक शासन में सत्ता के सर्वोच्च स्थान पर बैठे हों। इसी तरह दुनिया में ऐसा कोई राजनैतिक दल भी नहीं होगा, जिसके सर्वोच्च पद पर एक ही परिवार के छह व्यक्ति आसीन हुए हों। अब प्रियंका गांधी के चुनाव प्रचार की सक्रिय राजनीति में आ जाने से नेहरू-गांधी परिवार के सातवें सदस्य (मोतीलाल नेहरू से लेकर प्रियंका गांधी तक) का भी कांग्रेसाध्यक्ष बनना तय हो गया है। वैसे प्रियंका गांधी एवं राहुल गांधी के सक्रिय राजनीति में उतरने से भी कांग्रेस का कुछ खास भला हो नहीं पाया है।

इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि भारत में कांग्रेस का जनाधार घटता जा रहा है। प्रियंका गांधी को चुनाव प्रचार की सक्रिय राजनीति में उतारने का उद्देश्य संभवत: यही है कि इस घटते जनाधार को रोका जाये। प्रियंका गांधी को सक्रिय होने से कांग्रेस जनों को तीन लाभ दिख रहे हैं। पहला लाभ तो यह है कि उन पर विदेशी मूल के होने का आरोप नहीं लगाया जा सकता, दूसरा लाभ यह होगा कि आम जनता उनमें इंदिरा गांधी जैसी जुझारू छवि देखेगी। तीसरा लाभ यह होगा कि देश के नवयुवक मतदाता  प्रियंका के युवा नेतृत्व की ओर आकर्षित होंगे। इन तीन लाभों के माध्यम से कांग्रेस उस क्षति की पूर्ति करना चाहती है, जो पिछले चुनावों के परिणामों के बाद हुई है।

2014 के लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी और 2019 में राहुल गांधी के नेतृत्व की विफलता के बाद निराशा के समुद्र में गोते लगा रही कांग्रेस के नेता प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में उतारने की रणनीति बनाते समय यह भूल गए हैं कि सन् 1947 के बाद गंगा और यमुना में काफी पानी बह गया है। सन् 1947 में जवाहरलाल नेहरू का नेतृत्व इसलिए चुनौती हीन था कि उनके नाम के साथ उनका त्याग तथा स्वतंत्रता आंदोलन के लिए उनका बलिदान भी जुड़ा हुआ था। इंदिरा गांधी को भी उनके त्याग और बलिदान का लाभ मिला था, पर प्रियंका गांधी या राहुल गांधी के खाते में कौन सा त्याग या बलिदान हैं।

लोग प्रियंका और राहुल को अनुभवहीन एवं अपरिपक्व राजनेता मानते हैं। यद्यपि राजीव गांधी जब राजनीति में आए थे तब उन्हें भी अपरिपक्व माना जाता था फिर भी उन्हें कांग्रेस को सर्वाधिक सीटें एवं प्रचण्ड बहुमत दिलाने का श्रेय मिला था। पर इस श्रेय का कारण श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति थी। श्रीमती इंदिरा गांधी ने जब राजनीति में प्रवेश किया था तब उन्हें भी अपरिपक्व माना जाता था, पर वे उतनी अपरिपक्व नहीं थी जितना कि उन्हें समझा गया था। अपने पिता स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू से उन्होंने राजनीति के गुणदोषों को अच्छी तरह समझा था। फिर उनके पास समर्पित एवं जनाधार युक्त सलाहकारों की टीम थी। राजीव गांधी की अपरिपक्वता इसलिए सामने आयी कि वे अपने नाना एवं मां के समान कोई चमत्कार नहीं दिखा पाये। इसका एक मात्र कारण यही था कि वे भी जनाधार विहीन सलाहकारों से घिरे हुए थे। इसीलिए वे अपने प्रधानमंत्रित्व काल में कोई चमत्कार तो नहीं दिखा पाए बल्कि बोफोर्स घोटाले के आरोपों से घिर गए। फिर उनके पास देश सेवा या जनसेवा के लिए त्याग और बलिदान की वह पूंजी नहीं थी, जो जवाहरलाल नेहरू एवं श्रीमती इंदिरा गांधी के पास थी। राहुल गांधी एवं प्रियंका गांधी के पास भी यह पूंजी नहीं है। उनके पास भी जनाधार विहीन सलाहकारों की फौज है।

