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शिवराज सिंह चौहान ने कृषि छात्रों से किया संवाद

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27 अक्टूबर 2025, नई दिल्ली: शिवराज सिंह चौहान ने कृषि छात्रों से किया संवाद, कृषि शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए ICAR को दिए दिशा-निर्देश – केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान की उपस्थिति में आज (सोमवार, 27 अक्टूबर) पूसा, दिल्ली में राष्ट्रीय कृषि छात्र सम्मेलन का वृहद आयोजन किया गया, जिसमें देशभर के कृषि छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में शामिल हुए। वहीं हजारों विद्यार्थी वर्चुअल भी जुड़े थे। साथ ही, कृषि वैज्ञानिक, प्राध्यापक और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) तथा कृषि विश्वविद्यालयों के पदाधिकारी भी शामिल हुए और केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी वर्चुअल शामिल हुए।

इस महत्वपूर्ण सम्मेलन का उद्देश्य कृषि क्षेत्र में नवाचार, रिसर्च, आधुनिक तकनीकों व ज्ञान का आदान-प्रदान सुनिश्चित करना था। इसमें विद्यार्थियों को कृषि विज्ञान के आधुनिक आयाम और सरकार की नीतियों से अवगत कराया गया, वहीं इस मंच के माध्यम से कृषि शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने, युवा प्रतिभाओं को प्रेरित करने और कृषि में शोध कार्य को गति देने का प्रयास किया गया।

कृषि शिक्षा से खाली पदों को भरने के लिए मुख्यमंत्रियों को भेजेंगे पत्र
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने संबोधन में इस बात पर चिंता जताई कि कृषि शिक्षा से जुड़े कई पद खाली पड़े है, उन्होंने बेहतर कृषि शिक्षा के लिए सभी खाली पद शीघ्र भरने के निर्देश ICAR के महानिदेशक को दिए, साथ ही कहा कि सुचारू कृषि शिक्षा और राज्यों में विश्वविद्यालयों तथा कॉलेजों में खाली पड़े सभी पद शीघ्र भरने के लिए वे सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र भी भेजेंगे और वहां के कृषि मंत्रियों से भी चर्चा करेंगे।

कृषि में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जरूरी

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा कि कृषि के छात्र-छात्राओं के भविष्य से किसी भी कीमत पर खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। शिवराज सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी जी के मार्गदर्शन में बनाई गई नई शिक्षा नीति के अनुरूप देश में कृषि की भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना बहुत आवश्यक हैं। शिवराज सिंह ने कमियों को दूर करने के लिए कृषि विद्यार्थियों की एक टीम बनाकर रचनात्मक सुझाव लेने के भी ICAR को निर्देश दिए।

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह ने कहा कि कृषि विश्वविद्यालय और कॉलेजों की ग्रेडिंग के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होना चाहिए। दुनिया में हो रहे बेहतर प्रयोगों का अध्ययन कर अपने देश में भी लागू करने के उपाय ICAR करें।

मंत्री शिवराज सिंह ने कहा कि खेती और गांव हमने मिलकर विकसित कर दिए तो पलायन भी रुकेगा, यह भी देशसेवा हैं। उन्होंने कहा कि हम आत्मनिर्भर बनें, ताकि किसी भी देश पर हमारी निर्भरता नहीं रहे। विकसित और आत्मनिर्भर भारत, खेती के विकास के बिना नहीं हो सकता। यह भी देखें कि कृषि निर्यात और कैसे बढ़ सकता है। सालभर में कम से कम एक बार कृषि के विद्यार्थियों को किसानों के खेतों पर जाना ही चाहिए, ताकि उन्हें व्यवहारिक ज्ञान मिल सकें। किसानों की प्रेक्टिकल प्रॉब्लम्स क्या है, यह जानने के साथ ही उनका समाधान भी छात्र -छात्राएं सोचें। हमें कृषि का पूरा परिदृश्य बदलना है, जिसमें कृषि के छात्र-छात्राएं भी अपना योगदान दें।

शिवराज सिंह ने कहा कि कृषि के छात्र साधारण जीवन नहीं जिए, बल्कि एक लक्ष्य तय कर उसे पूरा करने के लिए उद्देश्यपूर्ण जीवन जीयें, जीना उसका जीना है, जो औरों को जीवन देता है।

ICAR के कृषि शिक्षा प्रभाग और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में कृषि छात्रों ने अपने अनुभव साझा किए व केंद्रीय कृषि मंत्री  शिवराज सिंह से सीधा संवाद स्थापित किया। विद्यार्थियों ने कृषि क्षेत्र में आ रहे बदलावों, नई तकनीकों व सरकार की नीतियों से जुड़कर आगे बढ़ने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, वहीं अपनी समस्याएं भी बताई। मंत्री चौहान ने छात्र- छात्राओं की बातों को गंभीरता से सुनकर समस्याओं का समुचित समाधान करने की बात कही, वहीं सभी को उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ दीं।

सिपाही के भतीजे ने ईंट से गाय को मार डाला

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प्रयागराज के नैनी काजीपुर मोहल्ले में एक सिपाही के विक्षिप्त नाबालिग भतीजे ने गाय के बच्चे को ईंट से सिर पर मार दिया। जिससे मवेशी मौत हो गई। घटना के बाद मौके पर लोगो की भीड़ जुट गई। सूचना पर पहुंची पुलिस ने मौके पर पहुंचकर पूछताछ की।

वहीं मवेशी को मारने वाले नाबालिग के परिजनों ने कहा, बेटा मानसिक रूप से विक्षिप्त है। हालांकि गाय के मालिक ने कोई कार्रवाई न करने की बात कही। जिसके बाद पुलिस ने गाय के शव को अंतिम संस्कार के लिए भिजवा दिया।

दिन भर गली में घूमता रहता है विक्षिप्त किशोर किशोर के के बारे में स्थानीय लोगों ने बताया- वह आए इस तरह की हरकत करता रहता है। पिता भानु ने बताया कि बेटे का दिमागी संतुलन ठीक नहीं है। इसलिए वह दिनभर गलियों में घूमता है। अचानक से उसने ईंट से मवेशी को मार दिया होगा। जिससे उसकी मौत हो गई होगी। गाय का अंतिम संस्कार करा दिया जा रहा है।

नैनी काजीपुर मोहल्ले में रहने वाले भानू दो भाई है। छोटा भाई इंद्र प्रताप पुलिस में कांस्टेबल है। भानू किराने की दुकान चलाते है। उसी मोहल्ले में रहने वाले बबलू भारतीय का परिवार भी रहता है। उन्होंने एक गाय पाल रखी है। बबलू का बेटा करीब 15 वर्ष का है। जो मानसिक रूप से विक्षिप्त है।

सोमवार को उसने बबलू की गाय के सिर पर एक बड़े ईंट से मार दिया। जिससे गाय की मौके पर ही तड़पकर मौत हो गई। घटना के वक्त बबलू जाप पर गया हुआ था। उसका परिवार घर पर था। घरवाले उस किशोर के विक्षिप्त होने के कारण कोई कार्रवाई नहीं किए।सूचना नैनी पुलिस को मिली तो नैनी इंस्पेक्टर ब्रज किशोर गौतम मौके पर पहुंचे और घटना की जांच कर पूछताछ की। बबलू के घरवाले ने किशोर के पिता को बुलाया। इसके बाद पुलिस ने पूछताछ की। मामले में बबलू के घरवालों ने कोई भी कार्रवाई न करने की बात की। इसके बाद पुलिस ने किशोर के पिता भानु से मृत गाय का अंतिम संस्कार करने के लिए कहा। जिसके बाद मामला शांत हो सका।

