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गौ पालन सरकार करेगी मदद ऐसे करें आवेदन

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Patna News: यदि आपके पास 15 से 30 डिसमिल भी जमीन है तो गो-पालन कर परंपरागत कृषि से ज्यादा कमाई कर सकते हैं। इसके लिए बेरोजगार युवक-युवतियों को सरकार 50 से 75 प्रतिशत तक अनुदान देगी। समग्र गव्य विकास योजना के तहत दो, चार, 15 और 20 उन्नत नस्ल के दुधारू मवेशी की डेयरी की स्थापना के लिए अनुदान ले सकते हैं।

इसके लिए वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए 4848.248 लाख रुपये की स्वीकृति दे दी गई है। योजना का लाभ लेने के लिए 15 अगस्त से आनलाइन आवेदन किया जा सकेगा। आवेदकों का चयन पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर किया जाएगा। इस योजना के तहत पूरे प्रदेश में 3583 इकाई लगायी जानी हैं। पिछले वित्तीय वर्ष में 3355 लोगों को इस योजना का लाभ दिया गया था।

कैसे करें आवेदन

योजना का लाभ लेने के लिए 15 अगस्त से गव्य विकास निदेशालय की वेबसाईट पर आनलाइन आवेदन कर सकेंगे। पिछले तीन वर्षों में आनलाइन प्रोप्त आवेदनों में से वैसे आवेदक जिन्हें योजना का लाभ प्राप्त नहीं हो सका, वैसे आवेदकों को प्राथमिकता के आधार पर वित्तीय वर्ष 2024-25 में योजाना का लाभ ले सकेंगे। इस योजना के लाभुकों की उम्र 55 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।

कितनी होनी चाहिए जमीन

योजना के तहत चार उन्नत नस्ल के दुधारू मवेशी की इकाई की स्थापना के लिए कम से कम 15 डिसमिल, 15 और 20 उन्नत नस्ल के दुधारू मवेशी, बाछी-हिफर की इकाई की स्थापना के लिए कम से कम 30 डिसमिल जमीन या लीज की जमीन होनी चाहिए ताकि वे हरा चारा का उत्पादन भी कर सके।

इकाई की लागत और अनुदान

दो दुधारू मवेशी की इकाई लागत 1,74,000 रुपये है। चार दुधारू मवेशी के लिए इकाई लागत 3,90,400 रुपये है। 15 दुधारू मवेशी की इकाई लागत 15,34,000 रुपये है। 20 दुधारू मवेशी की इकाई लागत 20,22,000 रुपये है।

सामान्य वर्ग को 50 प्रतिशत जबकि अत्यंत पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को कुल लागत का 75 प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा। इकाई लगाने के लिए सामान्य वर्ग को कुल लागत का 10 प्रतिशत राशि और अत्यंत पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को कुल लागत का पांच प्रतिशत राशि देना होगा।

प्रदेश में दुग्ध उत्पादन में वृद्धि करने के साथ-साथ स्वरोजगार के अतिरिक्त अवसर सृजित करने के लिए पशु पालन विभाग की ओर से समग्र गव्य विकास योजना का संचालन किया जा रहा है। इस योजना से प्रदेश में दुधारू पशुओं की संख्या में वृद्धि होगी। सिर्फ यही नहीं प्रदेश के सभी व्यक्तियों को दुग्ध के रूप में पौष्टिक आहार की उपलब्धता सुनिश्चित हो सकेगी। – संजय कुमार, निदेशक डेयरी

*स्वयंभू, सर्वोच्च एवं शाश्वत हैं भगवान शंकर*

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(सुनील कुमार महला-विनायक फीचर्स)

सावन या श्रावण के महीने को देवो के देव कहलाने वाले महादेव, भोलेशंकर या भगवान शिव(भोलेनाथ)का प्रिय मास माना जाता है। पूरे सावन के महीने में शिव की विशेष आराधना की जाती है। इस मास में कांवड़िए दूर दूर तक कांवड़ लेकर पैदल जाते हैं। हमारे शास्त्रों में कहा गया कि भोलेनाथ इतने भोले हैं कि यदि उनको भक्तिभाव से हम एक लोटा जल भी चढ़ा दें, तो वह अति प्रसन्न हो जाते हैं और बिना मांगे ही सब कुछ दे देते हैं। पाठक जानते हैं कि आषाढ़ पूर्णिमा के समापन के साथ ही श्रावण माह आरंभ हो जाता है।

इस बार यदि हम सावन की बात करें तो हिंदू पंचांग के अनुसार, श्रावण मास की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि 21 जुलाई को दोपहर 3 बजकर 47 मिनट से आरंभ हो जाएंगी, जो 22 जुलाई को दोपहर 1 बजकर 11 मिनट पर समाप्त होगी। ऐसे में 22 जुलाई से श्रावण मास आरंभ हो रहा है, जो 19 अगस्त को श्रावण पूर्णिमा के साथ समाप्त होगा। यह बहुत ही रूचिकर है कि इस साल श्रावण मास सावन सोमवार के साथ आरंभ हो रहा है और इसी दिन के साथ समाप्त हो रहा है। सोमवार भगवान भोलेनाथ का अति प्रिय दिन भी है और इस साल कुल 5 सावन सोमवार पड़ रहे है।

इसके साथ ही सावन माह के दौरान सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग, रवि योग बन रहा है। इसके साथ ही ग्रहों की स्थिति के कारण कुबेर योग, मंगल-गुरु युति, शुक्रादित्य योग, बुधादित्य, लक्ष्मी नारायण योग, गजकेसरी योग , शश राजयोगों जैसे योग बन रहे हैं।

सावन में भगवान शिव का रूद्राभिषेक किया जाता है।बिल्वपत्र, धतूरा, भस्म व फलादि अर्पित किए जाते हैं। भारत में  सावन बारिश का मौसम होता है और शिवजी को चढ़ने वाले फूल-पत्ते बारिश के मौसम में ही पल्लवित होते हैं इसलिए सावन में शिव पूजा की परंपरा बनी। सावन के महीने में पूर्णिमा तिथि पर श्रवण नक्षत्र होता है। इस नक्षत्र के कारण ही सावन महीने का ये नाम पड़ा बताते हैं। सावन के महीने में महादेव की पूजा, उनकी आराधना, भक्ति, आदि का विशेष महत्व माना जाता है।

 

यहां पाठकों को यह भी जानकारी देना चाहूंगा कि श्रावण मास के हर एक मंगलवार को मंगला गौरी व्रत रखा जाता है जिसमें मां पार्वती की पूजा करने का विधान है। श्रावण माह में भगवान शिव की पूजा करने से व्यक्ति को हर एक दुख-दर्द से छुटकारा मिल जाता है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।भगवान शि‍व को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धालु विशेषकर सावन के महीने में अपनी सामर्थ्य अनुसार व्रत, उपवास, पूजन, शिव का अभि‍षेक आदि करते हैं। मान्यता है कि सावन के आरंभ में भगवान विष्णु योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं और इस सारे संसार की सत्ता-संचालन का दायित्व प्रभु शिव के हाथों में होता है।

