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कृषि और सुरक्षा के सजग पहरेदार लाल बहादुर शास्त्री* 

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(विवेक रंजन श्रीवास्तव-विनायक फीचर्स)
2 अक्टूबर को महात्मा गांधी के जन्मदिन के साथ-साथ स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन है । जब दूसरे भारत पाकिस्तान युद्ध के समय हमें अपनी खाद्य जरूरतों के लिए अमेरिका का मुंह देखना पड़ा तो स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का महत्वपूर्ण नारा दिया था । उन्होंने देश व्यापी उपवास को अपना अस्त्र बनाया । जनता में देश के लिए उत्सर्ग का आचरण प्रदर्शित किया। आम लोगों ने उनके आव्हान पर आगे बढ़कर प्रधानमंत्री सहायता कोष में अपने गहने दान किए । सदैव अपने परिश्रम, कर्तव्य और आचरण से ईमानदारी और सादगी की एक अनुकरणीय मिसाल उन्होंने बनाई । छोटी उम्र में ही उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लिया था , और कई लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बने। 
 लाल बहादुर शास्त्री  का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी से सात मील दूर एक छोटे से रेलवे टाउन, मुगलसराय में हुआ था। उनके पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव एक स्कूल शिक्षक थे। जब लाल बहादुर शास्त्री केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। तब उनकी माँ रामदुलारी देवी अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पिता के घर मिर्जापुर जाकर बस गईं। यहीं पर शास्त्री जी का पालन पोषण हुआ और उनकी प्राथमिक शिक्षा शुरू हुई। कहा जाता है कि उस छोटे-से शहर में शास्त्री जी की स्कूली शिक्षा कुछ खास नहीं रही उन्होंने वहाँ काफी विषम परिस्थितियों में शिक्षा हासिल की। वहां उन्हें स्कूल जाने के लिए रोजाना मीलों पैदल चलना और नदी पार करनी पड़ती थी।  बड़े होने के साथ ही शास्त्री जी ब्रिटिश हुकूमत से आजादी के लिए देश के संघर्ष में  रुचि रखने लगे। वे भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन कर रहे भारतीय राजाओं की महात्मा गांधी द्वारा की गई निंदा से अत्यंत प्रभावित हुए थे। शास्त्री जी जब केवल ग्यारह वर्ष के थे तब से ही उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कुछ करने का मन बना लिया था। शास्त्री जी स्वतंत्रता के पहले आजादी की लड़ाई के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता थे।
वे स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लेते थे। आंदोलन के लिए उन्होंने अपनी पढ़ाई से भी समझौता किया। वर्ष 1930 में शास्त्री जी को कांग्रेस कमेटी की स्थानीय इकाई का सचिव बनाया गया था। शास्त्री जी स्वतंत्रता आंदोलन के उन क्रांतिकारी नेताओं में शामिल हैं जिन्हें 1942 में ब्रिटिश गर्वमेंट द्वारा जेल में बंद किया गया था।  देश के आजाद होने के बाद उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वे आजादी के बाद उत्तर प्रदेश में पुलिस मंत्री भी रहे थे। इसके बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें केंद्र में रेल मंत्री का पद दिया। पर शास्त्री जी के लिए नैतिकता सबसे ऊपर थी , 1956 में हुई एक रेल दुर्घटना के कारण उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद वे एक बार फिर 1957 में परिवहन और संचार मंत्री बने। इसके बाद 1961 में वे गृह मंत्री बनाए गए ।
वर्ष 1925 में काशी विद्यापीठ से ग्रेजुएट होने के बाद उन्हें “शास्त्री” की उपाधि दी गई थी। ‘शास्त्री’ शब्द एक ‘विद्वान’ या एक ऐसे व्यक्ति को इंगित करता है। जिसे शास्त्रों का अच्छा ज्ञान हो। काशी विद्यापीठ से ‘शास्त्री’ की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने जन्म से चला आ रहा सरनेम ‘श्रीवास्तव’ हमेशा हमेशा के लिये हटा दिया और अपने नाम के आगे ‘शास्त्री’ लगा लिया। इसके पश्चात् शास्त्री शब्द लालबहादुर के नाम का पर्याय ही बन गया। 16 मई 1928 में शास्त्री जी का विवाह मिर्जापुर निवासी गणेशप्रसाद की पुत्री ललिता जी से हुआ। उनके क्रान्तिकारी सामाजिक विचार इसी से समझे जा सकते हैं कि उन्होंने अपनी शादी में दहेज लेने से इनकार कर दिया था।
लेकिन अपने ससुर के बहुत जोर देने पर उन्होंने कुछ मीटर खादी का दहेज लिया था। गांधी जी ने असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए देशवासियों से एकजुट होने का आह्वान किया था, उस समय शास्त्री जी केवल सोलह वर्ष के थे। उन्होंने महात्मा गांधी के इस आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय कर लिया था।
वर्ष 1930 में महात्मा गांधी ने नमक कानून को तोड़ते हुए दांडी यात्रा शुरू की। इस प्रतीकात्मक सन्देश ने पूरे देश में एक तरह की क्रांति ला दी। शास्त्री जी विह्वल ऊर्जा के साथ स्वतंत्रता के इस संघर्ष में शामिल हो गए। उन्होंने कई विद्रोही अभियानों का नेतृत्व किया एवं कुल सात वर्षों तक ब्रिटिश जेलों में रहे। आजादी के इस संघर्ष ने उन्हें पूर्णतः परिपक्व बना दिया। स्वतंत्रता संग्राम के जिन जन आन्दोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही उनमें वर्ष 1921 का ‘असहयोग आंदोलन’, वर्ष 1930 का ‘दांडी मार्च’ तथा वर्ष 1942 का ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ महत्वपूर्ण है । लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे उससे पहले जब नेहरू जी बीमार थे वे बिना विभाग के मंत्री के रूप में सारा काम देख ही रहे थे । नेहरू जी मृत्यु के 13 दिनों बाद उन्होंने प्रधानमंत्री का पद संभाला।  अन्न संकट के कारण तब देश भुखमरी की स्थिति से गुजर रहा था।
वहीं 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था। उसी दौरान अमरीकी राष्ट्रपति  ने शास्त्री जी पर दबाव बनाया कि अगर पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई बंद नहीं की गई तो हम गेहूँ के आयात पर प्रतिबंध लगा देंगे। यह वो समय था जब भारत गेहूँ के उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं था इसलिए शास्त्री जी ने देशवासियों को सेना और जवानों का महत्व बताने के लिए ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया था। इस संकट के काल में शास्त्री जी ने अपनी तनख्वाह लेना भी बंद कर दिया था और देशवासियों से कहा कि हम हफ़्ते में एक दिन का उपवास करेंगे।
पाकिस्तान के साथ वर्ष 1965 का युद्ध खत्म करने के लिए वह समझौता पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए ताशकंद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान से मिलने गए थे लेकिन इसके ठीक एक दिन बाद 11 जनवरी 1966 को अचानक खबर आई कि हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हो गई है। हालांकि उनकी मृत्यु पर वर्तमान समय में भी संदेह है। भारत सरकार ने वर्ष 1966 में लाल बहादुर शास्त्री को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’  से सम्मानित कर उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन किया था। उनके सिद्धांत आज भी प्रेरक और प्रासंगिक हैं।(विनायक फीचर्स)

पूरे देश में गौ माता को मिले वही सम्‍मान जो महाराष्‍ट्र सरकार ने दिया- बोले प्रयागराज के संत

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प्रयागराज: महाराष्‍ट्र सरकार ने गाय को अपने प्रदेश में राज्‍य माता का दर्जा दिया है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रयागराज के योगाचार्य अयोध्‍या प्रसाद शास्‍त्री ने कहा, यह प्रसन्‍नता की बात है कि महाराष्‍ट्र सरकार ने गाय को राज्‍य माता का दर्जा दिया है। बाकी प्रदेशों में और पूरे राष्‍ट्र में इसका प्रसार और प्रचार होना चाहिए। गऊ माता के पंचगव्‍य के कारण पत्‍थर में रहने वाले देवता बदल जाता है .

