दुबई एयरपोर्ट में प्रवासी भारतीयों(उत्तराखंडियों )द्वारा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का स्वागत
दुबई, 17 अक्टूबर, दिसंबर में आयोजित होने वाले इन्वेस्टर समिट के लिए निवेशकों को आमंत्रित करने के लिए अबू धाबी व दुबई पहुंचे अपने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का दुबई एयरपोर्ट में उत्तराखंडी प्रवासियों द्वारा जोरदार स्वागत किया गया..!
मुख्यमंत्री धामी दिसम्बर में आयोजित होने वाले ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में अधिक से अधिक निवेशकों की भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु लन्दन के बाद दुबई एवं आबूधाबी के भ्रमण पर हैं । सोमवार को दुबई एयरपोर्ट पहुंचने पर प्रवासी भारतीयों द्वारा आत्मीयता के साथ स्वागत किया गया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने दुबई में रह रहे समस्त प्रवासी भारतीयों का आभार प्रकट किया। मुख्यमंत्री ‘इन्वेस्ट इन उत्तराखण्ड’ अभियान के तहत संयुक्त अरब अमीरात में उद्योगपतियों एवं प्रवासी भारतीयों से मिलेंगे। इस दौरान वे उत्तराखण्ड में निवेश की संभावनाओं पर आयोजित बैठकों में भी प्रतिभाग करेंगे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखण्ड देवभूमि के साथ ही योग, आध्यात्मिक की भी भूमि है। उत्तराखण्ड देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। उन्होंने कहा कि हमें गर्व है कि हमारी जड़े उत्तराखण्ड से जुड़ी हुई हैं। मुख्यमंत्री ने सभी प्रवासी उत्तराखण्डियों का आह्वान करते हुए कहा कि वह वर्ष में एक बार अपने प्रदेश उत्तराखण्ड ज़रूर आएँ। इससे उनकी भावी पीढी को भी अपनी मातृभूमि से जुडने की प्रेरणा मिलेगी।
उन्होंने कहा कि हमारे प्रवासी भाईयों ने अपनी प्रतिभा एवं मेहनत से स्वयं के साथ अपनी मातृभूमि का भी नाम रोशन किया है। यह हम सभी के लिये सम्मान की बात है।
अतः अपने अप्रवासी भाई-बहनों और उत्तराखंड सरकार के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित करने तथा उनके निवेश प्रस्तावों पर त्वरित कार्यवाही करने हेतु मुख्यमंत्री कार्यालय में एक उत्तराखण्ड अप्रवासी सेल बनाया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि अब तक 40 हजार करोड के निवेश करारनामो पर हस्ताक्षर किये जा चुके हैं। हमारा लक्ष्य ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में लगभग 2.5 लाख करोड़ के निवेश का लक्ष्य है। बडी संख्या में उत्तराखण्ड के प्रति देश विदेश के उद्यमियों द्वारा की जा रही पहल से हम इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये आशान्वित हैं ।
मुख्यमंत्री ने कहा कि देश के प्रधानमंत्री आदरणीय श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में दुनिया भर में भारत का मान, सम्मान और स्वाभिमान बढ़ा है। उन्होंने कहा कि आज विदेशों में भी एक भारत श्रेष्ठ भारत की परिकल्पना को मूर्त रूप दिया जा रहा है। इस अवसर पर शिक्षा एवं स्वास्थ्य कैबिनेट मंत्री श्री धन सिंह रावत भी उपस्थित थे ।
एएसजी आई हॉस्पिटल में कल्याण वासियों को मिलेगा नेत्र उपचार का उत्तम लाभ
कल्याण। अपनी विस्तार रणनीति के तहत, देश की प्रसिद्ध नेत्र देखभाल श्रृंखला एएसजी, कल्याण में प्रवेश कर चुकी है। कल्याण पश्चिम के खडकपाड़ा स्थित रॉक माउंट रेजीडेंसी की तीसरी मंजिल पर एएसजी आई हॉस्पिटल का उद्घाटन विधायक विश्वनाथ भोईर ने किया। यह अत्याधुनिक मशीन का उपयोग करके चिकित्सीय सुविधाएं प्रदान करने के लिए अच्छी तरह से सुसज्जित अस्पताल है जहाँ कल्याण शहर के मरीजों को एक महीने की मुफ्त ओपीडी सेवाएं प्रदान की जाएगी।
