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गुरु-शिष्य सबंध -गुरु समाज का दिशा-निर्देशक भी होता हैं

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(डॉ. परमलाल गुप्त – विनायक फीचर्स)
हमारे भारतीय अद्वैतवादी दर्शन के अनुसार मनुष्य तो क्या सभी प्राणी ईश्वर का अंश होने से समान होते हैं- ‘आत्मवत सर्व भुतेषु’। परंतु इनमें बुद्धि की भिन्नता होती है। मनुष्यों में भी ज्ञान का अंतर होता है। इस ज्ञान को जाग्रत करने के लिए विभिन्न गुरुओं की आवश्यकता होती है। परिवार, समाज, शिक्षण संस्थाएं आदि मनुष्य को ज्ञान देती हैं। सबसे प्रथम गुरु तो बच्चे की मां ही होती है। फिर परिवार, विद्यालय, समाज आदि। इसलिए भारतीय संस्कृति में मनुष्य पर तीन ऋण – 1. पितृ-ऋण, 2. गुरु-ऋण और 3. देव ऋण चुकाने का विधान है। पहले भारत में शिक्षा गुरुकुलों में दी जाती थी। धर्म और जीवन एक-दूसरे से अभिन्न थे। इसलिए बच्चों का एक ही गुरु होता था। कुछ विषयों में धर्म के अनुसार भी अलग गुरु थे जो उस कला में निपुण होते थे। शिक्षा का व्यावसायिक रूप नहीं था। गुरु का जीवन त्यागमय एवं आदर्श होता था। छात्र से कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। उल्टे उसके जीवन निर्वाह की व्यवस्था गुरुकुल करता था। गुरुकुल किसी के अधीन भी नहीं होता था। वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होता था। इसके लिए आश्रम में कृषि भूमि और गौशालाएं होती थीं। शिष्यों को सब काम करने पड़ते थे। आवश्यकता पडऩे पर उन्हें भिक्षा के लिए भी जाना पड़ता था। गुरुकुल की नियमित दिनचर्या होती थी। गुरु का कोई स्वार्थ किसी शिष्य से नहीं होता था। वह हृदय से शिष्य का कल्याण चाहता था। इसलिए वह पूरी ईमानदारी और लगन से शिष्य को जीवन के व्यवहारिक ज्ञान के साथ उसे आत्म ज्ञान कराता था। शिष्य इसी कारण गुरु पर पूरी श्रद्धा रखते थे और उसकी हर आज्ञा का पालन करते थे। बच्चे के माता-पिता इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करते थे।
गुरु समाज का दिशा-निर्देशक भी होता था और राजा तक उसका सम्मान करता था। इसलिए गुरु और शिष्य के संबंध बहुत आत्मीय होते थे। शिष्य गुरु के लिए हर त्याग करने के लिए तैयार होता था। गुरु दक्षिणा के समय गुरु उससे कुछ भी मांग सकता था, परंतु गुरु उसका कल्याण ही चाहता था, धन-दौलत नहीं।
वर्तमान समय में शिक्षा ने व्यावसायिक रूप धारण कर लिया है। उसका धर्म से कोई संबंध नहीं रहा। गुरु, धन (वेतन) लेकर विद्यालयों में विभिन्न विषय पढ़ाते हैं। विद्यालयों में एक निश्चित पाठ्यक्रम होता है, शिक्षा उसी तक सीमित रहती है। शिक्षा का अधिकतर उद्देश्य धन कमाना या नौकरी ्रप्राप्त करना होता है। अभियांत्रिकी, स्वास्थ्य विज्ञान, कृषि, वाणिज्य, व्यवसाय-प्रबंधन विज्ञान तथा अन्य अनेक विषयों की शिक्षा इसी उद्देश्य से दी जाती है। इसके लिए शिष्य को भारी शुल्क देना पड़ता है और साथ में अपने जीवन-निर्वाह का स्वयं प्रबंध करना पड़ता है। शिष्य के निजी जीवन से गुरु को कोई मतलब नहीं होता। वह अपने विषय के पुस्तकीय ज्ञान से शिष्यों को व्याख्यान देता है। अत: शिष्य और गुरु के संबंधों में कोई निकटता नहीं होती। शिष्य का उद्देश्य डिग्री प्राप्त करना होता है। इसलिए वह कुछ ऐसा नहीं करता कि इसमें बाधा हो। इसमें हृदय नहीं औपचारिकता होती है। सह शिक्षा के प्रचलन से छात्र-छात्राओं के मध्य यौन-संबंध होना तो आम बात है। गुरु और शिष्या या गुरुआनी और शिष्य के बीच भी यौन संबंध पनपते हैं। इन्हें प्रेम का नाम देकर नैतिक रूप भी दे दिया जाता है। कुछ रूपों में यौन शोषण भी होता है। अब तो किशोरों और किशोरियों को यौन शिक्षा की भी वकालत की जा रही है। तब गुरु व्यावहारिक रूप में शिष्या को और गुरुआनी व्यावहारिक रूप में शिष्य को यह शिक्षा दे सकती है। इन सबमें गुरु-शिष्य का संबंध सम्मान का नहीं रह जाता।
आजकल की शिक्षा में धर्म और नैतिकता का समावेश नहीं है। इसलिए इसके लिए अलग से अनेक धर्मगुरु बन गए हैं। हिन्दुओं में धर्म गुरु, साधु, संन्यासी, मठाधीश, महंत, योगी, आश्रमवासी, राजयोगी, तपस्वी, पौराणिक, वेदान्ती, गृहस्थ, कर्मकाण्डी आदि अनेक प्रकार हैं। इनमें से बहुत से किसी व्यवसायी की ही तरह शिष्य बनाकर उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर दक्षिणा प्राप्त करते हैं। जैसे कथावाचकों और प्रवचनकारों का व्यवसाय है कि वे इसके लिए मोटी रकम लेते हैं।
इनकी भी श्रेणियां हैं। जो जितने अच्छे ढंग से अपना कार्य संपादन करता है, उसे धनी लोगों द्वारा बड़ी रकम मिलती है। जो ख्याति प्राप्त नहीं है, उसे कम रकम से संतोष करना पड़ता है। प्रचार-तंत्र भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत में अनपढ़, पढ़े-लिखे ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो किसी चमत्कार की अफवाह से प्रभावित हो जाते हैं। तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत, पीर-फकीर, संत-महंत यहां तक कि गृहस्थ कर्म-काण्डियों के चक्कर में किसी को भी अपना गुरु बना लेते हैं। गुरु का ज्ञान कितना है, उसमें कितना आडम्बर और धोखेबाजी है, यह शिष्य नहीं समझ पाते। ऐसे बहुत से गुरुओं ने आश्रमों के नाम पर आलीशान भवन बनवा लिए हैं। उनके ऐशोआराम के सब साधन जुटाकर वे राजसी जीवन बिताते हैं। समय-समय पर शिष्यों को वे कुछ न कुछ धार्मिक उपदेश देते रहते हैं। कुछ गुरु तो अच्छी सेवा के लिए शिष्य बनाते हैं। ऐसे बहुत से बेकार और विवश युवक और युवतियां मुफ्त में जीवन-यापन की सुविधाएं मिलने पर इनके शिष्य बन जाते हैं। कुछ गुरु तपस्या और भजन-पूजन के साथ गांजा, चरस आदि का नशा करते हैं और शिष्य को भी करवाते हैं। कोई युवती हुई तो वह उनकी योग-मुद्रा बन जाती है, इस गुरु और शिष्य के धंधे में भारी धोखेबाजी है।
पूंजीपति और विदेशी तंत्र चाहता है कि भारतीय लोगों की ऐसी ही स्थिति बनी रहे। इसलिए वह इन गुरुओं को आश्रय देता है और जनता को भी गुमराह करता है। ईश्वर, धर्म और आध्यात्म का सच्चा ज्ञान होने पर न तो गुरु किसी को शिष्य बनाता है और न शिष्य किसी गुरु के चक्कर में आता है। शिष्य में आत्मज्ञान कैसे उत्पन्न हो, इसके लिए शिष्य को स्वयं प्रयत्नशील होना अनिवार्य है। उसमें यदि सच्ची लगन है, तो उसे सत्संग, स्वाध्याय, चिंतन, ध्यान आदि से आत्मज्ञान हो जाता है। गोस्वामी तुलसीदास का कथन है-
जाकर जापर सत्य सनेहू, सो तेहि मिलहि न कछु संदेहू॥
ईश्वर से सच्चा प्रेम उसे ईश्वर का अर्थात् आत्मज्ञान करा देता है। उसे ऐसा प्रकाश मिल जाता है, जो जीवन को सही परिप्रेक्ष्य में दिख सके। बहुत से लोग जो भौतिक लोभ-लालच में पड़कर गुरु बनाते हैं, वह तो बिल्कुल मूर्खता है। अपने विवेक, लगन और श्रम करने से ही भौतिक लाभ हो सकता है। कभी-कभी मनुष्य के मार्ग से भटकने की आशंका होती है। ऐसी दशा में धर्म-गुरुओं से नहीं अनुभवी, सच्चे और निकट के लोगों से सलाह लेनी चाहिए। (विनायक फीचर्स)

