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पर्यावरण संरक्षण – बल्कि समग्र जीव कल्याण का माध्यम

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(निखिलेश महेश्वरी-विनायक फीचर्स)

आज पूरे विश्व में जिस विषय पर सबसे अधिक चर्चा हो रही है, वह है पर्यावरण संरक्षण। परंतु प्रश्न यह खड़ा होता है कि पर्यावरण की रक्षा किससे करनी है? और संकट उत्पन्न किसने किया है? धरती पर रहने वाले समस्त जीव-जंतु प्रकृति द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार जीवन जीते हैं। केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसने अपनी बढ़ती इच्छाओं, लालच और अंधाधुंध उपभोग के कारण पृथ्वी के संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया। इसका परिणाम यह हुआ कि जल, जंगल, जमीन, वायु और ध्वनि जैसे सभी प्रकार के प्रदूषण बढ़ गए और संपूर्ण जीव-जगत एक गंभीर संकट में पहुँच गया।

ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठना भी स्वाभाविक है कि समाधान कहाँ है? इसका उत्तर हमें भारत की प्राचीन, वैज्ञानिक और प्रकृति-सम्मत पर्यावरण दृष्टि में मिलता है। प्रकृति को मातृरूप में देखने वाली भारतीय संस्कृति मनुष्य को प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने का मार्ग दिखाती है। यदि मनुष्य इस भारतीय दृष्टि को अपनाते हुए अपनी जीवनचर्या को पर्यावरण अनुकूल बनाता है, तभी पर्यावरण संरक्षण संभव है। अतः आवश्यक है कि मनुष्य अपनी आदतों, आवश्यकताओं और उपभोग की सीमाओं पर पुनः विचार कर प्रकृति के अनुकूल जीवन को अपनाए। क्योंकि प्रकृति बचेगी तो पृथ्वी बचेगी, और पृथ्वी बचेगी तो ही मानवता सुरक्षित रह पाएगी।

आज विश्व जिन पर्यावरणीय संकटों से जूझ रहा है उसका बड़ा कारण पश्चिमी विकास मॉडल है, जो अधिक से अधिक उपभोग पर आधारित है। वहाँ पेड़, पर्वत, नदियाँ और पशु सबको मनुष्य के उपयोग की वस्तु माना गया है। इसी मानसिकता के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हुआ। विश्व के “जी-7” देश अकेले दुनिया के करीब 80% संसाधनों का उपयोग करते हैं, फिर भी प्रदूषण का दोष विकासशील देशों पर डालते हैं। जब तक विकसित देश अपनी जीवनशैली में संयम और संतुलन नहीं अपनाएँगे, तब तक वैश्विक पर्यावरण संकट का समाधान संभव नहीं होगा।


रासायनिक खेती ने मिट्टी की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित किया है। रासायनिक उर्वरक मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों और केंचुओं को नष्ट कर देते हैं, जिससे मिट्टी का पोषण, नमी और हवा का संतुलन टूट जाता है। कई वर्ष तक रासायनिक खेती करने पर फसलें आकार में बड़ी तो दिखती हैं, पर उनमें पोषक तत्व कम हो जाते हैं। इन रसायनों के अवशेष मानव शरीर में पहुँचकर अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं।

इसी प्रकार जंगलों का विनाश भी बड़ी समस्या बन चुका है। स्वतंत्रता के समय भारत में लगभग 22% भूमि पर जंगल थे, परंतु प्राकृतिक जंगल लगातार कम होते जा रहे हैं। कृत्रिम वृक्षारोपण से आँकड़े भले ही बढ़े हुए दिखें, लेकिन प्राकृतिक जंगलों की जैव विविधता और मिट्टी को जो लाभ मिलता था, वह अब कम हो रहा है।

मनुष्य आज अपने सौंदर्य, सजावट और विलासिता के लिए, जानवरों के विनाश का कारण बन रहा है। पशुओं की चमड़ी, हड्डियों, तेल और हाथीदाँत से बनने वाले उत्पादों ने कई प्रजातियों को खत्म होने की कगार पर पहुँचा दिया है। यह उपभोग पर आधारित सोच का ही दुष्परिणाम है।

इसके विपरीत भारतीय संस्कृति हर जीव को प्रकृति के संतुलन का आवश्यक अंग मानती है। यहाँ पेड़ों, नदियों, पर्वतों को माता कहा गया। साँपों को भी नागपंचमी पर दूध पिलाकर यह संदेश दिया जाता है कि हर प्राणी का अस्तित्व मूल्यवान है। जनमेजय के सर्प-यज्ञ को रोकने वाले आस्तिक मुनि का संदेश भी यही था कि किसी भी प्रजाति का विनाश पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ देता है।

मनुष्य आज सौन्दर्य प्रसाधन, सजावट की वस्तुओं और विलासिता के लिए अनेक जीवों का विनाश कर रहा है। जानवरों की चमड़ी, तेल, हड्डियों और खून से बनने वाले उत्पादों तथा हाथीदाँत के व्यापार ने कई प्रजातियों को विनाश के कगार पर ला दिया है। यह पश्चिमी उपभोग आधारित सोच का परिणाम है।

भारतीय दृष्टि इसके विपरीत हर जीव को उद्देश्यपूर्ण मानती है। धरती, नदियाँ और वृक्षों को माता मानने की परंपरा ने समाज में प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना जगाई। यहाँ तक कि साँपों और नागों को भी दूध पिलाकर उनके अस्तित्व को महत्व दिया गया, क्योंकि हर जीव प्रकृति के संतुलन का भाग है। जनमेजय के सर्प-यज्ञ को रोकने वाले आस्तिक का संदेश भी यही था कि किसी प्रजाति का विनाश पूरे पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ देता है।

महात्मा गांधी आजीवन कहते रहे कि भारत का विकास गाँवों के आधार पर होना चाहिए। उनका मानना था कि भारतीय जीवन-दृष्टि के आधार पर विकसित समाज ही अंतिम व्यक्ति तक सुख और सुविधा पहुँचा सकता है। परंतु पश्चिमी मॉडल को अपनाने से शहर तो चमक उठे, पर गाँव, किसान और वन क्षेत्रों में रहने वाले लोग पिछड़े ही रह गए। इससे सामाजिक और पर्यावरणीय असंतुलन दोनो बिगड़ गया।

