कुछ राज्यों में, लोग अपने घरों को गाय के गोबर से भी सजाते हैं और इस प्रक्रिया को ‘लिपाई’ कहा जाता है।
सड़क पर मरे हुए गौ वंश के चलते आपस में टकराए कई वाहन एक की मौत
हाथरस: सिकंदराराऊ कोतवाली क्षेत्र में राष्ट्रीय राज मार्ग पर देर रात गांव जिमिसपुर के निकट मरे हुए गौ वंश की वजह से बड़ा हादसा हो गया. इस दौरान एक के बाद एक कई वाहन आपस में टकरा गए. हादसे में एक महिला की मौके पर ही मौत हो गई. विभिन्न वाहनों के 11यात्री घायल हो गए. पुलिस ने मृतिका के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा है. वहीं, घायलों को इलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया है.
दिवाली त्योहार के बाद सभी को अपने काम, ड्यूटी एवं अपने गंतव्य पर पहुंचने की जल्दी है. जिसके चलते बीती रात सिकंदराराऊ कोतवाली क्षेत्र के गांव जिमिसपुर के निकट एक ट्रक ने सड़क पर एक गौवंश को टक्कर मार दी थी. गौवंश सड़क पर पड़ा था. इस गौवंश से हरदोई से परिवार को ला रहा ऑटो और थ्री व्हीलर टकरा गया. वहीं उसके पीछे से आ रही हुंडई की एक कार और इको कार भी आपस में टकरा गई.
हादसे में हुंडई कार सवार एक महिला सुनीता देवी की मौके पर ही मौत हो गई. दुर्घटनाग्रस्त हुए वाहनों में 11 लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं. सूचना पर पहुंची पुलिस ने सभी घायलों को एंबुलेंस की मदद से सिकंदराराऊ के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया. जहां घायलों को प्राथमिक उपचार दिया गया. प्राथमिक उपचार देने के बाद 6 से 7 लोगों को हायर सेंटर रेफर किया गया है.
फर्रुखाबाद से नोएडा जा रहे हैं शिव प्रताप सिंह ने बताया, कि गाय बीच में मरी पड़ी थी. टेंपो का एक्सीडेंट हुआ था. जब उन्होंने गाड़ी साइड में रोकी वह और जीजा कार से बाहर निकाल कर आए. मां को निकालने को ही दे तभी पीछे से ही ईको वाले ने टक्कर मार दी. इस हादसे में उनकी मां की मौत हो गई.
सीओ श्यामवीर सिंह ने बताया, कि इस सड़क हादसे में एक महिला की मौत हुई है. जबकि 11 लोग घायल हुए हैं. घायलों में 6 से 7 लोगों को अलीगढ़ और एटा रेफर किया गया है.
गौपालकों के लिए सरकार10 हजार रुपए इनाम देने जा रही है
सुल्तानपुर: गौपालकों के लिए सरकार द्वारा खुशखबरी आई है. प्रगतिशील पशुपालक योजना के तहत अब सरकार गौपालकों को 10 हजार रुपए इनाम देने जा रही है. तो आईए जानते हैं कि इसके लिए कौन से लोग पात्र हैं और उनके द्वारा कहां और कैसे आवेदन किया जाएगा. इसके साथ यह भी जानेंगे कि इस योजना का लाभ लेने के लिए कौन-कौन से डॉक्यूमेंट लगेंगे.
इस प्रजाति की गायों पर मिलेगा लाभ
प्रगतिशील पशुपालक प्रोत्साहन योजना के तहत उन किसानों को लाभ मिलेगा जो डेयरी चलाते हैं अथवा उन्नत नस्ल एवं उच्च उत्पादकता वाली देसी गायों को पालें हैं. इसके लिए उन्हें सरकार द्वारा 10 से 15 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाएगी. इससे सुल्तानपुर जिले के पशुपालकों को इस योजना का लाभ मिल सकेगा.
क्या होनी चाहिए पात्रता
नंद बाबा दुग्ध मिशन के अंतर्गत चलाई जा रही है प्रगतिशील पशुपालक योजना में वे लोग पात्र हैं, जिनके पास अच्छे उत्पादकता वाली देसी गाय हैं. लोकल 18 से बातचीत के दौरान मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर अशोक कुमार तिवारी ने बताया कि वह लोग जिनके पास देसी गाय हैं और 24 घंटे में 10 से 12 लीटर दूध देती हैं, उनको इस योजना के तहत प्रोत्साहन राशि सरकार द्वारा दी जाएगी. मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि इसके लिए गाय की फोटो, आधार कार्ड और चार बार दुहान की फोटो लगेगी. 15 सितंबर से आवेदन लिए जा रहे हैं और 15 नवंबर तक लिए जाएंगे. अगर कोई पशुपालक इस योजना का लाभ लेना चाहता है, तो वह निर्धारित मानदडों के तहत अपने नजदीकी पशु चिकित्सा केंद्र पर डॉक्यूमेंट के साथ आवेदन कर सकता है.
