Home Blog Page 464

प्लेटिनम ज्वेलरी में स्लीक चेन से लेकर बोल्ड रिस्टवियर और स्टेटमेंट रिंग्स शामिल

0

मैन ऑफ प्लेटिनम द्वारा क्रिकेट के दिन आपके स्टाईल के लिए आपकी मार्गदर्शिका

मुंबई: क्रिकेट का नया सीज़न लेकन आ रहा है, नया जोश और जुनून! इस अवसर पर अपनी पसंदीदा टीम का उत्साह बढ़ाने के लिए अपना लुक लेटेस्ट मेन ऑफ प्लेटिनम कलेक्शन से स्टेटमेंट पीसेज़ द्वारा आकर्षक बनाएं। दुनिया का सबसे बहुमूल्य और दुर्लभ मैटल, प्लेटिनम पूरे विश्व में कुछ ही स्थानों पर पाया जाता है, जिसके कारण यह एक एक्सक्लुसिव विकल्प है। अपनी चमक और टिकाऊ होने के साथ यह हाई-एनर्जी स्टाईल के लिए परफेक्ट है।

स्टैंड में खड़े होकर टीम का उत्साह बढ़ाना हो या फिर दोस्तों के साथ मिलकर मैच देखना हो, या अपने नजदीकी स्पोर्ट्स बार में जाकर मैच की स्क्रीनिंग देखनी हो, प्लेटिनम ज्वेलरी हर अवसर पर आपके परिधान को ज्यादा उच्च और आकर्षक बना देती है। प्लेटिनम ज्वेलरी में स्लीक चेन से लेकर बोल्ड रिस्टवियर और स्टेटमेंट रिंग्स शामिल हैं, जो आपके लुक को आधुनिक शान-ओ-शौकत और सादगी प्रदान करते हैं।

मैन ऑफ प्लेटिनम का लेटेस्ट कलेक्शन नेकवियर, रिस्टवियर, और रिंग्स के विस्तृत विकल्प प्रदान करता है, जो मेंस ज्वेलरी के ग्लोबल ट्रेंड्स से प्रेरित है। 95 प्रतिशत शुद्ध प्लेटिनम से बना इस ज्वेलरी का हर डिज़ाईन विभिन्न आउटफिट्स के साथ अनेक तरीकों से पहना जा सकता है। प्लेटिनम के मौलिक गुणों के अनुरूप इस कलेक्शन में जटिल विस्तार, कटाव और अलंकरण के साथ बनी क्लीन और बोल्ड लाईंस तथा विशिष्ट प्रतीक, ठोस रूप में क्रेस्ट, और एयरोडायनामिक एलिमेंट्स हैं।

प्लेटिनम प्राकृतिक सफेद चमक के कारण किसी भी परिधान के लिए उत्तम है, जो सादगीपूर्ण लग्ज़री का प्रदर्शन करता है। मैच के दिन के लिए यह बहुत ही स्टाईलिश स्टेटमेंट होगा, जो सादगीपूर्ण स्टाईल के साथ क्रिकेट के जुनून को प्रतिबिंबित करेगा और अपनी तरह के इस खास मैटल की दुर्लभता एवं बहुमूल्यता का प्रदर्शन करेगा। मैन ऑफ प्लेटिनम का लेटेस्ट कलेक्शन देश में अग्रणी ज्वेलरी रिटेल स्टोर्स पर उपलब्ध होगा। नीचे कुछ स्टेटमेंट पीस दिए गए हैं, जो क्रिकेट के मौसम में अपनी पसंदीदा टीम का उत्साह बढ़ाते हुए आपको सबसे खास बना देंगे।

केदारनाथ भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में माने जाते हैं

0

 

निशीथ सकलानी ‘निशंक’ – विभूति फीचर्स

हिमालय के तीर्थ हर दृष्टि से अलौकिक हैं। जिस प्रकार भारत का प्रत्येक व्यक्ति दार्शनिक नजरिया रखता है, ठीक उसी प्रकार हिमालय का प्रत्येक प्रस्तर भी अपने आप में एक तीर्थ कहलाता है। हिमालय का कोई भी स्थान ऐसा नहीं है, जो ईश्वर की महिमा न गाता हो। कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय तीर्थ ज्ञान और भक्ति की पृष्ठभूमि हैं, भाव और विचार की सिद्धभूमि हैं तथा अनेक शास्त्रों एवं पुराणों की भावभूमि होने के साथ-साथ ये तीर्थ भक्तजनों के लिए धर्मभूमि भी हैं। हिमालय के तीर्थस्थलों में बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, कैलाश मानसरोवर, अमरनाथ, बूढ़े अमरनाथ, आदिबदरी, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, गोमुख, तुंगनाथ, त्रियुगी नारायण, ऊखीमठ, कालीमठ, मदमहेश्वर, रुद्रनाथ, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग, कल्पेश्वर, ज्योतिर्मठ, पांडुकेश्वर आदि जहां अपना एक विशिष्ट स्थान रखते हैं, वहीं मध्य हिमालय में स्थित भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक श्री केदारनाथ भी अपने आप में एक सिद्ध पीठ है। समुद्र तल से लगभग 11 हजार 750 फीट की ऊंचाई पर स्थित असंख्य श्रद्धालुओं की आस्था व श्रद्धा के प्रतीक केदारनाथ भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में माने जाते हैं।

श्री केदारनाथ, जो कि हिम शिखर की गोद में स्थित होने के साथ-साथ मंदाकिनी के सुरम्य तट को भी सुशोभित कर रहे हैं और सघन वृक्ष जहां उसकी हरीतिमा को द्विगुणित करते हैं, वहीं यह तीर्थयात्रियों एवं पर्यटकों के लिए आकर्षण का एक विशेष केंद्रबिंदु हैं। कुल मिलाकर यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। मान्यता है कि सतयुग में उपमन्यु ने यहां भगवान शिव की आराधना की और द्वापर युग में पांडवों ने तपस्या की। धर्मशास्त्रों एवं पुराणों के अनुसार तुंगनाथ, रुद्रनाथ, मदमहेश्वर, केदारनाथ, कल्पेश्वर और नेपाल स्थित पशुपतिनाथ, जिनको पंचकेदार के नाम से भी पुकारा जाता है। इन तमाम स्थानों पर भगवान शंकर का कोई न कोई अंग अपने अद्वितीय रूप में अवश्य विराजमान है। ऐसी मान्यता है कि भगवान शंकर का तुंगनाथ में बाहु, रुद्रनाथ में मुख, मदमहेश्वर में नाभि, कल्पेश्वर में जटा, केदारनाथ में पृष्ठभाग (धड़) और पशुपतिनाथ (नेपाल) में सिर स्थित है। केदारनाथ, जो कि भगवान शिव की दिव्य भूमि है, यहां कोई मूर्ति न होकर अपितु स्वयं निर्मित एक त्रिकोण प्रस्तर प्रतिमा है। इसी स्थान पर शिवभक्त पूजा-अर्चना करते हैं। केदारनाथ मंदिर के निकट ही कुछ मनोरम तथा दिव्य स्थल हैं, जिनमें भृगुपंथ, क्षीरगंगा, वासुकिताल एवं भैरव शिला आदि प्रमुख हैं। यह स्थल अपनी अलौकिक छवि में पवित्रता के लिए चिरविख्यात हैं। मंदिर मंडप में ही उषा, अनिरुद्ध, पंचपांडव, श्रीकृष्ण तथा शिव-पार्वती की भव्य मूर्तियाँ हैं। मंदिर के समीप कई कुंड हैं। बारह परिक्रमा के निकट अमृत कुंड, ईशान कुंड, हंस कुंड, रेतम कुंड आदि दर्शनीय स्थान हैं। इसमें दो राय नहीं कि धर्म एवं सौंदर्य दोनों ही दृष्टियों से यह तीर्थ वंदनीय है। श्री केदारनाथ मंदिर के विषय में कहा जाता है कि इसका निर्माण पांडवों ने कराया तथा बाद में इसका जीर्णोद्धार आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने कराया था। इसीलिए हिम से ढंके इस स्थान पर केदारनाथ मंदिर के समीप ही आदि शंकराचार्य का समाधिस्थल बनाया गया है।

