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गौ माता को राष्ट्रीय दर्जा दिलाने के लिए नागौर से निकला साइकिल यात्री

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 गौ माता को बचाने और संरक्षण को लेकर नागौर से निकला साइकिल यात्री आज डूंगरपुर पहुंचा. गौ भक्तों ने गौ रक्षक का कलेक्ट्रेट परिसर में स्वागत किया. इस दौरान यात्रा लेकर निकले युवक ने एडीएम को सीएम के नाम ज्ञापन देकर गौमाता को बचाने के साथ ही बजट को बढ़ाने की गुहार लगाई. गौ रक्षक नीरसिंह राठौड़ 13 जिलों का सफर पूरा कर आज बुधवार को डूंगरपुर पहुंचे. नीर सिंह साइकिल लेकर डूंगरपुर शहर में आते ही गोरक्षा दल के देवीसिंह समेत कई गो भक्तों ने स्वागत किया.

Cow produce insulin milk-अब इंसुलिन वाला दूध देगी गौ माता

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Cow produce insulin milk: गाय का दूध वैसे ही अमृत तुल्य है लेकिन अब यह एक और बीमारी का सत्यानाश करने वाला है. इस मामले में वैज्ञानिकों ने कमाल कर दिया है. दरअसल, वैज्ञानिकों ने जीन में परिवर्तन कर ऐसी गाय बनाई है जिसके दूध में ही इंसुलिन लबालब भरा रहेगा. इसका सीधा मतलब यह हुआ है कि दुनिया से डायबिटीज पर करारा प्रहार हो सकेगा क्योंकि डायबिटीज में इंसुलिन की कमी हो जाती है जिसके कारण खून से शुगर का अवशोषण नहीं हो पाता है यह बढ़ी हुई शुगर किडनी, लिवर, आंख, हार्ट जैसे महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचाती है. अब वैज्ञानिकों द्वारा बनाई गई गाय से डायबिटीज के खिलाफ जंग में महत्वपूर्ण सफलता हाथ लेगेगी क्योंकि दुनिया भर में डायबिटीज के 50 करोड़ मरीज हैं, इनमें अकेले भारत में 10 करोड़ मरीज शुगर के हैं. टाइप 1 डायबिटीज के मरीजों को रोजाना इंसुलिन लेना पड़ता है.

पहला ट्रांसजेनिक गाय से निकाला गया दूध
दरअसल, अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोएस में जानवरों के वैज्ञानिक मैट व्हीलर रिसर्च कर रहे थे. उन्होंने गाय के जीन में इंजीनियरिंग करके यह कमाल किया है. ब्राजील में पहला ट्रांसजेनिक गाय इंसुलिन वाला दूध देने योग्य हो गई है. मैट व्हीलर ने बताया कि मां का दूध वास्तव में प्रोटीन की फैक्ट्री होता है. हमने इसका फायदा उठाया और इसी प्रोटीन को इस तरह बना दिया जो दुनिया भर में हजारों लोगों के लिए रामबाण साबित हो सकता है. मैट व्हीलर के नेतृत्व में किस तरह गाय के जीन में परिवर्तन किया गया, यह बायोटेक्नोलॉजी जर्नल में विस्तार से प्रकाशित हुआ है. वर्तमान में कई ऐसे मरीज हैं जिन्हें रोजाना इंसुलिन की जरूरत पड़ती है. यह इंसुलिन जेनेटिकली मोडिफाइड बैक्टीरिया से बनाया जाता है जो महंगा भी होता है. लेकिन अगर यह दूध से डायरेक्ट मिल जाए तो इसका फायदा लाखों लोगों को होगा.

वैज्ञानिकों ने कैसे किया कमाल
मैट व्हीलर की टीम ने गाय के भ्रुण को निकालकर उसके जीन में इंसुलिन प्रोटीन वाला इंसानी डीएनए के सेगमेंट को सेट कर दिया. इस डीएनए में इंसानी डीएनए का कोड मौजूद रहता है. इस जीन में इंजीनियरिंग करने के बाद इस भ्रुण को सामान्य गाय के गर्भाशय में पहुंचा दिया गया. इससे एक सुंदर बछिया का जन्म हुआ. इसके बाद यह गाय बड़ी होकर प्रेग्नेंट हुई और उसने दूध देना शुरू कर दिया. जब दूध का परीक्षण किया गया तो पाया गया कि दूध में वहीं प्रोटीन मौजूद है जो मानव इंसुलिन में है. यानी ठीक यह इंसुलिन ही होता है. अध्ययन में पाया गया कि दूध का प्रोइंसुलिन इंसान के शरीर में जाकर इंसुलिन बन जाता है.