पौराणिकता, धार्मिकता, लोक संस्कृति, और प्रकृति की आराधना से परिपूर्ण छठ पर्व*
स्मृति शेष *मौन हुई लोक संगीत की मुखर गायिका शारदा सिन्हा
उनकी पहचान हिंदी सिनेमा की पार्श्व गायिका के रूप में भी है। अपने प्रशंसकों के बीच ‘ बिहार की समृद्ध लोक परंपराओं को राज्य की सीमाओं से बाहर भी लोकप्रिय बनाने वालीं शारदा सिन्हा के कुछ प्रमुख गीतों में ‘‘छठी मैया आई ना दुआरिया’’, ‘‘कार्तिक मास इजोरिया’’, ‘‘द्वार छेकाई’’, ‘‘पटना से’’, और ‘‘कोयल बिन’’ शामिल थे। इसके अलावा उन्होंने बॉलीवुड फिल्मों में भी गाना गया था। इनमें ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर- टू’ के ‘तार बिजली’, ‘हम आपके हैं कौन’ के ‘बाबुल’ और ‘मैंने प्यार किया’ के ‘कहे तोसे सजना ये तोहरी सजनिया’ जैसे गाने शामिल हैं।
उनकी आवाज में विरह है, मिठास है, सुकून है, माटी का सुखद एहसास है। इसी कारण से भौतिक रूप में न रहने के बावजूद लाखों-करोड़ों संगीत प्रेमियों की आत्मा में बसती हैं। खासकर, बिहार में। बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में शायद ही कोई ऐसा घर हो जहां विवाह, उपनयन या मुंडन संस्कार में शारदा सिन्हा की मौजूदगी न हो। अपने दमदार व पारंपरिक गीतों के माध्यम से मौजूदगी। कड़वा सच है कि आज बिहार, यूपी ही नहीं, राजस्थान में भी लोक गीतों का प्रचलन खत्म होेने को है, जबकि इन लोकगीतों में हमारे प्राण बसते हैं।
अपने स्पन्द-प्रदायी कोकिला-कंठ से लोकधुन और लोक-परंपराओं को उन्होंने अप्रतिम ऊँचाई प्रदान की। वे अब किसी मंच पर गाती हुईं दिखाई नहीं देंगी, किन्तु जब तक पृथ्वी पर सूर्योपासना का यह महापर्व होता रहेगा, शारदा जी अनन्त काल तक अपने स्वर में जीवित रहेंगी।
जिस आवाज़ से छठ की शुरूआत हुआ करती थी, वही आवाज़ छठ के शुरू होते ही ख़ामोश हो गई। शारदा सिन्हा जी अब हमारे बीच नहीं हैं। शारदा सिन्हा ने अपनी गायकी से ऐसी सामूहिकता का सृजन किया जिसे पहचानने के लिए ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना नहीं पड़ता है बल्कि चुपचाप अपने भीतर महसूस करना होता है। उनके गीत छठ का हिस्सा हैं। कहते हैं छठ में कुछ भी बाहरी परिवर्तन नहीं हुआ, जो पुराना है वही चला आ रहा है सिवाय शारदा सिन्हा के छठ गीतों के। क्या कोई छठ को शारदा सिन्हा की आवाज़ से अलग कर सकता है? इन्हीं दिनों उनके गीत लाउड स्पीकर पर बजने लगते हैं। खेत, खलिहानों और नदी किनारे बने घाटों से आ रही उनकी आवाज़ गांव-घर बुलाने लग जाती थी। शारदा सिन्हा की आवाज़ बिहार जैसे ग़रीब राज्य को समृद्ध बनाती थी। आज बिहार की समृद्धि थोड़ी कम हो गई।
जब भी भारत के गाँवों में, विशेषकर बिहार और पूर्वांचल में, कोई मंगल अनुष्ठान होगा, उनके गाए गीतों के स्वर शताब्दियों तक हमारे मन-प्राण को झंकृत करते रहेंगे!
शारदा सिन्हा ने करीब 50 साल पहले यानी साल 1974 में पहला भोजपुरी गाना गाया था।लेकिन इसके बाद उनका संघर्ष जारी रहा। फिर साल 1978 में उन्होंने छठ गीत ‘उग हो सुरुज देव’ गाया। इस गाने ने रिकॉर्ड बनाया और यही से शारदा सिन्हा और छठ पर्व एक दूसरे के पूरक हो गए। करीब 46 साल पहले गाए इस गाने को आज भी छठ घाटों पर सुना जा सकता है।
शारदा सिन्हा के छठ पूजा में।गाए गीत लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं।शारदा सिन्हा ने छठ पूजा पर कई लोक और पारंपरिक गीत गाए। उनके गीतों के बगैर तो छठ पर्व अधूरा होता है और छठ पूजा भी। छठ में सूप,डाला और ठेकुआ की तरह जरूरी है शारदा सिन्हा के छठ गीत।उन्होंने भोजपुरी, मगही, बज्जिका और मैथिली जैसी भाषाओं में कई छठ गीत गाकर छठ पर्व को भक्ति और उत्साह से भर दिया।उनके छठ गीतों में बिहार की माटी की सोंधी सुगंध, भाव और भक्ति विभोर करने वाले शब्द होते थे।उनके छठ गीतों में हे दीनानाथ (सूर्य देव) और छठी मैया की पुकार होती थी, सुहाग और संतान रक्षा की मुराद होती थी।
उनके चेहरे पर मासूमियत और कंठ में सरस्वती विराजमान थीं। वे प्रशिक्षित शास्त्रीय गायिका थीं, जिन्होंने अपने कई गीतों में लोक संगीत का मिश्रण किया। उन्हें अक्सर ‘मिथिला की बेगम अख्तर’ कहा जाता था। वह हर साल छठ पर्व पर एक नया गीत जारी करती थीं। बिहार कोकिला’ के नाम से मशहूर एवं सुपौल के हुलास गाँव में 1 अक्टूबर 1952 को जन्मीं सिन्हा छठ पूजा एवं विवाह जैसे अवसरों पर गाए जाने वाले लोकगीतों के कारण अपने गृह राज्य बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मशहूर थीं।
