Home Blog Page 103

आज प्रधानमंत्री महाराष्ट्र में 11,200 करोड़ रुपये वाली विभिन्न परियोजनाओं का करेंगे शिलान्यास

0
File Photo

प्रधानमंत्री जिला न्यायालय से स्वर्गेट तक पुणे मेट्रो सेक्शन का उद्घाटन करेंगे

प्रधानमंत्री बिडकिन औद्योगिक क्षेत्र राष्ट्र को समर्पित करेंगे

प्रधानमंत्री सोलापुर हवाई अड्डे का उद्घाटन करेंगे

New Delhi –  प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी 29 सितंबर को दोपहर करीब 12:30 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए महाराष्ट्र में 11,200 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली विभिन्न परियोजनाओं का शिलान्यास, उद्घाटन और राष्ट्र को समर्पित करेंगे।

प्रधानमंत्री जिला न्यायालय से स्वर्गेट तक पुणे मेट्रो खंड का उद्घाटन करेंगे और इसके साथ ही पुणे मेट्रो रेल परियोजना (चरण-1) पूरा हो जायेगा। जिला न्यायालय से स्वर्गेट के बीच भूमिगत खंड की लागत लगभग 1,810 करोड़ रुपये है।

प्रधानमंत्री पुणे मेट्रो फेज-1 के स्वर्गेट से कटराज एक्सटेंशन की आधारशिला रखेंगे। इस पर करीब 2,955 करोड़ रुपये की लागत आएगी। लगभग 5.46 किलोमीटर का यह दक्षिणी भाग मार्केट यार्ड, पद्मावती और कटराज नामक तीन स्टेशनों के साथ पूरी तरह से भूमिगत है।

प्रधानमंत्री, भारत सरकार के राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास कार्यक्रम के तहत 7,855 एकड़ क्षेत्र को कवर करने वाली एक परिवर्तनकारी परियोजना, बिडकिन औद्योगिक क्षेत्र को राष्ट्र को समर्पित करेंगे। यह महाराष्ट्र में छत्रपति संभाजीनगर से 20 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। दिल्ली मुंबई औद्योगिक गलियारे के तहत विकसित यह परियोजना मराठवाड़ा क्षेत्र में एक जीवंत आर्थिक केंद्र के रूप में अपार संभावनाएं रखती है। केंद्र सरकार ने 6,400 करोड़ रुपये से अधिक की कुल परियोजना लागत के साथ 3 चरणों में विकास के लिए इस परियोजना को मंजूरी दी है।

प्रधानमंत्री सोलापुर हवाई अड्डे का उद्घाटन करेंगे, जिससे कनेक्टिविटी में काफी सुधार होगा तथा सोलापुर पर्यटकों, व्यापारिक गतिविधियों के लिए आने वाले यात्रियों और निवेशकों के लिए अधिक सुलभ हो जाएगा। सोलापुर में मौजूदा टर्मिनल भवन को सालाना लगभग 4.1 लाख यात्रियों को सेवा देने के लिए पुनर्निर्मित किया गया है।

प्रधानमंत्री भिडेवाड़ा में क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले के पहले बालिका विद्यालय के स्मारक की आधारशिला भी रखेंगे।

***

प्रतिबंध के बाद भी धड़ल्ले से बिक रहा है चाइनीज लहसुन* 

0
(राकेश अचल-विभूति फीचर्स)

मुझे आज लेबनान पर हो रहे हमलों पर लिखना था ,लेकिन लिख रहा हूँ लहसुन के बारे में । हमारे देश की अदालतें इतनी दरियादिल हैं कि वे एक ओर यदि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की नागरिकता के मामले की सुनवाई करतीं हैं तो दूसरी तरफ लहसुन पर आयी याचिका की सुनवाई भी करतीं हैं और वो भी चीनी लहसुन के मामले की।

 लहसुन हालांकि प्याज जाति का कंद है किन्तु प्याज की गाँठ होती है और लहसुन की कलियाँ। अदालत में विवाद उस लहसुन का है जो हमारा नहीं बल्कि चीन का है ,और चीनी लहसुन पर भारत सरकार ने रोक लगा रखी है ,फिर भी चीन का लहसुन भारतीय बाजारों में इफरात में बिक रहा है। मामला दिलचस्प है इसलिए मैंने दूसरे तमाम विषयों को तिलांजलि देकर लहसुन पर लिखना शुरू कर दिया।

