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शौर्य और पराक्रम के प्रतीक प्रकृति को समर्पित भगवान बिरसा मुंडा*

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(कुमार कृष्णन-विभूति फीचर्स)
धरती आबा, महानायक और भगवान, बिरसा मुंडा को ये तीनों नाम यूं ही नहीं मिले। अंतिम सांस तक अंग्रेजों से अध‍िकारों की लड़ाई लड़ने वाले और प्रकृति को भगवान की तरह पूजने वाले बिरसा मुंडा की आज जयंती है।  देश में आज इनकी जयंती को जनजाति गौरव दिवस के तौर पर मनाया जा रहा है। मध्यप्रदेश,छत्‍तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा,‍ बिहार और पश्‍चिम बंगाल के आदिवासी क्षेत्रों में इन्‍हें भगवान की तरह पूजा जाता है।
               धरती आबा बिरसा मुंडा का ‘उलगुलान’भूमि से लेकर धर्म सम्बन्धी तमाम समस्याओं के खिलाफ जनसंघर्ष था तथा उन समस्याओं के खिलाफ राजनीतिक समाधान का प्रयास भी। वह आदिवासी और खासकर मुंडा समाज की आंतरिक बुराईयों और कमजोरियों को दूर करने का सामूहिक अभियान भी था। समाज की परंपरागत प्रकृति निर्भर तत्व ने आर्थिक समाजवाद की अवधारणा को बिरसा के अंदर जागृत किया । गांधी से पहले गांधी की अवधारणा के तत्व के उभार के पीछे भी बिरसा का समाज एवं पड़ोस के सूक्ष्म अवलोकन एवं उसे नयी अतंर्दृष्टि देने का तत्व ही था। तभी तो उन्होंने गांधी के समान समस्याओं को देखा-सुना, फिर चिंतन-मनन किया। उन्होंने मुंडा समाज को पुनर्गठित करने का जो प्रयास किया, वह अंग्रेजी हुकूमत के लिये विकराल चुनौती बनी। नये बिरसाइत धर्म की स्थापना की तथा लोगों को नई सोच दी, जिसका आधार सात्विकता, आध्यात्मिकता, परस्पर सहयोग, एकता व बंधुता था। समस्या के कारणों को ढूढ़ ‘गोरों वापस जाओ’ का नारा दिया एवं परंपरागत लोकतंत्र की स्थापना पर बल दिया, ताकि शोषणमुक्त ‘ आदिम साम्यवाद ’ की स्थापना हो सके।
           1894 में बिरसा मुंडा ने एक ऐसे धर्म की शुरुआत की जो पूरी तरह से प्रकृति को समर्पित था। बिरसाइत धर्म में गुरुवार के दिन फूल, पत्तियां और दातून को तोड़ने पर भी मनाही थी।इस दिन हल चलाने की भी पाबंदी थी। इस धर्म को मानने वालों का एक ही लक्ष्‍य था, प्रकृति की पूजा। इस धर्म के प्रसार के लिए बिरसा मुंडा ने 12 शिष्‍यों को नियुक्‍त किया। इस धर्म को मानने वालेे लोग मांस, मदिरा, तम्‍बाकू और बीड़ी का सेवन भी नहीं कर सकते।
           1857 के स्वतंत्रता आंदोलन के शांत होने के बाद सरदार आंदोलन संगठित जनांदोलन के रूप में शुरू हो गया। 1858 से भूमि आंदोलन के रूप में विकसित यह आंदोलन 1890 में राजनीतिक आंदोलन में तब्दील हो गया, जब बिरसा मुंडा ने इसकी कमान संभाली। बिरसा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को खूंटी जिले के अड़की प्रखंड के उलिहातु गांव में हुआ था। व्यक्तित्व निर्माण और तालीम ईसाई मिशनरियों के संरक्षण में हुई। स्कूली शिक्षा के दौरान बिरसा में विद्रोह के लक्षण प्रकट होने लगे। आदिवासियों में भूतकेता पहनाई आदि की परंपरा है। वे धार्मिक कृत्यों के लिये जमीन छोड़ते हैं। उस समय ईसाई पादरी उस जमीन पर मिशन का कब्जा करने की कोशिश करते थे।  बिरसा ने इसकी शिनाख्त ईसाई मिशनरियों और गोरों की साजिशों के रूप में की और इसकी बेबाक ढंग से आलोचना की, जिस कारण वे स्कूल से निकाल दिये गये।
इसके बाद वे सरदार आंदोलन में शमिल हो गये। ईसाई मिशन की सदस्यता छोड़ 1890-91 से करीब पांच साल तक वैष्णव संत आनंद पांड से हिन्दुओं के वैष्णव पंथ के आचार का ज्ञान प्राप्त किया और व्यक्तिक तथा सामाजिक जीवन पर धर्म के प्रभाव का मनन किया। परंपरागत धर्म की ओर उनकी वापसी हुई और उन्होंने धर्मोपदेश देना तथा धर्माचरण का पाठ पढ़ाना शुरू किया । ईसाई धर्म छोड़नेवाले सरदार बिरसा के अनुयायी बनने लगे। बिरसा का पंथ मुंडा जनजातीय समाज के पुनर्जागरण का जरिया बना । उनका धार्मिक अभियान प्रकारांतर से आदिवासियों को अंग्रेजी हुकूमत और ईसाई मिशनरियों के विरोध में संगठित होकर आवाज बुलंद करने को प्रेरित करने लगा। उस दौर में उनकी लोकप्रियता इस कदर परवान चढ़ी कि उनके अनुयायी ‘बिरसाइत’ कहलाने लगे। उन्होंने सादा जीवन उच्च विचार अपनाने का उपदेश दिया और मुंडा समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और कुरीतियों पर जमकर प्रहार किया । वह जनेउ, खड़ाऊ और हल्दी रंग की धोती पहनने लगे।
उन्होंने कहा कि ईश्वर एक है और वह है सिंगवोंगा। भूत-प्रेत की पूजा और बलि देना निरर्थक है।सार्थक जीवन के लिये सामिष भोजन अथवा मांस-मछली का त्याग करना जरूरी है। हड़िया पीना बंद करना होगा।भगवान बिरसा ने अपनी सुधारवादी प्रक्रिया के तहत सामाजिक जीवन में एक आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने नैतिक आचरण की शुद्धता, आत्मसुधार और एकेश्वरवाद का उपदेश दिया। उन्होंने ब्रिटिश सत्ता के अस्तित्व को अस्वीकारते हुए अपने अनुयायियों को सरकार को लगान न देने का आग्रह किया था। 1894 में अकाल के दौरान भगवान बिरसा ने वनवासि‍यों के लगान माफी के लिए आंदोलन चलाया। उन्होंने नारा दिया “अबुआ राज सतेरे जना, महारानी राज तुण्डु जना”।
बिरसा के लोकप्रिय व्यक्तित्व के कारण सरदार आंदोलन में नई जान आ गयी। अगस्त 1895 में वन सम्बन्धी बकाये की माफी का आंदोलन चला। उसका नेतृत्व बिरसा ने किया। धार्मिक आधारों पर एकजुट बिरसाइतो का संगठन जुझारू सेना की तरह मैदान में उतर गया। बकाये की माफी के लिये उन्होंने चाईवासा तक की यात्रा की तथा रैयतों को एकजुट किया। अंग्रेजी हुकूमत ने बिरसा की मांग को ठुकरा दिया। बिरसा ने भी ऐलान कर दिया कि -‘ सरकार खत्म हो गयी। अब जंगल जमीन पर आदिवासियों का राज होगा। 9 अगस्त 1895 को चलकद में पहली बार बिरसा को गिरफ्तार किया गया, लेकिन उनके अनुयायियों ने उन्हे छुड़ा लिया।16 अगस्त 1895 को गिरफतार करने की योजना के साथ आये पुलिस बल को बिरसा के नेतृत्व में सुनियोजित ढ़ंग से घेरकर खदेड़ दिया। इससे बौखलाई अंग्रेजी हुकूमत ने 24 अगस्त 1895 को पुलिस अधीक्षक मेयर्स के नेतृत्व में पुलिस बल चलकद रवाना किया तथा रात के अंधेरे में उन्हें गिरफ्तार  कर लिया गया।
उन पर यह आरोप लगाया गया कि लोगों को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह करने के लिये उकसा रहे थे। मुंडा और कोल समाज ने बिरसाइतों के नेतृत्व में सरकार के साथ असहयोग करने का ऐलान कर दिया। व्यापक विरोध के कारण मुकदमा चलाने का स्थान रांची से बदलकर खुंटी कर दिया गया, लेकिन विरोध के तेवर में फर्क नहीं पड़ने के कारण मुकदमें की कार्रवाई रोककर तुरंत जेल भेज दिया गया। भा़दवि की धारा 505 के तहत मुकदमा चला तथा उन्हें दो साल सश्रम कारावास की सजा सुनायी गयी। उन्हें रांची से हजारीबाग जेल भेज दिया गया। 1897 में झारखंड में भीषण अकाल पड़ा तथा चेचक की महामारी भी फैली। आदिवासी समाज बिरसा के नेतृत्व के अभाव में भी  दमन-शोषण, अकाल तथा महामारी से एकसाथ जूझता रहा। 30 नवम्बर 1897 को बिरसा जेल से छूटे तथा चलकद लौटकर अकाल तथा महामारी से पीड़ित लोगों की सेवा में जुट गये। उनका यह कदम अपने अनुयायियों को संगठित करने का आधार बना। फरवरी 1898 में डोम्बारी पहाड़ी पर मुंडारी क्षेत्र से आये मुंडाओं की सभा में उन्होंने आंदोलन की नई नीति की घोषणा की तथा खोये राज्य की वापसी के लिये धर्म तथा शांति का  मार्ग अपनाने का आह्वान किया। उनके अभियान के तहत सामाजिक तथा सांस्कृतिक पक्ष को केन्द्र में रखकर आदिवासी समाज को मजबूत तथा संगठित करने का सिलसिला जारी रहा। 1889 के अंत में यह अभियान रंग लाया और अधिकार हासिल करने, खोये राज्य की प्राप्ति का लक्ष्य, जमीन को मालगुजारी से मुक्त करने तथा जंगल के अधिकार को वापस लेने के लिये व्यापक गोलबंदी शुरू हुई। कोलेबिरा, बानो लोहरदग्गा, तोरपा, कर्रा, बसिया, खूंटी, मुरहु, बुंडु, तमाड़, पोड़ाहाट, सोनाहातु आदि स्थानों पर बैठक हुई।
24 दिसम्बर 1899 को रांची के तोरपा, खूंटी, तमाड़ बसिया, आदि से लेकर सिंहभूम जिला के चक्रधरपुर थाने तक में विद्रोह की आग भड़क उठी विद्रोह के दमन के लिये सिहभूम से रांची तक 500 बर्गमील क्षेत्र में सेना और पुलिस की कम्पनी बुलाकर बिरसा की गिरफ्तारी का अभियान तेज किया गया। सरदारों पर हमला करने और आंदोलन का साथ देनेवालों मुंडा- मानकियों को गिरफ्तार करने व आत्मसमर्पण न करनेवाले विद्रोहियों की घर -सम्पत्ति कुर्क करने की योजना को अमलीजामा पहनाया जाने लगा। सरकार ने बिरसा की सूचना देने वालों और गिरफ्तारी में मदद देने वाले मुंडा या मानकी को पांच सौ रुपए पुरस्कार देने का ऐलान किया। बावजूद इसके सरकार बिरसा को गिरफ्तार नहीं कर पायी। बिरसा ने आंदोलन की रणनीति बदली, साठ स्थानों पर संगठन के केन्द्र बने। डोम्बारी पहाड़ी पर मुंडाओं की बैठक में‘उलगुलान ’ का ऐलान किया गया। बिरसा के इस आंदोलन की तुलना आजादी के आंदोलन में बहुत बाद 1942 के अगस्त क्रांति के काल से की जा सकती है। 1942 में महात्मा गांधी ने ‘ करो या मरो’ का नारा दिया था।
           बिरसा के नेतृत्व में अफसरों, पुलिस, अंग्रेज सरकार के संरक्षण में पलनेवाले जमींदारों और महाजनों को निशाना बनाया गया। खूंटी, तोरपा, बसिया, तमाड़, सर्बादा, मुरहू, चक्रणरपुर, पोड़ाहाट रांची और सिंहभूम में गोरिल्ला युद्ध ने हुकूमत की चूलें हिला दी। आंदोलन को कुचलने के लिये रांची और सिंहभूम को सेना के हवाले कर दिया गया। 8 जनवरी 1900 को डोम्बारी पहाड़ियों पर जमे बिरसाइत के जत्थे पर सेना ने आक्रमण कर दिया तथा युद्ध के दौरान लगभग 200 मुंडा मारे गये। सैलरकब पहाड़ी पर भी संघर्ष हुआ। इसके बाद भी बिरसा पकड़ में नहीं आये। आंदोलन की रणनीति के तहत अपने आंदोलन के केन्द्र बदले तथा घने जंगलों में संचालन के केन्द्र बनाये गये। जमकोपाई तथा पोड़ाहाट के जंगलों संगठन तथा प्रशिक्षण के कैंप बनाये गये। 3 फरवरी 1900 को सेंतरा के पश्चिम जंगल में बने शिबिर से बिरसा को उस समय गिरफ्तार किया गया, जब वे गहरी नींद मे सोये हुए थे। पुलिस के भारी बंदोबस्त के  साथ उन्हें तत्काल खूटी के रास्ते रांची कारागार लाकर बंद कर दिया गया। बिरसा के साथ अन्य 482 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया गया। उनके खिलाफ 15 आरोप दर्ज किये गये। शेष अन्य  गिरफ्तार लोगों में सिर्फ 98 के खिलाफ आरोप सिद्ध हो पाया। बिरसा के विश्वासी गया मुंडा और उनके पुत्र सानरे मुंडा को फांसी दी गयी। गया मुंडा की पत्नी मांकी को दो वर्ष सश्रम कारावास की सजा दी। मुकदमें की सुनवाई के शुरूआती दौर में उन्होंने जेल में भोजन करने के प्रति अनिच्छा जाहिर की। अदालत में तबियत खराब होने की वजह से जेल वापस भेज दिया गया। 1 जून को जेल अस्पताल के चिकित्सक ने सूचना दी कि बिरसा को हैजा हो गया है और उनके जीवित रहने की संभावना नहीं है। 9 जून 1900 की सुबह सूचना दी गयी कि बिरसा नहीं रहे । इस तरह एक क्रांतिकारी जीवन का अंत हो गया। सन् 1895 से 1900 तक बिरसा मुंडा का महाविद्रोह ‘ऊलगुलान’ चला। आदिवासियों को लगातार जल-जंगल-जमीन और उनके प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल किया जाता रहा और वे इसके खिलाफ आवाज उठाते रहे। 1895 में बिरसा ने अंग्रेजों की लागू की गयी जमींदारी प्रथा और राजस्व-व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई के साथ-साथ जंगल-जमीन की लड़ाई छेड़ी थी। उन्होंने सूदखोर महाजनों के खिलाफ भी जंग का ऐलान किया। ये महाजन, जिन्हें वे दिकू कहते थे, कर्ज के बदले उनकी जमीन पर कब्जा कर लेते थे। यह मात्र विद्रोह नहीं था, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता, स्वायतत्ता और संस्कृति को बचाने के लिए महासंग्राम था।
अबुआ दिशुम अबुआ राज यानी हमारा देश हमारा राज्य का नारा देने वाले लोकनायक जिन्होंने आदिवासिओं के सम्मान ,स्वाभिमान ,स्वतंत्रता और सबसे मुख्य उनकी संस्कृति को बचाने के लिए आत्मसमर्पण और बलिदान दिया जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। भगवान बिरसा मुंडा ने महज़ 25 साल का जीवन जिया परन्तु इस छोटे से सफर में पूरे साहस और शौर्य का प्रदर्शन कर वह हमेशा के लिए अमर हो गए वास्तव में बिरसा मुंडा देशभक्ति एवं वीरता का प्रतीक थे। उन्होंने केवल आदिवासियों के लिए ही नहीं परन्तु उनके साथ-साथ इस देश की अखंडता, इसकी गौरवशाली संस्कृति और जनजातीय परंपरा के संरक्षण के लिए स्वयं को न्यौछावर कर दिया। अन्याय और उत्पीड़न से लड़ने के वीरतापूर्ण प्रयासों से भरी उनकी जीवन कहानी उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध की एक मजबूत आवाज का प्रतिनिधित्व करती है।
बिरसा के संघर्ष के परिणामस्वरूप छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 बना। जल , जंगल और जमीन पर पारंपरिक अधिकार की रक्षा के लिये शुरू हुए आंदोलन एक के बाद एक श्रृंखला में गतिमान रहा तथा इसकी परिणति अलग झारखंड राज्य के रूप में हुई, लेकिन अबुआ दिशुम का सपना साकार नहीं हो सका। आजादी के बाद औद्योगिकीकरण के दौर ने उस सामाजिक आर्थिक व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया जिसकी स्थापना के लिये बिरसा का उलगुलान था। खनिज सम्पदा के दोहन  और घोटाले ने प्रदेश को शर्मसार किया है।
                  बिरसा के द्वारा स्थापित बिरसाइत पंथ आज भी कायम है।खूंटी जिला मुख्यालय से पांच किलोमीटर दूर जंगल के बीच बिरसाइतों का गांव है अनिगड़ा। बिरसाइत सम्प्रदाय से जुड़े लोग मांस मछली नहीं खाते हैं, तुलसी की पूजा करते हैं। पहनने में सूती वस्त्र का इस्तेमाल करते हैं तथा नशे से दूर रहते है। हिंसा से दूर रहकर अहिंसा का पालन करते है। अनगड़ा में ही उदय मुंडा को फांसी दी गयीं। उनका परपौत्र मंगरा मुंडा आज भी जिंदा है। उनके मुताबिक कभी इस गांव में बिरसाइतों की संख्या 50 थी। अब ये नाममात्र के रह गये हैं। ये अपनी गरीबी और मुश्किलों से नाराज नहीं है, पर सरकारी उपेक्षा से ज्यादा दुखी है। मंगरा मुंडा के मुताबिक यदि अंग्रेजों ने शोषण किया तो आजाद भारत की सरकार ने भी कम धोखा  नहीं दिया। आजादी के बाद भी लगान- सूद से मुंडाओं को मुक्ति नहीं मिली। जल,जंगल,जमीन पर अधिकार नहीं मिला। अबुआ दिशुम का सपना पूरा नहीं हुआ।
                                                                आज राज्य गठन के 24 वर्ष होने के बाद भी अबुआ दिशुम-अबुआ राईज मात्र नारा बनकर रह गया। सीएनटी-एसपीटी एक्ट और संविधान प्रदत्त पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून, वनाधिकार कानून तथा न्यायिक निर्णय समता जजमेंट आदि मुद्दों पर राज्य गठन होने के बाद जो सार्थक प्रयास केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा होना चाहिए, वो अब तक दिखाई नहीं दे रहा है। हालांकि 10 नवंबर 2021 को केंद्र सरकार ने इनकी जयंती के दिन को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है। बिरसा मुंडा के नाम पर केंद्र सरकार और कई राज्यों की सरकारी योजना चला रही है।(विभूति फीचर्स)