उनके पिता सुखदेव ठाकुर शिक्षा विभाग में अधिकारी थे। वे अपने पिता को पहला गुरू मानती थीं। उन्होंने आरंभ से ही प्रोत्साहन और हौसला दिया। गाँव के नाटक में पहली बार उन्होंने सरस्वती वंदना का गीत गाया था। बचपन से ही उन्होंने संगीत को जीवन बना लिया था। शुरूआती दौर में संगीत सीखने को लेकर मां नाराज थीं। उनके पिता बहुत बडे़ विद्वान और दूरदर्शी थे। उनका मानना था कि बच्चों का रूझान जिस ओर हो,उसे उसी दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इस दौरान गाना बहुत ही चुनौतीपूर्ण था। स्टेज पर लड़कियों के गाना गाने को लेकर समाज का नज़रिया प्रगतिवादी नहीं, बल्कि रूढ़िवादिता से ग्रस्त था। तमाम विरोधों को झेलते हुए पिता ने गाँव के कार्यक्रम में गाने की इजाजत दी।
पिता ने रूढ़िवादिता से ग्रस्त लोगों को दो टूक लहजे में कहा-” आपको शरम आती है तो आप घरों में बैठिए, उसने सीखा है तो आगे बढ़ने का अवसर तो मिलना चाहिए।” इनके पिता ने अपनी बेटी के संगीत प्रेम को बचपन में ही पहचान लिया और ट्रेनिंग शुरू करा दी। घर पर ही इन्हें संगीत की शिक्षा मिलने लगी। हालांकि, पढ़ाई भी साथ-साथ जारी रही। उन्होंने नहीं समझा होता तो आज शारदा सिन्हा नहीं होती। नाटकों के एक दृश्य से दूसरे दृश्य के बीच का जो अंतराल होता था, उस बीच वह गाती थीं।
उन्होंनें स्टेज पर पहला पहला गाना ‘जय जगदीश्वरी मातु सदा पालनहारी’ गाया ।शादी के बाद उनकी गायकी को लेकर ससुराल में आपत्ति हुई लेकिन उनके पति ने उनका साथ दिया और संगीत साधना में रमी रहीं।सिन्हा ने 1970 के दशक में पटना विश्वविद्यालय में साहित्य का अध्ययन किया और उसी दौरान उनके मित्रों और शुभचिंतकों ने उन्हें गायन के प्रति अपने जुनून को निखारने के लिए प्रेरित किया था। बार-बार उनको इस तरह की सलाह मिलती थी, खुद उनकी भी संगीत के प्रति रुचि भी उनको आखिरकार एक प्रसिद्ध गायिका बनने की राह दिखाती चली गयी।
उन प्यार और समर्थन से ही उन्होंने गायन के प्रति अपने जुनून को आगे बढ़ाया और जल्द ही प्रसिद्धि उनके पीछे-पीछे चली गई। बकौल शारदा सिन्हा “हमारी शादी 1970 के दशक में हुई थी और मेरे ससुराल का घर मेरे अपने घर से काफी अलग था… जहां घर पर भजन गाना ठीक था, मेरे ससुराल की महिलाओं को सार्वजनिक रूप से गाने की अनुमति नहीं थी।”लेकिन उनके ससुर और पति बृजकिशोर सिन्हा ने उनका पूरा समर्थन किया। ससुर की प्रेरणा से उन्हें ठाकुरबाड़ी में भजन गाने का मौका मिला, जिससे उनके संगीत का सफर फिर से शुरू हो पाया। उनके ससुर से जुड़ा एक किस्सा काफी लोकप्रिय है, जब शारदा जी ने सिर पर पल्लू लेकर तुलसीदास जी का भजन मोहे रघुवर की सुधि आई गाया। गाने के बाद समारोह स्थल पर मौजूद उनके ससुर सहित सभी लोगों ने उन्हें आशीर्वाद दिया।
शारदा सिन्हा बिहार के बेगूसराय की रहने वाली थीं। बेगूसराय शारदा सिन्हा का ससुराल था। उनके पति बृजकिशोर सिन्हा भी शिक्षा विभाग में ही काम करते थे।
शारदा सिन्हा लोक गायिका के साथ-साथ समस्तीपुर कॉलेज में प्रोफेसर भी थीं।दोनों पति-पत्नी सेवानिवृत्ति के बाद दिल्ली से सटे इंदिरापुरम में अपने बेटे के साथ सालों से रह रहे थे।
उन्होंने दरभंगा स्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से संगीत में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की और साथ ही लोक गायिका के रूप में अपनी पहचान भी बनाई। इसके बाद फिल्म जगत में भी सिन्हा को पहचाने जाना लगा।
शारदा सिन्हा ने 1990 की मशहूर बॉलीवुड फिल्म ‘‘मैंने प्यार किया’’ में ‘‘कहे तोसे सजना’’ गीत गाया था और लोगों ने इस गाने को बहुत ज्यादा पसंद किया था। इस फिल्म में सलमान खान ने मुख्य भूमिका निभायी थी। शारदा सिन्हा इसके बाद और ज्यादा लोकप्रिय हो गईं और उन्होंने अपनी आवाज के माध्यम से लोक संगीत की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाना जारी रखा। हालांकि उन्होंने इस बात का ध्यान भी रखा कि वह कभी भी घटिया और द्विअर्थी गीत न गाएं।
शारदा सिन्हा को उनके संगीत योगदान के लिए कई पुरस्कार मिले, जिनमें 1991 में पद्मश्री, 2000 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2006 में राष्ट्रीय अहिल्या देवी अवार्ड, 2015 में बिहार सरकार पुरस्कार और 2018 में पद्मभूषण शामिल हैं।(विनायक फीचर्स)
छत्तीसगढ़ में गौवंशों के लिए CG में बनेगा 154 एकड़ में अभ्यारण्य
गौवंशों के लिए CG में बनेगा 154 एकड़ में अभ्यारण्य
Cow Sanctuary: छत्तीसगढ़ में गौवंशों को बचाने के लिए प्रदेश सरकार ने गौ-अभ्यारण योजना बनाई गई है. इस योजना का मुख्य उद्देश्य सड़कों पर घूमते गौवंशों को एक निश्चित जगह देना है, जहां इनको सुरक्षित और संरक्षित रखा जा सके. कुल 4 जिलों को इस योजना के लिए चिन्हांकित किया गया है, जिसमें बिलासपुर जिला भी शामिल है.