कहते हैं कि सावन माह में की गई उपासना का विशेष फल भक्तों को प्राप्त होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार विवरण मिलता है कि जब देवी सती(माता पार्वती )ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति द्वारा अपनी देह का त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को प्रत्येक जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था। अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने राजा हिमाचल और रानी मैना के घर में पार्वती के रूप में जन्म लिया था।

मां पार्वती ने सावन के महीने में अन्न-जल आदि त्याग कर, निराहार रह कर कठोर व्रत किया था। मां पार्वती के इस व्रत से प्रसन्न होकर ही भगवान शिव(भोलेनाथ)ने देवी पार्वती से विवाह किया और तभी से भगवान महादेव को सावन का महीना अतिप्रिय है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं।

त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं।सच तो यह है कि शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदि स्रोत हैं। वास्तव में, त्रिदेवों में भगवान शंकर को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। भगवान ब्रह्मा सृजनकर्ता, भगवान विष्णु संरक्षक और भगवान शिव विनाशक की भूमिका निभाते हैं।

वैसे तो भगवान शिव के अनेक नाम हैं लेकिन शिव के कुछ प्रचलित नामों में महाकाल, आदिदेव, किरात, शंकर, चन्द्रशेखर, जटाधारी, नागनाथ, मृत्युंजय (मृत्यु पर विजय पाने वाले), त्रयम्बक, महेश, विश्वेश, महारुद्र, विषधर, नीलकण्ठ, महाशिव, उमापति (माता पार्वती के पति), काल भैरव, भूतनाथ, त्रिलोचन (तीन नयन वाले), शशिभूषण, पशुपतिनाथ, अर्द्धनारीश्वर, लिंगम(संपूर्ण ब्रह्मांड के प्रतीक), नटराज (नृत्य के देव), भोलेनाथ (कोमल हृदय, दयालु व आसानी से माफ करने वालों में अग्रणी तथा बहुत जल्द प्रसन्न होने वाले) आदि को शामिल किया जाता है। यहां आदि का अर्थ है प्रारंभ। शिव को ‘आदिनाथ’ भी कहा जाता है और आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम आदिश भी है। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। भगवान शिव को रूद्र नाम से भी जाना जाता है। रुद्र का अर्थ है रुत् दूर करने वाला अर्थात दुखों को हरने वाला।

वास्तव में रूद्र से तात्पर्य है दुखों का निर्माण और नाश करना। ‘शिव’ शब्द का अर्थ ‘शुभ, स्वाभिमानिक, अनुग्रहशील, सौम्य, दयालु, उदार, मैत्रीपूर्ण’ होता है। लोक व्युत्पत्ति में ‘शिव’ की जड़ ‘शि’ है जिसका अर्थ है जिन में सभी चीजें व्यापक हैं। यहां ‘वा’ का अर्थ है ‘अनुग्रह के अवतार।’ ऋग्वेद में शिव शब्द एक विशेषण के रूप में प्रयोग किया जाता है। शिव शब्द ने “मुक्ति, अंतिम मुक्ति” और ‘शुभ व्यक्ति’ का भी अर्थ दिया है।  कैलाश सरोवर को शिव का निवास स्थान माना जाता है, जहां भगवान शिव साक्षात् विराजते हैं। शिव’ का शाब्दिक अर्थ है- ‘जो नहीं है’। शिव ‘शून्य’ हैं।  देखा जाए तो हमारी इस संपूर्ण सृष्टि में सब कुछ ‘शून्यता’ से ही तो आता है और वापस ‘शून्य’ में ही चला जाता है।  शिव ही वो गर्भ हैं जिसमें से सब कुछ जन्म लेता है, और वे ही वो गुमनामी हैं, जिनमें सब कुछ फिर से समा जाता है। सब कुछ शिव से आता है, और फिर से शिव में चला जाता है।

दूसरे शब्दों में यह बात कही जा सकती है कि  शिव वह चेतना है जहाँ से सब कुछ आरम्भ होता है, जहाँ सबका पोषण होता है और जिसमें सब कुछ विलीन हो जाता है| कोई भी कभी ‘शिव’ के बाहर नहीं हैं क्योंकि पूरी सृष्टि ही शिव में विद्यमान है। हमारा मन, शरीर सब कुछ केवल शिव तत्व  से ही बना हुआ है, इसीलिए शिव को ‘विश्वरूप’ कहते हैं जिसका अर्थ है कि सारी सृष्टि उन्हीं का रूप है।

शिव का कोई आदि और अंत नही है। भगवान शिव को स्वयंभू कहा जाता है जिसका अर्थ है कि वह अजन्मा हैं। वह ना आदि हैं और ना ही अंत। वास्तव में,भोलेनाथ को अजन्मा और अविनाशी कहा जाता है। सच तो यह है कि श्रद्धा का नाम माँ पार्वती और विश्वास का नाम शिव है।  ‘शिवतत्व” में शिवतत्व और शक्तितत्व दोनों का अंतर्भाव होता है। परमशिव प्रकाशविमर्शमय है। इसी प्रकाशरूप को शिवतत्व और विमर्शरूप को शक्तितत्व कहते हैं। यही विश्व की सृष्टि, स्थिति और संहार के रूप में प्रकट होती है। शिवलिंग अनंत शिव की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। शिव को सुंदरेश भी  कहते हैं वहीं उन्हें अघोर (भयंकर) भी कहते हैं।

शिव, चेतना की जागृत, निद्रा और स्वप्न अवस्था के परे हैं| शिव समाधि हैं – चेतना की चौथी अवस्था, जिसे केवल ध्यान में ही प्राप्त किया जा सकता है। इस संसार में बल्कि यूं कहें कि इस संपूर्ण ब्रह्मांड में ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ शिव न हों, यानी कि शिव सर्वत्र विराजमान हैं। जब हम शिव कहते हैं, तो हम एक विशेष योगी की बात कर रहे होते हैं। वे जो आदियोगी या पहले योगी हैं, और जो आदिगुरू, या पहले गुरु भी हैं। आज हम जिसे योगिक विज्ञान के रूप में जानते हैं, उसके जनक शिव ही हैं। अतः हम यह कह सकते हैं कि शिव शब्द के दो अर्थ हैं। एक योगी शिव और दूसरा शून्यता। ये दोनों ही देखा जाए तो एक तरह के पर्यायवाची हैं, पर फिर भी वे दो अलग-अलग पहलू हैं।

ॐ नमः शिवाय मन्त्र हमारे संपूर्ण सिस्टम को शुद्ध करता है और ध्यानमय बनाने में हमारी मदद करता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि भगवान शिव का स्वरूप कल्याणकारक है। समुद्र मंथन के समय महादेव को इस दुनिया को बचाने के लिए विष(जहर) का पान करना पड़ा था, और उस महाविनाशक विष को अपने कंठ में धारण करना पड़ा था। यही कारण है कि उन्हें नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है।मान्यता है कि सावन के महीने में भगवान शिव और माता पार्वती भू लोक पर साक्षात् निवास करते हैं और यदि विधि​-विधान से सच्चे मन, आत्मा, विश्वास और पूर्ण श्रद्धा भाव से उनका पूजन किया जाए तो सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम’ अर्थात इस संसार में जो भी सत्य है, वह शिव है और जो शिव है, वह स्वयं में सुंदर है।

