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आज प्रधानमंत्री दलहन की खेती में लगे किसानों से बातचीत करेंगे

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प्रधानमंत्री 11 अक्टूबर को नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में विशेष कृषि कार्यक्रम में भाग लेंगे

New Delhi – प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी 11 अक्टूबर 2025 को सुबह 10:30 बजे नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में विशेष कृषि कार्यक्रम में भाग लेंगे। प्रधानमंत्री किसानों से बातचीत करेंगे। श्री मोदी उसके बाद एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लेंगे, जहाँ वे इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करेंगे।

यह कार्यक्रम किसान कल्याण, कृषि आत्मनिर्भरता और ग्रामीण बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करने के प्रति प्रधानमंत्री की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह आधुनिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने, किसानों का समर्थन करने और किसान-केंद्रित प्रयासों में महत्वपूर्ण उपलब्धियों का उत्सव मनाने पर केंद्रित होगा।

प्रधानमंत्री कृषि क्षेत्र में 35,440 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली दो प्रमुख योजनाओं का शुभारंभ करेंगे।  वह 24,000 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना का शुभारंभ करेंगे। इसका उद्देश्य कृषि उत्पादकता में वृद्धि, फसल विविधीकरण और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना, पंचायत और ब्लॉक स्तर पर फसलोत्तर भंडारण क्षमता में वृद्धि, सिंचाई सुविधाओं में सुधार और चयनित 100 जिलों में दीर्घकालिक और अल्पकालिक ऋण की उपलब्धता को सुगम बनाना है।

प्रधानमंत्री 11,440 करोड़ रुपये के परिव्यय वाले “दलहन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता मिशन” का भी शुभारंभ करेंगे। इसका उद्देश्य दलहन उत्पादकता के स्तर में सुधार, दलहन की खेती के रकबे का विस्तार, मूल्य श्रृंखला – खरीद, भंडारण, प्रसंस्करण – को मजबूत करना और नुकसान को कम करना सुनिश्चित करना है।

प्रधानमंत्री कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रों में 5,450 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की परियोजनाओं का उद्घाटन और राष्ट्र को लोकार्पण करेंगे। प्रधानमंत्री लगभग 815 करोड़ रुपये की अतिरिक्त परियोजनाओं की आधारशिला भी रखेंगे।

प्रधानमंत्री जिन परियोजनाओं का शुभारंभ करेंगे उनमें बेंगलुरु और जम्मू-कश्मीर में कृत्रिम गर्भाधान प्रशिक्षण केंद्र; अमरेली और बनास में उत्कृष्टता केंद्र; राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत असम में आईवीएफ लैब की स्थापना; मेहसाणा, इंदौर और भीलवाड़ा में दूध पाउडर संयंत्र; तेजपुर, असम में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मछली चारा संयंत्र; कृषि प्रसंस्करण क्लस्टरों के लिए बुनियादी ढांचा, एकीकृत कोल्ड चेन और मूल्यवर्धन अवसंरचना, आदि शामिल हैं।

प्रधानमंत्री जिन परियोजनाओं की आधारशिला रखेंगे उनमें कृष्णा, आंध्र प्रदेश में एकीकृत कोल्ड चेन और मूल्यवर्धन अवसंरचना (विकिरण); उत्तराखंड में ट्राउट मत्स्य पालन; नागालैंड में एकीकृत एक्वा पार्क; कराईकल, पुडुचेरी में स्मार्ट और एकीकृत मत्स्य पालन बंदरगाह;  और ओडिशा के हीराकुंड में अत्याधुनिक एकीकृत एक्वापार्क, आदि।

कार्यक्रम के दौरान, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत प्रमाणित किसानों, मैत्री तकनीशियनों और प्राथमिक कृषि सहकारी ऋण समितियों (पीएसीएस) को क्रमशः प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्रों (पीएमकेएसके) और सामान्य सेवा केंद्रों (सीएससी) में परिवर्तित होने के प्रमाण पत्र वितरित करेंगे।

यह कार्यक्रम सरकारी प्रयासों के तहत हासिल की गई महत्वपूर्ण उपलब्धियों को भी चिह्नित करेगा। इसमें 10,000 एफपीओ में 50 लाख किसान सदस्यता शामिल है, जिनमें से 1,100 एफपीओ ने 2024-25 में ₹1 करोड़ से अधिक का वार्षिक कारोबार दर्ज किया। अन्य उपलब्धियों में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत 50,000 किसानों का प्रमाणन; 38,000 मैत्री (ग्रामीण भारत में बहुउद्देशीय एआई तकनीशियन) का प्रमाणन; कम्प्यूटरीकरण के लिए 10,000 से अधिक बहुउद्देशीय और ई-पीएसीएस की मंजूरी और संचालन; तथा पैक्स, डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियों का गठन और सुदृढ़ीकरण शामिल हैं। 10,000 से अधिक पैक्स ने अपने कार्यों का विविधीकरण करके उन्हें प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र (पीएमकेएसके) और सामान्य सेवा केंद्र (सीएससी) के रूप में कार्य करना शुरू कर दिया है।

कार्यक्रम के दौरान, प्रधानमंत्री दलहन की खेती में लगे किसानों से बातचीत करेंगे, जिन्हें कृषि, पशुपालन और मत्स्य पालन में मूल्य-श्रृंखला-आधारित दृष्टिकोण स्थापित करने के उद्देश्य से विभिन्न सरकारी योजनाओं से लाभ हुआ है। इन किसानों को किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) की सदस्यता और कृषि अवसंरचना कोष के तहत सहायता भी प्राप्त हुई है।

नये भारत के शिल्‍पकार प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के नाम एक और कीर्तिमान

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(सुरेश पचौरी-विनायक फीचर्स)

भारत के यशस्‍वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने अपने राजनैतिक जीवन में एक और कीर्तिमान रच दिया । वह है – मुख्‍यमंत्री तथा प्रधानमंत्री के रूप में लगातार 24 वर्षों तक देशवासियों की सेवा करने का। श्री मोदी का 7 अक्‍टूबर 2001 को गुजरात के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेने से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक का सफर अनगिनत उपलब्धियों से भरपूर है । लोकप्रियता के शिखर पर विराजमान मोदी जी का प्रभामंडल आज इतना व्‍यापक बन चुका है कि वे अब ‘वर्ल्‍ड लीडर’ बन चुके हैं । उनके नेतृत्‍व में भारत चहुंमुखी विकास कर रहा है और हमारी अर्थव्‍यवस्‍था कई गुना छलांग लगा चुकी है। देश के चतुर्दिक हिस्‍से स्‍वयमेव विकास की गवाही दे रहे हैं । कश्‍मीर से लेकर कन्‍याकुमारी तक सड़कों, रेलमार्गों, हवाई अड्डों, औद्योगिक इकाइयों, विद्युत परियोजनाओं, मेडिकल कालेजों आदि का तेजी से विस्‍तार हो रहा है । देश में आतंकवाद व नक्‍सलवाद की जड़ें खोखली होती जा रही है, साथ ही आतंकवाद के प्रति भारत की जीरो टॉलरेंस की नीति से अब संपूर्ण विश्‍व प्रेरणा ले रहा है । आत्‍मनिर्भरता और सुरक्षा के मद्देनजर मोदी जी द्वारा उठाए गए कदमों से जनमानस में निश्चिंतता के भाव जागृत हुए हैं ।

‘नये भारत’ के शिल्‍पकार नरेन्‍द्र मोदी ने ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्‍वास और सबका प्रयास’ की अवधारणा के साथ विश्‍व को भारत की शक्ति से परिचित कराया । भारतीय लोकतंत्र में अनुशासन व अन्‍त्‍योदय के महत्‍व को नये सिरे से परिभाषित कर उसे व्‍यवस्‍था का मूल आधार बनाया ।
साढ़े बारह वर्षों तक गुजरात के मुख्‍यमंत्री रहे श्री मोदी ने गुजरात राज्‍य को औद्योगिक क्रांति का केन्‍द्र बनाकर सर्वांगीण विकास का ऐसा सिलसिला शुरू किया, जो कालांतर में ‘गुजरात मॉडल’ के रूप में जाना गया और देश के विभिन्‍न प्रदेशों ने उसे अपने-अपने राज्‍यों में अपनाकर उसे विकास का संप्रेरक माना । गुजरात में हरित क्रांति लाने का श्रेय भी मोदी जी को ही जाता है। गांव-गांव पानी पहुंचाकर लाखों एकड़ बेकार पड़ी भूमि को खेती योग्‍य बनाने के परिणाममूलक कार्य मोदी जी के ही मुख्‍यमंत्रित्‍व काल में हुए, जिससे लाखों किसान आज खुशहाली का जीवन जी रहे हैं । गुजरात की तुलना समृद्ध व विकसित राज्‍य के रूप में होने के पीछे मोदी जी का कुशल नेतृत्‍व, दूरदर्शी सोच व समर्पण अन्‍तर्निहित है ।