प्रतिबंध के बावजूद चीन के खतरनाक लहसुन के धड़ल्ले से देश में आने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने खाद्य सुरक्षा आयुक्त और कलेक्टर  को कार्रवाई करने का आदेश दिए हैं। फरियादी   की ओर से पेश किए गए चीन के लहसुन को प्रदेश के खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग के पेश हुए अफसर से सील करवा दिया। अदालत ने 15 दिन में इसकी जांच रिपोर्ट मांगी है। इलाहबाद  का हाईकोर्ट सचमुच संवेदनशील है। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि इलाहबाद  हाईकोर्ट में लंबित मामलों की संख्या  10.74 लाख  है। देश में 25 हाईकोर्ट में से इलाहाबाद हाईकोर्ट इस मामले में सबसे आगे है। ये  राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड (एनजेडीजी) के  आंकड़े हैं।
बहरहाल लहसुन पर लौटते है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि खाद्य सुरक्षा आयुक्त और लखनऊ के डीएम हेल्पलाइन नंबर जारी करें, जिससे लोग चीन के लहसुन की बिक्री की शिकायत उस पर दर्ज करवा सकें। कोर्ट ने इस नंबर पर मिलने वाली शिकायतों पर सख्त करवाई करने के निर्देश दिए हैं। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ल की खंडपीठ ने यह आदेश स्थानीय अधिवक्ता मोतीलाल यादव की जनहित याचिका पर दिया। मोतीलाल  ने  खतरनाक चीनी लहसुन की बिक्री की प्रकाशित  खबरों को याचिका के साथ लगाकर इस पर सख्त प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया था। फरियादी का कहना है कि देश में 2014 से ही इस लहसुन की बिक्री प्रतिबंधित है, इसके बावजूद बाजारों में यह खुलेआम बिक रहा है।
लहसुन भले ही हमारे यहां औषधीय माना जाता है लेकिन कुछ लोग हैं जो इसे हाथ  भी नहीं लगाते ,उनके लिए लहसुन अस्पृश्य है । हमारे  वैद्य जी कहते हैं कि लहसुन में   रासायनिक तौर पर गन्धक की आधिक्य होती है। इसे पीसने पर ऐलिसिन नामक यौगिक प्राप्त होता है जो प्रतिजैविक विशेषताओं से भरा होता है। इसके अलावा इसमें प्रोटीन, एन्ज़ाइम तथा विटामिन बी, सैपोनिन, फ्लैवोनॉइड आदि पदार्थ पाए जाते हैं।अक्सर लहसुन खाली पेट खाने की सलाह दी जाती है। लहसुन को लेकर कहावतें उतनी नहीं हैं जितनी प्याज को लेकर है।  प्याज को काटा जाता है ,लहसुन को छीला जाता है ।  लहसुन की पैकेजिंग प्रकृति ने मक्के के भुट्टे की तरह बहुत आकर्षक तरीके से की है। जाहिर है कि ये विशेष कंद है अन्यथा इसे धरती के भीतर आलू की तरह उगने के लिए न छोड़ दिया जाता ?
कहते हैं कि लहसुन एक दक्षिण यूरोप में उगाई जाने वाली प्रसिद्ध फसल है। भारत में लहसुन की खेती मुख्य रूप से  गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और तमिलनाडु में की जाती है। इसका 50 प्रतिशत से भी ज्यादा उत्पादन गुजरात और मध्यप्रदेश  में किया जाता है। हमारे यहां एग्रीफाउंड वाइट (जी. 41 ), यमुना वाइट (जी.1 ), यमुना वाइट (जी.50), जी.51 , जी.282 ,एग्रीफाउंड पार्वती (जी.313 ) और एच.जी.1 प्रजाति का लहसुन मिलता है ,लेकिन हमारे पड़ौसी देश चीन ने हमारे लहसुन के सामने अपना लहसुन खड़ा कर दिया।
आपको शायद पता हो या न हो लेकिन भारत में साल 2014 से ही चाइनीज लहसुन प्रतिबंधित किया गया है ,लेकिन यह भारतीय मंडियों और खुदरा बाजार में धड़ल्ले  से बेचा जा रहा है। जिस लहसुन को देसी समझकर आप अपने घर ले जा रहे हैं और दाल-सब्‍जी में तड़का मारकर खा रहे हैं, वह सिंथेटिक रूप से खतरनाक कैमिकल्‍स से बना फंगस वाला चाइनीज लहसुन हो सकता है। चीनी लहसुन का अवैध व्यापार एक लम्बे अरसे से जारी है। चीन अक्सर नेपाल और बांग्लादेश के रास्ते इसकी यहां डंपिंग करता है । इन दोनों ही देशों के साथ भारत लहसुन का ड्यूटी फ्री व्यापार करता है। भारत पहुंचने वाला चीनी लहसुन कई बैक्टीरिया और बीमारियों को साथ लेकर पहुंचता है। ये लोगों की सेहत पर असर डालता है। हाल में एक वायरल वीडियो में दावा किया गया है कि चीन में लहसुन ‘सीवर के पानी’ में पैदा होता है। इसे सफेद दिखाने के लिए आर्टिफिशियल तरीके से ‘ब्लीच’ किया जाता है।
 हकीकत ये है कि भारत में करीब 32.7 लाख टन लहसुन का उत्पादन होता है । भारत में सबसे ज्यादा लहसुन का उत्पादन मध्य प्रदेश में होता है।  हालांकि चीन में उत्पादन गिरने के बावजूद वह दुनिया में नंबर एक है । चीन में हर साल करीब 2 से 2.5 करोड़ टन लहसुन का उत्पादन होता है, चीन के मुकाबले भारत का लहसुन थोड़ा छोटे आकार का होता है।  वहीं इसका रेट चीन के मुकाबले काफी कम है। चीनी लहसुन की ग्लोबल मार्केट में 1250 डॉलर प्रति टन कीमत है, तो वहीं भारतीय लहसुन 450 से 1000 डॉलर प्रति टन तक मिलता है। इसलिए भारत गरीब से लेकर अमीर देशों तक के हिसाब से लहसुन की क्वालिटी उपलब्ध करा पाता है।
चीनी लहसुन की मांग अधिकतर अमेरिका और यूरोपीय देशों में है, जबकि भारत, मलेशिया, थाईलैंड, नेपाल और वियतनाम को लहसुन का बड़े पैमाने पर निर्यात करता है । बावजूद सारी बुराइयों के  भारतीय इसके चमकदार बगुलामुखी रंग की दीवानगी के फेर में पढ़कर चीनी लहसुन खरीद लाते हैं। (विभूति फीचर्स)