ये जनाधार विहीन सलाहकार और साथी ही कांग्रेस को चला रहे हैं। इन साथियों एवं सलाहकारों की बानगी देखिए। दिग्विजय सिंह और अशोक गहलोत अपने-अपने प्रांतों (मध्यप्रदेश और राजस्थान) में कांग्रेस की दुर्गति करा चुके हैं। मणिशंकर अय्यर और सैम पित्रोदा भी गांधी परिवार के करीबी माने जाते हैं पर ये भी लोकसभा चुनावों के बीच में अपनी बयानबाजी से कांग्रेस को संकट में डालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। वहीं मध्यप्रदेश में राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले जीतू पटवारी भी अपने बयानों से चर्चा में बने रहते हैं और मध्यप्रदेश कांग्रेस के सबसे असफल अध्यक्ष साबित हो रहे हैं।

राहुल गांधी एवं प्रियंका गांधी के जनाधार विहीन साथियों और सलाहकारों की यह सूची काफी लम्बी है। जब ये सलाहकार  स्वयं चुनाव जीत नहीं सकते है, तो वे दूसरों को क्या चुनाव जितायेंगे?

ऐसी स्थिति में इन सलाहकारों एवं साथियों के भरोसे प्रियंका गांधी यदि राजनीति में आयी हैं तो यह उनकी राजनैतिक अपरिपक्वता ही कही जाएगी। पर फिर भी इसे कांग्रेस का आखिरी दांव ही कहा जा सकता है और यहआखिर दांव कांग्रेस की हारी हुई बाजी को जीत में बदल सकता है, इसमें मुझे तो संदेह है ही क्या आपको भी है? (विनायक फीचर्स)

हिमालयी जड़ी बूटियों पर गहराता संकट*

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(दीपक नौगांई – विभूति फीचर्स)

उत्तराखण्ड का पर्वतीय क्षेत्र अपनी अकूत वन संपदा और वनस्पतियों की विविधता के लिए जाना जाता है, लेकिन पिछले कुछ सालों मे शिवालिक पर्वत शिखरों मेें पाई जाने वाली जड़ी बूटियाँ अवैध दोहन और तस्करी के चलते तेजी से विलुप्त हो रही है। उत्तराखण्ड के हिमालय को हिमवंत औषधम भूमिनाम कहा गया है अर्थात जहाँ  औषधीय पौधों की भरमार है। महर्षि चरक, सुश्रुत, वांगभट्ट  से लेकर धनवंतरि के शोध ग्रन्थ द्रव्य गुण विज्ञान में पाँच सौ से अधिक जड़ी बूटियों के इस क्षेत्र में पाए जाने का वर्णन मिलता है।

हिमालय क्षेत्र में पाई जाने वाली जड़ी बूटियाँ ही आयुर्वेद चिकित्सा के ज्ञान का आधार रही है, जिनका आयुर्वेदाचार्यो ने दिल खोलकर गुणगान किया है, परन्तु प्रकृति प्रदत्त यह बेशकीमती संपदा अब छीज रही है। पहले स्थानीय  लोग यहाँ की जड़ी  बूटियों से परंपरागत रुप से लाभान्वित होते थे, लेकिन अब मोटी रकम कमाने की चाह में तस्करों ने गाँव वालों के साथ मिलकर इनका बेजा दोहन कर पहाड़ को कई महत्वपूर्ण बूटियों से विहीन कर दिया है। ये दुर्लभ जड़ी बूटियाँ तस्करी के जरिए विदेश पहुंच रही है।

एक सर्वेक्षण के अनुसार पहाड़ की दो सौ से अधिक जड़ी बूटियों की प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर है। कई तो विलुप्त हो चुकी है। शोधकर्ता भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण विभाग ने इनके अस्तित्व पर संकट का कारण  मनमाफिक दोहन,, वनों का कटाव,  वनों में हर साल लगने वाली आग तथा प्राकृतिक वन संपदा का क्षरण होना बताया है।
अवैध दोहन का एक मुख्य कारण यह भी है कि यूरोपीय व अन्य देशों में  आयुर्वेदिक दवाओं के प्रति आकर्षण के चलते कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण में उतर आई है। इस कारण तस्करी बढ़ी है और हमारी बहुमूल्य बूटियाँ चोरी छिपे विदेशों में पहुँच रही है। पिछले कुछ सालों मे हमारी तीन दर्जन से अधिक वनौषधियों को विदेशों में पेटेंट भी करा लिया गया है।

पहाड़ की संकटग्रस्त औषधीय पौधों की प्रजातियों में टैक्सस बकाटा,  कूठ,  पुनर्नवा, सर्पगंधा, हरड़, जटामांसी, कीड़ाजड़ी, शतावर, गूलर, चिरायता,  सालमपंजा, कासनी,  कालाबाशा,  पिपली,  जिंबू ,आक,  कौंच,  वज्रदंती आदि शामिल हैं।