जंगलों की कटाई का दोष अक्सर गरीबों पर लगाया जाता है, जबकि वास्तविक कारण अमीरों की उपभोगवादी प्रवृत्ति है। भारी लकड़ी के फर्नीचर, सजावटी वस्तुएँ, बड़े पलंग, और टिश्यू पेपर बनाने के लिए कटने वाले अनगिनत पेड़। स्पष्ट है कि पर्यावरण संकट गरीबों के कारण नहीं, बल्कि अमीरीकरण के कारण है। जबकि हमारे पूर्वजों ने कहा “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः” अर्थात् त्यागपूर्वक उपभोग करो।

भारतीय चिंतन में मनुष्य को प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका सहयात्री और संरक्षक माना गया है। इसी कारण यहाँ मितव्ययिता, अपरिग्रह और न्यूनतम संग्रह की भावना को सर्वोपरि बताया गया है।

भारतीय दर्शन में यह संदेश दिया गया है कि लेने से अधिक लौटाना ही सच्चा धर्म है। इसी संदर्भ में भगवद्गीता की यह प्रार्थना इसका स्पष्ट प्रमाण है—
“जीवने यावदादानं स्यात्, प्रदानं ततोऽधिकम्।
इत्येषा प्रार्थनास्माकं भगवन् परिपूर्यताम्॥” जिसका अर्थ है “जीवन में हम जितना लेते हैं, उससे अधिक लौटाने की क्षमता और संकल्प हमें प्राप्त हों, भगवान, हमारी यह प्रार्थना पूर्ण करें।” इसी मार्ग पर चलते हुए मनुष्य अपने स्वभाव में परिवर्तन ला सकता है और पृथ्वी को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित, स्वस्थ और संतुलित रूप में संरक्षित कर सकता है।
पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत हमें अपने स्वयं के घर से ही करनी होगी। प्रकृति की रक्षा और संरक्षण प्रत्येक मनुष्य का मौलिक कर्तव्य है, परंतु आज मनुष्य इसी कर्तव्य से विमुख होता जा रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि हमारी पारंपरिक जीवन शैली पूरी तरह प्रकृति आधारित थी और अब हमें उसी दिशा में लौटने की आवश्यकता है।
इस परिवर्तन की शुरुआत बहुत सरल कार्यों से हो सकती है,जैसे पानी बचाएँ, प्लास्टिक हटाएँ और पेड़ लगाएँ।
दूध-सी बहती नदी की धार पुकार रही बार-बार,
दूषित कर तूने मनुष्य, उसे कर दिया है लाचार।

पीने योग्य जल पृथ्वी पर सीमित मात्रा में उपलब्ध है और इसकी कमी निरंतर बढ़ती जा रही है। पानी को हम बना तो नहीं सकते, लेकिन समझदारी से इसका संरक्षण अवश्य कर सकते हैं।
प्रयागराज में कांग्रेस महासमिति की बैठक चल रही थी। मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय, मदन मोहन मालवीय और महात्मा गांधी सहित कई प्रमुख नेता उपस्थित थे। भोजन के बाद जब हाथ धोने का समय आया, तो जवाहरलाल नेहरू ने एक लोटा पानी लेकर गांधीजी के हाथ धुलाएं। गांधीजी चर्चा में इतने मग्न थे कि एक लोटा पानी अनजाने में समाप्त हो गया। नेहरू जी दूसरा लोटा लाने लगे, तभी गांधीजी का ध्यान गया और वे तुरंत बोले- “मैं एक लोटे पानी में हाथ नहीं धो सका, यह मेरे लिए अपराध है।”

नेहरू जी आश्चर्य से बोले- “बापू, यह प्रयागराज है। यहाँ तो गंगा-यमुना बह रही हैं, इतनी चिंता क्यों?”
गांधीजी ने शांत स्वर में उत्तर दिया- “गंगा-यमुना केवल मेरे लिए नहीं बहतीं। करोड़ों मनुष्य, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे सभी इन्हीं से जीवन पाते हैं। यदि मैं आवश्यकता से अधिक पानी लेता हूँ, तो किसी और का हिस्सा कम कर देता हूँ।”
गांधीजी का यह प्रसंग इस बात का संदेश है कि प्राकृतिक संसाधन केवल मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण प्रकृति के प्रत्येक जीव के लिए समान रूप से बने हैं। इसलिए इनका उपयोग हमेशा संयम और जिम्मेदारी के साथ करना चाहिए।
पॉलिथीन का अत्यधिक उपयोग आज कचरा प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। इसलिए प्रभावी कचरा प्रबंधन के साथ-साथ प्लास्टिक उन्मूलन की दिशा में ठोस कदम उठाना अनिवार्य है।

प्लास्टिक के स्थान पर पर्यावरण अनुकूल विकल्प अपनाना होगा, पॉलिथीन का न्यूनतम उपयोग करना होगा, और पुनर्चक्रण की संस्कृति विकसित करना होगी। इन्हें ही समाधान का मूल मंत्र मानकर कार्य करना होगा।
पौधारोपण, वृक्षारोपण और जैविक कृषि भारतीय संस्कृति के मूल में रहे हैं। हमारे यहाँ पेड़ केवल पर्यावरणीय आवश्यकता के लिए नहीं, बल्कि लोक कल्याण की भावना से प्रेरित होकर लगाए जाते थे। इतिहास में अहिल्याबाई होल्कर जैसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जिन्होंने वृक्षारोपण को समाज हित का महत्वपूर्ण कार्य माना।

भारतीय परंपरा में पेड़ों की समूह-रचना का भी विशेष महत्व रहा है। पंचवटी, त्रिवेणी जैसे वृक्षसमूह इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ऐसे समूह केवल धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीक ही नहीं थे, बल्कि उनमें इस तरह के वृक्ष लगाए जाते थे कि पक्षियों और जीव-जंतुओं को वर्ष भर भोजन और आश्रय मिल सके। इस प्रकार भारतीय अवधारणा में वृक्षारोपण केवल प्रकृति-संरक्षण नहीं, बल्कि समग्र जीव कल्याण का माध्यम रहा है। “हमारे द्वारा उठाए गए ये छोटे-छोटे कदम ही पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।”

