चुनाव प्रचार के दौरान जांच अधिकारी पर भड़के उद्धव ठाकरे
शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे के हेलिकॉप्टर की एक बार फिर चेंकिंग हुई है। 24 घंटे में दूसरी बार उद्धव ठाकरे के हेलिकॉप्टर की जांच हुई जिसके बाद उनका गुस्सा फूट पड़ा। उद्धव ने कहा कि बार-बार तलाशी लिया जाना गलत है। वहीं, इस मामले पर अब चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया सामने आई है। चुनाव आयोग ने कहा है कि एजेंसियां SOP का पालन कर रही हैं और उसी के तहत उद्धव के हेलिकॉप्टर की चेकिंग की जा रही है।
दरअसल, चुनाव आयोग के ऑफिसर ने उद्धव ठाकरे के हेलिकॉप्टर की जांच की थी, जिसके बाद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भड़क गए थे। चुनाव आयोग के अधिकारियों ने यवतमाल जिले के वानी हेलीपैड पर उद्धव ठाकरे के बैग की जांच करने की मांग की थी। इसके बाद उद्धव नाराज हो गए और उन्होंने कर्मचारियों से सवाल करते हुए वीडियो रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया था।
जांच अधिकारी पर भड़के उद्धव ठाकरे
वीडियो में वह जांच अधिकारी पर नाराजगी जाहिर करते हुए नजर आ रहे हैं। उद्धव सीधे तरीके से जांच कराने से मना नहीं किया, लेकिन उन्होंने अधिकारी से कहा कि इससे पहले कितने नेताओं के बैग चेक किए हैं। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि जांच अधिकारी को पीएम मोदी और अमित शाह का बैग भी चेक करना होगा और इसका वीडियो भी शेयर करना होगा।
उद्धव ठाकरे और जांच अधिकारी के बीच पूरी बातचीत
उद्धव ठाकरे – क्या नाम है आपका?
अधिकारी – मेरा नाम अमोल है
उद्धव ठाकरे – कहां के रहने वाले हैं?
अधिकारी – अमरावती का रहने वाला हूं
उद्धव ठाकरे – अमरावती का ठीक है..लेकिन अब तक किन-किन लोगों का अपने बैग चेक किया है? हां ठीक है मेरी बैग चेक कर रहे हो लेकिन मुझ से पहले किन नेताओं का बैग चेक किया?
अधिकारी – आपका ही पहले दौरा है
उद्धव ठाकरे – हां, ठीक है.. मेरा पहला दौरा है लेकिन किस राजनेता का बैग आपने चेक किया है अब तक?
अधिकारी – मुझे 4 महीने ही हुए हैं..
उद्धव ठाकरे – 4 महीने में आपने एक भी बैग नहीं चेक किया.. मैं ही पहले कस्टमर आपको मिला?
अधिकारी – नहीं साहब..ऐसी कोई बात नहीं है
उद्धव ठाकरे – नहीं आप मेरा बैग चेक करिए मैं आपको रुकूंगा नहीं। आप मेरा बैग चेक करते हुए बताओ कि क्या आपने अब तक मिंधे(एकनाथ शिंदे) का बैग चेक किया? क्या देवेंद्र फडणवीस, अजीत पवार, मोदी, अमित शाह का बैग चेक किया क्या?
अधिकारी – अब तक मौका नहीं मिला
उद्धव ठाकरे – जब वह आएंगे तो उनका बैग चेक करते हुए वीडियो आप मुझे भेजिए। मोदी की बैग चेक करते हुए आप लोगों का वीडियो मुझे चाहिए.. वहां आप अपनी पूछ मत झुका देना। यह वीडियो में रिलीज कर रहा हूं चेक करिए मेरा बैग। मेरा यूरिन पॉट भी चेक करिए। जो खोल कर देखना है देख लीजिए.. इसके बाद मैं आप लोगों को खोलूंगा। फ्यूल की टंकी चेक करना चाहेंगे ?