संस्कृत शब्दानुशासन के  अन्तिम रचयिता  महापंडित, कलिकालसर्वज्ञ हेमचन्द्राचार्यजी* 

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*(संदीप सृजन -विनायक फीचर्स)*
विश्व के इतिहास में संस्कृत के मध्यकालीन रचनाकारों में प्रसिद्ध जैन आचार्य हेमचन्द्राचार्यजी का नाम विशेष महत्व रखता है। वे महापण्डित थे, काव्यशास्त्र के आचार्य थे, योगशास्त्र मर्मज्ञ थे और ‘कलिकालसर्वज्ञ’ जैसी महान उपाधि से अलंकृत थे। जैनधर्म और दर्शन के तो वे प्रकाण्ड विद्वान् थे ही अपने समय के महान टीकाकार भी थे। वे जहाँ एक तरफ विभिन्न शास्त्रों के पारंगत थे वहीं दूसरी अनेक भाषाओं के मर्मज्ञ भी थे। हेमचन्द्राचार्यजी आज भी विश्व के सर्वश्रेष्ठ व्याकरणकार एवं अनेक भाषाकोशकार माने जाते है। भारतीय चिंतन, साहित्य और साधना के क्षेत्र में उनका योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। हेमचन्द्राचार्यजी ने साहित्य, दर्शन, योग, व्याकरण, काव्यशास्त्र, वाङ्मय के सभी अंगों पर नवीन साहित्य की सृष्टि तथा नये पंथ को आलोकित किया। संस्कृत एवं प्राकृत पर उनका समान अधिकार था।
हेमचन्द्राचार्यजी का जन्म गुजरात में अहमदाबाद से 100 किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम स्थित धंधुका नगर में विक्रम संवत 1145 को कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि में हुआ था। माता-पिता शिव पार्वती उपासक मोढ वंशीय वैश्य थे। पिता का नाम चाच और माता का नाम पाहिणी देवी था। बालक का नाम चंगदेव रखा। माता पाहिणी और मामा नेमिनाथ दोनों ही जैन धर्म के उपासक थे। चंगदेव जब गर्भ में थे तब माता ने आश्चर्यजनक स्वप्न देखे थे। इस पर जैनाचार्य देवचंद्रसूरी जी ने स्वप्न का विश्लेषण करते कहा कि सुलक्षण सम्पन्न पुत्र होगा जो दीक्षा लेगा और जैन सिद्धान्त का सर्वत्र प्रचार प्रसार करेगा।
बाल्यकाल से चंगदेव दीक्षा के लिये दृढ थे। खम्भात में जैन संघ की अनुमति से उदयन मंत्री के सहयोग से नौ वर्ष की आयु में दीक्षा संस्कार विक्रम सवंत 1154 में माघ शुक्ल चतुर्दशी शनिवार को हुआ और उनका नाम मुनि सोमचंद्र रखा गया। अल्पायु में शास्त्रों में तथा व्यावहारिक ज्ञान में निपुण हो गये। 21 वर्ष की अवस्था में समस्त शास्त्रों का मंथन कर ज्ञान वृद्धि की । नागपुर (महाराष्ट्र) के पास धनज ग्राम के एक वणिक ने विक्रम सवंत 1166 में सूरिपद प्रदान महोत्सव सम्पन्न किया। तब एक आश्चर्यजनक घटना घटी। मुनि सोमचन्द्र एक मिट्टी के ढेर पर बैठे थे। आचार्य देवचन्द्रसूरी जी ने अपने ज्ञान में देखा और कहा कि, “सोम जहाँ बैठेगा वहाँ हेम ही होगा” और वह मिट्टी का ढेर सोने में बदल चुका था। उस के बाद सोमचन्द्र, आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी के नाम से जाने लगे।
आचार्य श्री ने साहित्य और समाज सेवा करना आरम्भ किया और पैदल विहार करते हुए अणहिलपुरपत्तन में पधारे। जिस मार्ग से आचार्य श्री ने प्रवेश किया उसी मार्ग पर सामने से महाराजा सिद्धराज जयसिंह की सवारी आ रही थी। जब सिद्धराज जयसिंह की नजर आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी पर गयी तो वो आचार्य श्री को देखकर विस्मित हो गये और सहजभाव से उनके सामने नत मस्तक हो गये।उन्होंने आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी को अपने राजभवन में पधारने की विनती की। आचार्य श्री भी शकुन देख कर धर्मप्रभावना जान कर राजसभा में राजा सिद्धराज जयसिंह को प्रतिबोध देने लगे। राजा सिद्धराज जयसिंह के अनुरोध पर योगानुयोग आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी ने कश्मीर जाकर सरस्वती देवी की साधना की और देवी का साक्षात्कार प्राप्त कर देवी से आठ व्याकरण ग्रंथ प्रदान करने का निवेदन किया। देवी कृपा से आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी व्याकरण ग्रंथ लेकर राजा सिद्धराज जयसिंह के दरबार में पहुंचे। जिसका नाम सिद्धहेम शब्दानुशासन दिया। राजा की प्रसन्नता का पार नहीं रहा। राजा ने उस ग्रंथ को हाथी पर रखवाकर नगर में भ्रमण करवाया था। यह महान ग्रंथ आज भी संस्कृत व्याकरण के प्रमुख ग्रंथों में माना जाता है।
आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी की जितनी प्रगाढ़ता सिद्धराज जयसिंह से थी उससे भी अधिक घनिष्टता उनके सिंहासन पर बैठने वाले राजा कुमारपाल से रही। कुमारपाल अपने समय के दिग्विजयी महाराजा रहे। अठ्ठारह देशों में उनका शासन था। उनके शासन में मारना, काटना जैसे शब्दों का प्रयोग करना निषेध था। अहिंसा के क्षेत्र में आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी की प्रेरणा से उन्होंने कई कार्य किए जो कि जैन ग्रंथों में विस्तार से पढ़े जा सकते है। महाराजा कुमारपाल ने अपने आत्मकल्याण के लिए आग्रह कर आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी से एक ग्रंथ लिखने का अनुरोध किया तो आचार्य श्री ने योगशास्त्र ग्रंथ की रचना की थी।
आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी द्वारा रचित ग्रंथों मे योगशास्त्र सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसकी शैली पतंजलि के योगसूत्र के अनुसार ही है किन्तु विषय और वर्णन क्रम में मौलिकता एवं भिन्नता है। योगशास्त्र नीति विषयक उपदेशात्मक काव्य की कोटि में आता है। योगशास्त्र जैन संप्रदाय का धार्मिक एवं दार्शनिक ग्रंथ है। वह अध्यात्मोपनिषद् है। इसके अंतर्गत मदिरा दोष, मांस दोष, नवनीत भक्षण दोष, मधु दोष, उदुम्बर दोष, रात्रि भोजन दोष का वर्णन है। योगशास्त्र आज भी अत्यन्त उपादेय ग्रन्थ है। आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी ने अपने योगशास्त्र से सभी को गृहस्थ जीवन में आत्मसाधना की प्रेरणा दी। पुरुषार्थ से दूर रहने वाले को पुरुषार्थ की प्रेरणा दी। इनका मूल मंत्र स्वावलंबन है। वीर और दृढ चित पुरुषों के लिये उनका धर्म है। आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी के ग्रंथो ने संस्कृत एवं धार्मिक साहित्य में भक्ति के साथ श्रवण धर्म तथा साधना युक्त आचार धर्म का प्रचार किया। समाज में से निद्रालस्य को भगाकर जागृति उत्पन्न की। सात्विक जीवन से दीर्घायु पाने के उपाय बताये। सदाचार से आदर्श नागरिक निर्माण कर समाज को सुव्यवस्थित करने में आचर्य ने अपूर्व योगदान किया।
प्रसिद्ध विद्वान सोमेश्वर भट्ट की ‘कीर्ति कौमिदी’ में आचार्य हेमचन्द्रसूरी जी के बारे में कहा है कि “सदा हृदि वहेम श्री हेमसूरेः सरस्वतीम्।,सुवत्या शब्दरत्नानि ताम्रपर्णा जितायया ॥” आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी ने तर्कशुद्ध, तर्कसिद्ध एवं भक्तियुक्त सरस वाणी के द्वारा ज्ञान चेतना का विकास किया और परमोच्च चोटी पर पहुंचा दिया। पुरानी जड़ता को जड़मूल से उखाड़कर फेंक दिया। आत्मविश्वास का संचार किया। आचार्य के ग्रंथो के कारण जैन धर्म गुजरात में दृढमूल हुआ। भारत में सर्वत्र, विशेषतः मध्य प्रदेश में, जैन धर्म के प्रचार एवं प्रसार में उनके ग्रंथों ने अभूतपूर्व योगदान किया। इस दृष्टि से जैन धर्म के साहित्य में आचार्य हेमचन्द्र के ग्रन्थों का स्थान अमूल्य है। अन्य ग्रंथों में काव्यानुशासन, छन्दानुशासन, सिद्धहेमशब्दानुशासन (प्राकृत और अपभ्रंश का ग्रन्थ), उणादिसूत्रवृत्ति, अनेकार्थ कोश, देशीनाममाला, अभिधानचिन्तामणि, द्वाश्रय महाकाव्य, काव्यानुप्रकाश, त्रिषष्ठिशलाकापुरुषचरित, परिशिष्ट-पर्वन, अलङ्कारचूडामणि, प्रमाणमीमांसा, वीतरागस्तोत्र आदि प्रसिद्ध है।
आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी ने 84 वर्ष की अवस्था में अनशनपूर्वक अन्त्याराधन क्रिया आरम्भ की। विक्रम सवंत 1229  में महापंडितों की तरह समाधि मरण को प्राप्त किया।  आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी को पाकर उस समय गुजरात अज्ञानता, धार्मिक रुढियों एवं अंधविश्वासों से मुक्त हो धर्म का महान केन्द्र बन गया था। अनुकूल परिस्थिति में कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी सर्वजनहिताय एवं सर्वापदेशाय पृथ्वी पर अवतरित हुए। 12 वीं शताब्दी में पाटलिपुत्र, कान्यकुब्ज, वल्लभी, उज्जयिनी, काशी इत्यादि समृद्धिशाली नगरों की उदात्त स्वर्णिम परम्परा में गुजरात के अणहिलपुर ने भी गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया।
आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी अद्वितीय विद्वान थे। साहित्य के सम्पूर्ण इतिहास में किसी दूसरे ग्रंथकार की इतनी अधिक और विविध विषयों की रचनाएं उपलब्ध नहीं है। व्याकरण शास्त्र के इतिहास में आचार्य हेमचन्द्रसूरीजी का नाम सुवर्णाक्षरों से लिखा जाता है। संस्कृत शब्दानुशासन के वे अन्तिम रचयिता हैं। इनके साथ उत्तर भारत में संस्कृत के उत्कृष्ट मौलिक ग्रन्थों का रचनाकाल समाप्त हो जाता है।(विनायक फीचर्स)

चुनाव प्रचार के दौरान जांच अधिकारी पर भड़के उद्धव ठाकरे

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शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे के हेलिकॉप्टर की एक बार फिर चेंकिंग हुई है। 24 घंटे में दूसरी बार उद्धव ठाकरे के हेलिकॉप्टर की जांच हुई जिसके बाद उनका गुस्सा फूट पड़ा। उद्धव ने कहा कि बार-बार तलाशी लिया जाना गलत है। वहीं, इस मामले पर अब चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया सामने आई है। चुनाव आयोग ने कहा है कि एजेंसियां SOP का पालन कर रही हैं और उसी के तहत उद्धव के हेलिकॉप्टर की चेकिंग की जा रही है।

दरअसल, चुनाव आयोग के ऑफिसर ने उद्धव ठाकरे के हेलिकॉप्टर की जांच की थी, जिसके बाद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भड़क गए थे। चुनाव आयोग के अधिकारियों ने यवतमाल जिले के वानी हेलीपैड पर उद्धव ठाकरे के बैग की जांच करने की मांग की थी। इसके बाद उद्धव नाराज हो गए और उन्होंने कर्मचारियों से सवाल करते हुए वीडियो रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया था।

जांच अधिकारी पर भड़के उद्धव ठाकरे

वीडियो में वह जांच अधिकारी पर नाराजगी जाहिर करते हुए नजर आ रहे हैं। उद्धव सीधे तरीके से जांच कराने से मना नहीं किया, लेकिन उन्होंने अधिकारी से कहा कि इससे पहले कितने नेताओं के बैग चेक किए हैं। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि जांच अधिकारी को पीएम मोदी और अमित शाह का बैग भी चेक करना होगा और इसका वीडियो भी शेयर करना होगा।

उद्धव ठाकरे और जांच अधिकारी के बीच पूरी बातचीत

उद्धव ठाकरे – क्या नाम है आपका?

