भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का क्रूर अध्याय है आपातकाल

(डॉ. मोहन यादव-विनायक फीचर्स)
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून 1975 को लागू किया गया आपातकाल एक काले और क्रूर अध्याय के रूप में है। इस दिन भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने आपातकाल के प्रावधानों के तहत हजारों विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था। भारतीय लोकतंत्र में कांग्रेस पार्टी आपातकाल के कलंक से कभी मुक्त नहीं हो सकती।
कांग्रेस शासन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए विपक्षी दलों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन के कारण देश की कानून व्यवस्था की स्थिति खराब होने का बहाना बनाते हुए इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल लगाया था। इंदिरा गांधी ने तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक 21 महीने की अवधि के लिए हर छह महीने में आपातकाल लगाने के लिए कहा था।
आपातकाल के दौरान, इंदिरा गांधी ने खुद को सर्वशक्तिमान के रूप में स्थापित किया था। उन्होंने पार्टी के कुछ करीबी सदस्यों और अपने छोटे बेटे संजय गांधी के परामर्श से कई सारे निर्णय लिए जिसका भारत के सामाजिक तानेबाने पर दूरगामी प्रभाव पड़ा।
आपातकाल को अक्सर स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक काला दौर माना जाता है। इस अवधि में बेलगाम सरकारी कैद, असहमति को दबाना और नागरिक स्वतंत्रता पर सरकारी दमन की घटनाएं हुईं। मानवाधिकारों के लगातार उल्लंघन और प्रेस पर दमनकारी हद तक सेंसरशिप की खबरें आती रहीं। आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों के निलंबन को पर्यवेक्षकों और संवैधानिक विशेषज्ञों द्वारा चिंता के साथ याद किया जाता है।
दरअसल आपातकाल की बुनियाद 1967 के गोलकनाथ मामले से ही पड़ गई थी। गोलकनाथ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि यदि परिवर्तन मौलिक अधिकारों जैसे बुनियादी मुद्दों को प्रभावित करते हैं तो संसद द्वारा संविधान में संशोधन नहीं किया जा सकता है। इसके बाद इस निर्णय को निष्प्रभावी करने के लिए, सरकार ने 1971 में 24वाँ संशोधन पारित किया। सर्वोच्च न्यायालय में सरकार द्वारा तत्कालीन राजकुमारों को दिए गए प्रिवी पर्स के मामले में भी इंदिरा गांधी की किरकिरी हुई थी।
न्यायपालिका-कार्यपालिका की यह लड़ाई ऐतिहासिक केशवानंद भारती मामले में जारी रही, जहां 24वें संशोधन पर सवाल उठाया गया था। 7-6 के मामूली बहुमत के साथ, सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने संसद की संशोधन शक्ति को यह कहते हुए प्रतिबंधित कर दिया कि इसका उपयोग संविधान के “मूल ढांचे” को बदलने के लिए नहीं किया जा सकता है। इंदिरा गांधी को यह नागवार लगा और उन्होंने केशवानंद भारती मामले में अल्पमत में शामिल लोगों में सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश ए.एन. रे को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया।
न्यायपालिका को नियंत्रित करने की इंदिरा गांधी की प्रवृत्ति की प्रेस और जयप्रकाश नारायण (जेपी) जैसे राजनीतिक विरोधियों ने कड़ी आलोचना की। जयप्रकाश नारायण ने देश में घूम-घूम कर इंदिरा सरकार के खिलाफ रैलियां की और कुछ राज्यों में छात्रों ने आंदोलन भी किये।
इस बीच, सार्वजनिक नेताओं पर हत्या के प्रयास हुए और साथ ही तत्कालीन केन्द्रीय रेल मंत्री ललित नारायण मिश्रा की बम से हत्या कर दी गई। इन सभी बातों से पूरे देश में कानून और व्यवस्था की समस्या बढ़ने का संकेत मिलने लगा, जिसके बारे में इंदिरा गांधी के सलाहकारों ने उन्हें महीनों तक चेतावनी दी थी। इसके बाद मामले को हाथ से निकलता देख इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाने का फैसला किया। कांग्रेस पार्टी का यह फैसला देश के लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हुआ और इसे एक काला दिन के रूप में याद किया जाने लगा।