इन जड़ी बूटियों में  टैक्सस बकाटा अर्थात टैक्साल को कैंसर की औषधि के रुप मे प्रयोग किया जाता है। टैक्साल का मूल स्रोत  टैक्सस ब्रेविफोलिया नामक वृक्ष की छाल है। कुमाऊं में इसे थनेर नाम से जाना जाता है। एक से दो ग्राम टैक्साल की कीमत 3 लाख से अधिक होती है। कई जगह तस्कर चोरी छिपे इस पेड़ की छाल निकालकर या पेड़ को ही काटकर ले जाते हैं। नतीजतन यह अमूल्य वनस्पति आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रही है।

संकटग्रस्त प्रजातियों में खैर व भोज वृक्ष का बड़े स्तर पर अवैध कटान हो रहा है। खैर का उपयोग कत्था व गुटखा बनाने में होता है। इधर बाजार में नित नए गुटखे आने से खैर की मांग बहुत बढ़ गयी है। मांग बढऩे का अर्थ है तस्करी का भी बढऩा। इसी तरह भोज वृक्षों की संख्या भी  बहुत कम रह गई है। कभी हमारे श्रृषि मुनियों ने इसकी छाल पर कई ग्रंथ लिखे थे। स्वयं इस लेखक ने पिंडारी ग्लेशियर की यात्रा में देखा था कि गाँव वाले ही ईंधन के लिए भोज वृक्षों को काट रहे है।
हिमालय के ऊंचाई वाले इलाकों में एक नायाब जड़ी मिलती है, जिसे हमारे यहाँ कीड़ाजड़ी तो तिब्बत व चीन में  यारशागुंबा कहा जाता है। चीन में इसका इस्तेमाल एथलीटों की  क्षमता बढ़ाने के लिए प्राकृतिक स्टीरॉयड के रुप में ट्री किया जाता है। यही कारण है कि पिथौरागढ़ जनपद के धारचुला,  मुनस्यारी के ऊँचे इलाकों में स्थानीय  लोग बड़े पैमाने पर इसका दोहन व तस्करी कर रहे हैं कयोंकि चीन में इसकी मुंहमांगी  कीमत मिल रही है। इसके संग्रह और व्यापार से जुड़े लोगों में अक्सर खूनी संघर्ष तक देखने को मिलता है।
यह जड़ी 3500 मीटर की ऊंचाई पर हिम आच्छादित क्षेत्र में पाई जाती है,  जहाँ ट्री लाइन  खत्म हो जाती हैं। सामान्य तौर पर यह एक जंगली मशरुम है, जो एक खास तरह के कीड़े के कैटरपिलर्स को मारकर उस पर पनपता है। स्थानीय  लोग इसे कीड़ाजड़ी इसलिए कहते है क्योंकि  ये आधा कीड़ा है और आधा जड़ी। इसकी बड़े पैमाने पर तस्करी हो रही है। दुनिया भर में लोग आयुर्वेद की ओर मुड़ रहे है। विदेशों में जड़ी बूटियाँ दुर्लभ है पर भारत में इनकी प्रचुरता है। इसलिए दुनिया भर की दवा कंपनियों और तस्करों की नजरें भारत की इस संपदा पर टिकी है। वनौषधियों की विलुप्तता का एक कारण यह भी है कि महत्वपूर्ण जड़ी बूटियों की पहचान करने वाले परंपरागत पीढ़ी के वनस्पति विशेषज्ञ अब नहीं रहे और जिन्हें इनका ज्ञान है वे जानकारियों को अपने तक ही सीमित रख नई पीढ़ी को इस ज्ञान से वंचित कर रहे हैं।
जानकारों का कहना है कि जंगल से जड़ी बूटियों को खोज निकालना जितना मेहनत का काम है उतना ही श्रम साध्य है इन जड़ी बूटियों को तोडऩा। जिस पौधे की जड़ दवा बनाने मे काम आती है , उसे उखाड़ देने से पूरा पौधा ही मर जाता है। जंगल मे वन औषधीय पौधे अपने आप उगते हैं,  पर तस्कर बड़ी बेरहमी से जड़ों सहित इन पौधों को उखाड़ कर ले जाते हैं।

तस्कर कई बार सीधे सादे गाँव वालों से औने पौने दामों में जड़ी बूटियाँ खरीद लेते है। गाँव वाले जड़ी बूटियों के वास्तविक मूल्य से अनभिज्ञ रहते है और चंद रुपयों के बदले वनौषधियों को तस्करों के हाथों बेचकर खुश हो जाते है। बड़ी क्रूरता से किए जा रहे अवैध व अनियंत्रित दोहन से अनेक दुर्लभ वनौषधियों की प्रजातियां विलुप्त हो चुकी है और जो बची है वे भी विलुप्ति की कगार पर है। (विभूति फीचर्स)

Success Story – संदीप इंजीनियर , सफलता केवल मेहनत मांगती है.