पानी और पर्यावरण के लिए सदैव समर्पित रहे अनुपम मिश्र* 

0
कुमार कृष्णन-
हमारे देश में बात जब जल संकट की होती है तो अनुपम मिश्र सहज याद आ जाते हैं। उनका चिंतन आज भी प्रासंगिक है।अनुपम जी अपनी पीढ़ी के आखिरी ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत को पर्यावरण की राजनीति समझाई। वही वो व्यक्ति थे,जो चिपको आंदोलन में गए और जब वापस आए तो एक हकीकत भरी कहानी उनके साथ लौटी।उन्होंने बताया कि चिपको आंदोलन सिर्फ पेड़ों तक सीमित नहीं था बल्कि लोगों के राजनीतिक पक्षपात से भी जुड़ा हुआ था। लोग पर्यावरण के लिए लड़ रहे थे क्योंकि यह उनके अस्तित्व की लड़ाई थी। उन्होंने पर्यावरण की विशुद्ध राजनीति को समझाया, यह भी समझाया कि इस देश में हाशिए पर खड़े गरीबों की राजनीति कौन सी है और आखिर उनका भुलाया हुआ और उपेक्षित किया जाने वाला ज्ञान कैसे विकास का हिस्सा बनेगा।
अपने ढंग से उन्होंने लोक को समझने का प्रयास किया।  गांधी शांति प्रतिष्ठान में साथ बिताए वर्षों के दौरान, अनुपम मिश्र चंडी प्रसाद भट्ट के नेतृत्व वाले चिपको आंदोलन से बहुत प्रभावित हुए। सत्येंद्र त्रिपाठी के साथ, उन्होंने चिपको आंदोलन लिखा , जो भारत और दुनिया भर के लोगों का ध्यान “पेड़ों को गले लगाने” के इस अनूठे आंदोलन की ओर आकर्षित करने में बहुत प्रभावशाली था। सामूहिक अहिंसक प्रतिरोध के इस प्रेरक और प्रभावी रूप में, महिलाओं और पुरुषों ने मांग की कि अगर कोई पेड़ काटा जाना है, तो उन्हें भी उसके साथ काटा जाना चाहिए।
भारत में सदियों से अपनाई जा रही जल संरक्षण तकनीकों की जानकारी में उन्हें महारथ हासिल थी। उन्होंने देश-विदेश में बताया कि किस तरह भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोग अपनी भौगोलिक स्थिति, संसाधनों की उपलब्धता और जरूरतों को समझते हुए जल संरक्षण के कारगर तरीके अपनाते थे। उनका कहना था कि आधुनिक जल परियोजनाएं इन पारंपरिक तरीकों के आगे फीकी और कम असरदार हैं।
उनके निधन के बाद धीरे- धीरे  लोगों ने उन्हें विस्मृत कर दिया। पर्यावरण के संदर्भ में वे देशज ज्ञान के वाहक थे। गांधी शांति प्रतिष्ठान जो उनकी कर्मभूमि थी, उनकी स्मृतियों को खत्म किया जा रहा है। वहीं झारखंड में गोदावरी फांउडेशन द्वारा अनुपम मिश्र को याद किए जाने के कई मायने हैं।
वे ऐसे व्यक्ति थे जो बिना किसी नाम के, बिना आवाज के, बिना गाजे-बाजे के, बस अच्छे काम कर रहे थे। अनुपम जी व्यक्ति खोजते थे, उसे तराशते थे और उसके साथ काम करते थे। इनमें जल पुरूष राजेन्द्र सिंह के साथ साथ कई हस्तियों के नाम हैं।
पर्यावरण संरक्षण आज के युग की बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। भारत में इसका असर विविध रूपों में देखने को मिल रहा है।देश में पर्यावरण का संरक्षण करने के लिए तक़रीबन 200 से भी अधिक कानून हैं, लेकिन लगभग सभी कानूनों का खुलेआम उल्लंघन होता है इसलिए भारत सर्वाधिक प्रदूषित देशों की सूची में आता है और पर्यावरण संरक्षण के लिए कोई कदम अभी तक प्रभावी सिद्ध नहीं हो पाए हैं। दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान बढ़ रहा है, सूखा और जंगली आग अधिक बार होने लगी है, वर्षा के पैटर्न बदल रहे हैं, ग्लेशियर और बर्फ पिघल रहे हैं और वैश्विक औसत समुद्र स्तर बढ़ रहा है।
भारत में हाल ही में आई जानलेवा गर्मी और सूखे  के लिए आंशिक रूप से जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराया गया है। विश्लेषण से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन ने ऐसी घटना की संभावना को लगभग 30 गुना बढ़ा दिया है। इसके अलावा, अतिरिक्त वैश्विक तापमान वृद्धि के साथ इसी तरह की घटनाओं की संभावना बढ़ती रहेगी।
अनुपम मिश्र को साल 1996 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित किया था। जमना लाल बजाज पुरस्कार सहित कई अन्य पुरस्कार भी उनके नाम हैं। अनुपम के पिता भवानी प्रसाद मिश्र हिंदी के प्रख्यात कवि थे।जल संरक्षण के क्षेत्र में उन्होंने काफी योगदान दिया है।