एसएमएफजी इंडिया क्रेडिट ने नवी मुंबई में 1000वीं शाखा की शुरुआत की

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मुंबई (अनिल बेदाग): भारत के गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) क्षेत्र की एक प्रमुख कंपनी एसएमएफजी इंडिया क्रेडिट कं. लि. ने वाशी, नवी मुंबई में अपनी 1000वीं शाखा खोलने की घोषणा की है।
     यह ऐतिहासिक घटना देश भर में अपने पदचिन्‍हों का विस्तार करने और कम पहुंच वाले बाजारों में वित्तीय सेवाएं लाने के प्रति कंपनी की अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाती है। इस महत्वपूर्ण उपलब्धि को चिन्हित करने के
लिए, एसएमएफजी इंडिया क्रेडिट ने इंडिया पोस्ट के साथ मिलकर एक विशेष कवर और माई स्टैम्प जारी किया है। आधिकारिक अनावरण के अवसर पर मुंबई में जापान के महावाणिज्य दूतावास के महावाणिज्यदूत
श्री यागी कोजी, महाराष्‍ट्र सर्किल में डाक सेवाओं (मुख्यालय) के निदेशक श्री अभिजीत बंसोडे और एसएमएफजी इंडिया क्रेडिट के सीईओ और एमडी श्री शांतनु मित्रा उपस्थित थे।
1000वीं शाखा का शुभारंभ एसएमएफजी इंडिया क्रेडिट के बड़े और विविध भारतीय बाजार में अपनी उपस्थिति को गहरा करने के नीतिगत दृष्टिकोण का प्रमाण है। 2007 में अपनी स्थापना के बाद से, कंपनी लगातार विकास करते हुए एक अखिल भारतीय संस्थान के रूप में विकसित हुई है जो अब 670 से अधिक शहरों और 70,000 गांवों में काम करती है, जिसे 23,000 से अधिक कर्मचारियों का सहयोग प्राप्‍त है।
पिछले दो वर्षों में, एसएमएफजी इंडिया क्रेडिट ने लगभग 300 नई शाखाएं खोली हैं। यह विस्तार भारत भर में विविध आबादी तक औपचारिक ऋण पहुंच का विस्तार करने और उन्हें वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्‍त करने में सक्षम बनाने के कंपनी के मिशन के अनुरूप है।
इस महत्वपूर्ण अवसर पर विचार करते हुए, एसएमएफजी इंडिया क्रेडिट के सीईओ और एमडी श्री शांतनु मित्रा ने कहा, “हमारी 1000वीं शाखा का उद्घाटन एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है जो पूरे भारत में लोगों को औपचारिक ऋण पहुंच प्रदान करने और वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्‍त करने में उनकी मदद करने के लिए हमारी गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इस उपलब्धि का उत्‍सव मनाते हुए, हमें डाक विभाग के सहयोग से माई स्टैम्प
के साथ एक विशेष कवर जारी करने पर गर्व है, जो कंपनी द्वारा अब तक हासिल की गई वृद्धि और भारत के वित्तीय सेवा क्षेत्र में योगदान के महत्व का प्रतीक है। हमारी यात्रा निरंतर विकास की रही है, हम अपने
ग्राहकों की बदलती जरूरतों के अनुकूल होने के साथ ही सभी को वित्तीय सेवाएं उपलब्ध कराने और पूर्ण विकास हासिल करने के हमारे मिशन के प्रति निष्‍ठावान रहे हैं।

