देशभर में जहां लगातार गौ हत्या जैसे जघन्य अपराध रुकने का नाम नहीं ले रहा है, ऐसे में नोएडा के दादरी थाना क्षेत्र में गौ मांस का एक बहुत बड़ा खेप पकड़ा गया, जो कि पश्चिम बंगाल से आ रहा था। जब इस बात कि जानकारी गौ रक्षक देव नागर को पता चली तो बिना देर किये दादरी थाना क्षेत्र के टोल नाके के पास सभी गौरक्षक और नोएडा पुलिस के साथ मिलकर गौ मांस से भरी ट्रक को पकड़ लिया।
पूछताछ के बाद पता चला कि यह ट्रक पश्चिम बंगाल से नोएडा के दादरी थाना क्षेत्र स्थित SPJ कोल्ड स्टोरेज में जा रहा था। जिसके बाद नोएडा पुलिस और गौ रक्षा दल कि टीम SPJ कोल्ड स्टोर पहुंची तो वहां पर भारी मात्रा में गौ मांस रखे हुए थे। इसकी देख-रेख जिहादी खुर्शीदून करता था।
गौ रक्षा दल का कहना है कि कोल्ड स्टोर का मालिक पुरन जोशी जो कि अपने आपको हिन्दू बताता है वह सिर्फ नाम से हिन्दू है, बाकी वह इस्लाम कबूल कर चुका है। गौ रक्षकों के मुताबिक पूरा गौ मांस लगभग 300 से 400 टन था, जिसकी कीमत लगभग आधा अरब रुपये था। वहीं नोएडा पुलिस का कहना है कि, गौ मांस कि मात्रा लगभग पौने दो सौ टन था, जिसकी कीमत लगभग 4 करोड़ रुपये के आसपास थी, जिसको मिट्टी में गाड़ दिया गया है। इसको लेकर नोएडा पुलिस और गौ रक्षकों के बीच मतभेद है।
वहीं नोएडा पुलिस निदेशक खुर्शीदुन, कोल्ड स्टोर के मालिक पुरन जोशी समेत अन्य को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन गौ रक्षा दल ने कोल्ड स्टोर को भी ‘मिट्टी में मिलाने’ के लिए नोएडा पुलिस को 72 घंटे का समय दिया है, यदि 72 घंटे में कोल्ड स्टोरेज पर बुलडोजर नहीं चला तो गौ रक्षक एक महापंचायत करेंगे उसी कोल्ड स्टोर पर और खुद मिट्टी में मिलाने का काम करेंगे।
महाराष्ट्र में चुनाव से एक दिन पहले पुणे के पूर्व आईपीएस अधिकारी रवींद्रनाथ पाटिल ने एनसीपी (एसपी) नेता और बारामती की सांसद सुप्रिया सुले और महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष नाना पटोले पर बड़ा आरोप लगाया है। पूर्व आईपीएस अधिकारी ने आरोप लगाया कि दोनों नेताओं ने 2018 के क्रिप्टोकरेंसी धोखाधड़ी मामले से बिटकॉइन की हेराफेरी की थी। इसका इस्तेमाल महाराष्ट्र में चल रहे विधानसभा चुनावों के लिए किया है। पाटिल का कहना है कि वह इस पूरी जांच के समर्थन करने के लिए तैयार हैं।
बिटकॉइन की हेराफेरी में थे शामिल
पूर्व आईपीएस अधिकारी ने आरोप लगाया कि पुणे के तत्कालीन पुलिस आयुक्त अमिताभ गुप्ता और साइबर अपराध जांच को संभालने वाली तत्कालीन पुलिस उपायुक्त भाग्यश्री नौटके बिटकॉइन की हेराफेरी में शामिल थे। इसका उपयोग दोनों राजनीतिक नेताओं द्वारा किया जा रहा है।
14 महीने जेल में बिताए- पूर्व आईपीएस अधिकारी
पूर्व आईपीएस अधिकारी रवींद्रनाथ पाटिल ने कहा, ‘मेरी कंपनी ने मुझे 2018 में एक केस की जांच करने के लिए एक क्रिप्टोकरेंसी विशेषज्ञ के रूप में बुलाया था। मुझे 2022 में धोखाधड़ी के आरोपों के तहत उस केस में गिरफ्तार किया गया था। मैंने एक मुकदमे के बाद 14 महीने जेल में बिताए। उस दौरान मैं सोच रहा था कि क्या हुआ था? क्या मामला था? मुझे क्यों फंसाया गया था? मेरे साथ अन्य सहकर्मी भी थे। हम सच्चाई का पता लगाने पर काम कर रहे थे।’
2018 में अमित भारद्वाज को गिरफ्तार किया गया
इसके साथ ही पूर्व आईपीएस ने कहा, ‘हमारे खिलाफ एक गवाह, गौरव मेहता, जो सारथी एसोसिएट्स नामक एक ऑडिट फर्म का कर्मचारी हैं। परसों उसने मुझे 4-5 घंटे तक कई बार फोन किया, लेकिन मैंने कोई जवाब नहीं दिया। आखिरकार, जब मैंने जवाब दिया तो उसने मुझे बताया कि 2018 में जब अमित भारद्वाज को गिरफ्तार किया गया था। उसके पास एक क्रिप्टोकरेंसी हार्डवेयर वॉलेट था। उस वॉलेट को तत्कालीन कमिश्नर अमिताभ गुप्ता ने बदल दिया था और दूसरा वॉलेट रख लिया था। हमें गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन असली अपराधी अमिताभ गुप्ता और उनकी टीम थी।’
इन दो नेताओं का लिया गया नाम
पूर्व आईपीएस अधिकिरी ने कहा, ‘उन्होंने (गौरव मेहता) दो आईपीएस अधिकारियों, अमिताभ गुप्ता और भाग्यश्री नौटके का नाम लिया। उन्होंने दो लोगों का नाम लिया एक सुप्रिया सुले और नाना पटोले हैं । पाटिल ने आरोप लगाया कि इसके बाद उन्होंने मुझसे कहा कि इस विधानसभा चुनाव में बिटकॉइन का इस्तेमाल किया जा रहा है।’
महाराष्ट्र लोकसभा चुनाव में की गई फंडिंग
पाटिल ने आगे आरोप लगाया कि बिटकॉइन के पैसे का इस्तेमाल महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव के दौरान फंडिंग के लिए किया गया। पाटिल का दावा है कि उनके पास कथित गवाह गौरव मेहता द्वारा कथित तौर पर भेजे गए वॉयस नोट हैं।