अधिकारी – नहीं साहब
उद्धव ठाकरे – मोदी और अमित शाह का बैग चेक करते हुए मुझे एक तो वीडियो चाहिए। इसके बाद वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे हैं व्यक्ति से उद्धव ठाकरे पूछते हैं – वीडियो वाले दादा आपका नाम क्या है? नाम बता.. मेरा नाम उद्धव ठाकरे है आपका नाम क्या है। बैग चेक करने के लिए भी अब महाराष्ट्र के बाहर से लोगों को लाया जा रहा है।
उद्धव ठाकरे ने कहा- जिंदगी में पहली बार मेरा बैग चेक हुआ
वाशिम की प्रचार सभा मे शिवसेना यूबीटी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा कि जिंदगी में पहली बार चुनाव में उनका भी बैग चेक किया गया। उन्होंने चेकिंग करने वाले कर्मियों से कहा क्यों आपने फड़नवीस, मिंधे, गुलाबी जैकेट, अमित शाह और मोदी का बैग कभी चेक किया। उनका बैग चेक करने की हिम्मत की कभी? हम लोकशाही को मानते है, इसलिए आप हमें कायदा दिखाते हो। मैं कायदा मानता हूं और मानूंगा ही।
गाय माता को राष्ट्र माता का दर्जा दिलाने की मांग हुई तेज
जम्मू, 12 नवंबर (हि.स.)। गाय माता को राष्ट्र माता का दर्जा दिलाने, सशक्त कानून बनाने, और गौशालाओं के निर्माण की मांग को लेकर मूवमेंट कल्कि का धरना प्रदर्शन लगातार 23वें दिन भी जारी रहा। आंदोलनकारियों ने आम जनता से समर्थन का आह्वान करते हुए कहा कि अब समाज को जागरूक होकर इस पवित्र आंदोलन में सम्मिलित होना चाहिए।
इस अवसर पर मूवमेंट कल्कि के सदस्यों ने कहा गाय हमारी संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक है। उसे राष्ट्र माता का सम्मान दिलाने के साथ-साथ उसे संरक्षित करने के लिए कठोर कानून बनाना अत्यंत आवश्यक है। हमारी मांग है कि सरकार इस विषय पर तुरंत ध्यान दे और गौ संरक्षण हेतु एक प्रभावी नीति का निर्माण करे। उन्होंने आगे कहा कि समाज के हर वर्ग को आगे आकर इस आंदोलन में सहयोग देना चाहिए ताकि हमारी पवित्र धरोहर सुरक्षित रह सके।
मूवमेंट कल्कि के सदस्य दिन-रात इस मुद्दे को लेकर अडिग हैं और उन्होंने प्रतिज्ञा की है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होंगी, वे अपने आंदोलन को जारी रखेंगे। प्रदर्शनकारियों ने सरकार से मांग की है कि गौ संरक्षण के प्रति गंभीर कदम उठाए जाएं और गौशालाओं का निर्माण कर उन्हें सुरक्षित आश्रय प्रदान किया जाए।
थारपारकर गाय भारत की बेहतरीन दुधारू गायों में से एक है
देशी चीजों के फायदों को देखते हुए लोगों में ऐसे सामानों के प्रति इंट्रेस्ट बढ़ रहा है. देशी सब्जी से लेकर देशी खाना और देशी जानवरों के उत्पाद जैसे देशी मुर्गी के अंडे से लेकर देशी गायों के दूध आदि की मांग काफी बढ़ी है. देशी गाय के दूध और उससे बने प्रोडक्ट की डिमांड बढ़ने से अचानक देसी गाय थारपारकर के दाम हजारों से लाखों में पहुंच गए हैं.
हाल ही में राजस्थान में भारत सरकार के केन्द्रीय पशु प्रजनन फार्म में थारपारकर नस्ल की गायों और बछियों की खुली बोली लगाने का कार्यक्रम 18 अक्टूबर 2024 को आयोजित किया गया था. इसमें थारपारकर गाय की नीलामी ने अब तक के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए. नीलामी में 85 किसानों और पशुपालकों ने रजिस्ट्रेशन कराया था. नीलामी में कुल 43 पशुओं को रखा गया था जिसमें थारपारकर गाय संख्या 8034 की सबसे बड़ी बोली लगी. इस गाय के लिए 9.25 लाख रुपये की बोली लगाई गई.
यह बोली महाराष्ट्र के सतारा जिले के निमसोड निवासी प्रगतिशील किसान और ब्रीडर पुष्कराज विठ्ठल ने लगाई थी. बाद में पुष्कराज ने इसे खरीद लिया. इसके बाद अन्य राज्यों में भी थारपारकर गाय के दाम एकदम से आसमान छूने लगे. सहारनपुर के रहने वाले किसान आदित्य त्यागी के पास कई थारपारकर गाय हैं. उनकी गायों के भी 5 लाख रुपये से अधिक दाम लगा चुके हैं.
