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अपराधों के प्रति जीरो टॉलरेंस मध्यप्रदेश में मोहन यादव का सख्त संकेत

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(पवन वर्मा-विभूति फीचर्स)
मध्यप्रदेश की कानून-व्यवस्था पर पिछले कुछ दिनों से उठ रहे सवालों ने अंततः सत्ता के शीर्ष को हिला दिया है। मंगलवार रात को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का अचानक पुलिस मुख्यालय पहुँचना, और वहाँ दिए गए तीखे तेवरों वाले निर्देश,यह साफ कर गए कि सरकार अब चेतावनी की मुद्रा में नहीं, बल्कि कार्रवाई के मोड में है।
मध्यप्रदेश के रायसेन व भोपाल में हुई हालिया आपराधिक घटनाएँ भले अलग-अलग प्रकृति की हों, पर एक बात दोनों में समान थी, राज्य की पुलिस व्यवस्थाओं पर सीधे सवाल। रायसेन में जो कुछ हुआ, वह केवल किसी स्थानीय तंत्र की चूक नहीं थी, बल्कि कानून-व्यवस्था पर एक गंभीर धब्बा था। सबसे वीभत्स घटना गौहरगंज की रही, जहाँ छह साल की मासूम बच्ची से दुष्कर्म ने न केवल ज़िले, बल्कि पूरे प्रदेश को स्तब्ध कर दिया। यह वह बिंदु था, जहाँ मुख्यमंत्री का धैर्य टूटा और उनका रुख स्पष्टतः कड़ा हो गया।
मुख्यमंत्री की नाराज़गी सिर्फ शब्दों तक नहीं रही। रायसेन एसपी को तत्काल प्रभाव से हटाकर उन्होंने पुलिस महकमे को एक ठोस और निर्विवाद संदेश दिया कि “सुरक्षा में असफलता की कोई गुंजाइश नहीं, और ऐसी असफलता का मूल्य पद से चुकाना होगा।” यह निर्णय केवल एक अधिकारी का तबादला भर नहीं है, यह उन सभी जिलों के लिए संकेत है जहाँ अपराधियों का मनोबल पुलिस की सुस्ती से बढ़ने लगा है।
गौहरगंज कांड पर मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया में वह बेचैनी साफ झलकती है, जो किसी भी जागरूक शासन प्रमुख में होनी चाहिए। छह साल की बच्ची के साथ हुई यह अमानवीय वारदात केवल एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि राज्य की सामूहिक सुरक्षा प्रणाली की परीक्षा भी है। मुख्यमंत्री ने इसे पुलिस की “निगरानी की विफलता” करार दिया, जो मुख्यमंत्री की एक सही और आवश्यक टिप्पणी थी। क्योंकि यह प्रश्न लंबे समय से अनुत्तरित है कि छोटे जिलों में इस प्रकार की घटनाएँ अचानक कैसे बढ़ रहीं हैं, और अपराधी अवसर कैसे पा रहे हैं?
राजधानी भोपाल की घटनाओं पर भी मुख्यमंत्री ने सख्ती दिखाई। राजधानी में बढ़ती लापरवाही का अर्थ पूरे प्रदेश के लिए खतरे का संकेत है। राजधानी वह आइना है जिसमें सरकार की प्राथमिकताएँ और पुलिस की सतर्कता स्पष्ट दिखती है। यह बात मुख्यमंत्री ने मीटिंग में साफ कर दी है कि “राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था अनुकरणीय होनी चाहिए, असुरक्षा का प्रतीक नहीं।”
मुख्यमंत्री के तेवरों का सार एक ही था, कि अपराध रोकना अब पुलिस की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, केवल अपराधियों को पकड़ लेना ही उसका ‘काम’ नहीं है। यह सोच वर्षों से चली आ रही उस कार्यशैली को भी चुनौती देती है जिसमें पुलिस प्रायः ‘घटना के बाद की कार्रवाई’ पर जोर देती रही है, रोकथाम पर नहीं। मुख्यमंत्री का यह दृष्टिकोण स्वागत योग्य है, क्योंकि अपराधियों का मनोबल तब तक नहीं टूटता, जब तक उन्हें यह भरोसा रहता है कि पुलिस की चौकसी में कहीं न कहीं ढील है।
रायसेन एसपी का हटाया जाना आने वाले समय के लिए एक निर्णायक मोड़ होगा। यह पुलिस कप्तानों और जिलों के अधिकारियों को यह समझा रहा है कि अब आंकड़ों की रिपोर्ट नहीं, जमीन पर ठोस नतीजे मायने रखेंगे। महिलाओं की सुरक्षा, बच्चों की सुरक्षा और संगठित अपराधों पर नियंत्रण,इन मोर्चों पर सरकार अब प्रत्यक्ष निगरानी करेगी और लापरवाही की कीमत तुरंत चुकानी पड़ेगी।
इस पूरी घटना का बड़ा संदेश यह है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव अब कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर राजनीतिक जोखिम लेने को भी तैयार हैं। प्रशासनिक फेरबदल हो या सख्त निर्णय,वे यह दिखा रहे हैं कि “अपराध के प्रति शून्य-सहनशीलता” केवल नारा नहीं, बल्कि क्रियान्वयन का सिद्धांत होगा।
प्रदेश की जनता यही चाहती है कि शासन की संवेदनशीलता सिर्फ बयान या दौरे तक सीमित न रहे, बल्कि धरातल पर महसूस हो। जिस तरह रायसेन की मासूम बच्ची की वेदना ने सबको झकझोरा, उसी तरह मुख्यमंत्री की कार्रवाई ने पुलिस तंत्र को जगाया है। यह जागरण तभी सार्थक होगा जब हर जिले में अपराधियों के मन में यह भय जन्म ले कि इस सरकार में गलती की नहीं, ‘अपराध की सोच’ की भी सजा है।
मध्यप्रदेश आज कानून-व्यवस्था के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। मुख्यमंत्री का यह लौह-मुष्टि वाला रुख उम्मीद जगाता है कि आने वाला समय अपराधियों के लिए नहीं, बल्कि आम नागरिकों के लिए अधिक सुरक्षित होगा। (विभूति फीचर्स)