भारत के गांवों में घूम-घूमकर वह लोगों को पानी बचाने और जल का संरक्षण करने के पारंपरिक तरीकों के बारे में जागरूक करते थे। भारत के पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों की उनकी समझ को लेकर वह ना केवल भारत, बल्कि विदेशों में भी काफी मशहूर थे। उनकी पुस्तकें, खासकर “आज भी खरे हैं तालाब” तथा “राजस्थान की रजत बूंदें”, पानी के विषय पर प्रकाशित पुस्तकों में मील के पत्थर के समान हैं, और आज भी इन पुस्तकों की विषयवस्तु से कई समाजसेवियों, वाटर हार्वेस्टिंग के इच्छुकों और जल तकनीकी के क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों को प्रेरणा और सहायता मिलती है। सबसे बड़ी खासियत है कि अनुपम जी ने खुद की लिखी इन पुस्तकों पर किसी प्रकार का “कॉपीराईट” अपने पास नहीं रखा है। इसी वजह से “आज भी खरे हैं तालाब” पुस्तक का अब तक विभिन्न शोधार्थियों और युवाओं द्वारा ब्रेल लिपि सहित 19 भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। सामाजिक पुस्तकों में महात्मा गाँधी की पुस्तक “माय एक्सपेरिमेंट्स विथ ट्रुथ” के बाद सिर्फ़ यही एक पुस्तक ब्रेल लिपि में उपलब्ध है। सन् 2009 तक, इस अनुकरणीय पुस्तक “आज भी खरे हैं तालाब” की एक लाख प्रतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं।
सही अर्थों में भारतीय परिवेश, प्रकृति को गहराई तक समझने वाले अद्भुत विचारक,पर्यावरणविद, निश्चित ही अपनी तरह के विरले कर्मयोगी।अनुपम मिश्र पानी बचाने के लिए हमेशा आगे रहे,  एक बार गांधी शांति प्रतिष्ठान के परिसर में उनसे मिला, साथ में सूचना एवं जनसंपर्क के उपनिदेशक शिवशंकर सिंह पारिजात थे, उन्होंने पूछा – कितना पानी पियोगे – आधा गिलास या उससे ज्यादा या फिर पूरा गिलास, जितना पियोगे उतना ही दूंगा। पानी बहुत कम है। इसे बर्बाद मत करना।
पत्रकार प्रसून लतांत के अनुसार झारखंड में याद करने और उनकी स्मृति में पर्यावरण के क्षेत्र में काम रहे लोगो  को सम्मानित किए जाने के कई मायने हैं। एक तो उनके काम की पहचान और अच्छे कार्यो के लिए प्रोत्साहित करना है ताकि अच्छे काम करने वालों की कमी न हो।  प्रसून के मुताबिक अनुपम मिश्र की स्मृति में घनश्याम (झारखंड) , निलय उपाध्याय(बिहार),सुरेश भाई (उत्तराखंड) , अमरनाथ (पटना ), कमल कश्यप (दिल्ली) , डॉक्टर दुर्गा दत्त पाठक (चंपारण), डॉक्टर कुंदन कुमार , राम प्रकाश रवि(सुपोल बिहार), शिरोमणि कुमार (भागलपुर), राजेश कुमार सुमन (रोसड़ा, बिहार ), निर्भय सिंह (कटनी मध्य प्रदेश) ,राकेश कुमार(मुंगेर बिहार), इस्लाम हुसैन (उत्तराखंड), प्रेमलता सिंह (बिहार), प्रोफेसर डी एन चौधरी (भागलपुर), डॉ उत्तम पीयूष (मधुपुर)शेखर (रांची) ,अमित मकरंद (वैशाली बिहार), समीर अंसारी(देवघर),  संदीप कुमार शर्मा(उत्तर प्रदेश) संतोष बंसल(दिल्ली) ,बरखा लकड़ा(झारखंड), संजीव भगत(झारखंड),विनोद भगत (झारखंड), धीरज कुमार सिंह( जमुई), संजय कुमार ( पटना ) प्रमोद झिंझड़े (सोलापुर महाराष्ट्र),  दर्शन ठाकुर (उज्जैन), खेम नारायण शर्मा (छत्तीसगढ़),  जितेंद्र कुमार (समस्तीपुर), कुमार कृष्णन (बिहार), संजय कुमार (दरभंगा), नंदकिशोर वर्मा (उत्तर प्रदेश), निशांत रंजन (सारण) को रांची में अनुपम मिश्र की स्मृति में राष्ट्रीय पर्यावरण सेवी सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। झारखंड के संदर्भ मे अनुपम मिश्र को याद  किया जाना काफी महत्वपूर्ण है।जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और इंडियन स्कूल ऑफ माइंस, धनबाद की ओर से राज्य भर के लिए किए गए एक अध्ययन के मुताबिक पिछले दो वर्षों में रांची और झारखंड के अन्य हिस्सों में जल स्तर में लगातार गिरावट आ रही है।
जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया कि रांची में अत्यधिक आबादी, पिछले 50 सालों में तालाबों का अस्तित्व खत्म होने, कम बारिश की वजह से घटते जल स्तर की वजह से भी पानी की कमी हुई है। इस हाल में अनुपम मिश्र की पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’की प्रासंगिकता बढ़ गयी है। उनका मानना था कि तालाबों का महत्व न केवल पानी की आपूर्ति में होता है,बल्कि इससे समुदाय के आत्मिक और सामाजिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान होता है।
संस्कृति और परंपराओं के साथ तालाबों के सांस्कृतिक महत्व भी है।  विकास की तरफ़ बेतहाशा दौड़ते समाज को कुदरत की क़ीमत समझाने वाले अनुपम ने देश भर के गांवों का दौरा कर रेन वाटर हारवेस्टिंग के गुर सिखाए। वह ज्ञान समय की मांग है। नदी के सवाल पर उनका चिंतन था— नदी का भी अपना एक धर्म होता है। एक स्वभाव होता है।
नदी का धर्म है बहना,बहते रहना।पिछले एक दौर में हमने विकास के नाम पर, तकनीक की सहायता से नदी के इस धर्म को पूरी तरह बदल दिया है। खेती, उद्योग और शहर में पीने का पानी जुटाने हमने गंगा समेत हर नदी से पानी खींच लिया है। साफ पानी लिया है और फिर इन तीनों गतिविधियों से दूषित हुआ पानी  वापस नदियों में डाल दिया है।
(विनायक फीचर्स)