थारपारकर गाय की खासियत
थारपारकर गाय भारत की बेहतरीन दुधारू गायों में से एक है. यह गाय थार रेगिस्तान से ली गई है इसलिए इसका नाम थारपारकर पड़ा. थारपारकर गाय भारत के अलावा पाकिस्तान से भी जुड़ी हुई है. यह गाय भारत के जोधपुर, जैसलमेर और कच्छ में सबसे पहले पाई गई थी. आजकल यह गाय भारत के लगभग सभी राज्यों में पाई जाती है. थारपारकर गाय को ग्रे सिंधी, वाइट सिंधी और थारी के नाम से भी जाना जाता है. इस गाय के दूध में कई बीमारियों से लड़ने की ताकत होती है. यह गाय बिना खाए पिए दो से तीन दिन तक आसानी से रह सकती है. किसी भी प्रकार का घास खा लेती है लेकिन दूध में फर्क नहीं पड़ता.
थारपारकर गाय के दाम बढ़ने से किसान खुश
किसान आदित्य त्यागी ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि यह थारपारकर नस्ल की गए हैं और इन गायों को राजस्थान से एक बाड़मेर, एक जेसलमेर से लेकर आये थे. अब इन थारपारकर गायों की डिमांड बहुत ज्यादा बढ़ गई है. अभी हाल ही में सूरतगढ़ फार्म राजस्थान में इन गायों की नीलामी हुई है जबकि नीलामी में ए ग्रेड की गायों को नीलाम नहीं किया जाता. वहां सिर्फ डिफेक्टेड गायों को नीलाम किया जाता है. वहां पर सबसे ऊंची बोली थारपारकर गाय की 9 लाख 25 हजार रुपये लगी है. जबकि दूसरे नंबर पर थारपारकर 7 लाख 25 हजार रुपये में बिकी है.
किसान आदित्य त्यागी बताते हैं कि उनसे अच्छी नस्ल की गए उनके पास मौजूद है लेकिन इन गायों की डिमांड अब बहुत ज्यादा बढ़ गई है. कई लोगों के फोन भी आए हैं. यहां तक की 5 लाख रुपये तक उनकी गाय की कीमत लग चुकी है लेकिन अब थारपारकर गायों के दाम सोने के भाव हो गए हैं इसलिए वह उन गायों को अभी बेचना नहीं चाहते.
थारपारकर गाय 8 से 10 किलो दूध रोजाना देती है. इस थारपारकर गाय का दूध ₹100 लीटर से 150 रुपये लीटर बिकता है. आदित्य त्यागी बताते हैं कि इस थारपारकर गाय का बीमार आदमी को दूध पिलाने से वह जल्द स्वस्थ हो जाता है जिसका जीता जागता उदाहरण वह स्वयं हैं.
शिमला – कांगड़ा की गौशाला में दो साल में 1200 से ज्यादा गोवंश की मौत
शिमला: देवभूमि हिमाचल के जिला कांगड़ा में एक गौशाला में दो साल के अंतराल में 1200 से ज्यादा गोवंश की मौत हो गयी थी. हाईकोर्ट में जनहित याचिका के माध्यम से जिला के शक्तिपीठ ज्वालामुखी के पास लुथाण गांव में स्थित गौशाला को अन्यत्र स्थानांतरित किये जाने की मांग उठाई थी. इसी याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई चली हुई है.
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति सत्येन वैद्य की खंडपीठ ने इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार को आदेश दिए कि वह उनके द्वारा चलाए जा रहे गो अभयारण्य अथवा गोसदनों पर खर्च की गई राशि का विवरण पेश करे. कोर्ट ने खर्च की गई रकम और इसके उपयोग का सटीक विवरण दर्ज करने का आदेश दिया.
अदालत ने यह आदेश इस बात को देखते हुए जारी किए कि हिमाचल प्रदेश सरकार हिन्दू सार्वजनिक धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1984 के तहत सरकार द्वारा अधिग्रहित मंदिरों में दान के रूप में एकत्रित की जा रही राशि का 15% इन गोशालाओं पर खर्च कर रही है. राज्य सरकार प्रदेश में बेची जा रही शराब की प्रत्येक बोतल पर भी काऊ सेस के रूप में ढाई प्रतिशत का उप-कर लगा रही है.