बठिंडा -जिले की सरकारी गोशाला गोवंशों की लगातार हो रही मौत

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बठिंडा। जिले की सरकारी गोशाला कैटल पौंड हररायेपुर में गोवंशों की लगातार हो रही मौतों ने प्रशासनिक व्यवस्थाओं की पोल खोल दी है। आरटीआइ के तहत सामने आए आंकड़ों से राजफाश हुआ है कि जनवरी 2024 से अगस्त 2025 तक कुल 2411 गोवंशों की मौत हो चुकी है।

इस सरकारी गोशाला का उद्घाटन 1 अप्रैल 2016 को अकाली दल की सरकार के कार्यकाल में तत्कालीन सांसद हरसिमरत कौर बादल ने किया था। गोशाला में सुधार के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद हालात जस के तस हैं। गोवंश सेवा कमीशन पंजाब के चेयरमैन कई बार यहां का निरीक्षण कर चुके हैं, लेकिन उनकी यात्राओं के बाद भी यहां कोई ठोस सुधार नहीं हुआ।

आरटीआइ कार्यकर्ता संजीव गोयल ने बताया कि गोशाला में हर माह लगभग 24 से 28 प्रतिशत तक गोवंशों की मौत हो रही है। इससे यह साफ होता है कि लाखों रुपये की ‘डाइट मनी’ जारी होने के बावजूद पशुओं को न तो पर्याप्त आहार मिल रहा है और न ही उचित इलाज। गोवंशों को यहां भूख-प्यास और बीमारियों के बीच दम तोड़ना पड़ रहा है।

साल 2025 के आंकड़ों के अनुसार, मई माह में सबसे ज्यादा 208 गोवंशों की मौत दर्ज की गई है। इसके बाद जुलाई और अगस्त में 179-179, जून में 165, और जनवरी में 127 गोवंशों की मौत हुई है। फरवरी से अप्रैल के बीच भी दर्जनों मौतें हुईं। इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि हररायेपुर गोशाला में लगातार हो रही लापरवाही ने इसे एक ‘सरकारी कब्रगाह’ में बदल दिया है।

स्थानीय लोगों और समाजसेवियों का कहना है कि शहर से पकड़े गए बेसहारा गोवंशों को जब इस गोशाला में छोड़ा जाता है, तो वहां उन्हें न तो पर्याप्त भोजन मिलता है और न ही पीने का साफ पानी। कई बार मृत पशुओं के शवों को समय पर उठाया भी नहीं जाता। गोशाला की व्यवस्थाओं को लेकर पहले भी बठिंडा में कई बार धरने-प्रदर्शन हो चुके हैं, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं आया।

अब जबकि आरटीआइ में इतने गंभीर आंकड़े सामने आए हैं, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर गोवंशों के नाम पर खर्च की जाने वाली राशि कहां जा रही है। आरटीआइ कार्यकर्ता गोयल ने प्रशासन से मांग की है कि हररायेपुर गोशाला में मृत गोवंशों की जांच के लिए एक स्वतंत्र उच्च स्तरीय समिति गठित की जाए और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।

महीना-वर्ष मृत गोवंश की संख्या जितने प्रतिशत गोवंश की मौत हुई

वर्ष – 2025
जनवरी-2025 127 गोवंश 16.68% (लगभग)
फरवरी-2025 59 गोवंश 09.30% (लगभग)
मार्च-2025 92 गोवंश 12.76% (लगभग)
अप्रैल-2025 121 गोवंश 14.88% (लगभग)
मई-2025 208 गोवंश 27.91% (लगभग)
जून-2025 165 गोवंश 26.02% (लगभग)
जुलाई-2025 179 गोवंश 24.09% (लगभग)
अगस्त-2025 179 गोवंश 25.21% (लगभग)

शहरों में सड़कों पर प्लास्टिक खाने से गायें मर रही हैं, इसे रोकना जरूरी है – जी. किशन रेड्डी

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हैदराबाद। केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने रविवार को कृष्णा म्यूजियम इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट (केएमआईटी) में आयोजित एक पुरस्कार समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए। समारोह में गौ रक्षा और संरक्षण पर केंद्रित पुरस्कार वितरित किए गए, जहां रेड्डी ने गायों के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा व्यक्त की और वेदों का हवाला देते हुए उन्हें ‘ब्रह्मांड की माता’ करार दिया।

गोसेवा तेलंगाना विभाग के तत्वावधान में आयोजित राज्य स्तरीय तेलंगाना क्षेत्र गौ ज्ञान पुरस्कार समारोह का आयोजन हुआ। इस समारोह में रेड्डी ने कहा, “ग्रामीण परिवेश में पला-बढ़ा होने के कारण मेरे मन में गौ माता के प्रति विशेष सम्मान है। चरागाहों में स्वतंत्र विचरण करती गायों का दृश्य अनुभव करने वाले ही उसकी सुंदरता समझ सकते हैं।” उन्होंने वेदों का उद्धरण देते हुए बताया, “‘गौ विश्वस्य मातरः’ का अर्थ है कि गाय ब्रह्मांड की माता हैं। हमें इस कहावत को साकार करना चाहिए। गाय न केवल दूध देती हैं, बल्कि उनकी सांसें भी मनुष्य की आधी स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान करती हैं।” रेड्डी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण दिया, जिन्होंने स्वयं कहा है कि वे घर पर गायें पालते हैं और तनाव दूर करने के लिए उनके साथ समय बिताते हैं। मंत्री ने गायों की वर्तमान दुर्दशा पर चिंता जताई। उन्होंने कहा, “कृषि योग्य भूमि और चरागाहों की कमी से गायों की स्वतंत्रता छिन गई है। वे अब संकरी जगहों में बंधी रहती हैं, जो उनके हक का उल्लंघन है।”

रेड्डी ने गौ रक्षा को पूरे समाज की जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि गौ उत्पादों जैसे घी के महत्व से लोग अनजान हैं। उन्होंने स्वयं गौ घी के उपयोग का जिक्र किया और बताया कि सऊदी अरब जैसे देश भी गौ अपशिष्ट से मिट्टी की उर्वरता बढ़ा रहे हैं। समारोह में रेड्डी ने गौ सेवा विभाग की सराहना की और कहा, “यह कार्यक्रम आने वाली पीढ़ियों के लिए गौ रक्षा का संदेश देगा। कई राज्य गौ रक्षा को सब्सिडी दे रहे हैं। गौ माता से नफरत या किसी धर्म से जोड़ना अनुचित है। शहरों में सड़कों पर प्लास्टिक खाने से गायें मर रही हैं, इसे रोकना जरूरी है।”

लोक आस्था, पौराणिकता और संस्कृति का उजियारा बिखेरता छठ महापर्व

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(अंजनी सक्सेना-विभूति फीचर्स)

