गांधी परिवार के सबसे करीबी समझे जाने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह बेबाक हैं लेकिन उनकी यही बेबाकी अक्सर पार्टी को संकट में भी डाल देती है। जम्मू-कश्मीर में राहुल गांधी की यात्रा में शामिल हुए दिग्विजय सिंह ने सोमवार को भी ऐसा विवादास्पद बयान दे डाला, परन्तु राहुल गांधी ने मंगलवार को सर्जिकल स्ट्राइक पर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के बयान से पल्ला झाड़ लिया। उन्होंने कहा- कांग्रेस ने सेना के शौर्य पर कभी सवाल नहीं उठाया है।
अगर सेना कुछ करती है तो उस पर सबूत देने की जरूरत नहीं। ये दिग्विजय जी की निजी राय है। मैं इससे सहमत नहीं हूं। राहुल ने यह भी कहा कि कांग्रेस में किसी की बात को दबाया नहीं जाता, जहां चर्चा होगी वहां बेहूदा बात भी होगी। मुझे पार्टी के सीनियर लीडर के लिए ऐसा कहते हुए बुरा लग रहा है, लेकिन दिग्विजय जी ने बेहूदा बात ही कही है। जहां तक दिग्विजय जी के बयान की बात है।
उन्होंने जो सर्जिकल स्ट्राइक पर कहा, उससे हम पूरी तरह डिसएग्री करते हैं। कांग्रेस पार्टी भी इससे सहमत नहीं है। हमारी आर्मी पर हमें पूरा भरोसा है। राहुल से पूछा गया कि दिग्विजय के बयान से पार्टी ने खुद को दूर कर दिया है, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती। इस पर राहुल ने कहा कि हमारी पार्टी डेमोक्रेटिक पार्टी है।
यहां डिक्टेटरशिप नहीं है। हम दूसरे की आवाज दबाकर पार्टी चलाने में यकीन नहीं रखते हैं। यहां लोगों को अपनी बात रखने दी जाती है, चाहे वो पार्टी की सोच से कितनी भी अलग क्यों न हो। दिग्विजय जी ने जो भी कहा वे उनके निजी विचार हैं, लेकिन पार्टी के विचार उनके विचार से ऊपर हैं।सवाल यह भी उठता है कि ‘भारत जोड़ो यात्रा ‘ के दौरान दिग्विजय का दिया हुआ बयान निजी कैसे हो सकता है जबकि कांग्रेस के नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा मुख्य प्रभारी दिग्विजय सिंह ही हैं । उन्होंने घर बैठ कर तो ये बयान दिया नहीं था ।
इसलिये ये सवाल उठना लाजिमी है कि एक जमाने में मध्य प्रदेश में एकछत्र राज करने वाले दिग्विजय सिंह के इस तरह के विवादास्पद बयान देने के पीछे आखिर क्या सोच है और क्या वे इससे पार्टी का वोट बैंक मजबूत कर रहे हैं या फिर उसमें पलीता लगा रहे हैं? हालांकि साल 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही दिग्विजय बीजेपी सरकार पर ऐसे हमलावर बयान देते आये हैं जिनकी खूब आलोचना भी हुई लेकिन पार्टी नेतृत्व ने उन्हें न कभी टोका और न ही कभी रोका। इसलिये दिग्विजय के इस ताजा बयान से पार्टी ने बेशक पल्ला झाड़ने की रस्म अदायगी कर दी लेकिन उसका सियासी मतलब तो यही निकाला जा रहा है कि कांग्रेस इस सरकार के खिलाफ जो आरोप अपने मंच से लगा पाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है उसके लिए दिग्विजय सिंह को सब कुछ बोलने की खुली छूट मिली हुई है। दरअसल, कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा के जम्मू पहुंचते ही दिग्विजय सिंह ने गड़े मुर्दे उखाड़ते हुए मोदी सरकार द्वारा पाकिस्तान पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक पर फिर से सवाल उठाए हैं।
उन्होंने कहा था कि सर्जिकल स्ट्राइक की बात करते हैं कि हमने इतने लोगों को मार गिराया लेकिन इसका आज तक कोई प्रमाण नहीं है। आज तक घटना की जानकारी न संसद में पेश की गई और न ही जनता के सामने रखी गई। सर्जिकल स्ट्राइक की बात करके सिर्फ झूठ बोलने से ही राज कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में राहुल गांधी की यात्रा को अगले छह दिनों में कैसा और कितना समर्थन मिलेगा, ये हम नहीं जानते। लेकिन दिग्विजय ने पाकिस्तान की सीमा से सटे इस राज्य में पुराने आरोपों को दोहराते हुए वहां के मुस्लिमों में मोदी सरकार के खिलाफ नफरत की गंध फैलाने की पुड़िया फिर से खोल दी है।
वे नेता हैं और उन्हें अपनी बात कहने का पूरा हक भी है लेकिन सवाल उठता है कि जिस नाजुक मसले को लेकर न तो उनकी पार्टी ने, न सर्वोच्च न्यायालय ने और न ही मीडिया ने आज तक कोई सवाल उठाया, फिर वे इसे तूल देकर अब सियासत की कौन-सी नई बिसात बिछाना चाहते हैं? यकीनन अगले दो-तीन महीने के भीतर जम्मू-कश्मीर में विधानसभा के चुनाव होने हैं लेकिन सोचने वाली बात ये है कि दिग्विजय के इस बयान से अगर वहां कांग्रेस को अपनी ताकत मजबूत होते हुए दिखती तो वो उनके बयान से पल्ला झाड़ने में इतनी जल्दबाजी नहीं दिखाती। कांग्रेस के कुछ नेता दलील देते हैं कि उनके बयान को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए क्योंकि वे सुर्खियों में बने रहने के लिए अक्सर विवादास्पद बातें कह जाते हैं। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। वह इसलिये कि मनमोहन सिंह सरकार के दौरान उन्होंने ही सबसे पहले देश को ‘भगवा आतंकवाद’ का नाम दिया था और उसके पीछे भी उनकी एक सोच थी। लेकिन उन्होंने जिन लोगों के लिये ये नामकरण किया था, उन्हीं साध्वी प्रज्ञा भारती ने साल 2019 के लोकसभा चुनाव में दिग्विजय को भोपाल से हराकर ये साबित कर दिखाया कि उनका ये स्लोगन कितना बूमरैंग कर गया था।
दिग्विजय ने जम्मू के मंच से राहुल गांधी की मौजूदगी में पुलवामा हमले को लेकर मोदी सरकार पर कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि पुलवामा जो कि पूरे तरीके से आतंक का केंद्र बन चुका है बाहर गाड़ी की चेकिंग होती है वहां एक स्कॉर्पियो गाड़ी उल्टी दिशा से आती है उसकी जांच पड़ताल क्यों नहीं होती और और इसके बाद वो टकराती है और हमारे 40 सीआरपीएफ के जवान शहीद हो जाते हैं। हालांकि उस घटना पर तमाम तरह के शक-शुभहे उठने के बाद मोदी सरकार को चौतरफा क्लीन चिट मिल चुकी है और उसके बाद ही बालाकोट में सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया गया था। लेकिन दिग्विजय सिंह ने उन दोनों घटनाओं पर सवाल उठाकर अपनी ही पार्टी को शर्मिंदगी झेलने पर मजबूर कर दिया है ।
शायद इसीलिए कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश को ट्वीट करके ये सफाई देने पर मजबूर होना पड़ा कि ये पार्टी का स्टैंड नहीं है बल्कि उनके निजी विचार हैं। यहाँ तक कि उन्होंने दिग्विजय सिंह के सामने लगे हुए टी वी पत्रकार के माइक को हटा कर उन्हें बोलने से भी रोक दिया ।बाद में उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि आज वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह द्वारा व्यक्त किए गए विचार कांग्रेस पार्टी के नहीं उनके व्यक्तिगत विचार हैं। 2014 से पहले यूपीए सरकार ने भी सर्जिकल स्ट्राइक की थी। राष्ट्रहित में सभी सैन्य कार्रवाइयों का कांग्रेस ने समर्थन किया है और आगे भी समर्थन करेगी। इसलिये सवाल उठता है कि पार्टी लाइन से अलग हटकर दिग्विजय सिंह अपनी अलग सियासी लाइन क्यों लेते हैं और अगर ऐसा करते हैं,तो क्या कांग्रेस नेतृत्व की उसमें मौन स्वीकृति होती है?