By – Lakhan Narayan News 18

नूंह में गौ-तस्करी को लेकर चौंकाने वाली खबर, गौ-सेवक ही निकले तस्कर

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नूंह(अनिल मोहनिया): फिरोजपुर झिरका की गौशाला में गौसेवकों द्वारा की जा रही गौ-तस्करी से पूरे मेवात में हड़कंप मच गया है। अब मेवात में बनी इन गौशालाओं पर उंगली उठने लगी है। आखिर इन गौशालाओं के संचालक ऐसे कोन से कार्य में बिजी थे, जो गौशालाओं में रखी गई गायों का भी हिसाब नहीं रख सके। जिससे आए दिन गौ सेवक गाड़ियों में भर भर कर गौशालाओं से इन गायों की तस्करी करते रहे।

इस मामले में पुलिस ने बताया कि गोरक्षा दल के सदस्य खेम सिंह, जितेंद्र, छब्बू बैशाला को फोन पर सूचना मिली कि रात्रि के समय नंदी गौशाला से नंदी बैलों की तस्करी की जाएगी। जिसके बाद इन लोगों लोगों ने मामले की सूचना पुलिस और संबंधित गौरक्षा दल की टीम के सदस्यों को दी। इसके बाद तस्करों को रंगे हाथ पकड़ने की योजना बनाई। जैसे ही गौरक्षा दल के सदस्य नंदी गौशाला पहुंचे तो तस्करों ने तुरंत गाड़ी भगा दी। गाड़ी को भागते देख गौरक्षा दल के सदस्यों ने तस्करों का पीछा किया। लेकिन अंधेरे का फायदा उठाते हुए तस्कर फरार हो गए।

वहीं गौरक्षा दल के सदस्य जब वापस गौशाला पहुंचे तो वहां पर दो कर्मचारी फरार होने की फिराक में थे, जिन्हें मौके से ही दबोच लिया गया। इस मामले में फिरोजपुर झिरका सिटी चौकी प्रभारी भरत सिंह का कहना है कि गौरक्षा दल के सदस्यों द्वारा लिखित रूप से शिकायत मिल गई है। दो नामजद और चार अन्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर आगामी कार्रवाई शुरू कर दी है। पकड़े गए दोनों आरोपियों को आज स्थानीय अदालत में पेश किया जाएगा।

आपको बता दें कि मेवात एक मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है, यहां पर पुलिस जब को तस्करों से गायों को पकड़ती हैं तो उन्हें गौशालाओं में भिजवाती है। लेकिन अब सबसे बड़ी बात यह है कि जहां पुलिस गौशालाओं में गायों को सुरक्षित रखने के लिए भिजवाती है, लेकिन गौशालाओं से ही गौशालाओं में लगे हिंदू समाज के सेवाकर्मी इन गायों की तस्करी कर रहे हैं।

वैमनस्य भूल, नई शुरुआत करने का पर्व होली

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विवेक रंजन श्रीवास्तव –

हमारे मनीषियों द्वारा समय समय पर पर्व और त्यौहार मनाने का प्रचलन ऋतुओं के अनुरूप मानव मन को बहुत समझ बूझ कर निर्धारित किया गया है।

 जब ठंड समाप्त होने लगती है, गेंहूं चने की  नई फसल आने को होती है, मौसम में आम की बौर की महक की  मस्ती छाने लगती है, बाग बगीचों में, जंगलों तक में टेसू व अन्य फूल खिले होते हैं तब फागुन की पूर्णिमा की रात लकडिय़ों व उपलों से बनी  होली का  विधिवत पूजन कर, गुझिया पपड़ी आदि पकवानों का  भोग लगा कर होलिका दहन किये जाने की परम्परा है। इस बहाने लोग एकत्रित होते हैं, उत्सवी माहौल में नाचने गाने मिलने मिलाने और किंचित पनपी परस्पर कुंठायें व वैमनस्य भूल कर नई शुरुवात करने के अवसर उत्पन्न होते हैं। दूसरी सुबह लोग रंग गुलाल लगा कर खुशियां साझा करते हैं।

सारी दुनिया की विभिन्न सभ्यताओं में  रंगो से मन का उल्लास प्रगट किया जाता है होली की ही तरह रंगो के तथा अग्नि जलाने के अनेक त्यौहार विश्व के अलग अलग भूभाग पर अलग अलग समय में अलग अलग नामों से मनाये जाते हैं, जो किंचित सभ्यताओ के मिलन या परस्पर प्रभाव जनित हो सकते हैं  किन्तु यह तथ्य है कि होली भारत का अति प्राचीन पर्व है, जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता था।  वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव भी कहा जाता है. यह पर्व अधिकांशत: उत्तरी  भारत में प्रमुखता से  मनाया जाता है।