भारतीय संस्कृति के पर्वों में छठ पूजा वह अनूठा पर्व है जिसमें पौराणिकता, धार्मिकता, लोक संस्कृति और प्रकृति की आराधना का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोक जीवन का उत्सव है। यह एक ऐसा पर्व है जिसमें धरती, जल, सूर्य और वायु सबको समान रूप से पूजनीय मानकर मनुष्य अपनी जड़ों से जुड़ता है।
भारतीय समाज में छठ पर्व केवल आस्था का नहीं, बल्कि आत्मीयता और पहचान का पर्व है। यह हमारे समाज का वह जीवंत उत्सव है, जो गांवों की माटी, माँ की गोद, घाटों की गूंज और गीतों की मिठास में बसता है।
छठ, लोक का पर्व है, इसमें न कोई भेद है, न कोई दिखावा। यह उस श्रमशील, सहज और संतुलित भारतीय समाज की पहचान है, जो प्रकृति और मनुष्य के संबंध को सबसे पवित्र मानता है इसलिए इसे लोक आस्था का महापर्व कहा गया है। यहां न केवल ईश्वर की उपासना होती है, बल्कि इसे मानवता की एकता और आस्था के उत्सव के रुप में भी मनाया जाता है।
छठ पूजा का धार्मिक पक्ष जितना प्राचीन है, उतना ही गूढ़ भी। ऋग्वेद से लेकर स्कंद पुराण तक सूर्य की उपासना का उल्लेख मिलता है। कथाओं में कहा गया है कि देवताओं और असुरों की रक्षा के लिए अदिति ने सूर्यदेव का आव्हान किया था, और उसी से उत्पन्न हुए मार्तंड सूर्य की आराधना ही आगे चलकर छठ के रूप में स्थापित हुई।
हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य को प्राणों का आधार कहा है उनके बिना न प्रकाश है, न जीवन इसलिए छठ केवल धार्मिक कृत्य नहीं, बल्कि जीवन के स्रोत सूर्य के प्रति कृतज्ञता का भाव है। इस पर्व की मूल भावना यही है सूर्य से ऊर्जा, सूर्य से जीवन, और सूर्य से संतुलन।
व्रतियों का विश्वास है कि सूर्योपासना से सारे कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। डूबते और उगते दोनों सूर्य को अर्घ्य देने का अर्थ है जीवन के हर चरण में प्रकाश और संतुलन का स्वागत करना।
छठ की एक और बड़ी खूबसूरती इसके लोकगीतों में है। यह पर्व केवल पूजा नहीं, बल्कि संगीतमय साधना है।
घरों, घाटों, आँगनों और गलियों में जब “कांच ही बांस के बहंगिया” या “केरवा जे फरेला घवद से” गूंजते हैं, तो वह केवल गीत नहीं होते वे भावनाओं की लहरें होती हैं जो हर मन को भक्तिभाव से भर देती हैं।
पद्मश्री विंध्यवासिनी देवी,पद्मभूषण शारदा सिन्हा और विजया भारती के कंठों से निकले छठ गीतों में न केवल संगीत है, बल्कि लोकजीवन की आत्मा बसती है । इन गीतों में माँ की सादगी, व्रती की श्रद्धा और पूरे समाज की एकता की गूंज आज भी सुनाई देती है। इन गीतों को सुनते ही लगता है जैसे घर के आँगन में ही छठ मैया उतर आई हों।
छठ गीतों की परंपरा केवल भोजपुरी तक सीमित नहीं बल्कि मैथिली, अंगिका, वज्जिका, मगही हर बोली में इनका अपना अलग स्वर है। मगही का “चल.. चल.. अरघ के बेरिया” और भोजपुरी का “कोपि कोपि बोलेली छठी माई” लोक भावना के दो छोर हैं, जो भक्ति और मातृत्व की गहराई में एक ही बिंदु पर मिलते हैं।
छठ पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। इस दिन कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। हर व्यक्ति घाट पर समान भाव से खड़ा होता है, सब एक साथ, एक लय में, एक आस्था में। यह समरसता ही छठ की आत्मा है।
बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड से लेकर नेपाल तक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर जगह यह पर्व समाज को जोड़ता है। गांव-गांव में तालाबों के किनारे बने छठी मैया के मंदिर और घाट, केवल उपासना स्थल नहीं बल्कि लोक संस्कृति के जीवंत केंद्र हैं। यहां गीत, व्रत, परंपरा और सामूहिकता का ऐसा संगम होता है, जो किसी अन्य पर्व में विरले ही देखने को मिलता है।
समय के साथ बहुत कुछ बदला है, लेकिन छठ की आत्मा आज भी वही है। आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया ने इस पर्व को वैश्विक पहचान दी है। अब छठ के गीत मुंबई के जुहू बीच से लेकर न्यूयॉर्क के हडसन नदी तक गूंजते हैं। विंध्यवासिनी देवी,शारदा सिन्हा,विजया भारती,मैथिली ठाकुर जैसी कलाकारों ने छठ गीतों को लोक धरोहर से उठाकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाया है।
आज युवा कलाकार भी नए सुरों में छठ गीत गाते हैं, लेकिन पारंपरिक धुनों की आत्मीयता अब भी अतुलनीय है।
भले ही अब अनुराधा पौडवाल, उदित नारायण, सोनू निगम जैसे प्रसिद्ध गायक इन गीतों को स्वर दे रहे हों, मगर जो पवित्रता और सहजता गांव की बूढ़ी नानी की आवाज़ में थी, वह किसी मंच पर नहीं मिल सकती। छठ का यह रूप आधुनिक भारत में परंपरा और प्रगति के समन्वय का उदाहरण है।
छठ पूजा वर्ष में दो बार मनाई जाती है, चैत्र शुक्ल षष्ठी और कार्तिक शुक्ल षष्ठी को। कार्तिक मास की छठ सबसे लोकप्रिय है। यह तीन दिन का पर्व है, जिसमें हर चरण अपने भीतर एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है।
पहले दिन ‘नहाय-खाय’ में शरीर और मन की शुद्धि होती है। दूसरे दिन ‘खरना’ यानी पूर्ण उपवास और फिर प्रसाद का सेवन। तीसरे दिन शाम को डूबते सूर्य को अर्घ्य और चौथे दिन उगते सूर्य की वंदना के साथ यह पर्व संपन्न होता है।
व्रती महिलाओं की यह तपस्या केवल उपवास नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के संतुलन की साधना है।
व्रत के दौरान व्रती जमीन पर सोती हैं, नमक, तेल और मसाले से परहेज करती हैं ।
अर्घ्य के समय जब हजारों दीपक एक साथ जलते हैं, घाटों पर गीतों की ध्वनि गूंजती है, और सूर्यदेव की लालिमा जल में झिलमिलाती है तब वह क्षण केवल दर्शन नहीं, परमानंद का अनुभव होता है।
आज छठ केवल बिहार या उत्तर प्रदेश का नहीं रहा।
यह भारत की सीमाओं को लांघकर वैश्विक पर्व बन चुका है।
लंदन, न्यूयॉर्क, मॉरिशस, फिजी, दुबई, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका हर जगह जहां भारतीय समुदाय बसा है, वहां छठ घाट सजते हैं।
छठ का हर प्रतीक जैसे मिट्टी का दीपक, गंगाजल, ठेकुआ, केला, नारियल, ईख, सूप सभी प्राकृतिकता और स्वदेशी भावना के प्रतीक हैं। यह पर्व हमें बताता है कि सच्ची भक्ति वही है जो प्रकृति के प्रति आभार से उपजे।
छठ का हर अर्घ्य सूर्य को नहीं, बल्कि जीवन को समर्पित होता है। सूर्य, जो सृष्टि का स्रोत है, जिसे हमारे शास्त्रों ने ‘प्राण का अधिपति’ कहा है, वही इस पर्व का केंद्र है।
सूर्य के सात घोड़े ऊर्जा के सात रूपों का प्रतीक हैं, और छठ का व्रत उसी ऊर्जा के संतुलित उपयोग की साधना है।
छठ न तो केवल स्त्रियों का पर्व है, न किसी एक क्षेत्र का। यह भारत की आत्मा का उत्सव है जहां सादगी, श्रद्धा और सामूहिकता एक साथ चलती हैं। जब घाटों पर व्रती सूर्य को अर्घ्य देती हैं, जल में झिलमिलाती लौओं के बीच गीत गूंजता है – “सेई ले शरण तोहार ए छठी मइया, सुनी लेहू अरज हमार…” तो लगता है जैसे पूरी सृष्टि प्रार्थना में डूबी हो। महापर्व छठ हमें हर वर्ष यही स्मरण कराता है कि हमारी संस्कृति, हमारी आस्था और हमारी लोक परंपरा सूर्य की तरह शाश्वत है। (विभूति फीचर्स)