कल्याण में ऐसे अस्पताल की जरूरत थी। सभी विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम होने के कारण यहां मरीजों को अच्छी इलाज सुविधा मिलेगी, यह विश्वास विधायक विश्वनाथ भोईर ने उद्घाटन के मौके पर जताया।
वर्तमान समय में हर उम्र के लोग स्क्रीन पर अधिक समय बिताते हैं, इसलिए आंखों की समस्याएं भी बढ़ रही हैं। इसके लिए स्कूल, कॉलेज के साथ-साथ संस्थाएं और संस्थाएं आंखों की देखभाल के संबंध में मार्गदर्शन प्रदान करेंगी। हर किसी को साल में कम से कम दो बार अपनी आंखों की जांच करानी चाहिए। एएसजी अस्पताल मोतियाबिंद, लेसिक, विट्रो रेटिना सर्जरी, ओकुलोप्लास्टी, ग्लूकोमा, कॉर्निया, स्ट्रैबिस्मस, नेत्र विज्ञान के लिए अत्याधुनिक उपचार प्रदान करेगा। इस अस्पताल में आंखों से संबंधित सभी जटिल प्रक्रियाएं, निदान और उपचार एक ही स्थान पर उपलब्ध होंगे। एएसजी नेत्र अस्पताल समय-समय पर मुफ्त जागरूकता स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन करेगा। महाराष्ट्र में एएसजी अस्पताल की 7वीं शाखा खोला गया है। एएसजी ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स की देश के 83 शहरों में 160 से अधिक शाखाएँ हैं।

आपको बता दें कि 2005 में एम्स के दो दिग्गज डॉ. अरुण सिंघवी और डॉ. शिल्पी गैंग ने एएसजी आई ग्रुप की स्थापना की। इसके बाद, कुछ अनुभवी डॉक्टरों को शामिल करके एएसजी समूह का विस्तार हुआ। एएसजी ग्रुप की स्थापना दुनिया में सबसे अच्छी सुविधाएं प्रदान करने के लिए बिना किसी भेदभाव के सभी को समान उपचार प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। एएसजी ग्रुप के अस्पताल पूरे भारत में संचालित हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, एएसजी हॉस्पिटल्स की एक शाखा कंपाला, युगांडा, पूर्वी अफ्रीका में है, और एक अन्य शाखा काठमांडू, नेपाल में है। एएसजी आई ग्रुप को आजवर अचीवर्स 2009, एक्सीलेंस इन वेलनेस 2010, राजीव गांधी गॉडमेडल 2014, आदि से सम्मानित किया गया है। एएसजी आई हॉस्पिटल में चार अनुभवी और वरिष्ठ डॉक्टरों की एक टीम काम करेगी, जिसमें डॉ. नितेश सालुंखे, डॉ. रोहित मेंडके, डॉ. मानस देशमुख और डॉ. हरीश पाठक शामिल हैं।
केंद्रीय मंत्री परशोत्तम रुपाला 17 अक्टूबर को महाबलीपुरम में अंतर्राष्ट्रीय मत्स्य पालन सुशासन पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे
New Delhi – केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री, श्री परशोत्तम रुपाला और मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी राज्य मंत्री, डॉ. एल. मुरुगन, अंतर्राष्ट्रीय मत्स्य पालन सुशासन की मुख्यधारा में जलवायु परिवर्तन को शामिल करने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मत्स्य पालन प्रबंधन उपायों को सुदृढ़ बनाने पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे। यह सम्मेलन चेन्नई के महाबलीपुरम में 17 अक्टूबर, 2023 को आयोजित किया जाएगा।
सम्मेलन के बारे में
केंद्रीय मंत्री श्री परशोत्तम रुपाला इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे। इसमें समुद्री मत्स्य पालन में जलवायु-परिवर्तन से उत्पन्न स्थितियों को अपनाने के लिए भारत की तैयारियों पर विचार-मंथन होगा। इस दौरान विभिन्न सत्रों का आयोजन किया जाएगा जिनमें अनुसंधान और शैक्षणिक संस्थान; सामुदायिक संगठन और उद्यमी अपने नवाचारों और गतिविधियों को प्रदर्शित करेंगे। इस दौरान मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय में राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन विशेष संबोधन देंगे।