हरियाणा में गौ तस्करी के शक में 12वीं के छात्र की गोली मारकर हत्या

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Haryana News: आर्यन मिश्रा (Aryan Mishra) प्रकऱण में फरीदाबाद के एसीपी क्राइम अमन यादव ने बताया कि यह गोरक्षा का मामला नहीं है.पुलिस मामले की जांच कर रही है. आर्यन मिश्रा को दो गोली लगी थी. इस मामले के पांच आरोपी अभी तक गिरफ्तार हो चुके हैं. आर्यन की हत्या क्यों की गई पुलिस इसकी जांच कर रही है. वहीं, आर्य़न के पिता का बयान आया है और उन्होंने पूछा है कि गौ-तस्करी के शक में गोली मारने का अधिकार कौन देता है?

वहीं, आर्यन मिश्रा के पिता सियानंद मिश्रा का बयान आया है. उन्होंने कहा, ”मेरा बेटा आर्य़न मिश्रा 12वीं का छात्र था. मुझे कोई जानकारी नहीं थी. बाद में पता चला कि गाय तस्करी के शक में मेरे बेटे को गोली मार दी गई. गाय की तस्करी के शक में किसी को गोली मारने का अधिकार कौन देता है. मोदी सरकार ने गोली मारने का अधिकार दिया है?  तो क्यों दिया है? पांच आरोपी गिरफ्तार किए गए हैं. मेरा बेटा किसी को नहीं जानता था. हम पंडित है हमारी किसी लड़ाई झगड़ा नहीं है. हम परदेसी हैं और कमाने-खाने वाले हैं.”

आर्यन मिश्रा ने नहीं रोकी गाड़ी तो मार दी थी गोली
12 कक्षा के छात्र को गौ-तस्कर समझकर गोली मारकर हत्या कर दी गई. यह घटना 23 अगस्त की है. अब आरोपियों को गिरफ्तार किया गया तब पता चला कि उन्होंने गौ-तस्कर समझकर आर्यन मिश्रा को गोली मारी थी. गिरफ्तार आरोपियों के नाम सौरभ, अनिल कौशिक, वरुण, कृष्णा और आदेश हैं. ये पांचों 23 अगस्त को रात को गाय के तस्करों पर नजर रख रहे थे और जिस गाड़ी में  आर्यन मिश्रा अपने दोस्तों के साथ जा रहा था. उन्हें रुकने के लिए कहा था. उन्होंने आर्यन मिश्रा की कार का पीछा भी किया. जब आर्य़न और उनके दोस्तों ने गाड़ी नहीं रोकी तो उन्होंने गोली चला दी जिसमे आर्यन मिश्रा की गोली लगने से मौत हो गई.

 

नेहरू सेंटर, वर्ली में 5 सितंबर तक मुंबई साड़ी फेस्टिवल का उद्घाटन करने पहुंचीं आईएएस डॉ. एम. बीना

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मुंबई। नेशनल डिज़ाइन सेंटर द्वारा वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के विकास आयुक्त (हस्तकरघा) के सहयोग से, “मुंबई साड़ी महोत्सव” का आयोजन 30 अगस्त से 5 सितंबर, 2024 तक नेहरू सेंटर, वर्ली, मुंबई में किया जा रहा है। यह विशेष एक्सपो भारतीय हस्तकरघा साड़ियों की समृद्ध विरासत और विविधता को प्रदर्शित करेगा, और इसे देशभर के हस्तकरघा बुनकरों, स्वयं सहायता समूहों और सहकारी समितियों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखा जा रहा है। “मुंबई साड़ी महोत्सव” का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक भारतीय हस्तकरघा साड़ियों की बाजार में उपस्थिति को बढ़ाना है

