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सरसंघचालक ने 13 नवंबर को गौ विज्ञान पर होने वाली परीक्षा का किया पोस्टर विमोचन

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बारां, 7 अक्टूबर।    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन राव भागवत ने रविवार को बारां में गौ विज्ञान अनुसंधान एवं सामान्य ज्ञान परीक्षा के पोस्टर का विमोचन किया।  इस दौरान मंच पर विमोचन के लिए सरसंघचालक डॉ. भागवत के साथ क्षेत्र संघचालक रमेश अग्रवालप्रांत संघचालक जगदीश सिंह राणाक्षेत्र गौ सेवा संयोजक राजेंद्र पामेचा और सह प्रान्त गौ सेवा संयोजक धनराज मालव भी उपस्थित रहे।

सह प्रांत गौ सेवा संयोजक धनराज मालव ने बताया कि इस परीक्षा का उद्देश्य गौ माता के प्रति छात्रछात्राओं में सेवा और सुरक्षा का भाव जगाना है। गौ माता का पंचगव्य और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। परीक्षा के माध्यम से गौ माता के संरक्षण व संवर्धन के लिए गौ उत्पाद पंचगव्यगौ काष्ठ आदि की व्यवसायिक एवं विज्ञान आधारित जानकारी विद्यार्थियों को होनी है। प्रदेश में वर्ष 2011 में पहली बार इस परीक्षा का आयोजन हुआ था और अब तक 8 बार आयोजित हो चुकी है। इस वर्ष यह परीक्षा 13 नवंबर 2024 को होनी है

अटूट आस्था का केंद्र है कर्ण की आराध्या माँ दशभुजी दुर्गा का मंदिर

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(कुमार कृष्णन-विभूति फीचर्स)
बिहार के मुंगेर का ऐतिहासिक माँ दशभुजी दुर्गा मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और श्रद्धा का केन्द्र है। शारदीय नवरात्र और बासंती नवरात्र में तो यहां भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है।भक्तों का मानना है कि देवी के मंदिर में जो भी भक्त श्रद्धा और भक्ति के भाव से आता हैं। उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं
माँ दशभुजी को कर्ण की आराध्य देवी माना जाता है। महादानी, महातेजस्वी एवं महारथी कर्ण महाभारतकालीन भारत के महानायकों में अपने शौर्य, और पराक्रमी राजा के रूप में प्रसिद्ध हैं। तत्कालीन अंगदेश के राजा के रूप में उनका अधिकांश समय मुंगेर में व्यतीत हुआ है। अपनी दानशीलता के लिए इतिहास के अमर व्यक्तित्व राजा कर्ण की अधिष्ठात्री देवी दशभुजी दुर्गा के नाम से आज भी मुंगेर में स्थापित है और उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर पर स्थित प्रसिद्ध शक्ति पीठ चंडिका स्थान में उनकी आराधना की कथा जनश्रुतियों में आज भी व्याप्त है। वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त बिहार योग विद्यालय के गंगा दर्शन को कर्णचौरा ही कहा जाता है। इसी कर्णचौरा से महाराज कर्ण प्रतिदिन सवा मन सोना दान किया करते थे जो उन्हें देवी की आराधना और अपने बलिदान के फलस्वरूप प्राप्त होता था।
कर्ण, पाण्डवों की माता कुंती के प्रथम पुत्र थे, लेकिन कुमारी अवस्था में उनका जन्म होने के कारण उन्हें एक दलित मां-बाप के बेटे के रूप में जाना गया। उनकी माता का नाम राधा और पिता का नाम अधिरथ था। अधिरथ राजा धृतराष्ट्र के यहां सारथी का काम करते थे। एक कथा के अनुसार राजा पृथु की पुत्री कुन्ती को महर्षि दुर्वासा के आदर-सत्कार का मौका मिला और उनके सत्कार से प्रसन्न हो ऋषि ने उन्हें ऐसा आशीर्वाद दिया कि वे किसी भी दिव्य शक्ति को अपने पास बुला सकतीं थीं। ऋषि से प्राप्त आशीर्वाद का प्रयोग कौतुहलवश कुन्ती ने सूर्य के आह्नवान से किया। सूर्य तुरंत उपस्थित हो गए और दोनों के ससंर्ग से कर्ण जैसा तेजस्वी और जन्मजात कवचकुण्डधारी पुत्र उत्पन्न हुआ। चूंकि कर्ण का जन्म कुन्ती की कुमारी अवस्था में ही हुआ अत: कुन्ती ने उसे नदी में प्रवाहित कर दिया जिसका राधा और अधिरथ के यहां पालन पोषण हुआ। इसी कारण कर्ण को सूत पुत्र तथा राधेय नामों से भी जाना गया। राजघराने का वारिस नहीं होने के कारण कर्ण को कई अवसर पर अपमान एवं तिरस्कार का सामना करना पड़ा। पांडवों की शिक्षा पूरी होने के उपरान्त शस्त्र विद्या के प्रदर्शन के समय कर्ण द्वारा दी गयी चुनौती इस कारण स्वीकार नहीं की गयी कि वह सूत पुत्र है। दुर्योधन ने इसी अवसर पर कर्ण को अंगदेश का राजा घोषित करते हुए उसके सिर पर राजमुकुट रख दिया। दुर्योधन के इस व्यवहार से कर्ण उनके ऋणी बन गए और जीवनपर्यन्त कर्ण ने इस कृतज्ञता का ज्ञापन मैत्री,समर्थन एवं सदैव सहयोग के लिए तत्पर रहकर किया ही, अपना बलिदान देकर भी अपने सत्चरित्र का परिचय दिया।
कर्ण और अर्जुन के बीच बैर भाव की नींव भी उसी समय पड़ गयी। मत्स्य भेदन के समय यह बैर और गहरा गया जब उसे सूतपुत्र कहकर द्रोपदी ने विवाह करने से इंकार कर दिया। फिर अर्जुन द्वारा मत्स्य भेदन करने पर द्रोपदी ने उनका वरण किया।
कर्ण की आराध्य देवी दशभुजी थीं। यह स्थान मुंगेर के मंगल बाजार में अवस्थित है। जन श्रुति है कि यहां स्थापित प्रतिमा महाभारतकाल की है, यह मूर्ति दानवीर राजा कर्ण की अधिष्ठात्री देवी की है। वर्तमान स्थिति में मूर्ति की स्थापना के लगभग तीन सौ वर्ष हो चुके हैं। पूरी मूर्ति काले रंग के एक ही पत्थर की बनी हुई है। नवरात्रि में लाखों भक्त यहां पूजा अर्चना करते हैं। यहां पर बलि प्रथा वर्जित है। पहले यह मूर्ति पूरबसराय के किसी स्थान पर थी जहां यह वर्षो तक अज्ञात पड़ी रही। कालान्तर में इसे अंग्रेजों के शासनकाल में बैलगाड़ी में छुपाकर ले जाया जा रहा था, परन्तु वर्तमान स्थान पर जहां मूर्ति स्थापित है उससे आगे बैलों ने चलना बंद कर दिया, परिणामस्वरूप लोगों ने इसे दैवी कृपा मानते हुए उस स्थान पर ही मूर्ति को स्थापित कर दिया, जहां एक विशाल मंदिर बनाया गया। मुंगेर स्थित शक्तिपीठ चण्डिका स्थान में कर्ण प्रतिदिन अपने को एक जलते तेल कड़ाह में डालते हुए देवी की आराधना करता था। इससे देवी प्रसन्न होकर कर्ण को सवा मन सोना देती थी तथा उसकी हर मनोकामना पूर्ण करने का वरदान देकर उसे श्री सम्पन्न बना देतीं थी। आज भी दशभुजी देवी, चण्डिका स्थान तथा मां गंगा के बीच एक त्रिकोण है जिसे एक तांत्रिक स्थल के रूप में जाना जाता है। यहीं पर कर्णचौरा के रूप में विख्यात स्थान मुंगेर बिहार योग विद्यालय बना है जो उसके तांत्रिक स्वरूप को और समृद्ध बना देता है। दशभुजी मंदिर का जीर्णोद्धार कर नया रूप दिया गया है। मंदिर का उत्तरोतर विकास हो रहा है। यहां साल भर लोग पूजा के लिए आते हैं लेकिन शारदीय नवरात्र पर भक्तों की जबरदस्त भीड़ उमड़ती है।
धनुर्विद्या में प्रवीणता के साथ कर्ण महादानी भी थे। उनकी दानशीलता अपने चरमोत्कर्ष पर तब पहुंची जब इंद्र द्वारा मांगे जाने पर उन्होंने अपने शरीर से छीलकर कवच और कुण्डल का दान किया और महाभारत युद्ध के समय कुन्ती की याचना पर उन्होंने अर्जुन को छोड़कर सभी पाण्डव पुत्रों के जीवन का अभयदान दे दिया। कर्ण का जीवनादर्श बड़ा उच्च कोटि का था। वे त्याग और मैत्री को सर्वाधिक महत्व देते थे और यही जीवन आदर्श उनको अति उच्च कोटि का मानव बनाता है। मैत्री को सर्वाधिक महत्व देने वाले कर्ण को महाभारत युद्ध से पहले कृष्ण ने उन्हें दुर्योधन को छोउ़कर युधिष्ठिर के साथ आने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन दिए। पांडवों का अग्रज बताकर सम्राट बनाने की बात कही, भारत का चक्रवर्ती राजा बनाने का वादा किया परन्तु कर्ण पर इस प्रलोभन का कोई असर नहीं पड़ा। वो तो हिमालय के समान अडिग थे, उन्हें दुर्योधन के हित के सिवा कुछ भी नहीं प्रिय नहीं था। एक बार का दुर्योधन द्वारा दिया गया सम्मान उन्हें चक्रवर्ती बनने से ज्यादा प्रिय लगा। राष्ट्रकवि रामधारी सिहं दिनकर ने अपनी रचना रश्मिरथी में कर्ण के संबंध में उल्लेख किया है:
हृदय का निष्कपट, पावन क्रिया का,
दलित तारक, समुद्धारक त्रिया था।
बड़ा बेजोड़ दानी था, सदैव था,
युधिष्ठिर ! कर्ण का अद्भुत हृदय था।।
कर्ण की दानशीलता ने महाभारत युद्ध की दिशा ही बदल दी। एक बार इंद्र को कवच कुण्डल देना और दूसरी ओर युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव को अभयदान देकर उन्होंने अपनी दानशीलता पर होने वाले आक्षेप से अपने को बचाया। कर्ण को भगवान कृष्ण के वास्तविक रूप का ज्ञान था,फिर भी अंत तक वे अपने सिद्धांत पर डटे रहे और उनके प्रतिपक्ष में ही बोलते रहे। महाभारत युद्ध की दो घटना कर्ण के चरित्र को और उद्धात बनाती है। अश्वसेन नामक सर्प जिसके पूर्वजों ने अर्जुन को समाप्त करने के लिए कर्ण के बाण से अर्जुन के पास भेजने का अनुरोध किया तो कर्ण ने ऐसी विजय से मृत्यु का वरण करना श्रेष्ठ माना और अश्वसेन को भगा दिया। इसी तरह युधिष्ठिर के मामा शल्य जो कर्ण के सारथी थे, भगवान कृष्ण की सीख पर बार-बार उन्हें दुर्वचनों से हतोत्साहित करते रहे ताकि कर्ण की ओजस्विता और रणकौशल धूमिल हो परन्तु इसका कोई प्रभाव उन पर नहीं पड़ा और वे अंत तक अपने पराक्रम के बल पर अपराजेय बने रहे। कर्ण का वध छलपूर्वक किया गया। गड्डे में फंसे अपने रथ के चक्के को बाहर कर रहे थे तो कृष्ण के उकसावे पर अर्जुन ने अनीति से उसका वध कर दिया। इस प्रकार अंग देश सम्प्रति मुंगेर के सत्यनिष्ठ, पराक्रमी, दानशील एवं तेजोमय व्यक्तित्व का अंत हुआ। (विभूति फीचर्स)