शिवराज सिंह चौहान ने किया वेल्लोर कृषि विज्ञान केंद्र का दौरा

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“एक कृषि–एक देश– एक टीम”: किसानों की समृद्धि और ग्रामीण परिवर्तन की दिशा में राष्ट्रीय संकल्प

तमिलनाडु में केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिंह ने चौपाल पर किया किसानों, दीदियों और ग्रामीणजनों के साथ संवाद

श्री शिवराज सिंह ने प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना, प्राकृतिक खेती, दलहन मिशन, विविधीकरण से जुड़ी बातें की साझा

प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना में तमिलनाडु के रामनाथपुरम, शिवगंगई, तूतीकोरिन और विरुधुनगर जिले हैं शामिल

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने आज तमिलनाडु के आईसीएआर–कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), वेल्लोर का दौरा किया। यह दौरा देशभर में कृषि क्षेत्र की समग्र प्रगति और “एक कृषि–एक देश– एक टीम” की एकजुटता का प्रतीक है। यहां श्री शिवराज सिंह ने किसानों तथा ग्रामीणों से संवाद किया। उन्होंने किसानों से प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना (पीएम-डीडीकेवाई), राष्ट्रीय दलहन मिशन, राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन (एनएमएनएफ), क्लस्टर फ्रंटलाइन डिमॉन्स्ट्रेशन ऑन पल्सेस (CFLD on Pulses), फरमेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर (एफओएम/एलएफओएम) तथा केवीके से जुड़ी अन्य पहलों के बारे में चर्चा की।

केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने वेल्लोर में प्रगतिशील किसानों, महिला स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण युवाओं से संवाद करने के साथ ही क्षेत्र की उपलब्धियों की समीक्षा की। उन्होंने केवीके वेल्लोर द्वारा विकसित वाइल्ड बोअर रिपेलेंट जैसी अभिनव तकनीक की सराहना की, जिसने किसानों को जंगली सूअरों से फसल सुरक्षा के लिए व्यावहारिक समाधान प्रदान किया है। केंद्र द्वारा संचालित सीड हब और पल्सेस मिशन के तहत उच्च उत्पादकता वाली किस्मों (VBN-8, VBN-10, VBN-11) का सफल प्रसार किया गया है। प्रदर्शनी में कृषि नवाचारों और मूल्यवर्धित उत्पादों का श्री शिवराज सिंह ने अवलोकन किया।

केंद्रीय मंत्री श्री चौहान ने किसानों से उक्त योजनाओं से लाभ, कृषि, पशुपालन तथा मत्स्यपालन से संबंधित प्रतिक्रिया ली और उनका मार्गदर्शन किया। चौपाल संवाद के दौरान योजनाओं का ज़मीनी प्रभाव जानने के साथ ही श्री शिवराज सिंह ने आसपास के जिलों के किसानों से बातचीत की।

श्री चौहान ने पहली चौपाल में तमिलनाडु के विरुधुनगर, शिवगंगई, तूतीकोरिन और रामनाथपुरम के पीएमडीडीकेवाई से जुड़े किसानों से संवाद किया। प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना में रामनाथपुरम, शिवगंगई, तूतीकोरिन और विरुधुनगर (तमिलनाडु) शामिल हैं। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना के अंतर्गत 11 केंद्रीय मंत्रालयों की 36 योजनाओं को एकीकृत कर किसानों को व्यापक लाभ पहुंचाया जाएगा। उन्होंने चारों केवीके प्रमुखों से इन योजनाओं के संविलयन (convergence) की प्रगति पर जानकारी ली। यहां किसानों ने प्राकृतिक खेती, मुण्डु मिर्च, दलहन और तिलहन सीएफएलडी, और अन्य परियोजनाओं से अपनी संतुष्टि व्यक्त की।

दूसरी चौपाल में श्री शिवराज सिंह ने प्राकृतिक खेती और राष्ट्रीय दलहन मिशन पर विशेष बल दिया और कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा शुरू किया गया यह अनोखा अभियान देश को दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाएगा। उन्होंने बताया कि तमिलनाडु जैसे राज्य को इस योजना से अत्यधिक लाभ होगा क्योंकि इस अंतर्गत बेहतर किस्में, आधुनिक तकनीक तथा विपणन सुनिश्चित किया गया है। उन्होंने टीएनएयू के राष्ट्रीय दलहन अनुसंधान केंद्र, वाम्बन द्वारा विकसित उन्नत दलहन किस्मों की सराहना भी की।

कृषि संबंधी मुद्दों पर महत्वपूर्ण घोषणाएँ

केंद्रीय मंत्री श्री चौहान ने किसानों की समस्याओं को ध्यानपूर्वक सुना और कहा कि नारियल फसलों में कीट व रोग की समस्याओं के समाधान के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। उन्होंने उल्लेख किया कि आम उत्पादन में अधिशेष (glut) के कारण मूल्य गिरावट से राहत के लिए मूल्यवर्धन व प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना का प्रयास किया जाएगा। साथ ही, उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के अंतर्गत तमिलनाडु के पात्र किसानों को जोड़ा जाएगा ताकि अधिकतम लाभ पहुंच सके।

तमिलनाडु के किसानों की सराहना

श्री शिवराज सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि वे तमिलनाडु के मेहनती किसानों, उनकी संस्कृति और मूल्यों से अत्यंत प्रभावित हैं। उन्होंने वादा किया कि वे फिर से तमिलनाडु आएंगे और किसानों से प्राकृतिक खेती तथा अन्य पहल पर सीधे संवाद करेंगे।

इस आयोजन में तमिलनाडु कृषि, बागवानी एवं किसान कल्याण विभाग के निदेशक, टीएनएयू के कुलपति डॉ. आर. तमिऴवेंदान, आईसीएआर-ATARI हैदराबाद के निदेशक डॉ. शेख एन. मीरा, केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की संयुक्त सचिव सुश्री ईनिथा, राज्य बागवानी आयुक्त श्री कुमारवेल पांडियन, टीएनएयू एवं टीएएनयूवीएएस के वरिष्ठ अधिकारी तथा आईसीएआर, कृषि, बागवानी, पशुपालन विभागों और अन्य संबद्ध संस्थानों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। इस कार्यक्रम में सैकड़ों किसानों ने सहभागिता की और केंद्र तथा राज्य स्तर पर कृषि विकास के प्रयासों के प्रति अपना उत्साह प्रकट किया। यहां ड्रोन दीदियां, स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी लखपति दीदियां भी संवाद में शामिल हुईं।