वास्तव में, शिव चेतना के स्वामी हैं और शिव की अर्द्धागिंनी स्वयं मां शक्ति अर्थात पार्वती हैं। शिव के पुत्र  र्तिकेय,अय्यपा और गणेश हैं और अशोक सुंदरी, ज्योति और मनसा देवी इनकी पुत्रियां हैं।

शिव के मस्तक में ज्वाला है, जिसे शांत करने के लिए उनके मस्तक पर चन्द्रमा तथा जटाओं में पावन मां गंगा का वास है। शिव के गले में नागदेवता का वास है और इनके हाथों में डमरू और त्रिशूल हैं। शिव सौम्य भी हैं और रूद्र हैं। इसलिए शिव जी की पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है। अंत में, हम यह बात कह सकते हैं कि शिव स्वयंभू  हैं, शाश्वत हैं, सर्वोच्च हैं। शिव इस संपूर्ण ब्रह्माण्ड के अस्तित्व के आधार हैं।(विनायक फीचर्स)

गुरु पूर्णिमा – शिक्षक, आचार्य, गुरु एवं सद्गुरु* 

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 (ईश्वर शरण पाण्डेय- विनायक फीचर्स)
शिक्षक, आचार्य, गुरु एवं सद्गुरु समाज के दिव्य प्रकाश-स्त्रोत होते हैं। वे ज्ञान एवं चेतना की एक अवस्था विशेष, के दिव्य प्रतीक-प्रतिनिधि हैं। कला सिखाने वाला शिक्षक, जिंदगी सिखाने वाला आचार्य, चेतना के गहन मर्म से परिचित कराने वाला गुरु एवं शिष्य को अपने में मिला लेने वाला तत्व सद्गुरु कहलाता है। ये चारों तत्त्व आपस में घुले-मिले तो हैं, पर एक नहीं है। हर एक की अपनी सीमा एवं सामथ्र्य होती है, परंतु अनगढ़ व्यक्तित्व को सुधार-संभालकर भौतिक एवं आत्मिक रूप से परिपूर्ण करने में इनका अपना-अपना मौलिक योगदान रहता है।
शिक्षक ज्ञान की किसी कुशलता का विशेषज्ञ होता है। वह कुशलता के विशेष आयामों को खोलता एवं अनावृत्त करता है। उसको अपने विषय विशेष का विशेष एवं गंभीर ज्ञान  होता है। शिक्षक को अपने विषय का गहरा अनुभव होता है और वह इस अनुभव का स्पर्श विद्यार्थी को  भी करा देता है। शिक्षक में शिक्षार्थी के भीतर कुशलता को विकसित करने की अपार क्षमता होती है। उसमें शिक्षार्थी को अपने जैसा तथा अपने से भी बेहतर एवं निष्णात बना देने की कला होती है। साधारण से छात्र को अत्यंत प्रतिभावान शोधार्थी के रूप में गढ़ देने की विशेषता शिक्षक में होती है। शिक्षक ज्ञान का समुद्र होता है, जिसमें कला-कुशलताएं उद्दाम लहरों की भांति उफनती-उमड़ती रहती है। वह शिक्षार्थी के जीवन में इन कुशलताओं की बाढ़ ला देता है। वह उसे असाधारण प्रतिभा से निष्णात एवं पारंगत कर देता है। इस प्रकार शिक्षक ज्ञान का, कुशलता का बोध कराता है, परंतु जहां जिंदगी जीने की कला सिखाने की बारी आती है, शिक्षक असहाय और असमर्थ हो जाता है।
इस बिंदु पर उसकी सारी सीमाएं समाप्त हो जाती हैं, क्योंकि वह इस विषय से अनभिज्ञ एवं अपरिचित-सा होता है। सर्जन अपने ऑपरेशन थिएटर  में सर्जरी का ज्ञान देता है, परंतु जिंदगी की सर्जरी की कला नहीं बता पाता। यह थोड़ा कठिन है, क्योंकि जिंदगी जीकर ही सीखी जा सकती है। स्वयं के व्यक्तित्व को परिष्कृत, परिमार्जित करके ही दूसरों के व्यक्तित्व को  गढ़ा जा सकता है।
आज समाज, राष्ट्र और विश्व में प्रतिभाओं की कमी और अभाव नहीं है। मेडिकल, टेक्नीकल, प्रोफेशनल कॉलेजों से अव्वल दर्जे में निकलने वाले प्रतिभावान छात्रों की कमी नहीं है और न ही पब्लिक कॉर्पोरेट सेक्टर एवं प्रोफेशनल कॉलेजों में एक्जीक्यूटिव ऑफिसर एवं प्रोफेसरों का अभाव है। परंतु ये विशेषज्ञ शिक्षक एवं प्रतिभाशाली छात्र दोनों ही जिंदगी जीने के मामले में दुर्बल एवं कमजोर हैं। इनका आंतरिक व्यक्तित्व बिखरा, धुंधला एवं खोखला-सा दिखाई देता है। ये किसी गहरी प्यास से प्यासे लगते हैं। इनकी भावना भटकी हुई, अतृप्त एवं अनबुझी होती है। इन्हें बौद्धिकता तो मिली, परंतु अनुभव नहीं मिला, प्रवीण शिक्षक आचार्य नहीं होते। आचार्य शिक्षक का पर्याय भी नहीं है और हो भी नहीं सकता, परंतु आचार्य शिक्षक भी हो सकता है, क्योंकि वह व्यक्तित्व गढऩे के साथ-साथ कला-कुशलता भी सिखा सकता है। आचार्य को व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों की गहरी समझ एवं बोध होता है और इसी कारण वह व्यक्तित्व को संभाल-निखार सकता है।
आचार्य की वाणीभर नहीं बोलती, उसका आचरण उससे भी अधिक मुखर होकर बोलता है। वाणी की पहुंच कानों तक ही सीमित होती है, परंतु आचरण प्राणों तक अपनी पहुंच बनाता है। आचार्य विचारों का संप्रेषण भर नहीं करता, साथ ही अनुभव प्रदान कर उनमें प्राणों को घोलता है। आचार्य मात्र विचार ही नहीं, गहन अनुभव के निष्कर्ष से प्राप्त आचरण भी प्रदान करता है।
आचार्य को सहज अनुभव प्राप्त होता है कि विचार से व्यवहार तक की महायात्रा कितनी कठिन, कितनी दुष्कर और कितनी भीषण होती है। विचारों को व्यवहार और आचरण से उतारने का पुरुषार्थ कितना श्रमसाध्य, कष्टसाध्य और समयसाध्य है, आचार्य इससे भलीभांति परिचित होता है। आचार्य सद्विचार को सद्व्यवहार के रूप में परिवर्तित कर नई सृष्टि करता है, नूतन सृजन करता है।