74 करोड़ से प्रदेश के गौ पालकों को स्वावलंबी बनाएगी योगी सरकार

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UP News: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के गौ पालकों की आय बढ़ाने, आत्मनिर्भर बनाने एवं स्वदेशी नस्ल की गायों के प्रति रुझान बढ़ाने के लिए नन्द बाबा दुग्ध मिशन के द्वितीय चरण को हरी झंडी दे दी है। ऐसे में योगी सरकार मिशन के तहत विभिन्न योजनाओं को परवान चढ़ाने के लिए वित्तीय वर्ष 2024-25 में 74 करोड़ 21 लाख रुपये खर्च करेगी। इससे प्रदेश के दस हजार से अधिक गौ पालकों को लाभ मिलेगा और उनकी आय में वृद्धि होगी।

2566 लाभार्थियों को मिलेगा मुख्यमंत्री स्वदेशी गौ संवर्धन का लाभ, खर्च होंगे 2052.40 लाख
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गौ पालकों की आय बढ़ाने एवं स्वदेशी नस्ल की गायों के प्रति रुझान बढ़ाने के लिए पिछले वर्ष नन्द बाबा दुग्ध मिशन को लांच किया था। सीएम योगी ने इस पंचवर्षीय मिशन के लिए 1 हजार करोड़ रुपये के फंड का प्राविधान किया था। इसी के तहत सीएम योगी ने मिशन के दूसरे चरण को हरी झंडी दे दी है। सीएम योगी के इस कदम से वर्तमान वित्तीय वर्ष में 2566 लाभार्थियों को मुख्यमंत्री स्वदेशी गौ संवर्धन योजना का लाभ मिलेगा। इसके लिए 2052.40 लाख का बजट प्राविधानित है।

इसी तरह मुख्यमंत्री प्रगतिशील पशुपालक प्रोत्साहन योजना का 7028 लोगों को लाभ मिलेगा। इसके लिए 790 लाख रुपये खर्च किये जाएंगे। वहीं नन्दिनी कृषक समृद्धि योजना का 90 लाभर्थियों को लाभ मिलेगा। इस योजना में 1015 लाख रुपये खर्च किये जाएंगे। इसके अलावा 330 प्रारंभिक दुग्ध सहकारी समितियों के गठन का लक्ष्य रखा गया है। इस मद में 722.70 लाख रुपये खर्च किये जाएंगे। गौ पालकों को पशु स्वास्थ्य एवं दुग्ध गुणवत्ता के लिए 621 परीक्षण किट वितरित की जाएंगी। इसके लिए 25 लाख की धनराशि आवंटित की गयी है। प्रदेश के डेयरी हित धारकों की डेयरी की क्षमता बढ़ाने के लिए 1447 डेयरी धारकों को प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिसके लिए 64.30 लाख रुपये खर्च किये जाएंगे।