होली मनाये जाने का उल्लेख  कई पुरातन  पुस्तकों में भी मिलता है जैसे जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र , नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों  में भी होली का वर्णन मिलता है। प्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने  अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का उल्लेख किया है।  भारत के अनेक मुसलमान कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होली का त्यौहार केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते थे। अकबर और जोधा  तथा जहाँगीर का नूरजहाँ के  साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है।

वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था। अंतिम मुगल बादशाह, बहादुर शाह जफ़ऱ के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे। मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है।  प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर होलिका दहन व रंग खेलने के चित्र देखने मिलते हैं.  विजयनगर की राजधानी हंफी के 16वीं शताब्दी के एक चित्र फलक पर  राजकुमारों और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ राज दम्पत्ति को होली के रंग में रंगते हुए दिखाया गया है।

संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है।  श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह रास का वर्णन है। अन्य रचनाओं में रंग नामक उत्सव का वर्णन है जिनमें हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नावली तथा कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् शामिल हैं।  कालिदास रचित ऋतुसंहार में पूरा एक सर्ग ही वसन्तोत्सव को अर्पित है। भारवि, माघ और अन्य कई संस्कृत कवियों ने वसन्त की खूब चर्चा की है।

चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली का वर्णन है। भक्तिकाल और रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली और फाल्गुन माह का विशिष्ट महत्व रहा है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन कवि बिहारी, केशव, घनानंद आदि अनेक कवियों को होली वर्णन  प्रिय रहा है।

राधा कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़छाड़ से भरी होली के माध्यम से सगुण साकार भक्तिमय प्रेम और निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम का निष्पादन कवियों ने किया है।

सूफ़ी संत हजऱत निज़ामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो और बहादुर शाह जफ़ऱ जैसे मुस्लिम संप्रदाय का पालन करने वाले कवियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएँ लिखी हैं जो आज भी जन सामान्य में लोकप्रिय हैं।

आधुनिक हिंदी कहानियों में प्रेमचंद की राजा हरदोल, प्रभु जोशी की अलग अलग तीलियाँ, तेजेंद्र शर्मा की एक बार फिर होली, ओम प्रकाश अवस्थी की होली मंगलमय हो तथा स्वदेश राणा की हो ली में होली के अलग अलग रूपों के वर्णन देखने को मिलते हैं।  भारतीय फिल्मों में भी होली के दृश्यों और गीतों को प्रमुखता व सुंदरता के साथ चित्रित किया गया है।

वैष्णव व शैव संप्रदायों ने होली की व्याख्या अपने अपने इष्ट के अनुरूप कर ली थी।  होलिका  दहन की प्रह्लाद की सुप्रसिद्ध कथा के अतिरिक्त यह पर्व  राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जोड़ कर मनाया जाता है तो दूसरी ओर शैव संप्रदाय का  मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं।

वर्तमान स्वरूप में होली का त्यौहार सार्वजनिक उत्सव के रूप में ही अधिक लोकप्रिय हो चला है।  मोहल्लो के चौराहो, क्लबो, सोसायटियों में या सार्वजनिक मैदाननों पर युवको की टोलियां सार्वजनिक चंदे से होली का झंडा गाड़कर उसके चारो और लकडिय़ां लगाकर और होलिका व प्रहलाद की मूर्तियां सजाकर विद्युत प्रकाश से रंगबिरंगी सजावट कर डी जे पर गीत संगीत बजाकर होली का दहन का आयोजन करते हैं।

पारम्परिक रूप से गांवो में  भरभोलिए जलाने की भी परंपरा है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है, इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं। होली में आग लगाने से पहले इस माला को बहने भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक देती है।  रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नजऱ भी जल जाए।  इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है।  होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। कटते जंगलो को बचाने और व्यर्थ जलाई जाती लकड़ी के अपव्यय को रोकने के लिये इस वर्ष गोबर के कंडो की ही होली जलाने की अपील नेताओ द्वारा की जाती दिख रही है यह शुभ संकेत है, हमेशा से हिन्दू परम्परायें समय के साथ नव परिवर्तन को स्वीकारती आई हैं। यह परिवर्तन भी पर्यावरण की रक्षा हेतु उठाया जा रहा एक स्वागतेय कदम है।

होली से अगला दिन धूलिवंदन कहलाता है,  इस दिन लोग गुलाल और  रंगों से खेलते हैं।   सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं।  गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईष्र्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं।  इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैंन  बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं।  सारा समाज होली के रंग में रंगकर एक-सा बन जाता है।  रंग खेलने के बाद देर दोपहर तक लोग नहाते हैं और शाम को नए वस्त्र पहनकर सबसे मिलने जाते हैं।  प्रीति भोज तथा गाने-बजाने, कविताओं, हास्य विनोद के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।