मुंबई साड़ी महोत्सव का उद्घाटन डॉ. एम. बीना, आईएएस, विकास आयुक्त (हैंडलूम), वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा नेहरू सेंटर, डॉ. एनी बेसेंट रोड, मुंबई में किया गया। उद्घाटन के बाद मुख्य अतिथि ने सभी प्रतिभागी बुनकरों से एक-एक करके मुलाकात की, जो विभिन्न प्रकार की साड़ियों की बिक्री कर रहे हैं। मुख्य अतिथि ने प्रदर्शित की जा रही बुनाई की प्रशंसा की। उद्घाटन के अवसर पर डॉ शर्मिला दुआ भी उपस्थित रहीं।
प्रतिभागी बुनकर अपने सहभागिता से बहुत खुश हैं और खरीदारों से मिल रही भारी प्रतिक्रिया से उत्साहित हैं।
इस महोत्सव में 70 से अधिक हस्तकरघा बुनकर, स्वयं सहायता समूह, और सहकारी समितियां भाग लेंगी, जो भारत के विभिन्न राज्यों से आकर अपनी कला और कौशल का प्रदर्शन करेंगी। महोत्सव का उद्देश्य पारंपरिक भारतीय हस्तकरघा साड़ियों की बाजार में पहचान बढ़ाना और बुनकरों को सीधे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खरीदारों से जोड़ना है। इस एक्सपो के माध्यम से बुनकरों को अपने उत्पादों को प्रदर्शित करने और निर्यातकों, थोक व्यापारियों, और ग्राहकों से सीधे संपर्क स्थापित करने का अवसर मिलेगा।
“मुंबई साड़ी महोत्सव” में कांचीपुरम, चंदेरी, महेश्वरी, बनारसी, पैठणी, भागलपुरी, गोपालपुर तसर, शांतिपुरी, करवठ कटी, हबासपुरी, पोचमपल्ली इकत, जमदानी, धानियाखली, मैसूर सिल्क, मुगा सिल्क, वेंकटागिरी, और कोटपद जैसी 50 से अधिक विशिष्ट बुनाई की साड़ियाँ प्रदर्शित की गई है। यह आयोजन फैशन प्रेमियों, डिज़ाइनरों, और उद्योग विशेषज्ञों के लिए एक महत्वपूर्ण आकर्षण का केंद्र बन गया है।

मांस खाने के आरोप में पश्चिम बंगाल के युवक की हत्या

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Charkhi Dadri News: हरियाणा के चरखी दादरी जिले से गौ मांस खाने के आरोप में युवक की पीट-पीटकर हत्या का सनसनीखेज घटना सामने आने के बाद से तनाव का माहौल है. यह घटना शुक्रवार (30 अगस्त) की है. हत्या के इस मामले में पुलिस ने दो नाबालिगों सहित सात लोगों को गिरफ्तार किया है.

दरअसल, हरियाणा के चरखी दादरी जिले के बाढड़ा कस्बा में एक दिन पहले गौ रक्षक दल के सदस्यों ने झुग्गियों में गौ मांस को लेकर हंगामा मचाया था. गौ रक्षकों ने झुग्गियों में बनाए मांस को गौ मांस बताते हुए दो प्रवासी युवकों को पुलिस को हवाले किए थे. बाढड़ा कस्बा थाना पुलिस प्रवासी युवकों से जुड़े इस मामले की जांच में जुटी थी.

इस बीच गौ रक्षक दल के सदस्यों ने दो प्रवासी युवकों की डंडों से इतनी पिटाई की कि इनमें से एक युवक की मौत हो गई. दूसरे युवकी की हालत गंभीर बताई गई है. इस घटना को लेकर बाढड़ा कस्बा में पिटाई का वीडियो भी सोशल मीडिया पर हुआ था.

पीड़ित पक्ष का कुछ भी बोलने से इनकार 

बाढड़ा थाना पुलिस ने मामले में केस दर्ज करते हुए दो नाबालिगों सहित सात लोगों को अभी तक गिरफ्तार किया है. पुलिस और पीड़ित पक्ष मामले में कुछ भी बोलने से इंकार कर रहे हैं. गौ मांस होने के शक में व्यक्ति की हत्या मामले में एसपी पूजा वशिष्ठ ने मौके का निरीक्षण किया. एसपी ने सुरक्षा सहित दूसरे मामलों को लेकर पीड़ितों से की पूछताछ की. एसपी ने बताया कि थाना पुलिस इस मामले की जांच में जुटी है.

पीड़ित के पास से बरामद हुआ था पका मांस

इस मामले में बीते 27 अगस्त 2024 को झुग्गियों में रहने वाले प्रवासी लोगों के पास पका मांस मिला था. गौ रक्षकों ने इसे गौ मांस करार दिया. उसके बाद वहां काफी हंगामा मचा. इस मामले की सूचना मिलने के बाद थाना पुलिस की टीम मौके पर पहुंची. झुग्गी में रहने वाले लोगों को पुलिस थाने ले गई.

इस बीच गौ मांस खाने के शक में कूड़ा बीनने वाले युवक की तथाकथित गौ रक्षकों ने हत्या कर दी, जिसका शव गांव भांडवा के पास मिला. फिलहाल, झुग्गियों के समीप पुलिस बल को शांति ​बनाए रखने के मकसद से तैनात कर दिए गए हैं.

हिन्दी फिल्मों की महान गायिकाएं

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(सुभाष आनंद – विनायक फीचर्स)

गायिका लता मंगेशकर, गीता दत्त, आशा भोंसले ने जितने भी गीत गाए आज भी श्रोताओं को आनंदित कर देते हैं। क्या कला की अभिव्यक्ति में कलाकार के व्यक्तिगत अनुभवों, भावनाओं का योगदान होता है? क्या कलाकार अपनी जिंदगी की खामोशियों, आवाजों, अंधेरों-उजालों को अपनी रचना में भिगोता है, तभी वे अमर हो जाती हैं। हमारी हिन्दी फिल्मों के अमर गीत कुछ ऐसी ही कहानी कहते हैं। आधुनिक कलाकार प्रोफेशनल होते हैं। गाने की फीस ली और माइक्रोफोन के सामने गाना गाकर चलते बने।

पिछले दिनों यद्यपि नए-नए कलाकारों ने गाने गाए, लेकिन कोई भी गायक अपनी छाप छोड़ नहीं सका। न ही कोई गाना इतना हिट हुआ है कि उसकी चर्चा आज की जा सके। पिछले समय की बात की जाए तो देखेंगे कि हिन्दी फिल्मों की तीन महान गायिकाओं गीता दत्त, आशा भोंसले और लता मंगेशकर ने अपने गीतों में अपनी भावनाएं जोड़कर कई यादगार हिट गीत दिए। उल्लेखनीय है कि ये तीनों गायिकाएं घंटों रिहर्सल किया करती थीं। जब स्वयं संतुष्ट हो जाती थीं, तब गीत की रिकॉर्डिंग करवाया करती थी। इनके दर्द भरे गीत कानों में सुनाई देते हैं तो हृदय विदीर्ण हो उठता है। असर में कई गीतों में तो अपना दर्द उतर आता है।