समझना कठिन है कि कांग्रेस अपनी गलतियों से कोई सबक क्यों नहीं सीखती? जो अपनी गलतियों से सबक सीखने के बजाय उन्हें बार-बार दोहराए, उसे और कुछ जो भी कहा जाए, बुद्धिमान तो बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि कांग्रेसी नेता पुरानी गलतियां दोहराने अथवा बेतुके बयान देने का काम इसीलिए करते हैं, क्योंकि स्वयं राहुल गांधी ऐसा करते रहते हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि भारत जोड़ो यात्रा के दौरान उन्होंने अपने वही पुराने बयान दोहराए हैं, जो वह पिछले चार-पांच वर्षों से उठाते आ रहे हैं। कठिनाई यह है कि इस क्रम में वह ऐसे बेतुके सवाल करने में भी संकोच नहीं करते, जिनसे उनकी और कांग्रेस की फजीहत ही होती है। कोई नहीं जानता कि वह इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंच गए कि सैनिकों की भर्ती वाली अग्निवीर योजना सेना को कमजोर करने की साजिश है। आखिर वह ऐसा कैसे सोच लेते हैं? क्या कोई सरकार ऐसा कुछ कर सकती है?
कांग्रेस पार्टी यह नहीं सोचती की उनकी गलत बयानबाजी भाजपा को उनपर प्रत्युत्तर देने व हमला करने का पूरा मौका देती हैं । अब भाजपा उन पर लगातार हमलावर है। मंगलवार को प्रदेश भाजपा कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेने आये केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को राष्ट्र विरोधी यात्रा बताया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति और संगठन भारत के वीर जवानों पर प्रश्नचिन्ह कर रहे हैं। जिन्होंने जीवन का बलिदान दिया हो। देश की एकता और अखंडता बना रखी हो। वहीं, ओसामा बिन लादेन को ओसामा जी कहते हैं। ऐसे लोगों को जितना हम कहें कम होगा। यही कांग्रेस पार्टी का असली चरित्र हैं। अख़बारों में छपे बयान के अनुसार विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा कि दिग्विजय सिंह पर निशाना साध सेना से मांग करते हुए कहा कि अब जब भी सर्जिकल स्ट्राइक हो। पाकिस्तान के आतंकवादी कैंपो को उड़ाया जाए। बम फेंके जाए। तब दिग्विजय सिंह, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल तीनों महापुरुषों को विमान के नीचे बांधकर ले जाएं। उनको भी बमों के साथ पटक दिया जाएं। जिससे यह भारत लौटकर आये तो गिनती अक्षरश: बता दें कि कितने आतंकवादी कैंप उड़े और कितने आतंकवादी मारे। साथ ही कौन कौन वहां आतंकवादियों की मौत के ऊपर आंसू बहाने वाला था। शर्मा ने कहा कि यह भारत की सेना का मनोबल गिराने का बयान देते है, लेकिन सेना का मनोबल गिरने वाला नहीं हैं।
वसंत शब्द का अर्थ है बसंत और पंचमी का पांचवें दिन। इसलिये माघ महीने में जब वसंत ऋतु का आगमन होता है तो इस महीने के पांचवे दिन यानी पंचमी को वसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है। बसन्त उत्तर भारत तथा समीपवर्ती देशों की छह ऋतुओं में से एक ऋतु है। जो फरवरी मार्च और अप्रैल के मध्य इस क्षेत्र में अपना सौंदर्य बिखेरती है।
बसन्त पंचमी का दिन सरस्वती जी की साधना को अर्पित ज्ञान का महापर्व है। शास्त्रों में भगवती सरस्वती की आराधना व्यक्तिगत रूप में करने का विधान है। किंतु आजकल सार्वजनिक पूजा-पाण्डालों में देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापित कर पूजा करने का रिवाज चल पड़ा है। मां सरस्वती का प्रिय रंग पीला है। इसलिए उनकी मूर्तियों को पीले वस्त्र, फूल पहनाए जाते हैं। देश में लोग बसंत पंचमी पर पीले कपड़े पहन कर विद्या की देवी मा सरस्वती की पूजा करते हैं।
माना गया है कि माघ महीने की शुक्ल पंचमी से बसन्त ऋतु का आरंभ होता है। फाल्गुन और चैत्र मास बसन्त ऋतु के माने गए हैं। फाल्गुन वर्ष का अंतिम मास है और चैत्र पहला। इस प्रकार हिंदू पंचांग के वर्ष का अंत और प्रारंभ बसन्त में ही होता है। इस ऋतु के आने पर सर्दी कम हो जाती है। मौसम सुहावना हो जाता है। पेड़ों में नए पत्ते आने लगते हैं। खेत सरसों के फूलों से भरे पीले दिखाई देते हैं। अतः राग रंग और उत्सव मनाने के लिए यह ऋतु सर्वश्रेष्ठ मानी गई है।
भारत में पतझड़ ऋतु के बाद बसन्त ऋतु का आगमन होता है। हर तरफ रंग-बिरंगें फूल खिले दिखाई देते हैं। इस समय गेहूं की बालियां भी पक कर लहराने लगती हैं। जिन्हें देखकर किसान हर्षित होते हैं। चारों ओर सुहाना मौसम मन को प्रसन्नता से भर देता है। इसीलिये वसन्त ऋतु को सभी ऋतुओं का राजा अर्थात ऋतुराज कहा गया है। इस दिन भगवान विष्णु, कामदेव तथा रति की पूजा की जाती है। इस दिन ब्रह्माण्ड के रचयिता ब्रह्मा जी ने सरस्वती जी की रचना की थी। इसलिए इस दिन देवी सरस्वती की पूजा भी की जाती है।
बसन्त पंचमी के पर्व से ही बसंत ऋतु का आगमन होता है। शांत, ठंडी, मंद वायु, कटु शीत का स्थान ले लेती है तथा सब को नवप्राण व उत्साह से स्पर्श करती है। बसन्त ऋतु तथा पंचमी का अर्थ है शुक्ल पक्ष का पांचवां दिन। अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार यह पर्व जनवरी-फरवरी तथा हिन्दू तिथि के अनुसार माघ के महीने में मनाया जाता है।
बसन्त पंचमी का दिन भारतीय मौसम विज्ञान के अनुसार समशीतोष्ण वातावरण के प्रारंभ होने का संकेत है। मकर सक्रांति पर सूर्य के उत्तरायण प्रस्थान के बाद शरद ऋतु की समाप्ति होती है। हालांकि विश्व में बदलते मौसम ने मौसम चक्र को बिगाड़ दिया है। पर सूर्य के अनुसार होने वाले परिवर्तनों का उस पर कोई प्रभाव नहीं है। हमारी संस्कृति के अनुसार पर्वों का विभाजन मौसम के अनुसार ही होता है। इन पर्वो पर मन में उत्पन्न होने वाला उत्साह स्वप्रेरित होता है। सर्दी के बाद गर्मी और उसके बाद बरसात फिर सर्दी का बदलता क्रम देह में बदलाव के साथ ही प्रसन्नता प्रदान करता है।