राजधानी रायपुर के बाद बिलासपुर शहर छत्तीसगढ़ का दूसरा सबसे बड़ा शहर है, जहां सड़कों पर घूम रहे आवारा मवेशियों के कारण सड़कों पर दुर्घटनाएं लगातार होती रहती हैं, जिससे सड़क पर चलने वाले मुसाफिरों और गौ वंश सड़क दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं.
सड़कों को मवेशी मुक्त बनाने के लिए गौ-अभ्यारण का निर्माण
जिले की सड़कों को मवेशी मुक्त बनाने व आवारा मवेशियों के उचित प्रबंधन के लिए गौ अभ्यारणों की निर्माण की जाएगी. गौ अभ्यारण्य के विषय में जानकारी देते हुए बिलासपुर कलेक्टर अविनाश शरण ने कहा कि बिलासपुर के कोटा ब्लॉक के जोगीपुर ग्राम में गौ अभ्यारण्य प्रस्तावित है जिसे लेकर 154 एकड़ जमीन को चिन्हित किया गया है.
154 एकड़ गौ अभ्यारण्य में रखा जा सकेगा एक हज़ार गौ वंश
उन्होंने बताया कि जिले में गौ अभ्यारण्य निर्माण के लिए शीघ्र ही पशुपालन विभाग को हस्तांतरित किया जाएगा. बिलासपुर में बनाए जाने वाले 154 एकड़ गौ अभ्यारण्य में लगभग एक हज़ार गौ वंशों को रखा जा सकेगा, जिसमें उनके इलाज और भोजन की समुचित व्यवस्था की जाएगी, इसके लिए बकायदा गौ पालक या चरवाहा की नियुक्ति भी की जाएगी.
महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्र बिंदु बने उद्धव ठाकरे*
आज महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे चर्चित नाम है उद्धव ठाकरे। खासकर पिछले पांच साल से जैसी राजनीति महाराष्ट्र में चल रही है उसके कारण उद्धव ठाकरे आज महाराष्ट्र में वही हैसियत रखने लगे हैं जो एक वक्त देश की राजनीति में चंद्रशेखर रखते थे। भारत के इस पूर्व प्रधानमंत्री के बारे में कहा जाता था कि “देश में यदि प्रधानमंत्री पद का सीधा चुनाव हो तो चंद्रशेखर ही जीतेंगे” यह उनके चार महीने के प्रधानमंत्रित्व काल की वजह से जनता में बनी उनकी छवि का नतीजा था। आज ऐसी ही छवि महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की बन चुकी है। यही कारण है कि जितने भी सर्वे अभी तक आए हैं उनमें सीएम के रूप में लोगों की पहली पसंद उद्धव ही हैं। उद्धव की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण तो यही है कि वे बाला साहेब ठाकरे के बेटे हैं ।
उनके प्रति लोगों की सिम्पैथी भी है और उनके ढ़ाई साल के शासन काल से भी लोग संतुष्ट थे। हालांकि पालघर की घटना ने उनके शासन पर एक बड़ा दाग लगाया लेकिन इसमें उद्धव सीधे तौर से शामिल हैं ऐसा आरोप लगाने से विपक्ष भी पूरी तरह से बचता रहा। आमतौर पर उद्धव की जो छवि बनाई गई है उसके अनुसार उनको एक अच्छा राजनीतिज्ञ नहीं माना गया है लेकिन यह ज्यादातर दिल्ली और उत्तर भारत की धारणा है जो उद्धव को न तो नजदीक से जानते हैं और न ही निष्पक्ष बात करते हैं ।
वे उद्धव को उत्तर भारत का विरोधी बताते हुए उन्हें हिंदू विरोधी भी बताने की कोशिश करते हैं । यही कारण है कि महाराष्ट्र की राजनीति और मराठी जानमानस की सही तस्वीर पूरी तरह देश के सामने आ ही नहीं पाती और फिर बीजेपी के लोग भी उद्धव की जो छवि पेश करते हैं, उसमें पूरी तरह खुद को पाक साफ और उद्धव को गलत बताते हैं साथ ही उद्धव को एक अयोग्य नेता करार देते हैं। इसी गलतफहमी में बीजेपी ने लोकसभा में महाराष्ट्र गंवा दिया वरना आज बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिल चुका होता। बीजेपी उद्धव को एक अयोग्य नेता बताती रही लेकिन इसी अयोग्य नेता के कारण महाराष्ट्र में बीजेपी को बाइस सीटों का नुकसान उठाना पड़ा और उद्धव के कारण ही महाराष्ट्र में कांग्रेस भी पुनर्जीवित हो गई ।