आशा भोंसले के फिल्म उद्योग में प्रवेश करने से पहले गीता दत्त मादक गीतों की मल्लिका बन चुकी थीं। ओ.पी. नैयर के संगीत में उन्होंने कई सुरीले गीत गाए, फिर जैसे-जैसे आशा भोंसले ओ.पी. नैयर के नजदीक आती गई, गीता दत्त को पीछे हटना पड़ा। आशा भोंसले ने गीता दत्त की जगह पर अपना अधिकार जमा लिया। यह भावना गीता दत्त के हृदय में सदैव बनी रही। गुरुदत्त से शादी करने के पश्चात गीता दत्त की पूरी दुनिया सिमटकर रह गई, उन्हें सिर्फ गुरुदत्त की फिल्मों में काम करने की अनुमति थी। एक सदाबहार गायिका को बंधन में कैद कर दिया गया। जब गुरुदत्त और वहीदा रहमान के संबंध आगे बढऩे लगे तो गीता दत्त को कितना दुख हुआ था इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। बाहर से बेगानापन और प्यार में बेरुखी। कितना दर्द पीड़ा सही होगी महान गायिका गीता दत्त ने और यह दर्द फिल्म साहिब बीवी और गुलाम में एक गीत ‘कोई दूर से आवाज दे चले आओ’ में प्रगट किया। उन्होंने रात-रातभर जागकर गुरुदत्त का इंतजार किया, उसी गीत में वे पंक्तियां भी गायीं- रात-रात भर इंतजार है। ऐसे समय में फिल्म जगत की प्रसिद्ध अभिनेत्री मीना कुमारी भी दर्द से नहा रही थीं। वैवाहिक जीवन के दुख का बोझ उठा रही थीं। ऐसे में उनका और गीता का साथ दूध में केसर की भांति घुल गया था। कई बार उलझन होती थी और जनता कहती थी कि गीता दत्त अभिनय कर रही है या मीना कुमारी गीत गा रही हैं। मीना कुमारी की आंखों का वीरानापन गीता दत्त की आवाज में उतर आता था।

आशा भोंसले का जीवन भी बहुत संघर्षमय रहा है। व्यक्तिगत भी और सार्वजनिक तौर पर भी। लता मंगेशकर के फिल्म जगत में पूरी तरह स्थापित हो जाने के पश्चात आशा की राहें मुश्किल होती चली गईं। नंबर दो की गायिका होने के पश्चात उन्हें सहनायिका के गाने ही मिलते थे। यह बात उल्लेखनीय है कि ओ.पी. नैयर का साथ मिलने के पश्चात आशा भोंसले-लता मंगेशकर की बराबरी करने लगी थीं। वे ओ.पी. नैयर के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ गईं। दूसरे संगीतकार उन्हें लेने के लिए हिचकते रहे। आशा को सही समय पर लगा कि व्यावसायिक संबंध और भावनात्मक संबंध अलग-अलग होते हैं। अगर नाम कमाना है तो प्रोफेशनल होना जरूरी है और वह नैयर साहिब से जुदा हो गईं। जाते-जाते आशा भोंसले ने ऐसा गीत गाया जो उसके गले से नहीं बल्कि हृदय से निकला था और उनके व्यक्तिगत जीवन की तरफ इशारा करता है।

फिल्म प्राण जाए पर वचन न जाए का गाना चैन से हमको कभी आपने जीने न दिया। इस गाने में आशा भोंसले ने अपना कलेजा बाहर निकालकर रख दिया था। इस गीत में आशा भोंसले ने बहुत धीमी आवाज का प्रयोग किया। इस गाने में आशा भोंसले ने अपनी जिंदगी से शिकायत की है, अपनी मजबूरी पूरी तरह प्रगट की है। ओ.पी. नैयर को लेकर उनके चरित्र पर कई लांछन लगे। इस गाने को सुनने के पश्चात कई लोगों का कहना था कि आशा भोंसले पूरी तरह टूट चुकी थीं, इसी गाने को लेकर आशा भोंसले को फिल्म फेयर का सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार मिला था। यह गाना आशा भोंसले और ओ.पी. नैयर के बीच स्थापित रिश्तों की अंतिम निशानी थी। इसके पश्चात आशा भोंसले लगातार फिल्म जगत में ऊपर चढ़ती गईं, जबकि ओ.पी. नैयर का सूर्य अस्त होने लगा।

आशा भोसले ने अपनी जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। एक बार पुन: उनको एस.डी. बर्मन का सहारा लेना पड़ा। आर.डी. बर्मन के संगीत निर्देशन में आशा भोंसले ने कई गाने गाए और बुलंदियों को छुआ।