गौ माता को राष्ट्रीय गौमाता घोषित करो अभियान जोर-शोर से चला रखा है

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राजस्थान: सर्व समाज जागृति संघ (रजि) के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुरेश चंद शर्मा द्वारा पूज्य गौ माता को राष्ट्रीय गौमाता घोषित करो की मांग माननीय प्रधानमंत्री भारत सरकार से की है जिसके अंतर्गत जयपुर जिला के आस-पास के गांवों में निशुल्क सहमति पत्र अभियान जोर-शोर से चला रखा है।सर्व समाज अध्यक्ष सुरेश चंद शर्मा ने बताया कि जो भी गौ प्रेमी गौमाता को राष्ट्रीय गौमाता घोषित कराना चाहता है, वह अपना नाम पता हस्ताक्षर युक्त करके कार्यालय में जमा कर दे।

आज दिनांक 30 अक्टूबर 2024 को श्री श्री 108 श्री बाबा लाल मणि त्यागी,मां भगवती आश्रम एवं गौ संवर्धन केंद्र गोविंदगढ़ जिला जयपुर को सम्मानित करते हुए उनका आशीर्वाद लिया। महाराज ने अपने विचार प्रकट किये कि आप बहुत अच्छा कार्य कर रहे हो, इस अवसर पर ब्राह्मण समाज के जिला अध्यक्ष भुवनेश तिवाड़ी,बनवारी लाल शर्मा,  सत्य प्रकाश पारीक रमेश चंद्र गोयंका मौजूद रहे।

गरबा पंडाल में आने वाले हर व्यक्ति को गौमूत्र पिलाया जाए.

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नवरात्र आने वाला है, देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे धूम-धाम से मनाने की तैयारी चल रही है. इसी तैयारियों के बीच मध्यप्रदेश के इंदौर में इस नवरात्रि गरबा उत्सव में इंदौर के बीजेपी जिला अध्यक्ष चिंटू वर्मा ने एक अनूठा आइडिया दिया है. उन्होंने कहा कि गरबा पंडाल में आने वाले हर व्यक्ति को गौमूत्र पिलाया जाए.उनका तर्क है कि हिंदुओं को गौमूत्र पीने में कोई आपत्ति नहीं होगी

उन्होंने कहा कि पंडाल में कई तरह के लोग आते हैं, हम उनकी पहचान नहीं कर पाते, ऐसे में अगर पंडाल में जो भी लोग आएंगे, उन्हें हम गौमूत्र पिलाकर पंडाल में प्रवेश करने देंगे.

गैर-हिंदू एंट्री न करें

बीजेपी नेता चिंटू का कहना है कि आधार कार्ड को एडिट किया जाता है, कुछ गैर-हिंदू गरबा में आकर तिलक भी लगवा लेते हैं. उन्होंने कहा कि इस वजह से हर साल कई तरह की समस्याएँ सामने आने लगती हैं. इसके लिए गौमूत्र पिलाना उनका अनूठा आइडिया है. उन्होंने कहा कि गरबा माता की आराधना हमारी बहन-बेटियाँ करती हैं. इससे पहले भी मध्यप्रदेश में नवरात्र गरबा त्योहार को लेकर कई तरह की बातें सुनने को मिलीं. कुछ जगहों पर पंडालों में बाहर बोर्ड लगाकर लिखा गया था कि “गैर-हिंदू एंट्री न करें”, वहीं कहीं-कहीं तो यह भी सुनने को मिल रहा था कि उत्सवों में शामिल होने के लिए पहचान पत्र दिलाना होगा.

बता दें कि इंदौर से खबरें आई थीं कि दो दिनों में चोरी-छिपे गरबा पंडालों में आठ मुस्लिम घुस गए थे, जो पकड़े गए. वहीं पुलिस ने इनपर एक्शन भी लिया था. इन युवकों पर आरोप है कि इन्होंने अपनी पहचान छिपाकर एंट्री ली और लड़कियों पर अश्लील टिप्पणियाँ कीं. इस घटना के बाद उज्जैन में गरबे में आ रहे पार्टिसिपेंट्स के आईडी कार्ड चेक करने के अलावा उन्हें तिलक भी लगाया जा रहा था. वहीं, बीजेपी नेता के इस बयान के बाद अब गरबा में शामिल होने के लिए गौमूत्र पीने की व्यवस्था की जाएगी.