आचार्य का  ज्ञान बड़ा ही पारदर्शी होता है। वह व्यक्तित्व निर्माण की समग्र प्रविधियों का कुशल विशेषज्ञ होता है। वह बखूबी जानता है कि कैसे संस्कारों, आदतों, वृत्तियों आदि की दुर्बलताओं को हटाया-मिटाया जाए तथा इनके स्थान पर सदाचार, सद्विचार तथा सद्प्रवृत्ति की स्थापना की जाए। आचार्य व्यक्तित्व निर्माण की सूक्ष्म सर्जरी का सर्जन  होता है। उसे इसके मर्म का गहरा बोध होता है। सैद्धांतिक के साथ-साथ उसे व्यावहारिक ज्ञान भी होता है।
चाणक्य  आचार्य थे, चंद्रगुप्त को उन्होंने उसके व्यक्तित्व का बोध करा दिया था, उसके अनगढ़-अपरिष्कृत व्यक्तितव को गढ़ दिया था। आचार्य चाणक्य राजनीति के शिक्षक थे और चंद्रगुप्त को राजनीति ज्ञान से सराबोर कर दिया था। आचार्य जीवन के मर्म को  जानता है। आई.सी.एस. की नौकरी को तिलांजलि देने वाले श्री अरविंद सही मायने में आचार्य थे, जो अपने विद्यार्थियों में प्राण भरते थे, उनके व्यक्तित्व को गढ़ते थे। आचार्य का प्रभावकारी पक्ष उसके आचरण का आकर्षण होता है।
 आचार्य चरित्र, चिंतन एवं व्यवहाररुपी व्यक्तित्व को तो गढ़ता है, परंतु आंतरिक चेतना के विभिन्न आयामों को अनावृत्त कर पाने में असमर्थ होता है। वह मानवीय चेतना के मर्म को समझ पाने में अक्षम होता है। परंतु यह कार्य गुरु के लिए सहज-सुलभ होता है। गुरु मानवीय चेतना का गहरा मर्मज्ञ होता है। वह चेतना के रहस्य को उजागर  उद्घाटित करता है।
चेतना का परिमार्जन, परिष्कार एवं विकास, व्यक्तित्व की ऊंचाई से ऊंचा होता है। मानवीय चेतना की शिखर यात्रा सामान्य घटना नहीं है। यह असामान्य और असाधारण बात है। पिंड में समायी ब्रह्मांडीय चेतना को अनुभव करने एवं कराने की क्षमता शिक्षक एवं आचार्यों के पास नहीं हो सकती। इस महाघटना को केवल गुरु ही संपादित एवं संचालित करता है। वह मानवीय चेतना की समग्रता को जानता एवं बताता है। वह न केवल अद्वितीय बातें बताता है, बल्कि उनका प्रतिपल-प्रतिक्षण अनुभव भी करा देता है। ऐसी बातें जो न भी कहीं गईं और न सुनी गईं, न जानी गईं और न समझी गईं, उनकी वह नए सिरे से व्याख्या-विवेचना करता है।
गुरु देहधारी ईश्वर होता है। गुरुरूप में भगवान मूर्त होते हैं। गुरु के पास बैठने से भगवद्चेतना का दिव्य स्पर्शबोध होता है। इसी कारण रामकृष्ण परमहंस ने गुरु के हृदय को ‘भगवान का डाक-बंगला’ कहकर उसकी गरिमा को महाभिव्यक्ति दी है और कबीरदास ने गुरुपद को भगवान से भी बड़ा एवं श्रेष्ठतम बताया है। गुरुपद स्वयं भगवान देते हैं। गुरुपद की प्राप्ति इस मरणशील संसार के लिए महाक्रांति है, उत्क्रांति है, क्योंकि गुरु शिष्य  को मदहोशी से जगा-उठाकर उसे उसके आत्मसाक्षात्कार रुपी महाधिकार से विभूषित करता है। गुरु शिष्य की चेतना को महाशिखर की ओर आरोहित करता है। इच्छाओं, कामनाओं एवं वासनाओं से विदग्ध इस संसार में गुरु का अवतरण सुखद, सजल एवं शीतल छांव के समान होता है, जिस छांव तले न जाने कितनों को बोध प्राप्त होता और इस दिव्य स्पर्श से न जाने कितने बुद्ध पैदा होते है। गुरु केवल और केवल अविराम व नि:स्वार्थ कृपा ही करता है, महाकृपा करता है।
गुरु शिष्य को बोध कराता है, उसे बोधिसत्व बना देता है, परंतु सद्गुरु शिष्य को अपने में समाहित कर लेता है, मिला  लेता है। शिष्य की चेतना में वास करने वाला तथा अपनी महाचेतना में शिष्य को डुबो देने वाला सद्गुरु होता है। अत: हर गुरु सद्गुरु नहीं होते। सद्गुरु के लिए बाहर की दौड़ आवश्यक नहीं है, वह तो अंदर में वास करता है। वह बाहर दृश्यमान नहीं, अंदर में झलकता है। सूफियों की नजीर में सद्गुरु की बड़ी ही भावप्रवण अभिव्यंजना मिलती है-‘जब जरा गर्दन झुकाई देख ली तस्वीरें यार।’
सद्गुरु स्वराट नहीं, विराट होते हैं। सद्गुरु ब्राह्मी चेतना से सर्वथा अभिन्न होने के कारण इस जगत के चरम-परम स्त्रोत होते हैं। यह जगत भी  उन्हीं का, विस्तार, विराट रूप है। वे एक साथ महाबीज भी है और महावट भी। ऊपरी और बाहरीतौर पर हर कहीं कितना भेद-विभेद और विभाजन क्यों न दिखाई दे, सद्गुरु की परम पावन चेतना सभी कुछ अभिन्न और अभेद है। वह कहीं बाहर नहीं, अंदर में ही विद्यमान है। वह देहातीत है। अत: सद्गुरु को पाने की ढूंढ-खोज अपने अंदर ही करनी चाहिए। सद्गुरु की महाचेतना शिष्यों के अंदर वास करती है। हम अपने अंदर झांंककर ही उसका दिव्य साक्षात्कार कर सकते हैं, अपनी ही चेतना की अंतर्यात्रा में हम सद्गुरु में तदाकार-एकाकार हो सकते हैं। इस प्रकार शिक्षक, आचार्य, गुरु एवं सद्गुरुरुपी कला, ज्ञान, चेतना और महाचेतना के मूर्तरूप का स्पर्श पाकर भौतिक एवं आत्मिक रूप से जीवन समृद्ध होता है। (विनायक फीचर्स)

भारतीय पशुपालन निगम भर्ती का नोटिफिकेशन जारी

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भारतीय पशुपालन निगम भर्ती का नोटिफिकेशन जारी