पार्टी के एक सामान्‍य कार्यकर्ता से शुरू हुई नरेन्‍द्र मोदी की सामाजिक व राजनैतिक यात्रा परिश्रम, त्‍याग, एकनिष्‍ठा व राष्‍ट्रप्रेम का जीता-जागता उदाहरण है । साधारण कार्यकर्ता से लेकर देश के प्रधान सेवक के रूप में उनके कालखंड पर दृष्टिपात करें तो यह अवधि सेवा, समर्पण और राष्‍ट्र प्रथम के अद्भुत समागम से परिपूर्ण मिलेगी। 17 वर्ष की आयु में उनके कदम जनसेवा के लिए जो आगे बढ़े, वे फिर कभी रूके नहीं । ‘इदं राष्‍ट्राय, इदं न मम्’ की उदात्त भावना से ओतप्रोत होकर उन्‍होंने अपना जीवन राष्‍ट्र की सेवा में समर्पित कर दिया । मोदी जी राजनीति में नैतिकता और शुचिता के पक्षधर हैं । राजनीति को वे सेवा का एक जरिया मानते हैं, धनार्जन का माध्‍यम नहीं ।

श्री नरेन्‍द्र मोदी एक ऐसे कर्मयोगी हैं, जिनका जीवन सेवा की संकल्‍पबद्धता तथा राष्‍ट्रबोध की दृढ़ता से ओतप्रोत है । वे ऐसे जननेता हैं, जिनके लिए संपूर्ण वसुधा कुटुम्‍बवत् है । वे भारत की 140 करोड़ जनता को अपना परिवार मानकर उसे मनसा, वाचा, कर्मणा व्‍यवहार में लाते हैं । उनके नेतृत्‍व में आज केवल आर्थिक रूप से ही नहीं वरन् सामरिक रूप से भी हमारा देश शक्तिशाली बना है । अमेरिका, रूस, चीन जैसे देश भारत का लोहा मानने लगे हैं । पड़ोसी देश चीन दोस्‍ती के लिए बेताब है । ‘आपरेशन सिंदूर’ की गाथा तो पूरे विश्‍व में गूंज रही है । दुनिया ने देखा है कि पाकिस्‍तान कैसे ‘त्राहिमाम्-त्राहिमाम्’ की स्थिति में आकर भारत के आगे गिड़गिड़ाया था । पहलगाम की घटना के बाद पाकिस्‍तान को सबक सिखाने का मोदी जी ने जो संकल्‍प लिया था, उसे पूरा कर देशवासियों को यह भरोसा दिलाया कि मोदी जो कहते हैं, उसे पूरा करते हैं । ‘मोदी है तो मुमकिन है’, यह कथन अब पुराना हो चुका है, अब तो ‘मोदी है तो देश सुरक्षित है’, यह विश्‍वास देशवासियों के दिलों में रच-बस गया है ।

प्रधानमंत्री ने देश की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को सदैव प्राथमिकता में रखा है, उनका मानना है कि हम सुरक्षित तभी रह सकते हैं, जब हमारे पास रक्षा संसाधन भरपूर मात्रा में उपलब्‍ध हों । इसी परिप्रेक्ष्‍य में केन्‍द्र सरकार ने देश के रक्षा बजट में काफी बढ़ोत्‍तरी की । रक्षा बजट 2014 में 46,429 करोड़ रूपये था, वह 2024 में 1.27 लाख करोड़ रूपये हो चुका है । देश में पहले 65-70 प्रतिशत रक्षा उपकरण आयात किये जाते थे वहीं अब 65 प्रतिशत रक्षा उपकरण भारत में ही तैयार हो रहे हैं । आज भारत लगभग 100 देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है और भारत का निर्यात 2013-14 में 686 करोड़ रूपये का था जो बढ़कर 23,000 करोड़ रूपये हो गया है ।

अंतर्राष्‍ट्रीय संदर्भों में बात की जाए तो आज पूरे विश्‍व में हमारे प्रधानमंत्री श्री मोदी की धाक जम चुकी है । विश्‍व मंच पर उनका कद बहुत ऊंचा हो चुका है, उनका नाम दूरदर्शी व अग्रणी नेताओं में शुमार हो चुका है । वे दुनिया के जिस भी देश में जाते हैं, वहां के राष्‍ट्राध्‍यक्ष अपने देश के सर्वोच्‍च नागरिक सम्‍मान से उन्‍हें नवाजने में गर्व का अनुभव करते हैं । विगत साढ़े ग्‍यारह वर्षों के दौरान मोदी जी ने अनेक देशों की यात्रा की, उन देशों के साथ विभिन्‍न क्षेत्रों में हुए एमओयू इस बात के संकेत हैं कि मोदी जी ऐसे हर देश के लिए भारत का दरवाजा खोल रहे हैं, जो यहां आकर हमारी नीतियों और शर्तों के अनुसार निवेश करें, जिससे भारत समृद्धशाली बने । उल्‍लेखनीय है कि भारत के मित्र देशों की संख्‍या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है, जो उभयपक्षीय व्‍यावसायिक हितों के मद्देनजर एक सुखद संकेत हैं।

मोदी जी के व्‍यक्तित्‍व में भारत, भारतीयता और भारतीय संस्‍कृति का समुच्‍चय समाहित है । उनका विजन है कि भारत तरक्‍की करे, भारतीयता बरकरार रहे और भारतीय संस्‍कृति का संरक्षण-संवर्धन हो। इस दिशा में उनके निर्देशन में राजनैतिक, सामाजिक, सांस्‍कृतिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में हुए कार्य स्‍तुत्‍य हैं । उनके नेतृत्‍व में आज ‘नया भारत’ दुनिया के सामने सर ऊंचा कर चल रहा है । भारत मजबूत तो बना ही है, अब वह ‘अजेय’ बन चुका है ।

श्री मोदी जी के नेतृत्व में आज का भारत विश्‍वगुरू बनने की ओर अग्रसर है। अपने आत्‍मबल के सहारे हमारा देश दुनिया का प्रेरक बन चुका है। श्री नरेन्‍द्र मोदी ने पिछले 24 वर्षों में देश दुनिया की सोच बदल दी । उनकी विकासोन्‍मुखी व जनहितैषी योजनाओं एवं समाज के सर्वहारा वर्ग के कल्‍याण के लिए उठाए गए कदमों की वजह से जो आमूल-चूल बदलाव आए हैं, उससे नये भारत की नई तस्‍वीर बहुत साफ देखी जा सकती है। साढ़े बारह साल मुख्‍यमंत्री के रूप में और साढ़े ग्‍यारह साल प्रधानमंत्री के रूप में सेवारत श्री नरेन्‍द्र मोदी के कार्यकाल पर विहंगम दृष्टि डाली जाए तो सुस्‍पष्‍ट नजर आता है कि उन्‍होंने भारत के मान-सम्‍मान, गौरव, गरिमा और अस्मिता से कभी समझौता नहीं किया । उन्‍होंने सदैव राष्‍ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए उसे वरीयता दी । भारत को उत्‍कर्ष,तरक्‍की व खुशहाली के सर्वोच्‍च पायदान पर ले जाने का उनका स्‍वप्‍न नि:संदेह पूरा होगा। भारत को विश्‍वगुरू बनाने के लिए अहर्निश काम करने वाले ऐसे कर्मयोगी प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के प्रति हम हृदय से सद्भभावना व्‍यक्‍त करते हुए यह सद्इच्‍छा रखते हैं कि उनके नेतृत्‍व में भारत सदैव आलोकित होता रहे।

(विनायक फीचर्स) (लेखक भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता तथा पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं)