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Success Story : सफलता केवल मेहनत मांगती है. वह नहीं देखती की मेहनत करने वाला अमीर है या फिर किसी गरीब घर का लड़का. बिजनेस जगत ऐसे हजारों उदाहरणों से पटा पड़ा है. लगभग शून्य से शुरुआत करके लाखों करोड़ों तक का बिजनेस बनाने वाले लोगों की एक लम्बी फेहरिस्त है. इनकी कहानियां, किसी भी हार मान चुके शख्स के लिए पारस पत्थर की तरह काम करती हैं. आज हम एक ऐसे ही शख्स की कहानी लेकर हाजिर हैं, जिसने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह एक दिन 60,000 करोड़ रुपये की मार्केट कैप वाली कंपनी का मालिक होगा. वह तो बस मेहनत करता गया और कामयाबी झक मारके उसके पीछे-पीछे चलती रही.

जिस शख्स की आज हम बात कर रहे हैं उसका नाम है संदीप इंजीनियर. 26 सितंबर 1962 को गुजरात में पैदा हुए संदीप इंजीनियर आज एस्ट्रल लिमिटेड (Astral Limited) के मालिक हैं. कंपनी का शुरुआत नाम एस्ट्रल पॉली टेक्नीक लिमिटेड (Astral Poly Technik Limited) था. जब हम यह कहानी छाप रहे हैं, उस दिन तक भारतीय शेयर बाजारों में लिस्टेड इस कंपनी की इंटरप्राइज वैल्यू 61,457.22 करोड़ रुपये है. ट्रेंडलाइन से लिए गए आंकड़ों के मुताबिक, कंपनी के प्रोमोटर्स की लिस्ट में अहम नाम संदीप प्रवीणभाई इंजीनियर का है. उनके पास एस्ट्रल लिमिटेड के 31.57 फीसदी स्टॉक हैं. केवल उनकी ही शेयर होल्डिंग वैल्यू 18,606.8 करोड़ रुपये की है. आंकड़े तो भारी-भरकम हैं, मगर उनकी कहानी बहुत साधारण और दिलचस्प है.

पहला बिजनेस- कब्ज हटाने का पाउडर बेचा

संदीप इंजीनियर ने गुजरात विश्वविद्यालय से कैमिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली. उनके पास बिजनेस की बेसिक नॉलेज भी नहीं थी, मगर 23 साल की उम्र में वे अपना धंधा स्थापित करने के बारे में सोच रहे थे. वे लगभग ढाई साल से अहमदाबाद के मणिनगर में कैडिला लैबोरेट्री (अब कैडिला हेल्थकेयर) पर काम कर रहे थे. उन्होंने काम छोड़ा और बिजनेस की पहली उड़ान भरने के लिए पंख पसारे. संदीप इंजीनियर ने फ्लेवर्ड ईसबगोल (Isabgol) डिस्ट्रीब्यूट करना शुरू किया. बता दें कि ईसबगोल को भारत के कई हिस्सों में कब्ज (Constipation) के घरेलू नुस्खे के तौर पर लिया जाता है. माना जाता है कि ईसबगोल खाने से कब्ज दूर होती है और पेट आसानी से फ्रेश होता है.

ईसबगोल डिस्ट्रीब्यूशन में संदीप को एक बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ा. दुकानदार उनसे उधार में माल लेकर काउंटर पर रखना चाहते थे. वे कहते थे कि अगर बिक गया तो पैसा देंगे, और नहीं बिका तो माल ज्यों का त्यों रखे रहेंगे. इसी अड़चन की वजह से उनकी धंधे की यह उड़ान कुछ ही वर्षों में जमीन पर आ गिरी. 80 के दशक में वे 5 हजार रुपये के कर्ज तले दब चुके थे.