घरों में गुझिये, खीर, पूरी कचौड़ी, दही बड़े आदि विभिन्न व्यंजन बनाये जाते हैं,  भांग और ठंडाई इस पर्व के विशेष पेय होते हैं।

स्थानीय परम्पराओं के साथ होली का पर्व मनाने में विभिन्नता परिलक्षित होती है।  ब्रज की होली आज भी सारे देश के आकर्षण का बिंदु होती है.  बरसाने की लठमार होली काफ़ी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं।  इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन में भी 15 दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है।  कुमाऊँ की गीत बैठकी में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियाँ होती हैं।  हरियाणा की धुलंडी में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा है।  बंगाल की दोल जात्रा चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है,  जलूस निकलते हैं और गाना बजाना भी साथ रहता है। महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखा गुलाल खेलने, गोवा के शिमगो में जलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तथा पंजाब के होला मोहल्ला शक्ति प्रदर्शन तो  तमिलनाडु की कमन पोडिगई मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंतोत्सव है।  मणिपुर में  योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है जो पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है, दक्षिण गुजरात के आदिवासियों के लिए होली सबसे बड़ा पर्व है, छत्तीसगढ़ की होरी में

गाय का मीट खाना चाहिए – जीडी गोएनका अंग्रेजी माध्यम स्कूल , हिंदू विरोधी ज्ञान

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गुजरात के कच्छ के गाँधीधाम में जीडी गोएनका अंग्रेजी माध्यम स्कूल में बच्चों को शिक्षा के नाम पर हिंदू विरोधी ज्ञान दिया जा रहा था। स्कूल द्वारा दी गई पाठन सामग्री में गाय के बारे में प्रकाशित जानकारी बता रही थी कि गाय का मीट खाना चाहिए। जब इसका पता हिंदू संगठनों को चला तो उन्होंने इसका विरोध किया और स्कूल को माफी माँगनी पड़ी। सोशल मीडिया पर भी नेटिजन्स स्कूल के इस हरकत की आलोचना कर रहे हैं।

सामने आए स्टडी मटेरियल की तस्वीर में देख सकते हैं लिखा है- “ये गाय है। ब्लैक एंड वहाइट। ये Mooo कहती है। घास खाती है। हमें इसका दूध पीना बहुत अच्छा लगता है। हम इसका माँस खा सकते हैं। इसके सिर पर दो सींघ होती है और इसे खेतों में रहना अच्छा लगता है।” बच्चों को दी जा रही इस शिक्षा की जानकारी होने के बाद लोगों ने इसका विरोध शुरू किया। इसे शर्मनाक बताया गया और हैरानी जताई गई कि ये शिक्षा व्यवस्था को क्या होता जा रहा है।

वहीं दूसरी ओर इस टेक्स्ट के पता चलने के बाद हिंदू संगठनों ने भी इसका जमकर विरोध किया और स्कूल से माँफी माँगने को कहा। इस बीच ऑपइंडिया ने भी स्कूल से संपर्क करने का प्रयास किया लेकिन बात नहीं हो सकी। हालाँकि इस बीच स्कूल की ओर से एक पत्र सामने आया।

इसमें उन्होंने सनातनियों से माफी माँगते हुए कहा कि स्कूल की सनातन धर्म को नीचा दिखाने की कोई मंशा नहीं थी। अपने पत्र में स्कूल ने बताया कि जो कंटेंट स्टडी मटेरियल में पब्लिश हुआ वो पिंटरेस्ट से लिया गया था।

उन्होंने कहा, “हम सनातन के सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों को समझते हैं और उनका सम्मान करते हैं और हमारे अभियान के कारण हुए किसी भी अपराध या गलतफहमी के लिए हम क्षमा चाहते हैं।” स्कूल के माफी पत्र में कहा गया है, “किसी भी आस्था या प्रथा का अनादर या अवहेलना करना हमारा इरादा नहीं था।”

 

 

 