ग्रंथों के अनुसार देवी सरस्वती विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं। अमित तेजस्विनी व अनंत गुणशालिनी देवी सरस्वती की पूजा-आराधना के लिए माघमास की पंचमी तिथि निर्धारित की गयी है। बसन्त पंचमी को इनका आविर्भाव दिवस माना जाता है। ऋग्वेद में सरस्वती देवी के असीम प्रभाव व महिमा का वर्णन है। मां सरस्वती विद्या व ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं। कहते हैं जिनकी जिव्हा पर सरस्वती देवी का वास होता है। वे अत्यंत ही विद्वान व कुशाग्र बुद्धि होते हैं।
सभी शुभ कार्यों के लिए बसन्त पंचमी के दिन अत्यंत शुभ मुहूर्त माना गया है। बसन्त पंचमी को अत्यंत शुभ मुहूर्त मानने के पीछे अनेक कारण हैं। यह पर्व अधिकतर माघ मास में ही पड़ता है। माघ मास का भी धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। इस माह में पवित्र तीर्थों में स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। दूसरे इस समय सूर्यदेव भी उत्तरायण होते हैं। इसलिए प्राचीन काल से बसन्त पंचमी के दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है अथवा कह सकते हैं कि इस दिन को सरस्वती के जन्म दिवस के रुप में मनाया जाता है।
चूंकि बसन्त पंचमी का पर्व इतने शुभ समय में पड़ता है। अतः इस पर्व का स्वतः ही आध्यात्मिक, धार्मिक, वैदिक आदि सभी दृष्टियों से अति विशिष्ट महत्व परिलक्षित होता है। प्राचीन कथाओं के अनुसार ब्रह्मा जी ने विष्णु जी के कहने पर सृष्टि की रचना की थी। एक दिन वह अपनी बनाई हुई सृष्टि को देखने के लिए धरती पर भ्रमण करने के लिए आए। ब्रह्मा जी को अपनी बनाई सृष्टि में कुछ कमी का अहसास हो रहा था। लेकिन वह समझ नहीं पा रहे थे कि किस बात की कमी है। उन्हें पशु-पक्षी, मनुष्य तथा पेड़-पौधे सभी चुप दिखाई दे रहे थे। तब उन्हें आभास हुआ कि क्या कमी है। वह सोचने लगे कि एसा क्या किया जाए कि सभी बोले और खुशी में झूमे।
ऐसा विचार करते हुए ब्रह्मा जी ने अपने कमण्डल से जल लेकर कमल पुष्पों तथा धरती पर छिडका। जल छिडकने के बाद श्वेत वस्त्र धारण किए हुए एक देवी प्रकट हुई। इस देवी के चार हाथ थे। एक हाथ में वीणा, दूसरे हाथ में कमल, तीसरे हाथ में माला तथा चतुर्थ हाथ में पुस्तक थी। ब्रह्मा जी ने देवी को वरदान दिया कि तुम सभी प्राणियों के कण्ठ में निवास करोगी। सभी के अंदर चेतना भरोगी, जिस भी प्राणी में तुम्हारा वास होगा वह अपनी विद्वता के बल पर समाज में पूज्यनीय होगा। ब्रह्मा जी ने कहा कि तुम्हें संसार में देवी सरस्वती के नाम से जाना जाएगा।
कडकड़ाती ठंड के बाद बसंत ऋतु में प्रकृति की छटा देखते ही बनती है। पलाश के लाल फूल, आम के पेड़ों पर आए बौर, हरियाली और गुलाबी ठंड मौसम को सुहाना बना देती है। यह ऋतु सेहत की दृष्टि से भी बहुत अच्छी मानी जाती है। मनुष्यों के साथ पशु-पक्षियों में नई चेतना का संचार होता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व है। देश के कई स्थानो पर पवित्र नदियों के तट और तीर्थ स्थानों पर बसंत मेला भी लगता है। राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में तो बसंत पंचमी के दिन से ही लोग समूह में एकत्रित होकर रात में चंग ढफ बजाकर धमाल गाकर होली के पर्व का शुभारम्भ करते है।
बसन्त पंचमी के दिन विद्यालयों में भी देवी सरस्वती की आराधना की जाती है। भारत के पूर्वी प्रांतों में घरों में भी विद्या की देवी सरस्वती की मूर्ति की स्थापना की जाती है और वसन्त पंचमी के दिन उनकी पूजा की जाती है। उसके बाद अगले दिन मूर्ति को नदी, तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है। देवी सरस्वती को ज्ञान, कला, बुद्धि, गायन-वादन की अधिष्ठात्री माना जाता है। इसलिए इस दिन विद्यार्थी, लेखक और कलाकार देवी सरस्वती की उपासना करते हैं। विद्यार्थी अपनी किताबें, लेखक अपनी कलम और कलाकार अपने संगीत उपकरणो और बाकी चीजें मां सरस्वती के सामने रखकर पूजा करते हैं।
आज भारत अपना चौहतरवां गणतंत्र दिवस मना रहा है और इतिहासकार दावा करते हैं कि भारत ही विश्व में गणराज्य का जनक है कुछ लोग गणराज्य को शिवजी के गणों से जोड़कर देखते हैं तो कुछ लोग गणेश जी से कुछ का मानना है कि यहां बौद्ध काल एवं उससे भी पहले यथार्थ के धरातल पर गणराज्य की स्थापना हो चुकी थी।
दुनिया के 206 सम्प्रभु राज्यों में से 159 अपने आधिकारिक नाम के हिस्से में “रिपब्लिक” शब्द का उपयोग करते हैं – निर्वाचित सरकारों के अर्थ से ये सभी गणराज्य नहीं हैं, ना ही निर्वाचित सरकार वाले सभी राष्ट्रों के नामों में “गणराज्य” शब्द का उपयोग किया गया हैं। भले राज्यप्रमुख अक्सर यह दावा करते हैं कि वे “शासितों की सहमति” से ही शासन करते हैं, नागरिकों को अपने स्वयं के नेताओं को चुनने की वास्तविक क्षमता को उपलब्ध कराने के असली उद्देश्य के बदले कुछ देशों में चुनाव दिखावा मात्र है ।
गणराज्य वह देश होता है जहां के शासनतन्त्र में सैद्धान्तिक रूप से देश का सर्वोच्च पद पर आम जनता में से कोई भी व्यक्ति ही पदासीन हो सकता है। इस तरह के शासनतन्त्र को गणतन्त्र कहा जाता है। चाबी दे दे भाई के ध्यान रहे कि लोकतंत्र या प्रजातंत्र और गणराज्य दोनों एक नहीं है बल्कि उनमें कुछ अंतर है। लोकतन्त्र वह शासनतन्त्र है जहाँ वास्तव में सामान्य जनता या उसके बहुमत की इच्छा से शासन चलता है। आज विश्व के अधिकान्श देश गणराज्य हैं और इसके साथ-साथ लोकतान्त्रिक भी। भारत स्वयः एक लोकतान्त्रिक गणराज्य है।
हर गणराज्य का लोकतान्त्रिक होना अवश्यक नहीं है। तानाशाही, जैसे हिट्लर का नाज़ीवाद, मुसोलीनी का फ़ासीवाद, पाकिस्तान और कई अन्य देशों में फ़ौजी तानाशाही, चीन, सोवियत संघ में साम्यवादी तानाशाही, इत्यादि गणतन्त्र हैं, क्योंकि उनका राष्ट्राध्यक्ष एक सामान्य व्यक्ति थे। लेकिन इन राज्यों में लोकतान्त्रिक चुनाव नहीं होते, जनता और विपक्ष को दबाया जाता है और जनता की इच्छा से शासन नहीं चलता। पाकिस्तान,चीन ,अफ़्रीका के कई देश,ईरान, बर्मा दक्षिणी अमरीका के कई देश ऐसे ही देशों में शामिल हैं।