भारत का चिंतन समग्रता पर आधारित है। समय बदल गया है, पर हमारी प्रकृति-सम्मत जीवन-दृष्टि आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। अब आवश्यकता है कि भारत एक ऐसा विकास मॉडल प्रस्तुत करे जिसमें पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था,तीनों का संतुलन हो। यह दायित्व हम सबका है। यदि हम अपनी परंपरा के सिद्धांतों को अपनाएँगे, तो निश्चित ही एक स्वस्थ, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल भविष्य का निर्माण कर पाएँगे। (विनायक फीचर्स)

नेशनल हेराल्ड केस : भ्रष्टाचार या राजनीतिक प्रतिशोध

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(मनोज कुमार अग्रवाल -विनायक फीचर्स)

नेशनल हेराल्ड मामले में श्रीमती सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती दिखाई दे रही हैं। दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने नेशनल हेराल्ड केस में मामला दर्ज किया है। आरोपों के मुताबिक एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड की दो हजार करोड़ रुपये की संपत्ति 50 लाख रुपये में खरीदी गई थी। दोनों नेताओं के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने नई प्राथमिकी दर्ज की है। इस में सोनिया और राहुल के अलावा कुल छह अन्य लोगों और तीन कंपनियों के नाम शामिल हैं।
दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और सोनिया गांधी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। आर्थिक अपराध शाखा ने राहुल और सोनिया गांधी समेत 9 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। आरोपों के मुताबिक एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिडेट की दो हजार करोड़ रुपये की संपत्ति महज 50 लाख रुपये में हड़प ली गई थी। इस मामले में एजेएल ने 6 लोगों और 3 कंपनियों को आरोपी बनाया है।नेशनल हेराल्ड केस की जांच कर रही इडी की शिकायत पर दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने केस दर्ज किया है। कांग्रेस पार्टी से जुड़ी एसोसिएटेड जर्नल्स को धोखाधड़ी से कब्जाने की साजिश का आरोप लगा है।
सूत्रों के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने नेशनल हेराल्ड केस की जांच पूरी करने के बाद अपनी रिपोर्ट दिल्ली पुलिस को सौंपी थी। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने 3 अक्टूबर को प्राथमिकी दर्ज की। इस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि कांग्रेस के स्वामित्व वाली संस्था एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड का अधिग्रहण धोखाधड़ी के जरिए किया गया। एसोसिएट जर्नल की कुल संपत्ति लगभग 2000 करोड़ रुपये बताई गई है। यह अधिग्रहण यंग इंडियन के माध्यम से किया गया था, जिसमें गांधी परिवार की 76 फीसदी हिस्सेदारी बताई जाती है।
नई एफआईआर में सोनिया और राहुल के अलावा इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के प्रमुख सैम पित्रोदा और तीन अन्य व्यक्तियों के नाम भी दर्ज किए गए हैं। जिन कंपनियों को एफआईआर में शामिल किया गया है, उनमें एजेएल, यंग इंडियन और डोटेक्स मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं।
एफआईआर में आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और विश्वासघात जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। ​इडी ने 9 अप्रैल,2025 को सोनिया गांधी, राहुल गांधी, सुमन दुबे, सैम पित्रोदा और डोटेक्स के प्रमोटर के खिलाफ नेशनल हेराल्ड/एसोसिएटेड जर्नल्स प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में एक चार्जशीट दायर की थी। ताज़ा एफआईआर में सोनिया गांधी (आरोपी संख्या 1) राहुल गांधी (आरोपी संख्या 2)सुमन दुबे (आरोपी संख्या 3) सैम पित्रोदा (आरोपी संख्या 4)​ मेसर्स यंग इंडियन (आरोपी संख्या 5)​ मेसर्स डोटेक्स मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड (आरोपी संख्या 6)सुनील भंडारी (आरोपी संख्या 7)बनाए गए हैं।
आरोप है कि कोलकाता स्थित तीन फर्जी कंपनियों के माध्यम से यंग इंडियन को 1 करोड़ रुपये दिए गए और सिर्फ 50 लाख रुपये में एसोसिएट जर्नल का अधिग्रहण किया गया, जबकि एसोसिएट जर्नल की संपत्ति 2000 करोड़ रुपये आंकी गई है। माना जा रहा है कि दिल्ली पुलिस जल्द ही एजेएल के शेयरधारकों से पूछताछ कर सकती है।
गांधी परिवार पर आरोप है कि इस संपत्ति को हड़पने के लिए यंग इंडियन और डोटेक्स मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड नाम का इस्तेमाल किया गया। ये कंपनियां कथित तौर पर कोलकाता की शेल कंपनियां हैं, जिसने यंग इंडिया को एक करोड़ रुपये दिए थे। जिससे गांधी परिवार ने कांग्रेस को 50 लाख रुपये देकर एसोसिएट जर्नल को कथित तौर पर 2,000 करोड़ रुपये की संपत्ति खरीदने के लिए कहा था।
गौरतलब है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1938 में नेशनल हेराल्ड अखबार की शुरूआत की थी। इसकी संपत्ति दिल्ली, मुंबई, लखनऊ समेत कई शहरों में फैली थी। एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड नाम की कंपनी अखबार के प्रबंधन का जिम्मा संभालती थी। आरोपों के मुताबिक जिस वक्त नेशनल हेराल्ड की संपत्ति गांधी परिवार को महज 50 लाख रुपये में बेची गई उस वक्त उसकी कीमत 2,000 करोड़ रुपये थी।
नेशनल हेराल्ड केस में 2008 से 2014 के बीच मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप हैं। वर्ष 2014 में भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी की निजी शिकायत के आधार पर दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने इस मामले पर संज्ञान लिया था। 9 अप्रैल को गांधी परिवार समेत अन्य लोगों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। गांधी परिवार ने पटियाला हाउस कोर्ट के आदेश को दिल्ली उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट दोनों में चुनौती दी, लेकिन अदालतों ने कोई राहत नहीं दी। ​चूंकि यह मामला हजारों करोड़ की एजेएल की संपत्तियों और शेयरों के रूप में अपराध की आय बनाने, कब्जे और उपयोग से संबंधित है, इसलिए ₹ 752 करोड़ मूल्य की एजेएल की संपत्तियों को सुरक्षित करने के लिए इडी ने 20 नवंबर 2023 को अटैच करने का आदेश जारी किया था, जिसकी निर्णायक प्राधिकारी ने पुष्टि कर दी है।
​इडी की जांच रिपोर्ट आयकर विभाग के यंग इंडियन मामले में 27 नवंबर 2017 के आदेश को और आगे बढ़ाती है। 2017 में, आईटी विभाग ने यंग इंडियन के हाथों एजेएल की संपत्तियों के अवैध अधिग्रहण पर ₹414 करोड़ से अधिक की बड़ी टैक्स चोरी पाई थी। हालांकि इडी के आरोपों को कांग्रेस पार्टी लंबे समय से खारिज करती आ रही है। कांग्रेस का कहना है कि केंद्र की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी एजेंसियों का इस्तेमाल कर गांधी परिवार को परेशान कर रही है। कांग्रेस ने लगातार आरोपों को गलत बताया है और इडी पर सरकार के कहने पर राजनीतिक चाल चलने का आरोप लगाया है। दूसरी तरफ बीजेपी इसे कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार का भ्रष्टाचार बताती रही है।
राजनीतिक हल्के में ताजा एफआईआर से हड़कंप मच गया है। कयास है कि राहुल गांधी को नेशनल हेराल्ड मामले के आगे बढ़ने पर नेता प्रतिपक्ष पद भी छोड़ना पड़ सकता है। संभावना है कि अब सरकार विपक्ष पर हावी होने के लिए नई स्टेट्रजी बना कर काम कर रही है और जल्द ही कुछ अहम बिल सरकार संसद में लाएगी और अपने अजेंडा को प्रभावी बनाएगी।