याचिका के तथ्य चौंकाने वाले
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा रखे गए तथ्यों को चौंकाने वाला बताया. इन तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, कांगड़ा को आदेश दिए कि वह राधेश्याम गो अभयारण्य, ग्राम लुथान, पीओ सुधांगल, तहसील ज्वालामुखी, जिला कांगड़ा का दौरा करें और अभयारण्य की स्थिति के बारे में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करें और उसका निरीक्षण करने के बाद न केवल अपनी स्वतंत्र रिपोर्ट दाखिल करें बल्कि इस मामले में याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए तथ्यों पर अपना जवाब भी दाखिल करेंगे.
कोर्ट ने एसडीएम ज्वालामुखी को आदेश दिए कि वह अगली सुनवाई के दौरान कोर्ट में उपस्थित रहें और स्पष्ट करें कि उन्होंने किन परिस्थितियों में उक्त गौ अभ्यारण्य में ट्रैपिंग फोटोग्राफी और अन्य रिकॉर्डिंग पर प्रतिबंध लगाया गया है. कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि गौ अभयारण्य के लिए फिलहाल कोई प्रबंधन समिति क्यों नहीं है और इस संबंध नियुक्ति के संबंध में क्या कदम उठाए जा रहे हैं.
राधा कृष्ण गौशाला लुथाण का मामला
उल्लेखनीय है कि प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट को बताया था कि राधे कृष्णा गौ अभ्यारण्य लुथाण जिला कांगड़ा में कोई अनियमितताएं नहीं बरती जा रही हैं. प्रतिवादियों ने प्रार्थी के आरोपों से इंकार किया था. हाईकोर्ट ने साढ़े 3 करोड़ रुपये की लागत से बनाए राधे कृष्णा गौ अभयारण्य लुथाण जिला कांगड़ा को बंद करने की मांग से जुड़े मामले पर सरकार को नोटिस जारी किए थे.प्रार्थी पवन कुमार ने मुख्य सचिव सहित पशुपालन विभाग के सचिव, वन सचिव, गौ सेवा आयोग बालूगंज के निदेशक, केंद्रीय पशुपालन विभाग के सचिव और एनिमल वेलफेयर बोर्ड को प्रतिवादी बनाया है. मामले में दिए तथ्यों के अनुसार 23 जनवरी 2019 को प्रदेश सरकार ने प्रदेश को आवारा पशु मुक्त करने के लिए प्रत्येक जिले में कम से कम एक पशु अभ्यारण्य स्थापित करने के बारे में दिशा निर्देश तय किए थे.
31 जुलाई 2020 को पशु विभाग अभयारण्य में पशुओं की देखरेख संबंधी एसओपी जारी किया. 7 अप्रैल 2021 को एक और एसओपी जारी कर गो सदनों की कार्यप्रणाली तय की. 20 जनवरी 2022 को सरकार ने ज्वाला जी जिला कांगड़ा के लुथाण में राधे कृष्णा गौ अभयारण्य स्थापित करने का निर्णय लिया. इसके बाद साढ़े 3 करोड़ रुपये की लागत से यह अभयारण्य स्थापित किया गया. दो सालों में वहां 1310 बेसहारा गायों को रखा गया और इन्ही दो वर्षो में 1200 गायें कुपोषण और बीमारी से मारी गईं. 19 अक्टूबर 2023 को एक ही दिन में 15 गायें कुप्रबंधन की वजह से मारी गई. प्रार्थी ने इस अभयारण्य को लुथान में बंद कर किसी अन्य उपयुक्त स्थान पर स्थापित करने के आदेशों की मांग की है.
गर्भवती गाय को दौड़ा-दौड़ाकर मार डाला केस दर्ज
हिसार: जिले के पुठ्टी गांव में मानवता को शर्मसार कर देने वाली हरकत सामने आई है. कुछ युवकों ने एक गर्भवती गाय के गले में रस्सी डाल कर उसे दौड़ाया और तड़पा-तड़पा कर मार डाला. दौड़ती-दौड़ती बेदम हुई गाय की मौत हो गई. हांसी बास थाने में गौ रक्षक दल के सदस्यों की शिकायत पर 3 युवकों पर पशुक्रूरता अधिनियम समेत अलग-अलग धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. इस मामले में अभी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई है. गाय के शव का पोस्टमार्टम करवाया गया है.
3 युवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज : शिकायतकर्ता सिसर खास के रमेश ने हांसी के बास थाने में दी गई अपनी रिपोर्ट में बताया कि 8 नवंबर की दोपहर को वह महम से दोस्त के पास पुठ्टी गांव में आया था. उसने गाड़ी रोकी तो और देखा कि गांव की बोरियो वाली गली में 8 युवक, जिनमें पुठ्टी का फूल कुमार, महम का संजय, नीरज व दो अन्य युवकों ने गाय के गले में रस्सा डाल रखा था, और उसे दौड़ा रहे थे.