शरणार्थी और घुसपैठियों में बहुत अंतर है – गृह मंत्री श्री अमित शाह

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New Delhi –  केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह जी ने आज नई दिल्ली में ‘घुसपैठ, जनसांख्यिकी परिवर्तन व लोकतंत्र’ विषय पर ‘नरेन्द्र मोहन स्मृति व्याख्यान’ दिया और जागरण साहित्य सृजन पुरस्कार समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस अवसर पर अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि इस देश में 1951, 1971, 1991 और 2011 में जनगणना हुई, जिनमें शुरू से ही धर्म पूछने की परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि 1951 में जब यह निर्णय लिया गया तब उनकी पार्टी का गठन भी नहीं हुआ था। यदि देश का विभाजन नहीं हुआ होता, तो शायद धर्म के आधार पर जनगणना करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। लेकिन चूंकि देश का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ, इसलिए तत्कालीन सत्तारूद पार्टी के नेताओं ने 1951 की जनगणना से धर्म पूछना उचित समझा। श्री शाह ने कहा कि 1951 की जनगणना में हिंदू आबादी 84 प्रतिशत थी, जबकि मुस्लिम आबादी 9.8 प्रतिशत थी। 1971 में हिंदू आबादी 82 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी 11 प्रतिशत हो गई। 1991 में हिंदू आबादी 81 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी 12.2 प्रतिशत हो गई। वहीं, 2011 में हिंदू आबादी 79 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी 14.2 प्रतिशत हो गई। इस प्रकार, हिंदू आबादी में उल्लेखनीय कमी देखी गई है।

श्री अमित शाह ने कहा कि मुस्लिम आबादी में 24.6 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है, जबकि हिंदू आबादी में 4.5 प्रतिशत की कमी आई है। उन्होंने कहा कि यह कमी प्रजनन दर (फर्टिलिटी रेट) के कारण नहीं, बल्कि घुसपैठ के कारण हुई है। जब भारत का विभाजन हुआ, तो धर्म के आधार पर हमारे दोनों ओर पाकिस्तान का गठन हुआ, जो बाद में बांग्लादेश और पाकिस्तान के रूप में विभाजित हो गया। उन्होंने कहा कि दोनों ओर से घुसपैठ के कारण जनसंख्या में इतना बड़ा परिवर्तन हुआ।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि हमें हमारे पड़ोसी देशों – पाकिस्तान और बांग्लादेश की स्थिति पर भी ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि 1951 में पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी 13 प्रतिशत थी, जबकि अन्य अल्पसंख्यकों की आबादी 1.2 प्रतिशत थी। अब पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी घटकर मात्र 1.73 प्रतिशत रह गई है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में 1951 में हिंदुओं की आबादी 22 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 7.9 प्रतिशत रह गई है। श्री शाह ने  कहा कि अफगानिस्तान में उस समय 2 लाख 20 हजार हिंदू और सिख थे, जो आज घटकर मात्र 150 रह गए हैं। गृह मंत्री ने कहा कि इन देशों में जो हिंदू आबादी कम हुई, वह धर्मांतरण के कारण नहीं हुई; उनमें से बहुत से लोग भारत आकर शरण ले चुके हैं। दूसरी ओर, मुस्लिम आबादी में जो वृद्धि हुई, वह प्रजनन दर के कारण नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में मुस्लिम भाइयों के भारत में घुसपैठ के कारण हुई है।

श्री अमित शाह ने कहा कि जब भारत का विभाजन हुआ, तब यह तय किया गया था कि दोनों देशों में सभी धर्मों के पालन की स्वतंत्रता होगी। उन्होंने कहा कि भारत में यह स्वतंत्रता बनी रही; संविधान के अनुच्छेद 19 और 20 ने सभी को संरक्षण प्रदान किया। वहीं, पाकिस्तान और बांग्लादेश ने स्वयं को इस्लामिक राष्ट्र घोषित कर लिया और इस्लाम को उनका राजधर्म बना लिया गया। कई बार वहाँ अनेक प्रकार के अत्याचार और प्रताड़नाएँ हुईं, जिनके कारण हिंदू वहाँ से भागकर भारत में शरण लेने आए। उन्होंने कहा कि आजादी के तुरंत बाद भारत के सभी नेताओं ने यह वादा किया था कि चूंकि अभी देश में आपाधापी के कारण बड़े दंगे हो रहे हैं, इसलिए अभी न आएँ। लेकिन बाद में जब भी वे आना चाहेंगे, हम उन्हे स्वीकार करेंगे। श्री शाह ने कहा कि यह वादा नेहरू-लियाकत समझौते का हिस्सा था, जिस पर देश के प्रधानमंत्री ने हस्ताक्षर किए थे। जब वे लोग भारत आए, तो उन्हें शरणार्थी के रूप में स्वीकार किया गया, लेकिन उन्हें नागरिकता नहीं दी गई। श्री शाह ने कहा कि चार पीढ़ियाँ बीत चुकी हैं, फिर भी उन्हें नागरिकता नहीं मिली। गृह मंत्री ने कहा कि जब हमारी पार्टी को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ, तब हमने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) लागू किया और उन्हें नागरिकता प्रदान की गई।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि सीएए किसी की नागरिकता नहीं छीनने का नहीं बल्कि नागरिकता प्रदान करने का कार्यक्रम है। इस अधिनियम के किसी भी प्रावधान में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई या किसी अन्य की नागरिकता छीनने का कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य केवल शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान करना है। श्री शाह ने कहा कि 1951 से 2014 तक जो ऐतिहासिक गलतियाँ हुईं, उन्हें प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की सरकार ने सुधारने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि जो लोग यहाँ कानूनी रूप से या अवैध रूप से शरणार्थी के रूप में रह रहे थे, उन्हें दीर्घकालिक वीजा (लॉन्ग टर्म वीजा) प्रदान किया गया। उन्हें एक प्रमाणपत्र दिया गया और बाद में उनके लिए नागरिकता प्रदान करने का कानून लाया गया।

श्री अमित शाह ने कहा कि 1951 से 2019 तक भारतीयों से जो गलतियाँ हुईं, एक प्रकार से उनका तर्पण करने का काम मोदी जी ने किया। श्री शाह ने कहा कि कई पीढ़ियों तक शरणार्थी अपने नाम से मकान नहीं खरीद सकते थे, उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिलती थी, सरकारी राशन नहीं मिलता था, और सरकारी अस्पतालों में उनका इलाज नहीं होता था। गृह मंत्री ने सवाल किया कि इन ढाई से तीन करोड़ लोगों का गुनाह क्या था? उनसे पूछकर तो विभाजन नहीं किया गया था। धर्म के आधार पर विभाजन का फैसला तत्कालीन सत्तारूद पार्टी का था, न कि देश की संसद का, लेकिन इस फैसले के कारण लोग चार पीढ़ियों तक प्रताड़ित हुए। उन्होंने कहा कि जब सीएए लाया गया, तो इसे बदनाम करने का प्रयास किया गया। फिर भी, इतने विरोध के बावजूद आज सीएए अस्तित्व में है, और सभी शरणार्थियों को इस देश में नागरिकता का अधिकार प्राप्त है।

केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि शरणार्थी और घुसपैठिए को एक ही श्रेणी में रखकर नहीं सोचना चाहिए। जो व्यक्ति अपने धर्म को बचाने, जो हमारे संविधान के अनुसार उसका अधिकार है, भारत में शरण लेने आता है, उसे शरणार्थी कहते हैं। उन्होंने कहा कि जिन्हें धार्मिक प्रताड़ना का सामना नहीं करना पड़ा और जो आर्थिक या अन्य कारणों से अवैध रूप से देश में प्रवेश करना चाहते हैं, वे घुसपैठिए हैं। श्री शाह ने कहा कि धर्म को बचाने के लिए न केवल हिंदू बल्कि बौद्ध, सिख और ईसाई भी भारत आए। इसलिए, हमने सीएए में ऐसे सभी लोगों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान किया है। गृह मंत्री ने कहा कि यदि दुनिया के हर व्यक्ति को यहाँ आने की अनुमति दे दी जाए, तो यह देश धर्मशाला बनकर रह जाएगा और हमारा देश सुचारु रूप से नहीं चल पाएगा। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को यहाँ आने की स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती और विभाजन के परिप्रेक्ष्य में, जिनके साथ पाकिस्तान और बांग्लादेश में अन्याय हुआ है, उनका यहाँ स्वागत है। केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि इस देश की मिट्टी पर जितना मेरा अधिकार है, उतना ही पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिंदुओं, सिखों, बौद्धों और ईसाइयों का भी है।