नन्दिनी कृषक समृद्धि योजना पर खर्च किये जाएंगे 1730.08 लाख

मिशन के तहत साएलेज / हे / टीएमआर मेकिंग के अध्ययन एवं ट्रेनिंग नीड एसेसमेंट (टीएनए) की योजना के लिए 35 लाख आवंटित किये गये हैं। राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत संचालित एबीआईपी-आईबीएफ ईटीटी योजना का 200 लोगों को लाभ दिया जाएगा, जिस पर 25 लाख खर्च किये जाएंगे। नन्द बाबा दुग्ध मिशन पोर्टल को विकसित करने के लिए 60 लाख रुपये खर्च किये जाएंगे। वहीं नन्दिनी कृषक समृद्धि योजना (नवीन योजना) का 294 लोगों को लाभ दिया जाएगा। इस मद में 1730.08 लाख खर्च किये जाएंगे। इसके अलावा स्टेट प्रोग्राम मैनेजमेंट यूनिट (एसपीएमयू) के संचालन के लिए 237.60 लाख, डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम मैनेजमेंट यूनिट (डीपीएमयू) के 18 जनपदों में संचालन के लिए 214 लाख आवंटित किये गये हैं। इसके अलावा अति हिमीकृत वीर्य उत्पादन केंद्र, रहमानखेड़ा लखनऊ में बोवाइन पशुओं में सेक्स्ड सार्टेड सीमेन उत्पादन की परियोजना में प्रयोगशाला निर्माण के लिए 450 लाख खर्च किये जाएंगे।

गौ पालन से हो रही है अच्छी कमाई

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जहानाबाद: जिले के काको प्रखंड के महमदपुर काजीसराय के 25 वर्षीय युवा किसान बिट्टू ने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी और बड़े पैमाने पर गौ पालन शुरू कर एक सफल किसान बने. बिट्टू आज 17 गायों का पालन कर रहे हैं, जिनमें एचएफ, क्रॉस साहिवाल, गिर और देसी नस्ल की गायें शामिल हैं. उन्होंने 2023 में बड़े पैमाने पर गौ पालन की शुरुआत की और अब इससे अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं.

15 साल की उम्र में माता-पिता को खोया
बिट्टू ने अपने संघर्ष की कहानी बताते हुए कहा, जब मैं 15 साल का था, तब मेरे माता-पिता का निधन हो गया. 2014 में एक सड़क दुर्घटना में मां की मृत्यु हो गई और एक साल के भीतर पिता भी गुजर गए. हम चार भाई-बहन थे और सबसे बड़ा होने के कारण घर की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई. उस वक्त आर्थिक तंगी के कारण मैंने प्राइवेट नौकरी करनी शुरू की, लेकिन उससे बहुत ज्यादा आमदनी नहीं होती थी. कुछ सालों तक नौकरी की, फिर छोड़ दी और पूरा ध्यान पशुपालन पर केंद्रित कर दिया.

2023 में बड़े पैमाने पर शुरू किया गौ पालन
बिट्टू बताते हैं, शुरुआत में कुछ सालों तक 2-3 गायों से ही परिवार का खर्च चलाता था. फिर मैंने कृषि विज्ञान केंद्र गंधार से पशुपालन की ट्रेनिंग ली और 2023 में बड़े पैमाने पर गौ पालन शुरू किया. आज मेरे पास उन्नत नस्ल की 17 गायें हैं. इनमें 3 एचएफ (होल्सटीन फ्रिसियन) नस्ल की गायें शामिल हैं. इसके अलावा, मेरे पास गिर, क्रॉस साहिवाल और कुछ देसी नस्ल की गायें भी हैं.

गौ पालन से हो रही है अच्छी कमाई
बिट्टू का कहना है कि गौ पालन से अच्छी कमाई की जा सकती है. वर्तमान में उनकी गायें रोजाना लगभग 70 लीटर दूध दे रही हैं और आने वाले समय में यह उत्पादन और बढ़ने की उम्मीद है, क्योंकि कई गायें गाभिन हैं. उनकी एक गाय रोजाना 20 लीटर तक दूध देती है और जैसे-जैसे अन्य गायें तैयार होंगी, दूध उत्पादन बढ़ेगा. बिट्टू ने अपने गायों के लिए शेड तैयार किया है और उन्हें चोकर दर्रा, सरसों खल्ली खिलाते हैं. एक गाय पर सालाना लगभग 65,000 रुपये का खर्च आता है, लेकिन इससे होने वाली कमाई उससे कहीं अधिक है. बिट्टू की कहानी न केवल संघर्ष की मिसाल है, बल्कि यह भी दिखाती है कि पशुपालन में संभावनाओं की कोई कमी नहीं है. उनका यह सफर अन्य युवाओं के लिए भी प्रेरणा है.

25 अक्टूबर को देहरादून में गौ ध्वज यात्रा, अविमुक्तेश्वरानंद करेंगे शिरकत

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देहरादून: 25 अक्टूबर को देहरादून में गौ ध्वज को स्थापित किया जाएगा. इसमें गौ माता को राष्ट्रमाता घोषित करने का संकल्प लिया जाएगा. इस कार्यक्रम के लिए स्वामी शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद देहरादून पहुंचेंगे. देहरादून में जगदगुरु शंकराचार्य और गोपाल मणि महाराज गौ ध्वज की स्थापना कर गौ महासभा को संबोधित करेंगे. इसके बाद गौ ध्वज यात्रा दिल्ली रवाना हो जाएगी.

भारतीय गौ क्रांति मंच के पदाधिकारियों ने कहा गाय को पशु नहीं बल्कि माता की प्रतिष्ठा दी गई है. यही सनातन धर्मी हिंदुओं की पवित्र भावना है, इसी धार्मिक आस्था को लेकर और कानून में गाय को राज्य सूची से हटकर केंद्रीय सूची में प्रतिष्ठित कर गौ माता को राष्ट्र माता का सम्मान दिलाने के साथ ही गौ हत्या मुक्त भारत बनाने के उद्देश्य से गौ प्रतिष्ठा आंदोलन चलाया जा रहा है. ऐसे में ज्योतिष पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के मार्गदर्शन में समूचे भारत में गौ प्रतिष्ठा आंदोलन के तहत गौ ध्वज स्थापना यात्रा 22 सितंबर से 26 अक्टूबर तक होनी तय हुई है. ये यात्रा भारत के सभी 36 प्रदेशों की राजधानियों में पहुंचकर एक गौ ध्वज की स्थापना कर रही है.

यात्रा के राष्ट्रीय सहसंयोजक और उत्तराखंड राज्य के प्रभारी गौ भक्त विकास पाटनी ने कहा राज्य की हर राजधानी में विशाल गौ प्रतिष्ठा सम्मेलन का भव्य आयोजन किया जाएगा. जिसकी शुरुआत अयोध्या से होगी. उसके बाद पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण होते हुए 26 अक्टूबर को देश की राजधानी दिल्ली में यात्रा पहुंचेगी. 27 अक्टूबर को यह यात्रा वृंदावन में विराम लेगी. इस यात्रा के माध्यम से जगदगुरु शंकराचार्य भारत के सभी गौ भक्तों को सम्मानित भी करेंगे.