प्राकृतिक खेती के लिए गौ पालन आवश्यक है

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02 दिसंबर 2025, भोपाल: प्राकृतिक खेती के लिए गौ पालन आवश्यक है – उप मुख्यमंत्री शुक्ल – मध्य प्रदेश के उप मुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने बसामन मामा गो-अभयारण्य का भ्रमण करते हुए कहा कि बसामन मामा गो-अभयारण्य के आसपास का क्षेत्र विन्ध्य में प्राकृतिक खेती का केन्द्र बनेगा। प्राकृतिक खेती के लिए गौपालन आवश्यक है। कृषि क्षेत्र को मजबूत करने के लिए भी पशुपालन आवश्यक है। बसामन मामा गो-अभयारण्य में 25 दिसंबर को स्व. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म-दिन मनाया जायेगा। इस दिन अभ्यारण्य में प्राकृतिक खेती का सम्मेलन आयोजित किया जायेगा। सम्मेलन में कृषि विशेषज्ञ तथा प्राकृतिक खेती से जुड़े किसान भाग लेंगे। सम्मेलन क्षेत्र में प्राकृतिक खेती के विकास के प्रयासों को गति देगा।

खेत उपकरण

उप मुख्यमंत्री शुक्ल ने कहा कि बसामन मामा गो-अभयारण्य में 8 हजार से अधिक निराश्रित गौवंश को आश्रय दिया गया है। इनके गोबर और गोमूत्र का उपयोग करके आसपास के क्षेत्र को रासायनिक खाद के उपयोग से मुक्त किया जा सकता है। गो-अभयारण्य में प्राकृतिक खेती और जैविक खेती को बढ़ावा देने के साथ दुधारु पशुओं के नस्ल सुधार, महिला स्व-सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं के सशक्तिकरण पर भी बल दिया जा रहा है। गो-अभयारण्य के पांचों प्रकल्प पूरी क्षमता से कार्य कर इसे आदर्श गौशाला बना रहे हैं। बसामन मामा गो-अभयारण्य आसपास के क्षेत्रों के लिए प्राकृतिक खेती का केन्द्र बनेगा।

उप मुख्यमंत्री शुक्ल ने कहा कि 25 दिसंबर को अटल जी के जन्म-दिन पर एक विशाल कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इसकी सभी तैयारियां समय पर पूरी कर लें। निर्माणाधीन भोजन शाला का निर्माण अनिवार्य रूप से पूरा करायें। गो-अभयारण्य में बिजली की निर्बाध आपूर्ति की व्यवस्था करें। विद्युत सब स्टेशन का निर्माण कार्य स्वीकृत हो गया है। एसडीएम सिरमौर तत्काल निर्माण कार्य के लिए जमीन उपलब्ध करायें। विद्युत मंडल के अधिकारी तत्काल निर्माण कार्य दो माह में प्रारंभ करें।

उप मुख्यमंत्री  शुक्ल ने गौशाला का भ्रमण कर निर्माण कार्यों का जायजा लिया। उप मुख्यमंत्री ने पानी की आपूर्ति, परिसर की साफ-सफाई तथा सौन्दर्यीकरण के संबंध में अधिकारियों को निर्देश दिये। इसके बाद उप मुख्यमंत्री ने ग्राम पुरवा में पंचमुखी हनुमना के निर्माणाधीन मंदिर का अवलोकन किया। इसका निर्माण समाजसेवी मनोज शुक्ला द्वारा कराया जा रहा है। उप मुख्यमंत्री ने बसामन मामा धाम पहुंचकर पूजा-अर्चना की तथा क्षेत्र के विकास और कल्याण की कामना की। इस अवसर पर एसडीएम सिरमौर दृष्टि जायसवाल, कार्यपालन यंत्री हाउसिंग बोर्ड  अनुज प्रताप सिंह, अभय जयरामदास, आशीष शुक्ला तथा अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।

वंदना के. पाटिल को टीवी में देखकर उनके रिश्तेदारों और पड़ोसियों से मिली खूब प्रसंशा

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हिंदी और मराठी इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बना रहीं अभिनेत्री वंदना के. पाटिल आज उन चुनिंदा कलाकारों में शामिल हैं जो मेहनत, समर्पण और लगातार सीखने की जिज्ञासा के दम पर आगे बढ़ रहे हैं। फिल्मों, वेबसीरीज़, टीवी शो और म्यूजिक वीडियो हर माध्यम में उन्होंने अपने अभिनय का असर छोड़ा है। एक्टिंग के साथ-साथ वह एसोसिएट डायरेक्टर के तौर पर भी काम कर चुकी हैं और लावणी व बॉलीवुड डांस में उनकी पकड़ उन्हें और भी बहुमुखी बनाती है।