*गांधी जी और उनकी लोकसेवी पत्रकारिता*

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प्रसून लतांत –
पत्रकारिता पहले मूलतः कोई स्वतंत्र व्यवस्था नहीं थी, जैसी वह आज है। 17वीं और 18वीं शताब्दी की पत्रकारिता (जो खास तौर से यूरोप और अमेरिका में पनपी) या तो उद्योग-व्यापार-वाणिज्य आदि के सहायक के रूप में थी या उसका उद्देश्य अपने-अपने देशों या क्षेत्रों की राजनीति में मदद करने का था। अपने ‘स्वतंत्र’ रूप में पत्रकारिता का सूक्ष्म सा उद्गम 1760 के बाद हुआ। 19वीं शताब्दी के आरंभ में जो नई पत्रकारिता पनपी उसकी कुछ विशेषताएं थीं, यथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जनसमुदाय की व्यापक भागीदारी, जनमत तैयार करने की क्षमता और सामाजिक व सांस्कृतिक विषयों पर संपादकों की अपनी पकड़। यह 19वीं शताब्दी के बाद ही संभव हुआ कि समाचार पत्र—पत्रिकाएं आदि राजनीतिक और आर्थिक विषयों पर ही केंद्रित रहने के बजाय सांस्कृतिक और मनोरंजन प्रधान सामग्री की ओर मुड़ीं।
महात्मा गांधी जब पहली बार 1888 में लंदन गए, तब से लेकर अपने आगे के संपूर्ण पत्रकारिता जीवन में पत्रकारिता की उपर्युक्त विशेष प्रवृत्ति अर्थात् राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के विश्लेषण से जुड़े। चूंकि गांधीजी का लगभग साठ साल का सार्वजनिक जीवन इतने विषयों से जुड़ा रहा जिसका अंदाजा संपूर्ण गांधी वांग्मय (सौ खंडों) से भी लगना कठिन है। उन्हें सामान्यतया एक ‘राजनीतिक संत’ समझा जाता है, जिन्होंने सत्याग्रह की मौलिक और अप्रत्याशित प्रक्रिया से अहिंसक आंदोलनों द्वारा भारत को स्वतंत्रता दिलाई; हालांकि उन्होंने अपना सामाजिक सेवा का जीवन पत्रकारिता से ही शुरू किया था लेकिन जैसे-जैसे उनका यह सार्वजनिक जीवन विस्तृत होता गया और यह भुला दिया गया कि वे कर्मठ पत्रकार भी थे या भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी की पत्रकारिता का भी कुछ विशेष स्थान रहा है।
यह दुर्भाग्य रहा कि महात्मा गांधी पर देश-विदेश में और विभिन्न भाषाओं में हजारों किताबें लिखी गई पर वे ज्यादातर उनके अहिंसा के सिद्धांतों और स्वाधीनता आंदोलन में प्रयोग किए सत्याग्रह अभियानों व उनके सपनों के भारत आदि के साथ आजादी हासिल करने के दौरान उनकी गतिविधियों व मौजूदा समय में उनके विचारों की प्रासंगिकता आदि पर ही ज्यादा हैं। उनकी पत्रकारिता पर पूरी तरह केंद्रित पुस्तकों की संख्या नगण्य ही थी। तीन दशक पहले तक एक भी पुस्तक नहीं थी।
यदि शैलेन्द्रनाथ भट्टाचार्य की अंग्रेजी पुस्तक ‘महात्मा गांधी : द जर्नलिस्ट’ और दो-चार अंग्रेजी लेखों को छोड़ दें तो गांधीजी की पत्रकारिता पर कोई अध्ययन या शोध नहीं हो सका था। हिंदी में विशद या स्वल्प अध्ययन की एक भी पुस्तक या पुस्तिका नहीं थी। अपवादस्वरूप भवानी प्रसाद मिश्र का एक छोटा सा निबंध ही था, जिसका शीर्षक सर्वोदय पत्रकारिता था और गांधी प्रवर्तित सर्वजन हिताय पत्रकारिता और ‘पत्रकार गांधी’ पर केंद्रित था। शैलेन्द्रनाथ भट्टाचार्य की पुस्तक में ‘गांधी : एक पत्रकार’ के संस्थापक (स्ट्रक्चरल) पहलू को ज्यादा दर्शाया गया है, जैसे संपादक, व्यवस्थापक, विज्ञापन प्रबंधक, स्वतंत्र पत्रकार (फ्रीलांस जर्नलिस्ट) आदि के रूप में गांधीजी किस तरह काम करते थे। यह सही है कि भट्टाचार्य ने समाचार जगत की स्वतंत्रता विषयक अध्याय में गांधीजी के राजनीतिक विचारों को भी रखा है, लेकिन यह उनकी पूरी किताब का एक अध्याय मात्र है। यही बात अन्य दूसरे अंग्रेजी लेखों की बाबत कही जा सकती है। इन लेखों में से कुछ ने गांधीजी की पत्रकारिता का भारत की आजादी की लड़ाई में क्या योगदान रहा इसका विवेचन किया है लेकिन सरसरी और अपर्याप्त रूप में।
गांधीजी की पत्रकारिता पर अध्ययनों के अभाव पर प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी हैरानी जताई थी कि महात्मा गांधी के घटनापूर्ण जीवन और उनके विचारों पर तो बहुत लिखा गया लेकिन कोई उनकी पत्रकारिता पर कुछ नहीं लिखता जबकि वे दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत तक पत्रकारिता से जुड़े रहे। महात्मा गांधी को पत्रकार के रूप में जानने-समझने की कोशिश कम हुई जबकि यह हकीकत है कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गांधीजी ने भारत की पत्रकारिता को अलग से एक मोड़ दिया। उन्हें प्रोत्साहित किया और दिशा दी कि वे राजनीतिक पत्रकारिता के महत्व को समझें और जोखिम उठाकर भी यह काम करें। उन्होंने ऐसी पत्रकारिता को एक मिशन में बदला और अनेक संपादकों को स्वतंत्रता सेनानी बनाया। यह क्रम ‘हिंदी बंगवासी’ (1896) से शुरू होकर ‘हरिजन’ के अंकों तक अबाध रहा। इस दौरान भारत के हरेक प्रांत में विभिन्न अखबारों और पत्रिकाओं ने गांधीजी के रचनात्मक और राजनीतिक आदर्शों को समझा और अपनी नीतियों में बदलाव लाया।
विशाल जनता तक भारत की स्वतंत्रता के लिए राजनीतिक चेतना फैलाने में इन पत्रों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वस्तुतः एक दैनिक पत्र का तो नाम ही ‘गांधी’ रखा गया।