18 वीं लोकसभा के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आपातकाल को लेकर कांग्रेस पर तीखा हमला किया और आपातकाल की घोषणा को भारत के लोकतंत्र पर एक “काला धब्बा” बताया। 18वीं लोकसभा के पहले सत्र से पहले मीडिया को संबोधित करते हुए देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने कहा, “कल 25 जून को भारत के लोकतंत्र पर लगे उस कलंक के 50 साल हो रहे हैं। भारत की नई पीढ़ी कभी नहीं भूलेगी कि भारत के संविधान को पूरी तरह से नकार दिया गया था, संविधान के हर हिस्से की धज्जियां उड़ा दी गई थीं, देश को जेलखाना बना दिया गया और लोकतंत्र को पूरी तरह से दबा दिया गया था।” उन्होंने कहा, “अपने संविधान की रक्षा करते हुए, भारत के लोकतंत्र की, लोकतांत्रिक परंपराओं की रक्षा करते हुए, देशवासी यह संकल्प लेंगे कि भारत में फिर कोई ऐसा करने की हिम्मत नहीं करेगा जो 50 साल पहले किया गया था। हम एक जीवंत लोकतंत्र का संकल्प लेंगे। हम भारत के संविधान के निर्देशों के अनुसार आम लोगों के सपनों को पूरा करने का संकल्प लेंगे।”
18वीं लोकसभा के चुनाव की घोषणा होने के बाद कांग्रेस पार्टी के प्रमुख मुद्दों में से एक संविधान बचाने का मुद्दा था। जिसे पार्टी आज भी जोर शोर से उठा रही है। विडंबना ये है कि जिस कांग्रेस ने संविधान में सैकड़ों संशोधन किए, उसके मूल ढांचे में संशोधन किए वह पार्टी आज संविधान बचाने की बात कर रही है। जिस भारतीय जनता पार्टी की पूरी राजनीति संविधान में दिए गए प्रावधान के तहत समाज के गरीबों, महिलाओं, वंचितों और दलितों की उत्थान के लिए है आज उस बीजेपी पर संविधान की दुर्दशा करने वाली कांग्रेस पार्टी आरोप लगा रही है।
देश के महानायक प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कई बार इस बात का जिक्र किया है कि भारत की आत्मा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के संविधान में बसती है और इसे संसद भी नहीं बदल सकती। इसके बाद भी कांग्रेस पार्टी द्वारा गलत अवधारणा फैला कर जनता को बरगलाने का काम किया जा रहा है। लोकसभा चुनावों में जनता कांग्रेस और उनके साथियों के झांसे में आ गई थी, लेकिन विपक्षी पार्टियों की काठ की यह हांडी बार बार नहीं चढ़ेगी।(विनायक फीचर्स)(लेखक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।)
रानी दुर्गावती – जनकल्याण और शौर्य का शिखर

(डॉ. मोहन यादव-विभूति फीचर्स)
वह दुर्गाष्टमी का दिन था जब भारत भूमि पर एक ऐसी बेटी ने जन्म लिया, जिसके संस्कारों में एक तरफ तो करुणा और संवेदना समाहित थी, वहीं दूसरी ओर शौर्य, पराक्रम और सतीत्व रगों में दौड़ता था। आज पांच सौ वर्षों के बाद भी हम यदि इतनी श्रद्धा और गौरव के साथ वीरांगना रानी दुर्गावती का स्मरण कर रहे हैं तो वह किसी राज परिवार की प्रमुख होने के नाते नहीं, बल्कि उनके दूरगामी जनकल्याणकारी कार्यों और शौर्य की उस गाथा के कारण कर रहे हैं, जिसने भारत की नारी की वीरता को शिखरतम बिन्दु तक रेखांकित किया है।
5 अक्टूबर 1524 को कालिंजर में पैदा हुईं दुर्गावती का बलिदान 24 जून 1564 में हुआ। अर्थात 40 वर्ष की आयु में उन्होंने एक ऐसी प्रेरक परिपाटी खड़ी कर दी, जो आज भी मानवता के लिए मिसाल बनी हुई है। महारानी की वीरता की बात करें तो उन्होंने अपने छोटे से जीवन काल में लगभग 52 युद्ध लड़े और उनमें से 51 युद्धों में विजय प्राप्त हुई। मालवा के सुल्तान बाज बहादुर से लेकर अकबर तक मुगलों के अनेक भारी आक्रमणों का मुंहतोड़ जवाब देने वाली दुर्गावती ने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए आत्म बलिदान दिया। कोई दुश्मन उनकी देह को हाथ नहीं लगा सका। क्या अद्भुत अवतारी थीं रानी दुर्गावती कि विवाह के मात्र चार वर्ष बाद ही पति दलपत शाह की मृत्यु के कारण पूरे राजकाज का बोझ सिर पर आने के बाद भी न केवल एक वर्ष के अपने बेटे की परवरिश की बल्कि निरंतर युद्ध के मैदान में भी वीरता दिखाई।
सोलह वर्ष के शासन काल में एक ओर जहां दुर्गावती लगभग 52 बड़े युद्धों में रणचण्डीत की तरह टूटती रहीं, वहीं दूसरी ओर राज्य की जनता की खुशहाली के लिए पूरी संवेदनाओं के साथ सक्रिय रहीं। जल संरक्षण के क्षेत्र में रानी दुर्गावती के योगदान को वैश्विक मानकों में सबसे ऊपर रखा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। अपने सहयोगियों के प्रति ऐसा असीम स्नेह करती थीं कि उनके नाम पर कई बांध, तालाब और बाबड़ियां बनाई। अपने सहयोगी के नाम पर निर्मित आधारताल आज भी जबलपुर में रानी के जल संरक्षण के उच्च मानकों की गाथा गौरव के साथ कह रहा है।