वंदना हर किरदार को निभाने से पहले उसकी मनोवैज्ञानिक परतों को समझती हैं। वह सेट पर सिर्फ अभिनय ही नहीं, बल्कि कैमरा एंगल, फ्रेमिंग और तकनीकी प्रक्रिया पर भी ध्यान देती हैं। अनुभवी कलाकारों को देखकर सीखना, किताबें पढ़ना और संवाद की भाषा को बेहतर बनाना, उनकी रोज़मर्रा की आदतों में शामिल है। नेगेटिव किरदार उनके पसंदीदा हैं क्योंकि ऐसे रोल में एक्सप्रेशन, वाइब्स और एटीट्यूड की चुनौती अधिक होती है, और वह इसे खूब एन्जॉय करती हैं।

उनके करियर में अब तक छह मराठी शो, दो मराठी फिल्में, कई वेबसीरीज़ और हिंदी प्रोजेक्ट शामिल हैं। टीवी शो ‘पार्टनर’ में पुलिस ऑफिसर की भूमिका के दौरान उनकी मुलाकात असरानी और कई प्रतिष्ठित कलाकारों से हुई, जिससे उन्हें काम के दौरान काफी सीख मिली। वंदना की एक हिंदी फिल्म शेमारू ऐप पर रिलीज हो चुकी है, जिसमें उन्होंने एक दमदार कॉप का किरदार निभाया है। आने वाली फिल्मों में ‘एक तू ही निरंकार’ शामिल है, जिसमें वह दिग्गज कलाकार कुलभूषण खरबंदा के साथ दिखाई देंगी। ‘जिला हाथरस’ में वह एक जर्नलिस्ट की महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, जो जल्द ही डीडी वन के ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने वाली है। इसके अलावा एक नई फिल्म की शूटिंग भी जल्द शुरू होने वाली है।

वंदना का सफर जितना मजबूत है, उतना ही संघर्षों से भरा रहा है। शुरुआती दिनों में कई बार उनके पास खर्च करने के लिए सिर्फ दस रुपये ही रहते थे। ऐसे में खाना खाएँ या सफर के लिए टिकट लें। वह टिकट लेना चुनती थीं, क्योंकि उनके लिए काम तक पहुँचना ही सबसे बड़ा लक्ष्य था। बिना टिकिट यात्रा कर वह अपने आदर्शों से समझौता नहीं करना चाहती थी। कई बार सेट पर पहुँचते-पहुँचते ब्रेकफास्ट खत्म हो जाता था और वह भूखे पेट ही पूरे समर्पण के साथ शूट करती थीं। उनका मानना है कि इंडस्ट्री में जो नये कलाकार आते हैं। जिनका कोई गॉडफादर नहीं होता, वे अपने माता-पिता से वादा करके आते हैं कि मेहनत से नाम कमाएँगे। लेकिन कई लोग हालातों में बहकर या किसी की बातों में आकर गलत दिशा में चले जाते हैं। वंदना हमेशा यही सलाह देती हैं कि धैर्य रखो, क्योंकि अवसर देर से सही लेकिन मिलता ज़रूर है।
वह कहती हैं -“अपने जमीर के खिलाफ कोई काम मत करो। ऐसा काम करो कि आईने में खुद को देखकर गर्व महसूस हो, पछतावा नहीं।”
वह आगे कहती है कि इस मायानगरी में संघर्ष जरूर है मगर जब यह देती है तो छप्पड़ फाड़ के देती है।
नासिक की रहने वाली वंदना की अभिनय यात्रा एक इत्तेफाक से शुरू हुई, जब वह मुंबई अपनी सहेली के साथ आई, यहाँ उनकी मुलाकात उनकी सहेली के दोस्त से हुई। जो एक स्टील फोटोग्राफर हैं। वहां एक मराठी सीरियल की शूटिंग हो रही थी। अचानक सीरियल की टीम ने कहा कि दो लाइन का संवाद है कोई करना चाहता है वंदना ने हामी भरी और यह रोल उन्हें मिल गया । बाद में टीवी पर उनको देखकर उनके रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने उनकी खूब प्रसंशा की। यही से उन्हें अभिनय की राह पर आगे बढ़ने का आत्मविश्वास मिला। तब उन्हें यह भी नहीं पता था कि वह शो मराठी का हिट सीरियल था। यही पल उनके करियर की दिशा बदल गया और उन्होंने मुंबई को अपनी कर्मभूमि बना लिया।

आज वंदना के. पाटिल उन अभिनेत्रियों में शामिल हैं जो संघर्षों को कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बनाती हैं। सीखने की निरंतर इच्छा, मेहनत, प्रोफेशनलिज़्म और हर किरदार में डूब कर काम करने का जज़्बा उन्हें नई पीढ़ी की प्रेरणादायक कलाकारों में एक मजबूत स्थान देता है। आने वाले समय में उनके कई प्रोजेक्ट्स रिलीज होंगे और दर्शक उन्हें विभिन्न भूमिकाओं में देखने के लिए उत्साहित हैं।

नगर परिषद और नगर पंचायत चुनाव को लेकर की गई घोषणा , महाराष्ट्र में 2 दिसंबर को रहेगी छुट्टी

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महाराष्ट्र में 2 दिसंबर को नगर परिषद और नगर पंचायत के चुनाव होने हैं। इसी संदर्भ में महाराष्ट्र सरकार की तरफ से सरकारी आदेश जारी करते हुए मतदान के दिन औपचारिक तौर पर छुट्टी घोषित की गई है। यह आदेश उन सभी क्षेत्र पर लागू होगा, जहां पर पहले चरण में नगर परिषद और नगर पंचायत के चुनाव होने हैं। इन चुनावों में मतदाता पर अपने वोट डालने के आधिकार का इस्तेमाल कर सकें इसके लिए महाराष्ट्र सरकार की तरफ से यह अहम फैसला लिया है।