गांधीजी खुद को शौकिया पत्रकार कहते थे लेकिन इतिहास बताता है कि वे खुद भी अपने व्यक्तित्व, अपने दर्शन और अपने सत्याग्रह अभियानों के कारण खबर बनते रहते थे। पोरबंदर, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका, साबरमती और सेवाग्राम आश्रमों सहित दिल्ली में उन्होंने जो जीवन जिया और जो अभियान चलाए, उन सभी का समग्र आकलन करें तो हम पाएंगे कि उनके जीवन और उनके आंदोलनों में अखबारों की बड़ी भूमिका रही है। महात्मा गांधी इंग्लैंड गए तब उन्हें पहली बार समाचारपत्र पढ़ने का मौका मिला। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ‘अभी पढ़ाई शुरू नहीं हुई थी। मुश्किल से समाचारपत्र पढ़ने लगा था। यह दलपतराम शुक्ल का प्रताप था। हिंदुस्तान में मैंने समाचारपत्र कभी पढ़े नहीं थे, पर बराबर पढ़ते रहने के अभ्यास से उन्हें पढ़ने का शौक मैं पैदा कर सका था। ‘डेली न्यूज’, ‘डेली टेलीग्राफ’ और ‘पेलमेल गजेट’ इन पत्रों को सरसरी निगाह से देखा जाता था, पर शुरू-शुरू में तो इसमें मुश्किल से एक छोटा खर्च होता होगा?’’
महात्मा गांधी ने इंग्लैंड से ही नए युग के इस संचार साधन के महत्त्व को पहचान लिया था। उन्होंने छात्र जीवन से ही समाचारपत्रों के संपादकों को पत्र लिखकर और उनसे मिलकर अपने विचारों को फैलाने की प्रवृत्ति विकसित कर ली थी। दक्षिण अफ्रीका के प्रारंभिक दौर में ही महात्मा गांधी ने ‘नेटाल एडवर्टाइजर’, ‘नेटाल विटनेस’, ‘नेटाल मर्क्यूरी’ आदि अंग्रेजी अखबारों को प्रवासी भारतीयों की समस्याओं और अपनी स्थिति और विचारों को स्पष्ट करने के लिए पत्र लिखे, जो इन अखबारों में छपे भी। इसके बाद गांधी जी 1896 में दक्षिण अफ्रीका से पांच-छह महीने के लिए भारत आए। तब कलकत्ते से मुंबई जाते समय ट्रेन प्रयाग में रुकी तो गांधीजी दवा खरीदने को शहर में चले गए। जब तक वे स्टेशन वापस आए तो ट्रेन छूट गई। अब उन्हें एक दिन बाद ही मुंबई की ट्रेन मिलनी थी। उन्होंने इस दौरान ‘पायोनियर’ के संपादक मि. चेजनी से मुलाकात की और उन्हें दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों की समस्याओं से अवगत कराया। चेजनी ने उनको आश्वस्त किया कि वे जो भी लिखकर भेजेंगे उस पर मैं तुरंत टिप्पणी लिखूंगा। गांधीजी मुंबई पहुंचे और वहां से राजकोट चले गए, जहां उन्होंने एक पुस्तिका तैयार की, जो बाद में ‘हरी पुस्तिका’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ”हरी पुस्तिका की दस हजार प्रतियां छपाई थीं और उन्हें सारे हिंदुस्तान के अखबारों और सब पक्षों के प्रसिद्ध लोगों को भेजा था। ‘पायोनियर’ में उस पर सबसे पहले लेख निकला। उसका सारांश विलायत गया और उस सारांश का सारांश फिर रायटर के द्वारा नेटाल पहुंचा। नेटाल में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई।
गांधी जब अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ कुरलैंड स्टीमर से दक्षिण अफ्रीका पहुंचे तो उन्हें वहां गोरों के भयंकर विरोध का सामना करना पड़ा। दक्षिण अफ्रीका जाने के पहले गांधी जी मुंबई, राजकोट, पुणे, मद्रास और कलकत्ता गए और इन शहरों में कई संपादकों से मिले। गांधीजी फीरोजशाह मेहता, जस्टिस बदरूद्दीन तैयब, रामकृष्ण भंडारकर, न्यायमूर्ति रानाडे, लोकमान्य गोपालकृष्ण गोखले, जी परमेश्वरन और जी सुब्रह्मण्यम जैसे संपादकों से मिले। गांधीजी लिखते हैं कि जी परमेश्वरन पिल्लै ने तो मुझे अपने समाचारपत्र का इस काम के लिए मनचाहा उपयोग करने दिया और मैंने निसंकोच इसका उपयोग किया भी। कलकत्ते में ‘डेली टेलीग्राफ’ के प्रतिनिधि मि. एलर थॉर्पसे से पहचान हुई। मैं ‘अमृत बाजार पत्रिका’ के कार्यालय में गया। ‘बंगवासी’ ने हद कर दी। मुझे एक घंटे तक बैठाए रखा। ‘बंगवासी’ के संपादक ने साफ कह दिया कि मुझे आपकी बात नहीं सुननी। आप वापस जाएं यही अच्छा होगा। पर गांधी हारे नहीं। वे दूसरे संपादकों से मिलते रहे। ‘इंग्लिशमैन’ के संपादक मि. सॉन्डस ने तो उन्हें अपनाया और अपने दफ्तर और अखबार का उपयोग करने की छूट दी। इस प्रकार गांधीजी ने देश की पत्रकारिता से अपने संबंध बनाए और अपने उद्देश्य के लिए समाचारपत्रों का समुचित उपयोग किया।
इस बार जब वे दक्षिण अफ्रीका लौटे तो अपने सहयोगी मदनजीत की सलाह पर 1904 में ‘इंडियन ओपिनियन’ अखबार निकालना शुरू किया। गांधीजी इस अखबार के संपादक नहीं थे पर संपादन का सच्चा बोझ तो उन पर ही पड़ा। मनसुखलाल नाजर संपादक थे। आरंभ में यह अखबार गुजराती, तमिल, हिंदी और अंग्रेजी में निकलता था। बाद में तमिल और हिंदी में बंद कर दिया। हालांकि इस अखबार को निकालने में गांधीजी की बचत का का पैसा ही खर्च होता रहा। गांधीजी ने बाद में यह महसूस किया कि इस अखबार ने हिंदुस्तानी समाज की अच्छी सेवा की। इससे धन कमाने का विचार तो शुरू से किसी का नहीं था। ‘इंडियन ओपिनियन’ को लेकर गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ‘इंडियन ओपिनियन’ के पहले महीने के कामकाज से ही मैं इस परिणाम पर पहुंच गया था कि “समाचारपत्र सेवा भाव से ही चलाना चाहिए। समाचारपत्र एक जबरदस्त शक्ति है, लेकिन जिस प्रकार निरंकुश पानी का प्रवाह गांव के गांव डुबो देता है और फसल को नष्ट कर देता है उसी प्रकार कलम का निरंकुश प्रवाह भी नाश की सृष्टि करता है। यदि ऐसा अंकुश बाहर से आता है तो वह निरंकुशता से भी अधिक विषैला सिद्ध होता है। अंकुश तो अंदर का ही लाभदायक हो सकता है।”
गांधीजी के लिए उनके निकाले सभी समाचारपत्र उनके जीवन के कुछ अंशों के निचोड़ थे। ‘इंडियन ओपिनियन’ के हर अंक में गांधीजी अपनी आत्मा को उंडे़लते थे : “जिसे मैं सत्याग्रह के रूप में पहचानता था, उसे समझाने का प्रयत्न करता था। शायद ही कोई अंक ऐसा होगा, जिनमें मैंने कुछ नहीं लिखा हो। इनमें मैंने शायद ही एक भी शब्द बिना विचारे, बिना तौले लिखा हो या किसी को केवल खुश करने के लिए लिखा हो अथवा जानबूझकर अतिश्योक्ति की हो। मेरे लिए यह अखबार संयम की तालीम सिद्ध हुआ था। मित्रों के लिए वह मेरे विचारों को जानने का माध्यम बन गया था। मैं संपादक के दायित्व को भलीभांति समझने लगा और मुझे समाज के लोगों पर जो प्रभुत्व प्राप्त हुआ, उसके कारण भविष्य में होने वाली लड़ाई संभव हो सकी, वह सुशोभित हुई और उससे शक्ति प्राप्त हुई।”