केदारनाथ मंदिर में भगवान शिव के प्रतीक रूप में विराजमान त्रिकोण प्रस्तर प्रतिमा के संदर्भ में शिव पुराण के अनुसार कथा है कि जब महाभारत युद्ध के पश्चात पांडव अपने कुल परिवार और गोत्र के बंधु-बांधवों के वध के पाप का प्रायश्चित करने के लिए भगवान वेद व्यास के कहने से हिमालय पर तप करने आये तो गोत्र हत्या के दोषी होने के कारण भगवान शिव ने उन्हें दर्शन नहीं देना चाहा। पांडवों ने भी भगवान शिव के प्रति अपनी दर्शन की इच्छा को नहीं छोड़ा। शिव केदार भूमि पर भैंसे के रूप में अन्य भैंसों के बीच मिलकर हरी दूब चरने लगे, लेकिन सहदेव ने शिव को पहचान लिया। भीम ने अपनी दोनों जंघाओं से भैंसों के आने का रास्ता रोक दिया और केवल टाँगों के नीचे से ही जाने का रास्ता छोड़ा। शिव विवश होकर वहीं भूमि में धँसने लगे। भीम ने उन्हें पृथ्वी में अद्र्ध समाया हुआ देखकर बीच में ही पकड़ लिया। इस तरह पांडवों को सिर्फ उनकी पीठ के ही दर्शन हो सके। वही पीठ आज शिला के रूप में मंदिर में स्थापित है और अगला धड़, जो पृथ्वी में समा गया था, वह नेपाल में उदय हुआ, जो पशुपति के नाम से प्रसिद्ध है। केदारनाथ वास्तव में भगवान शंकर के अदृश्य रूप सदाशिव का मंदिर है। शिव के अन्य अंग जहाँ-जहाँ प्रकट हुए, वे केदार कहलाये, लेकिन यह समस्त केदार तीर्थों में श्रेष्ठ और प्रथम केदार के नाम से विख्यात है। केदार मंडल में अनेक तीर्थ सैकड़ों शिवलिंग व सुंदर तथा मीठे पानी की पवित्र धाराएं हैं। मंदिर के केंद्र में श्री केदारनाथ की स्वयंभू त्रिकोण प्रस्तर प्रतिमा है। उसी में भैंसे के पिछले धड़ की आकृति मालूम होती है। केदारनाथ का यह मंदिर शिल्प का अनूठा उदाहरण है। मंदिर भूरे रंग के विशाल शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। मंदिर के ठीक सामने नंदी की मूर्ति मंदिर के सौंदर्य को द्विगुणित कर देती है। मंदिर के सामने जगमोहन नामक स्थान पर द्रौपदी सहित पाँचों पांडवों की मूर्तियाँ भी स्थापित हैं। द्वार के दोनों ओर द्वारपाल हैं। श्री केदारनाथ भगवान शंकर की श्रृंगार मूर्ति की सुंदरता को द्विगुणित कर रही है। मंदिर के भवन में राम-लक्ष्मण, सीता, नंदीश्वर तथा गरूड़ की भव्य तथा सुंदर प्रतिमाएँ भक्तों को भक्ति का संदेश देती प्रतीत होती हैं।

मंदाकिनी, सरस्वती, क्षीरगंगा, स्वर्णद्वारी और महोदधि पाँच नदियों का संगम केदारनाथ मंदिर को अलौकिक छटा प्रदान करता है। इसीलिए संगम का स्थान संगम महादेव कहलाता है। मंदिर की परिक्रमा में स्थित अमृत कुंड, ईशान कुंड, हंस कुंड और उदय कुंड हैं। इनमें आचमन तथा तर्पण का बड़ा महत्व है। केदारनाथ के बायें भाग में इंद्र पर्वत है। यहाँ इंद्र ने तप किया था। यहाँ भी शिवलिंग है। मंदिर से आधा किलोमीटर की दूरी पर भैरव शिला मंदिर हैं, जहाँ केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलने व बंद होने के दिन ही पूजा होती है। भगवान केदारनाथ के कपाट शीतकाल में बंद कर दिये जाते हैं तथा वैशाख मास के आने पर श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ छह माह तक खुले रहते हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण में लिखा है कि सतयुग में एक राजा ने यहाँ तपस्या की थी, इसलिए यह क्षेत्र श्री केदारनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वास्तव में यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण होने के साथ-साथ सतयुगीन साधकों की साधना भूमि, भगवान शिव की आराधना भूमि, पांडवों की तपोभूमि तथा कवियों की कविताओं की भावभूमि के रूप में सदियों से हमारे अंत:करण में ईश्वर की उपस्थिति का आभास दिलाती प्रतीत होती है। (विभूति फीचर्स)

एग्जिट पोल के बाद कांग्रेस करेगी ये बड़ा काम

0

नई दिल्ली. आज लोकसभा चुनाव के लिए अंतिम चरण की वोटिंग खत्म हो गई. इसके साथ ही एग्जिट पोल के नतीजे भी सामने आए. जिसमें NDA को भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करते दिखाया गया है. न्यूज18 इंडिया के एग्जिट पोल के मुताबिक एनडीए को 355-370 सीटें मिलने की उम्मीद है. वहीं कांग्रेस की अगुवाई वाले इंडिया गठबंधन को 125-140 सीटें मिलने की उम्मीद है. जबकि अन्य दलों को 42-52 सीटें मिलने की उम्मीद हैं. वहीं कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक कल दोपहर 11 बजे कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ राहुल गांधी भी कांग्रेस उम्मीदवारों के साथ वर्चुअल बैठक में शामिल होंगे.

इसके बाद फिर दोपहर 1 बजे मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी देश भर के बड़े पार्टी नेताओं के साथ वर्चुअली जुड़ सकते हैं. इनमें कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, अशोक गहलोत, सचिन पायलट समेत बड़े नेताओं से बात करके आकलन और 4 जून की तैयारियों पर चर्चा होगी. एक बजे की इस अहम बैठक की लाइव स्ट्रीमिंग की तैयारी हो रही है. इसे लाइव दिखाया जाएगा. इसके साथ ही इंडिया गठबंधन की चुनाव आयोग से कल मुलाकात करने की कोशिश होगी. इंडिया गठबंधन के नेता शाम 4 बजे मिलने का समय मांगेगे. इंडिया गठबंधन दो अहम मुद्दों पर चर्चा करना चाहता है.

सबसे पहली मांग ये है कि पोस्टल बैलेट के वोट पहले गिने जाएं, जो परम्परा है. हाल में इसे कई जगह बदला गया. खासकर बिहार विधानसभा चुनाव में बाद में पोस्टल बैलट की गिनती हुई, जिसमें गड़बड़ी की शिकायतें मिली हैं. दूसरी मांग ये है कि वीवीपैट का जितना मिलान संभव है वो हो. सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के हिसाब से मतों की गिनती की व्यवस्था की जाए. वहीं इससे पहले विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के घटक दलों के नेताओं ने शनिवार को यहां ‘अनौपचारिक बैठक’ कर लोकसभा चुनाव की मतगणना से जुड़ी तैयारियों एवं रणनीति चर्चा की तथा दावा किया कि इस चुनाव में गठबंधन को 295 से अधिक सीट मिलेंगी.

धूल में लाठी चलाने का प्रयास है एग्जिट पोल

0

 

(राकेश अचल -विभूति फीचर्स)
************
भारत भी विचित्र किन्तु सत्य देश है । इस देश में हर विषय के विशेषज्ञ और भविष्यवक्ता मौजूद हैं । हाथ की लकीरें और ललाट पढ़कर भविष्य बताने वाले ही नहीं अपितु ईवीएम मशीनों में बंद मतों की गणना से पहले ही ये लोग बता सकते हैं कि कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है । इस विज्ञान को ‘ एक्जिट पोल ‘ कहा जाता है। एक्जिट पोल को मैं “धूल में लाठी चलाना” और’ पोल के बाद का ढोल ‘ कहता हूँ ,जो मजबूरन बजाया जाता है ताकि चुनावी रण में थके-हारे लोग नतीजे आने से पहले कुछ तो भांगड़ा कर लें।

जाहिर है कि चुनाव में जो मैदान में था वो जीतेगा भी और हारेगा भी। चुनाव परिणामों को लेकर हम और हमारा समाज खास तौर पर हमारा मीडिया इतना उतावला है कि इधर मतदान समाप्त होगा और उधर सभी टीवी चैनल भावी सरकार को लेकर अपना ज्ञान उगलना शुरू कर देंते हैं । वोटर के मन में क्या है ये कोई नहीं जानता, अगर जानता तो क्या बात थी। वैसे भी किसके मन में क्या है , ये जानना आसान काम नहीं है ? एक्जिट पोल सही होते हैं या गलत ये पूरा देश और इस तरह के पोल करने वाले भली-भांति न सिर्फ जानते हैं बल्कि नतीजों का रुझान बताते हुए झिझकते भी हैं। लेकिन कभी-कभी धूल में लाठी चल भी जाती है।

यकीन मानिये कि मैं भी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की ही तरह एक्जिट पोल्स पर कभी ध्यान नहीं देता और अपने ज्ञान-ध्यान में लगा रहता हूं। माननीय मोदी जी भी चुनावी रैलियों और रोड शो से फारिग होकर कन्याकुमारी स्थित विवेकानन्द स्मारक शिला पर ध्यान लगाने पहुँच गए थे। विपक्ष ने उनके ध्यान को सजीव प्रसारित करने के खिलाफ चुनाव आयोग की शरण ली थी ,विपक्ष को आशंका है कि माननीय ध्यान के जरिये देश की उस जनता को भ्रमित कर सकते हैं जो कि अंतिम और सातवें चरण में मतदान करने वाली है।