अधिकारी – मेरा नाम अमोल है

उद्धव ठाकरे – कहां के रहने वाले हैं?

अधिकारी – अमरावती का रहने वाला हूं

उद्धव ठाकरे – अमरावती का ठीक है..लेकिन अब तक किन-किन लोगों का अपने बैग चेक किया है? हां ठीक है मेरी बैग चेक कर रहे हो लेकिन मुझ से पहले किन नेताओं का बैग चेक किया?

अधिकारी – आपका ही पहले दौरा है

उद्धव ठाकरे – हां, ठीक है.. मेरा पहला दौरा है लेकिन किस राजनेता का बैग आपने चेक किया है अब तक?

अधिकारी – मुझे 4 महीने ही हुए हैं..

उद्धव ठाकरे – 4 महीने में आपने एक भी बैग नहीं चेक किया.. मैं ही पहले कस्टमर आपको मिला?

अधिकारी – नहीं साहब..ऐसी कोई बात नहीं है

उद्धव ठाकरे – नहीं आप मेरा बैग चेक करिए मैं आपको रुकूंगा नहीं। आप मेरा बैग चेक करते हुए बताओ कि क्या आपने अब तक मिंधे(एकनाथ शिंदे) का बैग चेक किया? क्या देवेंद्र फडणवीस, अजीत पवार, मोदी, अमित शाह का बैग चेक किया क्या?

अधिकारी – अब तक मौका नहीं मिला

उद्धव ठाकरे – जब वह आएंगे तो उनका बैग चेक करते हुए वीडियो आप मुझे भेजिए। मोदी की बैग चेक करते हुए आप लोगों का वीडियो मुझे चाहिए.. वहां आप अपनी पूछ मत झुका देना। यह वीडियो में रिलीज कर रहा हूं चेक करिए मेरा बैग। मेरा यूरिन पॉट भी चेक करिए। जो खोल कर देखना है देख लीजिए.. इसके बाद मैं आप लोगों को खोलूंगा। फ्यूल की टंकी चेक करना चाहेंगे ?

अधिकारी – नहीं साहब

उद्धव ठाकरे – मोदी और अमित शाह का बैग चेक करते हुए मुझे एक तो वीडियो चाहिए। इसके बाद वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे हैं व्यक्ति से उद्धव ठाकरे पूछते हैं – वीडियो वाले दादा आपका नाम क्या है? नाम बता.. मेरा नाम उद्धव ठाकरे है आपका नाम क्या है। बैग चेक करने के लिए भी अब महाराष्ट्र के बाहर से लोगों को लाया जा रहा है।

उद्धव ठाकरे ने कहा- जिंदगी में पहली बार मेरा बैग चेक हुआ

वाशिम की प्रचार सभा मे शिवसेना यूबीटी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा कि जिंदगी में पहली बार चुनाव में उनका भी बैग चेक किया गया। उन्होंने चेकिंग करने वाले कर्मियों से कहा क्यों आपने फड़नवीस, मिंधे, गुलाबी जैकेट, अमित शाह और मोदी का बैग कभी चेक किया। उनका बैग चेक करने की हिम्मत की कभी? हम लोकशाही को मानते है, इसलिए आप हमें कायदा दिखाते हो। मैं कायदा मानता हूं और मानूंगा ही।

गाय माता को राष्ट्र माता का दर्जा दिलाने की मांग हुई तेज

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जम्मू, 12 नवंबर (हि.स.)। गाय माता को राष्ट्र माता का दर्जा दिलाने, सशक्त कानून बनाने, और गौशालाओं के निर्माण की मांग को लेकर मूवमेंट कल्कि का धरना प्रदर्शन लगातार 23वें दिन भी जारी रहा। आंदोलनकारियों ने आम जनता से समर्थन का आह्वान करते हुए कहा कि अब समाज को जागरूक होकर इस पवित्र आंदोलन में सम्मिलित होना चाहिए।

इस अवसर पर मूवमेंट कल्कि के सदस्यों ने कहा गाय हमारी संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक है। उसे राष्ट्र माता का सम्मान दिलाने के साथ-साथ उसे संरक्षित करने के लिए कठोर कानून बनाना अत्यंत आवश्यक है। हमारी मांग है कि सरकार इस विषय पर तुरंत ध्यान दे और गौ संरक्षण हेतु एक प्रभावी नीति का निर्माण करे। उन्होंने आगे कहा कि समाज के हर वर्ग को आगे आकर इस आंदोलन में सहयोग देना चाहिए ताकि हमारी पवित्र धरोहर सुरक्षित रह सके।

मूवमेंट कल्कि के सदस्य दिन-रात इस मुद्दे को लेकर अडिग हैं और उन्होंने प्रतिज्ञा की है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होंगी, वे अपने आंदोलन को जारी रखेंगे। प्रदर्शनकारियों ने सरकार से मांग की है कि गौ संरक्षण के प्रति गंभीर कदम उठाए जाएं और गौशालाओं का निर्माण कर उन्हें सुरक्षित आश्रय प्रदान किया जाए।

थारपारकर गाय भारत की बेहतरीन दुधारू गायों में से एक है

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देशी चीजों के फायदों को देखते हुए लोगों में ऐसे सामानों के प्रति इंट्रेस्ट बढ़ रहा है. देशी सब्जी से लेकर देशी खाना और देशी जानवरों के उत्पाद जैसे देशी मुर्गी के अंडे से लेकर देशी गायों के दूध आदि की मांग काफी बढ़ी है. देशी गाय के दूध और उससे बने प्रोडक्ट की डिमांड बढ़ने से अचानक देसी गाय थारपारकर के दाम हजारों से लाखों में पहुंच गए हैं.

हाल ही में राजस्थान में भारत सरकार के केन्द्रीय पशु प्रजनन फार्म में थारपारकर नस्ल की गायों और बछियों की खुली बोली लगाने का कार्यक्रम 18 अक्टूबर 2024 को आयोजित किया गया था. इसमें थारपारकर गाय की नीलामी ने अब तक के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए. नीलामी में 85 किसानों और पशुपालकों ने रजिस्ट्रेशन कराया था. नीलामी में कुल 43 पशुओं को रखा गया था जिसमें थारपारकर गाय संख्या 8034 की सबसे बड़ी बोली लगी. इस गाय के लिए 9.25 लाख रुपये की बोली लगाई गई.

यह बोली महाराष्ट्र के सतारा जिले के निमसोड निवासी प्रगतिशील किसान और ब्रीडर पुष्कराज विठ्ठल ने लगाई थी. बाद में पुष्कराज ने इसे खरीद लिया. इसके बाद अन्य राज्यों में भी थारपारकर गाय के दाम एकदम से आसमान छूने लगे. सहारनपुर के रहने वाले किसान आदित्य त्यागी के पास कई थारपारकर गाय हैं. उनकी गायों के भी 5 लाख रुपये से अधिक दाम लगा चुके हैं.

थारपारकर गाय की खासियत
थारपारकर गाय भारत की बेहतरीन दुधारू गायों में से एक है. यह गाय थार रेगिस्तान से ली गई है इसलिए इसका नाम थारपारकर पड़ा. थारपारकर गाय भारत के अलावा पाकिस्तान से भी जुड़ी हुई है. यह गाय भारत के जोधपुर, जैसलमेर और कच्छ में सबसे पहले पाई गई थी. आजकल यह गाय भारत के लगभग सभी राज्यों में पाई जाती है. थारपारकर गाय को ग्रे सिंधी, वाइट सिंधी और थारी के नाम से भी जाना जाता है. इस गाय के दूध में कई बीमारियों से लड़ने की ताकत होती है. यह गाय बिना खाए पिए दो से तीन दिन तक आसानी से रह सकती है. किसी भी प्रकार का घास खा लेती है लेकिन दूध में फर्क नहीं पड़ता.

थारपारकर गाय के दाम बढ़ने से किसान खुश
किसान आदित्य त्यागी ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि यह थारपारकर नस्ल की गए हैं और इन गायों को राजस्थान से एक बाड़मेर, एक जेसलमेर से लेकर आये थे. अब इन थारपारकर गायों की डिमांड बहुत ज्यादा बढ़ गई है. अभी हाल ही में सूरतगढ़ फार्म राजस्थान में इन गायों की नीलामी हुई है जबकि नीलामी में ए ग्रेड की गायों को नीलाम नहीं किया जाता. वहां सिर्फ डिफेक्टेड गायों को नीलाम किया जाता है. वहां पर सबसे ऊंची बोली थारपारकर गाय की 9 लाख 25 हजार रुपये लगी है. जबकि दूसरे नंबर पर थारपारकर 7 लाख 25 हजार रुपये में बिकी है.

किसान आदित्य त्यागी बताते हैं कि उनसे अच्छी नस्ल की गए उनके पास मौजूद है लेकिन इन गायों की डिमांड अब बहुत ज्यादा बढ़ गई है. कई लोगों के फोन भी आए हैं. यहां तक की 5 लाख रुपये तक उनकी गाय की कीमत लग चुकी है लेकिन अब थारपारकर गायों के दाम सोने के भाव हो गए हैं इसलिए वह उन गायों को अभी बेचना नहीं चाहते.

थारपारकर गाय 8 से 10 किलो दूध रोजाना देती है. इस थारपारकर गाय का दूध ₹100 लीटर से 150 रुपये लीटर बिकता है. आदित्य त्यागी बताते हैं कि इस थारपारकर गाय का बीमार आदमी को दूध पिलाने से वह जल्द स्वस्थ हो जाता है जिसका जीता जागता उदाहरण वह स्वयं हैं.

शिमला – कांगड़ा की गौशाला में दो साल में 1200 से ज्यादा गोवंश की मौत

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शिमला: देवभूमि हिमाचल के जिला कांगड़ा में एक गौशाला में दो साल के अंतराल में 1200 से ज्यादा गोवंश की मौत हो गयी थी. हाईकोर्ट में जनहित याचिका के माध्यम से जिला के शक्तिपीठ ज्वालामुखी के पास लुथाण गांव में स्थित गौशाला को अन्यत्र स्थानांतरित किये जाने की मांग उठाई थी. इसी याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई चली हुई है.