स्मृतियों में उजाला बनकर सदैव जीवंत रहेंगे धर्मेन्द्र

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(विवेक रंजन श्रीवास्तव -विनायक फीचर्स)

धर्मेन्द्र जी के जाने की खबर सुनते ही हम सब के मन पर जैसे एक पुरानी रोशनी बुझने का दुख उतर आया है। वे सिर्फ फिल्मों का चेहरा नहीं थे बल्कि उन दुर्लभ कलाकारों में से थे जिनकी उपस्थिति भर से पर्दा जीवंत हो उठता था। उनमें रोमांस की कोमलता थी तो एक्शन की दृढ़ता भी थी और सबसे बढ़कर एक सरल मनुष्य की गर्मजोशी थी ।
उनकी हर भूमिका में उनके व्यक्तित्व की विशेषताएं अनायास छलक जाती थी। पंजाब के एक छोटे से कस्बाई वातावरण से उठकर मुंबई की चमक तक पहुंचने की उनकी यात्रा किसी प्रेरक गाथा से कम नहीं लगती। उन्होंने शुरुआती दौर से ही यह साबित कर दिया था कि अभिनय किसी एक खांचे में नहीं रहता बल्कि अपने भीतर कई रंगों की समृद्ध फुहार लिए कथा के नायक के अनुसार चलता है।
उनकी फिल्मों में एक सहज अपनापन दिखाई देता था। कभी वे दोस्ती की मिट्टी में लिपटे धूप जैसे लगते तो कभी पारिवारिक रिश्तों की महक में भीगे किसी बरगद की छांव जैसे। एक ओर उनका दमकता हुआ व्यक्तित्व दर्शकों को रोमांच से भर देता था और दूसरी ओर उनका भावनात्मक रूप से एक्टिंग का प्रभावी पक्ष उन्हें एक सम्पूर्ण कलाकार के रूप में स्थापित करता था। वर्षों तक वे दर्शकों के दिलों में बने रहे और पीढिय़ां उन्हें अपने अपने तरीके से याद करती रहीं।
फिल्मों से परे उनका जीवन भी उतना ही सहज और संजीदा था। उन्होंने समाज और राजनीति दोनों में अपनी भूमिका निभाई और यह साबित किया कि लोकप्रियता केवल तालियों से नहीं मापी जाती बल्कि जिम्मेदारियों से भी पहचानी जाती है। उनके चेहरे की बुझती मगर स्नेहिल मुस्कान में एक ऐसा अपनापन था जो आज भी स्मृतियों में उजाला फैलाता है।
धर्मेन्द्र जी केवल एक अभिनेता नहीं थे बल्कि एक फिल्मी युग थे जो अपनी विशालता में अनेक भावनाओं को समेटे रहा। उनकी विदाई फिल्मों के इतिहास में एक गहरी रिक्तता छोड़ गई है। वे अब इस संसार में नहीं हैं पर उनकी छवि और उनके किरदार सदैव हमारे साथ रहेंगे। ईश्वर उन्हें शांति प्रदान करे। (विनायक फीचर्स)

अन्वेषा घोष योग और जिम के जरिए खुद को रखती है एक्टिव

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अभिनेत्री अन्वेषा घोष अपने बेबाक अंदाज़ और अद्भुत अभिनय कौशल को नई ऊँचाइयों तक ले जाने के लिए तैयार है। मायानगरी मुंबई में वह बतौर अभिनेत्री काम करना चाहती हैं। इससे पहले वह कोलकाता में मॉडलिंग करती थीं और आज भी मॉडलिंग व इवेंट्स में सक्रिय हैं। ‘स्पंदन’ कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट के रूप में काम करते हुए उन्होंने नए कलाकारों, क्रिएटिव आर्टिस्ट्स और मेकअप आर्टिस्ट्स के चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

अन्वेषा प्रिंट, कैलेंडर और कैटलॉग शूट में लगातार निखरती रहती हैं, और अब वह फिल्म इंडस्ट्री में बतौर अभिनेत्री अपनी मजबूत पहचान बनाना चाहती हैं। उन्हें म्यूज़िक वीडियो और आइटम सॉन्ग्स करना बेहद पसंद है। वह प्रशिक्षित कथक डांसर हैं और बॉलीवुड डांसिंग में भी उन्हें महारत हासिल है। बचपन से ही उन्हें स्टाइलिश और ग्लैमरस रहना अच्छा लगता था, और अभिनेत्री बनने का उनका सपना अब सच होने की दहलीज़ पर है।