“मल्टीप्लेक्स प्ले ओटीटी” एप के मुंबई में नए कार्यालय के उद्घाटन समारोह में पहुंचे बॉलीवुड के मशहूर कलाकार

0

मुंबई। भारत के ऐसे पहले ओटीटी “मल्टीप्लेक्स प्ले” की ऑफिस का मुम्बई के रिलायबल बिजनस सेंटर में उद्घाटन किया गया जो सर्विस प्रोवाइडर है। इसके संस्थापक रेहान अली बिहार के मोतिहारी जिला के रहने वाले हैं। वह इंजीनियर हैं लेकिन तकनीकी क्षेत्र में माहिर होने और फिल्मों का शौक होने की वजह से वह बॉलीवुड इंडस्ट्री में आ गए। मल्टीप्लेक्स प्ले एप्प के नए कार्यालय की ओपनिंग के अवसर पर एडवोकेट शैलेश दूबे, आनंद बलराज विज, अली खान, राजा कॉपसॆ, ताहिर कमाल खान, सनी चार्ल्स, निर्माता निर्देशक डॉ कृष्णा चौहान, जर्नलिस्ट किशन शर्मा सहित कई हस्तियां मेहमान के रूप में उपस्थित रहे। एडवोकेट शैलेश दूबे के हाथों से फीता काटकर ऑफिस का शुभारंभ किया गया।

इस शुद्ध देसी ओटीटी ऐप के संचालन के लिए फाउंडर रेहान अली ने शाहनवाज़ खान, सिकन्दर खान, ज़ुबैर सिद्दीकी, मुश्ताक खान, नूर अली अंसारी, दीपक बलराज विज का विशेष आभार जताया।
संस्थापक रेहान अली ने
तीन चार साल के अध्ययन, रिसर्च और मेहनत के बाद मल्टीप्लेक्स प्ले ओटीटी लांच किया है, जो अपनी तरह का भारत का पहला सर्विस प्रोवाइडर ऐप है जो मेक इन इंडिया के अभियान को बुलंदी देता है।


बॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता अली खान ने इस अवसर पर रेहान अली को बधाई देते हुए कहा कि मल्टीप्लेक्स प्ले एक देसी एप है जो लोगो को एक बेहतरीन प्लेटफॉर्म मुहैया कराता है। मैं रेहान अली को मुबारकबाद देता हूं कि उन्होंने ऐसा नया ऐप अविष्कार किया है जो कंटेंट क्रिएटर्स के लिए एक वरदान साबित होगा। इनका नया ऑफिस मुम्बई की फ़िल्म इंडस्ट्री के केंद्र में स्थित है।
इस ओटीटी ऐप पर हिंदी, मराठी इंग्लिश सहित कई भाषाओं के कंटेंट्स का समावेश है। उच्च तकनिकी संसाधनों से सुसज्जित होने के कारण इस पर प्रसारित होने वाले सभी कार्यक्रम अच्छी गुणवत्ता के साथ दिखाई देंगे।
रेहान अली का कहना है कि इस ऐप पर शानदार फिल्मे, वेब सीरीज, कंटेंट्स दिखाए जाएंगे जो दर्शकों के लिए एक नया अनुभव होगा। तकनीकी रूप से काफी विकसित इस ऐप से निर्माता निर्देशक एक्टर्स कंटेंट क्रिएटर्स डायरेक्ट लाभ ले सकते हैं।
इसके अलावा हम समाज को प्रभावित करने वाले कंटेंट पर ध्यान देंगे। इंटरटेनमेंट के नाम पर गंदी फिल्मों से दूरी बनाकर रखेंगे और युवावर्ग को प्रोत्साहित करने वाली विषय पर बनी फिल्मों को हमारी ओटीटी पर प्रस्तुत करेंगे।

प्रधानमंत्री ने जैविक किसान श्रीमती पप्पाम्मल के निधन पर शोक व्यक्त किया

0

New Delhi प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित जैविक किसान श्रीमती पप्पाम्मल के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया है। श्री मोदी ने कहा कि उन्होंने कृषि, विशेषकर जैविक खेती के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। प्रधानमंत्री ने कहा कि लोग उनकी विनम्रता और दयालु स्वभाव के लिए उनकी प्रशंसा करते थे।

प्रधानमंत्री ने एक एक्स पोस्ट में कहा;

“पप्पाम्मल जी के निधन से बहुत दुःख हुआ। उन्होंने कृषि, विशेषकर जैविक खेती के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। लोग उनकी विनम्रता और दयालु स्वभाव के लिए उनकी प्रशंसा करते थे। मेरी संवेदनाएं उनके परिवार और शुभचिंतकों के साथ हैं। ओम शांति।”

बांग्लादेश में दुर्गापूजा पर संकट के बादल

0

(मनोज कुमार अग्रवाल -विनायक फीचर्स)

बांग्लादेश में मजहबी कट्टरपंथी ताकतों का अराजकता भरा उन्माद सिर चढ़कर बोल रहा है इसी के चलते हजारों साल से चली आ रही दुर्गा पूजा भी उनकी आंखों में चुभ रही है। इस बार बांग्लादेश में शारदीय नवरात्रि पर होने वाली दुर्गा पूजा कट्टरपंथी लोगों के निशाने पर है। बांग्लादेश से प्रधानमंत्री शेख हसीना के निर्वासन के बाद वहां हिन्दू विरोधी कट्टरपंथी ताकतों द्वारा कदम कदम पर हिन्दुओं का सामाजिक, धार्मिक ,सामुदायिक दमन किया जा रहा है।