कैडिला चीफ पंकज पटेल ने दिखाई राह
1987 में वे कैडिला हेल्थकेयर संभाल रहे पंकज पटेल के पास गए और बिजनेस के लिए सलाह मांगी. आज की डेट में पंकज पटेल एक अरबपति हैं और जायड्स लाइफसाइंस (Zydus Lifesciences) के चेयरमैन हैं. पटेल ने उन्हें सुझाव दिया कि वे एक्टिव फार्मा इंग्रिडिएंट्स (API) में अपनी किस्मत आजामाएं. बता दें कि दवाएं बनाने के लिए API एक महत्वपूर्ण तत्व होता है. संदीप इंजीनियर को आइडिया सही लगा और उन्होंने श्री कैमिकल्स (Shree Chemicals) नाम की एक कंपनी बना दी. फोर्ब्स इंडिया से बात करते हुए संदीप इंजीनियर ने एक बार कहा था, “पंकजभाई ने मुझे पूरी प्रक्रिया के बारे में समझाया था. मेरे जीवन में वे एक बड़े मेंटर की तरह हैं. उन्होंने मुझे आइडिया भी दिया और सलाह भी. उन्होंने मुझसे कहा था, जितना बना सकते हो बनाओ, हम खरीदेंगे.” फोर्ब्स की ही एक रिपोर्ट के मुताबिक, बाद में हालांकि कैडिला ने उनके लगभग आधे प्रॉडक्ट रिजेक्ट कर दिया, क्योंकि क्वालिटी वैसी नहीं थी, जैसी चाहिए थी. ऐसे में इंजीनियर को मैन्युफैक्चरिंग बंद करनी पड़ी. मतलब एक और सेटबैक मिला.

बिजनेस में मुसीबतें तो आती ही हैं, मगर सफल वही होता है जो जिद्दी हो और हार न माने. संदीप इंजीनियर ने कैरव कैमिकल्स (Kairav Chemicals) नाम की एक कंपनी बनाई और एक नई तरह के प्रॉडक्ट लाइन पकड़ी. शुरुआती सभी टेस्ट पास कर लिए. कंपनी ठीक-ठाक काम करने लगी. तब इंजीनियर को लगा कि केवल एक ही मॉलीक्यूल में काम करके बहुत आगे तक नहीं जाया जा सकता. वे अभी भी किसी ऐसी चीज की तलाश में थे, जो उनकी बिजनेस की तड़प को सुकून दे पाए.

अमेरिका वाले अंकल और CPVC
जब किसी भी चीज की तड़प हद से गुजरने लगे तो कायनात भी मदद के लिए आगे आ जाती है. ऐसा ही इंजीनियर के साथ हुआ. अमेरिका विजिट के दौरान उनके अंकल ने उन्हें सीपीवीसी (CPVC) के बारे में बताया. सीपीवीसी की फुल फॉर्म है क्लोरिनेडेट पॉलीविनिल क्लोराइड (Chlorinated polyvinyl chloride). उनके अंकल अमेरिकी कंपनी बीएफ गुडरिच परफॉर्मेंस मटीरियल में आरएंडडी (रिसर्च एंड डेवलपमेंट) डिपार्टमेंट में हेड थे. अब इस कंपनी का नाम लुब्रिजॉल (Lubrizol) है, जो सीपीवीसी पाइप की दुनिया की सबसे बड़ी मैन्युफैक्चरर है. यहां संदीप इंजीनियर को पोटेंशियल नजर आया.

वे अमेरिका से लौटे और 1998 में एस्ट्रल पॉली टेक्नीक कंपनी बनाई. खुद संदीप इंजीनियर बताते हैं, “जब मैंने सीपीवीसी पाइप्स लॉन्च की तो कोई इसे एक्सेप्ट नहीं कर रहा था. हम भारत में केवल इंडस्ट्रियल सीपीवीसी पाइप लाए थे. पहले कुछ वर्षों में इंडस्ट्री ने इसे भाव नहीं दिया. हम अपनी क्षमता का केवल 5 प्रतिशत ही काम कर पा रहे थे. हमें बहुत नुकसान हो रहा था और लगातार कर्ज का पहाड़ बढ़ रहा था.” यहां तक संदीप इंजीनियर ने बिजनेस की नब्ज तो पकड़ ली थी, मगर सफलता अभी कुछ कदम दूरी पर थी.

जीआई पाइप्स को किया रिप्लेस
2001 में संदीप इंजीनियर अपनी सीपीवीसी पाइप को प्लम्बिंग पर्पज के लिए ले आए. उन्होंने गाल्वैनिस्ड आयरन (GI) पाइप्स को रिप्लेस करने के बारे में सोचा था, जोकि बहुत मुश्किल था. इसे सफल बनाने के लिए उन्होंने प्लम्बरों के साथ मीटिंग्स की और उन्हें बताया कि इन पाइपों को कैसे इस्तेमाल में लाना है. सीपीवीसी पाइप जीआई पाइप से महंगी थी तो लोग उसे खरीदना नहीं चाहते थे. इसी वजह से संदीप ने पाइप की कीमतों को 20-25 प्रतिशत तक घटा दिया, ताकि ज्यादा बड़ी मात्रा में सेल की जा सके.