उसने बताया कि इस बीच भागते-भागते गाय गिर गई और बाद में उसकी मृत्यु हो गई. ग्रामीणों के पहुंचने से पहले ही आरोपी फरार हो गए. बाद में गाय का पोस्टमार्टम करवाया गया तो पता चला कि वह गर्भवती गाय थी. उसके गर्भ में पल रहे गौ वंश की भी मौत हो गई. पुलिस ने बताया कि मुकदमा दर्ज करके छानबीन शुरु कर दी गई है.
गौ तस्करों का भांडाफोड़, कुशीनगर से 4 गौ तस्कर गिरफ्तार
UP News: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में पुलिस ने रविवार को चार गौ तस्करों को गिरफ्तार किया। पुलिस ने तस्करों के पास से छह गायों, एक पिकअप वाहन, एक वैगनआर कार और तीन मोटरसाइकिलें भी जब्त की हैं।
गौ तस्करों की पहचान आरिफ अली उर्फ गोलू, आदित्य चौहान, विकास यादव और ईश्वर प्रसाद के रूप में की गई है। ये सभी देवरिया जिले के तरकुलवा थाना इलाके के रहने वाले हैं। पूछताछ के दौरान, आरोपितों ने बताया कि वे गौ तस्करी के लिए पिकअप वैन का इस्तेमाल करते थे। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए चारों के खिलाफ गोजातीय पशु तस्करी (बीएनएस) अधिनियम और पशु क्रूरता अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया है। चारों को जेल भेज दिया गया है।
सीओ अभिषेक प्रताप अजय ने बताया कि पुलिस ने चार गौ तस्करों आरिफ अली उर्फ गोलू (रिज़वानुल्लाह का बेटा), आदित्य चौहान (रवींद्र चौहान का बेटा), विकास यादव (सिंघासन यादव का बेटा) और ईश्वर प्रसाद (हरिकेश प्रसाद का बेटा) को गिरफ्तार किया है। ये सभी देवरिया जिले के तरकुलवा थाना क्षेत्र के रहने वाले हैं। वैगनआर कार, तीन मोटर साइकिल, पिकअप वैन और छह गायें बरामद की गईं।
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14 नवंबर जन्मदिवस विशेष – नेहरू से विज्ञान का नाता
– कल्पना पांडे
इतने सालों बाद हमे शर्म से ये स्वीकार कर लेना चाहिए कि धार्मिक आडंबरों, पाखंड और अंधविश्वास फैलाने वाले और दकियानूसी सोच के सभी धर्मों के धर्मगुरुओं के बढ़ते प्रभाव और वोटों के लिए उन्हे मिलते राजनीतिक संरक्षण के इस दौर में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की नेहरूवादी समझ और भारतीय संदर्भ में इसके वास्तविक उपयोग और कार्यान्वयन के बीच अब गहरी खाई तैयार हो चुकी है। इसीलिए नेहरू आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उस समय थे। आज देश में जब तमाम जगहों पर अंधविश्वास फैलाने वाले धर्मगुरुओं नेताओं की बाढ़ आई हुई है ऐसे में तकरीबन सत्तर साल पहले पंडित जवाहर लाल नेहरू का ये कहना कि, ‘राजनीति मुझे अर्थशास्त्र की ओर ले गई और उसने मुझे अनिवार्य रूप से विज्ञान और अपनी सभी समस्याओं और जीवन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की ओर प्रेरित किया. सिर्फ विज्ञान ही भूख और गरीबी की समस्याओं का समाधान कर सकता है. विज्ञान ही वह इकलौता जरिया है जो भूख और गरीबी को मिटा सकता है.’ बेहद दूरदर्शिता से भरा और दृष्टिगामी हो जाता है।
जवाहरलाल नेहरू की वैज्ञानिक सोच की अवधारणा एक तर्कसंगत दृष्टिकोण है, जिसके बारे में उनका मानना था कि यह किसी की सोच और कार्यों का अभिन्न अंग होना चाहिए। विज्ञान और धर्म के बीच उनके मन में कोई अंतर्विरोध नहीं था। उनका मानना था विज्ञान धर्म जैसा नहीं है, जो अंतर्ज्ञान और भावना पर निर्भर करता है। नेहरू का मानना था कि विज्ञान लोगों को पारंपरिक मान्यताओं को एक नए नज़रिए से देखने में मदद कर सकता है, और धर्म असहिष्णुता, अंधविश्वास और तर्कहीनता को जन्म दे सकता है। नेहरू के अनुसार वैज्ञानिक सोच जीवन जीने का एक तरीका है, सोचने की एक प्रक्रिया है, और काम करने का एक तरीका है। इसमें नए सबूतों के लिए खुला रहना, निष्कर्ष बदलना और देखे गए तथ्यों