सी. रामचंद्र ने लता मंगेशकर के लिए कई अमर धुनें बनाईं। वे इतने लतामय हो गए थे कि हल्के-फुल्के और फूहड़ गीतों तक के लिए लता मंगेशकर पर आश्रित हो गए थे। सी. रामचंद्र जब इन संबंधों को भुनाने लगे तो लता मंगेशकर को बहुत बड़ा धक्का लगा। वे भी सी. रामचंद्र के उतने ही करीब थीं। लता मंगेशकर के सामने कैरियर या रिश्ते दोनों में से एक को चुनना था। वे जानती थीं कि पाकिस्तान बनने के पश्चात नूरजहां वहां चली जाएंगी अत: नूरजहां के पाकिस्तान शिफ्ट होने के पश्चात उन्हें भारत में किसी प्रकार का कोई चैलेंज नहीं होगा। लता मंगेशकर को ऐसा लगने लगा कि उसकी आवाज में भी कुछ विशेषता है और लगभग सभी संगीत निर्देशक उनको प्राथमिकता देने लगे थे। लता मंगेशकर ने अंत में कैरियर को चुना। ऐसे दौर में अपने एक गीत में उन्होंने अपना सब कुछ उड़ेल दिया था। तुम क्या जानो तुम्हारी याद में हम कितना रोएं। यह गीत दर्द भरे गीतों में ऊंचा स्थान रखता है। फिल्म का नाम भी विचित्र था ‘शिनशिनाकी बुब्लाबू’। यह गीत एक परवाने की शिकायत है जो शमां के लिए जल मरा। आज इस गीत को सुनने से रोंगटे खड़े हो जाते हैं, दर्द का अहसास होता है। लता मंगेशकर ने यह गीत धीमी गति से इस कौशल के साथ गाया जैसे वे अपने आप से कुछ शिकायत दर्ज करवा रही हैं। यह उल्लेखनीय है कि इन तीनों महान गायिकाओं में दर्द की आवाज थी और आवाज का दर्द था, जो उनके सीने में सदा छिपा रहा। भारत की इन तीन बड़ी गायिकाओं ने, कुछ गाने जो दर्द भरे थे, इतनी मधुर आवाज में गाए कि श्रोता उन्हें आज भी सुनते हैं।

बड़ी विचित्र बात है कि आज की गायिकाएं केवल मुंह से गीत गाती हैं न कि दिल से, उनको तो पैसे की जल्दी होती है, पैसे लिए और चलती बनीं।

आज रीमेक एक ट्रेंड बन चुका है। आज 80 प्रतिशत गाने रीमिक्स आ रहे हैं और जो 20 प्रतिशत गाने ओरिजनल आ रहे हैं, उन्हें प्रमोट नहीं किया जा रहा।जो नये गायक-गायिकाएं फिल्म जगत में प्रवेश कर रही हैं, उनसे कोई खास उम्मीदें नजर नहीं आतीं। लोगों को ओरिजनल गाने चाहिए। हमारे कंपोजर्स में अच्छे ओरिजनल गाने क्रिएट करने की भरपूर काबिलियत भी है, फिर भी ओरिजनल गानों को ठीक तरह से बनाया नहीं किया जा रहा है और वे सदाबहार कर्णप्रिय भी नहीं बन पा रहे हैं। (विनायक फीचर्स)

हिस्ट्रीशीटर गौ-तस्कर ‘गुलाब’ गिरफ्तार

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UP News: मेरठ में मांस की तस्करी के लिए गौ तस्करों ने नए-नए तरीके इलाज करने शुरू कर दिए हैं. कार में मांस लेकर जा रहे बदमाश से पुलिस की मुठभेड़ हो गई. पुलिस ने उसे धर दबोचा और उसके पास से तमंचा और कारतूस भी बरामद किया है. पुलिस को कई बड़ी जानकारियों भी इस गौतस्कर से हाथ लगी हैं, जिस पर जल्द ही कई और गिरफ्तारियां भी हो सकती हैं.

सरूरपुर खुर्द थाना पुलिस चैकिंग कर रही थी तभी बरनावा पुलिया की तरफ से एक कार आ रही थी. पुलिस ने जैसे ही कार को रोका तो कार की रफ्तार और बढ़ा दी गई. पुलिस ने घेराबंदी की तो कार सवार ने गोली चला दी, तभी पुलिस ने उसे मुठभेड़ के दौरान गिरफ्तार कर लिया. वहीं पकड़े गए एक बदमाश की पहचान गुलाब के रूप में हुई, जो सरूरपुर खुर्द थाने का हिस्ट्रीशीटर भी है और उसके खिलाफ 16 मुकदमें भी दर्ज हैं. वो पिछले काफी समय से गौ-तस्करी की घटनाओं को अंजाम दे रहा था, लेकिन अब पुलिस के हत्थे चढ़ गया.

पुलिस ने मुठभेड़ में जब गौ-तस्कर गुलाब को गिरफ्तार किया तो उसके कब्जे से तमंचा, कारतूस और खोखा भी बरामद किया गया. पुलिस ने जब कार की तलाशी ली तो उसमें मांस भी था. पूछताछ की तो पता चला कि वो भैंस का मांस है और उसे कहीं सप्लाई करने के लिए गुलाब जा रहा था. इससे पहले भी वो कई बार कार से ही मांस की सप्लाई कर रहा था, उसके गैंग के कई और बदमाशों के नाम भी पुलिस के सामने आ गए हैं.

खिवाई में हुई थी गोकशी की घटना 

बता दें कि 24 जुलाई को खिवाई चौकी के पास एक बैल काट दिया गया था. पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली तो उसमें गुलाब का नाम सामने आया था. पता चला कि एक शख्स अपने बैल को बेचना चाहता था, लेकिन उसके दाम सही नहीं मिल रहे थे. तभी गांव के ही शादाब नाम के व्यक्ति ने गुलाब का परिचय दिया और बताया कि बैल काटा जाएगा तो ज्यादा पैसे मिलेंगे और फिर बैल को काट दिया गया था. पुलिस को इस मामले में भी गुलाब की तलाश थी, क्योंकि कई जगह जंगल में वो गोकशी की घटनाओं को अंजाम दे रहा था और मांस सप्लाई कर रहा था.