गांधीजी मानते थे कि पत्रकारिता के दो रूप हैं, एक व्यवसायी और दूसरा लोकसेवी। पत्रकारिता व्यवसायी बनती है तो वह दूषित हो जाती है और लोकसेवा के लक्ष्य से दूर हो जाती है।
महात्मा गांधी 1915 में भारत आए तो उन्होंने पूरे देश का भ्रमण शुरू किया। पांच साल बाद जब बाल गंगाधर तिलक का निधन हुआ तो गांधीजी ने राष्ट्रीय आंदोलन की बागडोर संभाली और असहयोग आंदोलन शुरू हुआ। हंटर आयोग की सिफारिशों के फलस्वरूप कार्रवाई पर देश भर में जो अशांति की लहर चली उसने आंदोलन को बल दिया। आंदोलन को आगे चलाने में समाचारपत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण रही और इस पर गांधी जी के विचारों का प्रभाव रहा।
इसके पहले 1919 में उन्हें ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ को लेकर ब्रिटिश हुकूमत के रवैए के खिलाफ जूझना पड़ा।
इस समाचारपत्र के संपादक बीजी हॉर्निमैन थे। इसमें गांधीजी के सत्याग्रह के समर्थन में कई लेख छपे, फलस्वरूप 26 अप्रैल को हॉर्निमैन को भारत छोड़ने का हुक्म मिला। इस तरह बॉम्बे क्रॉनिकल का प्रकाशन बंद हो गया। गांधीजी ने बंबई सरकार के सचिव जे किरर को पत्र लिखा। जिसमें गांधी जी ने कहा कि हॉर्निमैन का निर्वासन नितांत अनुचित और उनके निर्वासन के बाद समाचार नियंत्रण संबंधी आदेश बिल्कुल अनावश्यक है और जमानत को जब्त करके मानो आगे में घी डाल दिया हो। हॉर्निमैन के निष्कासन के बाद ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ को चलाने की जिम्मेदारी गांधीजी को सौंपी गई। गांधीजी लिखते हैं कि ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ में मुझे अधिक कुछ नहीं करना पड़ता था। फिर भी मेरे स्वभाव के अनुसार मेरे लिए यह जिम्मेदारी बहुत बड़ी हो गई थी। लेकिन मुझे यह जिम्मेदारी अधिक दिन तक नहीं उठानी पड़ी। सरकार की मेहरबानी से ‘क्रॉनिकल’ बंद हो गया।
इसके बाद गांधीजी ने ‘नवजीवन’ और ‘यंग इंडिया’ अखबार शुरू किया। इस बीच उन्होंने अप्रैल 1919 में ‘भारतीय प्रेस अधिनियम’ के विरोध में ‘सत्याग्रही’ नाम से अखबार बिना पंजीकरण कराए निकाला। गांधीजी इसके संपादक थे और यह मुंबई से हर सोमवार को निकलता था। इसके दो ही अंक निकले। इस अखबार के बारे में गांधीजी ने लिखा कि रौलट एक्ट को रद्द कराने के उद्देश्य से ‘सत्याग्रही’ ने जन्म लिया है और वह सत्याग्रह के आचरण से होगा। यह पत्र पंजीकृत नहीं है, इसलिए न वार्षिक चंदा लिया जाएगा और न यह गारंटी है कि पत्र बिना किसी रुकावट के छपता रहेगा। संपादक किसी भी क्षण गिरफ्तार किया जा सकता है, लेकिन प्रयत्न होगा कि एक के बाद एक संपादक मिलता रहे। हम सदा कानून नहीं तोड़ेंगे, इसलिए रौलट एक्ट रद्द होते ही इसे बंद कर दिया जाएगा।
महात्मा गांधी न केवल अपने अखबारों में लिख रहे थे बल्कि सरकार के अंकुशों के खिलाफ लड़ते भी रहे। नवजीवन के प्रकाशन संबंधी नियमों पर मुंबई सरकार ने पांच सौ रुपये की जमानत देने का आदेश दिया तो गांधीजी ने इसका तार्किक रूप से विरोध किया; सरकार को अपने आदेश वापस लेने पड़े। गांधीजी के संपादन में ‘इंडियन ओपिनियन’ और ‘यंग इंडिया’ अखबार दिनोंदिन प्रसिद्ध हो रहे थे।
गांधीजी ने आत्मकथा में लिखा है कि “इन दोनों पत्रों के द्वारा मैंने जनता को यथाशक्ति सत्याग्रह की शिक्षा देना शुरू कर दिया। पहले दोनों पत्रों की थोड़ी ही प्रतियां छपती थीं। लेकिन बढ़ते-बढ़ते वे चालीस हजार के आसपास पहुंच गई। नवजीवन के ग्राहक एकदम बढ़े, जबकि ‘यंग इंडिया के धीरे-धीरे बढ़े। मेरे जेल जाने के बाद इसमें कमी हुई। इन पत्रों में विज्ञापन न लेने का मेरा आग्रह शुरू से ही था। मैं मानता हूं कि इससे कोई हानि नहीं हुई और इस प्रथा के कारण पत्रों के विचार-स्वातंत्र्य की रक्षा करने में बहुत मदद मिली। इन पत्रों ने कठिन समय में जनता की अच्छी सेवा की और फौजी कानून के जुल्म को हलका करने में हाथ बंटाया।”
इन पत्रों की आम जनता में बढ़ती लोकप्रियता से सरकार परेशान थी। वह इसे बंद करने की घात में रहती थी। इस बीच ‘यंग इंडिया’ में (23 फरवरी, 1922) गांधी के लेख ‘गर्जन-तर्जन’ आदि के आधार पर सरकार के प्रति जनता में असंतोष भड़काने के आरोप में उन्हें 10 मार्च 1922 को अहमदाबाद में गिरफ्तार कर लिया गया। गांधीजी की भारत में यह पहली गिरफ्तारी थी और यह गिरफ्तारी भी उनकी पत्रकारिता की वजह से हुई थी। पत्रकारों के हक पर जब भी सरकार ने लगाम लगाने की कोशिश की तो गांधी ने इसके खिलाफ लिखने में कभी कोई संकोच नहीं किया। सरकार ने जब मुद्रणालयों पर छापे मारने और उन्हें जब्त करने के आदेश निकाले तो गांधीजी इसके खिलाफ डटकर खड़े हुए। गांधी ने लिखा कि “समाचारपत्रों के संचालक और प्रकाशक सरकार के ऐसे कानून को मानना पाप समझें और नोटिस आने पर प्रेस बंद कर दें। आज साधारण जन भयमुक्त होकर अनीतिमय कानूनों की सविनय अवज्ञा कर रहे हैं। ऐसे में पत्रकारों ने कमजोरी दिखाई तो देश की हानि होगी। समाचार पत्र भी इस लड़ाई में साथ दें।”
गांधीजी अपने अखबार के ग्राहकों और पाठकों के साथ आत्मीय संबंध बनाते हैं और उन्हें अखबार का मालिक मानने के साथ उनसे सलाह भी लेते हैं। उनके द्वारा जिस ‘सत्याग्रह’ का आविष्कार किया गया उसमें उनकी पाठकों से सलाह लेने की प्रवृत्ति का भी योगदान रहा। दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी को भारतीयों की खातिर अपनी लड़ाई का परिचय देने के लिए कोई शब्द नहीं सूझ रहा था तो नाममात्र का इनाम रखकर उन्होंने ‘इंडियन ओपिनियन’ के पाठकों में प्रतियोगिता कराई। उन्होंने ‘नवजीवन क्लब’ के रूप में पाठक क्लब बनाया और व्यापारिक संबंधों के बजाए अत्यंत घनिष्ठ और नैतिक संबंध बनाए। साथ ही पाठकों को यह अधिकार सौंपा कि वे इसका ध्यान रखें कि समाचारपत्र में कोई अनुचित और झूठी खबर नहीं छपे और अविवेकपूर्ण भाषा का प्रयोग नहीं हो।