एक्जिट पोल कितने सच ,कितने झूठ होते हैं इसके बारे में उनके अतीत को खंगालने की जरूरत है। जहां तक मुझे याद आता है कि भारत में आजादी के बाद दूसरे आम चुनाव के दौरान साल 1957 में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन की ओर से पहली बार इसके मुखिया एरिक डी कॉस्टा ने सर्वे किया था। हालांकि, तब इसे एग्जिट पोल नहीं माना गया था। औपचारिक रूप से 1980 और 1984 में डॉक्टर प्रणय रॉय की अगुवाई में सर्वे किया गया। साल 1996 में भारत में एग्जिट पोल की शुरुआत सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) ने की थी। तब पत्रकार नलिनी सिंह ने दूरदर्शन के लिए एग्जिट पोल कराया था, जिसके लिए सीएसडीएस ने आंकड़े जुटाए थे. इस पोल में बताया गया था कि भाजपा लोकसभा चुनाव जीतेगी और ऐसा ही हुआ। इसी के बाद से देश में एग्जिट पोल का चलन बढ़ गया। साल 1998 में निजी न्यूज चैनल ने पहली बार एग्जिट पोल का प्रसारण किया था।

नतीजे आने कि पहले नतीजों के आसपास पहुँचने की शुरुआत का श्रेय संयुक्त राज्य अमेरिका को जाता है। साल 1936 में सबसे पहले अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन ने चुनावी सर्वे किया था। तब पहली बार मतदान कर निकले मतदाताओं से पूछा गया था कि उन्होंने राष्ट्रपति पद के किस उम्मीदवार को वोट दिया है ? जैसा कि मैंने पहले ही कहा की एक्जिट पोल धूल में लाठी चलाने जैसा है । कभी -कभी ये 80 फीसदी तक सही निकलते हैं और कभी रत्ती भर भी नहीं। तो आने वाले तीन दिनों तक आप भी इस एक्जिट पोल से उड़ते हुए गुबार देखिये। अफ़साने सुनिए ,हकीकत का पता तो 4 जून 2024 की दोपहर तक ही चल जायेगा।(विभूति फीचर्स)

पुण्यतिथि 2 जून पर विशेष -ग्रेट शो मैन राजकपूर

0

 

(अंजनी सक्सेना -विनायक फीचर्स)

भारत के युवा समाज पर यहां की फिल्मों का गहरा प्रभाव पड़ा है। आरंभिक दौर की फिल्मों में तीन नायकों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान था। यह थे ग्रेट शो मैन के नाम से मशहूर राजकपूर, अभिजात्य तथा रूमानी शख्सियत के नायक दिलीप कुमार तथा सदाबहार अभिनेता देवानंद। इन तीनों ने अपने अभिनय की अमिट छाप भारतीय सिनेमा पर छोड़ी। इनमें राजकपूर ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने भारतीय सिनेमा को प्रेरक और मनोरंजक फिल्में तो दी ही साथ ही उन्होंने करुणा भरी भूमिकाओं को भी अमलीजामा पहनाया। यह एक संयोग ही था कि राजकपूर की पहली फिल्म नीलकमल वर्ष 1947 में भारत की स्वतंत्रता के साथ ही आयी। यद्यपि इस फिल्म के प्रदर्शन तक राजकपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर भी अपने पुत्र की प्रतिभा से परिचित नहीं थे। उन्होंने इस फिल्म के निर्देशक केदार शर्मा से स्वयं यह कहा था कि कांपता बदन और मिमियाती आवाज लेकर राज कितना चलेगा ? पर अंततः यही कांपता बदन और यही आवाज राजकपूर के साथ जुड़ गई जिसकी आज भी कई नायक नकल करने की कोशिश करते हैं। (याद कीजिये फिल्म ईश्वर के अनिल कपूर) बाद में यही युवक इंकलाब, चित्तौड़ विजय, दिल की रानी, अमर प्रेम और जेल यात्री जैसी फिल्मों में भी आया। राजकपूर ने इन फिल्मों से इतना धन कमा लिया कि अगले ही वर्ष 1948 में तब ही सुप्रसिद्ध अभिनेत्री नर्गिस के साथ एक फिल्म बनाने की घोषणा कर दी। आग राजकपूर द्वारा निर्मित और निर्देशित पहली फिल्म थी। यह फिल्म दर्शकों की भीड़ तो नहीं जुटा सकी, लेकिन इस फिल्म ने राजकपूर को निर्देशकीय क्षमता को नया आयाम अवश्य दिया।
यह फिल्म उस समय बन रही फिल्मों की लीक से कुछ अलग थी।

राजकपूर की पहली फिल्म की व्यवसायिक असफलता को दूसरी फिल्म बरसात ने भुला दिया। इस फिल्म ने व्यवसायिक रूप से आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त की। इस फिल्म का गीत-संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ। संभवतः इसी फिल्म से राजकपूर ने फिल्मों के गीत-संगीत की ओर ध्यान देना प्रारंभ किया। बरसात के बाद राजकपूर ने आवारा फिल्म बनायी।
इस फिल्म की और इसके गीत संगीत की लोकप्रियता को तो समन्दर भी न रोक सका और रूस तथा ईरान तक इसका संगीत लोकप्रिय हुआ।
कहा जाता है कि माओ-त्से-तुंग भी इस फिल्म को बहुत पसंद करते थे। आवारा ने राजकपूर को सफलता के नये आयाम तो दिखे ही साथ ही इन्हें रूमानी भूमिका में प्रवीण अभिनेता की छवि भी प्रदान की। राजकपूर ने श्री 420, मेरा नाम जोकर, अनाड़ी, जिस देश में गंगा बहती है तथा सपनों का सौदागर में भी इसी प्रकार की छवि को बनाये रखा। आवारा की अपार सफलता ने राजकपूर को व्यवसायिक फिल्मों में सफलता का फार्मूला भी दे दिया। इसी फार्मूले को राजकपूर ने बॉबी और प्रेमरोग में भी खूबसूरती से इस्तेमाल किया। राजकपूर की फिल्मों की चर्चा नर्गिस के बिना अकल्पनीय ही है। राजकपूर द्वारा अभिनीत पहली बार निर्मित एवं निर्देशित फिल्म की नायिका नर्गिस थी। इस मशहूर जोड़ी ने कुल सोलह फिल्मों में साथ-साथ अभिनय किया। राज नर्गिस की जोड़ी पहली बार 1948 में आग फिल्म में पर्दे पर आयी तथा 1956 में जागते रहो इस जोड़ी की आखिरी फिल्म थी। राज नर्गिस अभिनीत कुल सोलह फिल्मों में से बरसात, आवारा, श्री 420 और चोरी चोरी सुपरहिट मानी जाती है, लेकिन प्यार, पापी और धुन बुरी तरह असफल हुई। नर्गिस के अलावा राजकपूर ने मधुबाला, सुरैया, मीना कुमारी और माला सिन्हा के साथ भी नायक की भूमिकायें की है। नायक के रूप में राजकपूर ने लगभग 50 फिल्मों में अभिनय किया। आग, बरसात, आवारा, श्री 420, संगम और मेरा नाम जोकर उनके द्वारा निर्देशित एवं स्वयं अभिनीत फिल्में हैं। संगम की अपार सफलता के बाद राजकपूर ने मेरा नाम जोकर बनायी जिसे घनघोर असफलता का मुंह देखना पड़ा। कहा जाता है कि राजकपूर मेरा नाम जोकर को अपने पुत्र की भांति मानते थे, और इस फिल्म को अपने जीवन को सबसे अच्छी फिल्म मानते थे,लेकिन शायद यह दुर्भाग्य ही था कि आम जनता को यह फिल्म पसंद नहीं आयी।
मेरा नाम जोकर की असफलता से उबरने के लिये राजकपूर ने बॉबी जैसी हल्की फिल्म बनामी। राजकपूर के दूसरे बेटे ऋषि कपूर को लेकर बनायी गयी इस किशोरवय की प्रेम कहानी को अपार सफलता मिली। इसके बाद राजकपूर ने सत्यम शिवम सुन्दरम्, प्रेम रोग और राम तेरी गंगा मैली फिल्मों का निर्देशन किया। यद्यपि इन सभी फिल्मों में समस्याओं को उभारा गया, लेकिन फिल्मों की सफलता के लिये राजकपूर ने अपनी फिल्मों की नायिकाओं का भी भरपूर सहारा लिया। बॉबी में डिम्पल, सत्यम शिव सुन्दरम में जीनत अमान और राम तेरी गंगा मैली में मंदाकिनी का राजकपूर ने जमकर उपयोग किया।आज भी ये अभिनेत्रियों इन फिल्मों में अपने बोल्ड और ब्यूटीफुल अंदाज के लिए जानी जाती हैं। यह एक विडम्बना ही थी कि राजकपूर अपना एक और सपना हिना पूरा नहीं कर पाये और वर्ष 1988 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार ग्रहण करने के बाद उनका आखिरी सफर आरंभ हो गया।

राजकपूर का फिल्मी सफर चालीस वर्ष तक चला। 1947 से लेकर 1988 तक वे फिल्मी दुनिया में सतत गतिशील बने रहे। यही कारण था कि वे एक महान शो मेन के रूप में भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लोकप्रिय रहे। राजकपूर ने अपने फिल्मी जीवन में जो कुछ दुनिया को दिया वह अविस्मरणीय है।कपूर परिवार के अभिनय का सिलसिला पृथ्वीराज कपूर (राजकपूर के पिता) से आरंभ हुआ, फिर राजकपूर, शम्मी कपूर, शशि कपूर से होता हुआ रणधीर, ऋषि और राजीव कपूर तक पहुंचा। इस सिलसिले को आगे बढ़ाया राजकपूर की पोतियों करिश्मा कपूर और करीना कपूर ने ।राजकपूर के पोते और ऋषि कपूर के पुत्र रणवीर कपूर भी नयी पीढ़ी के फिल्म कलाकारों में अपना स्थान बना चुके हैं। यद्यपि राजकपूर के वंशजों को राजकपूर जैसी सफलता अर्जित करने के लिये कड़ा संघर्ष करना होगा, लेकिन यह सिलसिला तो चलता ही रहेगा राजकपूर के शब्दों में शो मस्ट गो ऑन। (विनायक फीचर्स)

कितने विश्वसनीय हैं एग्जिट पोल ?