शौर्य या वीरता रानी दुर्गावती के व्यक्तित्व का एक पहलू था। वो एक कुशल योद्धा होने के साथ-साथ एक कुशल प्रशासक थीं और उनकी छवि एक ऐसी रानी के रूप में भी थी, जो प्रजा के कष्टों को पूरी गहराई से अनुभव करती थीं। इसीलिए गोंडवाना क्षेत्र में उन्हें उनकी वीरता और अदम्य साहस के अलावा उनके जनकल्याणकारी शासन के लिए भी याद किया जाता है। रानी दुर्गावती के शासन में नारी की सुरक्षा और सम्मान उत्कर्ष पर था। न्याय और समाज व्यवस्था के लिए हजारों गांवों में रानी के प्रतिनिधि रहते थे। प्रजा की बात रानी स्वयं सुनती थीं। पूरा कोइतूर गोंड समाज उनके निष्पक्ष न्याय के लिए उन्हे “न्याय की देवी” के नाम से पुकारता और जानता था। रानी दुर्गावती अपने पराजित दुश्मन के साथ भी उदारता का व्यवहार करती थीं और उन्हें सम्मानपूर्वक कीमती उपहार और पुरस्कार के साथ शुभकामनाएँ देकर अपने नियंत्रण में रखती थीं। उनकी यह रणनीति हमेशा काम करती थी इसीलिए कभी भी गोंडवाना में विद्रोह के स्वर नहीं उठे।
वे जन कल्याण की जीवंत प्रतिमूर्ति थीं। गोंड साम्राज्य में बने तमाम मठ मंदिर, कुंए, तालाब, नहरें, धर्मशालाएं इसकी गवाह हैं। उनके साम्राज्य में समृद्धि ऐसी थी कि जनता स्वर्ण मुद्राओं से व्यापार करती थी। इसी समृद्धि को लूटने के लिए अकबर जैसे आक्रांताओं ने दुर्गावती के राज्य पर बार-बार आक्रमण किए। रानी ने बार-बार अकबर को शिकस्त दी, लेकिन अकबर की सेना के साथ चौथे युद्ध में वे बुरी तरह घिर गईं। उनकी आंख और गर्दन में तीर घुस गए तब उन्होंने अपने संकल्प ”विजय नहीं तो क्या हुआ, बलिदान तो संभव है” का स्मरण करते हुए स्वयं के वक्ष में कटार घोंपकर रणभूमि में आत्म बलिदान कर दिया। रानी की चिता को रणभूमि में ही अग्नि दी गई। उसी स्थान को बरेला नाम से जानते हैं।
सच तो यह है कि आत्म अस्मिता और स्वतंत्रता के लिए दिए जाने वाले ऐसे बलिदान ही प्रतिमान गढ़ते हैं। लेकिन यह प्रतिमान प्रतिपल ध्यान में रहें तो पीढ़ियों तक राष्ट्र स्वाभिमान जाग्रत रह सकता है। दुर्भाग्य से 1947 की स्वतंत्रता के बाद भी लंबे समय तक रानी दुर्गावती जैसी वीरांगनाओं और शूरवीरों की स्मृतियों को संजोए रखने के बेहतर प्रयास नहीं हुए। मुगलों, शकों, हूणों और अंग्रेजों के विरुद्ध किए गए युद्धों की श्रंखला में हमारे वनवासी, जनजाति समाज के नायकों का अतुलनीय और अविस्मरणीय योगदान है। परन्तु सच तो यही है कि रानी दुर्गावती से लेकर महानायक बिरसा मुण्डा, शंकर शाह, रघुनाथ शाह, टंट्या मामा जैसे महानायकों के शौर्य की प्राण प्रतिष्ठा का काम हमारे विचार की सरकारों ने ही किया है। भारत में जहां ”जनजातीय गौरव दिवस” जैसा आत्म-सम्मान प्रदान करने वाले प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का संकल्प हो अथवा जनजाति मंत्रालय के पृथक गठन का पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी का ऐतिहासिक फैसला हो, राष्ट्रीय विचार ने ही अपने उन भाई-बहनों के सम्मान और संसाधन पर ध्यान केन्द्रित किया है, जो कभी राजा थे लेकिन समय के थपेड़े में बिछड़ते और पिछड़ते चले गए।
जनजाति समाज की समृद्ध परंपराओं पर केन्द्रित करते हुए हमारी सरकारों ने अपने बंधुओं को सम्मान और संसाधान से परिपूर्ण बनाने के लिए ‘पेसा’ एक्ट लागू किया। महानायकों की स्मृतियों को चिरस्थायी रखने के लिए जहां संग्रहालय बनाए जा रहे हैं, वहीं माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की पहल पर भोपाल में रेलवे स्टेशन को रानी कमलापति को समर्पित कर दिया गया है। मुझे लगता है कि जनजाति महानायकों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए हमें अभी बहुत काम करने की आवश्यकता है। मेरी सरकार की पहली कैबिनेट बैठक रानी दुर्गावती की सुशासन नगरी जबलपुर में किए जाने का हमारा भावनात्मक आधार ही था। यह रानी दुर्गावती का 500वां जन्म शताब्दी वर्ष चल रहा है। हम इसे दूरगामी प्रेरणा पर्व के रूप में मनाने का प्रयत्न कर रहे हैं।
केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा संचालित अनेक जनकल्याणकारी योजनाओं का भरपूर लाभ जनजाति समाज को मिले, ऐसा भरसक प्रयास हम कर रहे हैं। जनजाति अस्मिता, संरक्षण और सांस्कृतिक संवर्द्धन हमारी सरकार का संकल्प है। जैसा कि मैंने पूर्व में कहा कि जनजाति समाज को सम्मान और संसाधन प्रदान करना हमारा नैतिक दायित्व है। यही रानी दुर्गावती जैसी शौर्य, पराक्रम और संवेदनशीलता की प्रतिमूर्ति के श्रीचरणों में सच्ची श्रद्धांजलि होगी। *(विभूति फीचर्स)(लेखक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं)*