श्री अमित शाह ने कहा कि भारत का संविधान बहुत स्पष्ट है कि इस देश में प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म के अनुसार अपने ईश्वर की उपासना करने का अधिकार है, और इसमें किसी को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो लोग इस देश में रहना पसंद करते हैं, चाहे वे मुस्लिम हों या किसी अन्य धर्म के, उनकी नागरिकता पर कोई प्रश्न नहीं उठाया जाता और उन्हें कोई परेशानी नहीं होती। लेकिन यदि लोग घुसपैठ करके आते हैं, विभिन्न अवैध तरीकों से प्रवेश करते हैं, तो ऐसे लोगों पर निश्चित रूप से घुसपैठिए का लेबल लगेगा। श्री शाह ने कहा कि पाकिस्तान या बांग्लादेश से किसी भी धर्म का व्यक्ति यदि वैध तरीके से पासपोर्ट और वीजा के साथ आवेदन करता है, तो सरकार उनके दस्तावेजों (क्रेडेंशियल्स) की जाँच करके उन्हें नागरिकता प्रदान करेगी, लेकिन यदि लोग अवैध रूप से घुसपैठ करते हैं, तो भारत की सीमाएँ खुली (पोरस) नहीं हो सकतीं।

केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि 2011 की जनगणना के अनुसार, असम में मुस्लिम समुदाय की आबादी की दशकीय वृद्धि दर 29.6 प्रतिशत थी, जो बिना घुसपैठ के संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के कई जिलों में यह वृद्धि दर 40 प्रतिशत को पार कर गई। सीमावर्ती जिलों में तो यह वृद्धि दर 70 प्रतिशत तक पहुँच गई। गृह मंत्री ने यह भी कहा कि झारखंड में जनजातीय समुदाय की संख्या में बहुत बड़ी गिरावट का कारण घुसपैठ है। श्री शाह ने कहा कि घुसपैठ जैसी जटिल समस्या को केन्द्र सरकार अकेले नहीं रोक सकती। उन्होंने कहा कि केन्द्र की जिम्मेदारी है और केन्द्र ने सीमा पर बाड़ लगाने जैसे कई कदम भी उठाए हैं, लेकिन ऐसे भौगोलिक क्षेत्रों में, जहाँ बाड़ लगाना असंभव है, वहाँ होने वाली घुसपैठ को स्थानीय राज्य सरकारें बढ़ावा देती हैं।

श्री अमित शाह ने Special Intensive Revision (SIR) का जिक्र करते हुए कहा कि यह राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मुद्दा है। उन्होंने सवाल किया कि यदि कोई व्यक्ति अवैध रूप से देश में प्रवेश करता है और जिले का प्रशासन उसकी पहचान नहीं कर पता, तो घुसपैठ को कैसे रोका जा सकता है? गुजरात और राजस्थान में भी सीमाएँ हैं, फिर वहाँ घुसपैठ क्यों नहीं होती? उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति शरणार्थी और घुसपैठिए के बीच का अंतर नहीं समझता, वह अपनी आत्मा के साथ छलावा कर रहा है। कुछ राजनीतिक दलों को घुसपैठियों में देश का खतरा नहींबल्कि वोटबैंक दिखता है। श्री शाह ने कहा कि SIR पहली बार नहीं हो रहा, बल्कि 1951 से हो रहा है। SIR करवाना चुनाव आयोग का दायित्व है। उन्होंने कहा कि संविधान में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है और ये तभी हो सकता है जब मतदाता सूची को मतदाता की परिभाषा के अनुरुप तैयार किया जाए। श्री शाह ने कहा कि जब घुसपैठिए हमारी मतदाता सूची में शामिल हो जाते हैं, तो वे देश की राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में हिस्सेदार बन जाते हैं। जब मतदान का आधार राष्ट्र का हित नहीं होता, तब लोकतंत्र कभी सफल नहीं हो सकता।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि हमारे देश की रचना भू-राजनीतिक (जियो-पॉलिटिकल) स्वभाव से नहीं हुई है, हम एक भू-सांस्कृतिक (जियो-कल्चरल) देश हैं। यदि इसकी आत्मा को समझना है, तो हमें राज्य की सीमाओं के दायरे से ऊपर उठकर कार्य करना होगा। श्री शाह ने कहा कि धर्म के आधार पर देश का विभाजन करना तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी की बहुत बड़ी गलती थी। उन्होंने कहा कि भारत माता की दो भुजाओं को काटकर अंग्रेजों के षड्यंत्र को सफल बनाया गया। धर्म और राष्ट्रीयता को अलग रखना चाहिए था, जिसके अभाव में ये सारे विवाद उत्पन्न हुए हैं।

केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि हमारी पार्टी ने 1950 के दशक से Detect, Delete और Deport के तीन सूत्रों को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि सरकार घुसपैठियों की पहचान करेगी, यह सुनिश्चित करने का पूरा प्रयास करेगी कि मतदाता सूची से उनका नाम हटाया जाए, और बाद में उन्हें उनके देश वापस भेजने का काम भी करेगी। श्री शाह ने कहा कि मतदान का अधिकार केवल उसी को होना चाहिए जो इस देश का नागरिक है।

श्री अमित शाह ने कहा कि घुसपैठियों की बड़ी संख्या किसी भी देश की सुरक्षा को सुनिश्चित नहीं कर सकती। वे सीमावर्ती क्षेत्रों की राजनीति और कानून-व्यवस्था दोनों को प्रभावित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि घुसपैठिये शहरी क्षेत्रों में भारत के गरीब मजदूरों के अधिकारों को छीन रहे हैं। श्री शाह ने कहा कि बीते 15 अगस्त को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने लाल किले की प्राचीर से जनसांख्यिकीय परिवर्तन (डेमोग्राफिक चेंज) पर अध्ययन के लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त मिशन के गठन की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि यह डेमोग्राफिक चेंजेस मिशन घुसपैठियों के कारण होने वाले जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का वैज्ञानिक मूल्यांकन करेगा। साथ ही, यह धार्मिक और सामाजिक जीवन पर पड़ रहे प्रभावों का अध्ययन करेगा, जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के संभावित कारणों का विश्लेषण करेगा, असामान्य बसावट के पैटर्न और समाज पर इसके दीर्घकालिक प्रभावों का अध्ययन करेगा, तथा सीमा प्रबंधन पर पड़ने वाले बोझ का भी विश्लेषण करके भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा।

बिहार में गौ भक्त प्रत्याशी उतारेंगे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद

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शेखपुरा. जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने बिहार में सनातनी राजनीति का शंखनाद किया है. शुक्रवार को शेखपुरा पहुंचने पर उन्होंने कहा कि बिहार की सभी विधानसभा सीटों पर वैसे प्रत्याशियों को समर्थन देंगे जो गौ हत्या बंद करने की बात अपने घोषणा पत्र में शामिल करता हो.उन्होंने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि देश की आजादी के 78 वर्षों बाद भी कोई राजनीतिक दल इस मुद्दे पर काम नहीं कर रहा है. केंद्र में कई दलों की सरकारें रही लेकिन किसी ने इस पर काम नहीं किया. इसे देखते हुए वह गौ मतदाता संकल्प यात्रा पर निकले हैं और बिहार के सभी जिलों में जाकर सनातन धर्म में गौ-रक्षा का संकल्प मतदाताओं को दिला रहे हैं.

जिससे कि विधानसभा चुनाव में गौ भक्त निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतर सकें. गौ माता की रक्षा कर सनातन धर्म की रक्षा का संदेश दिया. एक सभा को संबोधित करते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी ने कहा कि सनातन धर्म की रक्षा तभी संभव है जब हम गौ माता का संरक्षण करेंगे. गौ रक्षा हमारी आस्था का विषय ही नहीं, बल्कि यह हमारी संस्कृति और समाज की आधारशिला है.

उन्होंने लोगों से अपील की कि वे विधानसभा चुनाव में उन्हीं उम्मीदवारों को वोट दें जो गौ रक्षा को लेकर स्पष्ट और दृढ़ संकल्पित हों. शंकराचार्य ने बताया कि उन्होंने राष्ट्रीय राजनीतिक दलों से आग्रह किया था कि वे संसद में गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करने के पक्ष में अपना मत रखें, लेकिन किसी भी दल ने इस विषय पर अपना पक्ष स्पष्ट नहीं किया. इसी कारण अब उन्हें स्वयं गौ भक्त उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारने का निर्णय लेना पड़ा है. उन्होंने बताया कि बिहार की सभी विधानसभा क्षेत्रों में प्रत्याशी खड़े किए जाएंगे और नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद औपचारिक रूप से उम्मीदवारों की सूची जारी की जाएगी. इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु और गौ भक्त मौजूद रहे.