0

(संजय सिन्हा-विभूति फीचर्स)

चिलचिलाती धूप और बेशुमार गर्मी के बीच आठ राज्यों की 57 सीटों पर 18 वीं लोकसभा के लिए चल रही 7 चरणों वाली लंबी मतदान की प्रक्रिया आखिरकार संपन्न हुई । इसके साथ ही एग्जिट पोल का दौर भी शुरू हो चुका है।एनडीटीवी न्यूज चैनल के एग्जिट पोल में कहा गया है कि आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले गठबंधन को बहुमत मिलने का अनुमान है।ज्यादातर एग्जिट पोल में एनडीए के बहुमत की बात की जा रही है। दो एग्जिट पोल में अनुमान लगाया गया है कि सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) संसद के 543 सदस्यीय निचले सदन में 350 से अधिक सीटें जीत सकता है, जहां साधारण बहुमत के लिए 272 की आवश्यकता होती है। 2019 के चुनाव में एनडीए ने 353 सीटें जीती थीं।

राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 120 से अधिक सीटें जीतने का अनुमान लगाया गया है।हालांकि ये भी माना जा रहा है कि भारत में अब तक एग्जिट पोल का रिकॉर्ड खराब रहा है, क्योंकि वे अक्सर चुनाव के नतीजे गलत बताते हैं। देखा जाए तो बड़े और विविधतापूर्ण देश में एग्जिट पोल को सही बताना भी एक चुनौती है।हालांकि, विपक्ष ने एग्जिट पोल को खारिज कर दिया है और उसके जारी होने से पहले “पूर्वनिर्धारित” कहा था। 19 अप्रैल से शुरू हुए सात चरणों के चुनाव में लगभग एक अरब लोग मतदान करने के पात्र थे और कई हिस्सों में भीषण गर्मी में चुनाव हुए।इसमें कोई शक नहीं कि सात चरणों में होने वाले इस मतदान के दौरान चुनाव आयोग को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा।देखा जाए तो ये चुनाव ऐसे समय कराए गए, जब देश का ज्यादातर हिस्सा भीषण गर्मी की चपेट में रहा। इस तथ्य को जितनी अहमियत मिलनी चाहिए थी, उतनी न देते हुए आयोग ने छह सप्ताह की अप्रत्याशित रूप से लंबी मतदान प्रक्रिया निर्धारित कर दी। इसके पीछे मकसद निश्चित रूप से मतदान प्रक्रिया को यथासंभव शांतिपूर्ण, निष्पक्ष और विश्वसनीय बनाए रखना था, लेकिन इस वजह से नेताओं, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं में चुनावों को लेकर दिलचस्पी बनाए रखना मुश्किल होता गया। कम मतदान प्रतिशत के पीछे एक वजह यह भी मानी जा रही है।

 

गर्मी से बेहाल बहुत सारे लोग मतदान के लिए बूथ तक नहीं पहुंचे।चूंकि ज्यादातर वोटरों को वोट देने के लिए बूथ तक जाना होता है और अनुभव बताता है कि यह हमेशा आसान नहीं होता, इसलिए इसका ध्यान रखने की जरूरत होती है कि जहां तक हो सके, वोटरों के घर से बूथ की दूरी ज्यादा न हो। लेकिन राजधानी दिल्ली की ही बात की जाए तो यहां की सातों संसदीय सीटों में बूथों की संख्या 2019 के मुकाबले कम रखी गई थी। वह भी तब, जबकि मतदाताओं की संख्या में 9 लाख का इजाफा हो चुका था। जाहिर है, ऐसे में खास तौर पर बुजुर्ग मतदाताओं के लिए वोट देने जाना थोड़ा और मुश्किल हुआ।भारत जैसे बड़े और विविधतापूर्ण देश में अगर चुनाव विश्वसनीय माने जाते रहे हैं तो इसका श्रेय चुनाव आयोग को ही जाता है। सहज और शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण के पीछे सबसे बड़ा फैक्टर है इस प्रक्रिया पर मतदाताओं का विश्वास। इस विश्वास को मजबूती मिलती है आकंड़े समय पर जारी होते रहने से। ध्यान रखना चाहिए कि सूचनाओं का अभाव संदेह को जन्म देता है।देखा जाए तो चुनाव आयोग के लिए सबसे मुश्किल होता है विभिन्न पार्टियों के नेताओं से चुनावी आचार संहिता का पालन कराना।

अक्सर पार्टियों का नेतृत्व आयोग के नोटिसों को पर्याप्त महत्व नहीं देता। इन नोटिसों और दिशानिर्देशों को अदालतों में चुनौती भी दी जाती है। जो बात चुनाव आयोग के पक्ष में जाती है वह यह कि आयोग अपने सख्त रुख पर अडिग रहा और पक्ष-विपक्ष की चिंता किए बगैर आचार संहिता के उल्लंघनों पर त्वरित प्रतिक्रियाएं देता रहा। आयोग को भविष्य में भी इन बातों का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि उसके निष्पक्ष रहने जितना ही जरूरी है उसका निष्पक्ष दिखना।चुनाव आयोग अगर इन मुद्दों पर भी गंभीर रहे तो चुनाव की गुणवत्ता और स्ट्रॉन्ग होगी।फिलहाल तो मतदाताओं का मत ईवीएम के पिटारे में बंद है जो चार जून की सुबह ही खुलेगा और तब ही इन चुनावी पूर्वानुमानों की सत्यता का पता लगेगा।(विभूति फीचर्स)

चारधाम यात्रा मार्ग पर मिलावट खोरों के खिलाफ अभियान जारी

0

देहरादून,30 मई, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सख्त निर्देश पर -कल से प्रदेश में शुरू होगा गहन छापेमारी अभियान, हरिद्वार-ऋषिकेश यात्रा मार्ग पर होगी फलों की जांच  उत्तराखंड में नकली दवाईयों के कारोबारियों के खिलाफ खाद्य संरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग का अभियान लगातार जारी है। चारधाम यात्रा और पर्यटन सीजन को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर विभाग द्वारा गहन छापेमारी अभियान चलाया जा रहा है। यात्रा मार्गों के साथ ही ड्रग विभाग की टीमें पयर्टन स्थलों में स्थित मेडिकल स्टोरों पर छापेमारी के साथ ही दवा कंपनियों का भी औचक निरीक्षण कर रही हैं। आयुक्त, खाद्य संरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग डॉ आर राजेश कुमार पूरे अभियान की लगातार मॉनिटरिंग करने के साथ अधिकारियों को जरूरी दिशा निर्देश दे रहे हैं।

अन्य राज्यों की दवाईयों के 281 सैंपल में से 47 सैंपल फेल अपर आयुक्त खाद्य संरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग व ड्रग कंट्रोलर ताजबर सिह जग्गी ने बताया कि नकली दवा माफियों के खिलाफ विभाग का अभियान लगातार जारी है। चारधाम यात्रा व पर्यटन सीजन को देखते हुए गहन छापेमारी अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि नकली दवा कारोबारियों के खिलाफ ड्रग विभाग ने बड़ी कार्रवाईयां की है। रूड़की और उधमसिंहनगर में नकली दवा के ज्यादा मामले सामने आये हैं। पिछले 03 साल में 72 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किये गये हैं और 32 लोगों को जेल जाना पड़ा। इसके साथ ही कुल बेस्ड निरीक्षण के मामले 71, कुल निलम्बित निर्माण लाईसेंस 14, कुल निरस्त निर्माण लाइसेंस 04, कुल निरस्त औषधियों के अनुमोदन 63 के साथ ही निर्माण इकाईयों के सामान्य निरीक्षण 223 किये गए। उन्होंने बताया कि दिसम्बर 2023 से मार्च 2024 तक राज्य में ब्रिकय की जा रही औषधि की गुणवत्ता सुनिश्चित किये जाने को लेकर जगह-जगह से 281 सैंपल लिए गये जिनमें से 47 सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरे। यह सभी अन्य राज्यों में बनी दवाइयों के थे। जिनके खिलाफ कार्रवाई की गई है।