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति सत्येन वैद्य की खंडपीठ ने इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार को आदेश दिए कि वह उनके द्वारा चलाए जा रहे गो अभयारण्य अथवा गोसदनों पर खर्च की गई राशि का विवरण पेश करे. कोर्ट ने खर्च की गई रकम और इसके उपयोग का सटीक विवरण दर्ज करने का आदेश दिया.

अदालत ने यह आदेश इस बात को देखते हुए जारी किए कि हिमाचल प्रदेश सरकार हिन्दू सार्वजनिक धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1984 के तहत सरकार द्वारा अधिग्रहित मंदिरों में दान के रूप में एकत्रित की जा रही राशि का 15% इन गोशालाओं पर खर्च कर रही है. राज्य सरकार प्रदेश में बेची जा रही शराब की प्रत्येक बोतल पर भी काऊ सेस के रूप में ढाई प्रतिशत का उप-कर लगा रही है.

याचिका के तथ्य चौंकाने वाले

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा रखे गए तथ्यों को चौंकाने वाला बताया. इन तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, कांगड़ा को आदेश दिए कि वह राधेश्याम गो अभयारण्य, ग्राम लुथान, पीओ सुधांगल, तहसील ज्वालामुखी, जिला कांगड़ा का दौरा करें और अभयारण्य की स्थिति के बारे में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करें और उसका निरीक्षण करने के बाद न केवल अपनी स्वतंत्र रिपोर्ट दाखिल करें बल्कि इस मामले में याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए तथ्यों पर अपना जवाब भी दाखिल करेंगे.

कोर्ट ने एसडीएम ज्वालामुखी को आदेश दिए कि वह अगली सुनवाई के दौरान कोर्ट में उपस्थित रहें और स्पष्ट करें कि उन्होंने किन परिस्थितियों में उक्त गौ अभ्यारण्य में ट्रैपिंग फोटोग्राफी और अन्य रिकॉर्डिंग पर प्रतिबंध लगाया गया है. कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि गौ अभयारण्य के लिए फिलहाल कोई प्रबंधन समिति क्यों नहीं है और इस संबंध नियुक्ति के संबंध में क्या कदम उठाए जा रहे हैं.

राधा कृष्ण गौशाला लुथाण का मामला

उल्लेखनीय है कि प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट को बताया था कि राधे कृष्णा गौ अभ्यारण्य लुथाण जिला कांगड़ा में कोई अनियमितताएं नहीं बरती जा रही हैं. प्रतिवादियों ने प्रार्थी के आरोपों से इंकार किया था. हाईकोर्ट ने साढ़े 3 करोड़ रुपये की लागत से बनाए राधे कृष्णा गौ अभयारण्य लुथाण जिला कांगड़ा को बंद करने की मांग से जुड़े मामले पर सरकार को नोटिस जारी किए थे.प्रार्थी पवन कुमार ने मुख्य सचिव सहित पशुपालन विभाग के सचिव, वन सचिव, गौ सेवा आयोग बालूगंज के निदेशक, केंद्रीय पशुपालन विभाग के सचिव और एनिमल वेलफेयर बोर्ड को प्रतिवादी बनाया है. मामले में दिए तथ्यों के अनुसार 23 जनवरी 2019 को प्रदेश सरकार ने प्रदेश को आवारा पशु मुक्त करने के लिए प्रत्येक जिले में कम से कम एक पशु अभ्यारण्य स्थापित करने के बारे में दिशा निर्देश तय किए थे.

31 जुलाई 2020 को पशु विभाग अभयारण्य में पशुओं की देखरेख संबंधी एसओपी जारी किया. 7 अप्रैल 2021 को एक और एसओपी जारी कर गो सदनों की कार्यप्रणाली तय की. 20 जनवरी 2022 को सरकार ने ज्वाला जी जिला कांगड़ा के लुथाण में राधे कृष्णा गौ अभयारण्य स्थापित करने का निर्णय लिया. इसके बाद साढ़े 3 करोड़ रुपये की लागत से यह अभयारण्य स्थापित किया गया. दो सालों में वहां 1310 बेसहारा गायों को रखा गया और इन्ही दो वर्षो में 1200 गायें कुपोषण और बीमारी से मारी गईं. 19 अक्टूबर 2023 को एक ही दिन में 15 गायें कुप्रबंधन की वजह से मारी गई. प्रार्थी ने इस अभयारण्य को लुथान में बंद कर किसी अन्य उपयुक्त स्थान पर स्थापित करने के आदेशों की मांग की है.

गर्भवती गाय को दौड़ा-दौड़ाकर मार डाला केस दर्ज

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हिसार: जिले के पुठ्टी गांव में मानवता को शर्मसार कर देने वाली हरकत सामने आई है. कुछ युवकों ने एक गर्भवती गाय के गले में रस्सी डाल कर उसे दौड़ाया और तड़पा-तड़पा कर मार डाला. दौड़ती-दौड़ती बेदम हुई गाय की मौत हो गई. हांसी बास थाने में गौ रक्षक दल के सदस्यों की शिकायत पर 3 युवकों पर पशुक्रूरता अधिनियम समेत अलग-अलग धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. इस मामले में अभी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई है. गाय के शव का पोस्टमार्टम करवाया गया है.

3 युवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज : शिकायतकर्ता सिसर खास के रमेश ने हांसी के बास थाने में दी गई अपनी रिपोर्ट में बताया कि 8 नवंबर की दोपहर को वह महम से दोस्त के पास पुठ्टी गांव में आया था. उसने गाड़ी रोकी तो और देखा कि गांव की बोरियो वाली गली में 8 युवक, जिनमें पुठ्टी का फूल कुमार, महम का संजय, नीरज व दो अन्य युवकों ने गाय के गले में रस्सा डाल रखा था, और उसे दौड़ा रहे थे.

उसने बताया कि इस बीच भागते-भागते गाय गिर गई और बाद में उसकी मृत्यु हो गई. ग्रामीणों के पहुंचने से पहले ही आरोपी फरार हो गए. बाद में गाय का पोस्टमार्टम करवाया गया तो पता चला कि वह गर्भवती गाय थी. उसके गर्भ में पल रहे गौ वंश की भी मौत हो गई. पुलिस ने बताया कि मुकदमा दर्ज करके छानबीन शुरु कर दी गई है.

गौ तस्करों का भांडाफोड़, कुशीनगर से 4 गौ तस्कर गिरफ्तार

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UP News: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में पुलिस ने रविवार को चार गौ तस्करों को गिरफ्तार किया। पुलिस ने तस्करों के पास से छह गायों, एक पिकअप वाहन, एक वैगनआर कार और तीन मोटरसाइकिलें भी जब्त की हैं।

गौ तस्करों की पहचान आरिफ अली उर्फ ​​गोलू, आदित्य चौहान, विकास यादव और ईश्वर प्रसाद के रूप में की गई है। ये सभी देवरिया जिले के तरकुलवा थाना इलाके के रहने वाले हैं। पूछताछ के दौरान, आरोपितों ने बताया कि वे गौ तस्करी के लिए पिकअप वैन का इस्तेमाल करते थे। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए चारों के खिलाफ गोजातीय पशु तस्करी (बीएनएस) अधिनियम और पशु क्रूरता अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया है। चारों को जेल भेज दिया गया है।
सीओ अभिषेक प्रताप अजय ने बताया कि पुलिस ने चार गौ तस्करों आरिफ अली उर्फ ​​गोलू (रिज़वानुल्लाह का बेटा), आदित्य चौहान (रवींद्र चौहान का बेटा), विकास यादव (सिंघासन यादव का बेटा) और ईश्वर प्रसाद (हरिकेश प्रसाद का बेटा) को गिरफ्तार किया है। ये सभी देवरिया जिले के तरकुलवा थाना क्षेत्र के रहने वाले हैं। वैगनआर कार, तीन मोटर साइकिल, पिकअप वैन और छह गायें बरामद की गईं।

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झारखंड में आदिवासियों के  वोट तय करेगें चुनावी नतीजे*  