फिटनेस के प्रति सजग अन्वेषा योग और जिम के जरिए खुद को एक्टिव रखती हैं। भाषा पर उनकी पकड़ मजबूत है और वह अपने संवादों पर खास ध्यान देती हैं। अभिनय की बात करें तो वह शाहरुख़ ख़ान और कृति सेनन की बड़ी प्रशंसक हैं, जबकि अरिजीत सिंह की गायकी उन्हें बेहद भाती है। निर्देशकों में उन्हें राजकुमार हिरानी, संजय लीला भंसाली, अनुराग बसु और इम्तियाज़ अली की फिल्में बेहद पसंद हैं, और एक दिन वह इन दिग्गजों के साथ काम करने की इच्छा रखती है।

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म—फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम—पर अन्वेषा बेहद सक्रिय हैं। वह आधुनिक सोच रखने के साथ-साथ एक स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर शख़्सियत हैं। उनका मानना है कि कुछ पाने के लिए मेहनत जरूरी है; सही लगन और निरंतर प्रयास से फल देर-सबेर अवश्य मिलता है। उनका विश्वास है कि शॉर्टकट से मिली कामयाबी ज़्यादा देर टिक नहीं सकती। वे मानती हैं कि माता-पिता और परिवार का सम्मान करना और उनका साथ पाना ही असली प्रेरणा है, जो इंसान को आगे बढ़ने की शक्ति देता है।

अन्वेषा घोष जैसी प्रतिभाशाली, समर्पित, आत्मविश्वासी और बहुमुखी कलाकार आज के मनोरंजन जगत में एक चमकता हुआ सितारा बनने की पूरी क्षमता रखती हैं—और उनकी मेहनत, निखार और जुनून उन्हें निश्चित ही नई ऊँचाइयों तक ले जाएंगे।

अपोलो का महाराष्ट्र में तीसरा अस्पताल पुणे में शुरू

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400 बेड वाला अस्पताल क्वाटर्नरी देखभाल सुविधाएं प्रदान करेगा

पुणे। एशिया का अग्रणी एकीकृत स्वास्थ्य सेवा प्रदाता संसथान, अपोलो हॉस्पिटल्स ने आज पुणे के स्वारगेट में अपने नए हॉस्पिटल का उद्घाटन किया। इस अस्पताल की शुरूआत चरणबद्ध रूप से होगी, पहले 250 बेड शुरू होंगे। राज्य के इस क्षेत्र भर में बढ़ती स्वास्थ्य देखभाल आवश्यकताओं को मद्देनज़र रखते हुए, उन्हें पूरा करने के लिए स्वास्थ्य सेवा क्षमता को और बढ़ाना अपोलो हॉस्पिटल्स की योजना है।

अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप के चेयरमैन डॉ. प्रताप सी रेड्डी ने कहा,”अपोलो में, हमारा मिशन है, भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया के लिए स्वास्थ्य सेवा में बदलाव लाना। ‘हील इन इंडिया-हील बाय इंडिया’ विज़न से प्रेरित होकर, हम एक ऐसा स्थान बना रहे हैं जहां दुनिया भर के लोगों को करुणा और सामर्थ्य के साथ क्लिनिकल उत्कृष्टता मिल रही है। हम चाहते हैं कि, पुणे और भारत के हर घर में उत्तम स्वास्थ्य और खुशियां बसती रहें।”

अपोलो हॉस्पिटल्स ने अपने अगले विस्तार के लिए पुणे को चुना क्योंकि उन्होंने जाना कि इस क्षेत्र के लोगों की स्वास्थ्य संबंधी ज़रूरतें बदल रही हैं। उन्होंने अपनी विस्तार योजना को इस तरह बनाया है कि वे नई, उन्नत तकनीक का उपयोग करके शहर के अलग-अलग लोगों, समुदायों और संबंधित हितधारकों की बेहतर सेवा कर सकें।

अपोलो हॉस्पिटल्स की कार्यकारी उपाध्यक्ष डॉ. प्रीता रेड्डी ने कहा,”अपोलो हॉस्पिटल्स पुणे में, हम क्लिनिकल उत्कृष्टता, करुणामयी देखभाल और अथक नवाचार पर निर्मित चार दशकों से अधिक समय से चली आ रही विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। यह नया अस्पताल स्वास्थ्य सेवा पहुंच और गुणवत्ता को आगे बढ़ाने की हमारी स्थायी प्रतिबद्धता का प्रमाण है, जो पीढ़ियों से मरीज़ों द्वारा हम पर रखे गए भरोसे का सम्मान करती है।”

अपोलो हॉस्पिटल्स एंटरप्राइज लिमिटेड की प्रबंध निदेशक, सुनीता रेड्डी ने कहा,”हमारा पुणे अस्पताल अपोलो के बढ़ते राष्ट्रीय विस्तार में एक रणनीतिक जुड़ाव है, जो भारत के एक सबसे तेज़ी से बढ़ते स्वास्थ्य सेवा बाज़ारों में एक महत्वपूर्ण कदम है। ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को उच्च-स्तरीय क्वाटर्नरी देखभाल के लाभ दिलाने के लिए अपने एकीकृत स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र (इंटीग्रेटेड हेल्थ इकोसिस्टम) को शहर में लाते हुए बहुत खुश हैं। महाराष्ट्र के लिए देखभाल का एक मज़बूत, भविष्य के लिए तैयार नेटवर्क बनाने के लिए पुणे के क्लीनिकल टैलेंट के साथ सहयोग करने के लिए उत्सुक हैं।”