राज्य की सीमा व अर्न्तराष्ट्रीय सीमाओं पर निगरानी अपर आयुक्त खाद्य संरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग व ड्रग कंट्रोलर ताजबर सिह जग्गी ने बताया कि दवा निर्माताओं के साथ ही दवाईयों के थोक व फुटकर विक्रेताओं पर भी कार्यवाही की जा रही है। विभाग दवाईयों पर अनावश्यक छूट देने वाले रिटेलर पर निगरानी रख रहा है। दवाईयों पर अनावश्यक छूट देने वाले रिटेलर पर निगरानी डिस्ट्रीब्यूटर एवं होलसेलर को केवल बिल पर ही दवाईयां विक्रय किये जाने के निर्देश दिये गये हैं। सूचना, शिक्षा, व जन जागरूकता के माध्यम से जागरूकता बढ़ाये जाने का कार्य किया जा रहा है। राज्य में समस्त रिटेल शॉप पर कैमरे लगाने अनिवार्य किये गये हैं। राज्य में विभिन्न स्तर पर मनः प्रभावी दवाईयों के भण्डारण की सीमा निर्धारित की गयी है। राज्यों की सीमा एवं अर्न्तराष्ट्रीय सीमाओं पर भी विभाग द्वारा दवाईयों की आपूर्ति पर निगरानी रखी जा रही है। उन्होंने बताया कि अधिकारियों की कमी के कारण सप्लाई चेन पन निगरानी व नियंत्रण रखने में थोड़ा परेशानी आ रही है लेकिन विभाग द्वारा पूरे प्रयास किये जा रहे हैं।

देहरादून लैब में भी हो रही दवाओं की जांच अपर आयुक्त खा़़द्य और ड्रग कंट्रोलर ताजबर सिंह जग्गी ने बताया कि दवाओं और कास्मेटिक उत्पादों की जांच रुद्रपुर के अलावा देहरादून में की जा रही है। यहां अत्याधुनिक मशीनों से सुविधा युक्त लैब है। इसमें वेट लैब, माइनर और मेजर, कास्मेटिक और माइक्रो लैब की सुविधा मौजूद है। यहां जांच के साथ आनलाइन सर्टिफिकेशन की सुविधा है। अपर आयुक्त के मुताबिक आम लोग भी यहां मिलावट की जांच करा सकते हैं। उन्हें इसके लिए लैब चार्ज देना होगा। यात्रा मार्ग पर स्वच्छता और दवाओं की गुणवत्ता की भी जांच की जा रही है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन की टीमें लगातार सैंपलिंग कर रही हैं। जांच के लिए एक मोबाइल लैब भी बनाई गयी है। अपर खाद्य आयुक्त और ड्रग कंट्रोलर ताजबर सिंह जग्गी ने बताया कि यात्रा मार्ग दवाइयों के 156 सैंपल लिए गये जो कि ठीक पाए गये हैं। चारधाम यात्रा मार्ग से एकत्रित किये गये सैंपल की जांच रुद्रपुर लैब में की जा रही है। यह जांच प्राथमिकता से हो रही है।

फूड लाइसेंस पर बनाया जा रहा था मल्टीविटामिन अपर खा़द्य आयुक्त और ड्रग कंट्रोलर ताजबर सिंह जग्गी ने बताया कि कई दवा कंपनी में फूड लाइसेंस पर मल्टीविटामिन बनाए जा रहे थे। छापेमारी में मल्टीविटामिन के कैप्सूल और टेबलेट मिले। सैंपल की जांच में मल्टीविटामिन में दवाओं के सॉल्ट पाए जाने पर इनके विरुद्ध कार्रवाई की गई। कंपनी का सील कर दिया गया। टीम ने फैक्टरी कर्मियों से औषधि निर्माण का लाइसेंस दिखाने के लिए कहा। कर्मचारियों ने टीम को फूड लाइसेंस दिखाया।

नशे के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाओं का स्टाक तय अपर खा़द्य आयुक्त और ड्रग कंट्रोलर ताजबर सिंह जग्गी ने बताया कि राज्य सरकार ने नशे के रूप में उपयोग में लाई जाने वाली नारकोटिक और साइकोट्रापिक दवाओं का स्टाक पहले ही तय कर रखा है। अब मेडिकल स्टोर व सप्लायर इन दवाओं की बिक्री मनमाने ढंग से नहीं कर पाएंगे। होलसेलर व रिटेलर को तय मात्रा से अधिक दवा रखने की इजाजत नहीं होगी और उन्हें बिक्री का हिसाब भी रखना होगा।

लाइसेंस निरस्त करने के साथ होगी कार्रवाई अपर खा़द्य आयुक्त और ड्रग कंट्रोलर ताजबर सिंह जग्गी ने बताया कि राज्य में अब कोई भी मेडिकल स्टोर या स्टाकिस्ट तय सीमा से अधिक दवाओं का स्टाक नहीं रख सकता। यदि कोई ऐसा करते हुए पाया गया तो लाइसेंस निरस्त करने के साथ ही अन्य कार्रवाई भी की जाएंगी।

आदेश में कुल 13 दवाओं का स्टाक तय ड्रग कंट्रोलर की ओर से जारी आदेश में कुल 13 दवाओं का स्टाक तय किया गया है। इसमें एल्प्राजोलाम, ट्रामाडोल, ट्रामाडोल इंजेशक्शन, कोडीन, पेंसिडिल, डाइजेपाम, डाइजेपाम इंजेक्शन, क्लोनाजेपाम, पेंटाजोनिक, निट्रेजापाम, निट्रेजापाम इंजेक्शन आदि को इस श्रेणी में शामिल किया गया है। इन दवाओं का नया स्टाक तभी मंगाया जा सकेगा जब पहले का उपयोग हो गया हो और उसके उपयोग की पूरी जानकारी दे दी जाए। रिटेल में दवा विक्रेता इन दवाओं की अब 10 से 15 वायल और 20 के करीब स्ट्रिप रख सकेंगे।

फलों की भी होगी जांच 
अपर खा़द्य आयुक्त और ड्रग कंट्रोलर ताजबर सिंह जग्गी ने बताया कि फलों को लेकर कैलिशियम कार्बोइड के प्रयोग, मिलावट और इंजेक्शन लगाने की शिकायतें मिल रही हैं। इसके मद्देनजर खा़़द्य निरीक्षकों को पूरे यात्रा मार्ग पर भी फलों में मिलावट की जांच के आदेश दिये गये हैं। हरिद्वार, ऋषिकेश में छापेमारी अभियान शुरू होने जा हरा है। 31 मई से यात्रा मार्ग पर गहन छापेमारी अभियान चलाया जाएगा और फलों की जांच की जाएगी। यात्रा मार्गों से सैंपल लेकर जांच के लिए लैब में भेजे जायेंगे। जांच में दोषी पाये जाने वाले व्यक्तियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जायेगी।

विकासनगर में पनीर के सैंपल फेल, होगी कार्रवाई
खा़द्य और औषधि प्रशासन ने हाल में विकासनगर के धर्मावाला में एक पनीर विक्रेता के यहां से पनीर के सैंपल लिए थे। यहां विभाग ने 5 से 6 क्विंटल पनीर बरामद किया था। लैब से मिली रिपोर्ट के मुताबिक पनीर में मिलावट पाई गयी है। अपर खा़़द्य आयुक्त और ड्रग कंट्रोलर ताजबर सिंह जग्गी का कहना है कि उक्त पनीर संचालक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि खा़द्य पदार्थों में मिलावट करने वालों से सख्ती से निपटा जाएगा।