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(कुमार कृष्णन-विनायक फीचर्स)
झारखंड के विधानसभा चुनाव में आदिवासी मतदाताओं और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की खास अहमियत है। यानी आदिवासी वोटर के पास सत्ता की चाभी है।आदिवासी बहुल राज्य में मुद्दों की कमी नहीं, लेकिन कई ऐसे बड़े कारक हैं, जो चुनाव के नतीजों को निस्संदेह प्रभावित करेंगे ।
झारखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारी पूरी हो चुकी है। झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए 13 और 20 नवंबर को दो चरणों में वोट डाले जाएंगे। चुनाव के नतीजे 23 नवंबर को आएंगे।
चुनावी  नतीजे काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेंगें कि जनता किसके वादे पर कितना भरोसा करती है। भाजपा की अगुआई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में ‘इंडिया’ गठबंधन की ओर से एक से बढ़कर एक लुभावने वादे किए जा रहे हैं। इनमें से प्रमुख है महिलाओं के लिए मासिक आर्थिक मदद। झामुमो सरकार ने इसी साल मुख्यमंत्री मईया सम्मान योजना की शुरुआत की है ।
इसके अंतर्गत महिलाओं को 1000 रुपए मासिक सहायता दी जा रही थी। भाजपा ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार बनने पर 2100 रुपए मासिक देने का वादा किया तो अब झामुमो ने आगे निकलने की होड़ में 2500 रुपए देने का ऐलान कर दिया है। हेमंत सोरेन सरकार ने  इस प्रस्ताव को कैबिनेट से पास कर दिया है। महिला मतदाताओं को भी इस चुनाव में निर्णायक माना जा रहा है।
भारतीय जनता पार्टी ने झारखंड खासकर संथाल परगना में कथित तौर पर बांग्लादेशी घुसपैठ को बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे को जोरशोर से उठा रहे हैं ।
उनका  कहना है कि झारखंड में इस बार रोटी, बेटी और माटी बचाने की लड़ाई है।  झारखंड में बांग्लादेशी घुसपैठ की वजह से आदिवासियों की संख्या कम हो रही है। भाजपा के प्रभारी और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा भी बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे को आक्रामकता के साथ लगातार उठा रहे हैं। झारखंड भाजपा के कार्यकर्ता इस मुद्दे को आदिवासियों तक पहुंचाने के लिए गांव-गांव, गली-गली का दौरा कर रहे हैं। इस चुनाव में  हेमंत  सोरेन और चंपाई सोरेन के विक्टिम कार्ड की चर्चा जोरों पर है। सरायकेला के लोग बताते हैं कि इस क्षेत्र के लोगों को सुख दुख में चंपाई सोरेन का हमेशा साथ मिलता है, इसलिए वहां के लोग कह रहे हैं कि चुनाव तक वह मुख्य मंत्री बने रहते तो क्या हो जाता। इसी बात को दूसरे गांव के लोग अलग तरीके से देख रहे हैं।
कुछ का कहना है कि चंपाई को मुख्यमंत्री तो आखिर हेमंत ने ही बनाया था। वहीं बहुत से लोग अभी तक मन मिजाज नहीं बना पाए हैं कि जाना किधर है। झुकाव की असली तस्वीर चुनाव के वक्त ही देखने को मिल सकती है। लेकिन इतना तो तय है कि भाजपा में आकर चंपाई सोरेन ने अपनी सरायकेला सीट को बहुत हद तक सुरक्षित कर लिया है।अब वह कोल्हान की दूसरी सीटों पर कितना असर डालेंगे, अभी कहना मुश्किल है। रही बात हेमंत सोरेन की तो उनको पांच माह तक जेल में रखे जाने वाली घटना की जमीनी स्तर पर कोई खास चर्चा नहीं है। उनके लिए मईया सम्मान योजना प्लस प्वाइंट जरूर बना है। खासकर आदिवासी महिलाओं के बीच। क्योंकि यहां का आदिवासी समाज महिला प्रधान है। महिलाओं के हाथों में परिवार की बागडोर होती है। लिहाजा, यह कहना गलत नहीं होगा कि एक हजार रु. की सम्मान राशि ने हेमंत सोरेन को मजबूती दी है।
राजनीतिक जानकार बताते हैं कि दोनों नेताओं के पास विक्टिम कार्ड है। अंतर इतना है कि हेमंत सोरेन का विक्टिम कार्ड भाजपा के खिलाफ है। उनका कहना है कि बेवजह पांच माह तक जेल में रख दिया। सरकार गिराने की साजिश की जाती रही जबकि चंपाई सोरेन के पास अपमान वाला विक्टिम कार्ड है। वह नाम लिए बिना एक तरह से हेमंत सोरेन को ही घेर रहे हैं।आदिवासी समाज में इसकी चर्चा भी हो रही है।चंपाई सोरेन आंदोलन की उपज हैं। समाज में उनका प्रभाव है।
कोल्हान में जिस तरह से उनकी सभाओं में भीड़ जुट रही है, उससे बहुत कुछ आंका जा सकता है।फिलहाल तो ऐसा लग रहा है कि चंपाई सोरेन कोल्हान में तीन से चार सीट पर असर डाल सकते हैं। वे संथाल में भी सत्ताधारी दलों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही वजह है कि चंपाई सोरेन पर झामुमो सीधा हमला नहीं कर पा रहा है।गुरुजी की पार्टी के प्रति आदिवासी समाज की भावनाओं को चंपाई सोरेन भी बखूबी समझते हैं इसलिए वह आदिवासियों की बदहाली के लिए कांग्रेस पर हमला बोल रहे हैं। जाहिर है कि कांग्रेस को नुकसान होने का मतलब है भाजपा को फायदा। एक नैरेटिव सेट करने की कोशिश हो रही है।हालांकि इस मामले में हेमंत सोरेन आगे हैं लेकिन जमीनी तौर पर चंपाई सोरेन मजबूत दिख रहे हैं।
आदिवासी समाज के बीच अलग-थलग पड़ चुकी भाजपा उन्हें तुरुप के पत्ते में रूप में देख रही है लिहाजा, इस बार का झारखंड विधानसभा का चुनाव बेहद रोचक होगा। दोनों नेता खुलकर विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं लेकिन एक दूसरे के खिलाफ सीधे तौर पर बयानबाजी से बच रहे हैं। दोनों में एक बात समान दिख रही है चंपाई कह रहे हैं कि आदिवासियों की बदहाली के लिए कांग्रेस जिम्मेवार है तो हेमंत सोरेन भाजपा को महाजनी पार्टी बताकर आदिवासियों का दुश्मन बता रहे हैं।
कई  लोग करते हैं  कि खोखला और फरेब भरा नारा है – ‘रोटी, बेटी और माटी।’ उनका कहना है कि झारखंड में भाजपा के चुनाव की बागडोर दूसरे  राज्यों के प्रवासी नेताओं ने संभाल रखी है,इसलिए वे नारा भी ऐसा गढ़ रहे हैं जिसकी किसी तरह की भावनात्मक अपील झारखंडी जनता पर नहीं हो सकती। ‘रोटी, बेटी और माटी’ ऐसा ही नारा है जो उनके संकल्प पत्र का मूल तत्व है और जिसे मोदी अपने भाषणों में लगा रहे हैं।
लीजिये ‘रोटी’ को, तो झारखंड में यह भोजन का पर्याय है ही  नहीं। यहां मुख्य रूप से धान की एक साला खेती होती है और यहां की मुख्य आबादी भात खाती है। रोटी अपवाद स्वरूप ही खायी जाती है। लोग कुछ भी खा लें यहां वहां, लेकिन घर में गरम भात और साग से ही सबसे ज्यादा संतोष होता है। रोटी मुख्यतः पश्चिमोत्तर प्रदेशों का भोजन है और चूंकि भाजपा उन्हीं प्रदेशों की पार्टी है, इसलिए उसे नारों में भी वहीं के बिंब और प्रतीक सूझते हैं।
अब आएं ‘बेटी’ शब्द पर तो बेटी आदिवासी बहुल झारखंड में चिंता का विषय कभी नहीं रही। न उसकी सुरक्षा पर कभी संकट का एहसास आदिवासी समाज करता है। बेटी घर संवारती है, समृद्धि लाती है, वह बोझ नहीं, दो कामकाजी मेहनतकश हाथ होते हैं। इसलिए वह चिंता का विषय नहीं। ‘बेटी बचाने’ का नारा इसलिए यहां फजूल है।
और तो और यहां वह अपने समाज में जरा भी असुरक्षित नहीं। हां, उन लोगों से उन्हें जरूर खतरा है जिनके लिए औरत सिर्फ भोग या वंशवृद्धि का सामान है और ऐसे लोगों की आबादी आदिवासी इलाकों में बढ़ती जा रही है। हम उनसे ही उन्हें सुरक्षित रखने की कल्पना नहीं कर सकते, जो उनके लिए खतरा हैं।
रही ‘माटी’ , तो माटी तभी तक है जब तक जल, जंगल और जमीन है। जब जमीन और जंगल ही नहीं रहेगें और पानी ही खत्म हो जायेगा तो माटी कहां से बचेगी। सब कुछ रेत में बदल जायेगा। अब इतनी मोटी सी बात भाजपा के नेता नहीं समझते हैं, यह तो नहीं माना जा सकता, लेकिन जमीन और जंगल की सुरक्षा की गारंटी तो वे कर नहीं सकते।
जल, जंगल, जमीन और जमीन के नीचे दबे खनिज भंडार के लिए तो उनकी गिद्ध दृष्टि झारखंड पर गड़ी है  इन्हीं सब को तो कार्पोरेट के हवाले करने के लिए एक दर्जन प्रवासी मुख्यमंत्री, संतरी झारखंड में दिन रात एक किये हुए है।
82 सदस्यों वाली झारखंड विधानसभा में 28 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं, जिन पर जीत हासिल करने वाली पार्टी सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। झारखंड के 24 साल के इतिहास में यह पांचवां विधानसभा चुनाव है। इस दौरान सात नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल चुके हैं, लेकिन कोई भी पार्टी लगातार दूसरी बार सत्ता में नहीं आई है। भाजपा  नेता रघुबर दास ही एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया है।
झारखंड के गठन के बाद सात चेहरे राज्य की कमान संभाल चुके हैं। यहां होने वाले विधानसभा चुनाव में राज्य के इतिहास के सातों मुख्यमंत्रियों के रिश्तेदार या वो खुद चुनाव लड़ रहे हैं। मौजूदा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद और उनकी पत्नी, भाई और भाभी भी चुनाव मैदान में हैं।
झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री रहे शिबू सोरेन के परिवार के कई सदस्य इस चुनाव में उतरे हैं। शिबू सोरेन 02 मार्च 2005 से 11 मार्च 2005, अगस्त 2008 से जनवरी 2009 और दिसंबर 2009 से मई 2010 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। उनके बेटे और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बरहेट विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। हेमंत भी तीन बार झारखंड की शीर्ष सत्ता तक पहुंच चुके हैं। पहले वह जुलाई 2013 से दिसंबर 2014 और दिसंबर 2019 से जनवरी 2024 तक मुख्यमंत्री रहे। 4 जुलाई 2024 से तीसरी बार झारखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। मुख्यमंत्री हेमंत की पत्नी कल्पना सोरेन को झारखंड मुक्ति मोर्चा ने गांडेय सीट से टिकट दिया है।
शिबू सोरेन परिवार के दो और सदस्य भी चुनाव लड़ रहे हैं। शिबू सोरेन के बेटे और मुख्यमंत्री हेमंत के भाई बसंत सोरेन दुमका से झामुमो के टिकट पर मैदान में हैं। वहीं शिबू सोरेन की बहू और स्व. दुर्गा सोरेन की पत्नी सीता सोरेन जामताड़ा विधानसभा क्षेत्र से भाजपा की उम्मीदवार हैं। झारखंड में भाजपा की तरफ से 2024 के लोकसभा चुनाव में हार का सामना करने वाले कुछ चेहरों को भी विधानसभा में मौका दिया गया है। इनमें एक नाम सीता सोरेन का है, जिन्हें लोकसभा में दुमका सीट से हार का सामना करना पड़ा था।
झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री रहे अर्जुन मुंडा की पत्नी मीरा मुंडा भी 2024 के विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमा रही हैं। पूर्व केंद्रीय मंंत्री अर्जुन मुंडा की पत्नी पोटका सीट से भाजपा की प्रत्याशी बनाई गई हैं। हाल में हुए लोकसभा चुनाव में अर्जुन मुंडा भी उतरे थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली थी। अर्जुन मुंडा मार्च 2003 से मार्च 2005, मार्च 2005 से सितंबर 2006 और सितंबर 2010 से जनवरी 2013 तक झारखंड के मुख्यमंत्री थे।
राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी धनवार सीट से भाजपा के प्रत्याशी हैं। वह नवंबर 2000 से मार्च 2003 तक झारखंड के मुख्यमंत्री थे। मरांडी फिलहाल झारखंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद पर हैं। झारखंड के 24 साल के इतिहास में एकमात्र मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने पूरे पांच साल सरकार चलाई है और वो हैं रघुबर दास। उनकी बहू पूर्णिमा दास साहू को भाजपा ने जमशेदपुर पूर्व से प्रत्याशी बनाया है। 2014 से 2019 तक झारखंड की सत्ता संभालने वाले रघुबर दास अभी ओडिशा के राज्यपाल हैं। पिछले कुछ महीनों में लगातार झारखंड की राजनीति की सुर्खियों में रहे चंपई सोरेन भाजपा के टिकट पर भाग्य आजमा रहे हैं।
पूर्व जेएमएम नेता रहे चंपई को भाजपा ने सरायकेला सीट से उम्मीदवार बनाया है। चंपई सोरेन के बेटे बाबूलाल सोरेन भी चुनाव लड़ रहे हैं। उन्हें भाजपा ने घाटशिला सुरक्षित सीट से मौका दिया है। तत्कालीन मुख्यमंत्री  हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद चंपई सोरेन ने करीब छह महीने झारखंड की सत्ता संभाली। वह 2 फरवरी 2024 से 3 जुलाई 2024 तक मुख्यमंत्री रहे और हेमंत सोरेन के जेल से बाहर आने के बाद उनकी कुर्सी चली गई। पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन 30 अगस्त को भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। निर्दलीय विधायक होकर झारखंड के मुख्यमंत्री बनने वाले मधु कोड़ा का परिवार भी इस चुनाव में जोर आजमाइश कर रहा है। मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा जगन्नाथपुर सीट से भाजपा की उम्मीदवार हैं। गीता को 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सिंहभूम सीट से प्रत्याशी बनाया था लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।
मधु कोड़ा सितंबर 2006 से अगस्त 2008 तक झारखंड के मुख्यमंत्री रहे हैं। यह झारखंड के इतिहास में पहली बार था जब सरकार का नेतृत्व एक निर्दलीय विधायक ने किया था।
चुनावी मुहिम के तहत कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने झारखंड के सिमडेगा और लोहरदगा में चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए कहा कि देश में जल, जंगल, जमीन पर पहला हक़ आदिवासियों का है। राहुल गांधी ने सिमडेगा में अपने भाषण की शुरुआत ‘लव यू’ कहकर की। दोनों ही सीटें आदिवासी बहुल हैं। इससे यह कयास लगाए जा रहे हैं कि महागठबंधन को 28 आरक्षित आदिवासी सीटों पर फायदा हो सकता है। सवाल यह है कि क्या हेमंत सोरेन के नेतृत्व में महागठबंधन फिर इतिहास रच पाएगा या राहुल गांधी का ‘लव यू’ भी काम नहीं आएगा और भाजपा को फायदा होगा।
झारखंड विधानसभा में अनुसूचित जनजाति के लिए बोरियो, बरहेट, लिट्टीपाड़ा, महेशपुर, शिकारीपाड़ा, दुमका, जामा, घाटशिला, पोटका, सरायकेला, चाईबासा, मझगांव, जगन्नाथपुर, मनोहरपुर, चक्रधरपुर, खरसावां, तमाड़, तोरपा, खूंटी, खिजरी, मांडर, सिसई, गुमला, विशुनपुर, सिमडेगा, लोहरदगा, मनिका और कोलेविरा सीटें आरक्षित हैं।
2019 के विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) को अनुसूचित जनजाति  के लिए आरक्षित 28 में से 26 सीटों पर जीत मिली थी, जिससे उसे कुल 30 सीटों पर जीत हासिल हुई। झामुमो को आदिवासी, ईसाई, मुस्लिम और महतो वोटरों का जबरदस्त समर्थन मिला था। वहीं, भाजपा को अनुसूचित जनजाति  सीटों पर ही सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा था।
भाजपा को हाल ही में छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में आदिवासी सीटों पर बढ़त मिली है, जिससे उसे झारखंड में भी आदिवासी वोटरों से उम्मीद है।
 राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि झारखंड में  राजनीतिक दल गठबंधन में रहकर ही बेहतर प्रदर्शन करते हैं। 2014 में झामुमो और कांग्रेस ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था और उन्हें केवल 25 सीटें मिली थीं। लेकिन, 2019 में गठबंधन करके चुनाव लड़ने पर उनकी सीटें बढ़कर 47 हो गईं। इसी तरह, भाजपा को 2014 में आजसू के साथ गठबंधन में 42 सीटें मिली थीं, जबकि 2019 में अकेले चुनाव लड़ने पर उसे सिर्फ 25 सीटें ही मिल पाईं।
              झारखंड लंबे समय तक भाजपा  का गढ़ रहा है। पार्टी राज्य के गठन के बाद से 13 साल तक सत्ता में रही है। इस साल की शुरुआत में हुए लोकसभा चुनाव में भी भाजपा  का दबदबा देखने को मिला था, जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन  ने राज्य की 14 में से 9 सीटों पर जीत हासिल की थी।
पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने कहा, ‘हमने 51 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त बनाए रखी है। अब हमारा काम विधानसभा में और भी बड़ा बहुमत हासिल करना है।’
हालांकि, भाजपा  को अनुसूचित जनजाति  के लिए आरक्षित 28 सीटों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। 2019 के बाद से भाजपा  को आदिवासी क्षेत्रों में वोट शेयर में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 28 में से सिर्फ दो सीटें ही जीत पाई थी। यह ट्रेंड 2024 के लोकसभा चुनाव में भी जारी रहा, जब हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद हुए उपचुनाव में भाजपा  को अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सभी पांच लोकसभा सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था।
दूसरी ओर, झामुमो की राज्य के आदिवासी मतदाताओं पर मजबूत पकड़ है। हेमंत सोरेन के पिता शिबू सोरेन झारखंड के सबसे बड़े आदिवासी नेता रहे हैं। हेमंत ने 1932 के भूमि रिकॉर्ड के आधार पर स्थानीय निवास नीति और सरना धर्म को मान्यता देने की वकालत करके इस विरासत को आगे बढ़ाया है। इन कदमों से आदिवासी समुदाय को व्यापक हिंदू पहचान में शामिल करने की भाजपा  की योजना को झटका लगा है।
23 नवंबर को आने वाले चुनावी नतीजे बताएंगे कि आदिवासी मतदाताओं का रुझान किस पार्टी की ओर है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या हेमंत सोरेन लगातार दूसरी बार सत्ता में आने का मिथक तोड़ पाएंगे या फिर राज्य में सत्ता परिवर्तन का सिलसिला जारी रहेगा। (विनायक फीचर्स)