#WATCH | Maharashtra: Ex-IPS officer from Pune, who was charge-sheeted by Pune Police in the alleged multi-crore crypto fraud, Ravindranath Patil alleges, “…My company called me as a cryptocurrency expert to investigate a case in 2018. I was arrested in that case in 2022 under… pic.twitter.com/Nql9Sun4Tz
पूर्व आईपीएस अधिकारी रवींद्रनाथ पाटिल ने कहा, ‘सुप्रिया सुले ने तीन वॉयस नोट संदेश भेजे हैं, जिसमें वह गौरव से बिटकॉइन भुनाने के लिए कहती हुई सुनाई दे रही हैं, क्योंकि चुनाव के लिए फंड की जरूरत है। वह उन्हें यह आश्वासन भी देती हुई सुनाई दे रही हैं कि वे जांच के बारे में चिंता न करें और सत्ता में आने पर वे इसे संभाल लेंगे।’
महाराष्ट्र के चुनावी दंगल में जनता फैसला करने को तैयार है. बुधवार को वोट डाले जाएंगे. महाविकास अघाड़ी हो या फिर महायुति दोनों ओर से पूरी कोशिश की गई. आखिरी बॉल पर छक्के लगाने के प्रयास किए गए. किसी ने गुगली मारी तो किसी ने क्लीनबोल्ड करने की कोशिश की. नतीजा क्या होगा, यह तो 23 नवंबर को पता चलेगा, लेकिन दोनों ओर के सबसे बड़े खिलाड़ियों ने इस खेल में कैसे शॉट लगाए, वो जानना ज्यादा महत्वपूर्ण है.
बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे राज्य में 10 रैलियां की, जबकि गृहमंत्री अमित शाह ने 16 रैलियां. योगी आदित्यनाथ की डिमांड भी खूब रही. यूपी में उपचुनाव और झारखंड में चुनाव के बावजूद उन्होंने 11 रैलियों को संबोधित किया. नितिन गडकरी ने 52 सभाएं कीं जबकि देवेंद्र फडणवीस ने 54 सभा. मगर सबसे ज्यादा चर्चा योगी आदित्यनाथ की थी. क्योंकि उनके बयान सुर्खियां बने. उनपर बात हुई. आरोप लगे और शिकायत तक दर्ज कराई गई. उधर, महाविकास अघाड़ी की ओर से राहुल गांधी ने 8 रैली और 2 प्रेस कांफ्रेंस की. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 7 रैलियां और तीन सभाएं कीं. जबकि प्रियंका गांधी ने दो रैलियों को संबोधित किया.
आज हम दोनों ओर के दो बड़े खिलाड़ियों के बारे में बात करेंगे. इस चुनाव में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने खटाखट-खटाखट और संविधान बचाओ नारो के जरिये शॉट लगाने की कोशिश की तो यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दनादन चौके-छक्के लगाते नजर आए. जातिधर्म, पाकिस्तान-फिलिस्तीन से लेकर छत्रपति महाराज तक, हर मुद्दे उठाए और जनता को समझाने की कोशिश की. बंटोगे तो कटोगे काफी हिट रहा, तो राहुल गांधी की तिजोरी की खूब चर्चा हुई. आइए जानते हैं किसकी गुगली कितनी धारदार रही.
पहले दिन संविधान पर बात
राहुल गांधी ने महाराष्ट्र में शुरुआत ‘संविधान बचाओ सम्मेलन’ से की. आरएसएस के गढ़ नागपुर से उन्होंने हुंकार भरी और बीजेपी-संघ को संविधान विरोधी करार दिया. उनसे संविधान बचाने की बात कही. जाति आधारित जनगणना कराने का वादा किया. ये भी कहा, आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा तोड़ देंगे. यहीं से उन्होंने पिछड़ों और दलितों को एक हो जाने के लिए कहा.
दूसरे दिन फोकस में आदिवासी
राहुल गांधी जब 14 नवंबर को वे नांदेड़ पहुंचे तो उनके मुद्दे बदल गए. कहा कि बीजेपी आदिवासियों को वनवासी कहकर उनका हक छीनने की कोशिश में है. अनुसूचित जनजातियों से संबंधित मुद्दे उठाकर राहुल गांधी ने आदिवासियों-दलितों को संदेश देने की कोशिश की. इसी सभा में उन्होंने अपने हाथ में संविधान की लाल किताब लहराते हुए कहा कि इस किताब में आपका नाम आदिवासी लिखा है.
तीसरे दिन खटाखट का जिक्र
16 नवंबर को अमरावती पहुंचे राहुल गांधी ने फिर संविधान की लाल किताब दिखाई. कहा-कांग्रेस संविधान को देश का डीएनए मानती है, जबकि भाजपा और आरएसएस के लिए यह एक कोरी किताब है. गोंडिया की रैली में उन्होंने खटाखट का एक बार फिर जिक्र किया और कहा सरकार बनते ही सबके खाते में पैसे भेजेंगे. कहा-मेरी छवि बिगाड़ने में करोड़ों रुपये खर्च किए गए.
आखिरी दिन क्रोनी कैपिटलिज्म पर वॉर
चुनाव प्रचार के आखिरी दिन उन्होंने ‘सेफ शॉट’ खेला. मुंबई में प्रेस कांफ्रेंस कर धारावी पर सरकार को घेरा. कहा-सरकार सिर्फ उद्योगपतियों को बचा रही है. उनका कर्ज माफ कर रही है. गरीबों और किसानों का धन छीनकर उन्हें दे रही है. जनता इस बार चुनाव में उन्हें सबक सिखाने वाली है. हालांकि, बीजेपी ने ये कहकर मजाक उड़ाया कि वही हाल होगा, जो लोकसभा चुनाव में हुआ.