धूम्रपान न कर स्वस्थ जीवन का आनन्द लें* 

0
(डॉ. एस.के. गौड़ – विनायक फीचर्स)
रश्मि स्टेशन पर बैठी अपनी आने वाली गाड़ी का इन्तजार कर रही थी कि यकायक उसका जी मिचलाने लगा। इतना ही नहीं उसे उल्टियां व घबराहट भी शुरू हो गयी। यह देख आसपास लोग आने लगे।
यह सबकुछ जिस व्यक्ति के कारण हुआ वह अब भी धाराप्रवाह धुआं सिगरेट पीकर उड़ा रहा था। उसे इसकी कतई जानकारी न थी कि उसके इस नादान गलत काम से दूसरे को कितना कष्ट हो रहा है। ऐसे में उस व्यक्ति को शालीनता से सिगरेट पीने की मनाही करनी चाहिए थी। दबाव से या कानून की बात करने पर वह भड़क सकता था।
हमारे देश में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करने पर रोक लगा दी गई है, लेकिन बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी है।
जिन्हें जानकारी है, वे लापरवाही की वजह या कानून के विपरीत चलने की आदत से इसे नहीं छोड़ पा रहे हैं। कानून का आदर करने वाले दूसरों की परेशानी का भी ध्यान रखते हैं।
सरकार ने स्वास्थ्य की दृष्टि से सिगरेट, सिगार की डिब्बियों व अन्य तम्बाकू के पैकेटों पर ‘चेतावनी’ लिखना अनिवार्य कर दिया है। इतना ही नहीं, कानून बनाकर सार्वजनिक स्थानों जैसे- बस स्टैण्ड, रेलवे स्टेशन, मॉल, सिनेमा घर, स्कूल, अस्पताल, कॉफी घर, डिस्को आदि पर धूम्रपान करने वालों को 200 रुपये जुर्माना देना होगा।
वैसे सुरक्षा की दृष्टि से अति ज्वलनशील पदार्थों वाले स्थानों जैसे- पेट्रोल, डीजल, पम्प, गैस सेन्टर (घरेलू व व्यावसायिक) आदि पर पहले से ही धूम्रपान की सख्त मनाही है।
क्या केवल कानूनी दबाव से धूम्रपान पर अंकुश लगाया जा सकता है? बुद्धिजीवियों का उत्तर शायद ‘नहीं’ होगा। जब तक जनता में इसके प्रति जागरुकता नहीं आएगी, तब तक इस कदम में आशातीत सफलता नहीं मिल पायेगी।
इसके लिये अशासकीय संगठनों (एन.जी.ओ.) स्वास्थ्य केन्द्र, (व्यक्तिगत व शासकीय), सभी धर्म गुरुओं का सहयोग प्रशंसनीय कदम हो सकता है।
धूम्रपान करते समय लोगों को बताना चाहिए कि वह जो कर रहे है, उसके दूरगामी परिणाम घातक हो सकते हैं। सोचें व विचारें, जान है तो जहान भी है।
स्वार्थी होना इंसानों में ही नहीं, बल्कि जानवरों में भी देखा गया है। जैसे- एक बन्दरिया को बच्चों सहित काफी गहरे ड्रम में छोडऩे के बाद उसमें पानी भरना शुरू किया गया। पानी का स्तर बढऩे के साथ ही बन्दरिया बच्चे को बचाने के लिए अपने कंधे पर बैठा लेती है। जब स्वयं भी डूबने लगती है तो बच्चों को नीचे उतार अपनी जान बचाने के लिए उनके ऊपर चढ़ जाती है। अत: स्वार्थी नहीं बने और स्वास्थ्य के लिए आज ही से तम्बाकू व धूम्रपान का त्याग करें।धूम्रपान करने वाले माता-पिता के शिशुओं की तम्बाकू के धुएं से स्तनपान में अरुचि हो जाती है।
तम्बाकू ऐसे तरीकों से लेते हैं-
   तम्बाकू खाने, पीने, नाक आदि द्वारा लेने के अनेक रूप होते हैं। जैसे- सिगरेट, सिगार, बीड़ी, हुक्का, चिलम  आदि से धुएं के रूप में, गुटखा, चूने के साथ रगड़कर खाने तथा मंजन आदि के रूप में।
   एक छोटी-सी थैली में तम्बाकू की पुडिय़ा व छोटी-सी डिब्बी में चूना रखने की भी प्रथा है, क्योंकि हथेली पर रखकर रगडऩे की अलग कला है।
तम्बाकू की आदतें ऐसे पड़ जाती हैं-
   पारिवारिक व आस-पास का वातावरण : बचपन साफ सफेद कागज की तरह होता है। उस पर जो लिखा जाता है, अमिट हो जाता है। बच्चा अपने नजदीकी व्यक्तियों को देख अनुसरण करता है। उसे गलत-सही की जानकारी न के बराबर होती है। वह जिज्ञासावश नई वस्तु, नये काम, नई बातें आसानी से सीख लेता है। ऐसी ही आदत तम्बाकू की पड़ जाती है, जो उम्र बढऩे के साथ गहरी प्रभावकारी होती चली जाती है।
   आवभगत करने में तम्बाकू, बीड़ी, सिगरेट की पूछना। ऐसा न करना अशिष्टाचार कहलाता है। लोग कह देते हैं, हुक्का-पानी का भी नहीं पूछा।
   तन्हाई का मौका- ऐसे में अपना समय पास करने के लिए तम्बाकू का आसान साधन ग्रहण कर व्यक्ति तन्हाई को मित्र बना लेता है।
   तम्बाकू के पदार्थ (सिगरेट, बीड़ी, गुटखा, नसवार आदि) आसानी से व सस्ते मिल जाते हैं। जो गरीब से गरीब व्यक्ति की पहुंच में होते हैं। अत: इसकी आदत आसानी से पड़ जाती है।
   इसकी आदत इच्छाशक्ति गिरने से ही सम्भव है। ऐसे में न चाहते हुए भी व्यक्ति इसकी गिरफ्त में फंसता चला जाता है। स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक बात जानते हुए भी अपने को रोक पाने में कमजोर पाता है।
द्य इच्छा शक्ति मजबूत व अडिग रखने वाले व्यक्तियों पर घर-बाहर व मित्र मण्डली के वातावरण आदि का प्रभाव नहीं पड़ता। लोग  बुजदिली में कहते सुने जाते हैं कि क्या करें? छूटती ही नहीं। यह उनका अपनी कमजोरी छिपाने का तकिया कलाम होता है।
   धूम्रपान करने वाले कहते हुए मिल जायेंगे कि सुबह लैट्रिन नहीं उतरती, पेट में गैस बनने से पेट फूलता है, दर्द भी होने लगता है। बीड़ी-सिगरेट पीने से आराम मिल जाता है।
   मंजन करने वाले कहते हैं- पायरिया व दांतों के दर्द में राहत मिलती है, जबकि ऐसा कदापि नहीं।
   नवदुर्गा व्रत या अन्य किसी धार्मिक व्रत में कैसे पूरा दिन बिना तम्बाकू रह जाते है। इससे भी ज्यादा रमजान में चेन स्मोकर (लगातार पीने वाले) सेहरी से इफ्तार तक कैसे रह जाते हैं। यह क्रिया एक-दो दिन नहीं, बल्कि लगातार 29-30 दिनों तक चलती है। यह इच्छाशक्ति दृढ़ होने का परिणाम होता है।
   तम्बाकू छोडऩा मुश्किल है पर असम्भव नहीं।
तम्बाकू-धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए ऐसे हानिकारक हैं- जैसे- कैंसर, टी.बी., जिगर, गुर्दे व दिल की व्याधियों को बढ़ावा देने में धूम्रपान सहयोगी होता है, इसीलिए मेडिकल साइंस भी इस गलत आदतों पर पाबन्दी लगाने व उन्हें छुड़ाने के लिए तत्पर है। इच्छाशक्ति बढ़ाने हेतु मनोवैज्ञानिक ढंग काफी कारगर सिद्ध होता है, क्योंकि यह आदत केवल तलब है, जो दिमाग में पैदा होती है।
होम्योपैथी ऐसी आदतों को छुड़ाने में सहयोगी होती है-
एक होम्योपैथ कारण जानने के साथ ही आपसी बातचीत (काउन्सिलिंग) भी करता जाता है। जो आदत मिटाने हेतु सोने में सुगंध का काम करती है।
   जी मिचलाना एवं उल्टियां- इपीकॉक।
   तम्बाकू चूसने से आई परेशानियां- आर्सेनिक एल्बम, टैबेकम आदि।
   धूम्रपान से दूसरे दिन पेट की खराबी- नक्सवामिका।
   दिल की धड़कन बढऩा, लैंगिक कमजोरी (सैक्सुअल वीकनैस) फासफोरस।
   तकलीफ देने वालीं हिचकियां, इग्नेशिया।
   दांत दर्द- क्लीमेटिस, प्लैंटेगो आदि।
   सिरदर्द व चक्कर अधिक धूम्रपान करने पर जैल्सीमियस।
   तम्बाकू की आदतें- टैबेकम। (विनायक फीचर्स)