रामचरित मानस में स्थापत्य एवं वास्तु शास्त्र

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(इंजी. विवेक रंजन श्रीवास्तव-विभूति फीचर्स)

रामचरित मानस विश्व का ऐसा महान ग्रंथ है, जिसे शोध की जिस दृष्टि से देखा जावे, तो अध्येता इतना कुछ पाता है, कि वह उसे चमत्कृत कर देने को पर्याप्त होता है। रामचरित मानस की मूल कथा में अयोध्या, जनकपुर, लंका, चित्रकूट, नन्दीग्राम, श्रृंगवेरपुर, किष्किंधा, कैकेय, कौशल आदि नगरों तथा राज्यों का वर्णन मिलता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधपुरी का वर्णन करते हुए लिखा है :-

अयोध्या –

बंदऊ अवधपुरी अति पावनि । सरजू सरि कालि कलुष नसावनि ॥(प्रसंग : वन्दना,बालकाण्ड 1/16)

अवधपुरी सोइहि एहि भाँती । प्रभूहि मिलन आई जनु राती ॥(प्रसंग : रामजन्म बालकाण्ड 2/195)

इसी तरह रामविवाह के प्रसंग में भी अयोध्या का वर्णन मिलता है

जद्यपि अवध सदैव सुहावनि ।
रामपुरी मंगलमय पावनि ॥
तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई ।
मंगल रचना रची बनाई ॥(बालकाण्ड 3/296)

इसी प्रसंग में गोस्वामी जी लिखते है कि रामविवाह की प्रसन्नता में, माँ सीता के नववधू के रूप में स्वागत हेतु अयोध्यावासियों ने अपने घर सजा कर अपनी भावनायें इसी तरह अभिव्यक्त की।

मंगलमय निज-निज भवन,
लोगन्ह रचे बनाई ।
बीथी सींची चतुर सम,
चौके चारू पुराई ॥ (बालकाण्ड 296)

राजा दशरथ के देहान्त एवं राम वन गमन के प्रसंग में भी अयोध्या के राजमहल का वर्णन मिलता है :-

गए सुमंत तब राउर माही।
देखि भयावन जात डेटाही ॥(राउर अर्थात राजमहल)
(अयोध्या काण्ड 2/38)

अयोध्या का नगर एवं प्रासाद वर्णन पुनः उत्तर काण्ड में मिलता है, जब श्रीराम वनवास से लौटते है।

बहुतक चढ़ी अटारिन्ह निरखहि गगन विमान । देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान ॥(उत्तरकाण्ड /3 ख)

जद्यपि सब बैकुण्ठ बखाना। वेद पुरान विदित जग जाना।
अवधपुरी सम प्रिय नहीं सोऊ । यह प्रसंग जानड़ कोऊ कोऊ ॥ (उत्तरकाण्ड 2/4)

जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि । उत्तर दिसि बह सरयू पावनि ।(उत्तरकाण्ड 3/4)

रामराज्य के वर्णन के प्रसंग के अंतर्गत भी अवधपुरी के भवनों, सड़कों, बाजारों का विवरण मिलता है।

जातरूप मनि रचित अटारी । नाना रंग रूचिर गच ढारी ॥
पुर चहुं पास कोट अति सुन्दर । रचे कंगूरा रंग-रंग बर ॥

स्वर्ण और रत्नों से बनी हुई अटारियां है। उनमें मणि, रत्नों की अनेक रंगों की फर्श ढली है। नगर के चारों ओर सुन्दर परकोटा है। जिस पर सुन्दर कंगूरे बने है।

नवग्रह निकर अनीक बनाई । जनु घेरी अमरावति आई ॥ मानों नवग्रहों ने अमरावति को घेर रखा हो।
धवल धाम ऊपर नभ चुंबत । कलस मनहुँ रवि ससि दुति निंदत ॥

उज्जवल महल ऊपर आकाश को छू रहें है, महलों के कलश मानो सूर्य-चंद्र की निंदा कर रहे है, अर्थात उनसे ज्यादा शोभायमान है।
मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरी विदुम रची ।मनि खंब भीति, विरंचि विचि कनक मनि मरकत खची ।
सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रूचिर फटिक रचे । प्रति द्वार-द्वार कपाट पुरटं बनाई बहु बज्रहिं खचे ॥

घरों में मणियों के दीपक हैं। मूंगों की देहरी है। मणियों के खम्बे हैं।पन्नों से जड़ित दीवारें ऐसी है, मानों उन्हें स्वयं ब्रह्मा जी ने बनाया हो। महल मनोहर और विशाल है। उनके आगंन संगमरमर के है। दरवाजे सोने के हीरे लगे हुये है।
चारू चित्रसाला गृह-गृह प्रति लिखे बनाई ।
राम चरित जे निरख मुनि, ते मन लेहि चौटराई ॥
सुमन बाटिका सबहिं लगाई।
विविध भाति करि जतन बनाई ॥

घर-घर में सुन्दर चित्रांकन कर राम कथा वर्णित है। सभी नगरवासियों ने घरों में पुष्प वाटिकायें भी लगा रखी है।

छंद-
बाजार रूचिर न बनई बरनत वस्तु बिनु गथ पाइये । जह भूप रमानिवास तह की संपदा किमि गाइये । बैठे बजाज, सराफ बनिक, अनेक मनहुँ कुबेर ते । सब सुखी, सब सच्चरित सुंदर, नारि नर सिसुजख ते ।।

सुन्दर बाजारों में कपड़े के व्यापारी, सोने के व्यापारी, वणिक आदि इस तरह से लगते है, मानो कुबेर बैठे हों। सभी सदाचारी और सुखी है। इसी तरह सरयू नदी के तट पर स्नान एवं जल भरने हेतु महिलाओं के लिए अलग पक्के घाट की भी व्यवस्था अयोध्या में थी

दूटि फराक रूचिर सो घाटा, जहं जल पिअहिं बाजि गज ठाटा । पनिघट परम् मनोहर नाना, तहाँ न पुरूष करहि स्नाना ।। (उत्तरकाण्ड 1/29)

जल व्यवस्था हेतु बावड़ी एवं तालाब भी अयोध्या में थे। सार्वजनिक बगीचे भी वहाँ थे।

पुर शोभा कछु बरनि न जाई । बाहेर नगर परम् रुचिराई । देखत पुरी अखिल अध भागा। बन उपबन बाटिका तड़ागा।। (उत्तरकाण्ड 4/29)

इस प्रकार स्थापत्य की दृष्टि से अयोध्या एक सुविचारित दृष्टि से बसाई गई नगरी थी। जहाँ राजमहल बहुमंजिले थे। रनिवास अलग से निर्मित थे। रथ, घोड़े, और हाथियों के रखने हेतु अलग भवन थे। आश्रम और यज्ञशाला अलग निर्मित थी। पाकशाला अलग बनी थी। शहर में पक्की सड़कें थी। आम नागरिकों के घरों में भी छोटी सी वाटिका होती थी। घर साफ सुथरे थे, जिनकी दीवारों पर चित्रांकन होता था। शहर में सार्वजनिक बगीचे थे। जल स्रोत के रूप में बावड़ी, तालाब, स्त्री एवं पुरुषों हेतु अलग-अलग पक्के घाट एवं कुंए थे। नगर सरयू तट पर बसा हुआ था,ऐसा वर्णन तुलसीदास जी ने किया है।

जनकपुरी

मानस में वर्णित दूसरा बड़ा नगर मिथिला अर्थात जनकपुरी है।

जिसका वर्णन करते हुये गोस्वामी जी ने लिखा है कि –

बनई न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाई मन तहंइ लाभाई ॥ (उत्तरकाण्ड 1/213)

जनकपुर का वर्णन धनुष यज्ञ एवं श्रीराम सीता विवाह के प्रसंग में सविस्तार मिलता है।

जनकपुर में बाजार का वर्णन –

धनिक बनिक वर धनद समाना।बैठे सकल वस्तु लै नाना।
चौहर सुंदर गलीं सुहाई । संतत रहहिं सुगंध सिंचाई ॥

अर्थात यहाँ चौराहे, सड़के सुंदर है, जिनमें सुगंध बिखरी है। सुव्यवस्थित बाजारों में वणिक विभिन्न वस्तुयें विक्रय हेतु लिये बैठे है।