पर भरोसा करना शामिल है। नेहरू का मानना था कि वैज्ञानिक सोच के प्रसार से धर्म का दायरा कम हो जाएगा। नेहरू ने वैज्ञानिक सोच के महत्व पर जोर दिया और माना कि इसे व्यक्तिगत, संस्थागत, सामाजिक और राजनीतिक स्तरों पर बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले ही नेहरू ने सन् 1938 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस की एक बैठक में कहा था: ‘विज्ञान जीवन की वास्तविक प्रकृति है. केवल विज्ञान की ही सहायता से भूख, गरीबी, कुतर्क और निरक्षरता, अंधविश्वास एवं खतरनाक रीति-रिवाजों और दकियानूसी परम्पराओं, बर्बाद हो रहे हमारे विशाल संसाधनों, भूखों और सम्पन्न विरासत वाले लोगों की समस्याओं का समाधान किया जा सकता है. आज की स्थिति से अधिक सम्पन्न भविष्य उन लोगों का होगा, जो विज्ञान के साथ अपने संबंध को मजबूत करेंगे.’
वैज्ञानिक दृष्टिकोण को नेहरु ने सन् 1946 में अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में लोकहितकारी और सत्य को खोजने का मार्ग बताया था. वैज्ञानिक दृष्टिकोण किसी स्थिति के मूल कारणों के वस्तुगत विश्लेषण करने पर ज़ोर देती है. वैज्ञानिक कार्यपद्धति के प्रमुख या अनिवार्य गुणधर्म जिज्ञासा, अवलोकन, प्रयोग, गुणात्मक व मात्रात्मक विवेचन, गणितीय प्रतिरूपण और पूर्वानुमान हैं. नेहरू के मुताबिक ऐसा नहीं है, ये वैज्ञानिक कार्यपद्धति हमारे जीवन के सभी कार्यों पर लागू हो सकती है क्योंकि इसकी उत्पत्ति हम सबकी जिज्ञासा से होती है. इसलिए प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह वैज्ञानिक हो अथवा न हो, वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला हो सकता है. दरअसल, वैज्ञानिक दृष्टिकोण दैनिक जीवन की प्रत्येक घटना के बारे में हमारी सामान्य समझ विकसित करती है. नेहरू जी के अनुसार इस प्रवृत्ति को जीवन में अपनाकर अंधविश्वासों एवं पूर्वाग्रहों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है.

नेहरू अपनी पुस्तक 1946 की पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया के पृष्ठ 512 पर लिखते हैं “आज विज्ञान के अनुप्रयोग सभी देशों और लोगों के लिए अपरिहार्य और अटल हैं। लेकिन इसके अनुप्रयोग से कहीं ज़्यादा कुछ और भी ज़रूरी है। यह है वैज्ञानिक दृष्टिकोण, विज्ञान का साहसिक और फिर भी आलोचनात्मक स्वभाव, सत्य और नए ज्ञान की खोज, बिना परीक्षण और परीक्षण के किसी भी चीज़ को स्वीकार करने से इनकार करना, नए सबूतों के सामने पिछले निष्कर्षों को बदलने की क्षमता, पहले से तय सिद्धांत पर नहीं बल्कि देखे गए तथ्य पर भरोसा करना, मन का कठोर अनुशासन – यह सब सिर्फ़ विज्ञान के अनुप्रयोग के लिए ही नहीं बल्कि जीवन और उसकी कई समस्याओं के समाधान के लिए भी ज़रूरी है…” वैज्ञानिक दृष्टिकोण को नेहरू विज्ञान को लागू करने से भी ज्यादा महत्व देते हैं। जाहीर है इस तरह के वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बिना न समाज का विकास संभव है नया विज्ञान का। नेहरू ने भारत की एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में को कल्पना की और जिसके लिए प्रयत्न किया वो आधुनिक भारत उनके हिसाब से ऐसा होना था जहाँ लोग, पूर्व-धारणाओं और धार्मिक हठधर्मिता से मुक्त होकर, अपने आस-पास की दुनिया को समझने, अपने जीवन को बेहतर बनाने और सामाजिक समस्याओं को हल करने के लिए वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग करेंगे। देश और उसके लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने में विज्ञान और उसके अनुप्रयोगों के महत्व पर ज़ोर देते हुए, नेहरू ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी को सोच और तर्क के एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण, ‘जीवन का एक तरीका’ और ‘स्वतंत्र व्यक्ति के स्वभाव’ के रूप में परिभाषित किया।