योगी आदित्यनाथ की 11 रैलियां, क्या मुद्दे छाए रहे 1.योगी आदित्यनाथ ने वाशिम में अपनी पहली रैली के जरिए ही महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का सियासी एजेंडा सेट किया. 2.‘बंटेंगे तो कटेंगे’, ‘एक रहेंगे तो नेक और सेफ रहेंगे’ नारे के साथ हिंदुत्व के मुद्दे को धार देते नजर आए. 3.योगी आदित्यनाथ ने पाकिस्तान से लेकर फिलीस्तीन तक जिक्र किया तो हनुमान चालीसा का मुद्दा उठाया. 4.छत्रपति शिवाजी के बहाने योगी ने जातियों में बिखरे हिंदू वोटों को एकजुट करने की कोशिश करते भी नजर आए. 5.‘बंटेंगे तो कटेंगे’ पर विरोध शुरू हुआ तो उसे छत्रपति शिवाजी महाराज और औरंगजेब से जोड़ दिया. 6.कहा-भारत की चिंता की बजाय कुछ लोग पाकिस्तान और फिलीस्तीन के लिए घड़ियाली आंसू बहाते हैं. 7.अमरावती में पूर्व सांसद नवनीत राणा का जिक्र कर कहा, उन्हें हनुमान चालिसा के लिए भी संघर्ष करना पड़ा, ये कैसा दिन है. 8.आगरा के म्यूजियम को शिवाजी महाराज से जोड़ दिया, कहा-हमने उसका नाम औरंगजेब से बदलकर छत्रपति शिवाजी की स्मृति में रखा. 9.अयोध्या, काशी और मथुरा तक का जिक्र किया. उद्धव पर हमला करते हुए कहा-इन्हें देश, धर्म, राष्ट्रवाद, समाज की परवाह नहीं.
महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार समाप्त हो चुका है। इस बार चुनाव परिणाम को लेकर कोई भी निश्चित नहीं है। परिणाम क्या होगा यह तो तेईस तारीख को पता चल ही जाएगा लेकिन अभी चर्चा में है महाराष्ट्र का चुनाव प्रचार। महाराष्ट्र जैसा दिलचस्प चुनाव प्रचार पूरे देश में कहीं नहीं होता है,इसे निश्चित रूप से स्टाइलिश कैंपेन कहा जा सकता है। महाराष्ट्र के चुनाव प्रचार की खासियत यह होती है कि यहां की जनता बहुत अनुशासित होती है और नेता बहुत सम्माननीय होते हैं,यहां नेताओं के प्रति गहरी निष्ठा होती है इसीलिए जब वो मंच पर आते हैं तो इतनी गर्मजोशी से उनका स्वागत और अभिनन्दन होता है जैसे देवराज इंद्र पधारे हों और नेताओं से जनता का एक दिली लगाव तो होता ही है साथ ही उनके रिश्ते बिल्कुल घर जैसे होते हैं इसीलिए संबोधन भी घरेलू होते हैं दादा,ताई,काका, और साहेब। नेता भी आपस में एक दूसरे का जिक्र इसी तरह के संबोधन से करते हैं फिर चाहे वो विरोधी पार्टी के नेता ही क्यों न हों।
यहां सभी पार्टियां अजीत पवार का जिक्र करती हैं तो उनके नेता उनको अजीत दादा ही बोलते हैं,फिर चाहे अजीत दादा पर कोई आरोप ही क्यों न लगाना हो। इसी तरह की छोटी छोटी बातों से यहां के चुनाव प्रचार में एक घरेलू वातावरण बन जाता है जो देश में और कहीं देखने को नहीं मिलता ।यहां का चुनावी वातावरण ऐसा होता है कि महिलाएं भी चुनावी सभा में स्वयं को सहज महसूस करती हैं। यही कारण है कि चुनावी सभाओं में जितनी संख्या में महिलाएं महाराष्ट्र में इकट्ठी होती हैं उतनी और किसी राज्य में नहीं,पूर्वोत्तर के राज्यों भी महिलाएं बहुत आती हैं लेकिन उसके कुछ अलग कारण हैं।
बात महाराष्ट्र की करें तो यहां की चुनावी सभाएं बहुत अनुशासित होती हैं और पंडाल का माहौल लगभग वैसा ही होता है जैसा उत्तर भारत में किसी सांस्कृतिक आयोजन का होता है । चुनावी भीड़ में महिलाओं के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होती और न ही किसी प्रकार के हुड़दंग की स्थिति निर्मित होती है ।यहां सभी मराठी मानुष होते हैं जो मराठी अस्मिता का पूरा ध्यान रखते हैं।
अब यदि नेताओं की बात करें तो हर नेता का अपना स्टाइल होता है,अजीत पवार और राज ठाकरे का सेंस ऑफ ह्यूमर जबरजस्त होता है इनकी सभा एक कॉमेडी शो जैसी हो जाती है इसलिए इनकी सभाओं में भीड़ ज्यादा होती है और भीड़ सिर्फ इनके चुटकुले सुनने ही आती है। अजीत पवार विरोधाभासी नेता हैं उनकी निष्ठा किधर है यह क्लियर नहीं है लेकिन लोगों की नजर में वो पंवार साहेब के भतीजे हैं यही उनकी टीआरपी है और इसको कैसे भुनाया जाये यह अजीत दादा अच्छे से जानते हैं अजित दादा का दबदबा भी अच्छा है इसीलिए कोई लिबर्टी नहीं ले पाता,यहां तक कि सारे नेता उनको दादा ही कहते हैं फिर चाहे फडणवीस हों, नवाब मलिक हों या कोई और सभी अजीत दादा की पोजिशन का ध्यान रखकर बोलते हैं।
अजीत दादा के भाषण भी रोचक होते हैं और कभी कभी बिलो द बेल्ट भी होते हैं लेकिन मराठी मानुष को सब चलता है इसीलिए पिछले चुनाव में उनका दिया गया डायलॉग बहुत चर्चित हुआ था जिसे सोशल मीडिया पर भी खूब उछाला गया और उसके कार्टून भी बनाए गए थे ,अजीत दादा ने कहा था “यहां के डैम में पानी नहीं है तो मैं पेशाब से भर दूं क्या ? अजीत दादा के इस डायलॉग से जहां उनके समर्थक बहुत रोमांचित हुए थे वहीं विरोधियों ने तीखी आलोचना की थी, और राज ठाकरे की पार्टी ने कार्टून बनाकर एक डैम का नाम ही “अजीत दादा मूत्रालय” दर्शा दिया था। अजीत दादा, भाषण के मामले में शरद पवार से अलग हैं ।