इस सम्मेलन में खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के वरिष्ठ अधिकारी, क्षेत्रीय मत्स्य निकायों (आरएफबी) के प्रतिनिधि, मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तहत राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान और तटीय राज्य सरकारों के प्रतिनिधि भाग लेंगे। इसके अतिरिक्त तमिलनाडु का डॉ. जे. जयललिता मत्स्य पालन विश्वविद्यालय, कोचीन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, सत्यभामा विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान और विभिन्न उद्योगों और मछुआरा सहकारी समितियों के प्रतिनिधि भी इस कार्यक्रम में शामिल होंगे।
17 अक्टूबर, 2023 को एक अतिरिक्त कार्यक्रम ‘‘मत्स्य पालन प्रबंधन के लिए लाइफ (पर्यावरण के लिए जीवन शैली) को मुख्यधारा में लाना’’ विषय पर एक कार्यशाला भी आयोजित की गई है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 2021 संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (यूएनएफसीसीसी सीओपी26) में वैश्विक जलवायु कार्रवाई में व्यक्तिगत व्यवहार को सर्वाधिक महत्व देने के लिए मिशन लाइफ की शुरुआत की थी। मुख्य कार्यक्रम से इतर इस पर विचार-विमर्श किया जाएगा। इस कार्यक्रम में देश भर से छात्र भाग ले रहे हैं और विषय पर अपने नवीन विचार प्रस्तुत कर रहे हैं।
केंद्रीय मंत्री श्री परशोत्तम रुपाला और राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन पोस्टर प्रदर्शनी का भी उद्घाटन करेंगे, जिसमें छात्रों के बीच एक राष्ट्रव्यापी प्रतियोगिता से चुने गए 25 लाइफ विचार शामिल होंगे। दोनों मंत्री मत्स्य पालन प्रबंधन में लाइफ को मुख्यधारा में लाने पर अपने विचारों के बारे में छात्रों से चर्चा करेंगे।
जलवायु-परिवर्तन दुनिया भर में समुद्री मछली स्टॉक के वितरण में महत्वपूर्ण बदलाव ला रहा है। हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि इस सदी के अंत तक, साझा समुद्री मछली भंडार का लगभग आधा हिस्सा स्थानांतरित हो जाएगा और दुनिया के विशेष आर्थिक क्षेत्रों का एक बड़ा हिस्सा कम-से-कम एक ऐसे परिवर्तन का साक्षी बनेगा। समुद्री मछली स्टॉक का यह स्थानांतरण मौजूदा मत्स्य प्रबंधन ढांचे के लिए एक चुनौती है। जलवायु-परिवर्तन साझा मछली भंडार को कैसे प्रभावित करता है, इसकी गहरी समझ मजबूत, जलवायु-परिवर्तन के अनुरूप लचीले अंतर्राष्ट्रीय मत्स्य पालन प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण है।
5 से 9 सितंबर 2022 को रोम में आयोजित मत्स्य पालन समिति (सीओएफआई35) के 35वें सत्र में माना गया कि क्षेत्रीय मत्स्य निकायों (आरएफबी) को जलवायु-परिवर्तन के विषय पर सदस्य देशों के साथ प्रभावी ढंग से जोड़ना होगा। जलवायु-परिवर्तन को देखते हुए मत्स्य पालन प्रबंधन पर खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) से दिशा-निर्देश प्रस्तुत करने का अनुरोध किया गया।
खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने जलवायु-लचीलेपन को देखते हुए दिशा-निर्देशों को स्थितियों के अनुसार परिवर्तित करने के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र से क्षेत्रीय मत्स्य निकायों (आरएफबी) को शामिल करते हुए कार्यशाला आयोजित की है। इस दौरान मत्स्य पालन प्रबंधन और अंतर्राष्ट्रीय मत्स्य पालन गवर्नेंस में जलवायु-परिवर्तन के एकीकरण की रणनीति बनाने पर ध्यान केन्द्रित किया जाएगा। सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत मत्स्य पालन विभाग, इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है।