इसलिए, नेहरू ने न केवल राष्ट्र के विकास के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी को आगे बढ़ाने के भौतिक और व्यावहारिक लाभों को पहचाना, बल्कि उन्होंने जीवन के प्रति दार्शनिक दृष्टिकोण के रूप में विज्ञान (वैज्ञानिक पद्धति, दृष्टिकोण और स्वभाव सहित) की भी दृढ़ता से पैरवी की और उसके समर्थन तर्क दिए। भौतिक उपलब्धियों की तरह की विज्ञान की संस्कृति में नेहरू की गहरी रुचि थी। इसलिए वे बार-बार “वैज्ञानिक स्वभाव” और “विज्ञान की भावना” शब्दों का इस्तेमाल करते थे। विज्ञान की उनकी समझ एक दार्शनिकता लिए हुए थी। इसने उन्हें अपने सामाजिक आदर्शों और राजनीतिक विश्वासों को तर्कसंगतता पर आधारित, उनके धर्मनिरपेक्ष विश्वदृष्टिकोण और वैज्ञानिक समाजवाद की अवधारणाओं को विकसित करने और दुनिया के आगे उनके विचारों के रूप में रखने और कार्यपद्धति का हिस्सा बनाने में सक्षम बनाया। 1951 में विज्ञान कांग्रेस में उन्होंने कहा, “मेरी रुचि मुख्य रूप से भारतीय लोगों और यहां तक कि भारत सरकार को वैज्ञानिक कार्य और इसकी आवश्यकता के प्रति जागरूक बनाने की कोशिश में है।” वे साफ कहते हैं कि अकेले विज्ञान ने यह सुनिश्चित किया कि समाज उस तरह की बर्बरता की ओर न लौटे, जिसकी धार्मिक कट्टरता और प्रतिक्रियावादी रूढ़िवादिता बार-बार धमकी देती रही है। इसीलिए जितने साफ तौर पर नेहरू हिंदू और मुस्लिम संप्रदायवादियों की निंदा करते हुए उन्हें बेहद पिछड़ा बता सके और इन तत्वों को सरकार से दूर रख सके वैसा कोई केंद्र सरकार नहीं कर सकी।
भारत की स्वतंत्रता के बाद नए संविधान को लागू करने की चुनौतियों के साथ हमारे देश का नेतृत्व आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरू ने संभाला। देश के इस पहले प्रधानमंत्री को इस बात का भलीभांति बोध था कि वैज्ञानिकों सहित हमारे लोगों को तर्कहीनता, धार्मिक रूढ़िवादिता और अंधविश्वासों ने जकड़ा हुआ है. नेहरू का यह मानना था कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का एक ही रास्ता है- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को विकास से जोड़ा जाए. प्रधानमंत्री के रूप में, नेहरू ने अपने वैज्ञानिक विचारों के अनुसार वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों का निर्माण किया। अगस्त 1947 में उन्होंने अपने निर्देशन में वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए एक केंद्रीय सरकारी पोर्टफोलियो बनाया। 1951 में प्राकृतिक संसाधन और वैज्ञानिक अनुसंधान मंत्रालय बना जिसका वैज्ञानिक अनुसंधान विभाग में आगे विस्तार हुआ। नेहरू ने वैज्ञानिक मामलों पर संसद में बहस का नेतृत्व करना, भारतीय विज्ञान कांग्रेस की वार्षिक बैठकों को संबोधित करना और वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के शासी निकाय की अध्यक्षता करना जारी रखा। भारत के उत्तर-औपनिवेशिक विज्ञान के संरक्षक और मार्गदर्शक की तरह उन्होंने अपने वैज्ञानिकों को महत्व दिया। इनमें वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के महानिदेशक एस.एस. भटनागर, भारत की योजना व्यवस्था के सांख्यिकीविद् पी.सी. महालनोबिस और भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होमी के. भाभा शामिल थे। नेहरू ने परमाणु ऊर्जा विभाग पर अपना निजी नियंत्रण बनाए रखा। परमाणु ऊर्जा में उनकी गहरी रुचि ने यह सुनिश्चित किया कि यह एक महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत तथा भारत की वैज्ञानिक आधुनिकता के प्रतीक के उभरे। भाभा के साथ उनके संबंध विशेष रूप से घनिष्ठ थे, जिससे परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए विशेषाधिकार प्राप्त वित्त पोषण संभव हो सका। इसीलिए नेहरू का समय भारतीय विज्ञान के उत्कर्ष का युग था। उस समय छद्मविज्ञान की अवधारणाओं को किसी भी तरह का बढ़ावा सरकार द्वारा नहीं दिया गया।