अपोलो हॉस्पिटल्स के ग्रुप सीईओ और प्रेसिडेंट डॉ. मधु ससिधर ने बताया,”हमारा पुणे हॉस्पिटल सुरक्षा विज्ञान, सबूतों पर आधारित प्रैक्टिस और एक ऐसी संस्कृति की नींव पर बनाई गई है, जिसका हर निर्णय मरीज़ को मद्देनज़र रखते हुए लिया जाता है। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, मरीज़ों की देखभाल के प्रति हमारी प्रतिबद्धता मज़बूत होती जाएगी, जो कि सुसंगत गुणवत्ता, पारदर्शी परिणामों, करुणा और क्लिनिकल दृढ़ता के माध्यम से प्रदान की जाएगी।”

अपोलो हॉस्पिटल्स को गर्व है कि पुणे जैसे आईटी इनोवेशन और व्यापक शहर निर्माण के एक जीवंत केंद्र का, यहां की गतिशील इकोसिस्टम का वह हिस्सा बन रहे हैं। अपोलो हॉस्पिटल्स पुणे की सीईओ डॉ. मनीषा कर्माकर ने कहा,”पुणे शहर में हमारा नया हॉस्पिटल न केवल क्लिनिकल उत्कृष्टता के प्रति अपोलो की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, बल्कि एक ऐसे शहर के विकास और भलाई में सहयोग कर रहा है, जो प्रौद्योगिकी और इनोवेशन के केंद्र के रूप में भारत के भविष्य को आकार दे रहा है।”

अपोलो हॉस्पिटल्स पुणे, पश्चिमी भारत में उच्च-स्तरीय, तकनीकी-सक्षम देखभाल के सोच-समझकर किए जा रहे विस्तार में अग्रणी है। यह परिसर उन्नत सर्जिकल रोबोटिक्स, सटीक ऑन्कोलॉजी, व्यापक क्रिटिकल केयर और कार्डियक साइंस, ट्रांसप्लांट, ऑर्थोपेडिक्स, साथ ही मां और बच्चे के स्वास्थ्य में विशेषज्ञ कार्यक्रमों को एक एकीकृत डिजिटल आधार पर एक साथ लाता है। इस अस्पताल को क्षेत्र में देखभाल क्षमता को ऊपर ले जाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यहां के मॉड्यूलर ओटी (ऑपरेशन थिएटर) मानकीकृत गुणवत्ता के अनुरूप हैं।

पीडीयूएनएएसएस के निदेशक ने ईपीएफओ के नव पदोन्नत सहायक आयुक्तों के लिए ओरिएंटेशन कार्यक्रम का उद्घाटन किया

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पीडीयूएनएएसएस के निदेशक ने ईपीएफओ के नव पदोन्नत सहायक आयुक्तों के लिए ओरिएंटेशन कार्यक्रम का उद्घाटन किया

पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा अकादमी (पीडीयूएनएएसएस) के निदेशक, श्री कुमार रोहित ने सोमवार को कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के नव पदोन्नत सहायक भविष्य निधि आयुक्तों (एपीएफसी) के लिए तीन सप्ताह के ओरिएंटेशन कार्यक्रम का उद्घाटन किया।

श्री कुमार रोहित ने उद्घाटन सत्र के दौरान प्रशिक्षुओं को संबोधित करते हुए एक संवादात्मक बातचीत को प्रोत्साहित किया और प्रतिभागियों को पाठ्यक्रम से अपनी अपेक्षाएं साझा करने के लिए प्रेरित किया। दिल्ली सेंट्रल की एपीएफसी सुश्री प्रतिभा ठुकराल ने समय एवं तनाव प्रबंधन से संबंधित एक प्रश्न पुछा जिसके उत्तर में, निदेशक ने अधिकारियों को अपनी नई ज़िम्मेदारियों के प्रति एक नियमित, नियोजित एवं व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी।

एपीएफसी श्री बिगी वर्गीस द्वारा अनुपालन पर किए गए प्रश्न के जवाब में, श्री रोहित ने अनुपालन एवं सेवा गुणवत्ता के बीच महत्वपूर्ण संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्तमान डिजिटल युग में, जहां व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म सूचनाओं का तुरंत आदान-प्रदान कर देतें है, संगठनों को ग्राहकों की अपेक्षाओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील रहना चाहिए। उन्होंने प्रशिक्षुओं से आग्रह किया कि वे अपनी सोच को इस सेवा उन्मुख सच्चाई के अनुरूप तैयार करें और टीम वर्क, समन्वय एवं निरंतर कौशल विकास के माध्यम से व्यक्तिगत विकास पर अपना ध्यान केंद्रीत करें। उन्होंने अनुभवी अधिकारियों को प्रशिक्षण के दौरान अपने शिक्षण को अधिकतम बनाए रखने के लिए छात्र मानसिकता को अपनाने की भी सलाह दी।

इससे पहले, सत्र में आरपीएफसी-I एवं मुख्य शिक्षण अधिकारी, श्री रिजवान उद्दीन ने प्रतिभागियों का स्वागत किया और उन्हें आगामी टीम निर्माण अभ्यासों में सक्रिय रूप से शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया। आरपीएफसी-II, श्री मनीष कुमार नैय्यर ने पाठ्यक्रम संरचना पर एक रूपरेखा प्रस्तुत की।

हालांकि प्रतिभागियों की औसत आयु 55 वर्ष थी इसके बावजूद, उन्होंने उल्लेखनीय रूप से उत्साह एवं जिज्ञासा का प्रदर्शन करते हुए निदेशक के साथ खुलकर बातचीत की।