संपादकों पर पाठकों का चाबुक रहना ही चाहिए जिसका उपयोग संपादक के बिगड़ने पर ही हो। गांधीजी पाठकों से कहते थे कि वे नवजीवन बहिष्कार मंडल बनाएं और अहिंसक असहयोग से समाचारपत्र में छपने वाली भूलों और अशुद्धियों का विरोध करें और अशुद्धियां बंद न होने पर ‘नवजीवन’ को खरीदना बंद कर दें। गांधी जी खुद भी इस नवजीवन बहिष्कार मंडल के सदस्य बनने को तैयार थे।
गांधीजी कहते थे कि ‘नवजीवन’ समाचार पत्र नहीं है, वह विचार पत्र है। गांधीजी असत्य, विषैले और गोपनीय समाचारों के उद्घाटन के विरोधी हैं। ‘यंग इंडिया’ में 1930 में गांधीजी लिखते हैं कि समाचारों को अप्रत्यक्ष स्रोतों से और प्रायः उलटे-सीधे साधनों से बटोरकर उन्हें समय से पहले छापना पत्रकारिता का काम नहीं होना चाहिए। मुझे चार साप्ताहिक अखबारों को चलाने और बीस साल से अधिक सफलतापूर्वक पत्रकारिता करने का अनुभव है।
हमें अंग्रेजों की अंधी नकल नहीं करना चाहिए और पत्रकारिता को पैसा कमाने का जरिया न बनाकर लोकहित का ख्याल रखना चाहिए। गांधीजी चाहते हैं कि पत्रकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर दूसरे को अपमानित करने वाले, चोट पहुंचाने वाले और रोष उत्पन्न करने वाले मत और समाचार प्रकाशित न करें।
गांधी ने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में ‘हरिजन’ नाम से पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। हरिजन का प्रकाशन अंग्रेजी में पहले हुआ जबकि योजना पहले हिंदी में छापने की थी। हरिजन सेवक संघ के मुखपत्र के रूप में 11 फरवरी 1933 से प्रकाशित होना शुरू हुआ। इस पत्रिका के प्रकाशन के बारे में गांधीजी ने स्पष्ट किया था कि हरिजन सिर्फ हरिजन कार्य को लेकर चलता है और सरकार के साथ झगड़ा खड़े होने वाली सामग्री नहीं छापी जाती और इस कारण राजनीति विषयक सामग्री बिल्कुल नहीं दी जाती।
‘हरिजन’ का प्रकाशन हिंदी अंग्रेजी के साथ बंगाली, मराठी, तमिल, गुजराती में करने की कोशिश की गई। बाद में 1940 में विनोबा के सत्याग्रह के समाचार छपने पर सरकार को नोटिस मिला। गांधीजी ने इस संबंध में वायसराय से पत्र व्यवहार किया लेकिन संतोषप्रद उत्तर नहीं मिलने पर हरिजन (अंग्रेजी), हरिजन सेवक (हिंदी) और हरिजन बंधु (गुजराती) का प्रकाशन बंद करने की घोषणा कर दी। बाद में फिर से इसका प्रकाशन 1942 में शुरू किया गया। लेकिन सरकार फिर से इसके प्रकाशन पर रोक लगाने की तैयारी में थी।
गांधी का कहना था कि सरकार हरिजन का प्रकाशन रोक सकती है लेकिन जब तक मैं जिंदा हूं, वह उसके संदेश को रोक नहीं सकती। ‘हरिजन’ समाचारपत्र से भिन्न एक विचार पत्र है और वह आज अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू (दो संस्करण) तमिल, तेलुगु (दो संस्करण), उड़िया, मराठी और कन्नड़ (दो संस्करण) में प्रकाशित हो रहा है। बंगला में इसके प्रकाशन की तैयारी हो रही है, सिर्फ सरकार की इजाजत का इंतजार है।
भारतीय भाषाओं में ‘हरिजन’ के प्रकाशन पर बार-बार सरकारी नियम-कानून थोपे गए पर गांधी जरा भी विचलित नहीं हुए। आजादी मिलने के कुछ साल पहले ही विभाजन की स्थिति पैदा होने पर तो झूठी और मनगढ़ंत खबरों की जैसे बाढ़ आ गई। हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य पर अफवाहों का बाजार गर्म था। गांधीजी ने जामिया मिल्लिया में 20 अप्रैल 1946 को अपने भाषण में कहा कि आज सारा वातावरण दूषित है। समाचारपत्र सभी तरह की ऊटपटांग अफवाह फैला रहे हैं और लोग बिना सोचे-समझे उन पर विश्वास कर रहे हैं। इससे लोगों में घबराहट पैदा होती है और हिंदू और मुसलमान अपनी इंसानियत भूलकर आपस में जंगली जानवरों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। गांधी चाहते थे कि हिंदुस्तान में एक अखबार तो ऐसा हो जिसमें आद्योपांत सच हो, गंदगी न हो और लोग इसकी इज्जत करें।
दिल्ली में 12 अप्रैल, 1947 को गांधीजी ने प्रार्थना सभा में साफ-साफ कहा था कि मैं भी पुराना अखबारनवीस हूं और मैंने उस अफ्रीका के जंगल में अच्छी-खासी अखबारनवीसी की है, जहां पर हिंदुस्तानियों को कोई पूछने वाला भी न था। अगर ये लोग अपना पेट पालने के लिए अखबार के पन्ने भरते हैं और उससे हिंदुस्तान का बिगाड़ होता है तो उन्हें चाहिए कि वे अखबार का काम छोड़ दें और कोई दूसरा काम गुजारे के लिए खोज लें। अखबारों को अंग्रेजी में चौथी शक्ति बताया गया है। इनसे बहुत सी बातें बिगाड़ी या बनाई जा सकती हैं। यदि अखबार दुरुस्त नहीं रहेंगे तो फिर हिंदुस्तान की आजादी किस काम की होगी।’’
हिंदी में गांधी की पत्रकारिता पर अकेली पुस्तक की रचना करने वाले कमल किशोर गोयनका ने अपनी पुस्तक ‘गांधी : पत्रकारिता के प्रतिमान’ के प्राक्कथन में लिखा है कि गांधी स्वयं को शौकिया पत्रकार कहते थे जबकि उन्हें लगभग चार दशकों की पत्रकारिता का अनुभव था और उन्होंने अंग्रेजी के साथ भारतीय भाषाओं में भी पत्रकारिता की थी। गांधीजी ने पत्रकारिता में जो प्रतिमान बनाए वे उनके परंपरागत भारतीय ज्ञान, तत्कालीन भारतीय परिवेश, चिंतन और संघर्ष से बने थे और उनमें भारतीय की गहरी छाप थी। उन्होंने पत्रकारिता में पश्चिम की नकल की प्रवृत्ति और उससे होने वाले दूषण की भर्त्सना करते हुए भारतीय पत्रकारिता की नींव रखी और अपने राष्ट्र-बोध से उसके प्रतिमानों की सृष्टि की।
(विभूति फीचर्स)