2003 आते-आते काम चलने लगा. सालाना बिजनेस पहले 15 करोड़ और फिर 25 करोड़ तक पहुंचा. 2007 तक एस्ट्रल 60 करोड़ रुपये तक पहुंच गई थी. इंजीनियर कंपनी का आईपीओ लाए और बाजार से 35 करोड़ रुपये उठाए. एस्ट्रल ने न केवल पाइप्स, बल्कि सीपीवीसी सेग्मेंट में और भी काफी सामान बनाया, जोकि प्लम्बिंग में कम आता है. बाद में उनके बेटे कैरव भी उनके साथ आ गए. ग्राहकों तक पहुंचने और प्रॉडक्ट की रिकॉल वैल्यू बढ़ाने के लिए कंपनी का नाम बदला गया. एस्ट्रल पॉली टेक्नीक से बदलकर एस्ट्रल पाइप्स (Astral Pipes) कर दिया गया.

दबंग 2 का वो 6 मिनट का सीन और सेल हुई शूटअप
2012 में सलमान खान की एक फिल्म आई, जिसका नाम था दबंग 2 (Dabangg 2). इस फिल्म में एक सीन था, जिसमें हीरो सलमान खान (किरदार चुलबुल पांडे) बच्चे को किडनैप करने वाले गुंडों की धुनाई करते हैं. लगभग 6 मिनट के इस सीन में कई बार एस्ट्रल के बॉक्स और पाइपें देखने को मिलती हैं. सीन के लास्ट में सलमान खान एस्ट्रल पाइप से भी गुंडों को ठोकते नजर आते हैं. इसी सीन को लेकर एक टेलीविजन विज्ञापन (TVC) भी बनाया गया. नीचे वीडियो में आप एस्ट्रल का विज्ञापन देख सकते हैं-

दबंग के इस विज्ञापन के बाद एस्ट्रल की पाइप की डिमांड रातों-रात बढ़ गई. लोग इसे ‘दबंग पाइप’ और ‘सलमान वाली पाइप’ के नाम से जानने लगे. दबंग 3 के लिए भी कंपनी ने फिल्म के साथ टाईअप किया था. सलमान स्टारर यह मूवी 2019 में रिलीज हुई थी. हालांकि, एक्ट्रल पाइप की सेल तो 2012 के बाद से ही उड़ान भरने लगी थी. मगर 2019 के बाद तो इसने नई ऊंचाइयां छूनी शुरू कर दी थीं.

संदीप इंजीनियर द्वारा शुरू की गई एस्ट्रल लिमिटेड ने 2019 में ₹1,915 करोड़ रुपये की सेल की थी. 2020 में ये बढ़कर 2,042.8 करोड़ रुपये तक पहुंची और अगले ही साल यह 2,486 करोड़ पार कर गई. 2021 के बाद 2022 में यह बढ़कर 4061 करोड़ पहुंच गई. यह एक बड़ा उछाल था. 2023 में यह सेल 4,611.6 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है. इसी दौरान यदि हम बात करें प्रॉफिट की तो 2019 में कंपनी ने 141.4 करोड रुपये बनाए थे, और 2022 में कंपनी ने 461.7 करोड रुपये का प्रॉफिट हासिल किया था. 2023 में प्रॉफिट पिछले साल के मुकाबले कुछ घटकर 447.9 करोड़ रुपये रहा.

संदीप इंजीनियर की नेट वर्थ
फोर्ब्स डॉट कॉम के मुताबिक, संदीप इंजीनियर की नेट वर्थ 3.8 बिलियन डॉलर है. भारतीय करेंसी में यह 31,653 करोड़ (3,16,53,56,30,000) रुपये बनती है. इसी वेबसाइट के मुताबिक, 2020 में उनकी नेट वर्थ 1.1 बिलियन डॉलर थी. 2021 में बढ़कर 2.3 बिलियन डॉलर हुई और 2022 में 2.6 बिलियन डॉलर हो गई. 2023 में इसमें ज्यादा परिवर्तन नहीं देखा गया, मगर फिलहाल यह बढ़कर 3.8 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई है.