शरद पवार ज्यादातर काम की बातें ही करते हैं और जनता से घर के वरिष्ठ सदस्य की तरह बात व्यवहार करते हैं, यही उनकी ताकत भी है इसीलिए वे लोगों के पवार साहेब हैं,जिनका आधे महाराष्ट्र पर कब्जा है । उनकी राजनीति भाषण पर आधारित नहीं है बल्कि व्यक्तिगत संबंधों के दम पर वो पंवार साहेब बने हैं।महाराष्ट्र में साहेब बनना आसान नहीं है,वहां सिर्फ दो ही साहेब हुए हैं पंवार साहेब और बाला साहेब ,और इन दोनो का ही पूरे महाराष्ट्र पर कब्जा रहा है,ये दो सम्राट की तरह छाए रहे लेकिन दोनों की शैली भिन्न है।
बाला साहेब की बात सबसे अलग है क्योंकि उनमें बहुत से गुण थे,उनका व्यक्तिगत संपर्क तो मजबूत था ही उसके साथ उनके भाषण भी बहुत दमदार और रोमांचक होते थे, बाला साहेब की भाषा शैली इतनी अलग थी कि उनकी भाषा को लोगों ने अलग ही नाम दे दिया “ठाकरी भाषा” इस भाषा में असहनीय तीखेपन के साथ चुटकुले की मिठास भी होती थी और गालियों का नमक और साथ ही इतिहास,साहित्य और संस्कृति का ज्ञान भी इसलिए उनके जैसा नेता पूरे देश में कोई और नहीं था। उनकी इसी ठाकरी भाषा के सही उत्तराधिकारी बनकर उभरे हैं राज ठाकरे, जिनके भाषण में वे सभी तत्व हैं जो बाला साहेब में थे। उनका ह्यूमर भी कमाल का है इसीलिए राज के भाषण में तीखे प्रहार के साथ मजेदार जोक्स भी होते हैं और उनकी सभा एक अच्छा खासा कॉमेडी सर्कस होती है । राज भी बाला साहेब की तरह मिमिक्री करते हैं। वे सभी नेताओं की मिमिक्री इतनी परफेक्ट करते हैं कि एक बार शरद पंवार ने कहा था कि “राज यदि नेता नहीं होता तो फिल्मी हीरो जरूर होता”।
राज पूरी तरह बाला साहेब का प्रतिबिंब लगते हैं, बहुत डायनेमिक हैं और बुलंद आवाज़ है साथ ही तेवर भी वही हैं,राज की सभा में आधी भीड़ तो इसलिए भी होती है कि लोगों को उनमें बाला साहेब स्पष्ट नज़र आते हैं। राज की सभा में महिलाएं बहुत बड़ी संख्या में आती हैं, देश में किसी भी नेता की सभा में इतनी महिलाएं नहीं आतीं इसका कारण है कि वे यहां सुरक्षित महसूस करती हैं । राज भी सभा में कोई भी बदसलूकी नहीं कर सकता खासकर महिलाओं के साथ, ऐसा ही प्रभाव बाला साहेब का हुआ करता था ।
राज में पूरे बाला साहेब उतर जाते है,किसी नेता की इतनी परफेक्ट कॉपी कहीं और देखने को नहीं मिली । किसी पिता पुत्र में भी इतनी समानता देखने को नहीं मिलती,यहां तक कि बाला साहेब के किसी भी पुत्र में उनकी ऐसी झलक दिखाई नहीं देती ,उनके खुद के द्वारा बनाए गए राजनीतिक उत्तराधिकारी उद्धव भी बाला साहेब जैसे नहीं लगते, उद्धव की शैली अलग है,हालांकि राजनीति में मौलिक शैली ही बेहतर मानी जाती है,उद्धव की शैली भी मौलिक है लेकिन लोग उनमें बाला साहेब देखना चाहते हैं इसलिए उद्धव ने अपने स्वभाव के विपरीत थोड़ा तीखापन लाने की कोशिश की है,और काफी हद तक सफल भी हुए हैं,इसका सबूत है उनकी सभाओं में उमड़ने वाली भीड़। राज के बाद किसी की सभा से सबसे ज्यादा भीड़ आ रही है तो वो उद्धव की सभा हैं। हालांकि उद्धव की सभा इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि उनकी सभा में जो भीड़ आ रही है वो इंटीरियर इलाकों में आ रही है जबकि राज मुंबई में भीड़ जुटाते हैं,मुंबई में भीड़ जुटाना इतना कठिन नहीं है जितना इंटीरियर में ।
उद्धव के भाषण अब बेहतर हो गए हैं,अब वो भी तीखी और मीठी मिक्स भाषा बोलते हैं, यही ठाकरी भाषा कहलाती है। ठाकरी भाषा के दो प्रतिनिधि और हैं एक संजय राउत जो रोज टीवी पर बोलते हैं और दूसरे आदित्य ठाकरे जो टीवी पर तो बोलते ही हैं और सभाओं में भी खूब बोलते हैं। खास बात यह है कि आदित्य ने खुद को शिवसेना का अगला उत्तराधिकारी साबित कर भी दिया है,आदित्य भी अन्य ठाकरे की तरह इंटेलिजेंट और नॉलेजेबल हैं साथ भी उनमें बाला साहेब के तेवर और उद्धव की विनम्रता का मिश्रण है।
राजनीति में सबसे ज्यादा सफल ऐसे नेता ही होते है इसीलिए आदित्य का भविष्य उज्जवल दिखाई देता है। हालांकि शुरुआत में आदित्य को शिवसेना का पप्पू भी कहा गया था लेकिन आदित्य ने अपनी मेहनत और काबिलियत से एक मैच्योर्ड नेता की इमेज बना ली है, इसकी झलक उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी देखी जा सकती है ,आदित्य को देखकर शिवसेना का भविष्य सुरक्षित लगने लगा है लेकिन फिलहाल उनकी शिवसेना की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उनकी टक्कर सीधे सीधे केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों से है और मोदी जी जैसे पॉपुलर प्रधानमंत्री के होते हुए उद्धव सेना की जीत आसान नहीं होगी इसलिए शिवसेना फिलहाल तो उतनी सशक्त नहीं होगी जितनी बाला साहेब के वक्त थी लेकिन भारत की राजनीति के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता ।