देश की पहली आधुनिक और आत्म-निर्भर गौ-शाला ग्वालियर में

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प्रति दिन 3 टन सीएनजी, 20 टन सर्वोत्तम गुणवत्ता का बायो जैविक खाद मिलेगा
10 हजार गायों से मिलेगा 100 टन गोबर  
कार्बन उत्सर्जन रोकने में बनेगी वैश्विक आदर्श
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने जताया प्रधानमंत्री श्री मोदी और संतों का आभार

भोपाल : मंगलवार, अक्टूबर 2, 2024,

यह गौ-शाला इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन की सामाजिक जिम्मेदारी निधि से 32 करोड़ रूपये की लागत से बनी है। भविष्य में विस्तार की संभावना को रखते हुए एक हेक्टेयर की भूमि आरक्षित रखी गई है। गौ-शाला को और विस्तार देने सांसद निधि से 2 हजार गायों के लिये आधुनिक शेड निर्माण के लिए 2 करोड़ रूपये की राशि दी गई है।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और उनकी “वेस्ट टू वेल्थ” के विकास दर्शन के प्रति आभार व्यक्त किया है। उन्होने संत समुदाय के प्रति भी आभार व्यक्त किया है जो गौ-माता की सेवा कर रहे हैं। राज्य सरकार इस प्रयास के विस्तार के लिये पूरा सहयोग देगी। उल्लेखनीय है कि इंदौर में एशिया के सबसे बड़े सीएनजी प्लांट का संचालन हो रहा है। इसका शुभारंभ प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने किया था।

ग्वालियर की लाल टिपारा गौ-शाला आदर्श गौ-शाला में ग्वालियर नगर निगम और संत समुदाय के सहयोग से 10 हजार गायों की देखभाल की जा रही है। बायो सीएनजी प्लांट के साथ ही इंक्यूबेशन सेंटर भी जल्दी ही शुरू किया जायेगा।

क्या होंगे फायदे

प्लांट के विधिवत संचालन के दिन से ही लगभग 2 से 3 टन प्रतिदिन बायो सी.एन.जी. एवं लगभग 20 टन प्रतिदिन उच्च कोटि की प्राकृतिक खाद का उत्पादन होगा। इससे नगर निगम, ग्वालियर को भी लगभग 7 करोड़ रूपये की आय होगी।

कार्बन उत्सर्जन कम करने और जलवायु परिवर्तन के खतरों का सामना करने में समाज और सरकार के आपसी सहयोग का यह विश्व स्तरीय आदर्श उदाहरण है। बायो सीएनजी प्लांट की स्थापना से पर्यावरण सुधरेगा। स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा। गोबर धन के उपयोग से आर्थिक रूप से भी गौ-शाला आत्म-निर्भर बनेगी। ग्वालियर के आस-पास जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा। किसानों को इस प्लांट से गोबर की खाद उचित दाम पर मिल सकेगी।

ग्रीन ऊर्जा उत्पादन में आगे बढ़ता मप्र

मध्यप्रदेश ने क्लीन और ग्रीन ऊर्जा उत्पादन की ओर तेजी से कदम बढ़ा दिये हैं। केन्द्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय की ताजा रिपार्ट के अनुसार गांवों में बायो गैस संयंत्रों की स्थापना में मध्यप्रदेश देश में तीसरे स्थान पर है। पहले स्थान पर चंडीगढ और दूसरे पर उत्तर प्रदेश है। मध्यप्रदेश में 104 बायो गैस संयंत्र विभिन्न गांवों में संचालित हैं। सबसे ज्यादा 24 बैतूल में, बालाघाट 13 में और सिंगरौली में 12 हैं। स्थानीय स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध होने के साथ ही यह कार्बन उत्सर्जन रोकने में भी मदद करती है।

ग्वालियर की अत्याधुनिक गौ-शाला से जुड़े बॉयो सीएनजी प्लांट से अन्य नगरों के लोग लेंगे प्रेरणा : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

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भोपाल : मंगलवार, अक्टूबर 2, 2024,  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि प्रदेश में प्रधानमंत्री श्री मोदी के जन्म दिवस 17 सितम्बर से लेकर गांधी जयंती तक 15 दिवस की अवधि में सेवा ही स्वच्छता अभियान के अंतर्गत अनेक सार्थक गतिविधियां सम्पन्न हुईं। इन गतिविधियों से नागरिक और जन-प्रतिनिधि भी बड़ी संख्या में जुड़े। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री मोदी ग्वालियर की लाल टिपारा गौ-शाला के बॉयो सीएनजी प्लांट का शुभारंभ कर रहे हैं। अन्य नगरों के लोग इस प्लांट के संचालन से प्रेरणा लेकर गाय के दूध के साथ ही गौमूत्र एवं गोबर से समाज हितैषी उत्पाद बनाने का कार्य करेंगे। ग्वालियर में संचालित यह गौ-शाला देश की अत्याधुनिक और आत्मनिर्भर गौ-शाला है, जो लगभग 100 टन गोबर के उपयोग से प्रतिदिन 3 टन तक सीएनजी और 20 टन गुणवत्तापूर्ण जैविक खाद प्रदान करेगी।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि लगभग 10 हजार गौ-वंश से गोबर प्राप्त हो जाने से सीएनजी और जैविक खाद बनाने का कार्य संभव होगा। प्रदेश के अन्य नगरों में भी ऐसी गौ-शालाएं स्थापित कर संयंत्र स्थापित करने का कार्य किया जाएग।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री मोदी 2 अक्टूबर को स्वच्छ भारत मिशन एवं अमृत योजना के अंतर्गत 685 करोड़ रुपए की परियोजनाओं का वर्चुअली भूमि-पूजन और लोकार्पण कर रहे हैं। मध्यप्रदेश में स्वच्छता पखवाड़े में अनेक गतिविधियों का संचालन हुआ। प्रदेश के नगरीय निकायों में 8 हजार स्वास्थ्य शिविर लगाए गए। इनके माध्यम से 2 लाख से अधिक सफाई मित्रों और उनके परिजन का स्वास्थ्य परिक्षण हुआ। पखवाड़े के सफल संचालन के लिए प्रदेश के नागरिक, प्रशासनिक और जनप्रतिनिधि बधाई के पात्र हैं।

कांग्रेस के समय में पर्ची-खर्ची सिस्टम की वजह से प्रतिभावान युवाओं को नौकरी नहीं मिलती थी