भगोरिया:केवल उत्सव ही नहीं, पुरातन भारतीय संस्कृति का प्रतिबिंब भी 

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 कैलाश विजयवर्गीय-
झाबुआ जनजातीय संस्कृति का महापर्व है भगोरिया ।मालवा-निमाड़ के ग्रामीण अंचल फिर उमंग और उल्लास के साथ तैयारियों में जुट रहे हैं। पड़ोसी राज्यों में मजदूरी करने गए  मेहनतकश परिवारजन भी भगोरिया और होली मनाने के लिए अपने-अपने गांव-फलियों में लौटने लगे हैं। ग्रामीण ढोल-मांदल की दुरुस्ती करने जुट गए हैं।
भगोरिया को पिछले साल ही मध्यप्रदेश सरकार ने राजकीय पर्व घोषित किया था। वैसे भी परंपरागत मेले और पर्व हमारे गौरवशाली इतिहास का वर्तमान से मेल करवाते हैं। युवा पीढ़ी संस्कारों और सरोकारों का यह पाठ पढ़कर अपनी परंपराओं को न केवल स्वीकार करती है बल्कि अनुशासित रूप से अनुकरण के लिए भी स्वयं को समर्पित करती है।
भगोरिया की एक पहचान यह भी है कि हजारों की तादाद में उमड़ने वाली ग्रामीणों की भीड़ के बावजूद अनुकरणीय अनुशासन होता है। हर तरफ पारंपरिक वाद्य यंत्र ढोल-मांदल के साथ थाली की खनक पर लयबद्ध थिरकन का दौर चलता है। पूरे सात दिनों तक कहीं भी इतने वृहदस्तर पर ऐसा कोई भी उत्सव नहीं मनाया जाता। 
माना जाता है कि भगोरिया की शुरुआत राजा भोज के कालखंड में हुई थी। तत्कालीन भील राजाओं कासूमरा और बालून ने अपनी राजधानी भगोर में मेले की शुरुआत की। इसके बाद अन्य क्षेत्रों में भी यह आयोजन होने लगा। कालांतर में स्थानीय हाट और मेलों में लोग इसे भगोरिया कहने लगे। पश्चिमी निमाड़, झाबुआ-आलीराजपुर, धार, बड़वानी में भगोरिया अधिक धूमधाम से मनाया जाता है। भगोरिया के दौरान ग्रामीण जन ढोल-मांदल एवं बांसुरी बजाते हुए मस्ती में झूमते हैं। गुड़ की जलेबी, भजिये, खारिये (सेंव), पान, कुल्फी की दुकानों से मेले सजे रहते हैं।
दरअसल, भारत के अनेक भागों में आदिवासी समुदायों की एक विशेष महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर है। यहां तक कि उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक आयुष्य का अंग-अंग है। भगोरिया एक ऐसा महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे अलग-अलग तरीकों के साथ मध्य भारत के छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, बिहार और महाराष्ट्र में मनाया जाता है। इसे अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है, जैसे कि भागोरा, भगौरिया, भगोरी, भगोरीया, भगोरिया, बघोरिया आदि। मध्य प्रदेश के लिए यह विशेष गर्व का पर्व इसलिए भी है कि इसे आदिवासी समुदायों के सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व की प्रतीक के रूप में अब अधिक मान्यता मिलती जा रही है।
सत्य तो यह भी है कि भगोरिया का पर्व आदिवासी समुदायों की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। इसका आयोजन समाज में एकता, सामाजिक समरसता और समृद्धि को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया जाता है। इस पर्व के माध्यम से लोग अपनी परंपराओं को समझते हैं और इसे अपने जीवन में अमल में भी लाते हैं। भगोरिया पर्व का आयोजन समाज के प्राचीन रीति-रिवाजों और संस्कृति को मजबूत करने का भी प्रभावी माध्यम है। इसे पर्व के दौरान आदिवासी समुदाय परंपरा के साथ अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता को भी दोहराता है। यही पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि यह आदिवासी समुदायों की भावनाओं, संस्कृति और ऐतिहासिक पारंपरिकता को दर्शाता है। भगोरिया पर्व का आयोजन भले ही साल में एक बार होता है लेकिन इससे जुड़ी स्मृतियां वर्षभर मन को आनंदित रखती हैं।
भगोरिया पर्व एक महत्वपूर्ण आदिवासी पर्व है जो भारतीय समाज की विविधता और समृद्धि का प्रतीक है। यह आदिवासी समुदायों की भावनाओं, संस्कृति, और परंपराओं को मजबूत करने का एक माध्यम है। इस पर्व के माध्यम से लोग अपने समुदाय के गौरव को महसूस करते हैं और अपने धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने का संकल्प लेते हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस वर्ष भी भगोरिया पर्व समाज में एकता, सद्भावना, और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और प्रेम और सद्भावना की नई मिसाल बनेगा।
पर्व के लिए पधारने वाले सभी परिवार जनों को मेरी ढेर सारी बधाई और अग्रिम शुभकामनाएं।
*(लेखक भाजपा के वरिष्ठ नेता और मध्यप्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री हैं)*