बांग्लादेश में एक बार फिर हिंदू समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। राज्य में इस्लामी कट्टरपंथी समूहों ने हिंदूओ के कई मंदिरों और समितियों को धमकी भरे पत्र भेजे हैं। जिनमें 5 लाख बांग्लादेशी टका की मांग की गई है। इस पत्र में कहा गया है कि अगर ये रकम नहीं भेजी गई तो उन्हें पूजा नहीं करने दी जाएगी। हिंदू समुदाय के सदस्यों का कहना है कि दुर्गा जी की प्रतिमा को तोड़ने और जबरन वसूली के लिए उन्हें कई ऐसी ही धमकियां मिली है। इन धमकियों के चलते बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के आयोजन पर संकट के बादल छा गए हैं। बांग्लादेश में असुरक्षा का माहौल बना हुआ है हालांकि अतीत में मुगल काल तक में भी मौजूदा बांग्लादेश में दुर्गा पूजा की जाती रही थी।

दुर्गा पूजा का उत्साह केवल भारत में ही नहीं, बल्कि सारे विश्व में दिखाई देता है। हमारे पड़ोसी बांग्लादेश में भी माँ दुर्गा की पूजा बड़े आयोजन के रूप में होती है। सिर्फ हिंदू समुदाय के लोग ही यह त्यौहार नहीं मनाते, बल्कि लिबरल मुसलमान भी इसमें बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। वहां यह अब एक सार्वभौमिक त्यौहार है।

यह जानना कम सुखद नहीं है कि 2022 में बांग्लादेश में 32,168 दुर्गा पंडाल लगाए गए थे। अकेले ढाका में पूजा पंडालों की संख्या 241 थी।

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में स्थित ढाकेश्वरी मंदिर इस बात का प्रमाण है कि इस क्षेत्र में माँ दुर्गा की उपासना सदियों से होती चली आ रही है। माना जाता है कि ढाकेश्वरी मंदिर की स्थापना 12वीं शताब्दी में बल्लाल सेन नाम के एक हिंदू राजा ने की थी। बल्लाल सेन को माँ दुर्गा ने सपने में आकर कहा था कि उनकी प्रतिमा पास के जंगल के एक विशेष स्थान पर दबी हुई है, वह उस प्रतिमा को वहां से लेकर मंदिर में स्थापित करें।

ढाकेश्वरी माँ के नाम पर ही बांग्लादेश की राजधानी का नाम ढाका पड़ा, ऐसी मान्यता है। तभी से ढाका में माँ दुर्गा की यह पारंपरिक पूजा होती आ रही है। बांग्लादेश में ढाकेश्वरी मंदिर के अलावा सिद्धेश्वरी मंदिर, रमना काली मंदिर और रामकृष्ण मिशन मंदिर भी दुर्गा और काली पूजा के लिए विश्वविख्यात है। सिलहट जिले के पंचगांव की दुर्गापूजा लगभग 300 साल पुरानी है। यह पूरे उपमहाद्वीप में एकमात्र लाल रंग की दुर्गा है ।

 

सच कहे तो आज जिस रूप में हम दुर्गा पूजा का आयोजन करते हैं, उसकी शुरुआत बंगाल से हुई। आज भी धूमधाम और भव्यता में बंगाल की दुर्गापूजा का कोई मुकाबला नहीं है। भारत विभाजन से पहले बांग्लादेश बंगाल का ही हिस्सा था, दोनों की संस्कृति भी एक ही थी।

पहले बंगाल का एक भाग पूर्वी पकिस्तान के रूप में पाकिस्तान का हिस्सा बना और फिर 1971 में स्वतंत्र देश बन गया । इधर के कुछ वर्षों में बांग्लादेश में भी इस्लामिक कट्टरपंथी सर उठाने लगे हैं। दुर्गा पूजा के पिछले कुछ आयोजनों में विघ्न डालने के प्रयास किए गए। पिछले साल तो किसी कट्टरपंथी ने पंडाल में कुरान की प्रति रख दी और अफवाहें फैला दीं। कई जगह पंडाल में तोड़ फोड़ भी की गई। अब प्रधानमंत्री शेख हसीना के निर्वासन के बाद कट्टरपंथी ताकतों ने बड़े पैमाने पर हिन्दुओं के साथ हिंसा और आगजनी ,महिलाओं खासकर नाबालिग लड़कियों के साथ दरिंदगी, पूजा स्थलों पर तोडफ़ोड़ और मूर्ति भंजन की वारदातों को अंजाम दिया है। हाल ही में कट्टरपंथी तत्वों ने एक पत्र भेज कर खुली अवैध वसूली और धमकी देने का एलान किया है।

इन तत्वों ने चेतावनी दी है कि ‘अगर आप दुर्गा पूजा मनाना चाहते हैं, तो हर मंदिर समिति को 5 लाख टका दान देना होगा। अगर आप इसका पालन नहीं करते हैं, तो आप उत्सव नहीं मना पाएंगे। हम जो जगह बताएंगे, वहां एक हफ़्ते के अंदर पैसे जमा कर दें। याद रखें, अगर आपने प्रशासन या प्रेस को बताया, तो हम आपके टुकड़े-टुकड़े कर देंगे।’

चेतावनी पत्र में आगे लिखा है कि’हम अल्लाह की कसम खाते हैं, अगर हमें पैसे नहीं मिले, तो हम तुम्हें टुकड़े-टुकड़े कर देंगे। हमारी नज़र तुम पर है।’

दुर्गा पूजा से पहले तनाव के चलते बांग्लादेशी अधिकारियों ने देश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए उपायों को बढ़ाने का आश्वासन दिया है। उन्होंने कहा है कि दुर्गा पूजा पंडालों के आसपास सतर्कता बढ़ाई जाएगी। पुलिस महानिरीक्षक मोइनुल इस्लाम ने कहा कि दुर्गा पूजा समारोहों के लिए तीन-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था अपनाई जा रही है। यह मूर्ति विसर्जन तक लागू रहेगी।