संदीप इंजीनियर का परिवार
बिलियनेयर संदीप इंजीनियर के पिता प्रवीण चंद्रा थे और माता का नाम हंसाबेन इंजीनियर था. संदीप की शादी जाग्रुति से हुई. जाग्रुति फिलहाल एस्ट्रल लिमिटेड के प्रोमोटर्स में शामिल हैं और उनके पास 7.56 प्रतिशत (2,03,18,688) शेयर हैं. संदीप इंजीनियर और जाग्रुति को दो बेटे हैं, जिनका नाम कैरव और सौम्य हैं.

कंपनी में कितना दम?
किसी भी कंपनी में कितना दमखम है, यह जानने के लिए एक नजर इसके शेयरहोल्डिंग पैटर्न पर भी डालनी चाहिए. शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों की बारीक से बारीक जानकारी देने वाली वेबसाइट फिनोलॉजी के अनुसार, कंपनी के प्रोमोटर्स के पास 54.1 प्रतिशत शेयर हैं. आमतौर पर प्रोमोटर के पास 70-75 प्रतिशत तक शेयर होते हैं. केवल इसी आंकड़े को देखकर आप कह सकते हैं कि शायद प्रोमोटरों को कंपनी पर भरोसा नहीं, मगर यही सीन तब बिलकुल उलट जाता है, जब हम कंपनी के शेयर खरीदकर बैठे बड़े संस्थागत निवेशकों का आंकड़ा देखते हैं. विदेशी संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने कंपनी के 21.22 प्रतिशत शेयर अपने झोलों में भरे हुए हैं. इसी तरह घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) के पास 12.85 प्रतिशत शेयर हैं. पब्लिक के पास केवल 11.82 प्रतिशत शेयर ही हैं.

From –  NEWS18 हिंदी

अविस्मरणीय हैं कालजयी गीत ज्योति कलश छलके के रचनाकार पं. नरेंद्र शर्मा*

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डॉ.मुकेश कबीर –

पंडित नरेन्द्र शर्मा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की नींव के उन पत्थरों में से एक हैं जिन पर आज तक यह इंडस्ट्री टिकी हुई है। अक्सर बुनियादें भुला दी जाती हैं और तोरण द्वार याद रहता है यही हाल हमारी फिल्म इंडस्ट्री का है लेकिन बॉलीवुड इतिहास जब जब लिखा जाएगा तब तब पंडित नरेन्द्र शर्मा को धन्यवाद जरूर दिया जाएगा।

पंडित जी का सबसे आसान परिचय तो यह है कि उन्होंने फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम के टाइटल सॉन्ग सत्यम शिवम की रचना की साथ ही इसका एक और अविस्मरणीय गीत यशोमती मैया भी लिखा लेकिन पंडित जी का यह परिचय सिर्फ मुखौटे जैसा है उनका पूरा व्यक्तित्व तो अपार है।

फिल्मों में आने से पहले वे एक क्रांतिकारी थे जो आजादी के लिए जेल भी गए और उन चुनिंदा कवियों में से एक थे जिनकी कलम की ताकत से अंग्रेज भी सहमते थे लेकिन पंडित जी ने इतनी चतुराई से अपने गीत लिखे कि चाहकर भी गोरी सरकार उनका बाल बांका नहीं कर पाई, फिल्म *हमारी बात* के गीत ऐसे ही थे। हमारी बात से पंडित जी की शुरुआत तो हो गई लेकिन उनको शोहरत मिली भाभी की चूड़ियां फिल्म के महान गीत *ज्योति कलश छलके* से। पिछले कुछ साल छोड़ दें तो यह गीत हर धार्मिक अवसर पर अनिवार्य रूप से बजाया जाता था,इसको शोभा यात्रा का नेशनल एंथम भी कहा जा सकता है खासकर सनातन संस्कृति के शुभायोजनो की पहचान यह गीत है और खास बात यह है कि इस गीत को लता जी ने भी अपना वन ऑफ दी बेस्ट माना था।

लता जी पंडित जी को अपना पिता मानती थीं और वैसा ही उनको सम्मान देती थीं और यदि म्यूजिकली देखा जाए तो पिता पुत्री की यह बॉन्डिंग उनके इस गीत के साथ हीऔर अन्य गीतों में भी महसूस की जा सकती है।
पंडित नरेन्द्र शर्मा जी ने फिल्मों के अलावा आकाशवाणी को स्थापित करने में भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनके द्वारा शुरू किए प्रोग्राम आज तक रेडियो पर प्रसारित होते हैं । आकाशवाणी का सबसे लोकप्रिय चैनल विविध भारती भी पंडित जी की ही देन है और इसका नामकरण भी उन्होंने ही किया है,आज भी विविध भारती सबसे ज्यादा सुना जाता है और इसका मूल स्वरूप भी अभी तक कायम है यह नरेंद्र शर्मा जी की दूरदर्शिता का ही परिणाम है।