गुलाब पकड़ा गया तो कई नाम आए सामने 

गौ-तस्कर गुलाब की मुठभेड के बाद हुई गिरफ्तारी के मामले में जब एसएचओ सरूरपुर खुर्द थाना अजय शुक्ला से बात की गई तो उन्होंने कहा कि मुखबिर से सूचना मिली  थी और इसी आधार पर जब चैकिंग की गई तो पुलिस पर गोली चला दी. जिसमें मुठभेड़ के बाद गौ-तस्कर गुलाब को गिरफ्तार कर लिया गया. ये कई गौकशी की घटनाओं में शामिल रहा है. कई बड़ी जानकारियां भी पुलिस के हाथ लगी हैं, कौन-कौन लोग इसके साथ गौकशी में शामिल हैं उनका भी पता लगाया जा रहा है.

माताएँ अपनी भूमिकाओं के प्रति अत्यधिक सचेत हैं-शबाना आज़मी

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मुंबई (अनिल बेदाग) : 2024 राउंडटेबल कांफ्रेंस, यूनिसेफ के सहयोग से ग्रेविटस फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक प्रतिष्ठित कार्यक्रम, प्रारंभिक बाल विकास (ईसीडी) के जरूरी और आवश्यक विषय को संबोधित करने के लिए कई प्रमुख आवाज़ों को एक साथ लाता है। इसमें शामिल होने वाले प्रतिष्ठित गणमान्य व्यक्तियों में सामाजिक मुद्दों पर अपनी सशक्त आवाज़ रखने वाली प्रसिद्ध अभिनेत्री शबाना आज़मी, राज्यसभा में सांसद डॉ. मेधा कुलकर्णी और पुणे में शिक्षा आयुक्त सूरज मंधारे शामिल थे। उनके साथ प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ और नवजात शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. अमिता फडनीस, भारतीय बाल चिकित्सा अकादमी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रमोद जोग और वकालत के लिए प्रतिबद्ध अभिनेत्री तनीषा मुखर्जी भी शामिल थीं। 2024 का गोलमेज सम्मेलन ईसीडी को राष्ट्रीय और वैश्विक एजेंडे में ऊपर उठाने के चल रहे प्रयासों में एक निर्णायक क्षण साबित हुआ।
अभिनेत्री शबाना आज़मी ने कहा, “मैं केवल अपने व्यक्तिगत अनुभव से ही बोल सकती हूँ, मैंने देखा है कि मेरे माता-पिता ने क्या किया और मैंने माताओं को अपने बच्चों के साथ क्या करते देखा। मुझे लगता है कि आज की माताएँ अक्सर अपनी भूमिकाओं के प्रति अत्यधिक सचेत रहती हैं, जो हमेशा अच्छी बात नहीं हो सकती है। पिछली पीढ़ियों में, इस स्तर की चिंता नहीं थी, फिर भी बच्चों के साथ प्यार का एक गहरा, स्वाभाविक बंधन था। मेरा मानना है कि अपने बच्चे के साथ प्यार और सम्मान से पेश आना ज़रूरी है, और मुझे यकीन नहीं है कि आधुनिक “हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग” शैली बच्चे को लाभ पहुँचाती है या नहीं।
उन्होंने आगे कहा, “उदाहरण के लिए, मेरे पति ने अपनी माँ को जल्दी खो दिया, उनके पास बड़े होने पर कोई खिलौने नहीं थे, लेकिन उन्हें अपनी कल्पना को तलाशने और विकसित करने की स्वतंत्रता थी, जिसका श्रेय वे आज एक लेखक के रूप में अपनी सफलता को देते हैं।
उषा काकड़े ने कहा, “हमारे ग्रेविटस फाउंडेशन की ‘गुड टच बैड टच’ परियोजना एक महत्वपूर्ण मील के पत्थर तक पहुंच गई है, जिसका असर 1,095 स्कूलों के 4 लाख से ज़्यादा छात्रों पर पड़ा है। यह पहल बाल सुरक्षा के बारे में जागरूकता बढ़ाने, बच्चों को असुरक्षित स्पर्श को पहचानने और रिपोर्ट करने के लिए सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण है।”

 फिल्म ‘तिकड़म’ की स्पेशल स्क्रीनिंग लखनऊ में संपन्न

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                     पर्यावरण और सामाजिक चुनौतियों की पृष्ठभूमि के बीच एक पिता और उसके बच्चों के बीच के मार्मिक रिश्ते को दर्शाती फिल्म ‘तिकड़म’ जियोसिनेमा पर रिलीज होने के बाद से ही इन दिनों बॉलीवुड में चर्चा का विषय बनी हुई है।
इस फिल्म ने दर्शकों और समीक्षकों का दिल जीत लिया है। फिल्म की सफलता और प्रभाव को देखते हुए, मेकर्स ने लखनऊ में स्पेशल स्क्रीनिंग का आयोजन किया। 29 अगस्त को आयोजित इस कार्यक्रम में आईएएस, आईपीएस अधिकारी समेत यूपी सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारी तथा छात्र- छात्राओं और शिक्षकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और इस फिल्म का आनंद उठाया।
ज्योति देशपांडे और पार्थ गज्जर, पूनम श्रॉफ, सवियो शेनॉय और श्वेता शर्मा आंचलिया द्वारा निर्मित फिल्म ‘तिकड़म’ के इस स्पेशल स्क्रीनिंग में अभिनेता अमित सियाल और निर्देशक विवेक आंचलिया भी मौजूद थे।
प्रस्तुति : काली दास पाण्डेय

दुर्लभ कैंसर रोगियों के उपचार के लिए अपोलो हॉस्पिटल्स नवी मुंबई ने शुरू किया रेयर-केयर क्लीनिक