ऑनलाइन गाय बेचने के नाम पर संत से ठगी

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 वृंदावन। केशीघाट घाट स्थित मुरारी मोहन कुंज निवासी एक संत ने इंटरनेट मीडिया पर देखकर दो गिरि गाय का सौदा कर उनकी रकम भी आनलाइन दे दी। लेकिन अज्ञात व्यक्ति ने गाय नहीं भेजी। संत ने गाय बेचने के नाम पर ठगी करने वाले एक व्यक्ति के नाम प्रार्थना-पत्र दिया है।

केशीघाट क्षेत्र निवासी मुरारी मोहन कुंज के संत गोपाल दास ने 19 अक्टूबर को इंटरनेट मीडिया पर दो गिरि गाय देखी, जो कि सोनू जाट नामक युवक द्वारा बेचे जाने की बात कहते हुए अपना मोबाइल नंबर दिया था। उस नंबर पर संत ने काल कर दो गिरि गाय का सौदा 70 हजार रुपये में कर दिया।

गाय विक्रेता सोनू जाट ने भी गाय के सौदा पर सहमति जताते हुए संत से कई बार में आनलाइन गाय बेचने क एवज में 53500 रुपये यूपीआइ से भेज दिए। संत ने जब दोनों गाय को जब आश्रम भेजने के लिए युवक सोनू जाट से कहा तो वह टालमटोल करने लगा और गाय आश्रम नहीं भेजी।

शिकायत करने थाने पहुंचे संत गोपाल दास ने बताया कि फोन काल पर सोनू जाट ने अपना पता जयपुर के जयरामपुरा पाटया गांव बताया है। संत ने प्रार्थना-पत्र दिया है। वृंदावन थाना प्रभारी संजय पांडेय ने बताया कि जांच कर उचित कार्रवाई की जाएगी।

इस तरह के विश्व रिकॉर्ड्स का क्या किया जाए

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–    एड.संजय पांडे

उत्तर प्रदेश में दीपोत्सव की शुरुआत वर्ष 2017 में हुई थी, जब केवल 1.71 लाख दीये जलाए गए थे। तब से हर वर्ष यह आयोजन और भव्य होता गया है, और 2025 में इसकी संख्या बढ़कर 26.17 लाख तक पहुंच गई। अयोध्या में इस वर्ष दीपोत्सव 2025 में राम की पैड़ी और सरयू नदी के तटों पर करीब 26,17,215 दीये एक साथ जलाकर विश्व रिकॉर्ड बनाया गया। यह आयोजन गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड द्वारा प्रमाणित किए जाने की प्रक्रिया में है। इस अवसर पर 2,128 श्रद्धालुओं ने एकसाथ आरती और दीये-प्रज्वलन का समवर्ती अनुष्ठान किया, जो एक अलग रिकॉर्ड के रूप में दर्ज हुआ। कार्यक्रम में लगभग 33,000 स्वयंसेवक और हजारों श्रद्धालु शामिल हुए।

भाजपा सरकार के अनुसार दीपोत्सव का उद्देश्य अयोध्या को एक वैश्विक धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में प्रस्तुत करना है। ड्रोन शो, लेजर लाइटिंग, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ और तकनीकी प्रदर्शनों के साथ “नव-अयोध्या”, “धार्मिक पर्यटन” और “संस्कृति-विकास” के प्रतीक के रूप में अयोध्या की ब्रांडिंग करके स्थानीय अर्थव्यवस्था और सेवा क्षेत्र को लाभ मिलने का दावा किया जा रहा है। जिससे पर्यटन-उद्योग, होटल-अकॉमोडेशन, स्थानीय सेवा-उद्योग को बल मिलने, अयोध्या में रियल इस्टेट की कीमतें कई गुना बढ़ने कुम्हार-परिवारों और हस्तशिल्प कारीगरों को रोजगार और आय का स्रोत मिलने का दावा शामिल है।

लेकिन इसी सिक्के का दूसरा पहलू भी है। टीका टिप्पणी को हवा ना मिले इसके लिए पिछले ढेरों सालों से हो रहे अयोध्या के दीपोत्सव के संबंध में कुछ बजट आबंटन या खर्च-संबंधी जानकारी पूरी तरह से वर्ष-वार स्पष्ट व विस्तृत आंकड़े सार्वजनिक नहीं हैं। तो क्या यूपी सरकार के पास इस क्षेत्र में उपलब्धि वाकई सराही जाने योग्य है? क्या करदाताओं के पैसों से और सरकारी खर्चों से किये जा रहे ऐसे आयोजनों को बढ़ावा देने से उत्तर प्रदेश की समस्याएं हल हो सकती हैं? ऐसे सवाल उठ रहे हैं। ऐसे अजीब रिकॉर्ड्स का यूपी करेगा क्या?  इन आयोजनों पर कितना खर्च हो रहा है और अयोध्या शहर को हुआ फायदा क्या यूपी को भी हो रहा है ऐसे कई सवाल बरकरार हैं।

एक तरफ ऐसे आयोजनों पर बेशुमार खर्च करके किसी तरह के रिकॉर्ड बनाना और अपनी असली हकीकत से मुँह छुपाना ये अपने आप मे विरोधाभास है. उत्तर प्रदेश भारत का एक ऐसा राज्य है, जो अपनी विशाल क्षमता के बावजूद गरीबी, कम साक्षरता, खराब स्वास्थ्य, और कमजोर बुनियादी ढांचे के कारण पिछड़ा हुआ है। यह न केवल भारत के अन्य राज्यों से, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी कई विकासशील देशों से पीछे है। ऐसे में बजट और संसाधनों का बड़ा हिस्सा ऐसे आयोजनों में व्यय होता है, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय विकास जैसे बुनियादी क्षेत्रों पर ध्यान कम हो सकता है। “रिकॉर्ड बनाने” की प्रवृत्ति कहीं विकास की प्राथमिकताओं को पीछे न छोड़ दे, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है।

उत्तर प्रदेश (यूपी), भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य, अपनी विशाल जनसंख्या (लगभग 24 करोड़) के कारण वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान या ब्राजील से तुलनीय है। लेकिन सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संकेतकों में यह भारत और दुनिया के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता है। नीति आयोग, रघुराम राजन समिति (2013), और संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, यूपी BIMARU (बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश) समूह का हिस्सा है, जो भारत के विकास को पीछे खींचता है। कुछ संकेतकों में यूपी की स्थिति उप-सहारा अफ्रीकी देशों (जैसे माली) से भी बदतर है। 2025 तक के नवीनतम आंकड़े (NITI Aayog MPI 2023, RBI 2024) सुधार दिखाते हैं, लेकिन यूपी अभी भी कई मामलों में सबसे निचले पायदान पर है।उन प्रमुख क्षेत्रों का विश्लेषण करता है, जिनमें उत्तर प्रदेश पिछड़ा है, और इसके कारणों की पड़ताल करना सरकार कब का भूल चुकी है.