एफएओ कार्यशाला के साथ-साथ समुद्री मत्स्य पालन में जलवायु परिवर्तन को अपनाने के लिए भारत की तैयारियों पर एक विचार-मंथन सत्र का भी आयोजन करेगा। यह सत्र 17-18 अक्टूबर 2023 को होगा, जिसमें भारत सरकार और भारत में अन्य एजेंसियों द्वारा की गई प्रमुख पहलों को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत किया जाएगा।
मत्स्य पालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी मुख्य भाषण देंगे। कार्यक्रम के दौरान संयुक्त सचिव, सुश्री नीतू कुमारी प्रसाद सहित मत्स्य पालन विभाग के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहेंगे।
मनचाहे वरदान पा लिए भगवान शिव से
मनचाहे वरदान पा लिए भगवान शिव से
सुदर्शन भाटिया-
सुगमता से कृपा कर देने वाले भगवान शिव विंध्य पर्वत की तपस्या पर तो प्रसन्न होते ही थे, हुए भी। प्रकट होकर
कहा- विंध्य, तुम पिछले छह महीने से लगातार तप में लीन हो। मांगो, आ गया समय मनवांछित फल पाने का। यहां
उपस्थित अनेक ऋषि-मुनियों की उपस्थिति में तुम्हारी मनोकामना पूर्ण करना चाहता हूं। प्रभु! आपके दर्शन हो गए,
क्या यह कम है। फिर भी मेरी हर मनोकामना से आप परिचित तो हैं ही। मेरे से क्या पूछना। ठीक है! मैं तुम्हारी हर
कामना को पूरा होने का वर देता हूं। साथ ही साथ अपने इस ओंकारेश्वर रूप को दो भागों में बांट रहा हूं- एक तो
ओंकारेश्वर ही कहलाएगा, दूसरा अमलेश्वर। अलग-अलग होते हुए भी इसकी सत्ता एक ही होगी। युगों-युगों तक
नर्मदा में स्नान कर, इन दोनों रूपों के दर्शन तथा परिक्रमा करने के लौकिक-पारलौकिक, दोनों फलों की प्राप्ति होगी।
ये दोनों लिंग आज के मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी के तट पर स्थित हैं। यहां नर्मदा दो भागों में विभक्त होकर बीचों बीच
मान्धता टापू बन गया है। विंध्य पर्वत की अर्चना से काफी पूर्व महाराज मान्धता ने भी शिव को प्रसन्न कर दर्शन पाए
थे। अब सारा का सारा पर्वत ही शिवपुरी के नाम से जाना तथा पूजा जाता है। बहुत मान्यता है इस क्षेत्र की। (विभूति
फीचर्स)
शक्ति की उपासना और कन्याओं पर बढ़ते जुल्म
ललित गर्ग – विभूति फीचर्स
शताब्दियों से हम नवरात्र महोत्सव मनाते हुए कन्याओं को पूजते हैं। पूरे नौ दिन शक्ति की उपासना होती है। दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा-अर्चना करके लोग उनसे कृपा का अनुरोध करते हैं। लेकिन विडम्बना देखिये कि सदियों की पूजा के बाद भी हम कन्याओं को उनका उचित स्थान और सम्मान नहीं दे पाये हैं। हाल ही कि घटनाओं पर नजर डाले, किस तरह देश में कन्याओं एवं महिलाओं के साथ गलत हथकंडों में दुरुपयोग किया जाता है, शोषण किया जाता है, इज्जत लूटी जाती है और हत्या कर देना- मानो आम बात है। इन त्रासद, अमानवीय एवं विडम्बनापूर्ण नारी अत्याचार की बढ़ती घटनाओं के होते हुए मां दुर्गा को पूजने का क्या अर्थ है? सुनने में अजीब लगता है कि देश में अधिकांश लोग पढ़े-लिखे और संपन्न होने के बावजूद घर में कन्या के जन्म लेने पर शोक मनाते हैं। जन्म से पहले ही पता चल जाए कि बच्ची पैदा होगी तो ये उसकी जान लेने से भी नहीं कतराते। ऐसी मानसिकता के लोग किस तरह मां दुर्गा की पूजा के पात्र हो सकते हैं? पिछली सदी में समाज के एक बड़े वर्ग में यह एक विभीषिका ही थी कि परिवार की धुरी होते हुए भी नारी को वह स्थान प्राप्त नहीं था जिसकी वह अधिकारिणी थी।