14 नवंबर जन्मदिवस विशेष – नेहरू से विज्ञान का नाता

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– कल्पना पांडे
इतने सालों बाद हमे शर्म से ये स्वीकार कर लेना चाहिए कि धार्मिक आडंबरों, पाखंड और अंधविश्वास फैलाने वाले और दकियानूसी सोच के सभी धर्मों के धर्मगुरुओं के बढ़ते प्रभाव और वोटों के लिए उन्हे मिलते राजनीतिक संरक्षण के इस दौर में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की नेहरूवादी समझ और भारतीय संदर्भ में इसके वास्तविक उपयोग और कार्यान्वयन के बीच अब गहरी खाई तैयार हो चुकी है। इसीलिए नेहरू आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उस समय थे। आज देश में जब तमाम जगहों पर अंधविश्वास फैलाने वाले धर्मगुरुओं नेताओं की बाढ़ आई हुई है ऐसे में तकरीबन सत्तर साल पहले पंडित जवाहर लाल नेहरू का ये कहना कि, ‘राजनीति मुझे अर्थशास्त्र की ओर ले गई और उसने मुझे अनिवार्य रूप से विज्ञान और अपनी सभी समस्याओं और जीवन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की ओर प्रेरित किया. सिर्फ विज्ञान ही भूख और गरीबी की समस्याओं का समाधान कर सकता है. विज्ञान ही वह इकलौता जरिया है जो भूख और गरीबी को मिटा सकता है.’ बेहद दूरदर्शिता से भरा और दृष्टिगामी हो जाता है।

जवाहरलाल नेहरू की वैज्ञानिक सोच की अवधारणा एक तर्कसंगत दृष्टिकोण है, जिसके बारे में उनका मानना था कि यह किसी की सोच और कार्यों का अभिन्न अंग होना चाहिए। विज्ञान और धर्म के बीच उनके मन में कोई अंतर्विरोध नहीं था। उनका मानना था विज्ञान धर्म जैसा नहीं है, जो अंतर्ज्ञान और भावना पर निर्भर करता है। नेहरू का मानना था कि विज्ञान लोगों को पारंपरिक मान्यताओं को एक नए नज़रिए से देखने में मदद कर सकता है, और धर्म असहिष्णुता, अंधविश्वास और तर्कहीनता को जन्म दे सकता है। नेहरू के अनुसार वैज्ञानिक सोच जीवन जीने का एक तरीका है, सोचने की एक प्रक्रिया है, और काम करने का एक तरीका है। इसमें नए सबूतों के लिए खुला रहना, निष्कर्ष बदलना और देखे गए तथ्यों पर भरोसा करना शामिल है। नेहरू का मानना था कि वैज्ञानिक सोच के प्रसार से धर्म का दायरा कम हो जाएगा। नेहरू ने वैज्ञानिक सोच के महत्व पर जोर दिया और माना कि इसे व्यक्तिगत, संस्थागत, सामाजिक और राजनीतिक स्तरों पर बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले ही नेहरू ने सन् 1938 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस की एक बैठक में कहा था: ‘विज्ञान जीवन की वास्तविक प्रकृति है. केवल विज्ञान की ही सहायता से भूख, गरीबी, कुतर्क और निरक्षरता, अंधविश्वास एवं खतरनाक रीति-रिवाजों और दकियानूसी परम्पराओं, बर्बाद हो रहे हमारे विशाल संसाधनों, भूखों और सम्पन्न विरासत वाले लोगों की समस्याओं का समाधान किया जा सकता है. आज की स्थिति से अधिक सम्पन्न भविष्य उन लोगों का होगा, जो विज्ञान के साथ अपने संबंध को मजबूत करेंगे.’

वैज्ञानिक दृष्टिकोण को नेहरु ने सन् 1946 में अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में लोकहितकारी और सत्य को खोजने का मार्ग बताया था. वैज्ञानिक दृष्टिकोण किसी स्थिति के मूल कारणों के वस्तुगत विश्लेषण करने पर ज़ोर देती है. वैज्ञानिक कार्यपद्धति के प्रमुख या अनिवार्य गुणधर्म जिज्ञासा, अवलोकन, प्रयोग, गुणात्मक व मात्रात्मक विवेचन, गणितीय प्रतिरूपण और पूर्वानुमान हैं. नेहरू के मुताबिक ऐसा नहीं है, ये वैज्ञानिक कार्यपद्धति हमारे जीवन के सभी कार्यों पर लागू हो सकती है क्योंकि इसकी उत्पत्ति हम सबकी जिज्ञासा से होती है. इसलिए प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह वैज्ञानिक हो अथवा न हो, वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला हो सकता है. दरअसल, वैज्ञानिक दृष्टिकोण दैनिक जीवन की प्रत्येक घटना के बारे में हमारी सामान्य समझ विकसित करती है. नेहरू जी के अनुसार इस प्रवृत्ति को जीवन में अपनाकर अंधविश्वासों एवं पूर्वाग्रहों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है.