हमारी राजनीति दलबदलू नेताओं का स्वर्ग है इसलिए भविष्य में क्या होगा यह वक्त आने पर ही पता चलेगा,ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो एक्सपर्ट जानते हैं लेकिन अभी तो चुनाव प्रचार गर्मागर्म रहा ,बिल्कुल चना जोर गरम की तरह,बस इसका मजा लीजिए, जनतंत्र में जन के हाथ में बस यही काम होता है,सभा में ताली बजाने का अधिकार तो हमारा ही है,इसे कोई सरकार नहीं छीन सकती तो तेईस तारीख तक इंतजार कीजिए तब तक जय हिंद,जय महाराष्ट्र।
अमरेली जिले के चरवाहे, पशुपालन में अपना भविष्य देख रहे हैं और इससे लाखों रुपये कमा रहे हैं. यहां के प्रमुख पशुपालक प्रदीपभाई परमार ने गिर गायों के प्रजनन और बिक्री को व्यवसाय का रूप दिया है. वे असम, हरियाणा, पंजाब, बैंगलोर और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में गायें बेचते हैं. प्रदीपभाई महीने में 20 से अधिक गायें बेचते हैं और अच्छी नस्ल की गिर गायों के प्रजनन से यह संभव हो पाया है.
युवा कर रहे हैं पशुपालन में नवाचार
अमरेली जिले के युवा पशुपालन में रुचि लेकर अच्छी नस्ल की गाय और भैंसें पाल रहे हैं. गिर गाय और भैंसों से प्राप्त दुग्ध उत्पादन इनके व्यवसाय का प्रमुख हिस्सा है. सौराष्ट्र में एक गिर गाय की कीमत लाखों रुपये होती है, जबकि एक लीटर दूध का दाम 70 से 100 रुपये के बीच रहता है. एक गाय से महीने में 30 से 40 हजार रुपये तक की आमदनी होती है.
गुजरात की प्रसिद्ध गिर और कपिला गायें
गुजरात में गिर गाय का विशेष महत्व है, लेकिन कपिला गाय भी काफी चर्चित है. दमनगर गांव के एक चरवाहे के पास गिर गाय है, जिसकी कीमत 1.20 लाख रुपये आंकी गई है. यह गाय प्रतिदिन 14 लीटर दूध देती है. गाय के दूध से तैयार घी और अन्य उत्पादों से ग्रामीण क्षेत्रों में काफी आर्थिक प्रगति हो रही है.
हिंदू संस्कृति और गाय का महत्व
हमारी हिंदू संस्कृति में गाय का विशेष स्थान है. शोध से यह सिद्ध हुआ है कि गाय के दूध में स्वर्ण तत्व होते हैं. अमरेली जिले में काली कपिला, सफेद कपिला और गिर गाय जैसी विशेष नस्लें पाई जाती हैं. इन गायों की उच्च गुणवत्ता और दूध उत्पादन क्षमता ने पशुपालन व्यवसाय को नई ऊंचाई पर पहुंचाया है.
नौकरी छोड़ अपनाया पशुपालन
प्रदीपभाई परमार ने ग्रेजुएशन तक पढ़ाई की और कुछ समय तक पुलिस विभाग में नौकरी की. बाद में उन्होंने नौकरी छोड़कर पशुपालन का व्यवसाय शुरू किया. वर्तमान में वे गिर गायों की बिक्री और प्रजनन का कार्य कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि उनके पास एक गिर गाय है जिसकी कीमत 1.20 लाख रुपये है और यह 14 लीटर दूध देती है. इस दूध से घी बनाया जाता है, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त होती है.
समृद्धि का साधन बन रहा पशुपालन
अमरेली जिले के लोग पशुपालन के माध्यम से न केवल आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं, बल्कि इसे आधुनिक तरीके से संचालित कर रहे हैं. गिर गाय की बढ़ती मांग और उच्च दूध उत्पादन ने पशुपालन को एक लाभदायक व्यवसाय बना दिया है.
MP News: गाय को लेकर देशभर में बहस छिड़ी रहती है, गौ पालन के मुद्दे पर सियासत भी जमकर होती है. इस बीच मध्य प्रदेश में पूर्व मंत्री और बीजेपी के एक विधायक ने गौ पालन को लेकर नई डिमांड की है. उनका कहना है कि जो लोग गाय पालते हैं, उन्हें ही चुनाव लड़ने का अधिकार मिलना चाहिए. जिसके बाद से ही विधायक के इस बयान की चर्चा तेजी से सियासी गलियारों में हो रही है. जबकि उन्होंने हर पंचायत में गौशाला खोलने की मांग भी की है.
दरअसल, मंदसौर जिले की सुवासरा विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक और पूर्व मंत्री हरदीप सिंह डंग ने गौपालन को लेकर यह डिमांड की है. दरअसल, आगर मालवा जिले के सालरिया स्थित कामधेनु गौ अभयारण में चल रही एकवर्षीय गौ कथा में हरदीप सिंह डंग पहुंचे हुए थे, जहां उन्होंने कहा ‘नेता खाली भाषण दे रहे है कि गौमाता के लिए वो यह करते हैं वो करते हैं, लेकिन ऐसा दिखता नहीं है. लेकिन मेरा मानना है कि भारत में ऐसा कानून बनना चाहिए कि कोई भी पंच सरपंच विधायक सांसद कोई सा भी चुनाव लड़े, जो गौ माता पाले उसे ही चुनाव लड़ने का अधिकार हो, जो गौ पालन नहीं करता है उसका फार्म रिजेक्ट कर देना चाहिए. खाली बोलने से काम नहीं चलेगा.’