सिंगर ऋतु पाठक ने गाया फिल्म ‘सुशासन’ के लिए सुधाकर शर्मा का लिखा गीत ढिंचक सरफिरी
मुंबई। सलमान खान की नायिकाओं की चुनरिया उड़ाते रहे चर्चित गीतकार सुधाकर शर्मा ने अपना प्लेटफार्म तो नहीं पर पैंतरा ज़रूर बदल लिया है।
सुधाकर शर्मा ने सलमान की फिल्म प्यार किया तो डरना क्या, बीवी नंबर 1 और हैलो ब्रदर के गाने में चुनरी का प्रयोग किया था जो हिट साबित हुआ था। अब उन्होंने नये अंदाज के आइटम नंबर लिखना आरम्भ कर दिया है। अभी हाल ही में हिन्दी फिल्म “सुशासन” के लिए शर्मा ने एक आइटम नंबर लिखा जो सोशल नेटवर्किंग से संबंधित/ संदर्भित शब्दों से सराबोर एक फड़कता गीत है। इसे जलेबी बाई गीत गाकर चर्चा में आई सिंगर ऋतु पाठक ने एक बिंदास अंदाज में आया है। संगीत देने वाले युवराज मोरे ने कहा, यह गीत इतना मॉडर्न और ट्रेंडी है कि ऋतु को लोग सरफिरी सरफिरी बोलने लगेंगे। सुधाकर ने अपने पुराने ट्रेंड चुनरिया को छोड़कर यह गीत ढिंचक सरफिरी लिखा है जो काबिले तारीफ है। युवराज मोरे ने गीत के अनुसार ही नये अंदाज का म्यूजिक दिया है।
वसुन्धरा फिल्म्स प्रोडक्शन प्रा लि कृत हिन्दी फिल्म “सुशासन” का आइटम नंबर गीत “ढिंचक सरफिरी” हाल ही में ऋतु पाठक के स्वर में कृष्णा ऑडियो रिकॉर्डिंग स्टूडियो, गोरेगांव (पश्चिम), मुंबई में रिकॉर्ड किया गया। सुधाकर शर्मा द्वारा रचित इस गीत के लिए संगीत युवराज मोरे ने दिया है। फिल्म के निर्माता मनीष कुमार सिंह, सह – निर्मात्री निवेदिता देव तथा लेखक – निर्देशक दीपक पाण्डेय हैं।
इस फिल्म की शूटिंग पूरी हो चुकी है और जिसमें प्रसिद्ध अभिनेता राजपाल यादव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
कबीर जयंती 22जून – भक्त कबीर दास
(दमनजीत सिंह- विनायक फीचर्स)
मध्यकाल में जब संतसाहित्य का उदय हुआ, उस समय उत्तर भारत की सामाजिक एवं राजनीति स्थिति अत्यंत दयनीय एवं अव्यवस्थित थी। दिल्ली का शासन तैमूर के आक्रमणों को झेल रहा था, तुगलक, सैयद एवं लोधी वशंजों द्वारा राज्य विस्तार लालसा, हिंसा, छल-कपट और जबरन धर्म परिवर्तन के कारण जनमानस विक्षुब्धता, अकारण पीड़ा और नैराश्य जीवन जीने को मजबूर था। ऐसे समय में कबीर जी का जन्म ज्येष्ठ सुदी 15वीं विक्रमी संवत् 1455 को बनारस (काशी) नगर में एक विधवा ब्राह्मण महिला से हुआ था, जिसने उन्हें लोक लज्जावश लहरतारा तालाब में फैंक दिया था। मुस्लिम जुलाहा परिवार अली वीरू नामक दंपत्ति द्वारा पाले गये भक्त कबीर का संपूर्ण जीवन संघर्षमय रहा। काशी के धार्मिक एवं संस्कृति के विद्वानों का प्रमुख स्थान होने के कारण भक्त कबीरजी साधु-संतों की संगत कर विचार-विमर्श से अच्छे प्रगाढ़ ज्ञाता, प्रचारक एवं आलोचक बन गये। गृहस्थ धर्म का पालन करते हुये भक्त कबीरजी का विवाह मुदृभाषी एवं सेवाभावी लोईजी नामक महिला से हुआ, जिससे आपके परिवार में एक पुत्र पैदा हुआ, जिसका नाम कमाल रखा गया। भक्त कबीरजी ने ‘हरि को भजे सो हरि को होई…’ के अनुरूप ब्राह्मण सम्प्रदाय के भक्त रामानन्दजी को अपना गुरु मानकर ज्ञानार्जित किया। यद्यपि भक्त कबीरजी जुलाहा जाति के थे। पर भक्त रामानंदजी ने राम नाम के जिस अलौकिक बीज को बोया था, भक्त कबीरजी ने उसे ‘प्रेम न पूछे जात’ कहकर अविरल आध्यात्मिक धारा के साथ निरंतर खींचा। आदि श्री गुरुग्रंथ साहिबजी जो आध्यात्मिक, सामाजिक, धार्मिक एवं राष्ट्रीयता के प्रणेता हैं, में भक्त कबीरजी की 540 वाणियां (शब्द) गुरुमत विचारधारा के अनुरूप दर्ज हैं, जो 30 हिन्दू भक्तों एवं मुस्लिम की भक्त माला में सर्वाधिक हैं। भक्त कबीरजी सत्य के पुजारी थे, जो किसी अन्य आकर्षण अथवा मोहमाया से दूर ही रहे, उन्होंने तो ईश्वर को पाकर सब कुछ समर्पित भावना से ब्रह्मï में समावेश कर दिया ‘कबीर मेरा मुझमें किछु नहीं जो किछु है सो तेरा, तेरा तुझ कऊ सउपते किआ लागै मेरा।
कबीर जी ने जनमानस में जनजागरण एवं प्रेरणा की भाषा में मानवतावादी, विशुद्धतावादी, आदर्शवादी, पाखंड एवं साम्प्रदायिकता विरोधी धार्मिक आंदोलन को चलाया। राजनैतिक असंतोष के साथ-साथ सामाजिक एवं नैतिक अवमूल्यन शासक वर्ग की ऐश्वर्यमयी विलासिता, साम्प्रदायिक विद्वेष, सांस्कृतिक विभेदनकारी शक्तियों में संत वाणी को एक उत्प्रेरक पृष्ठïभूमि प्रदान की थी, जो कबीरजी के शब्दों में उच्चारित है- अवलि अलह नूरू उपाओ कुदरत के सभ बंदे, एक नूर ते सभी जगु उपजिआ कउन भले को मंदे।