2 दिसंबर को होगा मतदान

शुक्रवार को जारी एक सरकारी प्रस्ताव (GR) के अनुसार, जिन जिलों में मंगलवार (2 दिसंबर, 2025) को मतदान होगा। वहां के कर्मचारी अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए सवेतन अवकाश पाने के हकदार हैं।

246 नगरपालिका परिषदों और 42 नगर पंचायतों में चुनाव

महाराष्ट्र में लंबे समय से लंबित शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकाय चुनावों के पहले चरण में 246 नगरपालिका परिषदों और 42 नगर पंचायतों (नगर परिषदों) के चुनाव होंगे। उद्योग, ऊर्जा और श्रम विभागों ने कहा कि यह निर्णय यह सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है कि सभी पात्र नागरिक अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें।

मतदाताओं के लिए सवेतन अवकाश का प्रावधान

उन्होंने कहा कि पिछले चुनावों में कुछ प्रतिष्ठान सवेतन अवकाश या अवकाश प्रदान करने में विफल रहे थे, जिससे कई लोग अपने मताधिकार से वंचित हो गए थे। सरकारी प्रस्ताव में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के प्रावधानों का भी हवाला दिया गया है, जो मतदान के दिन मतदाताओं के लिए सवेतन अवकाश का प्रावधान करता है।

2 से 3 घंटे की विशेष छुट्टी का भी है प्रावधान

अवकाश संबंधी निर्देश मतदान क्षेत्रों में मतदाता सभी श्रमिकों, कर्मचारियों और अधिकारियों पर लागू होगा, चाहे उनका कार्यस्थल निर्वाचन क्षेत्र के भीतर या बाहर स्थित हो। श्रम विभाग के अंतर्गत आने वाले प्रतिष्ठानों, जिनमें कारखाने, दुकानें, होटल, व्यावसायिक प्रतिष्ठान, आईटी कंपनियां, मॉल और खुदरा दुकानें शामिल हैं। इन सभी इस निर्देश का पालन करना होगा। सरकारी आदेश में कहा गया है कि आवश्यक या निरंतर सेवाएं प्रदान करने वाली संस्थाओं को यदि पूरे दिन की छुट्टी संभव न हो तो 2 से 3 घंटे की विशेष छुट्टी देनी होगी। इसके साथ ही सरकार ने चेतावनी दी है कि यदि शिकायत प्राप्त हुई तो सवेतन अवकाश या पर्याप्त अवकाश प्रदान न करने पर कार्रवाई की जाएगी।

मुंबई सहित 29 नगर निगमों के लिए वोटिंग

सरकारी आदेश में उन जिलों की नगर पालिका परिषदों और नगर पंचायतों की विस्तृत सूची शामिल है। जहां 2 दिसंबर, 2025 को मतदान होगा। पहले दौर के मतदान के बाद 336 पंचायत समितियों, 32 जिला परिषदों और मुंबई सहित 29 नगर निगमों के लिए मतदान होगा।

भारतीय धर्मदर्शन के “कर्म सिद्धांत” का जीवंत विद्यालय है उज्जैन का ऐतिहासिक श्री चित्रगुप्त मंदिर

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(विवेक रंजन श्रीवास्तव -विभूति फीचर्स)