धर्म के लिए समर्पित ममतामयी महारानी देवी अहिल्‍याबाई

0
**
(निखिलेश माहेश्‍वरी-विनायक फीचर्स)
भारत में जन्मे हजारों-हजार महापुरुषों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व ने दुनिया में भारत को विशेष पहचान दिलाई है। उन महापुरुषों में एक चमकता सूर्य देवी अहिल्याबाई होल्कर हैं। उनकी अद्भुत प्रशासनिक क्षमता, राजनीतिक कौशल, आधुनिक सोच, कुरीतियों को दूर करने का साहस, धार्मिक-सांस्कृतिक गौरव,  न्यायप्रियता एवं प्रजा के प्रति मातृत्व भाव ने उन्हें इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया।
महाराष्ट्र के अहमदनगर के पास चौंडी ग्राम में एक सामान्य कृषक मणकोजी शिन्दे एवं सुशीलाबाई के घर दो पुत्रों के पश्चात 31 मई 1725 को अहिल्या का जन्म हुआ था। अहिल्या बचपन से चंचल, जिज्ञासु और नई-नई बातों को सीखने को उत्सुक स्वभाव वाली थी। माता-पिता के संस्कारों के कारण बचपन से ही उनका मन शिवभक्ति और धार्मिक कार्यों में लगने लगा था। भाइयों के साथ वह भी पढ़ना-लिखना चाहती थी लेकिन उस समय समाज में महिला शिक्षा प्रतिबंधित होने के कारण उनका पाठशाला जाना संभव न हो सका, लेकिन अहिल्या की पढ़ाई के प्रति लगन देखकर मणकोजी शिन्दे ने अपनी बेटी को घर पर ही पढ़ना-लिखना सिखाया।
किसी ज्योतिष ने अहिल्या के जन्म के समय कहा था कि यह बालिका एक दिन महारानी बनेगी, लेकिन एक सामान्य किसान की बेटी के लिए यह कैसे संभव था। एक बार मालवा नरेश मल्हारराव होल्कर चौंडी ग्राम के पास ही रुके थे तभी उनका मिलना अहिल्या से हुआ, उससे बात करने पर वे बहुत प्रभावित हुए। मल्‍हारराव ने मन में तय कर लिया कि अहिल्‍या उनके पुत्र खण्डेराव की पत्नी और होल्कर घराने की बहू बनने के योग्य हैं। मल्हाररावजी,  मणकोजी से मिले और अहिल्या और अपने पुत्र खण्डेराव के विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे ज्योतिष की भविष्यवाणी मानते हुए मणकोजी ने आनंदपूर्वक स्वीकार कर लिया। सन 1733 में दस वर्ष की आयु में विवाह के बाद अहिल्या इंदौर आ गईं। अपने ससुर मल्हारराव के संरक्षण में हाथी-घोड़े की सवारी, शस्त्रों का संचालन एवं युद्ध कला का प्रशिक्षण प्राप्त किया और अपनी सास गौतमीबाई के मार्गदर्शन में प्रशासनिक, वित्त और राजनीति के गुर सीखे। धीरे-धीरे उनके मन में राष्ट्रीय सोच का विस्तार होता चला गया। अपनी विनयशीलता, सेवा-भावना, शांत स्वभाव से उन्होंने पति खण्डेराव का मन भी जीत लिया था। अहिल्याबाई और खण्डेराव के यहाँ 1745 में पुत्र मालेराव और 1748 में पुत्री मुक्ताबाई का जन्म हुआ।
अहिल्याबाई का जीवन आसान नहीं रहा उन्हें कई प्रकार के संघर्ष से गुजरना पड़ा। सन 1754 में कुम्हेर के युद्ध में पति खण्डेराव वीरगति को प्राप्त हुए, उनकी मृत्यु से गहरे आघात में आईं अहिल्याबाई पति के साथ ही सती होना चाहती थीं परंतु ससुर के निवेदन पर उन्होंने अपना शेष जीवन ईश्वर को सौंप सती होने का निर्णय बदल दिया। धीरे-धीरे अहिल्याबाई राजकाज में भाग लेने के साथ ही, अपने ससुर के साथ मिलकर प्रशासनिक निर्णय में सहभाग करने लगीं। बहुत जल्द वे अपने व्यवहार और धार्मिक कार्यो से प्रजा में बहुत लोकप्रिय हो गई थीं लेकिन भाग्य को कुछ ओर ही मंजूर था। 1766 में ससुर मल्हाररावजी की भी मृत्यु हो गई। अहिल्‍या अपने पुत्र मालेराव को राजगद्दी पर बैठाकर स्वयं राज्य का संचालन करने लगी। लेकिन आघात अभी कम न हुए थे, 1767 में पुत्र मालेराव को भी मृत्यु देवता ने अपनी शरण में ले लिया। हे ईश्वर! पहले पति, फिर ससुर, फिर पुत्र कितनी परीक्षा लेंगे। इसके पश्‍चात भी अहिल्याबाई ने हिम्मत नहीं हारी। अहिल्याबाई की लोकप्रियता और प्रजा के प्रति उनके लगाव को देखकर पेशवा ने 11 दिसंबर 1767 को मालवा के सिंहासन पर अहिल्याबाई का राजतिलक कर दिया। अहिल्याबाई ने लगभग 30 वर्षो तक अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता के बल पर एक समृद्ध राज्य अपने सेनापति तुकोजीराव को सौंप, 13 अगस्त 1795 को इस संसार रुपी देह को पूर्ण कर इतिहास के पन्नों में सदा सदा के लिए अमर हो गई।
अहिल्याबाई ने शासन कैसे चलाया होगा यह महेश्वर के किले में लिखे उनके इन शब्दो से पता चलता हैं “ईश्वर ने मुझ पर जो उत्तरदायित्व रखा है, उसे मुझे निभाना है। मेरा काम प्रजा को सुखी रखना है। मैं अपने प्रत्येक काम के लिये जिम्मेदार हूँ। सामर्थ्य व सत्ता के बल पर मैं यहाँ जो कुछ भी कर रही हूँ, उसका ईश्वर के यहाँ मुझे जवाब देना होगा, मेरा यहाँ कुछ भी नहीं है, जिसका है उसी के पास भेजती हूँ, जो कुछ लेती हूँ, वह मेरे ऊपर ऋण (कर्जा) है, न जाने कैसे चुका पाऊँगी।”
  राज सिंहासन पर विराजमान होने के बाद भी अहिल्याबाई प्रत्येक दिन सूर्योदय के पहले जागतीं, स्नान, पूजन, स्वाध्याय के पश्चात विद्वान ब्राह्मणों से प्रवचन सुनती और उसके पश्चात दीन-दुखियों को भिक्षा, भोजन देकर थोड़ा विश्राम किया करती थी। इसके बाद वे दरबार में शासन के कामों में व्यस्त रहती थी। उन्होंनें भारत में मुगलकाल के खंडित मंदिरों का जीर्णोद्धार, नवीन मंदिरों, तालाबों, कुएं-बावड़ियों, घाटों एवं धर्मशालाओं का निर्माण कराया। प्रमुख तीर्थों में उनके द्वारा कराए गए कार्य आज भी देखे जा सकते हैं। उन्‍होंने अयोध्या, सोमनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ, रामेश्वरम, काशी, हरिद्वार, घृष्णेश्वर, नासिक, श्रीशैलम, परली वैद्यनाथ, उज्जैन, ओंकारेश्वर, महेश्वर के मंदिरों में जीर्णोद्धार और कई निर्माण कार्य कराए। उनके विषय में इतना ही कहा जा सकता है कि वह हिंदू मंदिरों की अग्रणी निर्माता और संरक्षक थीं।
अहिल्‍याबाई के न्याय से प्रभावित होकर जनता कहती थी की उनके राज्य में बकरी और शेर एक घाट पर पानी पीते हैं। अहिल्याबाई शिव का न्याय मानकर ही प्रतिदिन लोगों की समस्‍याएं सुनने के लिए दरबार लगाती थीं। ‘श्री शंकर आज्ञेवरुन’  (श्री शंकरजी की आज्ञानुसार) इस राजमुद्रा से चलने वाला उनका शासन भगवान शंकर के प्रतिनिधि के रूप में ही काम करता था। उन्होंने समाज में व्याप्त हो चुकी कुरीतियों को दूर करने का प्रयास भी किया जिनमें नारी शिक्षा और विधवा विवाह प्रमुख हैं। उनके इन्हीं कार्यों के कारण लोग उन्हें देवी कहने लगे थे।
देवी अहिल्‍याबाई के शासन के आरंभिक वर्षों में चोर-डाकुओं की समस्‍या काफी बढ़ गई थी। अहिल्याबाई ने घोषणा की कि जो कोई व्यक्ति चोर डाकुओं का दमन करेगा उसके साथ में मैं अपनी बेटी मुक्ताबाई का विवाह कर दूंगी। यशवंत फणसे नाम के एक साहसी युवक ने चोर डाकुओं का कठोरतापूर्वक दमन कर दिया, तब घोषणा अनुसार उन्होंने मुक्ताबाई का विवाह उस युवक के साथ संपन्न कराया। अहिल्याबाई ने अपने राज्य में कठोर दण्ड और कर की व्यवस्था का प्रावधान किया था। अपने राज्य की एक-एक बात को प्रतिदिन वे स्वयं देखती थी। इसी कारण उनके राज्य में साहित्य, संगीत, कला और उद्योग आदि क्षेत्र में विकास हुआ था।
  अहिल्याबाई के चित्र जिसमें हाथों में वह शिव लिंग रखे है, जो उन्हें न्याय की देवी के रूप में स्थापित करता हैं। उनमें युद्ध कौशल, रणनीति कौशल, राजनीतिक कौशल और नेतृत्व क्षमता जैसे गुण भी अद्भुत थे। उन्होंने महिला सैनिक दल बनाया था ओर कई बार सैनिक वेष में युद्ध के मैदान में मोर्चा संभाला था। पुत्र मालेराव की मृत्यु के पश्चात पूना के पेशवा के चाचा रघुनाथ राव, होल्कर राज्य को हड़पने पचास हजार की सेना लेकर नर्मदा तक आए थे। “अहिल्याबाई ने उन्हें  एक मार्मिक ओर चेतावनी पूर्ण पत्र लिखकर भेजा। महारानी के पत्र की भाषा इतनी स्पष्ट थी कि राघोबा को अधिक सोचने की जरूरत नहीं पड़ी। वह अकेले ही हाथी पर सवार होकर मालेराव की मृत्यु पर संवेदना प्रकट करने इन्दौर आए। इस प्रकार अपनी रणनीतिक समझ के आधार पर पूरी सेना को युद्ध मैदान से पीछे हटाने में वह सफल हो गई थीं। अहिल्याबाई ने भानपुरा-रामपुरा के युद्ध में स्वयं सैनिक वेष में पहुंच कर राजपूतों को भी पीछे हटने को विवश कर दिया।
  इंदौर को एक छोटे से गाँव से एक समृद्ध नगर में बदलने का श्रेय अहिल्याबाई को ही जाता है। उन्होंने अपनी राजधानी को इंदौर से महेश्वर स्थापित किया। जहां सुंदर अहिल्याघाट, काशी विश्वनाथ मंदिर और कई महत्वपूर्ण इमारतें बनवाईं। देवी अहिल्‍याबाई ने अपने राज्य के भीलों और किसानों को खेती के प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराये, पानी के लिए तालाब बनाए जिससे किसान समृद्ध हुए। उन्‍होंने महेश्वर में साड़ी बनाने के हैंडलूम स्थापित कराए जिससे महेश्वर की साड़ी पूरे भारत में प्रसिद्ध हुई। इंदौर और महेश्वर को केंद्र बनाकर उद्योग व्यापार को बढ़ावा दिया। अपनी सामान्य जागीर को अहिल्याबाई ने एक समृद्ध राज्य में परिवर्तित कर दिया।
  स्‍वतन्त्र भारत में अहिल्‍याबाई को एक ऐसी महारानी के रूप में जाना जाता है, जिन्‍होंने भारत के अलग-अलग राज्‍यों में मानवता की सेवा के लिये अनेक कार्य किये थे। उनके इन कार्यों को ध्यान रखकर भारत सरकार तथा विभिन्‍न राज्‍यों की सरकारों ने उनकी प्रतिमाएँ स्थापित की हैं, उनके नाम से कई जन कल्‍याणकारी योजनाएं एवं संस्थानों के नाम रखे हैं। प्रतिवर्ष इन्दौर और महेश्वर में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन अहिल्योत्सव मनाया आता है। भारत सरकार ने 1996 में अहिल्याबाई के नाम पर एक डाक टिकट जारी किया था। 31 मई 2024 को अहिल्याबाई का 300वां जन्म वर्ष हैं। यह हमारे लिए एक अवसर है कि हम पूरे वर्ष अनेक प्रकार के आयोजन जैसे गोष्ठी, प्रबोधन, प्रतियोगिताओं एवं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में उनके जीवन के विविध पहलुओं पर आलेख लिखकर उनका जीवन एवं उनके कार्यों को जन-जन तक पहुंचाए। यही देवी अहिल्याबाई के प्रति हमारी श्रद्धांजलि होगी।(लेखक विद्याभारती मध्‍य भारत प्रांत के प्रांत संगठन मंत्री हैं)(विनायक फीचर्स)