हर लोकतन्त्र का गणराज्य होना भी आवश्यक नहीं है। संवैधानिक राजतन्त्र, जहाँ राष्ट्राध्यक्ष एक वंशानुगत राजा होता है, लेकिन असली शासन जन्ता द्वारा निर्वाचित संसद चलाती है, इस श्रेणी में आते हैं। जैसे ब्रिटेन और उसके डोमिनियन :,कनाडा,ऑस्ट्रेलिया,स्पेन
बेल्जियम,नीदरलैंड्स, स्वीडन, नॉर्वे, डेनमार्क,जापान ,कम्बोडिया ,लाओस आदि ऐसे लोकतांत्रिक देश है जो गणतंत्र नहीं हैं ।
पश्चिम के इतिहासकार दावा करते रहे हैं कि विश्व का पहला गणतंत्र राज्य एथेंस था लेकिन भारतीय इतिहासकारों का मानना है कि जब एथेंस का अस्तित्व भी नहीं था तब भारत में लोकतंत्र था और लोकतंत्र की अवधारणा भारत की देन है।
प्रमाण के रूप में महाभारत में इसके सूत्र मिलते हैं। बौद्ध काल में वज्जी, लिच्छवी, वैशाली जैसे गणराज्य लोकतांत्रिक व्यवस्था के उदाहरण माने जाते हैं । वैशाली के तो पहले राजा विशाल को चुनाव द्वारा चुना गया था। इसका मतलब साफ है कि तब से ही वैशाली में गणराज्य की स्थापना हो गई थी
‘अर्थशास्त्र’ नामक प्राचीन पुस्तक में कौटिल्य जिन्हें चाणक्य के नाम से भी जाना जाता है ने लिखा है कि तब गणराज्य दो तरह के होते थे , पहला अयुध्य गणराज्य यानि की ऐसा गणराज्य जिसमें केवल राजा ही फैसले लेते हैं, दूसरा है श्रेणी गणराज्य जिसमें हर कोई भाग ले सकता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी लिच्छवी, बृजक, मल्लक, मदक और कम्बोज आदि जैसे गणराज्यों का उल्लेख मिलता है।
इतना ही नहीं उनसे भी पहले पाणिनी ने गणराज्यों का वर्णन ‘व्याकरण’ में किया है। पाणिनी की अष्ठाध्यायी में जनपद शब्द का उल्लेख अनेक स्थानों पर किया गया है, जिनकी शासनव्यवस्था जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथों में रहती थी।
भारत में बौद्धकाल में 450 ई.पू. से 350 ई. तक चर्चित गणराज्य थे पिप्पली वन के मौर्य, कुशीनगर और काशी के मल्ल, कपिलवस्तु के शाक्य, मिथिला के विदेह और वैशाली के लिच्छवी का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता रहा है। इसके बाद अटल, अराट, मालव और मिसोई गणराज्यों का भी उल्लेख है। वस्तुत: गणराज्य बौद्धकाल में ही नहीं जन्में बल्कि उससे भी पहले विद्यमान थे परंतु बौद्धकाल में और मजबूत हुए।
भारत में गणतंत्र वैदिक काल से चला आ रहा है। एक जानकारी के अनुसार गणतंत्र शब्द का प्रयोग विश्व की पहली पुस्तक ऋग्वेद में चालीस बार, अथर्ववेद में 9 बार और ब्राह्मण ग्रंथों में हुआ है। वैदिक काल में अधिकांश स्थानों पर भारत में गणतांत्रिक व्यवस्था थी।
ऋग्वेद में सभा और समिति में राजा मंत्री और विद्वानों से सलाह मशवरा करते थे समीति ही राज्य के लिए इंद्र का चयन करती थी।तब इंद्र एक पद था।
यूनेस्को ने भी ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है।
सच तो यह है कि यूनान के गणतंत्रों से बहुत पहले ही भारत में गणराज्यों का जाल बिछा हुआ था। यूनान ने भारत को देखकर ही गणराज्यों की स्थापना की थी। यूनान के राजदूत मेगास्थनीज ने भी अपनी पुस्तक में क्षुद्रक, मालव और शिवि आदि गणराज्यों का वर्णन किया है। सिकंदर के भारत अभियान को इतिहास में रूप में प्रस्तुत करने वाले डायडोरस सिक्युलस तथा कॉरसीयस रुफस ने भारत के सोमबस्ती नामक स्थान का उल्लेख करते हुए लिखा है कि वहां पर शासन की ‘
की ‘गणतांत्रिक प्रणाली थी, न कि राजशाही।’ डायडोरस सिक्युलस ने अपने ग्रंथ में भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में अनेक गणतंत्रों की उपस्थिति का उल्लेख किया है।
तो आइए हंसी खुशी मनाते हैं दुनिया के सबसे पहले गणराज्य भारतवर्ष का यह गणतंत्र दिवस।
इन दिनों पाकिस्तान के हालात बेहद खराब चल रहे हैं। अवाम भूख और गरीबी से जूझ रही है। इस बीच पाक अधिकृत कश्मीर गिलगित बाल्टिस्तान से भी पाकिस्तान के खिलाफ आवाज उठने लगी है। पाक अधिकृत कश्मीर के लोगों ने पाकिस्तान सरकार पर उनके साथ भेदभाव करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। यहां के नाराज लाग अब पीओके को भारत में मिलाने की मांग करने लगे हैं। शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए कश्मीरी उन्हें भारत के लद्दाख में एक बार फिर से मिलाने की बात कहनी शुरू कर दी है।पाक अधिकृत कश्मीर गिलगित बाल्टिस्तान में इन दिनों वहां के लोग पाकिस्तान सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते देखे जा रहे हैं। वहां के हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर हैं और जुलूस निकाल रहे हैं। पीओके के लोगों की मांग उन्हें भारत के लद्दाख क्षेत्र में मिला देने की है। इस मांग के तेज होते ही पाकिस्तान सरकार की नींद उड़ी है। इस विरोध प्रदर्शन के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। रैली में लोगों ने कारगिल सड़क को खोलने की मांग की। उन्होंने नारा लगाया कि ‘आर पार जोड़ दो, कारगिल को खोल दो।’
स्पष्ट है कि अब पाकिस्तान से टूटने वाला है और अब वहां बगावत भी शुरू हो गयी है, जिसकी पुष्टि खुद पाकिस्तान की जनता बार-बार खुल कर मीडिया के सामने कर रही है और साथ ही साथ भारत की प्रगति के कसीदे भी पढ़ते नजर आते हैं। पाकिस्तान की मौजूदा सरकार जोकि अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को नहीं संभाल पा रही है उसने Pok का भी बेड़ा गर्ग कर दिया है। जानकारी के अनुसार हाल ही में जब कुछ पाकिस्तानी अफसर Pok पहुंचे थे तो वहीं के लोगों ने उन्हें खदेड़ दिया।
गौरतलब है कि इन दिनों पाकिस्तान में घनघोर खाद्यान्न संकट है। पूरा देश आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। आटा के लिए लंबी कतारें और लोगों में संघर्ष देखा जा रहा है। इसको लेकर लोगों में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ गुस्सा बढ़ रहा है। वहीं पाक अधिकृत कश्मीर के लोग सेना के खिलाफ भी खुलकर बयान दे रहे हैं। हाल ही में तालिबान की तरफ से भी पाकिस्तान को चेताया गया है। तालिबान की तरफ से भी पाकिस्तान का चुनौती मिलने से वह परेशान दिखने लगा है। इस बीच पीओके में पाकिस्तान विरोध और भारत में शामिल किए जाने की आवास से पाकिस्तान सरकार और सेना की नींद उड़ने लगी है। लोगों की आवाज को दबाने की कोशिश होने लगी है।
