Home National जड़ी -बूटियों से ही होगा आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार

जड़ी -बूटियों से ही होगा आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार

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जिसने रामायण पढ़ी या सुनी होगी वो “संजीवनी बूटी”के बारे अवश्य जानता होगा कि कैसे लक्ष्मण मूर्छित हुए थे और हनुमान जी उनके लिए संजीवनी बूटी लेकर आये थे और उनके प्राणों की रक्षा की थी। हमारा भारत मे ऐसी कई तरह की संजीवनियो के लिए समृद्ध है। जड़ी-बूटी से रोगों का इलाज करना भारत की प्राचीन परम्परा हैl आयुर्वेद एक चिकित्सा पद्धति तो है ही, ये जीवन का विज्ञान भी हैI विशेष गुणों के कारण आयुर्वेदिक दवाईयों का दुष्प्रभाव नहीं होता हैI इसलिए आयुर्वेद से इलाज सरल व सुरक्षित हैI

चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद फिर से प्रचलित हो रही है। न सिर्फ देश में, बल्कि विदेश में भी इसकी मांग बढ़ रही है। वर्तमान केंद्र सरकार भी इसके प्रचार-प्रसार में सक्रियता दिखा रही है। राजधानी नई दिल्ली में आयुर्वेद चिकित्सा पर आधारित एम्स की स्थापना इस दिशा में एक बड़ा कदम है।विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ ) ने वैश्विक पारंपरिक औषधि केंद्र (India Traditional Medicine) की स्थापना के लिए भारत सरकार के साथ समझौता किया है। गुजरात के जामनगर में यह केंद्र स्थापित होने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर प्रसन्नता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि भारत की पारंपरिक औषधि और बेहतर स्वास्थ्य के तरीके दुनियाभर में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। उन्होंने कहा यह डब्लूएचओ सेंटर हमारे समाज में तंदुरुस्ती बढ़ाने में काफी मदद करेगा।

ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रैडिशनल मेडिसिन की स्थापना से संबंधित समझौते पर स्विट्जरलैंड के जिनेवा में भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन के बीच समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। प्रधानमंत्री की मौजूदगी में विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक ने ५ वें आयुर्वेद दिवस पर १३ नवंबर, २०२० को इसकी घोषणा की थी। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत में विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैश्विक पारंपरिक औषधि केंद्र की स्थापना को ९ मार्च को मंजूरी दे दी।विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया है कि पारंपरिक चिकित्सा के वैश्विक ज्ञान के इस केंद्र के लिए भारत सरकार ने २५० मिलियन डॉलर की सहायता की है। इसका उद्देश्य लोगों और पृथ्वी की सेहत में सुधार के लिए आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से दुनियाभर में पारंपरिक चिकित्सा की क्षमता का दोहन करना है।

आज के समय में दुनिया की करीब 80 प्रतिशत आबादी पारंपरिक चिकित्सा का उपयोग करती है।आज डब्लूएचओ के १९४ सदस्य देशों में से १७० ने पारंपरिक चिकित्सा के इस्तेमाल की सूचना दी है। इन देशों की सरकारों ने पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों और उत्पादों पर विश्वसनीय साक्ष्य और डेटा का एक निकाय बनाने की दिशा में विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोग करने के लिए कहा है। आयुर्वेद की बढ़ती मांग को देखते हुए कई बड़ी कंपनियां इस कारोबार में उतर आई है और बेहतर पैकेजिंग और मार्केटिंग के बूते अंग्रेजी दवा कंपनियों को मात देने लगी है। इसके बावजूद जंगलों से जड़ी-बूटी लाकर आयुर्वेद की दवा तैयार करनेवाले गांव के वैद्यों की बात ही कुछ और है। अपने पूर्वजों से चिकित्सा का ज्ञान लेकर ये वैद्य आज भी सामान्य से लेकर असाध्य रोगों तक के मरीजों की उम्मीद हैं।

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