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हरियाणा/कलानौर/ 1अक्टूबर, आज हरियाणा में विभिन्न जन सभाओं को सम्बोधित करते हुए मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने मंगलवार को बसाना गांव, कलानौर में भाजपा प्रत्याशी श्रीमती रेनू डाबला व लाडवा से नायब सिंह सैनी के पक्ष में आयोजित जनसभा में प्रतिभाग किया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि भाजपा प्रत्याशी श्रीमती रेनू डाबला निरंतर इस क्षेत्र की सेवा करती आई हैं। 2014 से 2024 तक हरियाणा की तस्वीर बदली है। प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में हरियाणा में चहुमुखी विकास धरातल पर उतरा है। पिछले दस वर्षों में गरीब, किसान, मजदूर वर्ग को आगे बढ़ाने का काम हुआ है। हरियाणा में सड़क, रेल, हवाई अड्डे, अस्पताल, विद्यालयों, मेडिकल कॉलेज, के क्षेत्र में तेजी से विकास कार्य हुए हैं।
मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि हरियाणा के प्रत्येक घर में शुद्ध पेयजल पहुंचाया जा रहा है। 24 लाख गरीब परिवारों को मुफ्त में गैस कनेक्शन दिए गए। प्रदेश के 1.50 लाख युवाओं को सरकारी नौकरी दी है। 5.50 लाख विद्यार्थियो को निशुल्क टैबलेट देने का कार्य किया है। किसानों की फसलों के नुकसान पर 12500 करोड का मुआवजा राशि दी गई है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का अभियान प्रधानमंत्री जी ने इसी धरती से शुरू किया था। जिससे बड़ा बदलाव हरियाणा में आया है।
केंद्र ने हरियाणा में 8 फसलों से बढ़ाकर 14 फसलों का एमएसपी तय किया गया है। अब भाजपा की सरकार बनने के बाद 24 फसलों में एमएसपी दिया जाएगा। उन्होंने कहा प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में देश में ऐतिहासिक गरीब कल्याण योजनाओं को लागू किया गया है। देश में जनधन योजना , प्रधानमंत्री आवास योजना, गरीब कल्याण अन्न योजना, आयुष्मान भारत योजना, किसान सम्मान निधि जैसी अनेकों योजनाएं गतिमान है। हरियाणा में भाजपा की सरकार 36 बिरादरियों को साथ में लेकर चलती है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि चुनाव में एक ओर विकास का साथ देने वाली भाजपा तो दूसरी ओर तुष्टिकरण भ्रष्टाचार और परिवारवाद वाली पार्टी कांग्रेस है। जिसने हरियाणा को लूटा है। कांग्रेस आम जनता का हक मारती थी। प्रतिभाशाली युवाओं को नौकरी से दूर रखकर पैसे लेकर नौकरियां बेची जाती थी। हरियाणा को कांग्रेस ने भ्रष्टाचार घूसखोरी और दलाली दी है। कांग्रेस ने गरीब किसानों की जमीन छीनकर बड़े-बड़े पूंजीपतियों और अपने दामादों को बाटी है। दलितों और महिलाओ पर अत्याचार हुआ करते थे। कांग्रेस के पाप कभी खत्म नहीं होंगे। कांग्रेस को लंबे समय से भ्रष्टाचार करने का मौका नहीं मिला तो ये लोग हरियाणा में सरकार बनाकर फिर से भ्रष्टाचार करना चाहते हैं।

इस अवसर पर भाजपा वरिष्ठ नेता संजीव बालियान भाजपा जिला अध्यक्ष रणवीर सिंह, विनय रौहेला राजेंद्र सिंह रावत, ठाकुर राज सिंह, मुकेश पंवार, एवं अन्य लोग मौजूद रहे।

इंडियन नेशनल मेमोरी चैंपियनशिप 2024: मुंबई में भारत के सबसे प्रतिभाशाली स्मरणशक्ति वालों का उत्कृष्ट प्रदर्शन

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मुंबई: मेमोरी स्पोर्ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (MSFI) के साथ इंडियन नेशनल मेमोरी चैंपियनशिप 2024 संस्करण का आयोजन 28 और 29 सितंबर, 2024 को सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। ब्रेन इनफिनिट एडुप्राइज द्वारा आयोजित और इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ मेमोरी (IAM) द्वारा समर्थित तेरापंथ भवन, ठाकुर कॉम्प्लेक्स कांदिवली पूर्व, मुंबई में यह कार्यक्रम हुआ जहां 225 लोगों ने परीक्षा दिया। भारत के विभिन्न राज्यों सहित नेपाल के होनहार लोगों ने इस टेस्ट परीक्षा में भाग लिया। इस प्रतिष्ठित कार्यक्रम में देश भर के कुछ प्रभावी दिमाग वालों ने जिसमें 7 साल के बच्चे के साथ 70 साल के बुजुर्ग भी सम्मिलित रहे, सबने एक साथ मिलकर विभिन्न चुनौतीपूर्ण कार्यों में स्मृति और संज्ञानात्मक क्षमताओं के असाधारण कारनामों का प्रदर्शन किया। ब्रेन इनफिनिट द्वारा आयोजित इस चैंपियनशिप को एक प्रतिष्ठित नेतृत्व टीम का समर्थन प्राप्त हुआ जिसने इस आयोजन की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिसमें अमृत जाधव (ब्रेन इनफिनिट के संस्थापक और मेमोरी स्पोर्ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष), प्रणित गायकवाड़ (ब्रेन इनफिनिट के सह-संस्थापक और मेमोरी स्पोर्ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष), राकेश थोम्ब्रे (ब्रेन इनफिनिट के सह-संस्थापक और मेमोरी स्पोर्ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के कोषाध्यक्ष), तारा थोम्ब्रे (ब्रेन इनफिनिट कार्यक्रम निदेशक और मेमोरी स्पोर्ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की सचिव) और निधि कपूर (मास्टर ट्रेनर और मेमोरी स्पोर्ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी सदस्य) का नाम प्रमुख है।

आयोजन के समापन में, उत्तराखंड के ऋषिकेश के निवासी प्रतीक यादव ने भारतीय राष्ट्रीय मेमोरी चैंपियनशिप 2024 के लिए प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया। सभी आयु समूहों के प्रतिभागियों ने प्रतिस्पर्धा की, जो देश में स्मृति प्रशिक्षण के प्रति बढ़ती रुचि और जागरूकता को दर्शाता है।

इंडियन नेशनल मेमोरी चैम्पियनशिप 2024 देश के मेमोरी एथलीटों के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है, जो मानसिक खेलों और संज्ञानात्मक विकास के लिए अधिक उत्साह को बढ़ावा देता है। प्रशिक्षण विशेषज्ञों और संगठनों से निरंतर समर्थन के साथ, यह चैम्पियनशिप भारत के स्मृति खेल परिदृश्य पर अपने प्रभाव को और मजबूत करने के लिए तैयार है।

यूपी सरकार ने उत्तर प्रदेश गौ सेवा आयोग किया गठन

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार हमेशा से गौरक्षा को लेकर सख्त रही है. प्रदेश में गायों की रक्षा हो सके और उनकी सेवा व देखरेख की जा सके  इसके लिए यूपी सरकार ने उत्तर प्रदेश गौ सेवा आयोग का गठन किया. आयोग का अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों का चयन भी कर लिया है.

अध्यक्ष- 
श्री श्याम बिहारी गुप्ता कृषक भवन, राजघाट कॉलोनी के पास. लहर गिर्द, नन्दनपुरा, झाँसी

उपाध्यक्ष- 
1- श्री जसवंत सिंह उर्फ अतुल सिंह ग्राम व पोस्ट खभराभार, कप्तानगंज, कुशीनगर
2- श्री महेश कुमार शुक्ल शिव नगर तुर्कहिया, पोस्ट गांधीनगर, बस्ती

सदस्य-
1 श्री दीपक गोयल बनबटागंज, कोर्ट रोड, निकट सरस्वती शिशु मन्दिर. मुरादाबाद
2 श्री राजेश सिंह सेंगर युवा कल्याण ऑफिस के पास, विकास भवन मार्ग, महोबा
3 श्री रमाकान्त उपाध्याय 1/103, सुहाग नगर, माता मन्दिर के पास, फिरोजाबाद