उद्धव ठाकरे असल में वो नहीं है जो उत्तरभारत का मीडिया दिखाता है या अलगाव के बाद बीजेपी जैसा उनको बताने लगी है बल्कि उद्धव एक सुलझे हुए नेता हैं। उद्धव भी अपने पिता की तरह स्ट्रेटफॉरवर्ड हैं । उनकी कथनी और करनी में ज्यादा फर्क नहीं होता जबकि आजकल की राजनीति में कहा कुछ जाता है और किया कुछ जाता है । अब नेतागण चुनाव के वक्त कुछ और बात करते हैं और शपथ लेने के बाद कुछ और बोलते हैं । ऐसे माहौल में सीधी बात करने वाले लोग मिसफिट होते हैं यही उद्धव के साथ हो रहा है जबकि उनके सामने एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस की कथनी और करनी में फर्क स्पष्ट दिखाई देता है।
शिंदे हिंदुत्व के नाम पर सरकार भी बनाते हैं और मजार पर चादर भी चढ़ाते हैं। ईमानदारी की बात भी करते हुए खुद को एक ऑटो वाला भी बताते हैं लेकिन चुनावी हलफनामे में करोड़ों की संपत्ति भी दिखाते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ तीखे शब्द बोलने वाले शिंदे जी की संपत्ति पिछले पांच साल में तीन गुना कैसे बढ़ गई ? लेकिन आज की राजनीति है ही ऐसी कि कहा कुछ जाए और किया कुछ और जाए इसीलिए ज्यादातर नेता मीडिया के सामने बहुत सज्जन और मीठे नज़र आते हैं जबकि उनकी कार्यशैली एकदम विपरीत होती है ।
उद्धव ठाकरे मीडिया में भी खुलकर बोलते हैं और काम भी खुलकर करते हैं ,यही ट्रेनिंग उनको बाला साहेब से मिली है। एक बार पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने कहा भी था कि शिंदे की चाल को उद्धव इसलिए नहीं समझ पाए क्योंकि उद्धव की ट्रेनिंग बाला साहेब ठाकरे के अंडर में हुई है,यदि उद्धव ने शरद पंवार जी से राजनीति सीखी होती तो शिंदे को पहली बार में ही समझ जाते, शिंदे को दूसरी बार बगावत का मौका ही नहीं देते।”बाला साहेब के स्कूल में डबल स्टेंडर्ड का काम नहीं था न धोखे का और न ही बात छुपाने का ।
जो भी बात मन में है वो सामने बोलो यही नियम था बाला साहेब की पार्टी में। जब उद्धव को शिवसेना का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था तब बाला साहेब ने राज ठाकरे से पूछा था कि उद्धव के अध्यक्ष बनने से तुम्हें कोई दिक्कत है क्या या तुम खुद अध्यक्ष बनना चाहते हो ?जो भी बात हो साफ साफ बोलो तब राज ठाकरे ने भी उद्धव का विरोध नहीं किया था लेकिन बाद में बग़ावत कर बैठे । बाला साहेब का भरोसा उद्धव पर ज्यादा था, इसलिए नहीं कि उनको पुत्रमोह था बल्कि इसलिए कि वे राज और उद्धव दोनों की क्षमताओं को जानते थे। शिवसेना में आपसी विवाद होने पर बाला साहेब ने कहा भी था कि “मैं धृतराष्ट्र नहीं हूं बल्कि वही कर रहा हूं जो सही है,वर्तमान समय में उद्धव ही बेहतर है” और बाला साहेब का निर्णय गलत नहीं था। राज एक बेहतरीन वक्ता हैं बिल्कुल बाला साहेब की दूसरी कॉपी लेकिन मैनेजमेंट के मामले में उद्धव बहुत आगे हैं ।
उद्धव ज्यादा बोलते नहीं हैं लेकिन चुप रहकर अपना काम करते रहते हैं,मेहनती भी ज्यादा हैं,राजनीति में ऐसा ही नेता बेहतर साबित होता है जिसका मैनेजमेंट बेहतर हो सिर्फ भाषण नहीं। उद्धव ठाकरे अब तो भाषण भी अच्छा देते हैं,इस बार के विधान सभा चुनाव में उनके भाषण बहुत पसंद किए गए थे जो सोशल मीडिया में भी बहुत पॉपुलर हुए और मैनेजमेंट भी उनका ऐसा है कि अपने छोटे बड़े सभी कार्यकर्ताओं से पर्सनली बात करते हैं । यदि कहीं कोई कार्यकर्ता किसी कारण नाराज़ है तो उससे फोन पर चर्चा करके मसला जरूर सुलझाते हैं। यही कारण है कि बाला साहब के जाने के बारह साल बाद भी उद्धव ठाकरे प्रासंगिक बने हुए हैं जबकि बड़े बड़े नेता उद्धव का साथ छोड़कर चले गए। उनकी पार्टी भी तोड़ी गई, चुनाव चिन्ह भी छीन लिया लेकिन इसके बाद भी नए चुनाव चिन्ह के साथ उद्धव ने लोकसभा में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया ।