भारतीय पशुपालन निगम भर्ती का 10वीं पास के लिए 2250 पदों पर नोटिफिकेशन जारी कर दिया है इसके लिए आवेदन फॉर्म 5 अगस्त तक भरे जाएंगे।

भारतीय पशुपालन निगम लिमिटेड भर्ती का नोटिफिकेशन जारी कर दिया है इसके तहत गौ संवर्धन विस्तारक, गौ संवर्धन सहायक और गौ सेवक के पदों पर भर्ती की जाएगी इस भर्ती के लिए 10वीं और 12वीं पास अभ्यर्थी आवेदन कर सकते हैं यह भर्ती महिला और पुरुष दोनों के लिए आयोजित की जा रही है इस भर्ती के लिए अभ्यर्थियों से ऑनलाइन आवेदन आमंत्रित किए गए हैं।

भारतीय पशुपालन निगम लिमिटेड द्वारा 2250 पदों पर भर्ती का विज्ञापन जारी किया गया है इसमें गौ संवर्धन विस्तारक के लिए 225 पद, गौ संवर्धन सहायक के लिए 675 पद और गौ सेवक के लिए 1350 पद रखे गए हैं भारतीय पशुपालन निगम भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन शुरू हो गए हैं और आवेदन की अंतिम तिथि 5 अगस्त रखी गई है।

भारतीय पशुपालन निगम भर्ती आवेदन शुल्क

इस भर्ती में गौ संवर्धन विस्तारक पद के लिए आवेदन शुल्क 944 रुपए, गौ संवर्धन सहायक पद के लिए 826 रुपए और गौ सेवक पद के लिए आवेदन शुल्क 708 रुपए यह रखा गया है अभ्यर्थी आवेदन शुल्क का भुगतान ऑनलाइन माध्यम से कर सकते हैं।

भारतीय पशुपालन निगम भर्ती आयु सीमा

इस भर्ती में गौ संवर्धन विस्तारक पद के लिए आयु सीमा 25 से 45 वर्ष तक, गौ संवर्धन सहायक पद के लिए 21 से 40 वर्ष तक और गौ सेवक के लिए 18 से 40 वर्ष तक रखी गई है इसमें आयु की गणना आवेदन की अंतिम तिथि को आधार मानकर की जाएगी इसमें आरक्षित वर्गों को सरकार के नियम अनुसार अधिकतम आयु सीमा में छूट दी जाएगी।

भारतीय पशुपालन निगम भर्ती शैक्षणिक योग्यता

इस भर्ती में गौ सेवक पद के लिए अभ्यर्थी मान्यता प्राप्त बोर्ड से 10वीं कक्षा उत्तीर्ण होना चाहिए गौ संवर्धन सहायक पद के लिए आवेदक मान्यता प्राप्त बोर्ड से 12वीं कक्षा पास होना चाहिए जबकि गौ संवर्धन विस्तारक पद के लिए उम्मीदवार मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी से स्नातक होना चाहिए।

भारतीय पशुपालन निगम भर्ती चयन प्रक्रिया

आवेदन पत्र प्राप्त होने के बाद भरी गई जानकारी के आधार पर ऑनलाइन परीक्षा की सूचना आपकी रजिस्टर्ड ईमेल आईडी पर भेजी जाएगी ऑनलाइन परीक्षा की तिथि एवं समय विज्ञापन की अंतिम तिथि से एक माह के बाद आवेदक की रजिस्टर्ड ईमेल आईडी पर भेजी जाएगी।

अभ्यर्थियों को सभी सूचनाओं आवेदन फॉर्म में भरी गई ईमेल आईडी पर भेजी जाएगी इसलिए आवेदन करते समय अपनी ईमेल आईडी और फोन नंबर सही दर्ज करें इसके बाद साक्षात्कार और डॉक्युमेंट वेरीफिकेशन होगा आवेदक द्वारा लिखित परीक्षा एवं साक्षात्कार परीक्षा को उत्तीर्ण करने के लिए दोनों में अलग-अलग 50% अंक लाना अनिवार्य होगा।

भारतीय पशुपालन निगम भर्ती आवेदन प्रक्रिया

अभ्यर्थी इस ऑनलाइन परीक्षा को किसी भी कंप्यूटर सेंटर, साइबर कैफे, लैपटॉप, डेस्कटॉप एवं मोबाइल के माध्यम से किसी भी स्थान से दे सकता है ऑनलाइन परीक्षा के लिए आवेदकों को एक लिंक उनकी रजिस्टर्ड ईमेल पर भेजा जाएगा अभ्यर्थी मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए एवं चरित्र अच्छा होना चाहिए।

भारतीय पशुपालन निगम भर्ती के लिए अभ्यर्थियों को आधिकारिक वेबसाइट से ऑनलाइन आवेदन करना होगा जो अभ्यर्थी इन पदों के लिए आवेदन करना चाहते हैं उन्हें पहले आधिकारिक नोटिफिकेशन पूरा देख लेना है इसके बाद अप्लाई ऑनलाइन लिंक पर क्लिक करना है।

अभ्यर्थियों को आवेदन फॉर्म में पूछी गई सभी जानकारी सही-सही भरनी है इसके बाद जरूरी दस्तावेज पासपोर्ट साइज फोटो और सिग्नेचर अपलोड करने हैं इसके बाद अपनी कैटेगरी के अनुसार आवेदन शुल्क का भुगतान करना है सभी जानकारी भरने के बाद आवेदन फॉर्म फाइनल सबमिट कर देना है और इसका प्रिंटआउट निकाल कर भविष्य के लिए सुरक्षित रख लेना है।

फिल्म “400” का मुहूर्त मड आयलैंड मुंबई में सम्पन्न, पॉलिटिकल सस्पेंस थ्रिलर है यह फिल्म

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मुंबई। ब्रॉडकास्ट मीडिया एण्ड एंटरटेनमेंट के बैनर तले निर्माता विश्व भट्ट की पॉलिटिकल सस्पेंस थ्रिलर फिल्म “400” का मुहूर्त पिछले दिन मनीषा बंगला, मड आयलैंड, मलाड (पश्चिम), मुंबई में भव्यता से सम्पन्न हुआ जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में भावनगर (गुजरात) के पूर्व विधायक प्रवीण कुमार मारू उपस्थित रहे। उन्हें शॉल श्रीफल देकर सम्मानित किया गया।

फिल्म ”400” की कहानी का प्लेटफार्म राजनीतिक गलियारा है जिसमें हर तरह के मसाले उपलब्ध रहेंगे। इस फिल्म में गलत कानून व्यवस्था, गलत राजनीतिक निर्णयों को दर्शकों के समक्ष ला कर उसे नये सिरे से समझने की कोशिश की जायेगी। उनकी दृष्टि में ऐसी बातें दो चार सौ तक होंगी जिन पर ध्यान नहीं दिया जाता। नवोदित निर्माता विश्व भट्ट कहते हैं कि फिल्म “400” न तो किसी राजनीतिक नारे से प्रेरित है ना ही हॉलीवुड की फिल्म “300” से प्रभावित है।
ब्रॉडकास्ट मीडिया एण्ड एंटरटेनमेन्ट की इस प्रथम प्रस्तुति की सारी निर्माण प्रक्रियाएं प्रारम्भ हैं। बरसात पश्चात् “400” हैदराबाद के खूबसूरत लोकेशंस पर फिल्माई जायेगी। संभवत: दूसरा लोकेशन नवाबों का नगर लखनऊ हो सकता है। लेकिन इस फिल्म की शूटिंग का समापन तो बस मुंबई में ही होगा।