संत साहित्य केवल कागद की लेखी पर आधारित न होकर आखन देखी अर्थात व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है, जहां निगम, अगम पुराणादि पर विशेष बल न देते हुये कथ्य को अधिक ग्राहय, प्रभावी, प्रेषणीय, मनभावन तथा सशक्त बनाने की दृष्टि से प्राचीन धार्मिक सामाजिक मान्यताओं एवं परंपराओं का भी सहारा लिया जाकर सगुण-निर्गुण का नवीन एवं विचित्र सम्मिश्रिण प्रस्तुत किया गया। सगुण का सहारा निर्गुण को स्पष्ट करने हेतु ही लिया गया है, जबकि दार्शनिक आधार तो वस्तुत: निर्गुण रूप ही है।
ज्ञानाश्रयी भक्त कबीरजी ने सत् रूपी परम-तत्व का अनुभव करते हुये जीवन में पवित्रता, ईश्वर मिलन, आचरण की शुद्धता तथा क्रोध लोभ, मोह, अहंकार से मुक्ति के आदर्श सिद्धांतों को प्रमुखता प्रदान की है। जहां मानव धर्म का पालन करते हुये न कोई जात-पात का भेदभाव है और न ही कर्मकांड का बंधन रहता है। इसी कारण मध्यकाल के संतों-साधकों में उनका उच्च स्थान रहा है। उनकी काव्य रचना आत्मसमर्पण की भावना से ओत-प्रोत है, जहां सहजता, उदारता, सरलता, आत्मसंतोष, सहनशीलता निस्पृद (लोभ-लालच रहित) के सिद्धांत विद्यमान हैं। साधनावृत्ति, आचरण शुद्धता और उत्कृष्ठ जीवनशैली के कारण कबीरजी पढ़े-लिखे न होकर भी पूर्ण आत्मसमर्पित थे, जिनका ब्रह्म निराकार निरंजन सर्वव्यापक निर्गुण अरूप और रूप विधान से परे है। संघर्षमयी जीवन के कारण उनकी आलोचना एवं उपदेश पूर्ण रूप से तथ्यों एवं प्रमाणों पर आधारित होते थे, क्योंकि वे स्पष्टवादी और क्रांतिकारी नायक थे। धार्मिक, सामाजिक प्रचलित कुरीतियों को दूर करने के लिए उन्होंने केवल दिशा-निर्देश ही प्रदान नहीं किये अपितु व्यवहारिक जीवन में स्वयं भी वही मार्ग अपनाया, भूखे भगति न कीजै, यह माला अपनी लीजै।
समाज उस समय यह धारणा बना चुका था कि काशी में मृत्यु होने पर मुक्ति मिल जाती है तथा मगहर नामक स्थान पर मृत्यु से मुक्ति नहीं मिलती। इस अवधारणा का खंडन करते हुये देहांत से कुछ समय पूर्व वे मगहर स्थान पर जाकर बस गये और यहीं पर ही विक्रमी संवत् 1533 को शरीर त्यागकर ब्रह्मलीन हो गये। काशी में भक्त कबीरजी का पवित्र स्थान कबीर चौरा के नाम से स्थापित है। इसी प्रकार से लहर तालाब पर भी आपकी स्मृति में पावन स्थान सुशोभित हो रहा है। सर्व शक्तिमान एवं सर्वव्यापक ईश्वर पर कबीर का अटूट विश्वास था, जब उन्हें गंगा नदी में डुबोने का प्रयत्न किया गया और राजा द्वारा हाथ-पांव बांधकर हाथी के आगे मरने के लिए फैंक दिया गया किन्तु फिर भी ब्रह्मनिष्ठ कबीरजी का कुछ भी नहीं हुआ और वह पूर्णत: सुरक्षित रहे।
आधुनिक समय में आवश्यकता है भक्त कबीरजी के उपदेशों की सर्वकल्याणकारी विचारधारा को जीवन में समाहित करने की, जो मानव सेवा की भावना से ओत-प्रोत है। (विनायक फीचर्स)
“सुशासन” का आइटम नंबर ऋतु के स्वर में रिकॉर्ड
राजपाल यादव कामयाब करेंगे बिहार में शराबबंदी
“सुशासन” का आइटम नंबर ऋतु के स्वर में रिकॉर्ड
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वसुन्धरा फिल्म्स प्रोडक्शन प्रा० लि० कृत हिन्दी फिल्म “सुशासन” का आइटम नंबर गीत – “ढिंचक सरफिरी” – हाल ही में ऋतु पाठक के स्वर में कृष्णा ऑडियो रिकॉर्डिंग स्टूडियो, एस वी रोड, गोरेगांव (पश्चिम), मुंबई में रिकॉर्ड किया गया। सुधाकर शर्मा द्वारा रचित इस गीत के लिए संगीत युवराज मोरे ने दिया है। राजनीतिक पृष्ठभूमि पर आधारित और शराबबंदी को लेकर बन रही है मनीष सिंह की फिल्म “सुशासन”।
बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा लागू की गई शराबबंदी को लेकर पनपे पक्ष विपक्ष की दलीलों पर एक बेबाक नज़रिया डालती है फिल्म “सुशासन”। इस अभियान में एक जुझारू युवक की महत्वपूर्ण भूमिका में दिखाई पड़ेंगे सर्वप्रिय अभिनेता राजपाल यादव। नवोदित निर्देशक दीपक पाण्डेय ने “सुशासन” को बिहार की जन समस्याओं को लेकर बनाई जा रही एक सोशल एंटरटेनमेंट फिल्म बताया। राजपाल प्रथम बार एक जनसेवा करनेवाले मुखर व्यक्ति के रूप में नज़र आएंगे। फिल्म के निर्माता मनीष कुमार सिंह, सह – निर्मात्री निवेदिता देव तथा लेखक – निर्देशक दीपक पाण्डेय हैं।