उद्धव ने न केवल खुद ने नौ सीट जीती बल्कि अपने सहयोगी कांग्रेस और NCP को भी मजबूती से वापस खड़ा कर दिया। अभी भी महाराष्ट्र में उद्धव को रैलियों में जो जन समर्थन मिल रहा है वह आश्चर्यचकित करने वाला है । अभी तक उद्धव को जनता का नेता नहीं माना जाता था उन्हें पैराशूट नेता बताते हुए उनके ऊपर आरोप लगाया जाता था कि वे घर से बाहर नहीं निकलते लेकिन पिछले ढाई साल में उद्धव ने घर से बाहर निकलकर ही नई पार्टी खड़ी की और ऐसी जगह भी सभाएं की जहां से उन्हें पहले जान से मारने की धमकियां मिलती थीं।
उद्धव की चाहे कोई कितनी भी आलोचना करे लेकिन उनके जैसे नेता आजकल मिलते नहीं हैं । उद्धव न केवल पढ़े लिखे हैं बल्कि एक ऐसे परिवार से आते हैं जिनके रक्त में भारतीयता कूट कूटकर भरी है,उद्धव को देश के धर्म और कला संस्कृति की भी गहरी समझ है। वे खुद भी बहुत अच्छे फोटोग्राफर रह चुके हैं,आज राजनीति में ऐसे लोगों का ही स्वागत होना चाहिए फिर वो चाहे किसी भी पार्टी के हों किसी भी विचारधारा के हों । हमारे देश में जब दसवीं फेल नेता मुख्यमंत्री या उप मुख्यमंत्री हो सकते हैं फिर पढ़े लिखे और संवेदनशील नेता का विरोध क्यों ? भारत की संस्कृति ही तो इसकी आत्मा है ।
दुनिया में हम अपनी संस्कृति के लिए ही जाने जाते हैं फिर हमारे नेता भी कम से कम ऐसे हों जिनको हमारी संस्कृति की जानकारी हो, इसमें रुचि हो, ठाकरे परिवार के सारे नेता ऐसे ही हैं,राज ठाकरे कार्टूनिस्ट हैं, आदित्य पेंटर हैं तो उद्धव फोटोग्राफर। उद्धव जब मुख्यमंत्री थे तब थियेटर को भी बढ़ावा देते थे और खुद दर्शकों में बैठकर कलाकारों की हौसला अफजाई करते थे।
यह सही है कि उद्धव की पार्टी एक छोटी पार्टी है लेकिन फिर भी वे वर्तमान में महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्रबिंदु हैं,किसी भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में देख लीजिए,यदि सारी पार्टियों के नेता एक मंच पर बैठे हों तो सबसे ज्यादा सवाल उद्धव से ही पूछे जाते हैं और कैमरा भी उन पर ही होता है जबकि वे न तो मुख्यमंत्री हैं न प्रधानमंत्री लेकिन उनका जनता से सीधा जुड़ाव है इसलिए उनको मीडिया कवरेज मिलता है।उनकी बात रोमांच पैदा करती है इसलिए उनको कवरेज मिलता है और उनको कवरेज हमेशा मिलता रहेगा उनके पिताजी की तरह क्योंकि वे उन्हीं के नक्शे कदम पर चल रहे हैं ।
बाला साहेब सत्ता की राजनीति में यकीन नहीं करते थे,इसलिए अब यह बात महत्वपूर्ण नहीं होगी कि उद्धव सेना सत्ता हासिल करेगी या मेकर बनेगी और न ही उद्धव का अब यह टारगेट होगा क्योंकि उनको विपक्ष में बैठने की आदत है । सत्ता के खिलाफ लड़ना उनको विरासत में मिला है इसलिए उद्धव सेना यदि तीस पैंतीस सीट भी हासिल करती है तो भी उनकी राजनीति चलेगी,क्योंकि कम सीट जीतकर भी ज्यादा प्रभाव रखना वे अच्छे से जानते हैं,यह उन्होंने अपने पिता से सीखा है। बाला साहेब भी कभी सत्ता में नहीं रहे कभी सबसे बड़ी पार्टी नहीं रहे लेकिन फिर भी महाराष्ट्र के केंद्र बिंदु थे,आज उद्धव भी वही हैं महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्रबिंदु।(विनायक फीचर्स)
‘ गऊ भारत भारती ‘ का अहमदाबाद संस्करण जल्द ही शुरू होगा
સાવરકુંડલા પંથકમાં ગૌ સેવા માટે સુપ્રસિદ્ધ એવા શિવ દરબાર આશ્રમની મુલાકાત લીધી અને પૂજ્ય ઉષા મૈયાને વંદન કરી તેમના આશીર્વાદ પ્રાપ્ત કર્યા.