गौरतलब है कि पाकिस्तान की मौजूदा हालात पर इन दिनों दुनिया भर की नजरें हैं। इसी बीच अमेरिका के डेलावेयर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर मुक्तदर खान ने यह कह कर बवाल खड़ा कर दिया है कि भारत चाहे तो जंग का ऐलान कर पीओके और बाकी इलाकों को अपने में मिला सकता है।उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इस समय एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। ऐसे में भारत चाहे को उस पर चढ़ाई कर सकता है।
उधर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने पहले ही कह दिया है कि हमें भारत से युद्ध नहीं करना चाहिए था। उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान कहा कि हमने भारत के साथ तीन युद्ध लड़े। लेकिन बदले में हमें परेशानी, गरीबी और बेरोजगारी मिली। हमने अपना सबक सीख लिया है। हम शांति के साथ रहना चाहते हैं। इसके साथ ही पाकिस्तान के पीएम ने भारत के साथ ईमानदारी से बातचीत करने को कहा है।
जिसपर अमेरिका के डेलावेयर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर मुक्तदर खान ने कहा है कि पीएम शहबाज शरीफ ने भारत के साथ ईमानदारी से बातचीत कहकर यू टर्न लिया है। खान ने कहा है कि पाकिस्तान हर मामले में कमजोर पड़ चुका है। हाल ये है कि कोई भी मुल्क पाकिस्तान पर हावी हो सकता है। भारत चाहे तो वो आसानी से कब्जा कर सकता है।इसके साथ ही मुक्तदर खान ने कहा है कि पाकिस्तान को सबसे पहले भारत का शुक्रिया अदा करना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि अभी तक पाकिस्तान के नाजुक हालात का फायदा भारत नहीं उठा पा रहा है। पाकिस्तान को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा है कि पाकिस्तान के नेताओं को समझना होगा कि भारत के नेता अधिक सम्मानित हैं और उनके जैसे नहीं हैं।
मुक्तदर खान ने कहा कि पाकिस्तान मौजूदा समय में छह प्रकार के संकट का सामना कर रहा है। इस दौरान उन्होंने राजनीतिक संकट, आर्थिक संकट, सुरक्षा का संकट, सिस्टम का संकट, पहचान का संकट और पर्यावरण संकट का हवाला दिया। इसके साथ ही हाल ही में वहां बिजली संकट खड़ा हो गया हैं । करीब दो दिन तक बिजली गुल रही थी । इसके साथ ही उन्होंने कहा है कि अगर मुझे हजारों और लाखों बार भी ये पूछा जाए कि मैं भारत में एक मुस्लिम की तरह रहना चाहूंगा या फिर पाकिस्तान में एक हिंदू की तरह रहना चाहूंगा तो मेरा हर बार जवाब होगा कि मैं हर बार भारत में मुस्लिम बनकर रहना चाहूंगा।
गौरतलब है कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद से ही पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (पीओके) चर्चा में रहा है। भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शौर्य दिवस के मौके पर जम्मू कश्मीर में खड़े होकर पाकिस्तान को चुनौती दी थी। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में उसने (पाकिस्तान) जो किया है, उसकी कीमत के रूप में पीओके खोकर चुकानी पड़ेगी। साथ ही भारत के उत्तरी सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कुछ समय पूर्व कहा था कि भारतीय सेना पीओके को वापस लेने जैसे आदेशों को पूरा करने के लिए तैयार है। इस प्रकार की बातों से भी पीओके में रहने वालों को भारत से उम्मीद बंधी हैं ।
साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि अब पीओके को आजाद कराने और भारत में शामिल कराने का वक्त आ गया है। ईश्वर से प्रार्थना करें कि हम अपने जीवनकाल में यह अवसर देख पाएं। दो दिन पहले ही राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी ट्वीट किया था कि 1947 में पं। जवाहरलाल नेहरू द्वारा यूएन में दायर किया प्रस्ताव वापस लेकर पीओके को सेना हासिल कर सकती है। कुल मिलाकर, पीओके हर किसी की जुबान पर है, लेकिन क्या वाकई इसे पाकिस्तान के कब्जे से छुड़ाया जा सकता है? यह जानने के लिए भास्कर ऐप प्लस ने पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल दीपक कपूर और संविधान विशेषज्ञ विराग गुप्ता से बात की। जनरल दीपक कपूर के अनुसार, संभव सबकुछ है, लेकिन इससे पहले हमें आतंकवाद और पाकिस्तान के प्रति रवैया बदलना होगा। अभी तक हम डिफेंसिव मोड में रहे हैं, लेकिन अब हमें ऑफेंसिव-डिफेंस की नीति अपनाना होगी। यानी सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक यह दिखाती है कि यदि हम पर हमला होगा तो हम न सिर्फ उसका माकूल जवाब देंगे बल्कि उसे जड़ से खत्म करेंगे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का परमाणु हथियारों के इस्तेमाल पर आया बयान भी यह दिखाता है कि सरकार कितनी मतबूत है और दुश्मन को सही जवाब देने के लिए हम कितने सक्षम हैं।
जनरल कपूर बताते हैं कि अभी हमें आतंकियों को नियंत्रण रेखा पार करने से रोकना होगा। चूंकि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा है, इसलिए वहां के हालात सामान्य होने में समय लगेगा। पहला फोकस वहां के लोगों पर, खासकर घाटी के लोगों पर होना चाहिए। वहां के लोगों को जब यह अहसास हो जाएगा कि अनुच्छेद 370 हटना उनके लिए फायदेमंद है, भारत सरकार और सेना उनकी सुरक्षा और बेहतर भविष्य के लिए काम कर रही है, तो आगे की राह अपने आप आसान हो जाएगी।
संविधान विशेषज्ञ विराग गुप्ता के अनुसार, संविधान के मुताबिक, पीओके भारत का अभिन्न अंग है। यह पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है। पीओके हासिल करने में न तो कोई कानूनी बाध्यता है और न संयुक्त राष्ट्र का कोई दबाव। यूएन इस मामले में कुछ नहीं कर सकता। अब बात आती है कि यह कैसे संभव है, तो बातचीत से इसका हल निकलने से रहा। दूसरा, जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद पाकिस्तान तिलमिला गया तो पीओके की बात करने से क्या होगा, आप सोच ही सकते हैं। इसका एक ही रास्ता है, पाकिस्तानी सेना को वहां से खदेड़ना होगा।