गरीबी और बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) की पड़ताल करें तो उत्तर प्रदेश में 22-25% आबादी (लगभग 5 करोड़ लोग) बहुआयामी गरीबी में जी रही है। इसमें पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य, और स्वच्छता जैसे मूलभूत क्षेत्र शामिल हैं। NITI आयोग के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, यूपी भारत में बिहार (33%) और झारखंड (28%) के बाद तीसरे स्थान पर है। वैश्विक MPI में यूपी निचले 20% राज्यों में आता है, जो इसे माली ($2,246 PPP) जैसे देशों के करीब लाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और खराब है, जहाँ स्वच्छ पेयजल और बिजली तक सीमित पहुंच है।

2024 में यूपी की प्रति व्यक्ति आय ₹93,422 (NSDP) है, जो राष्ट्रीय औसत (₹1.7 लाख) से 45% कम है। यह भारत के निचले पांच राज्यों (बिहार, ओडिशा, झारखंड, मणिपुर) में शामिल है। खरीद शक्ति समता (PPP) में यह $2,252 है, जो वैश्विक स्तर पर निम्न-आय वाले देशों के बराबर है। 2012 के बाद से आय दोगुनी हुई, लेकिन विकास दर अन्य राज्यों की तुलना में धीमी है, जिससे यूपी आर्थिक रूप से पिछड़ता है।

यूपी की साक्षरता दर 67.7% (2011 अपडेट 2024) है, जिसमें पुरुष 77.3% और महिलाएँ 57.2% हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह 60% से भी कम है। यह भारत के निचले 10 राज्यों में शामिल है, जहाँ राष्ट्रीय औसत 74% है। विशेष रूप से महिला साक्षरता में यूपी 28वें स्थान पर है, जो BIMARU राज्यों में सबसे कम है। शिक्षा की गुणवत्ता भी निम्न है, और स्कूल ड्रॉपआउट दर (विशेषकर लड़कियों में) राष्ट्रीय औसत से अधिक है।

उत्तर प्रदेश में शिशु मृत्यु दर (IMR) 64 प्रति 1,000 जन्म और मातृ मृत्यु दर (MMR) 167 प्रति लाख जन्म है। यह भारत में सबसे खराब IMR और तीसरी सबसे खराब MMR (बिहार और असम के बाद) है। ये आंकड़े कई अफ्रीकी देशों (जैसे माली, चाड) से भी बदतर हैं। NFHS-5 (2019-21) के अनुसार, टीकाकरण और पोषण की कमी ग्रामीण क्षेत्रों में गंभीर समस्या है। इसके अलावा, कोविड-19 के दौरान यूपी में सड़क हादसों से 41,746 मौतें हुईं, जो स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रणालियों की कमजोरी दर्शाता है।

यूपी में बेरोजगारी दर 7-8% (NSSO 2023) है, जो राष्ट्रीय औसत (6%) से अधिक है। 50 लाख से अधिक मजदूर रोजगार के लिए अन्य राज्यों (महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली) में प्रवास करते हैं। BIMARU राज्य भारत की 45% आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन GDP में केवल 8-9% योगदान देते हैं। यूपी की अर्थव्यवस्था 70% कृषि पर निर्भर है, लेकिन कम उत्पादकता और बाढ़-सूखा जैसी समस्याएँ इसे और कमजोर करती हैं।

यूपी में बुनियादी ढांचा, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, बेहद कमजोर है। वैश्विक स्तर पर खुले में शौच के 60% मामले भारत में हैं, और यूपी इसका बड़ा हिस्सा है। स्वच्छ भारत मिशन के बावजूद, ग्रामीण स्वच्छता में प्रगति धीमी है। सड़क घनत्व राष्ट्रीय औसत से कम है, और 101 आकांक्षी जिलों में से 6 (श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, चंदौली, फतेहपुर, बहराइच) यूपी में हैं। पूर्वी यूपी विशेष रूप से पिछड़ा है। यूपी में गंगा नदी का प्रदूषण वैश्विक स्तर पर उच्च है, और गंगा सफाई परियोजना असफल रही है। कृषि, जो 70% आबादी का आधार है, कम उत्पादकता और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से जूझ रही है। प्रति हेक्टेयर उपज राष्ट्रीय औसत से कम है, और बाढ़-सूखे से वार्षिक नुकसान होता है। यह यूपी को पर्यावरणीय और आर्थिक रूप से कमजोर बनाता है।

यूपी में अपराध दर, विशेष रूप से पुलिस हिरासत में मौतें (2014 में 365), भारत में सबसे अधिक हैं। जाति और सांप्रदायिक हिंसा भी आम है। NCRB और NHRC के आंकड़े दिखाते हैं कि यूपी के 75 जिलों में शासन और विकास असमान है। राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार ने दीर्घकालिक विकास को बाधित किया है।

सभी भाजपा और आरएसएस नेताओं में कम्युनिस्टों के प्रति घोर घृणा का भाव देखा जाता है। कम्युनिस्ट पार्टी शासित राज्य केरल से उत्तर प्रदेश की तुलना किसी भी मायने में नहीं की सकती। केरल सरकार सार्वजनिक सुरक्षा और सुविधाओं को महत्व देती है वही केरल की प्रगति का एक मुख्य कारण है। 2022 के यूएनडीपी उप-राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, केरल का एचडीआई 0.758 है (भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दूसरा स्थान), जो इसे “उच्च मानव विकास” श्रेणी में रखता है। इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश का एचडीआई 0.609 है (36 में से 34वां स्थान), जो “मध्यम मानव विकास” श्रेणी में आता है। दोनों राज्यों के एचडीआई में 0.149 का अंतर है, जो एक महत्वपूर्ण अंतर को दर्शाता है।

केरल के नाम यूपी के दीपोत्सव की तरह का कोई विश्व रिकॉर्ड नहीं है। लेकिन फिर भी दक्षिण भारत के कई राज्यों की तरह केरल स्पष्ट रूप से उत्तर प्रदेश से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है, क्योंकि इसका एचडीआई स्कोर और सभी उप-घटक उत्तर प्रदेश से काफी ऊंचे हैं। केरल का प्रदर्शन इसे वैश्विक स्तर पर मध्यम-आय वाले देशों (जैसे मैक्सिको या चीन) के समकक्ष रखता है, जबकि उत्तर प्रदेश का प्रदर्शन दक्षिण एशिया के निम्न-मध्यम विकास स्तर के करीब है।

केरल और उत्तर प्रदेश के बीच इस अंतर के पीछे नीतिगत प्राथमिकताएं, संसाधन आवंटन, और सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं में दीर्घकालिक अंतर हैं। केरल की जीवन प्रत्याशा 73.43 वर्ष है, जो उत्तर प्रदेश से लगभग 8 वर्ष अधिक है। इसका कारण 1970 के दशक से केरल में मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य निवेश है, जैसे कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का व्यापक नेटवर्क, उच्च टीकाकरण दर, और मातृ-शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम। उत्तर प्रदेश, अपनी विशाल जनसंख्या (24 करोड़ से अधिक) और कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था के साथ, कुपोषण, ग्रामीण क्षेत्रों में खराब स्वच्छता, और असमान स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियों का सामना करता है, जिसके परिणामस्वरूप शिशु मृत्यु दर अधिक है और जीवन प्रत्याशा कम है।