उसका मुख्य कारण था सदियों से चली आ रही कुरीतियाँ, अंधविश्वास व बालिका शिक्षा के प्रति संकीर्णता। कितनी विडम्बना है कि जिस देश में हम ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा बुलन्द करते हुए एक जोरदार मुहिम चला रहे हैं उस देश में हम एक प्रतिभा सम्पन्न बेटी की जिन्दगी को इसलिये नहीं बचा सके क्योंकि सरकार की नीति उसकी पढ़ाई में बाधक बन गयी। युवा सपनों का टूटना-बिखरना तो आम बात है लेकिन एक दलित बालिका के पढाई का सपना उसकी मौत का कारण बनना सरकार ही नहीं सम्पूर्ण राष्ट्रीयता पर एक बदनुमा दाग है। यह दाग ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के संकल्प पर भी लगा है और यह दाग हमारे द्वारा मां दुर्गा को पूजने की परम्परा पर भी लगा है। नारी अस्मिता एवं अस्तित्व को नोचने वाली घटनाएं हमें बार-बार शर्मसार करती है।
देवभूमि भी धुंधली हुई है क्योंकि पवित्र माटी की गुडिय़ा को जब दरिन्दों ने हवस का शिकार बनाया , यह वीभत्स घटना भी महाभारतकालीन उस घटना का नया संस्करण है जिसमें राजसभा में द्रौपदी को बाल पकड़कर खींचते हुए अंधे सम्राट धृतराष्ट्र के समक्ष, उसकी विद्वत मंडली के सामने निर्वस्त्र करने का प्रयास हुआ था। इस वीभत्स घटना में मनुष्यता का ऐसा भद्दा एवं घिनौना स्वरूप सामने आया है जिसने पूरे राष्ट्र को एक बार फिर झकझोर दिया है। एक बार फिर अनेक सवाल खड़े हुए है कि आखिर कितनी बालिकाएं, कब तक ऐसे जुल्मों का शिकार होती रहेंगी। कब तक अपनी मजबूरी का फायदा उठाने देती रहेंगी। दिन-प्रतिदिन देश के चेहरे पर लगती इस कालिख को कौन पोछेगा? कौन रोकेगा ऐसे लोगों को जो इस तरह के जघन्य अपराध करते हैं, नारी को अपमानित करते हैं। इन सवालों के उत्तर हमने निर्भया के समय भी तलाशने की कोशिश की थी। लेकिन इस तलाश के बावजूद इन घटनाओं का बार-बार होना दु:खद है और एक गंभीर चुनौती भी है। यह समाज की विकृत मानसिकता को भी दर्शाता है।
सोचनीय प्रश्न है कि मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हुए भी हर घर में क्या कन्याओं एवं महिलाओं को जीने का सम्मानपूर्वक स्थान प्राप्त है? जिस तरह कन्या भू्रण हत्या की घटनाएं बढ़ी है, उससे तो ऐसा प्रतीत नहीं होता। जहां पांव में पायल, हाथ में कंगन, हो माथे पे बिंदिया… इट हैपन्स ओनली इन इंडिया- जब भी कानों में इस गीत के बोल पड़ते है, गर्व से सीना चौड़ा होता है। जब नवरात्र के दिनों में कन्याओं को पूजित होने के स्वर सुनते हैं तब भी सुकून मिलता है लेकिन जब उन्हीं कानों में यह पड़ता है कि इन पायल, कंगन और बिंदिया पहनने वाली कन्याओं के साथ इंडिया क्या करता है, तब सिर शर्म से झुकता है। निर्भया कांड, नितीश कटारा हत्याकांड, प्रियदर्शनी मट्टू बलात्कार व हत्याकांड, जेसिका लाल हत्याकांड, रुचिका मेहरोत्रा आत्महत्या कांड, आरुषि मर्डर मिस्ट्री की घटनाओं में पिछले कुछ सालों में इंडिया ने कुछ और ऐसे मौके दिए जब अहसास हुआ कि किसी तरह नारी अस्तित्व बच भी जाए तो दुनिया के पास उसके साथ और भी बहुत कुछ है बुरा करने के लिए। बहशी एवं दरिन्दे लोग ही नारी को नहीं नोचते, समाज के तथाकथित ठेकेदार कहे जाने वाले लोग और पंचायतें भी नारी की स्वतंत्रता एवं अस्मिता को कुचलने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे है स्वतंत्र भारत में यह कैसा समाज बन रहा है, जिसमें महिलाओं की आजादी छीनने की कोशिशें और उससे जुड़ी हिंसक एवं त्रासदीपूर्ण घटनाओं ने बार-बार हम सबको शर्मसार किया है।