इसी कड़ी में उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में जगदगुरु शंकराचार्य और गोपाल मणि महाराज 25 अक्टूबर को दोपहर 12 बजे से 3 तक गौ ध्वज की स्थापना करके गौ महासभा को संबोधित करने जा रहे हैं. इसके बाद यात्रा के समापन दिल्ली में होगा. 7,8 और 9 नवंबर को तीन दिवसीय राष्ट्रव्यापी गौ प्रतिष्ठा महासम्मेलन भी आयोजित किया जाएगा, जो गाय को राष्ट्र माता की प्रतिष्ठा दिलाने के लिए निर्णायक होगा.

ऑटो में मांस और चमड़े की हो रही थी तस्करी

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Banswara News: बांसवाड़ा शहर में देर रात सड़क पर हंगामा हो गया. कुछ युवाओं ने सड़क से गुजर रहे एक ऑटो को रूकवाया, जिसके बाद मामला इस कदर बढ़ गया कि मौके पर पुलिस को पहुंचना पड़ा. ऑटो में मांस के साथ चमड़े के टुकड़े रखे हुए थे. इसे देखकर युवा भड़क गए और जमकर विरोध किया. मामला शहर के कस्टम तिराहे का है, जहां से गुजर रहे ऑटो में चमड़ा रखा हुआ था. करीब से गुजर रहे युवाओं को मांस की बदबू आई तो उन्होंने इसे रूकवाया. उन्होंने नवरात्रि (Navratri) के दौरान गौ मांस की तस्करी की आशंका जताई. हंगामा होने की सूचना पर राज तालाब थाना पुलिस मौके पर पहुंची और वाहन के ड्राइवर को थाने पर ले जाकर पूछताछ की.

रात 1.30 बजे गरबा खेलकर लौट रहे थे युवा

दरअसल, नवरात्रि के मौके पर शहरभर में गरबा की धूम है. रात 1:30 बजे कुछ युवा गरबा खेलकर ही घर लौट रहे थे. वह शहर के कस्टम तिराहे तक पहुंचे तो सामने से ऑटो आ रहा था. इस ऑटो में चमड़ा होने के चलते बदबू आई, इसके चलते युवाओं को गौमांस की तस्करी का शक हुआ. इस दौरान गौ रक्षक दल के कुछ सदस्य भी पहुंचे और उन्होंने इस पर आक्रोश जताया. सूचना मिलने के बाद थाना अधिकारी जाब्ते के साथ पहुंचे.

वाहन चालक समेत 2 डिटेन 

गाड़ी का रजिस्ट्रेशन नंबर दाहोद (गुजरात) का है. यह गाड़ी दाहोद से बांसवाड़ा आई थी और चमड़ा लेकर वापस दाहोद ही लौट रही थी. इस गाड़ी के ड्राइवर और एक अन्य सदस्य को पुलिस ने डिटेन कर लिया है. राज तालाब थाना प्रभारी दीपक कुमार ने बताया कि दोनों सदस्यों से पूछताछ जारी है. वहीं, बॉर्डर एरिया होने के चलते गुजरात और मध्य प्रदेश में तस्करी की सूचना अक्सर मिलती रहती है. युवाओं का गुस्सा यही है कि इस तरह की कार्रवाई नहीं रूक नहीं रही है.

दवाई वाला चारा खाते ही मर गई गौशाला की सैकड़ों गाय

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उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती की गौशाला में बीती रात डॉक्टरों की लापरवाही के चलते सैकड़ो गांव गायों की मौत हो गई. बताया जा रहा है कि गौशाला में कुछ गायों की तबीयत खराब थी डॉक्टरों ने आकर देखा और दवा दी. सभी गायों के चारे में डॉक्टर की दी गई दवा को मिला दिया गया, जिसके बाद एक के बाद एक गायों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया. इसके बाद देखते ही देखते गौशाला शमशान घाट में तब्दील हो गया और सैकड़ो गायों की मौत हो गई.

दवाई खाते ही मरने लगी गाय

जिस गौशाला में ये सब हुआ हुआ, वो श्रावस्ती जनपद के गिलौला विकासखंड के काशीपुर के मूसा गांव में है. जहां पर कल कुछ गायों की तबीयत खराब थी, डॉक्टर ने आकर गायों के स्वास्थ्य की जांच की और चारे में दवा मिलकर गायों को देने को चारे में दवा मिलाई गई, और गायों को खिला दी गई. जिसके बाद गौ आश्रम केंद्र शमशान घाट में तब्दील होने लगा. एक के बाद एक गायों की मौत का सिलसिला जो शुरू हुआ तो सैकड़ो गायों की मौत हो गई.

गायों की मौत से पूरे जिले में हड़कंप

गायों की मौत से पूरे जिले में हड़कंप मच गया. आनन फानन में गौ आश्रम पहुंचे डीएम और SP ने मौके की जांच शुरू की. डीएम ने कहा कि डॉक्टरों की टीम बुलाई गई है और उच्च स्तरीय जांच भी होगी जांच में दोषी पाए गए लोगों के ऊपर कड़ी कार्रवाई की जाएगी. वहीं स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ गायों को गौ आश्रम के चोरी से कर्मचारियों के द्वारा गड्ढा खोदकर दफना भी दिया गया. अब सवाल यही उठ रहा है कि गौशाला में हुई सैकड़ों गायों की मौत की जिम्मेदार कौन है.