केरल की साक्षरता दर 96% से अधिक है, और इसका सार्वजनिक शिक्षा तंत्र प्रभावी है। मुफ्त मध्याह्न भोजन योजना और लिंग-समावेशी नीतियों ने विशेष रूप से लड़कियों के नामांकन को बढ़ावा दिया है, जिसके परिणामस्वरूप औसत और अपेक्षित स्कूली शिक्षा के वर्ष अधिक हैं। उत्तर प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में कम नामांकन (विशेषकर लड़कियों के लिए), शिक्षकों की कमी, और बुनियादी ढांचे की कमी जैसी समस्याएं हैं, जिसके कारण शिक्षा उपलब्धि केरल की तुलना में लगभग दो-तिहाई है।

दोनों राज्यों की प्रति व्यक्ति आय औद्योगिक राज्यों जैसे महाराष्ट्र की तुलना में कम है, लेकिन केरल को अपने वैश्विक प्रवासी कार्यबल (विशेषकर खाड़ी देशों में) से प्राप्त प्रेषण और पर्यटन से लाभ होता है। साथ ही, केरल में धन का वितरण अधिक समान है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि और असंगठित श्रम पर निर्भर है, जहां गरीबी दर (लगभग 30% बनाम केरल की 0.5%) और असमानता अधिक है।

केरल का “केरल मॉडल” सामाजिक कल्याण पर केंद्रित विकास रणनीति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो तीव्र औद्योगीकरण के बिना भी मानव पूंजी में निवेश, असमानता में कमी, और लचीलापन निर्माण करता है। उत्तर प्रदेश ने हाल के वर्षों में प्रगति की है, जैसे कि आयुष्मान भारत जैसी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के माध्यम से, लेकिन इसकी विशाल जनसंख्या और संसाधन बाधाओं के कारण इन प्रयासों को व्यापक स्तर पर लागू करना चुनौतीपूर्ण है। 2023 में भारत का राष्ट्रीय एचडीआई 0.685 तक पहुंचा, लेकिन केरल और उत्तर प्रदेश जैसे अंतर-राज्य अंतर दर्शाते हैं कि पिछड़े राज्यों में लक्षित सुधारों की आवश्यकता है।

आँकड़े बताते हैं कि यूपी और बिहार दोनों राज्यों में ट्रिपल इंजन की सरकारें होने पर भी ये दोनों भारत में रोजगार के लिए पलायन करनेवाले 2 सबसे बड़े राज्य हैं। ग्रामीण इलाकों/कम-विकसित जिलों में स्थायी एवं गुणवत्तापूर्ण रोजगार अवसरों की कमी है, जिससे लोग अन्य राज्यों या महानगरों की ओर जाते हैं। यूपी में बहुत से कामकाजी लोग अर्धकुशल या अकुशल श्रमिक हैं। परिवार के बोझ, सीमित स्थानीय अवसर, पर्याप्त रोजगार न मिलने की आशंका आदि कारणों से लाखों लोग दूसरे राज्यों या श्रम आधारित कामों के लिए पिछले 2 दशकों से खाड़ी देशों में पलायन कर रहे हैं।  यदि पर्याप्त अवसर होते तो इतनी संख्या में लोग बाहर नहीं जाते। उनमें बेहतर-स्किल या काम-के अवसर तलाशने वाले पढे लिखे होनहार युवा भी हैं, जिनके हिसाब से यूपी में उन्हें उनका कोई भविष्य नजर नहीं आता।  पलायन की प्रवृत्ति सामाजिक असम-वितरण, अवसर-असमानता और विकास के विषम वितरण का संकेत देती है — जो सुधार-नीति के लिए चेतावनी है।

ऐसी स्थिति में, राज्य को “बेहतर तरह के रोजगार, स्किल्स-उन्नयन, उद्योग एवं निजी क्षेत्र निवेश” को बढ़ाने की ज़रूरत है ताकि लोग अपने-अपने स्थान पर बने रह सकें और पलायन कम हो। लेकिन सरकार की प्राथमिकताएँ अभी भी यूपी को आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र बनाने का है और इसीलिए महाकुंभ और दीपोत्सव जैसे कार्यक्रम यूपी की पहचान बनाने की कोशिश सरकार करती है। इससे क्या यूपी का कोई उज्ज्वल भविष्य हो सकता है, जवाब आप खुद सोचिए। फिलहाल दीपोत्सव जैसे विश्वरिकॉर्ड्स पर ‘विश्वगुरु’ बनने पर खुश होकर मन को बहला लीजिए।

–    एड. संजय पांडे (अधिवक्ता, मुंबई उच्च न्यायालय)

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8 हजार फीट ऊंचे शिखर पर 108 फीट के हनुमान

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(संजीव शर्मा-विनायक फीचर्स)