बधाई व शुभकामनाएं देने पहुंचे शुभेच्छुओं में कुछ प्रमुख नाम हैं – भरत गज्जर, कल्याणजी भाई जाधव, राजेश पाटिल, राजेश नानावटी, राजू भाई शाह, दीपक मित्तल और अजीत बोरा।

खूबसूरत अंबर बेदी को एक महत्वपूर्ण सकारात्मक भूमिका हेतु चयनित किया गया है। सिनेमाघरों में विश्व भट्ट की “400” अगले वर्ष अर्थात् सन् 2025 के पूर्वार्द्ध में पहुंचेगी।

उलझ ट्रेलर: जान्हवी कपूर, गुलशन देवैया और रोशन मैथ्यू का दिखेगा इस दिलचस्प और मनोरंजक थ्रिलर में दमदार अभिनय

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जंगली पिक्चर्स द्वारा “उलझ” का मनोरंजक ट्रेलर रिलीज़ किए जाने के साथ ही इंतज़ार खत्म हो गया है. फिल्म में, जान्हवी कपूर, गुलशन देवैया और रोशन मैथ्यू नज़र आएंगे. राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता सुधांशु सरिया द्वारा निर्देशित “उलझ” दर्शकों को अंतर्राष्ट्रीय डिप्लोमेसी वाली दुनिया में ले जाती है.

इस रोमांचक कहानी में, जान्हवी कपूर ने सुहाना का किरदार निभाया है. वह लंदन दूतावास में अपने महत्वपूर्ण कार्य के दौरान एक विश्वासघाती व्यक्तिगत साजिश में उलझी हुई एक युवा राजनयिक है. जैसे-जैसे वह अपने करियर की जटिलताओं से निपटती है, वह खुद को अपनी विरासत के बोझ और धोखे के जाल में उलझी हुई पाती है, जहाँ हर सहयोगी दुश्मन हो सकता है. जान्हवी कपूर का किरदार और उनके एक्शन दर्शकों के लिए रोमांच की एक अलग ही दुनिया ले कर आते हैं, जिससे यह फिल्म उनके फैन्स के लिए मस्ट वाच हो जाती है.
ट्रेलर में इंटेंसिटी है, जिसमें जान्हवी, गुलशन और रोशन के बेहतरीन अभिनय को दिखाया गया है. हर किरदार ग्रे शेड्स से भरा हुआ है, जो सस्पेंस और अप्रत्याशित ट्विस्ट की रोलरकोस्टर राइड का वादा करता है.
दर्शक दिल को थामने वाले पलों और सीट से चिपके रहने वाले ड्रामा की उम्मीद कर सकते हैं क्योंकि “उलझ” जाल, साजिशों और विश्वासघात की एक मनोरंजक कहानी को सामने लाती है. अपनी आकर्षक कहानी और शानदार अभिनय के साथ, यह फिल्म बिलकुल अलग तरह के सिनेमाई अनुभव प्रदान करेगी.
जान्हवी कपूर ने फिल्म में अपनी भूमिका के बारे में अपने विचार साझा करते हुए कहा, “यह फिल्म मेरे लिए विशेष रूप से खास है क्योंकि मैं पहली बार एक राजनयिक की बहुत ही चुनौतीपूर्ण भूमिका निभा रही हूँ. यह एक आकर्षक अनुभव रहा है. सुधांशु सरिया के साथ काम करना अविश्वसनीय रूप से समृद्ध करने वाला रहा है. उन्होंने मुझे अपनी सीमाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया. सुहाना का किरदार मजबूत और बहुआयामी है. मुझे किरदार के कुछ पहलुओं से व्यक्तिगत जुड़ाव महसूस हुआ जिसने मुझे एक प्रामाणिक परफोर्मेंस देने में सक्षम बनाया.”
निर्देशक सुधांशु सरिया कहते हैं, “उलझ आखिरकार विकल्पों की पहेली के बारे में है और इसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति वाली दुनिया में स्थापित करना इसे और अधिक रोमांचक बनाता है. जान्हवी, गुलशन और रोशन के नेतृत्व में इन शानदार कलाकारों का निर्देशन करना एक शानदार अनुभव रहा है.वे सभी अपने किरदारों में गहराई लेकर आए हैं और कहानी को ऊपर उठाया है. मैं जानता अहूँ कि दर्शक इस रोमांचक ट्विस्ट और टर्न से भरपूर फिल्म देखने के लिए इंतजार नहीं कर सकते.”
जंगली पिक्चर्स की सीईओ अमृता पांडे ने टिप्पणी की, “सुधांशु के निर्देशन में उलझ दर्शकों को सस्पेंस और ड्रामा का एक आकर्षक मिश्रण प्रदान करती है. हमारा मानना है कि जान्हवी ने अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय किया है. फिल्म की तकनीकी टीम ने फिल्म को नया और प्रामाणिक बनाने के लिए बहुत मेहनत की है. हम 2 अगस्त को इस आकर्षक कहानी को बड़े पर्दे पर लाने के लिए उत्सुक हैं.”
फिल्म में आदिल हुसैन, राजेश तैलंग, मेयांग चांग, राजेंद्र गुप्ता और जितेंद्र जोशी ने भी अभिनय किया है. परवेज शेख और सुधांशु सरिया द्वारा लिखित और अतिका चौहान के संवादों के साथ, “उलझ” 2 अगस्त, 2024 को रिलीज़ होने के लिए पूरी तरह तैयार है.

https://bit.ly/Ulajh-OfficialTrailer

जोधपुर में असुरक्षित हुई गौ माता

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भारत में गाय को माता का दर्जा दिया जाता है. लेकिन ऐसे कई लोग हैं जो इन बेजुबानों को तकलीफ देने से नहीं हिचकते. इन बेजुबानों को दर्द देने के बाद इन्हें ख़ुशी मिलती है. इसका एक उदाहरण जोधपुर की सड़कों पर देखने को मिल रहा है. सोशल मीडिया पर इससे जुड़ा एक वीडियो शेयर किया गया. इसे देखने के बाद आपका कलेजा भी कांप जाएगा.

वायरल हो रहे वीडियो को जोधपुर का बताया जा रहा है. सड़कों पर घूमने वाली गौ माता पर किस तरह से कुछ लोग एसिड से अटैक कर रहे हैं, ये देखकर सबकी रुह कांप गई. सड़क पर घूम रह एक बैल की पूरी चमड़ी जली हुई नजर आई. वो दर्द से कराह रहा था. उससे चला नहीं जा रहा था. जब नजदीक से देखा तो पता चला कि किसी ने उसपर एसिड फेंक दिया था. इससे उसकी बॉडी जल गई थी.