राजनीति के नये मुद्दे जलेबी,चूरमा और लड्डू* 

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(राकेश अचल -विभूति फीचर्स)
आप मानें या न मानें लेकिन हकीकत ये है कि  कड़वाहट से भरे नेताओं को भी मिष्ठान प्रिय होते हैं,भले ही नेता मधुमेह के शिकार हों लेकिन मिष्ठान सामने आ जाये तो पीछे नहीं हटता । देश के पूर्व प्रधानमंत्री और ग्वालियर के सपूत अटल बिहारी वाजपेयी को बहादुरा के लड्डू और गुलाब जामुन प्रिय थे,हालांकि वे चाची के मंगौड़ों के भी मुरीद थे। जब तक अटल जी  रोग शैय्या पर नहीं गए थे तब तक इन लड्डुओं और मंगौड़ों  का सेवन करते रहे। वाजपेयी जी से मिलने वाले उनके रिश्तेदार हों या और कोई यदि उन्हें बहादुरा के लड्डू भेंट करते थे तो उनके मुखमंडल पर एक स्निग्ध मुस्कान तैरने लगती थी। पूर्व राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा जलेबी के शौकीन थे । वे राष्ट्रपति भवन में आगंतुकों को भी जलेबी ही खिलते थे।  
हाल ही में तिरुपति के प्रसादम में मिलने वाले लड्डुओं के विवाद के बावजूद ग्वालियर में न बहादुर के लड्डुओं के प्रेमियों की संख्या कम हुई है और न लखनऊ में ठग्गू के लड्डुओं की। लड्डू  है ही ऐसी मिठाई जिसे हर जाति और धर्म के लोग खाते हैं। लड्डू मेरे हिसाब से मिठाइयों का राजा है।  कायदे से उसे अब तक राष्ट्रीय मिष्ठान घोषित कर देना चाहिए था। मुमकिन है कि महाराष्ट्र  सरकार ने जैसे हाल ही में गाय को राज्य माता का दर्जा दिया है वैसे ही आने वाले दिनों में कोई लड्डू प्रेमी सरकार लड्डू को भी राज्य या राष्ट्र मिष्ठान का दर्जा दे दे। हमारे यहां दर्जा देना या पेरोल देना बहुत आसान काम है।
हरियाणा विधानसभा के चुनाव प्रचार में गोहाना पहुंचे लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता और  राहुल गांधी भी जलेबी नाम के एक मिष्ठान के मुरीद हो गए। गोहाना की चुनवाई सभा के  मंच पर राहुल गांधी ने मातूराम हलवाई की जलेबी का स्वाद चखा। दीपेंद्र हुड्डा ने राहुल गांधी को अपने हाथों ये जलेबी खिलाई। राहुल को  इसका स्वाद इतना पसंद आया कि उन्होंने एक डिब्बा अपनी बहन प्रियंका गांधी के लिए पैक करवा लिया। उन्होंने अपनी रैली में भी इस जलेबी का जिक्र किया। बता दें कि लाला मातूराम की जलेबी कोई सामान्य जलेबी नहीं है, इनका आकार सामान्य जलेबी से ज्यादा बड़ा है। एक जलेबी ढाई  सौ  ग्राम तक की होती  है।
जलेबी केवल हम भारतीयों को ही नहीं बल्कि भारत के बाहर तमाम इस्लामिक राष्ट्रों की जनता को भी प्रिय है ।  वे इसे हिन्दू मिठाई मानकर इसका तिरस्कार नहीं करते।  जानकार बताते हैं कि  जलेबी भारतीय उपमहाद्वीप व मध्यपूर्व की एक लोकप्रिय मिठाई  है। यह किसी कर्ण कुंडल की तरह ऐसी रसभरी होती है कि  आप इसे खाये बिना रह नहीं सकते । कोई इसे दूध में डालकर खाता है तो कोई रबड़ी डालकर । किसी को जलेबी दही के साथ खाना पसंद  है लेकिन खाते सब है।  कहीं जलेबी बहुत छोटे आकार की बनती है तो गोहाना में 250  ग्राम की एक।  सागर में तो जलेबी में मावा भरा जाता है।   स्वाद में मीठी और खमीर की वजह से हल्की सी खट्टी जलेबी की लोकप्रियता ऐसी है कि हमारे यहां सुंदर  महिलाओं का नाम तक जलेबी बाई भी रखा जाता है।जलेबी की लोकप्रियता का अंदाजा  आप इसी से लगा सकते हैं कि  हमारे यहां जलेबी बाई फ़िल्मी गीत भी है ,बेव सीरीज भी है और कार्टून श्रंखला भी ।
जलेबी की धूम मैंने अपनी अनेक विदेश यात्राओं में भी देखी। भारत के अलावा  बांग्लादेश, पाकिस्तान, ईरान के साथ समस्त अरब देेेशों में भी यह जानी-पहचानी है। मैंने तो स्पेन में भी जलेबी खाई। अमेरिका में तो जलेबी आसानी से मिल जाती है। जलेबी की तारीफ़ कर इसके जरिये रोजगार की बात कर राहुल गांधी भले ही अपने विरोधियों द्वारा ट्रोल किये जा रहे हों लेकिन इससे जलेबी का तो भला ही हुआ।वैसे भी हमारे राम जी सभी का भला करते हैं  ।
जलेबी के बाद आइये बात करते हैं चूरमा की । चूरमा राजस्थान का अघोषित राज्य मिष्ठान है और इसकी धूम देश-विदेश तक है ।  हाल ही में हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी भी चूरमा खाकर  न सिर्फ गदगद हो गए बल्कि उन्हें अपनी दिवंगत माँ की याद भी आ गयी । भारत के स्‍टार जैवलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा की मां ने ये चूरमा भेजा था ।  मोदी जी ने चूरमा न सिर्फ खुद खाया बल्कि जमैका के प्रधानमंत्री को भी खिलाया और भावुक होकर नीरज की माँ श्रीमती सरोज देवी  को एक आभार पत्र भी लिख दिया । नीरज की माँ को मोदी जी ने खुद पत्र  लिखा । ये चूरमे  की ही  ताकत  तो थी ।   मोदी जी ने लिखा -, “आज इस चूरमे को खाने के बाद आपको पत्र लिखने से खुद को रोक नहीं सका। भाई नीरज अक्‍सर मुझसे इस चूरमे की चर्चा करते हैं, लेकिन आज इसे खाकर मैं भावुक हो गया। आपके अपार स्‍नेह और अपनेपन से भरे इस उपहार ने मुझे मेरी मां की याद दिला दी।”
अब आप समझ ही गए होंगे कि  मिष्ठान चाहे कोई भी हो बहुत ताकतवर चीज है। मिष्ठान शुष्क से शुष्क आदमी को भी सरस बना सकता है। मिष्ठान कड़वाहट मिटाने का सबसे बढ़िया विकल्प है ,आप इसे कड़वाहट  का ‘ ऐंटी डोज ‘ भी कह सकते हैं शायद इसीलिए हमारे यहां तीज-त्यौहारों पर मिठाइयों का आदान-प्रदान किया जाता है। मैं तो कहता हूँ कि  मिष्ठान बिना जग सूना है। सियासत में बढ़ती कड़वाहट और अदावत को मिष्ठान के जरिये दूर किया जा सकता है,फिर मिष्ठान चाहे लड्डू हो,जलेबी हो,चूरमा हो या बंगाल का रसोगुल्ला। मैं तो कहता हूँ कि  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर स्वच्छता पखवाड़ा मानते हुए आम जनता को रसोगुल्ला वितरित करना चाहिए था। यदि ऐसा होता  तो प्रधानमंत्री जी और उनकी पार्टी के तमाम लोग संदेशखाली और कोलकाता जैसे मुद्दे उठाना भूल जाते।
देश में पुरखों की विदाई के बाद देवी स्वरूपा  दुर्गा का आगमन हो चुका है ।   हमें इन नौ दिनों में मिष्ठान के जरिये सौहार्द की वापसी की कोशिश करना चाहिए। मुहब्बत  की दुकान खोलने से आपको ऐतराज हो सकता है किन्तु मिष्ठान की दुकान खोलने से नहीं।  यदि यही  मिष्ठान हमारे लिए रोजगार पैदा करने लगे तो भी क्या बुरा है।  मिष्ठान भी किसी मंगौड़े से कम नहीं है। हम तो 8  अक्टूबर को हरियाणा और जम्मू -कश्मीर के सभी नए विधायकों से मिठाई खाएंगे।(विभूति फीचर्स)