हमारे देश में गाय को पूजा जाता है। उसे एक मां का दर्जा दिया जाता है। कई लोगों के घरों में गाय पाली जाती हैं। गाय हमारी तमाम जरूरतों को पूरा करती है। दूध-दही से लेकर गाय का गोबर भी हमारे काम में आता है। गाय का दूध मनुष्यों के लिए पोषण का प्राथमिक स्रोत है। वहीं, इसके गोबर का उपयोग प्राकृतिक उर्वरक के रूप में किया जाता है। हिंदू धर्म में गायों को धन और समृद्धि की देवी, मां लक्ष्मी का अवतार भी माना गया है। कहते हैं कि एक गाय के अंदर कई देवी-देवताओं का वास होता है। गाय एक मां की तरह ही हमारे पूरे परिवार का भरण-पोषण करती है। इन सभी लिखी गई बातों को आप इस वीडियो को देखने के बाद अच्छी तरह से समझ जाएंगे कि आखिर गाय को मां क्यों कहते हैं।
परिवार को खुशियों से भर देती है गाय
वायरल हो रहे इस वीडियो में देखा जा सकता है कि एक महिला गाय का दूध निकाल रही है। गाय चुपचाप बिल्कुल शांत खड़ी है। एक बच्चा है जो गाय के गले लगा हुआ है और उसकी गर्दन को पकड़कर उस पर लटक रहा है। इसके बावजूद भी गाय बिल्कुल शांत होकर खड़ी है। वीडियो देख ऐसा लग रहा है जैसे कोई बच्चा अपनी मां की गोद में खेल रहा हो। शायद गायों में भी हमारी मां की तरह ममता का भाव कूट-कूटकर भरा हो। वीडियो से आप यह भी समझ सकते हैं कि एक गाय कैसे पूरे परिवार को खुशियों से भर देती है।
“मां तो आखिर मां ही होती है”
इस वीडियो को सोशल साइट एक्स पर @Gulzar_sahab नाम के अकाउंट से शेयर किया गया है। जिसे खबर लिखे जाने तक करीब डेढ़ लाख लोगों ने देखा और 5 हजार लोगों ने लाइक किया है। वीडियो पर कई लोगों ने कमेंट करते हुए अपना रिएक्शन भी दिया है। जहां एक यूजर ने लिखा – गाय अगर हमारे घर से चली जाती है तो हमें बहुत दुख होता है। ये एक ऐसी जानवर है जिसके लिए हमें अन्य जानवरों से कहीं ज्यादा दुख होता है। दूसरे ने लिखा – बचपन में मैं भी अपनी गाय के साथ ऐसे ही खेला करता था।
भारत की सबसे बड़ी उद्यमी ट्रेन यात्रा युवा लीडरों को प्रेरित करेगी और दुनिया को ‘मध्य भारत’ दिखाएगी
मुंबई। जागृति यात्रा 2024 देश भर से चुने गए 500 युवा परिवर्तनकर्ताओं के साथ 15 दिन की एक अतुलनीय यात्रा पर निकलने के लिए तैयार है। 16 नवंबर से शुरु हुई यह यात्रा भारत भर में ट्रेन द्वारा 15 दिन में 8,000 किलोमीटर का अभियान पूरा करेगी। नरीमन प्वाइंट मुंबई, यशवंत राव चव्हाण ऑडिटोरियम में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जागृति यात्रा के सीईओ आशुतोष कुमार और सीओओ चिन्मय द्वारा यह जानकारी साझा की गई।
जागृति यात्रा 2024 के बारे में जानकारी देते हुए आशुतोष कुमार ने कहा कि 15 दिनों की यह अनूठी ट्रेन यात्रा युवा लीडरों को भारत के टियर 2 और टियर 3 शहरों में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के लिए प्रेरित और सशक्त बनाने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि मुंबई से शुरू हुई इस साल की यात्रा 500 युवा प्रतिभागियों को 12 शहरों से होते हुए 8,000 किलोमीटर की यात्रा पर ले जाएगी। इनमें से 50% से अधिक सफल उद्यमी हैं, जो बाकी लोगों के लिए संभावित रोल मॉडल हैं।
उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम मीडिया को भारत के कुछ सबसे प्रभावशाली उद्यमियों और देश के कोने-कोने से बदलाव लाने वालों से मिलने और बातचीत करने का मौका देगा। अपनी तरह के सबसे बड़े आंदोलन के रूप में, यह यात्रा उद्यमिता के लिए एक जीवंत इनक्यूबेटर के रूप में कार्य करती है, जो भारत की कुछ सबसे बड़ी चुनौतियों के लिए वास्तविक दुनिया के समाधान खोजने के लिए विभिन्न पृष्ठभूमि के युवाओं को सशक्त बनाती है।
आशुतोष कुमार ने कहा कि जागृति सेवा संस्थान द्वारा आयोजित यह वार्षिक यात्रा एक मोबाइल इनक्यूबेटर के रूप में कार्य करती है, जो प्रतिभागियों को मध्य भारत के हृदय स्थल से होकर ले जाती है, जहां नवाचार की सबसे आकर्षक कहानियां प्रतीक्षा कर रही हैं।
अपने 17वें वर्ष में, एसबीआई द्वारा समर्थित जागृति यात्रा विविध पृष्ठभूमि से जोशीले युवा उद्यमियों को एक साथ लाती है, जो उन्हें भारत के टियर 2 और टियर 3 शहरों की वास्तविकताओं को समझने और हल करने के लिए सशक्त बनाती है। अहमदाबाद, दिल्ली और चेन्नई सहित 12 गतिशील स्टॉप के दौरान, ‘यात्री’ के रूप में प्रतिभागी जमीनी स्तर के शोधकर्ताओं और सामाजिक उद्यमियों से मिलेंगे, जो पहले से ही भारत के भविष्य को फिर से परिभाषित कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यह यात्रा देश के शीर्ष मीडिया आउटलेट्स के लिए परिवर्तन की प्रभावशाली कहानियों को हासिल करने के लिए एक दुर्लभ मंच प्रदान करेगी, क्योंकि युवा लीडर स्थानीय नायकों से जुड़ते हैं और भारत की सरलता की अनकही कहानियों का पता लगाते हैं।