गौरतलब है कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद से ही पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (पीओके) चर्चा में रहा है। भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शौर्य दिवस के मौके पर जम्मू कश्मीर में खड़े होकर पाकिस्तान को चुनौती दी थी। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में उसने (पाकिस्तान) जो किया है, उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। साथ ही भारत के उत्तरी सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कुछ समय पूर्व कहा था कि भारतीय सेना पीओके को वापस लेने जैसे आदेशों को पूरा करने के लिए तैयार है। इस प्रकार की बातों से भी पीओके में रहने वालों को भारत से उम्मीद बंधी हैं ।
साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि अब पीओके को आजाद कराने और भारत में शामिल कराने का वक्त आ गया है। ईश्वर से प्रार्थना करें कि हम अपने जीवनकाल में यह अवसर देख पाएं। दो दिन पहले ही राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी ट्वीट किया था कि 1947 में पं। जवाहरलाल नेहरू द्वारा यूएन में दायर किया प्रस्ताव वापस लेकर पीओके को सेना हासिल कर सकती है। कुल मिलाकर, पीओके हर किसी की जुबान पर है, लेकिन क्या वाकई इसे पाकिस्तान के कब्जे से छुड़ाया जा सकता है? यह जानने के लिए भास्कर ऐप प्लस ने पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल दीपक कपूर और संविधान विशेषज्ञ विराग गुप्ता से बात की। जनरल दीपक कपूर के अनुसार, संभव सबकुछ है, लेकिन इससे पहले हमें आतंकवाद और पाकिस्तान के प्रति रवैया बदलना होगा। अभी तक हम डिफेंसिव मोड में रहे हैं, लेकिन अब हमें ऑफेंसिव-डिफेंस की नीति अपनाना होगी। यानी सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक यह दिखाती है कि यदि हम पर हमला होगा तो हम न सिर्फ उसका माकूल जवाब देंगे बल्कि उसे जड़ से खत्म करेंगे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का परमाणु हथियारों के इस्तेमाल पर आया बयान भी यह दिखाता है कि सरकार कितनी मतबूत है और दुश्मन को सही जवाब देने के लिए हम कितने सक्षम हैं।
जनरल कपूर बताते हैं कि अभी हमें आतंकियों को नियंत्रण रेखा पार करने से रोकना होगा। चूंकि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा है, इसलिए वहां के हालात सामान्य होने में समय लगेगा। पहला फोकस वहां के लोगों पर, खासकर घाटी के लोगों पर होना चाहिए। वहां के लोगों को जब यह अहसास हो जाएगा कि अनुच्छेद 370 हटना उनके लिए फायदेमंद है, भारत सरकार और सेना उनकी सुरक्षा और बेहतर भविष्य के लिए काम कर रही है, तो आगे की राह अपने आप आसान हो जाएगी।
संविधान विशेषज्ञ विराग गुप्ता के अनुसार, संविधान के मुताबिक, पीओके भारत का अभिन्न अंग है। यह पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है। पीओके हासिल करने में न तो कोई कानूनी बाध्यता है और न संयुक्त राष्ट्र का कोई दबाव। यूएन इस मामले में कुछ नहीं कर सकता। अब बात आती है कि यह कैसे संभव है, तो बातचीत से इसका हल निकलने से रहा। दूसरा, जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद पाकिस्तान तिलमिला गया तो पीओके की बात करने से क्या होगा, आप सोच ही सकते हैं। इसका एक ही रास्ता है, पाकिस्तानी सेना को वहां से खदेड़ना होगा। अब यह साफ़ है कि पीओके के लोगों का भारत की झुकाव कभी भी भारत को पीओके को भारत में मिलाना सरल हो जायेगा ।
नई दिल्ली, National Girl Child Day 2023: राष्ट्रीय बालिका दिवस (National Girl Child Day) भारत में हर साल 24 जनवरी को मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य लड़कियों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाना है। जिसकी शुरुआत भारत सरकार द्वारा साल 2008 में की गई थी।
राष्ट्रीय बालिका दिवस (National Girl Child Day) का इतिहास
24 जनवरी 1966 को इंदिरा गांधी ने महिला प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली थी इसलिए 24 जनवरी को भारत में राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाने की शुरुआत साल 2008 में महिला कल्याण एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से की गई थी क्योंकि भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा था कि एक महिला देश की प्रधानमंत्री बन गई थी, जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव था।
24 जनवरी को क्यों होता है बालिका दिवस?
हर साल 24 जनवरी को बालिका दिवस मनाने की सबसे बड़ी वजह भारत की पहली प्रधानमंत्री बनने वाली इंदिरा गांधी से जुड़ी हुई है। ये भारत के लिए बहुत ही गर्व की बात थी। भारत के इतिहास और महिलाओं के सशक्तिकरण में 24 जनवरी का दिन बेहद महत्वपूर्ण है।
बालिका दिवस मनाने का उद्देश्य
यह दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य देश की लड़कियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना है। हमारे समाज लड़कियों को लड़कों की अपेक्षा कम आंका जाता है। उन्हें पढ़ने के अवसर नहीं मिलते, वक्त से पहले शादी करा दी जाती है और फिर बच्चे की जिम्मेदारी। उन्हें अपने सम्मान और अधिकार के लिए भी लड़ना पड़ता है। तो इस दिन को लड़कियों के साथ ही समाज को भी शिक्षित और जागरूक करने का प्रयास किया जाता है। इस दिन हर साल राज्य सरकारें अपने-अपने प्रदेश में कई तरह के कार्यक्रम का आयोजन करती हैं।
राष्ट्रीय बालिका दिवस का महत्व