मिर्जापुर सीजन 3 का इंटेंस ट्रेलर रिलीज; सत्ता और बदले की सबसे खूनी लड़ाई होगी अबकी बार
प्राइम वीडियो, रितेश सिधवानी और फरहान अख्तर की एक्सेल मीडिया एंड एंटरटेनमेंट ने मिर्जापुर सीजन 3 का इंटेंस ट्रेलर किया रिलीज; सत्ता और बदले की सबसे खूनी लड़ाई के लिए अब हो जाइए तैयार
भारत का सबसे पसंदीदा मनोरंजन स्थल, प्राइम वीडियो ने बहुप्रतीक्षित क्राइम थ्रिलर मिर्जापुर के तीसरे सीज़न का रोमांचक ट्रेलर लॉन्च किया। एक्सेल मीडिया एंड एंटरटेनमेंट द्वारा निर्मित और गुरमीत सिंह और आनंद अय्यर द्वारा निर्देशित, इस फैन-फेवरेट सीरीज़ में पंकज त्रिपाठी, अली फज़ल, श्वेता त्रिपाठी शर्मा, रसिका दुग्गल, विजय वर्मा, ईशा तलवार, अंजुम शर्मा, प्रियांशु पेन्यूली, हर्षिता शेखर गौर, राजेश तैलंग, शीबा चड्ढा, मेघना मलिक और मनु ऋषि चड्ढा सहित एक शानदार कलाकार समूह शामिल है। सीज़न 3 के साथ, दांव और भी ऊँचे हो गए हैं और कैनवास बड़ा हो गया है। यह दस-एपिसोड की सीरीज़ विशेष रूप से 5 जुलाई, 2024 से प्राइम वीडियो पर भारत और दुनिया भर के 240 देशों और क्षेत्रों में प्रीमियर होगी। भारत में प्राइम सदस्य सिर्फ ₹1499/साल में बचत, सुविधा और मनोरंजन का आनंद लेते हैं।
भारत के अंदरूनी इलाकों में सेट, मिर्जापुर फ्रेंचाइज़ी ने अपनी शक्ति, बदला, महत्वाकांक्षा, राजनीति, विश्वासघात, धोखा और जटिल पारिवारिक गतिशीलता की मनोरंजक गाथा से लाखों दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया है। पिछले सीज़न के रोंगटे खड़े कर देने वाले क्लाइमैक्स पर आधारित, मिर्जापुर सीज़न 3 का ट्रेलर दर्शकों को पुनः पूर्वांचल के अपराध और सत्ता की एक आकर्षक, फिर भी अंधेरी और क्रूर दुनिया में ले जाता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि कहानी कैसे सामने आती है और नये सीज़न में कहानी कहने की रचनात्मक सीमाएं कितनी आगे बढ़ती हैं।
निर्देशक और कार्यकारी निर्माता गुरमीत सिंह ने कहा, “मिर्जापुर के पहले दो सीजन भारत में स्ट्रीमिंग स्पेस में क्राइम थ्रिलर शैली के लिए गेम चेंजर साबित हुए। मिर्जापुर 3 के साथ, हम इस गति को बनाए रखने और कथा को एक नए स्तर पर ले जाने का प्रयास कर रहे हैं, प्रत्येक किरदार के जीवन के नए पहलुओं और आयामों का अन्वेषण कर रहे हैं, जिसमें नई साजिश की उलझने भी शामिल हैं। हम बेहद उत्साहित हैं कि प्रशंसक नए सीज़न में मिर्जापुर के सिंहासन के लिए होने वाले संघर्ष को देख सकें। दांव और भी ऊँचे हो गए हैं और कैनवास निश्चित रूप से बड़ा हो गया है। साढ़े तीन साल के अंतराल के बाद, हम, अपने दर्शकों की तरह, प्राइम वीडियो पर मिर्जापुर 3 के वैश्विक प्रीमियर का और इंतजार नहीं कर सकते।
मिर्जापुर सीजन 3 के निर्देशक गुरमीत सिंह और आनंद अय्यर, कार्यकारी निर्माता रितेश सिधवानी, फरहान अख्तर, कासिम जगमगिया और गुरमीत सिंह, लेखक अपूर्व धर बडगईयन, अविनाश सिंह तोमर, अविनाश सिंह और विजय नारायण वर्मा हैं।
विवेक रंजन अग्निहोत्री ने ‘द दिल्ली फाइल्स’ के लिए पैन इंडिया लेवल पर की कास्टिंग करने की घोषणा
अपनी पाथब्रेकिंग और शानदार फिल्मों के सिलसिले को जारी रखते हुए, फिल्म मेकर विवेक रंजन अग्निहोत्री अपने अगले प्रोजेक्ट “द दिल्ली फाइल्स” से पर्दा उठाने वाले हैं। फिल्म की घोषणा के बाद से ही चर्चा का माहौल बना हुआ है, जो एक ग्रैंड स्केल पर एक ग्राउंडब्रेकिंग कहानी का वादा करती है। एक हालिया अपडेट में, ‘आई एम बुद्धा’ के प्रोड्यूसर ने एक बड़ा कदम उठाया है, जिसमें उन्होंने “द दिल्ली फाइल्स” में महात्मा गांधी और मुहम्मद अली जिन्ना की अहम भूमिकाओं के लिए पैन इंडिया लेवल पर कास्टिंग शुरू की है।
विवेक रंजन अग्निहोत्री की अपकमिंग फिल्म ‘द दिल्ली फाइल्स’ मोमेंटम और पैमाने हासिल कर रही है। टीम ने फिल्म के लिए गहरी रिसर्च की है, और अब प्रोड्यूसर ने देश भर के लोगों के लिए नेशनवाइड कास्टिंग के अवसर खोलकर एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। ‘आई एम बुद्धा’ और अभिषेक अग्रवाल आर्ट्स उन एक्टर्स की तलाश कर रहे हैं, जो “द दिल्ली फाइल्स” में महात्मा गांधी और मुहम्मद अली जिन्ना की भूमिकाओं को निभाना चाहते हैं।
यह पहली बार है जब किसी फिल्म के लिए कास्टिंग इतने बड़े पैमाने पर खोली गई है, जिससे आम लोग भी इसमें भाग ले सकें और फिल्म का हिस्सा बन सकें। यह उन लोगों के लिए एक सुनहरा मौका है, जो मानते हैं कि उनमें एक्टर बनने का टैलेंट है।