मंगलमय मंदिर सब केरे । चित्रित जनु रतिनाथ चितेरे ।
अर्थात, सभी घरों पर सुंदर चित्रांकन होता था।
भवनों के दरवाजों पर परदे होते थे। किवाड़ों पर सुन्दर नक्काशी और रत्न जड़े होते थे-

सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा।भूप भीट नट मागध आटा ।
सेनापति, मंत्रिगण आदि के घर भी महल की ही तरह सुन्दर और बड़े थे। घुड़साल, गजशाला, अलग बनी थीं। धनुष यज्ञ हेतु एक सुन्दर यज्ञशाला नगर के पूर्व में बनाई गई थी। जहां लंबा चौड़ा आंगन एवं बीच में बेदी बनाई गई थी। चारों ओर बड़े-बडे मंच बने थे। उनके पीछे दूसरे मकानों का घेरा था। पुष्पवाटिका जहां पहली बार श्रीराम का सीताजी से साक्षात्कार हुआ था, का वर्णन भी गोस्वामी जी रचित मानस में मिलता है। वटिका में मंदिर भी है। बाग के बीचों बीच एक सरोवर है। सरोवर में पक्की सीढ़ियां भी बनी है। इस प्रकार हम पाते है कि स्वयं श्रीराम जिनको चौदहों लोकों का प्रणेता कहा जाता है, जब अपने मानव अवतार में संसारी व्यवहारों से गुजरते है, तो “मकान’ की मानवीय आवश्यकता के अनेक वर्णन उनकी लीला में मिलते है। भगवान विश्वकर्मा, जो देवताओं के स्थापत्य प्रभारी के रूप में पूजित है, जो क्षण भर में मायावी सृष्टि की संरचना करने में सक्षम है, जैसे उन्होनें ही माँ सीता की नगरी बसाई हो, इतनी सुव्यवस्थित नगरी वर्णित है जनकपुर।

लंका

अयोध्या, जनकपुर के बाद जो एक बड़ी नगरी मानस में वर्णित है, वह है रावण की सोने की लंका। लंका में एक स्वतंत्र भव्य प्राचीन वाटिका है, ‘अशोक वटिका’ जहाँ रावण ने अपहरण के बाद माँ सीता को रखा था। लंका का वर्णन एक किले के रूप में है-

गिरि पर चढ़ी लंका तह देखी ।
कहि न जाइ अति दुर्ग विशेषी ।।
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदराय तना घना ।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीर्थी, चारूपुर बहु बिधि बना ।।

गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गने । बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहीं बनें ।।
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहिं ।
नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहिं ।।
(सुन्दर काण्ड 5/3)

लंका सोने की है। वहां सुन्दर-सुन्दर घर है। चौराहे, बाजार, सुन्दर मार्ग और गलियां है। नगर बहुत तरह से सजा हुआ है। नगर की रक्षा हेतु चारों ओर सैनिक तैनात है। नगर में एक प्रवेश द्वार है। लंका में विभीषण के महल का वर्णन करते हुये गोस्वामी जी ने लिखा है कि
रामायुध अंकित गृह शोभा वरनि न जाय।
नव तुलसिका वृंद तह देखि हरषि कपिराय ।।

रावण के सभागृह का वर्णन, लंकादहन एवं श्रीराम दूत अंगद के प्रस्ताव के संदर्भ में मिलता है। इसी तरह समुद्र पर तैरता हुआ सेतु बनाने का प्रसंग भी वर्णित है जिसमें समुद्र स्वयं सेतु निर्माण की प्रक्रिया श्रीराम को बताता है।

“नाथ नील” नल कपि दो भाई। लरकाई ऋषि आसिष पाई ।
तिन्ह के परस किए गिरि भाटे। तरहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे ॥

‘एडम्स ब्रिज’ के रूप में आज भी भौगोलिक नक्शे पर इस रामसेतु के अवशेष विद्यमान है। यांत्रिकीय उन्नति के उदाहरण स्वरूप पुष्पक विमान, आयुध उन्नति के अनेक उदाहरण युद्धों में प्रयुक्त उपकरणों के मिलते हैं। स्थापत्य जो आधारभूत अभियांत्रिकी है, के अनेक उदाहरण विभिन्न नगरों के वर्णन में मिलते है। ये उदाहरण गोस्वामी तुलसीदास के परिवेश एवं अनुभव जनित एवं भगवान राम के प्रति उनके प्रेम स्वरूप काव्य कल्पना से अतिरंजित भी हो सकते है, किन्तु यह सुस्पष्ट है कि मानस के अनुसार राम के युग में स्थापत्य कला सुविकसित थी।
अंत में यह आध्यत्मिक उल्लेख आवश्यक जान पड़ता है कि सारे सुविकसित वास्तु और स्थापत्य के बाद भी श्रीराम तो बसते है मन मंदिर में।

(विभूति फीचर्स)

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने गौशाला का किया निरीक्षण

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Bihar News: शंकराचार्य जी ने मिर्जापुर गौशाला की वर्तमान हालत पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि शहर के बीचोंबीच स्थित इस गौशाला में पर्याप्त जगह होने के बावजूद सेवा की स्थिति दयनीय है।

गौ मतदाता संकल्प यात्रा के तहत ज्योतिष पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज आज दरभंगा के मिर्जापुर स्थित गौशाला पहुंचे। उन्होंने गौशाला का बारीकी से निरीक्षण किया और स्थानीय लोगों से गायों की देखभाल एवं व्यवस्था के बारे में जानकारी ली।

पत्रकारों से बातचीत में शंकराचार्य जी ने कहा कि देश में आज भी गौ हत्या हो रही है, जिसे रोकने में सरकार असफल रही है। उन्होंने कहा कि जिन्हें हम वोट देकर सत्ता में भेजते हैं, वे भी गौ हत्या रोकने में सक्षम नहीं हैं, बल्कि गौमांस को विदेश भेजने की अनुमति दे रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम उन नेताओं को वोट देना बंद करें जो गौ हत्या रोकने के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं। हमारे सनातन धर्म में गौ हत्या को अत्यंत बड़ा पाप माना गया है। हम केवल उन्हीं प्रत्याशियों को वोट देंगे जो गौ हत्या रोकने का संकल्प लें।
शंकराचार्य जी ने मिर्जापुर गौशाला की वर्तमान हालत पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि शहर के बीचोंबीच स्थित इस गौशाला में पर्याप्त जगह होने के बावजूद सेवा की स्थिति दयनीय है। उन्होंने कहा कि यदि उचित व्यवस्था की जाए तो लगभग एक हजार गायों की बेहतर सेवा संभव है। शंकराचार्य जी ने गौशाला के विकास और व्यवस्थाओं में सुधार के लिए अपनी ओर से हर संभव सहयोग देने की घोषणा भी की। उन्होंने कहा कि गौ माता के आशीर्वाद से ही दरभंगा खुशहाल बन सकता है।

वाराणसी में गौ तस्करी गिरोह का भंडाफोड़

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वाराणसी। रोहनिया पुलिस ने एक महत्वपूर्ण कार्रवाई करते हुए गौ तस्करी करने वाले गिरोह का भंडाफोड़ किया है। यह गिरोह कड़ाई के बाद मवेशियों को बड़े ट्रकों से छोटे पिकअप वाहनों में लादकर बार्डर तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा था। पुलिस को मिली सूचना के आधार पर, एक विशेष टीम ने 11 तस्करों के साथ छह पिकअप वाहनों को पकड़ा, जिनमें से 35 गोवंश बरामद हुए हैं।

थाना प्रभारी निरीक्षक राजू सिंह ने बताया कि उन्हें सूचना मिली थी कि पशु तस्कर अवैध रूप से मवेशियों को लादकर वध के लिए बिहार ले जा रहे हैं। इस सूचना के आधार पर, अखरी चौकी प्रभारी विशाल कुमार सिंह और उनकी टीम ने नेशनल हाइवे 19 पर अखरी गांव के सामने घेराबंदी की। पुलिस ने मवेशियों से लदे पिकअप वाहनों को रोका और तलाशी ली, जिसमें कुल 35 गोवंश बरामद हुए।

चौकी प्रभारी विशाल सिंह ने बताया कि तस्करों ने शुरू में दावा किया कि वे सुल्तानपुर मेले से मवेशियों को ले जा रहे हैं, लेकिन कड़ाई से पूछताछ करने पर उन्होंने बताया कि वे प्रयागराज से एक बड़े वाहन से गोवंश को अलग-अलग छह पिकअप में लादकर बिहार जा रहे थे, जहां उन्हें फिर एक बड़े ट्रक पर लादना था। इस कार्रवाई से यह स्पष्ट होता है कि पुलिस तस्करी के खिलाफ सख्त कदम उठा रही है और ऐसे गिरोहों के खिलाफ लगातार निगरानी रखी जा रही है।