पाठ्यक्रम के भाग में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षु अगले सप्ताह उत्तराखंड के रामनगर जाएंगे। यह मॉड्यूल विशेष रूप से नेतृत्व कौशलों पर केंद्रित होगा, जिनमें समय प्रबंधन, टीम निर्माण, समस्या-समाधान, नवाचार, स्वयंसेवा, अनुकूलनशीलता एवं प्रभावी संचार शामिल हैं।

उद्घाटन सत्र में श्री ओतोजित क्षेत्रिमयूम (फेलो, वीवीजीएनएलआई), श्री अंकुर गुप्ता (आरपीएफसी-I), श्री राम आनंद (आरपीएफसी-I), श्री हरीश यादव (आरपीएफसी-I) और अकादमी के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित हुए।

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अभिनेता धर्मेंद्र का निधन, 89 की उम्र में ली अंतिम सांस

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Actor Dharmendra dies at age 89:  बॉलीवुड के वेटरन और लीजेंड्री एक्टर, जिन्हें ‘ही-मैन’ के नाम से जाना जाता था, धर्मेंद्र का आज लंबी बीमारी के बाद 89 साल की उम्र में निधन हो गया. न्यूज ऐजेंसी IANS ने उनके निधन की खबर की पुष्टि की है. जिसके बाग पूरे फिल्म जगत और उनके फैंस में शोक की लहर दौड़ गई है. धर्मेंद्र ने मुंबई स्थित अपने जुहू आवास पर अंतिम सांस ली. उनके अंतिम दर्शन के लिए बेटी ईशा देओल सहित परिवार के सभी सदस्य घर पर इकट्ठा हो गए हैं.

कई करीबी हस्तियों के पहुंचने उम्मीद 

इस दुखद घड़ी में परिवार को सांत्वना देने के लिए कई करीबी हस्तियों उनके घर पहुंचने का सिलसिला लगातार जारी है.  अभनेता अमिताभ बच्चन. आमिर खान, सहत कई एक्टर श्मशान घाट पहुंचे है. अभिनेता परिवार की प्राइवेसी बनाए रखने के लिए उनके जुहू स्थित घर के बाहर सुरक्षा भी कड़ी कर दी गई है.

इलाज के लिए हुए थे डिस्चार्ज

पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, 12 नवंबर को तबीयत बिगड़ने के बाद धर्मेंद्र को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था. हालांकि, बाद में परिवार के कहने पर उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया था . जिसके बाद उनका इलाज घर पर ही जारी था, जहां आज उनका निधन हो गया.धर्मेंद्र ने अपने 6 दशक से अधिक के करियर में भारतीय सिनेमा को कई यादगार फिल्में दी हैं.

अलवर के वेंकटेश बालाजी मंदिर में पहुँची दुर्लभ पुंगनूर गाय

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अलवर शहर स्थित वेंकटेश बालाजी दिव्य धाम मंदिर में आंध्र प्रदेश की प्रसिद्ध पुंगनूर गाय लाई गई है. यह नस्ल देशभर में अपनी दुर्लभता और खूबसूरत छोटे आकार के लिए जानी जाती है. मंदिर प्रशासन ने बताया कि इन गायों को विशेष रूप से यहाँ लाया गया है, जिसके बाद मंदिर आने वाले लोग लगातार इनको देखने पहुंच रहे हैं. इन गायों का आगमन मंदिर परिसर में एक नया और दिव्य आकर्षण बन गया है.
मंदिर समिति के अनुसार पुंगनूर नस्ल के एक बछड़े और एक बछड़ी को लाया गया है. इनका नाम क्रमशः राधा और कृष्ण रखा गया है. इनका छोटा आकार और आकर्षक रूप इन्हें देखने वालों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है. ये गायें भारतीय देसी नस्लों में सबसे छोटी मानी जाती हैं.
दूध में 8% फैट, औषधीय गुणों से भरपूर
हालांकि यह गाय प्रतिदिन केवल 2 से 2.5 लीटर दूध देती है, लेकिन इसका दूध सामान्य गायों के मुकाबले अधिक पौष्टिक माना जाता है. जहां सामान्य दूध में 3–5% फैट होता है, वहीं पुंगनूर नस्ल के दूध में 8% तक फैट पाया जाता है, जिसे अत्यधिक पौष्टिक और औषधीय गुणों से युक्त माना जाता है. यह दूध शारीरिक विकास और प्रतिरक्षा के लिए बेहद उत्तम माना जाता है.
कम जगह और कम भोजन में भी रह सकती है
इस गाय की सबसे बड़ी विशेषता इसका छोटा आकार है. आमतौर पर इनकी ऊंचाई 24 से 27 इंच और वजन 125 से 150 किलो तक होता है. इस कारण यह कम जगह में भी आसानी से पालने योग्य है और शहरी क्षेत्रों में गोपालन के लिए एक उत्तम विकल्प है.
महंत सुदर्शनाचार्य का बयान
मंदिर के महंत सुदर्शनाचार्य ने बताया कि पुंगनूर गाय छोटी जगह में भी आराम से रह सकती है. मंदिर में दोनों बछड़ा–बछड़ी फिलहाल एक कमरे में रखे गए हैं. ये कम भोजन लेती हैं और स्वास्थ्यवर्धक दूध देती हैं. लोगों के लिए यह आकर्षण का बड़ा कारण बनी हुई है.
उन्होंने कहा –“ये गाय घर में भी आराम से घूम-खेल सकती है, जिससे घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है.”
पीएम मोदी के आवास पर भी मौजूद है पुंगनूर गाय
यह भी उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सरकारी आवास पर भी पुंगनूर नस्ल की गायें हैं, जिनके साथ उनके कई फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे, जिससे इस नस्ल की प्रसिद्धि और बढ़ी है.
मूत्र में एंटीबैक्टीरियल गुण, किसान करते उपयोग
पुंगनूर गाय के मूत्र में एंटीबैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं. किसान इसका उपयोग फसल पर छिड़काव के रूप में करते हैं, जिससे फसल को कीटों से सुरक्षा मिलती है और यह जैविक खेती को बढ़ावा देता है.