આશ્રમમાં ગૌમાતાને ગોળ ખવડાવી ધન્યતા અનુભવી. પૂજ્ય ઉષા મૈયા સાથે આશ્રમ દ્વારા હાથ ધરવામાં આવતી વિવિધ સેવાકીય પ્રવૃત્તિઓ અંગે ચર્ચા કરી. pic.twitter.com/E9phbKGOsh
— Bhupendra Patel (@Bhupendrapbjp) November 5, 2024
मुंबई – राष्ट्रीय समाचारपत्र ” गऊ भारत भारती ” भारत का ऐसा पहला प्रकाशन है जिसे गौ वंश पर आधारित प्रथम समाचारपत्र के तौर पर जाना जाता है। ” गऊ भारत भारती ” गौ वंश के संरक्षण व संवर्धन से जुड़े व्यक्तियों व संस्थाओं की सक्रियताओं व गतिविधियों को प्रमुखता से प्रकाशित करता आ रहा है। इन १० वर्षो में ” गऊ भारत भारती ” अपने छोटे प्रकाशन समूह और सीमित संसाधनों के बावजूद गौवंश को ले कर अप्रतिम व अनुपम सजगता के साथ गौवंश और पर्यावरण बचाओ अभियान को सफलता पूर्वक लोगो तक पहुँचने में सफल रहा है।
अब इसका प्रकाशन डीजिटल और प्रिंट संस्करण जल्द ही अहमदाबाद से शुरू होने जा रहा है। गुजरात के माननीय मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र भाई पटेल से प्रकाशन ने संस्करण के विमोचन के लिए तथा गौ भक्तों के सम्मान के लिए समय के लिए अनुरोध किया है संभवता जल्द ही गऊ भारत भारती को माननीय मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र भाई पटेल का आशीर्वाद मिलेगा और समाचारपत्र का प्रकाशन शुरू हो सकता है।
श्री भूपेंद्र भाई पटेल खुद एक गौ भक्त है अभी हाल ही में उन्होंने अमरेली जिले का दौरा किया जहां मुख्यमंत्री ने सावरकुंडला पंथक में गौ सेवा के लिए प्रसिद्ध स्थान शिव दरबार आश्रम में जा कर श्रद्धेय उषा मैया को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। और गौ सेवा की। बता दे कि भूपेंद्र पटेल सरकार गुजरात में गौवंश पर बहुत अच्छा काम कर रही है , खुद मुख्यमंत्री ने शपथ से पहले गौमाता की पूजा कर के शपथ लिया था।
ज्ञात हो कि ” गऊ भारत भारती ” अपने माध्यम से गौ , गंगा , गीता , गायत्री के मूल मन्त्र को आत्मसात करते हुए इस विषय को जीवित रखने में तत्परता के साथ संघर्ष करते हुए देश में गौ वंश और पर्यावरण के साथ साथ हिन्दू सनातन संस्कृति के प्रचार प्रसार में मुख्य भूमिका निभाते हुए भारत के जनमानस में जागरूकता की ज्वाला जगाते हुए माँ भारती की सेवा कर रहा है।
समाचारपत्र के संपादक और प्रकाशक संजय शर्मा ने बताया कि , पिछले वर्ष १२ से १८ अक्टूबर तक भारत का पहला ” गऊ ग्राम महोत्सव ” – The Festival Of Cows Economy – काऊ बेस इकोनॉमी – अर्थवयवस्था ( Economy ) का पहला Cow Product Exhibition का आयोजन कर प्रकाशन समूह द्वारा एक मंच पर भारत के गौपालकों , किसानों को लाने और काऊ बेस इकोनॉमी के महत्व को बताने का हमारा प्रयास रहा। जिसमे भारत सरकार Animal Welfare Board of India , राष्ट्रीय कामधेनु आयोग , आरआर ग्लोबल , तथा महाराष्ट्र सरकार का भरपूर योगदान रहा।
उन्होंने आगे कहा कि – ” आप को मुझे यह बताते हुए बड़ा हर्ष हो रहा है कि ” गऊ ग्राम महोत्सव ” – The Festival Of Cows Economy – काऊ बेस इकोनॉमी – अर्थवयवस्था ( Economy ) का पहला Cow Product Exhibition के कार्यक्रम का यह परिणाम रहा कि इस से सम्बंधित गैर सरकारी संस्थान इस विषय पर अलग अलग प्रदेशो में कार्यक्रम कर रहे है और गौ आधारित भारतीय अर्थवयवस्था को मजबूती प्रदान कर रहे है।
आज ”गऊ भारत भारती ” अपने सिमित संसाधनों के बावज़ूद भी गौ वंश से उत्पन्न काऊ बेस इकोनॉमी – अर्थवयवस्था ( Economy ) को ले कर बड़े पैमाने पर प्रचार -प्रसार का काम कर रहा है।
आप सभी के आशीर्वाद से अमेरिका, इंगलैंड, डेनमार्क, नार्वे, न्युजीलैंड तक इसकी ख्याति पहुंची। टाइम्स आफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, स्क्रोल, द वायस, मलयाला मनोरमा, मुंबई मिरर, ओपेन, रिपब्लिक वर्ल्ड, महासंवाद, लोकमत टाइम्स, दैनिक भास्कर, लोकसत्ता, मायापुरी आदि पत्र- पत्रिकाओं में गऊ भारत भारती को अभूतपूर्व कवरेज मिली है ।