पकड़े गए तस्करों में शाम‍िल

गुलशन निषाद (ग्राम बाहरपुर बंधवा, थाना जयसिंहपुर, सुल्तानपुर), रोशन कुमार (मनकोसी, थाना बोधगया, जनपद गया, बिहार), दीपू धुरिया (ग्राम आलापुर, थाना कादीपुर, जनपद सुलतानपुर), संजीत कुमार यादव (ग्राम छाछ, थाना बोधगया, जनपद गया, बिहार), मनोज कुमार निषाद (ग्राम भरवारीपुर, थाना कादीपुर, जनपद सुलतानपुर), इशू कुमार (ग्राम मनकोसी, थाना बोधगया, बिहार), अभिषेक कुमार (ग्राम राणा नगर, थाना कादीपुर, सुलतानपुर), उपेंद्र यादव (नारायण नगर, थाना मोखाशी, जनपद गया, बिहार), दीपक कुमार (ग्राम आशापुर, पोस्ट पारस पट्टी, थाना मोतियारपुर, जिला सुलतानपुर), सुरेश यादव (ग्राम दर्जियाचक, थाना टंकुपा, जिला गया, बिहार) और निखिल धुरिया (ग्राम गोकुल नगर, आलापुर, थाना कादीपुर, जनपद सुलतानपुर) शामिल हैं।

उत्तरप्रदेश में मायावती की नई चुनौती

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(डॉ. सुधाकर आशावादी -विनायक फीचर्स)

कब कोई राजनीतिक विचार किसी दल को सत्ता का स्वाद चखा दे, अब कब कोई विचार सत्ता से अलग कर दे, यह कोई नहीं जानता। इसी कारण देश की राजनीति में विघटनकारी जातीय गठबंधन की राजनीति कारगर सिद्ध होगी या सोशल इंजीनियरिंग पर आधारित सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय की राजनीति , यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है, किन्तु लंबे समय तक हाशिये पर रहने वाली बहुजन समाज पार्टी एक बार फिर अपनी पूरी शक्ति के साथ लोकतंत्र के चुनावी मैदान में उतर आई है। उत्तर प्रदेश में पिछड़े,दलित और अल्पसंख्यक के नाम पर समाज को बांटने में जुटी समाजवादी पार्टी के लिए यह खतरे की घंटी सिद्ध हो सकता है।

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की स्मृति में लखनऊ में आयोजित सुश्री मायावती की रैली में बसपा समर्थकों ने जिस प्रकार से बसपा की जड़ों को मजबूत करने का जज्बा दिखाया है, उससे लगता है कि गहन मंथन के बाद बसपा नए प्रारूप में उभर कर उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपना दमखम दिखाएगी तथा 2027 में सत्ता में आने का दिवास्वप्न देखने वाली समाजवादी पार्टी तथा अन्य राजनीतिक दलों के लिए नई चुनौतियां खड़ी करेगी।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा की बरसों तक बड़ी उपस्थिति रही है। एक दौर था कि जब प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा हाशिये पर चली गई थी। अपने जातीय समीकरणों के कारण समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी सत्ता का खेल खेलते रहे। सुश्री मायावती ने 18 सितंबर साल 2003 को पहली बार पार्टी की कमान संभाली थी। इसके बाद बसपा सुप्रीमो ने जमकर मेहनत की और चार साल में ही पार्टी के लिए एक ऐसा स्वर्णिम अवसर लाने में सफल हुईं जो इतिहास में दर्ज हो गया। वह साल था 2007 जब उत्तर प्रदेश में पहली बार प्रचंड बहुमत की सरकार बनाई थी। सुश्री मायावती वर्ष 2007 में चौथी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं, यह उनके राजनीतिक जीवन का स्वर्णिम काल था। साल 2003 से लेकर 2024 तक मायावती सात बार पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुकी हैं। वर्ष 2003 से लेकर साल 2024 तक बीएसपी सुप्रीमो ने पार्टी में कई उतार चढ़ाव देखे हैं। वर्तमान में जब उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार पूरी दृढ़ता के साथ गतिशील है तथा विगत लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को अति आत्मिश्वास के कारण अनेक संसदीय क्षेत्रों में हार का सामना करना पड़ा तथा समाजवादी पार्टी की कृपा से कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में कदम रखने की जगह मिली, उसका कारण बसपा की तत्कालीन चुनावों में सक्रिय भागीदारी न होना भी रहा है।

लखनऊ में सुश्री मायावती की हुंकार ने यह जता दिया है, कि आज भी बहुजन समाज के शुभचिंतकों के हृदय में बसपा धड़कती है। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के नाम पर विघटन का खेल खेलने वाली समाजवादी पार्टी के दिन लद गए हैं। समझना चाहिए कि सबका साथ सबका विकास की नीतियां ही राजनीतिक दलों को सत्ता की संजीवनी प्रदान कर सकती हैं। जातीय विघटनकारी षड्यंत्रों को जनता समझ चुकी है। वह किसी भी राजनीतिक दल के विघटनकारी मंसूबों को सफल नहीं होने देगी। बसपा इस बार अपनी नई सोच के साथ यदि चुनाव मैदान में अपना दमखम दिखाती है, तो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय विकल्प के रूप में उभर सकती है। ऐसा समझा जाना चाहिए। (विनायक फीचर्स)

डॉ हेडगेवार सबसे पहले सरसंघचालक

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हिंदू राष्ट्रवाद को आकार देने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे हो गए हैं। महज डेढ़ दर्जन लोगों की पहली शाखा के साथ शुरुआत करने वाला यह संगठन आज देश में सत्ता को मजबूती देने वाली प्रमुख वैचारिक ताकत बन चुका है। संगठन भारत के लोगों में हिंदुत्व की भावना जागृत करने के साथ ही शिक्षा और समाजसेवा में भी अहम योगदान दे रहा है। 100 साल की इस यात्रा में नेतृत्व करने वाली छह हस्तियां ऐसी रही हैं, जिन्हें संघ में सर्वोच्च माना जाता है। यानी सरसंघचालक। इन सरसंघचालकों के बारे में संक्षेप में जानिए

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

  • 27 सितंबर, 1925 को नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। वह 1925-1940 तक इसके सरसंघचालक रहे। वह पेशे से चिकित्सक थे और डॉक्टरजी के नाम से जाने जाते थे। 1920 के दशक के आरंभ में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भागीदार होने के कारण जेल में भी रहे।
  • माधव सदाशिव गोलवलकर
    • 1940-1973 तक संघ के सरसंघचालक रहे। इसी कालखंड में नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी थी, जिसके बाद संघ पर प्रतिबंध लग गया।

    मधुकर दत्तात्रेय देवरस

      • 1973-1994 तक संघ प्रमुख रहे। 12 वर्ष की उम्र में संघ से जुड़े थे। उन्होंने आपातकाल के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में संघ को सीधे तौर पर शामिल किया।

    राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया

      • 1994 से 2000 तक संघ प्रमुख रहे। संघ के एकमात्र गैर-ब्राह्मण प्रमुख। इलाहाबाद विवि में पढ़ाई के दौरान संघ के संपर्क में आए और पूर्णकालिक प्रचारक बने।

    केएस सुदर्शन

    • वर्ष 2000 में संघ प्रमुख बने। कर्नाटक के रहने वाले सुदर्शन ने 2009 में खराब स्वास्थ्य के चलते पद छोड़ा।

    मोहन भागवत

    • साल 2009 से संघ प्रमुख। महाराष्ट्र के अकोला स्थित पंजाबराव कृषि विश्वविद्यालय से पशु चिकित्सा विज्ञान और पशुपालन में स्नातक हैं। संघ प्रचारक बनने के लिए उन्होंने अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई छोड़ दी।

    अहंकार के खिलाफ
    संघ व भाजपा के बीच सहज संवाद और समन्वय के बावजूद भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पिछले साल कहा था कि पार्टी अब उस समय से आगे बढ़ चुकी है जब उसे संघ की जरूरत नहीं है। इस पर भागवत ने भी जवाब दिया था। उन्होंने कहा था कि जनता की सेवा करने वालों में अहंकार नहीं होना चाहिए।