महाकाल की नगरी उज्जैन बाबा महाकाल, देवी हरसिद्धि, चिंतामणि श्री गणेशजी के साथ ही कर्म, न्याय और मोक्ष की गहरी अवधारणाओं से जुड़े भगवान श्री चित्रगुप्त मंदिर के कारण भी विशेष पहचान रखती है। क्षिप्रा नदी के पवित्र तट रामघाट, अंकपात क्षेत्र में स्थित यह मंदिर उन विरले तीर्थों में गिना जाता है, जहाँ मृत्यु के बाद मिलने वाले न्याय, कर्मों के लेखा-जोखा और मोक्ष की परंपरा को महसूस किया जा सकता है। प्राचीन अवंति या उज्जयिनी की इस तपोभूमि को भगवान श्री चित्रगुप्त की साधना का स्थल माना जाता है, जहाँ उन्होंने तपस्या कर सर्वज्ञता और समस्त जीवों के कर्मों का लेखा रखने की दिव्य शक्ति प्राप्त की थी।
मान्यता के अनुसार, सृष्टि की रचना के समय भगवान ब्रह्मा ने दीर्घ तपस्या के दौरान अपने ही मन में अंकित एक दिव्य पुरुष की कल्पना की, वह चित्र मन के अंतरतम में गुप्त हो गया, इसी से “चित्रगुप्त” नाम की उत्पत्ति मानी जाती है।
ब्रह्मा ने इस दिव्य पुरुष को आदेश दिया कि वे महाकाल की नगरी उज्जैन जाकर कठोर तपस्या करें और मानव कल्याण के लिए ऐसी शक्तियाँ अर्जित करें, जिनसे वे समस्त प्राणियों के पाप पुण्य और कर्मों का सूक्ष्मतम लेखा रख सकें। लोक परंपरा में यही स्थान आगे चलकर श्री चित्रगुप्त धाम , धर्मराज चित्रगुप्त मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित हुआ । आज भी भगवान श्री चित्रगुप्त की प्रतिमा को एक हाथ में कर्मों की पुस्तक और दूसरे हाथ से लेखा करते हुए दर्शाया गया है।
उज्जैन का यह मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली की परंपरागत रचना लिए हुए है, जिसमें गर्भगृह, मंडप और ऊँचा शिखर प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। गर्भगृह में स्थापित भगवान चित्रगुप्त की मूर्ति को सफेद संगमरमर की शांत, गंभीर और न्यायमूर्ति भाव वाली प्रतिमा के रूप में वर्णित किया जाता है, जो भक्तों को अपने कर्मों के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देती है। रामघाट स्थित धर्मराज श्री चित्रगुप्त मंदिर में यमराज, धर्मराज और यमुना के साथ चित्रगुप्त की संयुक्त उपासना की परंपरा भी मिलती है, जिससे यह स्थल मृत्यु, धर्म, पवित्रता और न्याय , इन चारों के अनूठे संगम के रूप में देखा जाता है।
कथाओं के अनुसार, उज्जैन के इसी क्षेत्र में भगवान चित्रगुप्त ने दीर्घकालीन तप कर वह दिव्य शक्ति पायी, जिसके बल पर वे यमलोक में प्रत्येक आत्मा के लोक-परलोक के कर्मों का खाता तैयार करते हैं। इसी कारण यहाँ आने वाले श्रद्धालु केवल पूजा ही नहीं, बल्कि आत्म-मंथन, अनुशासित जीवन और सत्यनिष्ठ आचरण का संकल्प भी करते हैं ताकि मृत्यु के बाद उनके पक्ष में उत्तम लेखा लिखा जाए। कायस्थ समाज, जो श्री चित्रगुप्त को अपना आदि देव और कुलदेव मानता है, इस मंदिर को ‘कायस्थों के चार धाम’ के रूप में अग्रणी स्थान देता है , और कार्तिक शुक्ल द्वितीया (चित्रगुप्त पूजा ,यम द्वितीया) पर यहाँ विशेष अनुष्ठानों, लेखनी, बही की पूजा और सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक एकता को व्यक्त करता है।
उज्जैन के धर्मराज चित्रगुप्त मंदिर से कई जीवंत लोककथाएँ भी जुड़ी हैं, जो इसके आध्यात्मिक महत्व को बढ़ाती हैं। एक प्रसिद्ध मान्यता यह है कि वनवास के बाद भगवान राम ने शिप्रा तट पर इसी क्षेत्र में आकर धर्मराज चित्रगुप्त की विशेष पूजा की और अपने पिता दशरथ सहित पूर्वजों का तर्पण कर पितृऋण से मुक्ति की प्रार्थना की थी। इसीलिए आज भी बहुत से लोग यह विश्वास लेकर आते हैं कि शिप्रा में स्नान और चित्रगुप्त मंदिर में विधिवत पूजा तर्पण से पितृदोष शांत होता है और पूर्वजों की आत्माओं को शांति और उन्नति प्राप्त होती है।
आधुनिक समय में इस मंदिर की एक अत्यंत विशिष्ट और चमत्कारिक मानी जाने वाली लोकपरंपरा ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। यहाँ ऐसे अनेक श्रद्धालु पहुँचते हैं जो असहनीय रोग, दीर्घकालीन पीड़ा या जीवन मृत्यु के संघर्ष में उलझे अपने परिजनों के लिए या तो चमत्कारिक स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना करते हैं या फिर शांत, पीड़ामुक्त मृत्यु के रूप में मोक्ष का वरदान माँगते हैं।
प्रचलित विश्वास यह है कि सच्ची आस्था से की गई विशेष पूजा के बाद चौबीस घंटे के भीतर या तो कष्टों से राहत मिलती है या फिर अत्यंत शांतिपूर्ण प्रस्थान का मार्ग खुल जाता है, इसलिए इसे कई लोग रूपक रूप में “मौत का वरदान” माँगने वाला मंदिर भी कहने लगे हैं, जबकि भक्त इसे वास्तव में “मोक्ष और कष्टमुक्ति” की याचना मानते हैं।
स्थानीय परंपरा में यह धारणा भी प्रचलित है कि इस मंदिर के ऊपर से कर्क रेखा गुजरती है, जो इसे ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष ऊर्जा क्षेत्र बनाती है और ग्रहदोषों, विशेषकर कालसर्प, राहु- केतु आदि के समाधान के लिए यहाँ दीपदान और विशेष पूजा कराई जाती है। कई पीढ़ियों से यहाँ सेवा कर रहे पुरोहितों के अनुसार रामघाट का यह मंदिर सैकड़ों वर्षों से नियमित पूजा अर्चना का केंद्र है, और उनके वंश द्वारा सत्रहवीं, अठारहवीं शताब्दी से यहाँ आराधना किए जाने के प्रमाण मिलते हैं। समय समय पर मंदिर का जीर्णोद्धार, नई प्रतिमाओं की प्राणप्रतिष्ठा और ट्रस्ट के गठन जैसी प्रक्रियाएँ भी हुईं, जिनके कारण इसे “श्री चित्रगुप्त धाम” के रूप में व्यवस्थित धार्मिक केंद्र का रूप मिला।
समग्र रूप से देखें तो उज्जैन का श्री चित्रगुप्त मंदिर केवल एक देवालय भर नहीं, बल्कि भारतीय धर्मदर्शन के “कर्म सिद्धांत” का जीवंत विद्यालय है, जहाँ हर दर्शन यह स्मरण कराता है कि मृत्यु के बाद न्याय निश्चित है और उसका आधार हमारे अपने कर्म ही हैं। महाकालेश्वर, कालभैरव और शक्तिपीठों के साथ स्थित यह धाम उज्जैन की बहुरंगी आध्यात्मिक विरासत में उस कड़ी के रूप में जुड़ता है जो भक्ति के साथ-साथ जिम्मेदार, न्यायपूर्ण और नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा देती है । इसलिए जब यह कहा जाता है कि “स्वयं भगवान चित्रगुप्त ने यहाँ तपस्या की थी”, तो इसके पीछे वही भाव निहित है कि यह स्थल मनुष्य को अपने भीतर के न्यायाधीश, अपने ही ‘चित्रगुप्त’ को जगाने की प्रेरणा देता है।
यह मंदिर न केवल कायस्थों के लिए बल्कि समूचे हिंदू समाज,पौराणिक,ऐतिहासिक,पुरातत्व एवं पर्यटन हर दृष्टि से जन महत्व की विरासत है। (विभूति फीचर्स)

जहरीली हवा से घुट रहा मुंबई का दम

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 मुंबई। दिल्ली के बाद अब मुंबई में भी सांसों का संकट बढ़ने लगा है। वायु प्रदूषण के कारण लोगों का दम घुटने लगा है। मुंबई में हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि शहर के ज्यादातर हिस्सों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) खराब से गंभीर स्थित में पहुंच गया है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) ने शहर में ग्रैप-4 (GRAP-4) लागू कर दिया है।

BMC ने इन जगहों पर निर्माण कार्य रोकने का आदेश दिया है। निर्माण कार्य से उठने वाली धूल के कारण शहर में वायु प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। ऐसे में BMC ने 50 से ज्यादा कंस्ट्रक्शन साइट्स पर काम रोकने और उन्हें बंद रखने का नोटिस जारी किया है। BMC के अधिकारी इन सभी साइटों पर नजर रखे हुए हैं।