मीडिया के लिए मुख्य आकर्षण ऐसी कहानियां होंगी, जिन्हें आप मिस नहीं करना चाहेंगे। मीडियाकर्मियों के पास उन उद्यमियों से सीधे जुड़ने का एक अनूठा मौका है, जो स्वास्थ्य सेवा, टिकाऊ खेती और शिक्षा के क्षेत्र में नई ज़मीन तैयार कर रहे है। ऐसे दूरदर्शी उद्यमशीलता की भावना का उदाहरण देते हैं, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा की कहानियों से बाहर रखा जाता है।
भारत के उभरते नेताओं पर स्पॉटलाइट प्रतिस्पर्धी चयन प्रक्रिया के माध्यम से चुने गए, 21-27 वर्ष की आयु के प्रतिभागी सामाजिक परिवर्तन के लिए जुनून और भारत के भविष्य को आकार देने की प्रतिबद्धता से प्रेरित हैं। 28 से अधिक उम्र के सलाहकारों द्वारा समर्थित, वह अंतर पीढ़ी की अंतर्दृष्टि प्राप्त करते हैं और नेतृत्व कौशल विकसित करते हैं।
जागृति यात्रा को कवर करके, रिपोर्टर उन युवा भारतीयों की आवाज़ और कहानियों को सामने ला पाएंगे, जो मध्य भारत की भावना का प्रतिनिधित्व करते हैं, और आकांक्षा को कार्रवाई में बदलते हैं।
आशुतोष ने कहा कि जागृति यात्रा 2024, मीडिया के सदस्यों को आमंत्रित किया गया है, ताकि भारत के जीवंत उद्यमशीलता कोर को प्रकट करने वाली कहानियों को कैप्चर किया जा सके।
जागृति यात्रा के बारे में बता दें कि यह जागृति सेवा संस्थान की एक प्रमुख पहल है, जो युवा भारतीयों को अनुभवात्मक शिक्षा, उद्यमशीलता और सतत परिवर्तन के माध्यम से सामाजिक रूप से जागरूक नेता बनने के लिए सशक्त बनाती है। 2008 में स्थापित, इस गैर-लाभकारी संस्था ने पूरे भारत में सामाजिक रूप से जागरूक नेतृत्व की लहर को उत्प्रेरित किया है, जो वैश्विक प्रासंगिकता वाले स्थानीय समाधानों को प्रेरित कर रहे हैं।
महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग 20 नवंबर को होगी। अब मतदान में बहुत कम दिन ही बचे हैं और सियासत चरम पर है। वोटिंग से ठीक दो दिन पहले सीएम एकनाथ शिंदे ने रविवार को बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि वो सीएम पद की रेस में कहीं नहीं हैं। न्यूज एजेंसी आजतक से बातचीत में शिंदे ने कहा कि ये भी तय है कि सीएम महायुति का ही होगा लेकिन मैं किसी रेस में नहीं। बता दें कि इससे ठीक एक दिन पहले ही महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस ने भी न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में भी यही बात कही थी। तो अब महायुति की सरकार बनी तो सीएम कौन होगा, इसपर अभी से सस्पेंस शुरू हो गया है।
फडणवीस ने कहा था-मैं सीएम रेस में नहीं
फडणवीस ने 16 नवंबर को एएनआई को दिए इंटरव्यू में कहा था कि एनसीपी (SP) चीफ शरद पवार परिवार और पार्टी तोड़ने में महारथी हैं। एनसीपी और शिवसेना अपनी अति महत्वाकांक्षाओं के कारण टूटीं।क्योंकि उद्धव सीएम बनना चाहते थे, इसलिए उन्होंने हमसे नाता तोड़ लिया। मुख्यमंत्री बनने के बाद वे आदित्य ठाकरे को आगे लाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने एकनाथ शिंदे को सफोकेट करने की कोशिश की।उद्धव ठाकरे के लिए भाजपा के दरवाजे बंद हो चुके हैं। महाराष्ट्र में पार्टी भविष्य में भी कभी उनके साथ नहीं जाएगी। शिंदे को सीएम बनाने की जानकारी मुझे पहले से थी। मैं मुख्यमंत्री या अध्यक्ष किसी भी रेस में नहीं हूं।
शिंदे ने पीएम मोदी के नारे का किया समर्थन
सीएम शिंदे ने कांग्रेस पर जमकर तंज कसा और कहा कि कांग्रे की नीति फूट डालो राज करो की है। राहुल गांधी, बाला साहेब ठाकरे को हिंदू हृदय सम्राट कब कहेंगे? बालासाहेब ठाकरे खुद कहते थे कि मैं अपनी पार्टी को कभी भी कांग्रेस की पार्टी नहीं बनने दूंगा, लेकिन उद्धव ठाकरे खुद के स्वार्थ और मुख्यमंत्री बनने के लिए कांग्रेस के साथ चले गए। शिंदे ने इसके साथ ही पीएम मोदी के ‘एक हैं तो सेफ हैं’ नारे का भी समर्थन किया।
एक समय था जब ब्रिगेडियर उस्मान को बंटवारे के समय पाकिस्तान का सेनाध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव दिया गया था लेकिन उन्होंने यह कहकर इनकार कर दिया था कि भारत मेरा देश है इस धरती में मेरे बुजुर्ग दफन हैं। उन्होंने पाकिस्तान का सेनाध्यक्ष बनने की बजाय भारत का ब्रिगेडियर बने रहना स्वीकार किया और अपना नौसेरा बचाने के लिये शहीद हो गये। वह तो अनिश्चितता का समय था,जान-माल का खतरा था किंतु आज तो निश्चिंतता का समय है। संवैधानिक और नियामक संस्थायें देश को आजादी के प्रति सजग कर रहीं हैं ऐसे दौर में कुछ खबरें हैरान भी करतीं हैं और चिंतित भी।