विवेक रंजन अग्निहोत्री ने अपने सोशल मीडिया पर कास्टिंग की जानकारी शेयर करते हुए लिखा है –
“कास्टिंग अलर्ट:
#TheDelhiFiles के लिए मोहनदास करमचंद गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना की तलाश है।”
https://x.com/vivekagnihotri/status/1802936834852618654
विवेक रंजन अग्निहोत्री ने अपनी फिल्म के लिए सटीक और अहम जानकारी जुटाने के लिए केरल से कोलकाता और फिर दिल्ली तक लंबी दूरी तय की है। उन्होंने अपनी फिल्म की कहानी में सच्चाई की हर एक परत जोड़ने के लिए असल कहानी वाली एतिहासिक घटाओं से जुड़ी 100 से ज्यादा किताबें और 200 से ज्यादा लेख पढ़ें हैं, जो उनकी फिल्म का आधार है। विवेक रंजन अग्निहोत्री और उनकी टीम ने रिसर्च वर्क के लिए 20 राज्यों की यात्रा की है। इसके अलावा, उन्होंने 7000 से ज्यादा रिसर्च पेजेस और 1000 से ज्यादा आर्काइव्स पर स्टडी की है।
विवेक रंजन अग्निहोत्री द्वारा द दिल्ली फाइल्स की रिसर्च में की गई बहुत सारी मेहनत और डेडीकेशन उनकी आर्ट के लिए कमिटमेंट को दर्शाता है, जिससे दर्शकों को एक दमदार और बेहद जुड़ाव महसूस कराने वाली फिल्म की उम्मीद है।
सेल्सफोर्स इंडिया ने पब्लिक सेक्टर डिवीजन किया लॉन्च
मुंबई। नंबर 1 सीआरएम, सेल्सफोर्स (एनवाईएसई: सीआरएम) ने आज परिवर्तन को बढ़ावा देने के लिए भारत में अपने पब्लिक सेक्टर डिवीजन के लॉन्च की घोषणा अरुंधति भट्टाचार्य, सीईओ और चेयरपर्सन, सेल्सफोर्स इंडिया और अरुण कुमार परमेश्वरन, मैनेजिंग डायरेक्टर, सेल्स एंड डिस्ट्रीब्यूशन, सेल्सफोर्स इंडिया की, जिसका उद्देश्य सेल्सफोर्स टेक्नोलॉजी के साथ नागरिकों के अनुभवों को बदलने के लिए सरकारी एजेंसियों और सार्वजनिक क्षेत्र के संगठनों को सशक्त बनाना है।
सेल्सफोर्स पब्लिक सेक्टर सॉल्यूशन को डिजिटल सेवा वितरण के लिए डिज़ाइन किए गए आउट-ऑफ-द-बॉक्स ऐप के साथ सरकारी एजेंसियों को जनता तक तेज़ी से सेवाएं पहुंचाने में मदद करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। सेल्सफोर्स आइंस्टीन 1 प्लेटफ़ॉर्म पर बनाया गया, यह सरकारी संगठनों को नागरिक डेवलपर्स, एआई और ऑटोमेशन टूल के साथ अपने आईटी निवेश को भविष्य में सुरक्षित बनाता है, जबकि उनकी सेवाओं की चपलता, कार्यकुशलता और डिजिटल परिवर्तन को बढ़ाने में मदद करता है। सेल्सफोर्स ने हाल ही में पब्लिक सेक्टर के लिए आइंस्टीन 1 के लॉन्च की भी घोषणा की, जिसमें सरकारी एजेंसियों को प्रशासनिक कार्यों को स्वचालित करने और नागरिकों को तेज सेवाएं प्रदान करने में मदद करने के लिए सीआरएम, विश्वसनीय एआई और डेटा क्षमताएं शामिल हैं।
सेल्सफोर्स पब्लिक सेक्टर सॉल्यूशन हाइपरफोर्स नामक पब्लिक क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर पर उपलब्ध हैं, जो पब्लिक क्लाउड के लिए बनाया गया अगली पीढ़ी का इंफ्रास्ट्रक्चर आर्किटेक्चर है। यह ग्राहकों को उनके डेटा रेजीडेंसी, डेटा नियंत्रण और सुरक्षा दायित्वों को पूरा करने में मदद करता है। मूल रूप से, हाइपरफोर्स सुरक्षा-प्रथम संस्कृति, जीरो ट्रस्ट सिद्धांतों और उन्नत गोपनीयता-केंद्रित मानकों को एकीकृत करने के लिए पब्लिक क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर की शक्ति का उपयोग कर रहा है। भारत में सरकारी एजेंसियों और सार्वजनिक क्षेत्र के संगठन सेल्सफोर्स के उत्पाद पेशकशों के साथ काफी हद तक सफल हैं।
टेबल्यू और आइंस्टीन एनालिटिक्स उन्नत डेटा विज़ुअलाइज़ेशन और एआई-संचालित एनालिटिक्स प्रदान करते हैं। म्यूलसॉफ्ट के एकीकरण समाधान अनुभव को बदलने के लिए सेल्सफोर्स को किसी भी क्लाउड या ऑन-प्रिमाइसेस सिस्टम के साथ एकीकृत करना आसान बनाते हैं । इसके अतिरिक्त, स्लैक एआई-संचालित सारांश और डेटा-ट्रिगर वर्कफ़्लो के साथ काम को अधिक उत्पादक और संवादात्मक बनाता है। सेल्सफोर्स लो कोड प्लेटफ़ॉर्म अद्वितीय आवश्यकताओं के लिए कस्टम एप्लिकेशन बनाने की अनुमति देता है। ऐपएक्सचेंज विशेष रूप से सरकारी उपयोग के लिए डिज़ाइन किए गए विभिन्न प्रकार के प्री-बिल्ट ऐप भी ऑफर करता है।