नेहरु ने ही हमारे शब्द-ज्ञान में ‘साइंटिफिक टेम्पर’ (वैज्ञानिक दृष्टिकोण) शब्द जोड़ा. वे डिस्कवरी ऑफ इंडिया में लिखते हैं : ‘आज के समय में सभी देशों और लोगों के लिए विज्ञान को प्रयोग में लाना अनिवार्य और अपरिहार्य है. लेकिन एक चीज विज्ञान के प्रयोग में लाने से भी ज्यादा जरूरी है और वह है वैज्ञानिक विधि जो कि साहसिक है लेकिन बेहद जरूरी भी है और जिससे वैज्ञानिक दृष्टिकोण पनपता है यानी सत्य की खोज और नया ज्ञान, बिना जांचे-परखे किसी भी चीज को न मानने की हिम्मत, नए प्रमाणों के आधार पर पुराने नतीजों में बदलाव करने की क्षमता, पहले से सोच लिए गए सिद्धांत की बजाय, प्रेक्षित तथ्यों पर भरोसा करना, मस्तिष्क को एक अनुशासित दिशा में मोड़ना- यह सब नितांत आवश्यक है. केवल इसलिए नहीं कि इससे विज्ञान का इस्तेमाल होने लगेगा, लेकिन स्वयं जीवन के लिए और इसकी बेशुमार उलझनों को सुलझाने के लिए भी…..वैज्ञानिक दृष्टिकोण मानव को वह मार्ग दिखाता है, जिस पर उसे अपनी जीवन-यात्रा करनी चाहिए. यह दृष्टिकोण एक ऐसे व्यक्ति के लिए है, जो बंधन-मुक्त है, स्वतंत्र है.’
नेहरु ने भारत में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए अनेक प्रयत्न किए. इन्हीं प्रयत्नों में से एक है उनके द्वारा सन् 1958 में देश की संसद (लोकसभा) में विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति को प्रस्तुत करते समय वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विशेष महत्त्व देना. उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को सोचने का तरीका, कार्य करने का तरीका तथा सत्य को खोजने का तरीका बताया था. सारी दुनिया के लिए यह पहला उदाहरण था, जब किसी देश की संसद ने विज्ञान नीति का प्रस्ताव पारित किया हो. उनका कहना था कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मतलब महज परखनली को ताकना, इस चीज और उस चीज को मिलाना और छोटी या बड़ी चीजें पैदा करना नहीं है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मतलब है दिमाग को और ज़िंदगी के पूरे ढर्रे को विज्ञान के तरीकों से और पद्धति से काम करने के लिए प्रशिक्षित करना. वैज्ञानिक दृष्टिकोण का संबंध तर्कशीलता से है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार वही बात ग्रहण के योग्य है जो प्रयोग और परिणाम से सिद्ध की जा सके, जिसमें कार्य-कारण संबंध स्थापित किये जा सकें. चर्चा, तर्क और विश्लेषण वैज्ञानिक दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण अंग है. निष्पक्षता, मानवता, लोकतंत्र, समानता और स्वतंत्रता आदि के निर्माण में भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण कारगर है.
1976 में 42वें संवैधानिक संशोधन के हिस्से के रूप में अनुच्छेद 51ए(एच) के तहत भारतीय संविधान में ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और खोज और सुधार की भावना विकसित करना’ प्रत्येक नागरिक के दस मौलिक कर्तव्यों में से एक घोषित किया गया. विज्ञान और प्रौद्योगिकी को मानवतावाद की भावना के साथ जोड़ा जाना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि अंततः हर तरह की तरक्की का लक्ष्य मानव और जीवन की गुणवत्ता और उसके संबंध का विकास है. हमारे बच्चों और समाज में इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास ही नेहरूजी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

– कल्पना पांडे