योद्धा में सिद्धार्थ ने फिर जीता लोगों का दिल और  जगाई देश भक्ति की लहर 

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(अर्चित सक्सेना-विनायक फीचर्स)
 सिद्धार्थ मल्होत्रा ने अपनी फिल्म योद्धा में एक कमांडो मैन “अविनाश कटियार” का किरदार निभाया है। इस फिल्म में सिद्धार्थ ने शेरशाह की तरह ही फिर से आर्मी मैन का रोल प्ले किया है।फ़िल्म योद्धा एक फ़िक्शिसियस स्टोरी है जिसमें टास्क फ़ोर्स पर कहानी फिल्माई गई है। इसमें सिद्धार्थ ने एयर कमांडो बनकर प्लेन हाइजैक की स्टोरी में योद्धा (कमांडो) का रोल निभाया है।  सिद्धार्थ ने जोशीले कमांडो का किरदार बखूबी निभाया है ।
कहानी में वे एक बार अपने इसी जोश को लेकर आए हैं।इस फिल्म में निर्णय लेने में देरी के कारण , भारत अपना एक साइंटिस्ट खो देता है और इस गलती का पूरा दोष  योद्धा नामक टास्क फोर्स पर डाल दिया गया । बाद में योद्धा टास्क फोर्स पर कार्रवाई हुई और धीरे धीरे पूरी योद्धा टीम ने अपना ट्रांसफर करवा लिया सिवाए अविनाश कटियार यानि सिद्धार्थ मल्होत्रा के। कुछ सालों बाद वह  दुबई की फ्लाइट में  उन्हें एक अनजान व्यक्ति से दिल्ली का टिकट मिलता है जो कि उनके नाम का ही था । कुछ गलतफहमियों के कारण वे एक व्यक्ति पर अटैक करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वह व्यक्ति आतंकवादी है जबकि एक एयर होस्टेस  आतंकवादी थी जिसने इंजेक्शन बदलकर यह बताना चाहा कि फ्लाइट योद्धा अविनाश ने हाईजैक की  है ।
बाद में पता चलता है कि फ्लाइट का एक पायलट बदल गया था और उसकी जगह जो पायलट आया था वह भी अआतंकवादी था और उनका प्लान फ्लाइट को इस्लामाबाद में क्रैश करवाने का था क्योंकि उस दिन भारत पाकिस्तान के बीच एक बड़ा समझौता  होने वाला था । बाद में अपनी जांबाजी दिखाते हुए अविनाश कटियार ने सबको बचाया और आतंकियों का सच भी सबके सामने लाया। अंत  में फिर योद्धा टास्क फोर्स पुनः शुरू हुई ।देश भक्ति से भरपूर इस फिल्म में पूरी तरह से सिद्धार्थ मल्होत्रा ही छाए रहे।(विनायक फीचर्स)

Lok Sabha Elections: बिहार NDA की सीटों का बंटवारा

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नई दिल्ली: Lok Sabha Elections 2024:  बिहार एनडीए (NDA) के अंदर सीट बंटवारे पर सहमति बन गई है. दरअसल, बिहार में सीटों के समझौते को लेकर एनडीए ने सोमवार को एक प्रेस कांफ्रेस के जरिए बड़ी जानकारी दी. एनडीए के नेताओं ने  सीट शेयरिंग को लेकर जानकारी देते हुए बताया कि बिहार में भाजपा 17, जेडीयू 16, लोजपा रामविलास 5 और उपेंद्र कुशवाहा 1 और जीतन राम मांझी 1 सीट पर चुनाव लड़ने वाली है.  दरअसल, नई दिल्ली में सोमवार को भाजपा नेता व बिहार के प्रभारी विनोद तावड़े, सम्राट चौधरी, मंगल पांडे, जेडीयू नेता संजय झा, जीतन राम मांझी पार्टी की पार्टी हम के दिल्ली अध्यक्ष रजनीश कुमार, आरएलएम के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा, चिराग पासवान की पार्टी की ओर से राजू तिवारी ने प्रेसवार्ता में सीट शेयरिंग को लेकर बड़ी घोषणा की है. इस दौरान एनडीए के सभी नेताओं ने कहा कि वे लोग बिहार में 40 सीटों पर चुनाव जीतने वाले हैं.
एनडीए के अंदर तय फॉर्मूले के अनुसार भाजपा पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, मधुबनी, अररिया, दरभंगा उजियारपुर, सारण, महाराजगंज,बेगूसराय, नवादा, पटना साहिब, पाटलिपुत्र, अररिया, आरा, बक्सर से चुनावी मैदान में उतरी है. वहीं जेडीयू के पक्ष में वाल्मिकीनगर, सीतामढ़ी, झंझारपुर, सुपौल, कटिहार, बांका, नालंदा, शिवहर, किशनगंज, मधेपुरा, सीटें आई हैं. जीतन राम मांझी की पार्टी HAM को गया की सीट दी गई है. उपेंद्र कुशवाहा कारकाट से चुनाव लड़ेंगे. वहीं चिराग पासवान को हाजीपुर, वैशाली, जमुई, खगड़िया, समस्तीपुर की सीट मिली है.
NDA का क्या है फॉर्मूला
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए में सीटों के बंटवारे को लेकर फार्मूला तय किया गया है. इसके तहत भाजपा को 17 सीटें, जेडीयू को 16 सीटें, चिराग पासवान की पार्टी को LJP (RV) को 5 सीटें मिली है. वहीं जीतन राम मांझी की पार्टी ( HAM) को एक सीट प्राप्त हुई है. उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी (RLM) को सिर्फ एक सीट दी गई है. मगर जो जानकारी सामने आई है, उसके तहत उपेंद्र कुशवाहा 1 सीट नहीं बल्कि दो सीट चाहते हैं. पशुपति पारस को एनडीए गठबंधन में एक भी सीट नहीं दी गई है.  वहीं मुकेश सहनी को को लेकर अभी तक तस्वीर साफ नहीं हुई है.