महाराष्ट्र की राजनीति में राजमाता बनी गौमाता

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राकेश अचल 
आप मानें या न मानें लेकिन मुझे ये लग रहा है कि  देश के तमाम चौपाये गाय की किस्मत से जल-भुन रहे होंगे,क्योंकि उसे महाराष्ट्र की सरकार ने राजमाता घोषित कर दिया है ।  राजमाता कहिये या राज्य माता अर्थ एक ही है। ये सम्मान पाने के लिए पुराने  सामंतों परिवारों की महिलाएं तरस जाया करतीं थीं ।  पशुओं  में तो किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि  कलिकाल में जाकर गाय किसी राज्य की राजमाता बन जाएगी। मैं देश-दुनिया के तमाम चौपाया परिवार की ओर से गाय को इस सम्मान के लिए दिल से बधाई देता हूँ।
‘ गाय ‘ देश का सबसे  निरीह चौपाया है ,लेकिन भारतीय समाज में ‘ गाय ‘ को माता का दर्जा हासिल है तो एक बड़े हिस्से में उसके मांस को बड़ी लज्जत के साथ भक्षण भी किया जाता है। सनातनी तो गाय की पूंछ पकड़ कर वैतरणी पार करने का यकीन रखते हैं।  पहले ये विश्वास  मनुष्यों तक सीमित था लेकिन अब सियासत में भी सियासी दल चुनावी वैतरणी पार करने के लिए ‘ गाय ‘ को ठीक उसी तरह राजमाता बना रहे हैं जैसे की ‘ गधे ‘ को वक्त पड़ने पर बाप बनाया जाता है।
वैसे ‘ गाय ‘ और ‘ गधे की राशि एक ही है किन्तु दोनों के बीच कोई तुलना ,कोई बराबरी नहीं है।  गाय को माता बनाया जाता है और गधे को बाप। ये सिद्धांत मेरे या आपके नहीं बल्कि भारतीय  समाज के हैं।  ये मान्यताएं भी सनातन ही समझिये।  जबसे मनुष्य ने गाय और गधे को अपना सहचर बनाया है शायद तभी से ये मान्यताएं,ये कहावतें   समाज में प्रचलित हैं। अब यदि ये प्रचलित हैं तो निश्चित ही इनका कोई आधार भी रहा होगा। फ़िलहाल बात गाय की हो रही है।गाय और गधे में केवल एक ही समानता है कि दोनों बड़े ही धैर्यवान हैं। हालाँकि दोनों को लात मारना आता है।
गाय पर हमारे पुरखा पत्रकार स्वर्गीय राजेंद्र माथुर ने भी लिखा और साथी गिरीश पंकज ने भी। महात्मा गाँधी ने गाय के बजाय बकरी को प्राथमिकता दी ,लेकिन उनकी कांग्रेस ने गाय को ही नहीं उसके बछड़े को और उसके पति बैल को भी सम्मान दिया।  एक जमाना था जब कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी होता था और बाद में ये गाय-बछड़ा भी बना। इस सात्विक चौपाये ने कांग्रेस की हमेशा मदद की।  कांग्रेस को अनेक बार चुनावी वैतरणी  पार करायीं। कांग्रेस को हुए फायदे को देखकर अब महाराष्ट्र सरकार ने गाय को अपने सूबे की राजमाता घोषित कर दिया।ये इसलिए हुआ क्योंकि महाराष्ट्र  नवंबर में विधानसभा के चुनाव होना हैं।
गाय सबका सहारा होती है । जब हम सब छात्र हुआ करते थे तब गाय हमारा भी सहारा थी।  परीक्षा में हर बार गाय पर निबंध लिखने का विकल्प होता था और हम बच्चे किसी और विषय पर निबंध लिखने के बजाय गाय पर निबंध लिखना पसंद करते थे। गाय केवल एक पशु ही नहीं बल्कि हमारी मान्यता भी है ।  हमारे समाज में गाय को सबसे सीधा चौपाया माना जाता है। उसके इसी स्वभाव की वजह से कहावत तक बन गयी ।  हमारे यहां अक्सर सीधे पुरुष और महिला को गाय ही कहा  जाता है । कृषि प्रधान देश में एक जमाने में गाय को सचमुच राजमाताओं जैसा सम्मान मिलता था ,क्योंकि वे कृषि के लिए बैल जनती थीं। उस जमाने में जिस किसान के घर जितनी ज्यादा गायें और जितनी ज्यादा बैल जोड़ियां होतीं थीं,उसे उतना समृद्ध माना जाता था। घर-घर में गौशालाएं थीं। तब गायों को सड़कों पर गलियों में आवारगी करने की न छूट थी और न मजबूरी।
कालांतर में भारत कृषि प्रधान देश  तो है किन्तु आज न किसानों का सम्मान है और न गायों का।  अब खेती  बैलों की जोड़ियों   से नहीं मशीनों से होती है ।  बैलों  की जगह ट्रेक्टरों ने ले ली है।  कटाई मजदूरों के पेट पर हार्वेस्टर लात मार चुके हैं। ऐसे में गायों और बैलों का बेरोजगार और महत्वहीन होना स्वाभाविक है। अब गाय और बैल पाले कौन ? आज के समय में तो आदमी  के लिए अपना पेट पालना  ही मुश्किल  हो रहा है ।
85  करोड़ लोग पेट पालने के लिए सरकार पर निर्भर हैं। सरकार अपने वोटर पाले या गाय ? यहां तक कि गाय को राजमाता का सम्मान देने वाले भाजपा के कार्यकर्ता और नेता तक गाय या बैल नहीं पालते ।  उन्हें या तो सड़कों पर छोड़ दिया जाता है ,या वे कत्लगाहों के काम आते है।  जहाँ  उनके मांस को डिब्बों में बंद कर बाजारों में बेच दिया जाता है। आप हैरान होंगे कि गाय-बैल का मांस बेचने  वाले विधर्मी नहीं बल्कि सनातन धर्म के मानने वाले ही हैं। महाराष्ट्र सरकार ने गाय को राज्यमाता का दर्जा दे दिया है।  यह बड़ा कदम चुनाव से पहले उठाया गया है।  सरकार ने कैबिनेट बैठक में यह फैसला सुनाते हुए कहा कि वैदिक काल से भारतीय संस्कृति में देशी गाय की स्थिति, मानव आहार में देशी गाय के दूध की उपयोगिता रही है।
यह फैसला जारी करते हुए कहा गया कि वैदिक काल से भारतीय संस्कृति में देशी गाय की स्थिति, मानव आहार में देशी गाय के दूध की उपयोगिता, आयुर्वेद चिकित्सा,पंचगव्य उपचार पद्धति तथा जैविक कृषि प्रणालियों में देशी गाय के गोबर एवं गोमूत्र के महत्वपूर्ण स्थान को ध्यान में रखते हुए देशी गायों को अब से ‘राज्यमाता गोमाता’ घोषित करने की मंजूरी दी गई है। हम महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ  शिंदे को इस फैसले कि लिए बधाई देते हैं। हमें उम्मीद है कि अब महाराष्ट्र में तो गाय बच ही जाएगी ।
देश के जिन राज्यों में डबल इंजिन की सरकारें हैं वे भी आज नहीं तो कल गाय को राजमाता का दर्जा दे ही देंगीं। भारत को कोई भी नागरिक,कोई भी मतदाता गाय को दिए गए इस सम्मान का विरोध नहीं कर सकता। करना भी नहीं चाहिए  आखिर गौशालाओं के नाम पर पलने वाले नेता और बाबा भी तो बहुत हैं। देश भले ही मंगल ग्रह पर पहुंच गया हो लेकिन विकास की हकीकत ये है कि आज भी सड़क परिवहन का एक बड़ा भाग आज भी बैलगाड़ी पर निर्भर है।
देहाती ईंधन का अधिकांश भाग तथा शहरी ईंधन का लगभग 20 प्रतिशत भाग गोबर का होता है। गौ-दुग्ध में समस्त पोषक तत्व पाए जाते हैं। पिछड़े वर्ग के लोगों और वनवासियों की आय का साधन भी गौ-वंश है। गाय से प्राप्त ऊर्जा पर्यावरण प्रदूषण फैलाने की जगह उसे रोकती है तथा दुग्ध पाउडर व रासायनिक खादों के रूप में देश से बाहर जाने वाली देशी मुद्रा की बचत करती।  गाय केवल सियासत के ही नहीं बल्कि धार्मिक नेताओं के काम भी आती है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती हिंदुओं के लिए पूज्य गायों की रक्षा के लिए देशभर में एक लाख ‘गौ ध्वज’ स्थापित करने कि अभियान में लग गए हैं।हमारे प्रधानमंत्री जी  को आपने  हाल  में ही एक बछिया  को ‘ किस ‘ करते हुए देखा ही होगा।
सरकारी आंकड़ों कि मुताबिक इस समय देश में गायों की संख्या 19  करोड़  से ज्यादा है। एक समय था, जब देश की जनसंख्या 38 करोड़ हुआ करती थी और गौ वंश 117 करोड़ हुआ करता था। आंकड़े बताते हैं कि   बीफ एक्सपोर्ट में भारत अब विश्व में दूसरे नंबर पर पहुँच गया है।  भारत ‘मिथुन’ और ‘जलीय भैंस’ का निर्यात कर रहा है। सन् 2023 में भारत ने 1,475 टन बीफ और बछड़े का मांस एक्सपोर्ट किया है। खैर जो है सो है। अब यदि राजमाता बनने कि बाद हमारी गायों को राजमाताओं जैसा सुख भी मिलने लगे तो सबसे ज्यादा ख़ुशी मुझे होगी क्योंकि मुझे भी गाय बहुत पसंद है।  मैं यदि फ़्लैट  में न रह रहा होता तो एक गाय जरूर पालता।(विनायक फीचर्स)