दृष्टिकोण विरोध एस.आइ.आर.का या चुनाव सुधार की कवायद का

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(डॉ. सुधाकर आशावादी-विनायक फीचर्स)

लम्बे समय से देश में फर्जी मतदान का ढिंढोरा पीटकर अनेक राजनीतिक दल कभी अपनी हार का कारण ई.वी.एम. को बताते रहे, कभी कार्यपालिका के प्रशासनिक अधिकारियों व कर्मचारियों को मतदान में गड़बड़ी का आरोपी प्रचारित करते रहे। मतदाता सूची में गड़बड़ के आरोपों पर ध्यान देते हुए भारत में चुनाव सुधार की प्रक्रिया हेतु विशेष गहन पुनरीक्षण हेतु चुनाव आयोग ने कमर कसी, जिसके उपरांत बिहार में चुनाव हुए। उसके बाद देश के अनेक राज्यों में एस.आइ.आर. के माध्यम से मतदाता सूची को अद्यतन करने की कवायद चल रही है।
एक व्यक्ति एक मतदान अधिकार की स्पष्ट नीति के तहत एक से अधिक स्थानों पर मतदाता सूची में नाम होना या मृतक अथवा पलायन कर गए मतदाता का नाम संबंधित क्षेत्र की मतदाता सूची से हटाकर मतदाता सूची में प्रामाणिक परिवर्तन करना विशेष गहन पुनरीक्षण का प्रमुख उद्देश्य है।
विडंबना यह है कि जो लोग मतदाता सूची में गड़बड़ी और वोट चोरी का आरोप लगाकर चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा कर रहे थे, वहीं मतदाता सूची को अद्यतन करने हेतु की जा रही एस.आइ.आर. का विरोध करके चुनाव आयोग के विरुद्ध अराजक प्रदर्शन करने से बाज नहीं आ रहे हैं। प्रथम दृष्टया यही प्रतीत होता है, कि देश के विभिन्न राज्यों में चुनाव आयोग के निर्देशन में चल रही एस.आइ.आर. में जुटे कर्मचारियों की निष्ठा और कर्तव्यपरायणता को संकीर्ण सियासत अपमानित करके देश में अराजकता का वातावरण बनाना चाहती है तथा आम आदमी को भ्रमित करने का प्रयास कर रही है। वह ईमानदारी से चुनाव सुधार प्रक्रिया के पक्ष में नहीं है। यदि चुनाव सुधार के पक्ष में होती, तो अनेक क्षेत्रीय राजनीतिक दल पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश तथा अन्य प्रदेशों में एस.आइ.आर. का विरोध न करते, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से मतदाताओं की पहचान में सहयोग करते।
इतिहास साक्षी है, कि देश के दूरदराज के क्षेत्रों में बरसों तक देश में मतपत्रों के माध्यम से चुनाव कराए जाने वाली दीर्घ प्रक्रिया में आम आदमी की मतदान स्थल तक पहुँच नहीं हो पाती थी। गांवों के दबंग जातीय क्षत्रप अपनी मनमानी किया करते थे। बूथ कैप्चरिंग, मतपत्र छीनने और मतपेटियां चोरी करके चुनाव परिणामों को प्रभावित किया जाता था। मतगणना स्थल पर थकाऊ प्रक्रिया में दिन रात मतपत्रों की गिनती करके चुनाव परिणाम जारी होते थे, जिनमें गड़बड़ी की आशंका रहती थी।
अब मतदान पर्यवेक्षकों, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की देखरेख में चुनाव कर्मियों को मतदान और मतगणना के लिए विशेष प्रशिक्षण देकर निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराई जाती है। इस प्रक्रिया में जुड़े कर्मियों के अथक प्रयासों से सटीक चुनाव परिणाम आते हैं, किन्तु मतदाताओं द्वारा नकारे जाने से आहत अराजक तत्व अपनी हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़कर अपनी रातों की नींद और दिन का चैन गंवाकर चुनाव में ड्यूटी देने वाले कर्मचारियों की निष्ठा और कर्तव्यपरायणता पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा करने में पीछे नहीं रहते। मतदाता सूचियों में यदि गड़बड़ है तथा एक व्यक्ति का एक से अधिक मतदाता सूची में नाम है, तो इसके लिए वह मतदाता दोषी क्यों नहीं है, जो एक मत के स्थान पर अधिक मत देने का दुस्साहस करता है। आम मतदाता तो ऐसा कर नहीं कर सकता। समझा जा सकता है, कि किसी राजनीतिक दल से जुड़ा व्यक्ति ही ऐसा दुस्साहस करने की हिम्मत जुटा सकता है। बहरहाल ऐसा प्रतीत होता है, कि एस.आइ.आर. का विरोध वही कर रहे हैं, जो निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया के पक्षधर नहीं हैं। यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि मतदाता सूचियों का परीक्षण कर रहे बी.एल.ओ. को भी संकीर्ण मनोवृत्ति धारी संदेह के घेरे में खड़ा करने का प्रयास करने से परहेज नहीं कर रहे हैं। उनके आरोपों के अनुसार बी.एल.ओ. विपक्षी दलों के मतदाताओं के वोट काटता है। समझ नहीं आता कि इस प्रकार की सोच सियासी तत्व कैसे रख सकते हैं ? चुनाव प्रक्रिया से जुड़े प्राथमिक कर्मचारी से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक मतदाता सूचियों से मतदाताओं के नाम बिना किसी जांच पड़ताल के कैसे काट सकते हैं ? क्या प्राथमिक कर्मचारी मतदाता सूची का परीक्षण करने से पहले हर मतदाता से यह पूछता है, कि वह किसी राजनीतिक दल का समर्थक है ? क्या मतदान के दिन कोई मतदान कर्मी किसी खास दल के समर्थक मतदाताओं से पूछता है, कि वे किस राजनीतिक दल के पक्ष में मतदान करने आए हैं।
यदि नहीं तो वोट चोरी करने और मतदाता सूचियों के परीक्षण हेतु की जाने वाली एस.आइ.आर. प्रक्रिया पर प्रश्न उठाने का औचित्य क्या है ? लगता है कि अपनी राजनीतिक जमीन खो चुके राजनीतिक दल अपनी नैतिक हार स्वीकार कर चुके हैं तथा जनता के बीच में अपना अस्तित्व सुरक्षित न पाने के कारण देश में अराजकता का वातावरण बनाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि ऐसा न होता, तो वे चुनाव सुधार की प्रक्रिया में विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात एस.आइ.आर. का विरोध करने की जगह चुनाव प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी एवं निष्पक्ष बनाने हेतु चुनाव सुधारों का समर्थन करते। (विनायक फीचर्स)