CAA के खिलाफ दाखिल 237 याचिकाओं पर आज से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

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नई दिल्ली:  CAA: नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के देशभर में लागू होने के इसे लेकर विरोध भी देखने को मिला. इसके साथ ही सीएए के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 237 से अधिक में याचिकाएं भी दाखिल की गई. जिन पर सुप्रीम कोर्ट आज यानी मंगलवार को सुनवाई करेगा. नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ दाखिल इन याचिकाओं पर स्‍वयं चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) डी वाई चंद्रचूड़ की बेंच सुनवाई करेगी. सीजेआई की इस बैंच में उनके अलावा दो अन्‍य न्यायाधीश भी होंगे.

2019 में संसद में पास हुआ था सीएए

बता दें कि नागरिकता संशोधन कानून संसद के दोनों सदनों- लोकसभा और राज्यसभा में दिसंबर 2019 में पास हो गया था. तब सीएए के खिलाफ कई याचिकाएं दाखिल की गई थी. केंद्र सरकार ने 11 मार्च 2024 को सीएए के नियमों को अधिसूचित किया. इसके बाद एक बार फिर से नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गई. साथ ही इन याचिकाओं पर जल्द सुनवाई करने का भी अनुरोध किया गया. इन याचिकाओं में सीएए को धर्म के आधार पर भेदभाव करने वाला और संविधान के खिलाफ बताया गया.

क्या है सरकार का सीएए पर तर्क

केंद्र सरकार ने बीते मंगलवार को देशभर में नागरिकता संशोधन कानून लागू कर दिया. सीएए के प्रावधानों के मुताबिक, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भारत में आए गैर मुस्लिमों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है. सीएए में मुस्लिम समाज को शामिल न करने की वजह से इसे मुस्लिम विरोधी कहा जा रहा है. हालांकि गृह मंत्रालय ने साफ किया है कि सीएए से किसी भारतीय की नागरिकता नहीं आएगी. बल्कि ये कानून नागरिकता देने वाला है. गृह मंत्रालय ने कहा है कि भारतीय मुसलमानों को सीएए से चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. क्योंकि नागरिकता संशोधन अधिनियम उनकी नागरिकता को प्रभावित नहीं करेगा.

दस्तावेज पेश करने की नहीं होगी जरूरत

इसके साथ ही गृह मंत्रालय का कहना है कि इस अधिनियम के बाद किसी भी भारतीय नागरिक को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कोई दस्तावेज पेश करने की जरूरत नहीं होगी. खासकर भारतीय मुसलमानों को चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सीएए में उनकी नागरिकता को प्रभावित करने का कोई प्रावधान नहीं है. इसका वर्तमान 18 करोड़ भारतीय मुसलमानों से कोई लेना-देना नहीं है और उनके पास भी हिंदूओं के बराबर अधिकार हैं.

 