नेहरू अपनी पुस्तक 1946 की पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया के पृष्ठ 512 पर लिखते हैं “आज विज्ञान के अनुप्रयोग सभी देशों और लोगों के लिए अपरिहार्य और अटल हैं। लेकिन इसके अनुप्रयोग से कहीं ज़्यादा कुछ और भी ज़रूरी है। यह है वैज्ञानिक दृष्टिकोण, विज्ञान का साहसिक और फिर भी आलोचनात्मक स्वभाव, सत्य और नए ज्ञान की खोज, बिना परीक्षण और परीक्षण के किसी भी चीज़ को स्वीकार करने से इनकार करना, नए सबूतों के सामने पिछले निष्कर्षों को बदलने की क्षमता, पहले से तय सिद्धांत पर नहीं बल्कि देखे गए तथ्य पर भरोसा करना, मन का कठोर अनुशासन – यह सब सिर्फ़ विज्ञान के अनुप्रयोग के लिए ही नहीं बल्कि जीवन और उसकी कई समस्याओं के समाधान के लिए भी ज़रूरी है…” वैज्ञानिक दृष्टिकोण को नेहरू विज्ञान को लागू करने से भी ज्यादा महत्व देते हैं। जाहीर है इस तरह के वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बिना न समाज का विकास संभव है नया विज्ञान का। नेहरू ने भारत की एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में को कल्पना की और जिसके लिए प्रयत्न किया वो आधुनिक भारत उनके हिसाब से ऐसा होना था जहाँ लोग, पूर्व-धारणाओं और धार्मिक हठधर्मिता से मुक्त होकर, अपने आस-पास की दुनिया को समझने, अपने जीवन को बेहतर बनाने और सामाजिक समस्याओं को हल करने के लिए वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग करेंगे। देश और उसके लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने में विज्ञान और उसके अनुप्रयोगों के महत्व पर ज़ोर देते हुए, नेहरू ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी को सोच और तर्क के एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण, ‘जीवन का एक तरीका’ और ‘स्वतंत्र व्यक्ति के स्वभाव’ के रूप में परिभाषित किया।

इसलिए, नेहरू ने न केवल राष्ट्र के विकास के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी को आगे बढ़ाने के भौतिक और व्यावहारिक लाभों को पहचाना, बल्कि उन्होंने जीवन के प्रति दार्शनिक दृष्टिकोण के रूप में विज्ञान (वैज्ञानिक पद्धति, दृष्टिकोण और स्वभाव सहित) की भी दृढ़ता से पैरवी की और उसके समर्थन तर्क दिए। भौतिक उपलब्धियों की तरह की विज्ञान की संस्कृति में नेहरू की गहरी रुचि थी। इसलिए वे बार-बार “वैज्ञानिक स्वभाव” और “विज्ञान की भावना” शब्दों का इस्तेमाल करते थे। विज्ञान की उनकी समझ एक दार्शनिकता लिए हुए थी। इसने उन्हें अपने सामाजिक आदर्शों और राजनीतिक विश्वासों को तर्कसंगतता पर आधारित, उनके धर्मनिरपेक्ष विश्वदृष्टिकोण और वैज्ञानिक समाजवाद की अवधारणाओं को विकसित करने और दुनिया के आगे उनके विचारों के रूप में रखने और कार्यपद्धति का हिस्सा बनाने में सक्षम बनाया। 1951 में विज्ञान कांग्रेस में उन्होंने कहा, “मेरी रुचि मुख्य रूप से भारतीय लोगों और यहां तक कि भारत सरकार को वैज्ञानिक कार्य और इसकी आवश्यकता के प्रति जागरूक बनाने की कोशिश में है।” वे साफ कहते हैं कि अकेले विज्ञान ने यह सुनिश्चित किया कि समाज उस तरह की बर्बरता की ओर न लौटे, जिसकी धार्मिक कट्टरता और प्रतिक्रियावादी रूढ़िवादिता बार-बार धमकी देती रही है। इसीलिए जितने साफ तौर पर नेहरू हिंदू और मुस्लिम संप्रदायवादियों की निंदा करते हुए उन्हें बेहद पिछड़ा बता सके और इन तत्वों को सरकार से दूर रख सके वैसा कोई केंद्र सरकार नहीं कर सकी।

भारत की स्वतंत्रता के बाद नए संविधान को लागू करने की चुनौतियों के साथ हमारे देश का नेतृत्व आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरू ने संभाला। देश के इस पहले प्रधानमंत्री को इस बात का भलीभांति बोध था कि वैज्ञानिकों सहित हमारे लोगों को तर्कहीनता, धार्मिक रूढ़िवादिता और अंधविश्वासों ने जकड़ा हुआ है. नेहरू का यह मानना था कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का एक ही रास्ता है- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को विकास से जोड़ा जाए. प्रधानमंत्री के रूप में, नेहरू ने अपने वैज्ञानिक विचारों के अनुसार वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों का निर्माण किया। अगस्त 1947 में उन्होंने अपने निर्देशन में वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए एक केंद्रीय सरकारी पोर्टफोलियो बनाया। 1951 में प्राकृतिक संसाधन और वैज्ञानिक अनुसंधान मंत्रालय बना जिसका वैज्ञानिक अनुसंधान विभाग में आगे विस्तार हुआ। नेहरू ने वैज्ञानिक मामलों पर संसद में बहस का नेतृत्व करना, भारतीय विज्ञान कांग्रेस की वार्षिक बैठकों को संबोधित करना और वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के शासी निकाय की अध्यक्षता करना जारी रखा। भारत के उत्तर-औपनिवेशिक विज्ञान के संरक्षक और मार्गदर्शक की तरह उन्होंने अपने वैज्ञानिकों को महत्व दिया। इनमें वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के महानिदेशक एस.एस. भटनागर, भारत की योजना व्यवस्था के सांख्यिकीविद् पी.सी. महालनोबिस और भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होमी के. भाभा शामिल थे। नेहरू ने परमाणु ऊर्जा विभाग पर अपना निजी नियंत्रण बनाए रखा। परमाणु ऊर्जा में उनकी गहरी रुचि ने यह सुनिश्चित किया कि यह एक महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत तथा भारत की वैज्ञानिक आधुनिकता के प्रतीक के उभरे। भाभा के साथ उनके संबंध विशेष रूप से घनिष्ठ थे, जिससे परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए विशेषाधिकार प्राप्त वित्त पोषण संभव हो सका। इसीलिए नेहरू का समय भारतीय विज्ञान के उत्कर्ष का युग था। उस समय छद्मविज्ञान की अवधारणाओं को किसी भी तरह का बढ़ावा सरकार द्वारा नहीं दिया गया।

नेहरु ने ही हमारे शब्द-ज्ञान में ‘साइंटिफिक टेम्पर’ (वैज्ञानिक दृष्टिकोण) शब्द जोड़ा. वे डिस्कवरी ऑफ इंडिया में लिखते हैं : ‘आज के समय में सभी देशों और लोगों के लिए विज्ञान को प्रयोग में लाना अनिवार्य और अपरिहार्य है. लेकिन एक चीज विज्ञान के प्रयोग में लाने से भी ज्यादा जरूरी है और वह है वैज्ञानिक विधि जो कि साहसिक है लेकिन बेहद जरूरी भी है और जिससे वैज्ञानिक दृष्टिकोण पनपता है यानी सत्य की खोज और नया ज्ञान, बिना जांचे-परखे किसी भी चीज को न मानने की हिम्मत, नए प्रमाणों के आधार पर पुराने नतीजों में बदलाव करने की क्षमता, पहले से सोच लिए गए सिद्धांत की बजाय, प्रेक्षित तथ्यों पर भरोसा करना, मस्तिष्क को एक अनुशासित दिशा में मोड़ना- यह सब नितांत आवश्यक है. केवल इसलिए नहीं कि इससे विज्ञान का इस्तेमाल होने लगेगा, लेकिन स्वयं जीवन के लिए और इसकी बेशुमार उलझनों को सुलझाने के लिए भी…..वैज्ञानिक दृष्टिकोण मानव को वह मार्ग दिखाता है, जिस पर उसे अपनी जीवन-यात्रा करनी चाहिए. यह दृष्टिकोण एक ऐसे व्यक्ति के लिए है, जो बंधन-मुक्त है, स्वतंत्र है.’

नेहरु ने भारत में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए अनेक प्रयत्न किए. इन्हीं प्रयत्नों में से एक है उनके द्वारा सन् 1958 में देश की संसद (लोकसभा) में विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति को प्रस्तुत करते समय वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विशेष महत्त्व देना. उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को सोचने का तरीका, कार्य करने का तरीका तथा सत्य को खोजने का तरीका बताया था. सारी दुनिया के लिए यह पहला उदाहरण था, जब किसी देश की संसद ने विज्ञान नीति का प्रस्ताव पारित किया हो. उनका कहना था कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मतलब महज परखनली को ताकना, इस चीज और उस चीज को मिलाना और छोटी या बड़ी चीजें पैदा करना नहीं है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मतलब है दिमाग को और ज़िंदगी के पूरे ढर्रे को विज्ञान के तरीकों से और पद्धति से काम करने के लिए प्रशिक्षित करना. वैज्ञानिक दृष्टिकोण का संबंध तर्कशीलता से है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार वही बात ग्रहण के योग्य है जो प्रयोग और परिणाम से सिद्ध की जा सके, जिसमें कार्य-कारण संबंध स्थापित किये जा सकें. चर्चा, तर्क और विश्लेषण वैज्ञानिक दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण अंग है. निष्पक्षता, मानवता, लोकतंत्र, समानता और स्वतंत्रता आदि के निर्माण में भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण कारगर है.

1976 में 42वें संवैधानिक संशोधन के हिस्से के रूप में अनुच्छेद 51ए(एच) के तहत भारतीय संविधान में ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और खोज और सुधार की भावना विकसित करना’  प्रत्येक नागरिक के दस मौलिक कर्तव्यों में से एक घोषित किया गया. विज्ञान और प्रौद्योगिकी को मानवतावाद की भावना के साथ जोड़ा जाना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि अंततः हर तरह की तरक्की का लक्ष्य मानव और जीवन की गुणवत्ता और उसके संबंध का विकास है. हमारे बच्चों और समाज में इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास ही नेहरूजी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

 – कल्पना पांडे