Navratri Special – बंगाल का सिद्ध शक्तिस्थल तारापीठ* 

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(शिव शंकर सिंह पारिजात-विनायक फीचर्स)
तारापीठ बंगाल का एक प्रमुख शक्तिस्थल है जो पटना-हावड़ा लूप रेल लाईन पर झारखंड-बंगाल की सीमा पर रामपुर हाट स्टेशन (बीरभूम जिला) से करीब 8 किमी  दूर द्वारिका नदी के तट पर स्थित है। कोलकाता से यह 213 कि.मी. और पटना से (वाया जमालपुर-भागलपुर) 389 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। रेल के अलावा यहां सड़क मार्ग से भी देश के किसी भी कोने से पहुंचा जा सकता है।
बंगाल में शक्ति-पूजा की प्राचीन परम्परा है। यहां के घर-घर में देवी काली की पूजा होती है जिनके मंदिर यहां के हर गली-मुहल्लों में देखने को मिल जायेंगे। तारापीठ में आद्या देवी शक्ति की अवतार मां तारा विराजती हैं। इस स्थल की मान्यता एक जाग्रत शक्ति पीठ एवं तंत्रपीठ के रूप में है जहां आराधकों और साधकों की विनती शीघ्र सुनी जाती है। मां तारा सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य-आरोग्य व ज्ञान-साधना की देवी मानी जाती हैं। यही कारण है कि बिहार, बंगाल और झारखंड सहित देश के कोने-कोने से प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु यहां तारा माँ के दर्शन हेतु यहां आते हैं एवं भक्ति पूर्वक पूजन-अर्चन कर मनोवांछित फल पाते हैं।
शक्ति-पीठ तारापीठ के बारे में ऐसी मान्यता है कि यहां देवी की आंख का तारा गिरा था जिसकी कथा दक्ष प्रजापति के यज्ञ और माता पार्वती के हवन-कुंड में दाह से जुड़ी है। जब पिता द्वारा अपने पति की अवहेलना से व्यथित पार्वती ने हवन-कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया और इससे उन्मत्त होकर शिव उनके शव को लेकर तीनों लोक में फिरने लगे तो भगवान विष्णु ने देवी के शव को सुदर्शन चक्र से काट डाला जिसके 51 टुकड़े विभिन्न स्थानों में गिरे जिनकी मान्यता 51 शक्तिपीठों में हुई। तारापीठ में देवी की आंखों के तारे गिरे थे, इस कारण इसकी प्रसिद्धि तारापीठ के नाम से हुई।  एक मान्यता यह भी है कि यह स्थल बिहार के महेशी में है।
देवी तारा की गणना दश महाविद्याओं में होती है जो शक्ति के रूप में देवी का तांत्रिक अवतार मानी जाती हैं । जिनका निवास-स्थान श्मशान होता है। अपने भक्तों की आराधना एवं तंत्र साधकों की साधना से देवी शीघ्र प्रसन्न हो जाती हैं।
देवी तारा के आविर्भाव के संबंध में ‘कालिका पुराण’ में वर्णित है कि शुंभ व निशुंभ दानवों से पराजय के बाद जब देवतागण हिमालय में जाकर देवी मातंगी का आह्वान करने लगे तो उनके शरीर से महासरस्वती स्वरूप श्वेत वरणवाली कौशिकी के साथ काले वरणवाली काली अथवा उग्रतारा प्रकट हुई थीं। देवी तारा नील वरण की चार भुजाओं वाली होती हैं जिसमें वे तलवार, खप्पर, कटार और नील कमल धारण करती हैं।
धार्मिक ग्रंथों में करूणामयी तथा कल्याणमयी तारा माँ के आठ रूपों की चर्चा है जो उग्र तारा, नील सरस्वती, एकजटा भवानी, महोग्रा, कामेश्वरी, चामुण्डा, वज्र और भद्रकाली आदि नामों से भी जानी जाती हैं। वशिष्ठ मुनि द्वारा पूजित होने के कारण माँ का एक नाम वशिष्ठ आराधित तारा भी है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वशिष्ठ मुनि ने तारा मंदिर के निकट द्वारिका नदी के तट पर स्थित श्मशान में तारा माँ की आराधना की थी जिसके कारण ये वशिष्ट आराधित तारा के नाम से भी जानी जाती हैं।  स्थानीय परम्परा के अनुसार मुनि वशिष्ठ ने इस स्थान को इस कारण अपनी साधना के लिये चुना क्योंकि इसकी प्रसिद्धि सिद्ध पीठ के रूप में थी।
बताते हैं कि वशिष्ट मुनि ने यहां कठोर तपस्या करते हुए 3 लाख तारा मंत्रों के जाप किये थे जिससे प्रसन्न होकर देवी उनके समक्ष प्रकट हुई। वशिष्ठ के अनुरोध पर देवी ने उन्हें भगवान शिव को दुग्ध-पान कराते हुए मातृ स्वरुप में दर्शन दिये जिसके उपरांत वे शिलामूर्ति में परिवर्तित हो गईं। बाद में द्वारिका नदी के तट पर स्थित श्मशान, जहां वशिष्ट मुनि ने तपस्या की थी,  से प्राप्त तारा माँ की शिलामयी प्रस्तर मूर्ति को मुख्य तारा मंदिर में लाकर प्रतिष्ठित किया गया है जिसके ऊपर देवी की चांदी की मुखाकृति आवेष्ठित कर दी गई है जिसका दर्शन-पूजन श्रद्धालुगण करते हैं। प्रतिदिन देर रात्रि में भक्तों को देवी तारा के शिलारुप का दर्शन कराया जाता है।