अगर दुर्गा पूजा समितियों को कोई धमकी देता हैं तो वे आपातकालीन नंबर 999 पर संपर्क कर सकते हैं। दुर्गा पूजा के लिए सादे कपड़ों में सुरक्षाकर्मी, संकट प्रतिक्रिया दल और स्वाट को स्टैंडबाय पर रखा जाएगा। वहीं, डाकोप पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर-इन-चार्ज सिराजुल इस्लाम ने कहा, ‘शुक्रवार को चार मंदिरों ने जीडी दर्ज कराई है। हम इस मामले की जांच कर रहे हैं और नियमित रूप से सेना दल के साथ गश्त कर रहे हैं।

बांग्लादेश की सरकार ने बाकायदा फरमान जारी कर हिंदुओं को आदेश दिया है कि दुर्गा पूजा पंडालों में बजने वाले म्यूजिक सिस्टम मस्जिदों में होने वाली अजान और नमाज के वक्त बंद कर दिए जाएं । बांग्लादेश की सरकार के इस तालिबानी फरमान का अब चौतरफा विरोध शुरू हो गया है।

बांग्लादेशी मीडिया के मुताबिक बांग्लादेश में गृह मामलों के सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) मोहम्मद जहांगीर आलम चौधरी ने यह आदेश जारी किया है। इस फरमान में जहांगीर आलम ने कहा है कि दुर्गा पूजा पंडालों के दौरान मस्जिद में अजान से 5 मिनट पहले म्यूजिक सिस्टम को बंद करना अनिवार्य होगा। इसके बाद जब तक मस्जिदों में नमाज चलेगी, तब तक पंडालों में बजने वाले सभी म्यूजिक सिस्टम और लाउडस्पीकर बंद रहने चाहिए । बांग्लादेश की यूनुस सरकार के इस तालिबानी फरमान का भारत में विरोध शुरू हो गया है। इस्कॉन कोलकाता के उपाध्यक्ष राधारमण दास ने एक्स पर पोस्ट कर इस आदेश पर विरोध जताया है।

पोस्ट में दास ने लिखा, बांग्लादेश में गृह मंत्री के सलाहकार फरमान जारी कर रहे हैं कि हिंदुओं को अजान से 5 मिनट पहले अपनी सभी पूजा- अनुष्ठान और संगीत बंद कर देना चाहिए वरना उनकी गिरफ्तारी हो सकती है। ये नया तालिबानी बांग्लादेश है।

इन हालातों में क्या हजारों साल से चली आ रही दुर्गा पूजा इस साल परम्परागत उत्साह से संपन्न हो पाएगी इसमें संदेह की काफी गुंजाइश है । लेकिन यह अजब दुर्योग कहा जाएगा कि बांग्लादेश में हिन्दूओं के साथ बर्बरता की वारदातों के बावजूद भारत में भारतीय क्रिकेट टीम बांग्लादेश की टीम के साथ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेल रही है और बांग्लादेश में हो रही अराजकता के खिलाफ तनिक भी विरोध नहीं जता रही है। सेकुलरिज्म ने हमारे राष्ट्रीय चरित्र और चेतना का किस हद तक पतन किया है यह इस बात का सटीक सत्यापन है।

(विनायक फीचर्स)

मुख्यमंत्री धामी ने लांच की प्रवासी उत्तराखण्ड प्रकोष्ठ की वेबसाइट

0

28 सि.2024,शनिवार, देहरादून
-संजय बलोदी प्रखर
मीडिया समन्वयक उत्तराखंड प्रदेश

देश-विदेश के समस्त प्रवासी उत्तराखण्डी बंधुओं के जुड़ने से राज्य के विकास कार्यों को मिलेगी नयी शक्ति *

07 नवम्बर 2024 को देहरादून में आयोजित किया जायेगा प्रवासी उत्तराखण्डी सम्मेलन।

देहरादून,28 सितम्बर, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आज शनिवार को सचिवालय में प्रवासी उत्तराखण्ड प्रकोष्ठ की वेबसाइट www.pravasiuttarakhandi.uk.gov.in लांच की। प्रवासी उत्तराखण्ड प्रकोष्ठ की वेबसाइट आइटीडीए के माध्यम से तैयार की गई है। वेबसाइट के माध्यम से प्रवासियों को राज्य सरकार की विभिन्न नीतियों, कार्यक्रमों एवं गतिविधियों की जानकारी प्रदान की जायेगी।

मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिये कि 07 नवम्बर 2024 को प्रस्तावित प्रवासी उत्तराखण्ड दिवस के अवसर पर देहरादून में देश के विभिन्न प्रदेशों में रह रहे प्रवासियों को आमंत्रित कर भव्य सम्मेलन आयोजित किया जाए। उन्होंने कहा कि अपनी मातृभूमि से सबका जुड़ाव होता है। राज्य सरकार का प्रयास है कि उत्तराखण्ड के प्रवासियों का राज्य के विकास के लिए सहयोग लिया जाए और उनको अपनी मातृभूमि से जुड़ाव के लिए उन्हें हर संभव सहयोग किया जाए। उन्होंने कहा कि हमारे उत्तराखण्ड के प्रवासियों ने देश-दुनिया में अपने कार्यों के बल पर अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्होंने कहा कि देश-दुनिया में रहने वाले सभी उत्तराखण्ड वासियों से हमारा नियमित सम्पर्क होना चाहिए। हमारा प्रयास है कि हम हर सुख-दुःख में भागीदार बनें।

मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिये कि विदेशों में रह रहे प्रवासी उत्तराखण्डियों को भी आमंत्रित कर राज्य में जल्द एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया जाए। विदेशों में रह रहे सभी प्रवासी उत्तराखण्डियों का डाटाबेस अपडेट रखा जाए। उन्होंने कहा कि विदेश भ्रमणों के दौरान हमारे प्रवासी भाई-बहनों द्वारा जिस तरह भव्य रूप से स्वागत किया जाता है, इससे उनका अपनी पैतृक भूमि से लगाव और अपनी संस्कृति से जुड़ाव स्पष्ट परिलक्षित होता है।