फ्लाइंग स्क्वाड तैनात

BMC ने बेकरी और मार्बल काटने वाले छोटे उद्योगों से भी सफाई की प्रक्रिया कहीं और शिफ्ट करने की अपील की गई है। BMC के आदेश का पालन न करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

मुंबई के कई वार्ड में फ्लाइंग स्क्वाड तैनात किए गए हैं, जो सभी की निगरानी करते हुए उत्सर्जन पर भी नजर रखेंगे। इस स्क्वाड टीम में इंजीनियर्स, पुलिसकर्मी समेत कई जीपीएस ट्रैक्ड वाहन भी शामिल हैं।

आम लोगों की बढ़ी परेशानी

पिछले कुछ दिनों से मुंबई की हवा काफी खराब हो गई है। शहर का AQI ‘काफी खराब’ से ‘गंभीर’ स्थिति में चल रहा है। इससे लोगों को आंखों में जलन, सांस लेने में समस्या और गले में खराश की समस्या देखने को मिल रही है।

LIVE: PM Modi’s remarks during the felicitation of Thiru CP Radhakrishnan Ji in the Rajya Sabha

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LIVE: PM Modi’s remarks during the felicitation of Thiru CP Radhakrishnan Ji in the Rajya Sabha

गौ तस्करो पर उत्तरप्रदेश पुलिस का कहर

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लखनऊ. यूपी पुलिस ने गौ तस्करों पर शिकंजा कसते हुए वाराणसी और सोनभद्र में अलग-अलग कार्रवाई की. थाना फूलपुर क्षेत्र (वाराणसी) और खलियारी–दरमा मार्ग (सोनभद्र) पर चेकिंग के दौरान तस्करों ने पुलिस पर फायरिंग की, लेकिन पुलिस ने हिम्मत और तत्परता से जवाबी कार्रवाई की. इस कार्रवाई में कई तस्कर घायल और गिरफ्तार हुए, जबकि उनके कब्जे से अवैध हथियार और गोवंश बरामद हुए.
वाराणसी के सिन्धुरिया रोड पर चेकिंग के दौरान पुलिस टीम पर तस्करों ने फायरिंग की. जवाबी कार्रवाई में अभिषेक यादव उर्फ गोलू, जो कई गौ तस्करी मामलों में वांछित था, घायल हो गया. पुलिस ने उसे पकड़कर अस्पताल में उपचार के लिए भेजा, वहीं मौके से अवैध तमंचा और जिंदा कारतूस बरामद किए गए. (रवि पांडेय)

दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता में सुधार जारी

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कोविड लॉकडाउन अवधि को छोड़कर पिछले आठ वर्षों में जनवरी–नवंबर के लिए सबसे कम औसत एक्यूआई दर्ज किया गया; 2025 में केवल तीन दिन ऐसे रहे जिनमें दैनिक औसत एक्यूआई 400 से अधिक था

दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की समग्र वायु गुणवत्ता में सुधार का रुख जारी है और वर्तमान वर्ष के दौरान जनवरी से नवंबर के बीच की अवधि में दिल्ली में आठ वर्षों के दौरान यानी 2018 से 2025 तक (2020 को छोड़कर – कोविड के कारण लॉकडाउन का वर्ष) जनवरी से नवंबर के बीच की अवधि के लिए अपना अब तक का सबसे कम औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) दर्ज किया है।

वर्तमान वर्ष के दौरान जनवरी-नवंबर की अवधि के लिए दिल्ली का औसत एक्यूआई 187 दर्ज किया गया है, जबकि इसी अवधि के दौरान 2024 में यह 201, 2023 में 190, 2022 में 199, 2021 में 197, 2020 में 172, 2019 में 203 और 2018 में 213 था।

जनवरी से नवंबर, 2025 के दौरान सिर्फ तीन दिन ऐसे रहे जब रोज का औसत एक्यूआई 400 से अधिक (‘गंभीर से अत्यधिक गंभीर’ की श्रेणी में) था। 2024 में ऐसे 11 दिन, 2023 में 12 दिन, 2022 में चार दिन, 2021 में 17 दिन, 2020 में 11 दिन, 2019 में 16 दिन और 2018 में ऐसे 12 दिन थे।

इसके अलावा, इस साल अब तक किसी भी दिन दैनिक औसत एक्यूआई 450 से अधिक (‘अत्यंत गंभीर श्रेणी में’) दर्ज नहीं किया गया। 2024 में ऐसे दो दिन (एक्यूआई 450 से अधिक), 2023 में दो दिन, 2022 में शून्य दिन, 2021 में तीन दिन, 2020 में दो दिन, 2019 में पांच दिन और 2018 में शून्य दिन ऐसे थे जब एक्यूआई 450 से अधिक था।

जनवरी से नवंबर (27 नवंबर तक) की अवधि में दिल्ली में पीएम 2.5 सांद्रता का स्तर 2018 के बाद से अब तक की समान अवधि की तुलना में सबसे कम रहा है, जो 2020 (कोविड लॉकडाउन का वर्ष) के बराबर है। दिल्ली में वर्तमान वर्ष में पीएम2.5 का औसत 85 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर देखा गया है, जबकि 2024 में यह 98, 2023 में 90, 2022 में 90, 2021 में 95, 2020 में 85, 2019 में 99 और 2018 में 103 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था।

इसी तरह, जनवरी-नवंबर (27 नवंबर तक) की अवधि में भी दिल्ली में पीएम10 सांद्रता का स्तर 2018 के बाद से (2020 को छोड़कर – कोविड के कारण लॉकडाउन का वर्ष) इसी अवधि की तुलना में सबसे कम देखा गया। दिल्ली में इस साल पीएम10 सांद्रता का स्तर औसतन 183 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया है, जबकि 2024 में यह 205, 2023 में 193, 2022 में 202, 2021 में 200, 2020 में 167, 2019 में 210 और 2018 में 228 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था।

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) वायु प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और इसमें कमी लाने के उद्देश्य से प्रभावी कदम उठाने तथा दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए विभिन्न हितधारकों के साथ मिलकर कार्य कर रहा है। आने वाले दिनों में दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता की स्थिति को और बेहतर बनाने के प्रयासों को और अधिक तेज किया जाएगा।