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मुंबई। दुर्लभ (रेयर) कैंसर के साथ जुड़ी अनिश्चितता और भय से जूझ रहे रोगियों के लिए सही निदान और इलाज की पहुंच बड़ी चुनौती जैसी लग सकती है। अपोलो हॉस्पिटल्स नवी मुंबई की रेयरकेयर क्लीनिक अब उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आएगी। यह विशेष क्लीनिक, दुर्लभ और चुनौतीपूर्ण कैंसर से जूझ रहे लोगों को हर तरह के व सहानुभूतिपूर्ण तरीके से इलाज प्रदान करने के लिए समर्पित है।

दुर्लभ कैंसर आम तौर पर असामान्य है और यह 1 लाख में 6 लोगों को होता है लेकिन कुल मिलाकर 20% कैंसर इस प्रकार (टाइप) के होते हैं। ये कैंसर लगभग 200 प्रकार के होते हैं और ऐसे रोगी अक्सर अलग-थलग महसूस करते हैं क्योंकि नैदानिक प्रक्रियाओं और उपचार प्रोटोकॉल संबंधी डाटा की कमी है। दुर्लभ कैंसर में हड्डी और सॉफ्ट टिशू सार्कोमा (डेस्मॉइड ट्यूमर), त्वचा कैंसर, गर्भावस्था से जुड़े कैंसर, लैंगिक अल्पसंख्यक आबादी में कैंसर (एलजीबीटीक्यू+ कैंसर), न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर (एनईटी), वंशानुगत और पारिवारिक कैंसर और किशोरों या युवाओं को होने वाले कैंसर शामिल हैं। ऑन्कोलॉजी में चुनौतीपूर्ण स्थितियों में कोमॉर्बिडिटी के साथ वृद्धावस्थामें होने वाले कैंसर, इम्यूनो कॉम्प्रोमाइज्ड सिचुएशन, कोमॉर्बिडिटी वाले रोगी और पॉली पिल थेरेपी, या सामान्य कैंसर जैसे स्तन, स्त्री रोग, फेफड़े, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल, सिर तथा गर्दन के कैंसर के असामान्य प्रेज़ेंटेशन या रेयर हिस्टोलॉजी शामिल हैं।
दुर्लभ कैंसर के उपचार के लिए व्यापक और मल्टी-डिसिप्लिनरी दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, जिसे अपोलो हॉस्पिटल्स नवी मुंबई में रेयर-केयर क्लीनिक अनुकूल वातावरण प्रदान करता है। रोगियों और उनके परिवारों को विशेषज्ञ से इलाज के साथ-साथ सहानुभूतिपूर्ण समर्थन मिलेगा, जिससे उन्हें नई आशा और आत्मविश्वास के साथ अपने स्वास्थ्य की यात्रा को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
डॉ. ज्योति बाजपेयी (लीड-मेडिकल एंड प्रेसिज़न ऑन्कोलॉजी, अपोलो कैंसर सेंटर नवी मुंबई) ने कहा कि दुर्लभ कैंसर के लिए शीघ्र निदान महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे अक्सर ऐसे लक्षणों के साथ उपस्थित होते हैं जिन्हें आसानी से अन्य स्थितियों के लिए गलत समझा जा सकता है। सोसाइटी ऑफ इम्यूनोथेरेपी इन कैंसर (एसआईटीसी), यूरोपियन सोसाइटी ऑफ मेडिकल ऑन्कोलॉजी (ईएसएमओ) में इम्यूनो-ऑन्कोलॉजी संकाय और सार्कोमा के लिए तत्काल पूर्व संकाय के साथ-साथ महिलाओं के लिए ऑन्कोलॉजी के लिए कोर कमेटी सदस्य जैसे वैश्विक कैंसर संघों के सक्रिय सदस्यता के एक्सपोज़र ने मुझे दुर्लभ प्रकार के कैंसर का सटीक निदान और उपचार करने की विशेषज्ञता प्रदान की है, इससे रोगियों के लिए अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तुरंत सही उपचार शुरू करने में मदद मिलती है।
दुर्लभ कैंसर लगातार होने वाली समस्याओं के रूप में सामने आ सकते हैं, जैसे कि लगातार खांसी, सांस लेने में तकलीफ, तिल या त्वचा के घावों में बदलाव, बिना किसी कारण के दर्द, नए सीज़र या सिरदर्द, सूजे हुए लिम्फ नोड, बार-बार बुखार, लगातार थकान या बिना किसी कारण के वज़न कम होना। अपोलो के रेयरकेयर क्लीनिक में विशेषज्ञ सहायता प्रदान करते हैं।
डॉ. अनिल डी’क्रूज़ (डायरेक्टर ऑन्कोलॉजी और सीनियर कंसल्टेंट हेड एंड नेक ऑन्कोलॉजी, अपोलो हॉस्पिटल्स) ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में कैंसर की वैश्विक घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं, जो 2012 में 1 करोड़ 20 लाख से बढ़कर 2018 में 1 करोड़ 80 लाख और 2020 में 1 करोड़ 93 लाख हो गई हैं। भारत में कैंसर रजिस्ट्रियां भी इसी तरह की प्रवृत्ति दिखा रही हैं। अपोलो कैंसर सेंटर हमारे पास आने वाले मरीजों के लिए सर्वोत्तम परिणाम सुनिश्चित करने के लिए साक्ष्य आधारित, अवयव नुसार विशेष सेवाएं, उत्कृष्ट बुनियादी संरचना और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के चिकित्सकों द्वारा समर्थित ट्यूमर बोर्ड शुरू करके कैंसर देखभाल पर जोर दे रहे हैं। रेयर-केयर क्लिनिक हमारे समर्पण का एक प्रमाण है जो यह सुनिश्चित करता है कि सबसे अनोखे और चुनौतीपूर्ण कैंसर के मामलों को भी व्यक्तिगत, देखभाल प्राप्त हो। हमारा लक्ष्य रोगियों और उनके परिवारों के लिए कैंसर देखभाल के अनुभव को बदलना है।