जीवन को सहज, सुंदर और सफल बनाने वाले दस सूत्र

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(विजय कुमार शर्मा-विभूति फीचर्स)

दशहरा केवल रावण दहन का पर्व नहीं, बल्कि यह अपने भीतर छिपे बुरे गुणों को पहचानने और उन्हें मिटाने का अवसर भी है। यह त्यौहार हमें याद दिलाता है कि जैसे भगवान राम ने असत्य पर विजय पाई, वैसे ही हम भी अपने जीवन के संकटों पर काबू पा सकते हैं। इसके लिए हमें कुछ सरल सूत्र अपनाने होंगे, जो हमारे जीवन को सहज, सुंदर और सफल बना देंगे।

1. अहंकार का दहन करें

दशहरा हमें यह सिखाता है कि रावण जैसा महान ज्ञानी और शक्तिशाली व्यक्ति भी केवल अहंकार के कारण नष्ट हो गया। जीवन में यदि हम अभिमान को पालते हैं तो वह धीरे-धीरे रिश्तों को तोड़ता है और समाज से दूर कर देता है। अहंकार हमें सच्चे मित्रों और ईश्वर की कृपा से भी वंचित कर देता है। इसलिए इस पर्व पर संकल्प लें कि भीतर छिपे अहंकार, क्रोध और ईर्ष्या को जलाएँ और विनम्रता को अपनाएँ। विनम्र व्यक्ति ही सबका प्रिय बनता है और हर संकट को सहजता से पार कर लेता है।

2. सत्य का साथ दें

राम की विजय का सबसे बड़ा आधार सत्य था। चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विपरीत क्यों न हों, सत्य का मार्ग कभी छोड़ना नहीं चाहिए। असत्य से मिलने वाली सफलता क्षणिक होती है और अंततः विनाश का कारण बनती है। सत्य का पालन करने से विश्वास और प्रतिष्ठा मिलती है। यह जीवन में ऐसे कवच का काम करता है, जो हमें हर संकट से सुरक्षित रखता है। इसलिए दशहरा के दिन संकल्प लें कि जीवन के हर छोटे-बड़े कार्य में सत्य और ईमानदारी का साथ देंगे।

3. संयम साधें

मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अनियंत्रित मन और वाणी है। यदि हम संयम नहीं रखते तो क्रोध और आवेग के कारण गलत निर्णय ले बैठते हैं। दशहरा हमें याद दिलाता है कि संयम ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है। भोजन, व्यवहार, बोलचाल और इच्छाओं पर नियंत्रण रखने वाला व्यक्ति कभी संकटों में नहीं फँसता। संयमित जीवन से न केवल आत्मबल बढ़ता है बल्कि परिवार और समाज में भी सम्मान मिलता है। इस पर्व पर संकल्प लें कि संयम को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएँगे।

4. धर्म के मार्ग पर चलें

धर्म का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। धर्म का असली स्वरूप है – कर्तव्य, न्याय, सत्य और करुणा। दशहरा हमें प्रेरित करता है कि जीवन की हर परिस्थिति में धर्म का पालन करें। जब हम अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाह करते हैं, तो संकट स्वतः दूर हो जाते हैं। धर्म मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी पराजित नहीं होता, भले ही अस्थायी कठिनाइयाँ आएँ। भगवान राम ने हर परिस्थिति में धर्म का पालन कर यह उदाहरण प्रस्तुत किया।

5. सेवा का भाव रखें

सेवा केवल दान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि दूसरों की पीड़ा समझकर उनकी मदद करना ही सच्ची सेवा है। निःस्वार्थ सेवा करने से मन को शांति मिलती है और समाज में सम्मान भी। सेवा करने वाले व्यक्ति के जीवन में संकट लंबे समय तक टिक नहीं पाते क्योंकि उसके अच्छे कर्म ही उसकी रक्षा करते हैं। दशहरा का यह संदेश हमें याद दिलाता है कि जरूरतमंदों, बीमारों, बुजुर्गों और बच्चों की सेवा करके हम न केवल पुण्य अर्जित करते हैं, बल्कि अपने जीवन को भी सार्थक बनाते हैं।

6. शक्ति और करुणा में संतुलन

जीवन में शक्ति होना जरूरी है, परंतु उसका उपयोग दूसरों को दबाने के लिए नहीं बल्कि रक्षा और सहयोग के लिए होना चाहिए। रावण ने शक्ति का दुरुपयोग किया और अंततः नष्ट हुआ, जबकि भगवान राम ने करुणा और धर्म के लिए शक्ति का प्रयोग किया और आदर्श बने। दशहरा हमें यही शिक्षा देता है कि शक्ति और करुणा का संतुलन ही संकट हरने का सूत्र है। यदि हम शक्तिशाली होकर भी दयालु बने रहें तो समाज हमें आदर देता है और संकट हमारे निकट नहीं आ पाते।

7. सद्ग्रंथों का अध्ययन करें

रामायण, महाभारत और गीता जैसे ग्रंथ केवल कथाएँ नहीं, बल्कि जीवन के मार्गदर्शक हैं। इनका अध्ययन करने से हमें संकटों से जूझने की प्रेरणा और समाधान दोनों मिलते हैं। गीता सिखाती है कि कठिनाइयों में धैर्य कैसे बनाए रखें, रामायण हमें मर्यादा और आदर्श का पाठ पढ़ाती है। सद्ग्रंथों से जुड़कर हम न केवल ज्ञान प्राप्त करते हैं बल्कि जीवन में सही दिशा भी पाते हैं। दशहरा पर संकल्प लें कि प्रतिदिन थोड़ा समय सद्ग्रंथों के अध्ययन को देंगे। यही आत्मबल को दृढ़ बनाता है।

8. परिवार में सौहार्द बढ़ाएं

आज के समय में संकट का एक बड़ा कारण परिवारों में टूटन और कलह है। दशहरा का पर्व हमें यह अवसर देता है कि हम अपने परिवारजनों के साथ मिलकर रिश्तों को और प्रगाढ़ करें। संवाद, प्रेम और विश्वास ही रिश्तों की नींव हैं। यदि परिवार में सौहार्द रहेगा तो संकट कभी भी लंबे समय तक नहीं टिक पाएगा। त्योहारों का उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं, बल्कि परिवार को एक सूत्र में बांधना भी है। इसलिए दशहरा पर पारिवारिक रिश्तों को नई ऊर्जा देने का संकल्प लें।

9. प्रकृति और पर्यावरण का आदर करें

रावण का विनाश हुआ क्योंकि उसने प्रकृति और धर्म का अनादर किया। आज के समय में पर्यावरण संकट सबसे बड़ा खतरा है। यदि हम प्रकृति का सम्मान करेंगे और उसके संसाधनों का संतुलित उपयोग करेंगे तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य बना सकेंगे। पेड़ लगाना, जल संरक्षण करना और प्रदूषण कम करना भी हमारे धर्म का हिस्सा है। दशहरा पर संकल्प लें कि हम पर्यावरण का आदर करेंगे और प्रकृति को देवता की तरह पूजकर उसकी रक्षा करेंगे। यही असली विजय है।

10. आत्मचिंतन व साधना करें

संकट तभी बड़ा लगता है जब मन अस्थिर और नकारात्मक हो। आत्मचिंतन और साधना से मन को स्थिर किया जा सकता है। प्रतिदिन कुछ समय ध्यान, प्रार्थना और मौन में बैठकर अपने जीवन का मूल्यांकन करें। इससे हमें अपनी गलतियों का बोध होगा और सुधार का अवसर भी मिलेगा। साधना से आत्मबल और धैर्य बढ़ता है, जो किसी भी कठिनाई को पार करने में सहायक होता है। दशहरा पर यह संकल्प लें कि प्रतिदिन आत्मचिंतन और साधना को जीवन का हिस्सा बनाएँगे।

दशहरा केवल बाहरी रावण को जलाने का नहीं, बल्कि अपने भीतर के रावण को पराजित करने का पर्व है। यदि हम इन दस सूत्रों को जीवन में अपनाएँ, तो हर संकट को अवसर में बदल सकते हैं और सच्चे अर्थों में विजय प्राप्त कर सकते हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि धर्म, सत्य, संयम और करुणा से ही स्थायी शांति और सफलता मिलती है। आइए, इस दशहरा हम अपने भीतर छिपी नकारात्मकताओं को जला कर उज्ज्वल और सकारात्मक जीवन की ओर बढ़े। (विभूति फीचर्स)