मॉडल एक्ट्रेस शर्लिन चोपड़ा ने ब्रेस्ट इम्प्लांट हटाने के फैसले पर खुलकर बात की और युवतियों से की खास अपील

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मुंबई। बॉलीवुड एक्ट्रेस और मॉडल शर्लिन चोपड़ा एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह है उनका साहसिक फैसला—अपने 825 ग्राम वजनी सिलिकॉन ब्रेस्ट इम्प्लांट को हटाना। इसके लिए उन्होंने मुंबई के कंट्री क्लब में एक विशेष प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर मीडिया के सामने खुलकर अपनी बात रखी।

शर्लिन ने बताया कि इम्प्लांट्स की वजह से उन्हें लंबे समय से पीठ, सीने, गर्दन और कंधों में लगातार दर्द हो रहा था। उन्होंने कहा, “825 ग्राम सिलिकॉन लेकर चलना मेरे लिए बेहद मुश्किल हो गया था। ऐसा लगता था जैसे सीने पर कोई पहाड़ रखा हो। यह कदम बोल्ड था, लेकिन ज़रूरी भी।”
कई डॉक्टरों से सलाह लेने के बाद मैंने इम्प्लांट हटाने का निर्णय लिया।

शर्लिन चोपड़ा ने आगे बताया कि अब यह भारी बोझ मेरे शरीर से उतर चुका है। हर इम्प्लांट 825 ग्राम का था। उन्हें हटाने के बाद मैं खुद को बेहद हल्का और आज़ाद महसूस कर रही हूँ। सबसे राहत की बात यह है कि अब मेरे शरीर में कुछ भी कृत्रिम नहीं है—सब कुछ नैचुरल है और मेरा अपना है। मैं ईश्वर और अपने प्रशंसकों की आभारी हूँ।”

शर्लिन चोपड़ा ने खास तौर पर युवा लड़कियों को संदेश देते हुए कहा कि दूसरों के कहने, सोशल मीडिया या समाज के दबाव में आकर अपने शरीर के साथ छेड़छाड़ न करें। किसी भी चीज़ का निर्णय जल्दबाजी में न लें। फायदे के साथ नुकसान को भी समझें, दुष्प्रभावों के बारे में जानें और अपने परिवार, दोस्तों व मेडिकल एक्सपर्ट्स से सलाह लिए बिना कोई कदम न उठाएँ। भीड़ का हिस्सा मत बनो—अपनी वास्तविकता की रक्षा करो।”

उन्होंने आगे कहा कि यह सिर्फ खूबसूरती का मामला नहीं, बल्कि एक बड़ा सर्जिकल प्रोसेस है जिसमें जोखिम शामिल होते हैं।
“मैं विज्ञान के खिलाफ नहीं हूँ, पर केवल किसी और को देखकर कुछ भी मत कर लो। सोशल मीडिया की चमक पर आँख बंद करके भरोसा न करें। आपकी नैचुरल खूबसूरती ही आपकी सच्ची ताकत है।”

यह उल्लेखनीय है कि ब्रेस्ट इम्प्लांट एक सर्जिकल प्रक्रिया है, जिसमें सिलिकॉन का उपयोग कर स्तनों के आकार और शेप को बढ़ाया जाता है।

शर्लिन के फैंस भी उनके इस फैसले की सराहना कर रहे हैं और कह रहे हैं, “आखिरकार आपको एहसास हुआ कि आपको किसी बदलाव की ज़रूरत नहीं थी। आप जैसी थीं, वैसी ही खूबसूरत हैं।