देवी के द्वारा मातृरूप में भगवान शिव के दुग्धपान कराने का प्रसंग पौराणिक समुद्र मंथन की घटना से जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि समुद्र मंथन से निकले विष का पान करने से जब उसकी ज्वाला से वे विह्वल हो उठे, तो देवी पार्वती ने उनको मातृस्वरूप धारण कर दुग्धपान कराया था जिसके पश्चात उनके कंठ की ज्वाला शांत हुई थी। जिस मंदार पर्वत से समुद्र मंथन किया गया था, वो तारापीठ से करीब 137 कि.मी. (वाया दुमका-हंसडीहा) पर बौंसी ( बांका जिला, बिहार) में अवस्थित है। मुख्य तारा मंदिर के निकट स्थित श्मशान में वशिष्ठ मंदिर तथा पंचमुंडी मंदिर निर्मित है जहां साधना करते साधकों को देखा जा सकता है। जाने-माने इतिहासकार विलियम डेलरिंपल ने भी अपनी पुस्तक ‘नाईन लाइव्स: द लेडी ट्वीलाईट’ में तारापीठ की अलौकिक कहानियों के उल्लेख किये हैं।
हिंदू धर्मावलंबियों की तरह बौद्ध धर्म में भी देवी तारा का  महात्यम है। बौद्ध धर्म में भी ये शाक्त देवी के रूप में पूजी जाती हैं। बौद्ध धर्म में शाक्त धर्म से ही देवी तारा का प्रवेश हुआ है। ‘डेवलपमेंट ऑफ बुद्धिस्ट आईकोनोग्राफी इन इस्टर्न इंडिया’ में मल्लार घोष कहते हैं कि तारा का आविर्भाव पुराणों में वर्णित देवी दुर्गा से हुआ है। वे शाक्त धर्म के साथ बौद्ध धर्म में भी दश महाविद्याओं में एक मानी जाती हैं।
बौद्ध धर्म की तिब्बती मान्यताओं में आर्यतारा महायान में नारी बोधिसत्व और वज्रयान में नारी बुद्ध के रूप में पूजित हैं जो मुक्ति व सफलता प्रदान करती हैं। कतिपय मूल बौद्ध ग्रंथों में तारा को सभी तथागतों की माता बताया गया है। तिब्बती बौद्ध धर्म में श्वेत तारा और हरित तारा की विशिष्ट मान्यता है। वज्रयान और तंत्रयान के विशिष्ट केंद्र के रूप में प्रसिद्ध विक्रमशिला बौद्ध महाविहार के आचार्य दीपंकर श्रीज्ञान अतिश की आराध्य देवी तारा ही थीं।
मां तारा के अनन्य भक्त बामाखेपा अर्थात बामदेव का उल्लेख किये बिना तारापीठ की चर्चा अधूरी है। कहते हैं उन्हें माँ का दर्शन प्राप्त हुआ था। तारापीठ में माँ के मंदिर परिसर में ही बामदेव का भी मंदिर है। ऐसा विरले होता है कि एक ही स्थान पर भक्त के साथ उनके भगवान की भी पूजा होती हो।
तारापीठ का मुख्य मंदिर अत्यंत भव्य और आकर्षक है तथा बंगाल की पारम्परिक चाला रीति में निर्मित है। लाल सुर्ख ईंटों से बने इस मंदिर की दीवारों पर विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियों के अलावा रामायण के प्रसंग भी अंकित हैं।
यह उन दिनों की बात है जब तारापीठ नाटोर स्टेट के अन्तर्गत आता था जो तत्कालीन पूर्व बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) में पड़ता था। 34 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले डेढ़ करोड़ के राजस्व वाले नाटोर स्टेट की रानी भवानी  कुशल शासक के साथ बहुत ही धार्मिक स्वभाव की थी और मां तारा के मंदिर के निर्माण, जीर्णोद्धार तथा प्रबंधन-व्यवस्था में उनका विशेष योगदान था।  वाराणसी के प्रसिद्ध दुर्गा कुंड मंदिर के अलावा  जैसोर जिला गजेटियर में ओ’ मोली बताते हैं कि रानी भवानी ने 380 मंदिरों तथा धर्मशालाओं के निर्माण करवाये थे।
बामाखेपा एक सिद्ध तांत्रिक  थे तथा मंदिर के बगल में स्थित श्मशान रहते थे। बामा मां के रूप में देवी तारा की आराधना करते थे तथा उनके साथ पुत्रवत उन्मुक्त व्यवहार करते थे जिसके कारण मंदिर के पुजारी उन्हें बीच-बीच में प्रताड़ित करते रहते थे।
इस संबंध में अपनी पुस्तक में डेविड आर.किंसले एक घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं कि एक बार बामा ने तारा मां को भोग लगाने के पहले ही प्रसाद उठाकर खा लिया जिससे क्रोधित होकर पुजारियों ने उन्हें मंदिर से निकाल बाहर कर दिया। मां के वियोग में बामा बगल के श्मशान में एक  पेड़ के नीचे मां की रट लगाते हुए विलाप करने लगे।
कहते हैं अपने पुत्र की इस दशा से मां तारा ने विह्वल होकर नाटोर स्टेट की रानी को स्वप्न दिया है कि मेरा पुत्र श्मशान में भूखा पड़ा है, तो मैं तुम्हारा भोग कैसे स्वीकार कर सकती हूं, पहले उसको भोजन दो। देवी के आदेश का रानी ने तत्काल पालन किया और तब से देवी को भोग लगाने के पूर्व बामा को भोजन देने की परिपाटी चल पड़ी। ऐसी मान्यता है कि मां तारा ने बामा खेपा को दर्शन दिये थे।
तारापीठ में मुख्य मंदिर के सामने एक पोखर है जो जीवंतो पोखर कहलाता है। कहते हैं एक व्यापारी का मृत पुत्र इस पोखर में स्नान कराने से जी उठा था। तारा पीठ में पूजा करने के पूर्व भक्तगण इस सरोवर में स्नान करते हैं। हाल ही में सरकार ने पूरे तारापीठ के साथ इस पोखर का सौन्दर्यीकरण कराया  है जिससे यहां की खूबसूरती काफी बढ़ गयी है।
माँ तारा को जवा, कमल और नीले फूल अत्यंत प्रिय हैं, इस कारण श्रद्धालुगण इन्हें आवश्यक रूप से माँ को अर्पित करते हैं। ऐसे तो यहां साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है, किंतु शनिवार और रविवार-सोमवार को माँ तारा का दर्शन-पूजन परम आनन्ददायक तथा फलदायी माना जाता है।(विनायक फीचर्स)