गऊ भारत भारती मेरे लिए एक समाचार पत्र की बजाय देश सेवा का साधन है। कोरोना काल में गऊ भारत भारती ने माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा स्थापित राष्ट्रीय कामधेनु आयोग के साथ मिलकर एक राष्ट्रीय आनलाइन सेमिनार का आयोजन किया था जिसमें देश भर की 500 से ज्यादा गौशालाओं के संचालक सहभागी हुए थे। उस सेमिनार में तत्कालीन मंत्री गण गिरिराज सिंह, प्रताप सारंगी, संजीव बालियान, प्रमुख सचिव भारत सरकार अतुल चतुर्वेदी ,उपसचिव ओपी चौधरी के साथ राष्ट्रीय कामधेनु आयोग के अजय भट्ट ने भी हिस्सा लिया और अमूल्य मार्गदर्शन प्रदान किया। अब अहमदाबाद के बाद अन्य राज्यों में भी समाचारपत्र का प्रकाशन किया जायेगा जिस से लोगो में गौ माता के प्रति जनजागृति लाई जा सके।
फिल्म लेखक और निर्देशक नीरज सिंह बने उत्तर भारतीय विकास सेना के राष्ट्रीय सचिव
मुंबई। बॉलीवुड के लेखक निर्देशक नीरज सिंह ने सोमवार को उत्तर भारतीय विकास सेना की सदस्यता ग्रहण कर ली है। आगरा में जन्मे नीरज सिंह ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित सुनील शुक्ला के साथ एक विशेष समारोह में इस अवसर पर शामिल होकर पार्टी की आईटी शाखा का दायित्व संभालने की जिम्मेदारी ली है। उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय सचिव (आईटी सेल) नियुक्त किया गया है, और वह पार्टी के डिजिटल अभियानों के नेतृत्व में सहायक होंगे। इस नई भूमिका में नीरज का मुख्य उद्देश्य उत्तर भारतीय विकास सेना की विचारधारा को लोगों तक पहुँचाना और पार्टी की डिजिटल उपस्थिति को मजबूत बनाना होगा।
नीरज सिंह भारतीय फिल्म उद्योग में एक चर्चित लेखक और निर्देशक हैं, जिन्होंने कई शॉर्ट फिल्मों के अलावा सावधान इंडिया और क्राइम अलर्ट जैसे लोकप्रिय टेलीविजन शो में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी चर्चित फिल्म “बिकरू कानपुर गैंगस्टर” गैंगस्टर विकास दुबे के जीवन पर आधारित है, जिसमें उन्होंने लेखन और निर्देशन दोनों का कार्य संभाला है। इस फिल्म में उनकी प्रस्तुति ने दर्शकों और आलोचकों से सराहना बटोरी और उन्हें ग्लोबल ताज इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी दिलवाया।
उत्तर भारतीय विकास सेना के विवादित कदमों के चलते चर्चा में बनी रहती है। हाल ही में पार्टी ने तब सुर्खियाँ बटोरीं जब उसने कुख्यात गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई को आगामी विधानसभा चुनाव लड़ाने का प्रस्ताव दिया। इस संदर्भ में पार्टी ने गुजरात की जेल में बंद बिश्नोई को पत्र भी भेजा। इसके अलावा पार्टी ने हाल ही में मुंबई में उत्तर भारतीय समुदाय के समर्थन में पोस्टर भी लगाए हैं जिनमें लिखा है, “उत्तर भारतियों, बटोगे तो पिटोगे।” इस संदेश के माध्यम से पार्टी ने उत्तर भारतीयों को एकजुट रहने का आह्वान किया है। पार्टी का यह संदेश समाज में जागरूकता लाने के उद्देश्य से साझा किया गया है, लेकिन इसने विभिन्न समुदायों के बीच बहस को जन्म दिया है।

नीरज सिंह का उत्तर भारतीय विकास सेना से जुड़ना फिल्म उद्योग में चर्चा का विषय बन गया है। नीरज ने मुंबई में एक फिल्म निर्देशक और लेखक के रूप में पहचान बनाई है, और उनके कार्यों का व्यापक प्रभाव रहा है। उनके परिवार का निवास आगरा के रामबाग क्षेत्र में है, जबकि नीरज स्वयं मुंबई में सक्रिय हैं।
पार्टी में नीरज सिंह की भूमिका पर बात करते हुए पंडित सुनील शुक्ला ने कहा कि नीरज का फिल्मी अनुभव और उनकी आईटी समझ पार्टी की डिजिटल मुहिम को नए स्तर पर ले जाएगी। उन्होंने कहा, “नीरज जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति का पार्टी से जुड़ना हमारे उद्देश्यों को साकार करने में सहायक होगा।”
अपने इस राजनीतिक सफर की शुरुआत करते हुए नीरज सिंह ने कहा कि उत्तर भारतीय विकास सेना का उद्देश्य मेरे दिल के करीब है। मैं इस पार्टी के जरिए उत्तर भारतीय समुदाय के अधिकारों और उनकी समस्याओं के प्रति जागरूकता फैलाना चाहता हूँ। नीरज का मानना है कि उनका फिल्मी और आईटी अनुभव पार्टी को डिजिटल माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचने में मदद करेगा।
नीरज सिंह का राजनीति में यह प्रवेश उन्हें एक नए स्तर पर स्थापित करने का अवसर देगा। उनकी इस नई जिम्मेदारी से न केवल उत्तर भारतीय विकास सेना को एक प्रभावशाली आईटी विभाग मिलेगा, बल्कि नीरज के निर्देशन का भी नया आयाम सामने आएगा।