सामने आए कई मामले
सोशल मीडिया पर इस घटना का एक वीडियो शेयर किया गया. इसमें एक बैल को सड़क पर लंगड़ाते हुए जाते देखा गया. जब कुछ लोग बैल के नजदीक गए तो उनके होश ही उड़ गए. किसी ने उसके ऊपर तेज़ाब फेंक दिया था. इससे बैल के पीठ के ऊपर की स्किन उतर गई थी. दर्द की वजह से उससे चला नहीं जा रहा था. इसके बाद कुछ लोग उसे इलाज के लिए पास के वेट अस्पताल ले गए, जहां दवा देने के बाद उसका दर्द कम हुआ.

आखिर क्यों मनाएं “संविधान हत्या दिवस”

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(डॉ. राघवेंद्र शर्मा -विभूति फीचर्स)

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी  लोकसभा चुनाव के दौरान बार-बार कहते रहे हैं कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर इस देश को ऐसा संविधान सौंप कर गए हैं जिसे कोई माई का लाल छेड़  तक नहीं सकता। संभवतः कहने का मतलब यह है कि जिस संविधान को छेड़ा तक नहीं जा सकता तो फिर उसकी हत्या कैसे की जा सकती है? यदि सरसरी तौर पर देखा जाए तो  यह तर्क पूरी तरह गलत भी नहीं है। लेकिन जैसी मान्यताएं हैं कि अनेक बार पूर्ण सत्य वह नहीं होता जो हमें दिखाई अथवा सुनाई दे रहा होता है। उसे समझने के लिए कई बार तात्कालिक एवं पुरातन परिस्थितियों का अध्ययन करने की बाध्यता उत्पन्न हो जाती है। तब कहीं जाकर निर्णायक रूप से वास्तविकता का पता लग पाता है। इस मामले में भी यदि हम तार्किक दृष्टि से देखें तो  25 जून को संविधान हत्या दिवस कहना कोई गलती नहीं  है। लेकिन इस पूरे सत्य को समझने के लिए हमें थोड़ा पुरातन काल की ओर लौटना होगा और अपनी संस्कृति का अध्ययन करना पड़ेगा।

द्वापर युग में जब महाभारत का युद्ध समापन की ओर था और अश्वत्थामा स्वयं को श्रेष्ठ धनुर्धर साबित नहीं कर पा रहा था। उसकी वीरता और अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लग चुका था। जिसे वह अपना परम मित्र कहता था वह दुर्योधन अपना स्वार्थ सिद्ध न होने पर निरंतर उसे धिक्कार रहा था। तब अश्वत्थामा ने सारी लोक लाज त्याग कर द्रोपदी के निद्रामग्न पांच पुत्रों की वीभत्स हत्या कर दी। इससे भी मन नहीं भरा तो अश्वत्थामा ने सुभद्रा के गर्भ में पल रहे शिशु पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया। चूंकि ब्रह्मास्त्र को बेहद विध्वंसक और निर्णायक अस्त्र माना गया है सो उसने सुभद्रा के गर्भस्थ शिशु को मृतप्राय: कर ही दिया था। किंतु तभी भगवान कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र को उस शिशु की सुरक्षा हेतु सुभद्रा के गर्भ में स्थापित कर दिया। इससे वह जीव पुनर्जागृत हो चुका और उसने परीक्षित के रूप में जन्म लेकर धर्म राज्य की पुनर्स्थापना की। वर्ष 1975 में ऐसा ही कुछ घटित हुआ था। जब श्रीमती इंदिरा गांधी के ही घोर समर्थक और शिष्य कहे जाने वाले राजनारायण ने उनके निर्वाचन के खिलाफ अदालत में याचिका लगा दी थी। समस्त साक्ष्यों और परिस्थितियों का अध्ययन करने के बाद अदालत ने फैसला श्रीमती इंदिरा गांधी के विरुद्ध सुनाया। इससे उनके सांसद बने रहने में बाधा उत्पन्न हो गई तथा प्रधानमंत्री का पद उन्हें अपने हाथ से जाता लगा।
फलस्वरुप उन्होंने संविधान ही नहीं बल्कि लोकतंत्र की भी हत्या करने की ठान ली और सभी लोक मर्यादाओं को ताक पर रखते हुए पूरे देश को आपातकाल की भट्टी में झोंक दिया। संविधान में प्राप्त आम नागरिकों के अधिकारों की एक प्रकार से हत्या ही कर दी गई। मीडिया ने अधिकारों की बात की तो उस पर भी अघोषित सेंसरशिप लागू कर दी गई। राजनीतिक स्तर पर संविधान की उपरोक्त हत्या का विरोध हुआ तो तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा सभी नेताओं को जेल में ठूंस दिया गया। जिस प्रकार दुरात्मा कंस, रावण, हिरण्यकश्यप आदि राक्षसों ने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया था और आसुरी शक्तियों ने तीनों लोकों पर बलात् सत्ता स्थापित कर ली थी। उसी प्रकार आपातकाल के दौरान इंदिरा इज द इंडिया और इंडिया इज द इंदिरा के नारे जमीन आसमान को कंपित करने लगे थे। यह तो भला हो जनता जनार्दन का कि उसने लगभग मृतप्राय हो चुके संविधान में जन आंदोलन के माध्यम से पुनः प्राण फूंके और लगभग दो सालों के संघर्ष के बाद संविधान को जिंदा करके ही माने।परिणामस्वरुप इस देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार जनता शासन का प्रादुर्भाव हुआ। पूरे देश में कांग्रेस का एक प्रकार से सूपड़ा साफ ही हो गया था। निसंदेह उक्त उपलब्धि का श्रेय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत विभिन्न संगठनों को जाता है।
लिखने का आशय यह कि लॉर्ड मैकाले के स्वयंभू शिष्य वह अर्धसत्य कह रहे हैं जो सुनने में भले ही सच लगता हो किंतु वह पूरा सत्य नहीं है। जैसे बीते लोकसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी और कांग्रेस के अनेक नेता तथा उनके गठबंधन में शामिल राजनीतिक दलों के नेतागण यह प्रपंच फैला रहे थे कि भाजपा अर्थात एनडीए सरकार केंद्र में स्थापित हुई तो वह संविधान को बदल देगी, संविधान की हत्या कर देगी, संविधान का नाश हो जाएगा। इस बात की तारीफ करनी होगी कि वह झूठ कांग्रेस ने पूरी कुशलता के साथ स्थापित भी कर दिखाया। कांग्रेस सहित विरोधी दलों को यह सफलता भी शायद इसीलिए मिली, क्योंकि संविधान को कैसे बदला जाता है, उसकी हत्या कैसे की जाती है, इस बात का उन्हें भली भांति अनुभव है।  25 जनवरी 1975 को यह लोग उक्त जघन्य अपराध कर चुके हैं।
मुझे लगता है प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने प्रत्येक 25 जून को संविधान हत्या दिवस मनाने की जो अधिसूचना जारी की है, वह उक्त करतूत को उजागर करने का एक बेहतर माध्यम साबित होने वाली है, जो कांग्रेस और उसके सहयोगियों द्वारा 25 जून 1975 को रची गई थी। जब जब संविधान हत्या दिवस की बरसी मनाई जाएगी तब तक देश की जनता कांग्रेस और उसके नेताओं को पूरे आत्मविश्वास के साथ आईना दिखाने का काम करेगी।
धर्म संकट यह है कि कांग्रेस हो या फिर विपक्षी गठबंधन, यह लोग खुलकर आपातकाल की हिमायत नहीं कर सकते। लेकिन यह लोग अपने पापों पर पर्दा डालना भी चाहते हैं। क्योंकि यदि संविधान हत्या दिवस के माध्यम से सच्चाई बार-बार सामने आती रही तो इनके चेहरे पर पड़ा लोकतांत्रिक दल का नकाब तार तार हो जाएगा। नतीजा यह है कि यह लोग चाह कर भी इस अधिसूचना का खुलकर विरोध नहीं कर पा रहे। यही वजह है कि इन लोगों ने यह काम लार्ड मैकाले के पिछलग्गू वामपंथी विद्वानों को सौंप दिया है।
यही कारण है कि बात कांग्रेस की हो या फिर उसके साथी राजनीतिक दलों की, यह सब बगले झांकते दिखाई दे रहे हैं। इंदिरा गांधी द्वारा लगाई जाने वाली इमरजेंसी की कांग्रेस जन निंदा कर पाएं ऐसा साहस किसी भी कांग्रेसी नेता में शेष नहीं है। जब तक कांग्रेसी अधिपत्य के सूत्र परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से गांधी परिवार के किसी भी सदस्य के हाथ में बने हुए हैं, कम से कम तब तक तो ऐसा किया जाना किसी भी कांग्रेसी के लिए संभव ही नहीं है। संविधान हत्या दिवस मनाए जाने के खिलाफ जाते हुए यह इमरजेंसी को सही साबित कर पाएं यह भी संभव नहीं है। तब उनके पास केवल एक ही रास्ता बचा रह जाता है। वह यह कि बौद्धिक स्तर पर लोकतांत्रिक वातावरण में भ्रम का वातावरण स्थापित किया जाए। अतः यह काम प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक शुरू हो गया है। कांग्रेस एवं विपक्षी गठबंधन में शामिल राजनीतिक दलों के नेता संविधान हत्या दिवस की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह खड़े कर रहे हैं। लेकिन इनमें से कोई भी ना तो यह दावा कर रहा है कि आपातकाल सही था और ना ही यह कहने की हिम्मत जुटा पा रहा है कि आपातकाल गलत था। कुल मिलाकर यदि आपातकाल की स्मृति मरा हुआ सांप है तो कांग्रेस की स्थिति छछूंदर जैसी हो गई है। अब वह वास्तविकता को ना तो आत्मसात करने की स्थिति में है और ना ही उसे उगल पा रही है। शायद गोस्वामी तुलसीदास जी ने ऐसी ही परिस्थितियों को ध्यान में रखकर “भई गति सांप छछूंदर केरी” लिखा है।
(विभूति फीचर्स)