दीपिका पादुकोण बनीं #1! IMDb की “मोस्ट व्यूड इंडियन स्टार ऑफ द लास्ट डिकेड” की लिस्ट में चला एक्ट्रेस का जादू

0

एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए, ग्लोबल आइकॉन दीपिका पादुकोण को IMDb द्वारा “मोस्ट व्यूड इंडियन स्टार ऑफ द लास्ट डिकेड” के रूप में मान्यता दी गई है। यह मान्यता दुनिया भर के करोड़ों IMDb कस्टमर्स और फैंस के पेज व्यू पर आधारित है। ध्यान देने वाली बात यह है कि 100 स्टार्स की इस लिस्ट में हिंदी, तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री के एक्टर्स शामिल हैं। ऐसे में इस लिस्ट में दीपिका सबसे ऊपर हैं, उनके बाद इसमें शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय और अलग-अलग इंडस्ट्रीज के कई बड़े नाम हैं।

https://www.instagram.com/p/C7if1bdyQ23/?igsh=MWptNjhyZ2JodXlhMw==

यह घोषणा IMDb द्वारा टॉप 100 मोस्ट व्यूड इंडियन स्टार्स ऑफ द डिकेड लिस्ट की जाती लिस्ट से मेल खाती है, जिसमें जनवरी 2014 से अप्रैल 2024 तक का डेटा शामिल है। दीपिका पादुकोण की पॉपुलैरिटी ने उनके पोजीशन को इस लिस्ट में मजबूत करते हुए टॉप पर पहुंचाया है, जिससे एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में उनकी दुनिया भर में अपील और इनफ्लुएंस का पता चलता है।

दीपिका पादुकोण, जिन्होंने 2007 में शाहरुख खान के साथ ब्लॉकबस्टर फिल्म “ओम शांति ओम” से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री की थी, उनका अब तक 2 दर्शकों का शानदार करियर रहा है। दीपिका की फिल्मोग्राफी में कई बड़ी हिट फिल्में शामिल हैं, जैसे ‘कॉकटेल’, ‘ये जवानी है दीवानी’, ‘पीकू’, ‘चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘पठान’, ‘जवान’ और ‘पद्मावत’ आदि। 2017 में, दीपिका ने हॉलीवुड में अपनी शुरुआत “xXx: रिटर्न ऑफ़ ज़ेंडर केज” से की, जिसमें विन डीजल के साथ उन्होंने स्क्रीन शेयर किया था, जिससे ग्लोबल स्टार के रूप में उनका स्टेटस और मजबूत हुआ। उनकी पिछली तीन फिल्मों ने शानदार उपलब्धि हासिल की है, ग्लोबल बॉक्स ऑफिस पर सामूहिक रूप से 2550 करोड़ से ज्यादा की कमाई की है, जो किसी भी इंडियन एक्ट्रेस के लिए एक रिकॉर्ड है।

इस रिकॉग्निशन पर बात करते हुए, दीपिका पादुकोण ने फैंस के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हुए कहा है, “मैं बहुत शुक्रगुजार हूं कि मुझे एक ऐसे लिस्ट में शामिल किया गया है जो एक ग्लोबल ऑडियंस की भावनाओं को पेश करता है।”

उन्होंने आगे कहा, “IMDb भरोसे का प्रतीक है, जो लोगों के जुनून, रुचियों और प्राथमिकताओं की सच्ची नब्ज को समझता है। यह मान्यता असल में दिल छू लेने वाली है और यह मुझे दर्शकों से जुड़े रहने साथ ही उनसे मिलने वाले प्यार को, ऑन स्क्रीन या ऑफ स्क्रीन ऑथेंटिसिटी और उद्देश्य के साथ लौटाने के लिए प्रेरित करती है।

आने वाले समय में दीपिका कल्कि 2898 एडी. (27 जून, 2024 को रिलीज़) में दिखाई देने वाली हैं, साथ ही नहीं फिल्म सिंघम अगेन इस साल के अंत में सिनेमाघरों में रिलीज़ होने वाली है।

दीपिका के साथ IMDb की लिस्ट में टॉप 100 में इंडियन सिनेमा की कुछ सबसे पसंदीदा हस्तियाँ शामिल हैं, जिसमें शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय बच्चन, आलिया भट्ट, इरफ़ान खान, आमिर खान, सुशांत सिंह राजपूत, सलमान खान, ऋतिक रोशन और अक्षय कुमार का नाम शामिल है। बता दें कि टॉप 100 लिस्ट में हिंदी, तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ के साथ अलग अलग इंडियन फिल्म इंडस्ट्रीज की प्रतिभाएँ शामिल हैं, जो इंडियन सिनेमा के अलग अलग और समृद्ध परिदृश्य को उजागर करती हैं।

दीपिका पादुकोण का प्रभाव फिल्म्स और बॉक्स ऑफिस नंबर्स तक ही सीमित नहीं है। वह सभी के लिए सिंबल ऑफ एक्सीलेंस और हार्ड वर्क बन गई हैं। इंडियन सिनेमा को उन्होंने ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर भी खूबसूरती से रिप्रेजेंट किया है। हॉलीवुड डिसरप्टर के रूप में उनकी हाल की मान्यता ने एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में बाधाओं को तोड़ने और नए स्टैंडर्ड सेट करने में उनकी भूमिका को सबूत किया है।

दुनिया भर के दर्शकों को इंस्पायर वाले करियर के साथ, दीपिका पादुकोण की लेगेसी शानदार टेलेंट और दुनिया भर में उनकी मान्यता से सजी हुई है। दीपिका पादुकोण हर नए चैलेंज के साथ नए रोल को निभाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। अपने टैलेंट की वजह से ही दीपिका ने इंडिया में ही नहीं बल्कि इंटरनेशनल सिनेमा में भी अपनी जगह मजबूत की है और वह आने वाले जनरेशन को भी इसके साथ इंस्पायर करते हुए एंटरटेन करने वाली हैं।