नारी के साथ नाइंसाफी चाहे कोटखाई में हो या गुवाहाटी में हुई हो या बागपत में या तमिलनाडू में- नवरात्र का अवसर इन स्थितियों पर आत्म-मंथन करने का है, उस अहं के शोधन करने का है जिसमें श्रेष्ठताओं को गुमनामी में धकेलकर अपना अस्तित्व स्थापित करना चाहता है। देश में हुई जनगणना के आंकड़े चौंकाते ही नहीं बल्कि दुखी भी करते हैं। जिस तरह से लड़के-लड़कियों का अनुपात असंतुलित हो रहा है, उससे ऐसी चिन्ता भी जतायी जाने लगी है कि यही स्थिति बनी रही तो लड़कियां कहां से लाएंगे? केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों ने स्थिति की गंभीरता को देखते कड़े कदम उठाये, लेकिन समस्या कम होने की बजाय आज भी खड़ी है। देश में शिक्षा के क्षेत्र में कुछ पॉजिटिव बदलाव आए हैं। पुरुषों में साक्षरता पिछले दस सालों में 31 फीसदी बढ़ी है तो महिलाओं में 49 फीसदी। लेकिन लड़कियों के लिए समाज के साक्षर होने का कोई सकारात्मक अर्थ नहीं है क्योंकि अधिकतर साक्षर राज्यों और जिलों में बच्चियों का जीवन ज्यादा खतरे में है। आदिवासी इलाकों और पिछड़ा कहे जाने वाले क्षेत्रों में बालिका अनुपात अच्छा ही नहीं, काबिले तारीफ है।
जिस देश में हर साल पांच लाख से अधिक कन्या भू्रण मार दिए जाते हों वहां लड़कियों की सामाजिक हैसियत सुधरने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? सरकार की तमाम कोशिशों एवं सख्त कानूनों के बावजूद भू्रण परीक्षण का प्रचलन बढ़ रहा है। क्या कारण है भ्रूण परीक्षण के बढ़ते प्रचलन का? क्या ऐसा इसलिए किया गया कि भू्रण को कोई असामान्य परेशानी थी, मां का शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं था या गर्भ निरोधक नाकाम रहा था। नहीं। एक्सपर्ट कहते हैं 80 फीसदी मेडिकल अबॉर्शन कन्याभ्रूण के ही होते हैं। किस मेडिकल ग्राउंड पर इसकी इजाजत दी जाती है, कोई नहीं जानता। इस मामले में डॉक्टर एवं भ्रूण परीक्षण कराने वाला परिवार दोनों ही दोषी होते हैं। जिन परिवारों में देवी की पूजा अर्चना की जाती है, उन परिवारों में जन्म से पहले ही कन्याओं को मार देने की स्थितियां हमारी धार्मिक आस्था पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े करती है।
गुजरात, महाराष्ट्र और बंगाल में लोग छोटा परिवार चाहते हैं और बेटी को बुरी नहीं मानते। लेकिन कम से कम एक बेटा होना उन्हें भी जरूरी लगता है। पंजाब, हरियाणा और उत्तरप्रदेश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो किसी की पहली संतान बेटी होने पर अगली बार बेटा होने का आशीर्वाद देते हैं और अगली बार भी बेटी हुई तो दिलासा देने आते हैं। अस्पताल में बेटी होने पर बधाई नहीं मांगी जाती, लेकिन बेटा होने की खबर आते ही पूरे परिवार एवं समाज में जश्न की तैयारियां होने लगती हैं। अगर कोई बेटी के जन्म पर खुश होना चाहे तो समाज उसे ऐसा नहीं करने देता। क्या जन्म के बाद बेटे और बेटी के बीच भेदभाव कम करने की किसी कोशिश को सराहा जाता है? ऐसा होने लगे तभी देवी- पूजा की सार्थकता है और तभी हमारा नवरात्र महोत्सव मनाना उपयोगी है। (विभूति फीचर्स)
मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम – विदेशों में भी प्रेरणास्त्रोत रही है रामकथा
दिनेश चंद्र वर्मा –
मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम का चरित्र सदैव से ही प्रेरणा का स्त्रोत रहा है। एशियाई देशों में रामकथा इतनी लोकप्रिय रही है कि हर एशियाई भाषा में भगवान राम का जीवन चरित्र लिखा गया है। भारत की तो हर भाषा में रामायण मिलती है किन्तु एशियाई देशों में भी रामकथा इतनी व्यापक एवं प्रचलित थी कि कम्बोडिया, थाईलैण्ड और जाबा में रामकथा से चित्रित मंदिर आज भी देखने को मिलते हैं। कम्बोडिया की राजधानी पअंग कोर वाटफ में विश्व के सबसे विशाल मंदिर में रामकथा उत्कीर्ण है। इस मंदिर में लगी विशालकाय चट्ïटानें इतनी बड़ी हैं कि उन्हें हाथियों से खींचना तक कठिन था, किन्तु ये चट्टानें उस समय आदमी खींच कर लाये थे।
” थाईलैण्ड में राम की कथा रामकियेन के नाम से प्रचलित है। यह कथा लगभग उसी स्वरूप में है, जिस स्वरूप में संस्कृत में महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है। हां एक अंतर अवश्य है इस कथा में रावण के वध के बाद लंका की स्थिति का भी विवरण मिलता है। इस विवरण के अनुसार चक्रवाल के राजा महापाल ने एक बार लंका पर आक्रमण कर दिया था तब लंका के शासकों की मदद हेतु भगवान राम ने हनुमान को लंका भेजा था। रामकियेन की मूल कथा जहां वाल्मीकि रामायण के समान है, वहीं उसमें कुछ नये पात्रों का भी समावेश है। कुछ पात्रों के नाम बदले हुए हैं। ”
कम्बोडिया के अतिरिक्त इंडोनेशिया, थाईलैण्ड, जाबा, सुमात्रा और बाली में रामकथा का आज भी प्रचलन है। कुछ इतिहासकारों की मान्यता है कि इन देशों में बौद्ध धर्म के पहुंचने के कई वर्षों पूर्व से रामकथाएं प्रचलित थीं। स्थानीय भाषाओं में इनका व्यापक प्रचार-प्रसार था। इन देशों में मिले कुछ पुरातत्व अवशेष इस धारणा की पुष्टिï करते हैं। मलेशिया को पूर्ण इस्लामी देश माना जाता है किन्तु वहां 'हकायत सिरीराम’ के नाम से आज भी रामकथा प्रचलित है। इस कथा पर आधारित नाटक भी वहां खेले जाते हैं। 'हकायत सिरीराम’ मे राम का आदर्श चरित्र तो ज्यों का त्यों है पर कथा एवं पात्रों में वाल्मीकि रामायण से काफी अंतर है। जैसे इस कथा में कैकई का नाम बलिया दरी बताया गया है तथा उसे रानी के स्थान पर दासी बताया गया है। राम को इस कथा में ;सिरीराम’ कहा गया है। लक्ष्मण के नाम में कोई परिवर्तन नहीं है, किन्तु भरत को 'वरदान’ कहा गया है। सीता को रावण की पुत्री बताया गया है तथा कहा गया है कि सीता के पैदा होते ही ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि यह कन्या अपने पिता की मृत्यु का कारण बनेगी। रावण ने इस कन्या को नदी में बहा दिया। यह कन्या एक ऋषि को मिली तो उन्होंने उसका पालन -पोषण किया। इस कन्या के विवाह के लिए ऋषि ने यह शर्त रखी थी कि जो व्यक्ति एक तीर से चालीस वृक्षों को छेद देगा उसके साथ ही इस कन्या का विवाह किया जाएगा। राम ने इस शर्त को पूरा किया और उनका सीता के साथ विवाह कर दिया गया। इस कथा में रावण की बहिन शूर्पनखा का नाम 'सुरापंडिका’ कहा गया है। कथा में हनुमान जी का भी उल्लेख है पर उन्हें वानर नहीं माना गया है। हकायत सिरीराम के अनुसार हनुमान जी अंजनी नामक तपस्विनी के पुत्र थे, उनकी मुखाकृति वानर से मिलती थी। इस कथा में सीता की अग्नि परीक्षा तथा बाद में उन्हें राम द्वारा त्याग देने का उल्लेख भी है। महर्षि वाल्मीकि को इस कथा में;ऋषि काली’ कहा गया है। इस कथा में यह भी कहा गया है कि बाद में राम और सीता का मिलन हो गया था तथा वे वन चले गये थे।