गौ गोबर से हरित ऊर्जा (Green Energy): भारत का सतत भविष्य का ईंधन

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भारत में प्रतिवर्ष लगभग ५०० मिलियन टन गौ गोबर उत्पन्न होता है। इसे यदि कूड़ा मानकर फेंक दिया जाए तो यह मीथेन गैस छोड़कर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है, लेकिन यदि इसका वैज्ञानिक उपयोग किया जाए तो यही गोबर भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का सबसे बड़ा स्रोत बन सकता है।१. बायोगैस (Bio-Gas) – घरेलू हरित ईंधन

  • एक औसत देसी गाय प्रतिदिन १०-१२ किलो गोबर देती है।
  • २ किलो गोबर + २ किलो पानी से बने घोल से एक १ घन मीटर बायोगैस प्लांट में १ घन मीटर बायोगैस बनती है।
  • १ घन मीटर बायोगैस = ०.४५-०.५ किलो LPG के बराबर।
  • एक ४ जनों का परिवार ४-५ गायों के गोबर से अपना पूरा रसोई गैस मुफ्त में चला सकता है।

आज देश में ५० लाख से अधिक परिवार स्तर के बायोगैस प्लांट चल रहे हैं। नए मॉडल (जैसे फ्लेक्सी बायोगैस, SINTEC, KVIC फ्लोटिंग ड्रम) इतने आसान हो गए हैं कि छत पर भी लगाए जा सकते हैं।२. CBG (Compressed Bio-Gas) – पेट्रोल-डीज़ल का देसी विकल्प

  • बायोगैस को शुद्ध करके ९५-९८% मीथेन बनाई जाती है, इसे CBG कहते हैं।
  • १ टन गोबर से लगभग ४०-५० किलो CBG बनती है।
  • १ किलो CBG = १.२५ लीटर पेट्रोल या १.४ लीटर डीज़ल के बराबर ऊर्जा देती है।

सरकार का SATAT (Sustainable Alternative Towards Affordable Transportation) योजना के अंतर्गत ५००० CBG प्लांट लगाने का लक्ष्य है।

  • एक ५ टन प्रतिदिन क्षमता वाला CBG प्लांट प्रतिदिन २ टन जैविक खाद भी देता है।
  • अभी तक १०० से अधिक CBG प्लांट चालू हो चुके हैं (Reliance, Indian Oil, Adani, HPCL आदि लगा रहे हैं)।
  • २०३० तक १५ मिलियन टन CBG उत्पादन का लक्ष्य = १५% प्राकृतिक गैस की जगह ले सकता है।

३. बिजली उत्पादन (Bio-CNG से Electricity)

  • १०००% गोबर से चलने वाले बायोगैस प्लांट से बिजली भी बनाई जा सकती है।
  • १ क्यूबिक मीटर बायोगैस से २-२.५ यूनिट बिजली बनती है।
  • महाराष्ट्र के बारामती में १० मेगावाट, राजस्थान में ५ मेगावाट क्षमता के गोबर आधारित पावर प्लांट सफलतापूर्वक चल रहे हैं।

४. जैविक खाद – बोनस लाभबायोगैस प्लांट का बचा हुआ स्लरी रासायनिक खाद से ३०-४०% अधिक उपज देने वाली बेहतरीन जैविक खाद होती है। इससे किसान की खाद का खर्चा भी बच जाता है।५. पर्यावरणीय लाभ

  • १ टन गोबर से बायोगैस बनने पर ३-४ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन रोकता है।
  • पराली जलाने की समस्या भी कम होती है क्योंकि किसान पराली की जगह गोबर बेचकर कमाई करते हैं।
  • मीथेन (जो CO₂ से २५ गुना अधिक ग्लोबल वार्मिंग करती है) को नियंत्रित किया जाता है।

प्रमुख सफल उदाहरण

  1. पुणे के उरुली कांचन में पंडित साठे जी का ३५ साल पुराना बायोगैस प्लांट आज भी चल रहा है।
  2. इंदौर नगर निगम रोज़ ५५० टन गोबर-कचरे से CBG बना रहा है और पूरे शहर की सफाई गाड़ियाँ CBG से चलती हैं।
  3. गुजरात का बनासकांठा डेयरी रोज़ ४० टन गोबर से CBG बना रही है।
  4. हरियाणा के करनाल में गौसंवर्धन केंद्र १०० टन गोबर रोज़ प्रोसेस करता है।

निष्कर्षगौ गोबर कोई अपशिष्ट नहीं, अपार ऊर्जा का खजाना है। यदि भारत अपने ३० करोड़ पशुओं के गोबर का केवल ५०% का भी उपयोग बायोगैस/CBG में कर ले तो:

  • ५० मिलियन टन जैविक खाद
  • २० मिलियन टन CBG (लगभग २५ अरब लीटर पेट्रोल के बराबर)
    -डाइज़ल)
  • १० करोड़ परिवारों को मुफ्त रसोई गैस
  • १०० गीगावाट बिजली क्षमता

यह केवल ऊर्जा क्रांति नहीं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, स्वच्छ भारत और जलवायु परिवर्तन से लड़ाई का त्रिवेणी संगम है।
गौ गोबर सचमुच भारत का “ग्रीन गोल्ड” है।
ॐ गौमातरूपेण संरक्षितं विश्वम्।
जय गौमाता! जय हरित ऊर्जा!