आज देश की बेटियां हर फील्ड में अपना परचम लहरा रही हैं। भारतीय समाज में आज से नहीं बल्कि काफी पहले से लैंगिक असमानता एक बड़ी चुनौती रही है। भारत सरकार ने महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव की इस स्थिति को बदलने और सामाजिक स्तर पर लड़कियों की हालत में सुधार करने के उद्देश्य से कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिसमें ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान, ‘सुकन्या समृद्धि योजना’, बालिकाओं के लिए मुफ्त या अनुदानित शिक्षा और कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में सीटों का आरक्षण शामिल हैं। भारत में राष्ट्रीय बालिका दिवस 24 जनवरी और 11 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाया जाता है।
गाय के साथ युवक ने किया दुष्कर्म, ग्रामीणों ने पकड़कर पुलिस को सौंपा
सेहरामऊ दक्षिणी क्षेत्र में एक युवक ने पड़ोसी के घर के बाहर बंधी गाय के साथ दुष्कर्म किया। उसे ग्रामीणों ने मौके से पकड़ लिया। इसके बाद उसे पुलिस के हवाले कर दिया।
शाहजहांपुर में इंसानियत को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। सेहरामऊ दक्षिणी थाना क्षेत्र के गांव निवासी एक युवक ने गाय की बछिया के साथ दुष्कर्म किया। आरोपी को ग्रामीणों ने मौके से पकड़ लिया। उसकी पिटाई कर दी। इसके बाद उसे पुलिस के हवाले कर दिया। पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर आरोपी को जेल भेज दिया है।
घर के बाहर बंधी थी बछिया
मामला सेहरामऊ दक्षिणी क्षेत्र के चांदापुर गांव का है। गांव निवासी एक ग्रामीण की गाय की बछिया घर के बाहर बंधी थी। शनिवार शाम को पड़ोसी रामप्रसाद ने गाय के साथ दुष्कर्म किया। ग्रामीणों ने उसे मौके पर ही पकड़ लिया। जानकारी होने पर ग्रामीणों की भीड़ जुट गई। आरोपी की पिटाई कर दी। बाद में उसे पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया।
पशु चिकित्सक ने किया मेडिकल
सेहरामऊ दक्षिणी के थाना प्रभारी राजेंद्र बहादुर सिंह ने बताया कि पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर आरोपी रामप्रसाद को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया। वहीं एक पशु चिकित्सक ने गाय का मेडिकल किया। उधर, घटना के बाद आरोपी युवक के खिलाफ ग्रामीणों में आक्रोश है।
राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी सभी राजनीतिक जिम्मेदारियों से मुक्त होना चाहते हैं
महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ‘सभी राजनीतिक जिम्मेदारियों से मुक्त’ होना चाहते हैं। इस बात का खुलासा सोमवार को खुद उन्होंने ट्वीट करके किया है। महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बाबत बताया भी है। उन्होंने पीएम से कहा है कि वे सभी राजनैतिक जिम्मेदारियों से मुक्त होकर जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। गौरतलब है कि महाराष्ट्र के राज्यपाल अकसर पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने के आरोप को लेकर विपक्ष के निशाने पर रहते हैं।
महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत ने ट्वीट किया कि प्रधानमंत्री की हाल की मुंबई यात्रा के दौरान मैंने उन्हें सभी राजनीतिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने और पढ़ने, लिखने और अन्य गतिविधियों में अपना शेष जीवन व्यतीत करने की इच्छा व्यक्त की थी। उन्होंने आगे कहा कि मुझे हमेशा प्रधानमंत्री से प्यार और स्नेह मिला है और मुझे इस संबंध में भी ऐसा ही मिलने की उम्मीद है। कोश्यारी ने आगे कहा कि महाराष्ट्र जैसे संतों, समाज सुधारकों और वीरों की महान भूमि का राज्यपाल होना मेरे लिए सौभाग्य की बात थी। प्रदेश की जनता से तीन वर्ष से अधिक समय तक मिले प्यार और स्नेह को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
सिजलिंग, मजेदार, फ्रेश और युवा जोश से भरपूर है ट्रेलर
मुम्बई। लव रंजन की मोस्ट अवेटेड रोमांटिक कॉमेडी ‘तू झूठी मैं मक्कार’ का ट्रेलर एक मेगा इवेंट में जारी किया गया और जिसे काफी शानदार रिएक्शन्स मिले। ट्रेलर ताजी हवा का एक झौंका है, जिसमें लीड जोड़ी के बीच शानदार केमिस्ट्री, बेहतरीन विजुअल्स, हिलेरिस डायलॉग्स और एक कॉन्सेप्ट है जो मज़ेदार, अप्रत्याशित और अपने टाइटल की तरह ही ट्विस्ट से भरा लेकिन रिलेटेबल है। कह सकते है तू झूठी मैं मक्कार वो फिल्म है जो थिएटर्स में फिर से रोमांस को जिंदा करने वाली है, लेकिन 2023 स्टाइल में।
स्टैंड-अप किंग अनुभव सिंह बस्सी, जो फिल्म के साथ अपनी शुरुआत कर रहे हैं, ने इस इवेंट को होस्ट किया और उन्होंने सचमुच अपने मजाकिया वन लाइनर्स के साथ सबको खूब एंटरटेन किया और साल के सबसे मनोरंजक ट्रेलर के लॉन्च के लिए माहोल बना दिया। जब ‘झूठी’ श्रद्धा और ‘मक्कार’ रणबीर ने स्टेज पर निर्देशक लव रंजन को ज्वाइन किया तो किस्सों की बाढ़ आ गई और जिससे ये भी समझ आ गया कि फिल्म की शूटिंग भी उतनी ही मजेदार थी जितनी कि पर्दे पर दिखती है। ट्रेलर में प्रीतम, अमिताभ भट्टाचार्य और अरिजीत सिंह के एक साथ आने के मैजिक के साथ फिल्म में शानदार संगीत की झलक भी दी गई है।
दर्शकों ने एक रियल युवा रॉम-कॉम फिल्म के लिए लंबे समय से इंतजार किया है और टीजेएमएम ने निश्चित रूप से सभी बॉक्सों पर टिक करती हैं। ट्रेलर बस फिल्म की प्रत्याशा को कुछ पायदान ऊपर ले जाता है। ये फिल्म 8 मार्च 2023 को होली पर दुनिया भर में रिलीज होगी।
निर्देशक लव रंजन, जो अपनी फिल्मों के अनूठे ब्रांड के लिए जाने जाते हैं और कंटेम्परेरी रोमांस के फ्लैग बियरर हैं, ने कहा, “प्यार एक कॉम्प्लीकेटेड सब्जेक्ट है, लेकिन क्यों न आज की दुनिया में रिश्तों को सुलझाने की कोशिश करते हुए कुछ मजा लिया जाए। श्रद्धा और रणबीर की सुपर टैलेंटेड जोड़ी और मेरे ब्रिलियंट क्रू ने फिल्म की दुनिया और वाइब को जीवंत कर दिया है। मैं उम्मीद कर रहा हूं कि हर उम्र के दर्शक, युवा और युवा दिल से थिएटर में अच्छा समय बिताएंगे, जब वे फिल्म देखते हुए अपने खुद के रोमांस से जुड़ेंगे।”
तू झूठी मैं मक्कार लव रंजन द्वारा निर्देशित हैं। वहीं इस फिल्म को लव फिल्म्स के लव रंजन और अंकुर गर्ग द्वारा निर्मित किया गया है और टी-सीरीज़ के गुलशन कुमार और भूषण कुमार द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