रामायण का चीनी भाषा में भी अनुवाद हुआ तथा कालांतर में वह बौद्ध साहित्य में शामिल हो गया। बौद्ध साहित्य में रामकथा 'दशरथ जातक’ के रूप में प्रचलित है। जापान में रामकथा को आज भी नृत्य नाटिका के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। टोकियो के काबुकी थियेटर में रामायण पर आधारित नाटक और नृत्यों का मंचन किया जाता है, जो आज भी वहां बहुत लोकप्रिय है। एशियाई देशों में रामकथा के व्यापक प्रचार-प्रसार के साक्षी मध्य जावा के प्राचीन शिव मंदिर भी हैं। प्रेम बनन तथा पर तरन में स्थित इन दोनों शिव मंदिरों में रामकथा उत्कीर्ण है। ईरान में नौवीं शताब्दी में रामायण का रूपांतर ईरानी भाषा में हो चुका था। जाबा में दसवीं शताब्दी में रामकथा पर आधारित 'रामायने ककबीन’ नामक ग्रन्थ की रचना हो चुकी थी। वहां 'सेरतराम’ नामक एक अन्य ग्रन्थ भी मध्यकाल में लिखा गया, जो रामकथा पर ही आधारित है। बाली दीप में आज भी ;चरित्र रामायण’ के नाम से रामकथा प्रचलित है।
कम्बोडिया में;रामकेति’ नामक एक अति प्राचीन ग्रन्थ उपलब्ध हुआ है। इस ग्रंथ के 80 सर्ग ही मिल पाए हैं तथा इसमें राजा दशरथ के पुत्रयेष्ठिï यज्ञ से मेघनाद वध तक की कथा समाहित है। थाईलैण्ड की राजधानी बैंकाक के बौद्ध मंदिरों में रामकथा उत्कीर्ण है। थाईलैण्ड के शासक आज भी अपने नाम के साथ राम लगाते हैं। थाईलैण्ड में रामकथा पर आधारित कोई एक दर्जन ग्रंथ उपलब्ध हैं।
वर्मा (म्यानमार) में राम के चरित्र पर रामयागन नामक ग्रंथ की रचना हुई। तिब्बती भाषा में भी भगवान राम के जीवन पर आधारित ग्रंथ मिले हैं। तुनछांग की गुफाओं में दो ऐसी पांडुलिपियां मिली हैं, जिनमें राम की कथा थी तथा जिनकी रचना छठवीं एवं सातवीं शताब्दी में हुई थी। साईबेरिया तथा रूस के हाल्मिंग गणराज्य में भी रामकथा प्रचलित होने के प्रमाण मिलते हैं। श्रीलंका में भी सिंहली भाषा में राम की महिमा में कोई आधा दर्जन से अधिक ग्रंथ लिखे जाने के प्रमाण मिले हैं, जिनमें सुवेणी, सीतात्याग तथा जानकी हरण के नाम उल्लेखनीय हैं। भारत में आक्रांताओं के आगमन के पूर्व से ही रामकथा मध्यपूर्व में प्रचलित थी पर मुगल शासकों के काल में अरबी एवं फारसी में भी रामकथा का अनुवाद हुआ। बाद में यूरोपीय देशों में भी रामकथा पहुंची तथा अंग्रेज साहित्यकारों की मान्यता है कि, होमर मिल्टन तथा शेक्सपियर की कुछ रचनाओं पर रामकथा का प्रभाव पाया जाता है। पादरी फ्रेंक हेवलिंग नामक अंग्रेज लेखक ने अपनी पुस्तक 'दी राईज ऑफ रिलीजियस सिग्नीफेन्स ऑफ दी राम’ में इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कहा है कि यूरोप में राम का महत्व बढ़ता जा रहा है।
विभिन्न यूरोपीय भाषाओं में रामकथा का अनुवाद हुआ। पार्जिटन ने वाल्मीकि रामायण का अनुवाद किया। रूसी विद्वान वारान्निकोव ने तुलसी कृत रामचरित मानस को अनुदित किया। यूरोपीय विद्वान फादर कामिल बुल्के तो रामकथा से इतने अभिभूत हुए कि वे बीसवीं सदी के रामायण के सबसे बड़े विद्वान के रूप में जाने जाते हैं। अनेक यूरोपीय विद्वानों ने रामकथा की विवेचना और मीमांसा अपने-अपने दृष्टिïकोण से की है, जैसे ए.के. वेवर का कथन है कि राम ने श्रीलंका में अपने धर्म के प्रचार हेतु युद्ध लड़ा था। मोनियर विलियम्स के मतानुसार राम ने आर्य संस्कृति के प्रचार के लिए श्रीलंका पर आक्रमण किया था।
अब विद्वान रामकथा की किसी भी तरह विवेचना करते रहें पर दो तथ्य अब स्थापित हो चुके हैं। एक तो दुनिया के हर देश में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का चरित्र प्रेरणादायी माना जाता है तथा दूसरा तथ्य यह है कि सदियों पूर्व रामकथा सुदूर देशों में प्रचलित हो गई थी। (विभूति फीचर्स)