विजय मंदिर आंदोलन के प्रणेता निरंजन वर्मा

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(अंजनी सक्सेना-विभूति फीचर्स)
मध्यभारत प्रांत के नेता प्रतिपक्ष रहे स्वर्गीय निरंजन वर्मा न केवल एक उत्कृष्ट राजनीतिज्ञ थे बल्कि वे एक कुशल इतिहासकार भी थे।पर उन्हें सर्वाधिक ख्याति प्राप्त हुई विदिशा के विजय मंदिर आंदोलन से।अपने इस आंदोलन के द्वारा उन्होंने न केवल  विदिशा के जनमानस को आंदोलित किया बल्कि उन्होंने देश के उस गौरव पूर्ण इतिहास को भी दुनिया के समक्ष लाने की कोशिश की जिसे बलपूर्वक दबा दिया गया। 
विदिशा जिले के छोटे से गांव पुरैनिया में जन्मे श्री निरंजन वर्मा  ने विदिशा के एक शताब्दी के  इतिहास को सामने लाने के  सार्थक प्रयास किए।इसके लिए उन्होंने न केवल जनांदोलन किए बल्कि अपनी लेखनी द्वारा भी जनमानस को जागृत किया।
श्री वर्मा को पूर्व मध्य भारत प्रांत के जननेता आंदोलनकर्ता एवं इतिहास ,संस्कृति के लेखक के रुप में भी राष्ट्रीय ख्याति और प्रतिष्ठा प्राप्त हुई । 1952 के चुनाव में उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबू तख्तमल जैन को बासौदा विधानसभा से पराजित करके तहलका मचा दिया था।तत्कालीन मुख्यमंत्री को हराकर वे मध्य भारत विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता बने थे। 1966 से 1972 तक वे भारतीय जन संघ की ओर से राज्यसभा के सांसद भी रहे ।इस दौरान वे कई समितियों के अध्यक्ष और सदस्य भी रहे। उन्होंने चीन,जापान और बर्मा(म्यामांर) जाकर वहां भी विदिशा के गौरवपूर्ण इतिहास को सबके सामने रखा।इतिहास के विषय में उनकी विद्वता के श्री अटल बिहारी वाजपेई एवं लक्ष्मीमल्ल सिंघवी भी कायल थे।
हिंदू धर्म एवं संस्कृति के अनन्य उपासक श्री वर्मा  भारत  की एकता और अखंडता के प्रति सदैव समर्पित रहे।
 विदिशा के बीजा मंडल अर्थात विजय मंदिर के आंदोलन  के तो वे प्रणेता ही थे।दसवीं शताब्दी में यह एक भव्य एवं विशालकाय मंदिर था।इस मंदिर को पहले इल्तुतमिश फिर अलाउद्दीन खिलजी के मंत्री मलिक काफूर उसके बाद मांडू के शासक महमूद खिलजी ने जमकर लूटा।बाद में गुजरात के बहादुर शाह और अंत में औरंगजेब ने इस मंदिर को तहस नहस कर दिया लेकिन किंवदंतियों में यह मंदिर निरंतर जीवित रहा।बाद में कुछ वर्षों तक यहां वाद विवाद भी चलता रहा । इसी बीच श्री वर्मा ने कई आंदोलनों द्वारा इस मंदिर की मुक्ति के लिए अभियान चलाया।इसके लिए उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा।विजय मंदिर के अलावा काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनरुद्धार आंदोलन में भी उन्होंने कई बार जेल यात्राएं की।विजय मंदिर के मामले में पुरातात्विक उत्खनन के बाद अंततः उनका सच साबित हुआ कि बीजा मंडल ही वह भव्य विजय मंदिर है जिसे तोड़कर मस्जिद बनायी गई थी।
श्री वर्मा ने अपने पैतृक गांव पीपलखेड़ा में हिंदू महासभा का प्रांतीय अधिवेशन भी आयोजित कराया था जो उस दौर में एक अचंभा ही था।इसके साथ ही वे हिंदी साहित्य सम्मेलन से भी  जुड़े रहे और सन 1975 में विदिशा में इसके प्रांतीय सम्मेलन का आयोजन भी उन्होंने ही किया ,जिसमें तत्कालीन गृहमंत्री  बाबू जगजीवन राम  सहित देश के 100 से अधिक प्रमुख लेखकों और कवियों की उन्होंने मेजबानी की।
 श्री निरंजन वर्मा  आंदोलन कारी जननेता के साथ-साथ कुशलअध्येता,प्रखर इतिहासविद् तथा शोधार्थी भी थे।उन्होंने
20 से अधिक पुस्तकें भी लिखी जो खासी चर्चित एवं लोकप्रिय रहीं।दशार्ण दर्शन, असंधिमित्रा तथा युद्ध एवं जौहरगाथाएं उनकी लोकप्रिय एवं चर्चित पुस्तकें रही। विदिशा के प्राचीन वैभव के साथ ही देश के धर्म और संस्कृति पर भी उन्होंने कई लेख लिखे ।
निरंजन वर्मा का विजय मंदिर आंदोलन अंततः सही और सफल तो सिद्ध हुआ लेकिन उनके जानने वालों का मानना है कि अभी उनकी यह सफलता अधूरी है,उनका यह आंदोलन तभी पूर्णतः सफल और सार्थक सिद्ध होगा जब विजय मंदिर अपने पुरातन वैभव और गरिमा को पुनः प्राप्त कर लेगा और शायद यह निकट भविष्य में यह संभव भी होगा।(विभूति फीचर्स)