(पवन वर्मा-विभूति फीचर्स)
मध्यप्रदेश की कानून-व्यवस्था पर पिछले कुछ दिनों से उठ रहे सवालों ने अंततः सत्ता के शीर्ष को हिला दिया है। मंगलवार रात को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का अचानक पुलिस मुख्यालय पहुँचना, और वहाँ दिए गए तीखे तेवरों वाले निर्देश,यह साफ कर गए कि सरकार अब चेतावनी की मुद्रा में नहीं, बल्कि कार्रवाई के मोड में है।
मध्यप्रदेश के रायसेन व भोपाल में हुई हालिया आपराधिक घटनाएँ भले अलग-अलग प्रकृति की हों, पर एक बात दोनों में समान थी, राज्य की पुलिस व्यवस्थाओं पर सीधे सवाल। रायसेन में जो कुछ हुआ, वह केवल किसी स्थानीय तंत्र की चूक नहीं थी, बल्कि कानून-व्यवस्था पर एक गंभीर धब्बा था। सबसे वीभत्स घटना गौहरगंज की रही, जहाँ छह साल की मासूम बच्ची से दुष्कर्म ने न केवल ज़िले, बल्कि पूरे प्रदेश को स्तब्ध कर दिया। यह वह बिंदु था, जहाँ मुख्यमंत्री का धैर्य टूटा और उनका रुख स्पष्टतः कड़ा हो गया।
मुख्यमंत्री की नाराज़गी सिर्फ शब्दों तक नहीं रही। रायसेन एसपी को तत्काल प्रभाव से हटाकर उन्होंने पुलिस महकमे को एक ठोस और निर्विवाद संदेश दिया कि “सुरक्षा में असफलता की कोई गुंजाइश नहीं, और ऐसी असफलता का मूल्य पद से चुकाना होगा।” यह निर्णय केवल एक अधिकारी का तबादला भर नहीं है, यह उन सभी जिलों के लिए संकेत है जहाँ अपराधियों का मनोबल पुलिस की सुस्ती से बढ़ने लगा है।
गौहरगंज कांड पर मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया में वह बेचैनी साफ झलकती है, जो किसी भी जागरूक शासन प्रमुख में होनी चाहिए। छह साल की बच्ची के साथ हुई यह अमानवीय वारदात केवल एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि राज्य की सामूहिक सुरक्षा प्रणाली की परीक्षा भी है। मुख्यमंत्री ने इसे पुलिस की “निगरानी की विफलता” करार दिया, जो मुख्यमंत्री की एक सही और आवश्यक टिप्पणी थी। क्योंकि यह प्रश्न लंबे समय से अनुत्तरित है कि छोटे जिलों में इस प्रकार की घटनाएँ अचानक कैसे बढ़ रहीं हैं, और अपराधी अवसर कैसे पा रहे हैं?
राजधानी भोपाल की घटनाओं पर भी मुख्यमंत्री ने सख्ती दिखाई। राजधानी में बढ़ती लापरवाही का अर्थ पूरे प्रदेश के लिए खतरे का संकेत है। राजधानी वह आइना है जिसमें सरकार की प्राथमिकताएँ और पुलिस की सतर्कता स्पष्ट दिखती है। यह बात मुख्यमंत्री ने मीटिंग में साफ कर दी है कि “राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था अनुकरणीय होनी चाहिए, असुरक्षा का प्रतीक नहीं।”
मुख्यमंत्री के तेवरों का सार एक ही था, कि अपराध रोकना अब पुलिस की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, केवल अपराधियों को पकड़ लेना ही उसका ‘काम’ नहीं है। यह सोच वर्षों से चली आ रही उस कार्यशैली को भी चुनौती देती है जिसमें पुलिस प्रायः ‘घटना के बाद की कार्रवाई’ पर जोर देती रही है, रोकथाम पर नहीं। मुख्यमंत्री का यह दृष्टिकोण स्वागत योग्य है, क्योंकि अपराधियों का मनोबल तब तक नहीं टूटता, जब तक उन्हें यह भरोसा रहता है कि पुलिस की चौकसी में कहीं न कहीं ढील है।
रायसेन एसपी का हटाया जाना आने वाले समय के लिए एक निर्णायक मोड़ होगा। यह पुलिस कप्तानों और जिलों के अधिकारियों को यह समझा रहा है कि अब आंकड़ों की रिपोर्ट नहीं, जमीन पर ठोस नतीजे मायने रखेंगे। महिलाओं की सुरक्षा, बच्चों की सुरक्षा और संगठित अपराधों पर नियंत्रण,इन मोर्चों पर सरकार अब प्रत्यक्ष निगरानी करेगी और लापरवाही की कीमत तुरंत चुकानी पड़ेगी।
इस पूरी घटना का बड़ा संदेश यह है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव अब कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर राजनीतिक जोखिम लेने को भी तैयार हैं। प्रशासनिक फेरबदल हो या सख्त निर्णय,वे यह दिखा रहे हैं कि “अपराध के प्रति शून्य-सहनशीलता” केवल नारा नहीं, बल्कि क्रियान्वयन का सिद्धांत होगा।
प्रदेश की जनता यही चाहती है कि शासन की संवेदनशीलता सिर्फ बयान या दौरे तक सीमित न रहे, बल्कि धरातल पर महसूस हो। जिस तरह रायसेन की मासूम बच्ची की वेदना ने सबको झकझोरा, उसी तरह मुख्यमंत्री की कार्रवाई ने पुलिस तंत्र को जगाया है। यह जागरण तभी सार्थक होगा जब हर जिले में अपराधियों के मन में यह भय जन्म ले कि इस सरकार में गलती की नहीं, ‘अपराध की सोच’ की भी सजा है।
मध्यप्रदेश आज कानून-व्यवस्था के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। मुख्यमंत्री का यह लौह-मुष्टि वाला रुख उम्मीद जगाता है कि आने वाला समय अपराधियों के लिए नहीं, बल्कि आम नागरिकों के लिए अधिक सुरक्षित होगा। (विभूति फीचर्स)

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