हिमाचल प्रदेश में ‘क्वीन ऑफ हिल्स’ शिमला के सबसे लोकप्रिय स्थान मॉल रोड पहुंचते ही दूर पर्वत की चोटी पर विराजमान पवनपुत्र हनुमान जी की प्रतिमा बरबस ही सभी का ध्यान खींच लेती है। इस प्रतिमा और बादलों की आंख मिचौली से शिमला के बदलते मौसम का अंदाजा भी लगता रहता है क्योंकि कभी यह प्रतिमा बादलों में छिपकर अदृश्य हो जाती है तो कभी सूर्य की किरणें को आत्मसात कर दिव्यता से चमकने लगती है।
यह प्रतिमा इस तरीके से स्थापित की गई है कि मॉल रोड से लेकर इसके आसपास के कई इलाकों से आप हनुमान जी के दर्शन कर सकते हैं और अब यह मॉल रोड के एक प्रमुख आकर्षणों में से एक है।
इस पहाड़ को जाखू हिल्स और हनुमान जी को ‘शिमला के रक्षक’ कहा जाता है। आख़िर, हनुमान चालीसा में ऐसे ही थोड़ी लिखा गया है..’तुम रक्षक काहू को डरना।’
जाखू वाले हनुमान जी केवल एक मंदिर या पर्यटन स्थल नहीं है बल्कि यहां की गाथा रामायण काल से जुड़ी है और यह अकाट्य आस्था का स्थान है। शिमला की ऊंची चोटियों के बीच, समुद्र तल से लगभग 8 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित यह जाखू मंदिर आस्था, प्रकृति और रोमांच का एक अद्भुत संगम है एवं शिमला के ‘ताज’ से कम नहीं है।
मंदिर में लगे शिलालेख के अनुसार, ऐसी मान्यता है कि लंका विजय के दौरान युद्ध में मेघनाथ द्वारा शक्ति बाण चलाने से मूर्छित लक्ष्मण को बचाने के लिए जब हनुमान आकाश मार्ग से संजीवनी बूटी लेने के लिए हिमालय की और जा रहे थे तो अचानक उनकी दृष्टि जाखू पर्वत पर तपस्या में लीन यक्ष ऋषि पर पड़ी।
संजीवनी बूटी का परिचय जानने के लिए हनुमान जी यहां पर उतर गए। बताया जाता है कि उनके वेग से जाखू पर्वत जो पहले काफी ऊँचा था, आधा पृथ्वी के गर्भ में समा गया। बूटी का परिचय प्राप्त करने के उपरान्त हनुमान द्रोण पर्वत की और चले गए। जाखू पर्वत पर जिस स्थान पर हनुमान जी उतरे थे वहां पर आज भी उनके चरण चिन्हों को संगमरमर से निर्मित करके सुरक्षित रखा गया है।
हनुमान ने ऋषि यक्ष को वापसी में इसी स्थान पर उनसे मिलते हुए लौटने का वचन दिया था। परन्तु यात्रा के दौरान हनुमान को मार्ग में कालनेमी राक्षस के कुचक्र सहित कई बाधाओं को पार करना पड़ा और समय अधिक लग गया। तब हनुमान समय पर संजीवनी बूटी लक्ष्मण तक पहुंचाने के लिए इस रास्ते की बजाए दूसरे छोटे मार्ग से अयोध्या होते हुए लंका चले गए। जाखू हिल्स पर अन्न जल त्यागकर हनुमान की प्रतीक्षा कर रहे ऋषि यक्ष की व्याकुलता बढ़ने लगी। उनकी व्याकुलता देख हनुमान जी ने ऋषि को दर्शन दिए और न आने का कारण बताया। उनके अंतर्ध्यान होने के तुरन्त बाद यहां बजरंग बली की एक स्वयंभू मूर्ति प्रकट हुई जो आज भी मन्दिर में पूजी जाती है।
यक्ष ऋषि ने ही हनुमान जी के यहां ठहराव की स्मृति में इस मन्दिर का निर्माण किया। ऋषि ‘यक्ष’ के नाम पर ही पर्वत का नाम पहले ‘यक्ष’ था, जो समय के साथ बदलते हुए ‘याक’, फिर ‘याखू’ और अंत में ‘जाखू’ बन गया।
जाखू मंदिर का अब सबसे बड़ा आकर्षण यहाँ स्थापित हनुमान जी की 108 फीट ऊँची सिंदूरी प्रतिमा है । वर्ष 2010 में स्थापित यह मूर्ति इतनी विशाल है कि इसे शिमला के लगभग हर कोने से देखा जा सकता है। यह प्रतिमा शहर की पहचान बन चुकी है और इसे ‘प्राइड ऑफ शिमला’ भी कहा जाता है। अब यहां विशाल ध्वज भी स्थापित कर दिया गया है।
जाखू मंदिर तक पहुँचना भी अपने आप में एक रोमांचक अनुभव है। पर्यटक मॉल रोड के रिज मैदान से जाखू मंदिर तक पहुँचने के लिए पैदल या टैक्सी का उपयोग कर सकते हैं। पैदल रास्ता घने देवदार के जंगल से होकर गुज़रता है, जो ट्रेकिंग प्रेमियों के लिए स्वर्ग जैसा है। वहीं संकरे पहाड़ी कच्चे-पक्के मार्ग पर टैक्सी की सवारी भी किसी रोमांच से कम नहीं है। वहीं, जो पर्यटक खड़ी चढ़ाई से बचना चाहते हैं उनके लिए जाखू रोपवे एक बेहतरीन विकल्प है।
रिज मैदान से शुरू होकर यह रोपवे कुछ ही मिनटों में सीधे मंदिर परिसर तक पहुँचा देता है, साथ ही शिमला शहर के मनमोहक नज़ारे भी दिखाता है। जाखू पहाड़ी की चोटी से शिमला शहर, आसपास की चोटियों और घाटियों का मनोरम और विहंगम दृश्य देखने को मिलता है। यहाँ से सूर्योदय और सूर्यास्त का नज़ारा देखना एक अविस्मरणीय अनुभव है।
कुल मिलाकर जाखू मंदिर केवल पत्थर और मूर्तियों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह वह सिद्ध स्थान है जहाँ देवत्व और प्रकृति का मिलन होता है इसलिए शिमला की यात्रा जाखू हनुमान के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है। (विनायक फीचर्स)

हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय ने गेहूं की उन्नत किस्म WH-1402 को किया लॉन्च

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 हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (CCSHAU) ने किसानों के लिए एक नई और उन्नत गेहूं की किस्म WH-1402 लॉन्च की है, जो न केवल उच्च पैदावार और गुणवत्ता के लिए जानी जाती है, बल्कि तेजी से पकने के कारण भी किसानों के लिए फायदेमंद साबित होगी। इस किस्म के विकास का उद्देश्य किसानों को अधिक उत्पादन, बेहतर पोषण और समय पर फसल प्राप्ति की सुविधा प्रदान करना है। कुलपति प्रो. बी.आर. काम्बोज की उपस्थिति में विश्वविद्यालय ने श्री संत सीड्स एलएलपी, टोहाना के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि इस नई किस्म के बीज अधिक से अधिक किसानों तक पहुंचे।
WH-1402 किस्म की विशेषता यह है कि यह 147 दिनों में पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है। इसमें बालियां लंबी और मजबूत होती हैं, जिससे यह तेज़ हवाओं या बारिश में भी गिरने की संभावना को कम करती है। यह किस्म 100 दिन में बालियां निकालती है, और इसके पौधों की ऊंचाई लगभग 100 सेंटीमीटर तक होती है। इसके अलावा, इसमें 11.3 प्रतिशत प्रोटीन, 77.7 किलो/हेक्टोलिटर वजन, और लौह (37.6 पीपीएम) और जिंक (37.8 पीपीएम) जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो इसे पौष्टिकता के लिहाज से उत्कृष्ट बनाते हैं।

बीज दर और सिंचाई की आवश्यकता

WH-1402 किस्म की बिजाई अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर के पहले सप्ताह के बीच की जाती है। इसकी बीज दर 100 किलो प्रति हेक्टेयर रखी गई है। यह किस्म दो बार सिंचाई की मांग करती है — पहली सिंचाई बिजाई के 20-25 दिन बाद और दूसरी सिंचाई 80-85 दिन बाद। इसकी कम सिंचाई की आवश्यकता इसे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से भी सुरक्षित रखती है, जो इसे अधिक उत्पादक और स्थिर बनाता है।

नई किस्म से किसानों को मिलेगा लाभ

WH-1402 का मुख्य उद्देश्य किसानों को उन्नत तकनीकी से अधिक पैदावार और बेहतर गुणवत्ता वाली गेहूं की फसल प्राप्त कराना है। इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण और गुणवत्तापूर्ण उत्पाद किसानों की आय को बढ़ाने में मदद करेगा। किसानों के लिए इसे अपनाना एक लाभकारी कदम साबित हो सकता है, क्योंकि यह किस्म कम समय में तैयार होती है और इसकी पैदावार भी अधिक होती है।

समझौता ज्ञापन और भविष्य की योजनाएँ

विश्वविद्यालय ने श्री संत सीड्स एलएलपी के साथ समझौता कर यह सुनिश्चित किया है कि इस किस्म के बीज देशभर में किसानों तक पहुंच सकें। इस समझौते के तहत, निजी क्षेत्र की कंपनी किसानों तक इस उन्नत किस्म के बीज पहुंचाएगी, जिससे उत्पादन में सुधार होगा और किसानों को अधिक आर्थिक लाभ मिलेगा।इस नई गेहूं की किस्म को लेकर वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यह किस्म भारत के विभिन्न कृषि क्षेत्रों में सफलतापूर्वक अपना स्थान बना सकती है और किसानों के लिए कृषि क्षेत्र में नई क्रांति का प्रतीक बन सकती है।