 

डॉ. राघवेंद्र शर्मा –

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज के हाथों डॉ रामकुमार पाल को मिला गऊ भारत भारती सर्वोत्तम सम्मान

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मुंबई: गाय की महिमा और संरक्षण पर आधारित “गऊ भारत भारती सर्वोत्तम सम्मान 2024” पुरस्कार समारोह का आयोजन 14 जुलाई 2024 को मुक्ति कल्चरल हब, अंधेरी पश्चिम, मुंबई में संपन्न हुआ।

इस समारोह में श्री शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज ने बीजेपी नेता, समाजसेवक एवं बिजनेसमैन डॉ रामकुमार पाल को आशीर्वाद देते हुए सम्मानित किया।
डॉ रामकुमार पाल मंच पर महाराज के हाथों सम्मानित होकर और उनका आशीर्वचन सुनकर अभिभूत हो गए।
इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में हैदराबाद की भाजपा नेता माधवी लता, मुक्ति हॉल की संस्थापक तथा फिल्म निर्मात्री स्मिता ठाकरे, बिजनेस मैन डॉ निकेश ताराचंद जैन माधानी, निर्माता प्रेम सागर, शेखर मुंदड़ा, प्रिंसिपल अजय कौल, प्रशांत काशिद, महेंद्र संगोई, गिरीश जयंतीलाल शाह, बिमल भूटा, सुनील सेठी, चिराग गुप्ता, आरटीआई एक्टिविस्ट अनिल गलगली, कवि वागीश सारस्वत, मॉडल एक्ट्रेस सीमा मीना सहित कई गौ सेवक और गौ संरक्षक की विशेष उपस्थिति रही।
आपको बता दें कि भाजपा नेता होने के अलावा, डॉ रामकुमार पाल एक सफल व्यवसायी हैं और वे गरीबों के हितार्थ समर्पित भाव से कार्य करते हैं। वर्तमान में, वे मुंबई के उत्तर/पश्चिम निर्वाचन क्षेत्र के लिए भाजपा के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं। इससे पहले, वे महाराष्ट्र सरकार द्वारा नियुक्त विशेष कार्यकारी अधिकारी (एसईओ) (2005-2010) के पद पर रह चुके हैं। भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य और दमन-दीव और दादरा नगर हवेली के प्रभारी के रूप में, श्री पाल ने किसानों की विभिन्न समस्याओं की ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान आकर्षित किया।
डॉ पाल प्रधानमंत्री आत्मनिर्भर भारत अभियान संगठन के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हैं। वह भाजपा किसान मोर्चा राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी हैं। यह समूह भारतीय किसानों के जीवन में सुधार लाना चाहता है।
डॉ रामकुमार पाल के उल्लेखनीय योगदान और एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में मानवता के प्रति उनकी निस्वार्थ सेवा के लिए प्रमुख मीडिया हाउस, मिड-डे ने सक्सेस स्टोरी कॉलम में उन्हें स्थान दिया और मैगजीन इंडिया टुडे की 45 वीं वर्षगांठ के दौरान भी उन्हें उचित स्थान पर प्रकाशित किया।
श्री पाल को सामाजिक कार्य के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान, उनकी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और हिंदी भाषा और सारस्वत साधना को लोकप्रिय बनाने के लिए वर्षों की सेवा के लिए वीर भारतीय हिंदी साहित्यपीठ, लखनऊ द्वारा समाज सेवा रत्न से सम्मानित किया गया। जनसंख्या समाधान फाउंडेशन महाराष्ट्र अध्यक्ष पद पर रामकुमार पाल अपनी तमाम उपलब्धियों के बावजूद एक विनम्र और समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता बने हुए हैं।