उत्तराखण्ड राज्य से विभिन्न देशों एवं भारत के विभिन्न प्रदेशों में निवासरत उत्तराखण्डी प्रवासियों तक राज्य सरकार की पहुंच बनाने और प्रावासी उत्तराखण्डियों को उनकी मातृ भूमि के साथ जोड़ने, राज्य के विकास में उनकी विशेषज्ञता, अनुभव एवं वित्तीय क्षमताओं का लाभ लिये जाने तथा उल्लेखनीय उपलब्धि वाले प्रवासियों को सम्मानित करने के उद्देशय से राज्य में प्रवासी उत्तराखण्ड प्रकोष्ठ की स्थापना की गई है। विदेशों में रह रहे प्रवासियों की सुविधा के लिए भारत सरकार के विदेश मंत्रालय एवं उनकी महत्वपूर्ण योजनाओं के लिंक भी वेबसाइट में दिये गये है। प्रकोष्ठ द्वारा विभिन्न स्रोतो से देश के अन्दर एवं विदेशों में कार्यरत प्रवासी संगठनों एवं प्रतिष्ठित प्रवासियों के सम्पर्क सूत्र एकत्र किये है। अभी तक 18 देशों में रह रहे प्रवासी उत्तराखण्डियों से सम्पर्क स्थापित किया जा चुका है।
इस अवसर पर मुख्य सचिव श्रीमती राधा रतूड़ी, सचिव आर. मीनाक्षी सुंदरम, डा. बी.वी.आर.सी पुरूषोत्तम, श्री दीपेन्द्र चौधरी, एस.एन.पाण्डेय, महानिदेशक सूचना बंशीधर तिवारी, निदेशक आईटीडीए श्रीमती नीतिका खण्डेलवाल, प्रवासी उत्तराखण्ड प्रकोष्ठ के सदस्य सुधीर चन्द्र नौटियाल एवं संबंधित अधिकारी उपस्थित थे।

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज जी को अरुणाचल प्रदेश के एयरपोर्ट पर रोका गया

0

जगद्गुरु शंकराचार्य जी गौ ध्वज स्थापना भारत यात्रा पर निकले हैं।पहले जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज जी को अरुणाचल प्रदेश के एयरपोर्ट पर रोका गया फिर नागालैंड के एयरपोर्ट पर रोका गया और अब तो त्रिपुरा के अगरतला एयरपोर्ट से मेघालय के शिलांग एयरपोर्ट के लिए शंकराचार्य जी को चार्टर प्लेन से जाने ही नहीं दिया जा रहा है।

 

MP – मुदियाखेडा रामू भट्टा के पास 3 गायो की करंट से हुई मौत

0

 

रिपोर्ट – रूद्र देव बजरंगी – मध्यप्रदेश

Punjab News: मस्जिद के पास हमलावरों ने आठ गायों को चाकुओं से गोदा

0

जागरण संवाददाता की रिपोर्ट के अनुसार , रूपनगर। स्थानीय पुल बाजार में जामा मस्जिद के निकट डेयरी फार्म में अज्ञात लोगों ने आठ गायों पर तेजधार चाकुओं से हमला कर उन्हें घायल कर दिया। इसमें एक गाय की मौत हो गई जबकि सात की हालत गंभीर है। हमलावर एक गाय के पेट में ही चाकू छोड़ गए जिले तुरंत पशु अस्पताल लाकर उसके पेट से चाकू निकाला गया।

शेष घायल गायों का डेयरी में ही उपचार किया जा रहा है। डेयरी फार्म के मालिक परमजीत कुमार ने बताया कि वह और उसकी बहन रिया वासुदेवा डेयरी फार्म चलाते हैं। सुबह उन्होंने डेयरी में आकर देखा तो आठ गायों पर चाकू से वार किए गए थे।

इनमें से एक की मौत हो चुकी थी जबकि एक के पेट में ही आरोपित चाकू छोड़ फरार हो चुके थे। उन्होंने कहा कि पहले भी उनके डेयरी फार्म में गायों को मारने का प्रयास हुए हैं और चार गाय मर चुकी हैं।

हिंदू संगठन ने दी चेतावनी

डेयरी में कई बार सिरिंज की सुइयां व अन्य आपत्तिजनक चीजें मिल चुकी हैं। उन्हें अपने पड़ोसी पर संदेह है जो उनसे कई बार झगड़ा कर चुका है। एसएसपी गुलनीत सिंह खुराना ने कहा कि गायों पर किए गए अत्याचार को लेकर केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

उन्होंने कहा कि जल्द ही आरोपितों का पता लगाकर उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा। उधर, हिंदू संगठनों ने घटना की निंदा करते हुए चेतावनी दी है कि अगर 48 घंटे में पुलिस ने आरोपितों को गिरफ्तार नहीं किया तो वे संघर्ष करने को मजबूर होंगे।

बजरंग दल ने गोवंश से भरी पिकअप पकड़ी

बजरंग दल ने बुधवार रात गोवंश से भरी पिकअप पकड़ी। बजर दल फाजिल्का के जिला सुरक्षा प्रमुख कपिल ढाका निवासी गांव खानवाना ने बताया कि 25 सितंबर को रात करीब 10:45 बजे उन्होंने एक पिकअप रोक चालक से पूछताछ की तो वह टालमटोल करने लगा। पुलिस को बुलवा पिकअप की जांच की गई तो उसमें से सात गोवंश बरामद हुए।