संसद में एक प्रश्न के उत्तर में बताया गया है कि पिछले 10 सालों में लगभग 15 लाख भारतीय नागरिकों ने देश की नागरिकता त्याग दी है । इससे भी जो ज्यादा चिंताजनक आंकड़ा है वह यह कि अमेरिका में शरण मांगने वाले भारतीयों की संख्या में 855 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका में शरण मांगने वाले दो तरह से शरण के लिए आवेदन करते हैं एक तो वह जिन्हें एफर्मेटिव कहा जाता है और दूसरा वे जिन्हें डिफेंसिव कहा जाता है। डिफेंसिव यानि वे जो सुरक्षा की दृष्टि से अमेरिका में शरण की गुहार लगाते हैं । अमेरिका की होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट की इमीग्रेंट एनुअल फ्लो रिपोर्ट बताती है कि 2023 में अमेरिका में शरण चाहने वाले आवेदकों में 41हजार 330 भारतीय शामिल थे जो कि 2022 की तुलना में 855 फ़ीसदी ज़्यादा हैं और भी आश्चर्यजनक बात यह है कि इसमें से आधे आवेदक गुजरात राज्य के हैं। जहां 2014 के बाद समृद्धि का विस्फोट हुआ है। समझना जरूरी है कि उन भारतीयों ने क्यों कर सुरक्षा एसाईलम के लिये आवेदन किया है? वर्ष 2022 में शरणार्थी के रूप में आवेदन करने वाले 14 हजार 570 भारतीयों में से 9200 ने डिफेंसिव एसाईलम यानि सुरक्षा शरण का आवेदन किया है।
भारत की अर्थव्यवस्था के उछालें भरने के दावे ,आम नागरिक के लिये सुरक्षा की गारंटी और बेहतर अवसरों के प्रचार के बीच भी अगर 41हजार 330 नागरिक अमरीका में शरण मांग रहे हैं और उनमें भी 50% से अधिक सुरक्षा कारणों से तो यह पड़ताल का विषय होना ही चाहिए ? इन सुरक्षा शरण चाहने वाले भारतीयों को देश में क्या खतरा लग सकता है? उनमें से आधे उस राज्य से क्यों हैं जिसमें सर्वाधिक विकास के दावे किये जा रहे हैं?
एलपीआर रिपोर्ट के अनुसार अमरीका में लगभग 28 लाख भारत में जन्मना नागरिक रहते हैं जो मेक्सिको में पैदा हुए अमरीकी नागरिकों के बाद सर्वाधिक संख्या है।अकेले 2022 में ही 1लाख 28 हजार 878 मेक्सीकन,65 हजार960 भारतीय,53 हजार 413 फिलिपाईन नागरिकों को अमरीकी नागरिकता के लिये न्यूट्रिलाईज किया गया है।
ऐसा माना जाता है कि सामान्यतःआर्थिक ,शैक्षणिक अवसरों और राजनैतिक स्थिरता को देखते हुए सुरक्षित भविष्य की तलाश में लोग अपनी नागरिकता त्याग करने का कठिन फैसला लेते हैं। अमरीका में रहने वाले 28 लाख 31 हजार 330 भारतीयों में 42 फीसदी भारतीय , अमरीकन नागरिकता के लिये अपात्र हैं। इसके बावजूद भारतीय ब्रेन इतनी बड़ी तादाद में जोखिम क्यों उठा रहा है?
मोटा-मोटी सभी देशों से आर्थिक प्रवासी अवसरों की तलाश करते हैं जिसमें आऊटफ्लो और इनफ्लो की मात्रा देश की वास्तविक परिस्थितियों का बखान कर देती है।
जिन 10 वर्षों में 15 लाख भारतीयों ने नागरिकता छोड़ने का आवेदन किया है उसी दौरान विगत पांच सालों में मात्र 5 हजार 220 विदेशियों को भारतीय नागरिकता दी गई है उनमें 4 हजार 552 यानि 87 फीसदी पाकिस्तानी, 8 फीसदी अफगानिस्तानी और 2 फीसदी बंगलादेशी हैं। इसका अर्थ है कि भारतीय नागरिकता त्यागने वालों के मुकाबले भारतीय नागरिकता चाहने वालों की संख्या 1 प्रतिशत भी नहीं है।
लंदन की हेनली एंड पार्टनर की एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 7 हजार सुपर रिच धनाढ्य भारत की नागरिकता छोड़ सकते हैं।सरकार ने राज्यसभा में बताया है कि वह इन लोगों की व्यावसायिक पृष्ठभूमि के बारे में अनभिज्ञ है।भारतीय टेक्स कानूनों,स्वास्थ्य सुविधाओं और इनवेस्टमेंट माईग्रेशन नागरिकता त्यागने की नयी वजह के रूप में सामने आ रही है। मेहुल चौकसी जैसे लोग इसी इवेस्टमेंट माईग्रेशन के नाम पर भाग खड़े हुए हैं।
नागरिकता छोड़ने का एक कारण यह भी है कि कई देश दोहरी नागरिकता स्वीकार नहीं करते,दूसरा बड़ा कारण अन्य देशों में निर्वाध आवाजाही के लिये भारतीय पासपोर्ट पर केवल 60 देशों में वीजा फ्री या आगमन पर वीजा सुविधा उपलब्ध है जबकि अमरीकन पासपोर्ट पर 186 देशों में यह सुविधा प्राप्त है। जन्म से भारतीय विदेशी नागरिकों को भारत में ओसीआई(ओवरसीज सिटीजन आफ इंडिया के रूप में पंजीकृत किया जा सकता है) माना जाता है। गृह मंत्रालय ने सदन को जानकारी दी है कि आज ओसीआई की संख्या 1लाख 90 हजार है जो 2005 में मात्र 300 हुआ करती थी।इसका अर्थ है कि लगभग 8 फीसदी नागरिकता त्यागने वाले भारतीय ही ओसीआई के रूप में देश से जुड़े रहना चाहते हैं।
अवसरों की तलाश और बेहतर जीवन की महत्वाकांक्षा मानव स्वभाव है किंतु जब अवसर देश से बड़ा बनने लगे तो मानिये चिंता का समय आ गया है।(विभूति फीचर्स)