अरुंधति भट्टाचार्य, सीईओ और चेयरपर्सन, सेल्सफोर्स इंडिया ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र पर हमारा ध्यान ऐसे समय में आया है जब क्लाउड डिजिटल परिवर्तन प्रयासों में एक मूलभूत शक्ति बन गया है, जो नवाचार का मार्ग प्रशस्त करने और भारत को 2030 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था बनने के लिए प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस – प्रिडिक्टिव और जनरेटिव दोनों, मशीन लर्निंग और विश्वास पर आधारित एप्लिकेशन विकास नागरिकों के अनुभवों को आगे बढ़ाएगा।
अरुण कुमार परमेश्वरन, मैनेजिंग डायरेक्टर, सेल्स एंड डिस्ट्रीब्यूशन, सेल्सफोर्स इंडिया ने कहा कि आज, नागरिक अपने द्वारा उपयोग किए जाने वाले प्रत्येक प्लेटफ़ॉर्म पर उनके लिए बेहतर, तेज़ सेवा की उम्मीद करते हैं। विश्वास और गहन उद्योग विशेषज्ञता के साथ एकीकृत डेटा प्लेटफ़ॉर्म पर आधारित सेवाएँ प्रदान करने के लिए नागरिकों का 360 डिग्री व्यू बनाना सरकारी एजेंसियों के लिए जबरदस्त संभावनाएँ खोलेगा। जनरेटिव एआई सरकार के कई कार्यों और स्तरों में सालाना 1.75 ट्रिलियन डॉलर की उत्पादकता के अवसर को खोल सकता है। मेरा मानना है कि सरकारी एजेंसियों के साथ सेल्सफोर्स के सहयोग में भारतीय नागरिकों के अनुभवों को महत्वपूर्ण रूप से आकार देने और उन्हें फिर से परिभाषित करने की क्षमता है। मैं भारत में सेल्सफोर्स के लिए इस महत्वपूर्ण उपलब्धि का हिस्सा बनने और इसे नई ऊंचाइयों पर ले जाने, अनुभवों को आधुनिक बनाने और सार्वजनिक क्षेत्र को अद्वितीय मूल्य प्रदान करने के लिए उत्साहित हूँ।
सेल्सफोर्स इंडिया ने हाल ही में हैदराबाद, भारत में अपने प्रमुख फ्लैगशिप सेंटर (सीओई) का विस्तार किया है, जिससे इस क्षेत्र को कंपनी के लिए एक प्रमुख प्रतिभा, ज्ञान और वैश्विक नवाचार केंद्र के रूप में मजबूत किया गया है। आज, सेल्सफोर्स के भारत में हैदराबाद, बेंगलुरु, मुंबई, गुरुग्राम, पुणे और जयपुर में 11,000 से अधिक कर्मचारी हैं।
कंपनी दुनिया भर के पब्लिक सेक्टर के संगठनों को एक विश्वसनीय क्लाउड वातावरण में सरकारी सेवा का आधुनिकीकरण करने, डिजिटल सेवा वितरण में बदलाव लाने, तेजी से मूल्य निर्धारण करने और एआई, उद्देश्य-निर्मित समाधान और स्मार्ट अंतर्दृष्टि के साथ मिशन की सफलता में सुधार करने लिए सक्षम बना रही है, जो मिशन को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं।
भारत सेल्सफोर्स के लिए लगातार तेजी से विकास करने वाला मार्केट बना हुआ है। वित्तीय सेवाओं, मैन्युफैक्चरिंग, रिटेल और उपभोक्ता वस्तुओं, स्वास्थ्य सेवा, ऑटोमोबाइल, ट्रैवल, रियल एस्टेट, एजुकेशन और पब्लिक सेक्टर में अग्रणी भारतीय व्यवसाय सेल्सफोर्स की ओर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं ताकि उन्हें डिजिटल रणनीतियाँ बनाने में मदद मिल सके, जिससे उत्पादकता और कार्यक्षमता बढ़ेगी, तथा नवाचार के एक नए युग में ग्राहकों के साथ उनके संबंधों में क्रांतिकारी बदलाव आएगा जहाँ उत्पादों और सेवाओं के लिए अपेक्षाएँ बदल रही हैं।
भारत में सेल्सफोर्स की वृद्धि को स्थापित रणनीतिक साझेदारों, स्टार्ट-अप्स, दो मिलियन से अधिक सेल्सफोर्स डेवलपर्स और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाहर किसी भी मार्केट की तुलना में कंपनी के मुफ़्त ऑनलाइन शिक्षण प्लेटफ़ॉर्म – ट्रेलहेड के अधिक उपयोगकर्ताओं के व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा भी समर्थन प्राप्त है। यह एक अद्वितीय, अत्यधिक गतिशील समुदाय है जो क्षेत्र में नए सेल्सफोर्स सॉल्यूशंस और अवसर लाता है।
Kashmir में गऊओं की हत्या मामले ने पकड़ा तूल,
सांबा (अजय) : कश्मीर में हुए गौ हत्या कर उनकी वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट करने का मामला उग्र होता जा रहा है। आज साम्बा, जम्मू, व कठुआ गौ रक्षक सेवा दल के सदस्यों ने जम्मू-पठानकोट राष्ट्रीय राजमार्ग पर सांबा में जमकर रोष प्रकट किया है। उन्होंने चेतावनी देत हुए कहा कि गौ हत्या करने वालों पर अगर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई तो जम्मू संभाग के हालात खराब हो जाएंगे। प्रदर्शनकारियों ने गौ रक्षक दल ने राजमार्ग पर जमकर हंगामा मचाया और इस दौरान पुलिस के अधिकारी भी मौके पर पहुंचे और लोगों को शांत किया। प्रदर्शनकारी लोगों ने कहा पुलवामा में 2 लोगों ने गौ हत्या करके उसके वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिए, जिसे सहन नहीं किया जाएगा।