नाम की यदि बात की जाए तो अपने जमाने के सुपर स्टार दिलीप कुमार का फिल्मी नामकरण संस्कार भी पंडित जी ने ही किया था, इसके पहले वो यूसुफ खान थे लेकिन देविका रानी के आग्रह पर पंडित जी ने नाम दिया दिलीप कुमार और आगे की कहानी हम सब जानते हैं कि यह नाम कितना चमका,यह बिल्कुल एक चिराग से दूसरे चिराग को रोशन करने जैसा है।

पंडित जी भले ही फिल्मों से जुड़े थे लेकिन उनका सम्मान साहित्यकारों जैसा ही था ।साहित्य में जितने सम्मान से पंत जी, निराला जी, बच्चन जी का नाम लिया जाता था उतने ही सम्मान से पंडित नरेंद्र शर्मा का नाम लिया जाता था यही कारण है कि भारत में जब पहली बार एशियाई खेलों का आयोजन हुआ तो सरकार ने स्वागत गीत लिखने की जिम्मेदारी पंडित जी को दी और इस तरह एशियाड का स्वागत गीत *स्वागतम सुस्वागतम* सारी दुनिया ने सुना। बी.आर चोपड़ा जब महाभारत बना रहे थे तब वो पंडित की शरण में ही गए और पंडित जी ने एक पिता और एक गुरु की तरह महाभारत में मार्गदर्शक की भूमिका निभाई और दुनिया का सबसे सफल टीवी सीरियल हमारे सामने आया। आमतौर पर फिल्मी गीतकारों का दायरा सीमित होता है यहां श्रृंगार रस की प्रधानता होती है लेकिन पंडित जी धर्म,राजनीति,समाज शास्त्र,मनोविज्ञान,दर्शन शास्त्र और ज्योतिष के ऐसे प्रकांड विद्वान थे कि सारी इंडस्ट्री उनके आगे  श्रृद्धा से झुकती थी,खासकर लता जी और राज कपूर जैसी हस्तियां उनको पिता तुल्य सम्मान देती थीं इससे बड़ा सम्मान बॉलीवुड में और क्या होगा ? वैसे पंडित जी थे भी इतने ही गरिमामय क्योंकि फिल्मी दुनिया में शुद्ध हिंदी गीत को लिखना और उनको स्थापित कराना आसान नहीं था।पर यह काम  किया पं. नरेंद्र  शर्मा ने और आज ऐसे ही विद्वानों की जरूरत है फिल्म इंडस्ट्री को जो इस कला माध्यम को अपराध की गर्त से निकालकर धर्म धरा पर प्रतिष्ठित कर सके इसलिए पंडित जी का स्मरण जरूरी है, तभी दुनिया में फिर से गूंजेगा *ज्योति कलश छलके* ।

विनायक फीचर्स (लेखक सुप्रसिद्ध गीतकार हैं)

 

पीएफसी ग्रुप ने 25% वृद्धि के साथ लाभ दर्ज किया

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मुंबई (अनिल बेदाग) : पीएफसी अब भारत में सबसे अधिक मुनाफा कमाने वाली एनबीएफसी है, जिसके स्टैंडअलोन कर पश्चात लाभ में 24% की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। FY’23 में 11,605 करोड़ रु. FY’24 में 14,367 करोड़।
तिमाही PAT में रु. से 18% की वृद्धि दर्ज की गई। Q4’23 में 3,492 करोड़ रु. Q4’24 में 4,135 करोड़।

रुपये का अंतिम लाभांश. बोर्ड द्वारा Q4’24 में 2.50 प्रति शेयर प्रस्तावित। इसके साथ ही पीएफसी ने कुल मिलाकर 10,000 करोड़ रुपये का लाभांश दिया है। वित्त वर्ष 24 के लिए 13.50 प्रति शेयर।
ऋण परिसंपत्ति बुक में 14% की दोहरे अंक की वृद्धि देखी गई- रुपये से। 31.03.2023 को 4,22,498 करोड़ रुपये से 31.03.2024 को 4,81,462 करोड़ रुपये।

समेकित सकल एनपीए लगभग 3% को छू गया है और वित्त वर्ष 24 में 3.02% बनाम वित्त वर्ष 23 में 3.66% है।
सक्रिय समाधान प्रयासों के कारण, समेकित शुद्ध एनपीए वित्त वर्ष 2023 में 1.03% से वित्त वर्ष 24 में अपने न्यूनतम स्तर 0.85% पर पहुंच गया है।