मुम्बई। पूजा एंटरटेनमेंट की आने वाली जबरदस्त एक्शन एंटरटेनर ‘बड़े मियां छोटे मियां’ को लेकर काफी चर्चा है। इस फिल्म में बॉलीवुड के दो सबसे बड़े एक्शन हीरो, अक्षय कुमार और टाइगर श्रॉफ एक साथ दिखाई देंगे, एक ऐसा कॉम्बिनेशन जो निश्चित रूप से दर्शकों को खुश कर देगा। पृथ्वीराज सुकुमारन भी इस फिल्म का हिस्सा हैं और एक पावरफुल विलेन के रूप में अपने अभिनय कौशल को सामने वाले हैं। अली अब्बास ज़फ़र के निर्देशन में बन रही फिल्म को बड़े पैमाने पर सेट किया गया है, जिसमें पहले कभी नहीं देखा गया एक्शन सेट, दुनिया भर से क्रू, स्पेशलाइज्ड टेक्नोलॉजी और इक्विपमेंट्स हैं। महीनों की कड़ी तैयारी के बाद बीएमसीएम के निर्माताओं ने पूरी कास्ट, क्रू और फिल्म जगत के शुभचिंतकों के साथ एक विशेष शुभ मुहुर्त में फिल्म की शूटिंग शुरू कर दी है, जो इस रोमांचक पल का हिस्सा थे।
वाशु भगनानी और पूजा एंटरटेनमेंट प्रेजेंट्स अली अब्बास जफर द्वारा लिखित और निर्देशित एएजेड फिल्म के सहयोग से बन रही ‘बड़े मियां छोटे मियां’ के वाशु भगनानी, दीपशिखा देशमुख, जैकी भगनानी, हिमांशु किशन मेहरा और अली अब्बास जफर प्रोड्यूसर हैं। यह पूजा एंटरटेनमेंट एक्शन एंटरटेनर दिसंबर 2023 में सिनेमाघरों में रिलीज होगी।
‘ऐ वतन मेरे वतन’ सच्ची घटनाओं से प्रेरित एक थ्रिलर ड्रामा है, जिसकी कहानी दरब फ़ारूक़ी और कन्नन अय्यर ने लिखी हैं।
मुम्बई। भारत के 74वें गणतंत्र दिवस समारोह से पहले, प्राइम वीडियो ने आने वाली अमेज़न ऑरिजिनल मूवी ‘ऐ वतन मेरे वतन’ का फर्स्ट-लुक लॉन्च किया, जो भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले निडर नायकों को एक श्रद्धांजलि है। धर्माटिक एंटरटेनमेंट प्रोडक्शन के बैनर तले बन रही इस फिल्म के करण जौहर और अपूर्व मेहता प्रोड्यूसर हैं और को-प्रोड्यूसर सोमेन मिश्रा हैं। कन्नन अय्यर के निर्देशन में बन रही यह फिल्म सच्ची घटनाओं से प्रेरित एक थ्रिलर ड्रामा है, जिसकी कहानी दरब फ़ारूक़ी और कन्नन अय्यर ने लिखी हैं। इस फिल्म में सारा अली ख़ान एक दिलेर स्वतंत्रता सेनानी के किरदार में दिखाई देंगी।
हाल ही में इस फिल्म का फर्स्ट-लुक वीडियो लॉन्च किया गया, जो हमें अतीत के दौर में वापस ले जाता है, जिसमें हमें एक लड़की नज़र आती है जो बेहद चिंतित होते हुए भी पूरी लगन के साथ कम रोशनी वाले एक कमरे में रेडियो की तरह दिखने वाले डिवाइस को बड़ी कुशलता से असेंबल करती है। कैमरा धीरे-धीरे दिखाता है कि वह युवती कोई और नहीं बल्कि सारा अली ख़ान है जिन्हें दर्शकों ने इस तरह के नॉन-ग्लैमरस अवतार में पहले कभी नहीं देखा होगा। वह रेडियो पर बोलना शुरू कर देती है, उसकी आवाज़ में दृढ़-संकल्प और साहस की झलक दिखाई देती है, और वह जमीन के नीचे मौजूद अपने रेडियो स्टेशन के जरिए पूरे देश के साथ स्वतंत्रता का संदेश साझा करती है।
‘ऐ वतन मेरे वतन’ सच्ची घटनाओं से प्रेरित बॉम्बे के एक कॉलेज में पढ़ने वाली बहादुर लड़की कहानी है जो स्वतंत्रता सेनानी बन जाती है। यह काल्पनिक कहानी 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इस फिल्म में देश के युवाओं की दिलेरी, देशभक्ति, दूरदर्शिता और हर मामले में उनकी कुशलता को दिखाया गया है।
इसके बारे में बात करते हुए करण जौहर ने कहा, “धर्माटिक एंटरटेनमेंट को इस बात की बेहद खुशी है कि हमें एक बार फिर से प्राइम वीडियो के साथ मिलकर अव्वल दर्जे की फिल्म – ‘ऐ वतन मेरे वतन’ के निर्माण का मौका मिला है।” उन्होंने आगे कहा, “इस फिल्म के जरिए आज़ादी की लड़ाई के एक ऐसे अध्याय को दर्शकों के सामने लाने की कोशिश की गई है, जिसके बारे में लोगों को काफी कम जानकारी है। बेहद प्रतिभाशाली अदाकारा, सारा अली ख़ान मुख्य भूमिका निभा रही हैं और दर्शकों ने उन्हें इस तरह के किरदार में पहले कभी नहीं देखा होगा। साथ ही, कन्नन अय्यर का वजन भी लाजवाब है और इसी वजह से यह दर्शकों को प्रेरणा देने वाली और उनका भरपूर मनोरंजन करने वाली फिल्म है।”
इस पर आगे बात करते हुए फिल्म निर्देशक, कन्नन अय्यर ने कहा, “भारत के स्वतंत्रता संग्राम के बेहद कठिन दौर की सच्ची घटनाओं से प्रेरित इस कहानी का निर्देशन करना मेरे लिए बड़े गर्व की बात है, साथ ही मैं प्राइम वीडियो और धर्माटिक एंटरटेनमेंट का शुक्रगुजार हूं जिन्होंने मुझे यह मौका दिया। ऐ वतन मेरे वतन देश की आज़ादी की लड़ाई में हमारे बहादुर नायकों द्वारा दिए गए अनमोल योगदान के प्रति एक सच्ची श्रद्धांजलि है। मुझे पहली बार सारा अली ख़ान के साथ काम करने का मौका मिला है और उन्होंने जिस तरह से खुद को इस किरदार में ढाला है उसे देखकर मैं बेहद उत्साहित हूं।”
वहीं फिल्म में अपने किरदार को लेकर सारा अली ख़ान बेहद उत्साहित हैं और इस बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, “ऐसी फिल्म का हिस्सा बनना मेरे लिए बड़ी खुशी की बात है, क्योंकि मुझे लगता है कि इसकी कहानी लोगों तक पहुंचनी ही चाहिए। प्राइम वीडियो और धर्माटिक एंटरटेनमेंट ने मुझे यह मौका दिया, जो मेरे लिए सम्मान की बात है। एक अभिनेता होने के साथ-साथ एक भारतीय होने के नाते, मैं इस किरदार को निभाते हुए गौरव और जिम्मेदारी की भावना का अनुभव कर रही हूं। कन्नन अय्यर सर के साथ काम करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है, क्योंकि भावनात्मक रूप से उन्हें इस कहानी से काफी लगाव है और वे इसे लेकर बेहद उत्साहित हैं। सच कहूं तो ऐसे किरदार को निभाना बहुत चुनौतीपूर्ण है क्योंकि मैंने अब तक जो भूमिकाएं निभाई हैं, यह उनसे बिल्कुल अलग है। इस प्रोजेक्ट के लिए मैं वाकई कड़ी मेहनत करने जा रही हूँ। और सबसे बड़ी बात यह है कि, हर दिन इस किरदार को निभाते हुए मैं उसके हर लम्हे को अपने दिल में संजोकर रखूंगी।”
‘ऐ वतन मेरे वतन’ दुनिया भर में 240 से अधिक देशों और क्षेत्रों में प्राइम मेंबर्स के लिए उपलब्ध होगी।